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शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश में स्टूडेंट प्रोटेस्ट अभी भी जारी हैं। जो प्रोटेस्ट एक एंटी-कोटा पीसफुल एजीटेशन से शुरू हुआ था, वो अब डिक्टेटर हसीना के बर्बरता के चलते एक प्रो-डेमोक्रेसी मूवमेंट बन रही है। 30% का फर्जी फ्रीडम फाइटर कोटा तो वहां के सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया, लेकिन अब मुद्दा यह है कि एक आजाद, सो कॉल्ड डेमोक्रेटिक देश में हसीना सरकार की पुलिस और आर्मी स्टूडेंट प्रोटेस्टर्स पे इस तरीके से गोलियां कैसे चला सकती है? हेलीकॉप्टर्स से स्टूडेंट्स को कैसे मार गिरा सकती है? स्टूडेंट ऑर्गेनाइजर्स को किडनैप ऐसे कैसे किया जा सकता है? उन्हें टॉर्चर ऐसे कैसे किया जा सकता है?
9000 से ज्यादा प्रोटेस्टर्स जेल में हैं, 20000 से ज्यादा जख्मी हैं, ऑफिशियल 200 डेड। लेकिन अनऑफिशियल रिपोर्ट्स की मानें तो 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों क्रिटिकली इंजर्ड हैं। और शेख हसीना इस मैसिक की जिम्मेदारी तक नहीं ले रही हैं, उल्टा दूसरों को ब्लेम कर रही हैं।
अभी भी बांग्लादेश के कई शहरों में पुलिस हर मोड़ पर तैनात है। रात को हेलीकॉप्टर की आवाज सुनाई देती है और उसी रात के अंधेरे में स्टूडेंट्स के घरों पर पुलिस की रेड होती है। और फोन पर अगर कोई पॉलिटिकल मैसेज, कोई वीडियो दिख जाए या वीपीएन तक मिल जाए तो अरेस्ट होना एकदम अशो है। मगर अरेस्ट और पुलिस टॉर्चर के बाद भी स्टूडेंट्स का कहना है कि यह मूवमेंट जारी रहेगा जब तक उनकी नाइन पॉइंट डिमांड मीट नहीं हो जाती है।
क्या है ये नाइन पॉइंट डिमांड ऑफ द स्टूडेंट्स ऑफ बांग्लादेश? सुप्रीम कोर्ट के 30% फ्रीडम फाइटर कोटा हटाने के बाद भी स्टूडेंट्स इतना आग बबूला क्यों है? स्टेप डाउन तो छोड़ो, क्या शेख हसीना एक बार भी माफी मांगेगी? हसीना की पुलिस, हसीना की आर्मी के खिलाफ अभी देश और दुनिया को क्या-क्या सबूत मिल रहा है? क्या यह प्रोटेस्ट बांग्लादेश में बिगड़ते इकोनॉमिक और जॉब सिचुएशन हालत को भी दर्शाता है? और क्यों स्टूडेंट्स का मानना है कि डिक्टेटर दीदी कितना भी पुलिस लगा ले, आर्मी लगा ले, मीडिया का दम लगा ले, अभी यह महीना जुलाई-अगस्त 2024 हसीना का बिगिनिंग ऑफ दी एंड है।
बांग्लादेश के होम मिनिस्टर के हिसाब से प्रोटेस्ट और क्रैकडाउन के चलते करीबन 150 लोगों की मौत हुई है। प्रोथम आलो, एक रिलायबल मीडिया हाउस, उसके हिसाब से 210 लोगों की मौत कंफर्म्ड है। मगर स्टूडेंट ऑर्गेनाइजर्स, लोकल जर्नलिस्ट के मुताबिक ये आंकड़ा उससे कई ज्यादा हो सकता है, शायद 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और सरकार ट्रांसपेरेंसी रख नहीं रही है, तो यह मौतों की जो रूमर है, यह और तगड़ी हो रही है। लोग तो इसी आंकड़े को मान रहे हैं।
अब ये विजुअल देखिए। सीनियर बांग्लादेश जर्नलिस्ट सैर खान ने ट्वीट करके एक रिपोर्ट दिखाया। ढाका के रेयर बाजार इंटेलेक्चुअल सिमेट्री में कई सारी आपको अन आइडेंटिफिकेशन हैं। अब इस दावे को हम इंडिपेंडेंटली तो वेरीफाई कर नहीं सकते हैं और ना इतनी इतनी रिलायबिलिटी है कि बांग्लादेश सरकार इसको वेरीफाई करे। पर यह ऐसा इकलौता दावा नहीं है। प्रॉब्लम यहां आती है और शेख हसीना की मीडिया, उसके इंटर बैन, इंटरनेट बैन से सब लोग तो यही सोच रहे हैं ना कि यह सब किया गया है डेथ टोल को छिपाने के लिए। ऐसी कई रिपोर्ट्स आपको दिखेंगी इंटरनेट पर। हॉस्पिटल्स का अगर एग्जांपल ले लेते हैं, ऑफिशियल डेथ रिपोर्ट्स वो देने से इंकार कर रहे हैं। अभी भी कुछ लोग मिसिंग हैं और कई लाशों को फैमिलीज बिना अस्पताल ले जाकर ही सीधे उन्होंने दफन बना दिया है। यानी ऑफिशियल रिकॉर्ड और एक्चुअल डेथ काउंट में काफी बड़ा अंतर है। इस पर शायद डिबेट नहीं है।
शेख हसीना चाहती है कि अब जो हुआ सो हुआ, यह मामला जल्दी से दब जाए, लोगों का जो गुस्सा है, वो ठंडा हो जाए। इसीलिए शायद असली आंकड़ा आपको कभी पता नहीं चलेगा, रियल इन्वेस्टिगेशन होगा नहीं। मगर जब से बांग्लादेश में इंटरनेट वापस आया है, तब से पुलिस ब्रूटालिटी का जो हुआ है पिछले दो-तीन हफ्तों में, उसका जो प्रमाण है, वो भर-भर कर सामने आ रहा है और इसीलिए लोगों का गुस्सा एक्चुअली और भी बढ़ रहा है।
अगर आपको पिछले दो हफ्तों के प्रोटेस्ट की पूरी कहानी नहीं मालूम है, तो हमने पूरा एक बांग्लादेश पर एपिसोड बनाया है, उसे जरूर देखिएगा कि कैसे एक अन-डेमोक्रेटिक फ्रीडम फाइटर कोटा के खिलाफ बांग्लादेश के स्टूडेंट ने प्रोटेस्ट करना शुरू किया। स्टूडेंट से बात ना करने के बजाय हसीना सरकार ने तानाशाही और बर्बरता का रास्ता आजमाया और पुलिस और आर्मी को भेज दिया आतंक मचाने के लिए।
ऐसा ही एक आतंक का प्रतीक बने अबू सईद, जिनकी बांग्लादेश पुलिस ने निर्मम हत्या कर दी। वो भी कैमरा के सामने, वीडियो एविडेंस साफ है कि अबू सईद के पास कोई हथियार नहीं था। उनको जब गोली मारी गई, तो वह पत्थरबाजी तक नहीं कर रहे थे। एक अन-आर्म्ड स्टूडेंट को पुलिस ने पॉइंट ब्लैंक रेंज पे गोली मारकर उसकी हत्या कर दी।
19 जुलाई को रामपुरा पुलिस स्टेशन के पास प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस और बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश (बीजीबी) के फायरिंग के चलते कुछ नौजवान अपनी सेफ्टी के लिए पास के एक बिल्डिंग में चढ़ जाते हैं। कुछ टाइम बाद पुलिस और बीजीबी बिल्डिंग पर घुस जाती है। सारे नौजवान वहां से भाग निकलते हैं, पर एक नौजवान वहीं पर अटक जाता है। फोर्थ फ्लोर की छत से यह नौजवान लिटरली लटक रहा है। किसी को कोई खतरा नहीं है उस नौजवान से, लेकिन वो भागने की कोशिश कर रहा है और पुलिस उसको रेस्क्यू नहीं करती है, उसको डिटेन कर सकती थी, लेकिन किया क्या? सीधा पॉइंट ब्लैंक रेंज पर शूट कर दिया। ये शूट-एट-साइट ऑर्डर्स एग्जीक्यूट हो रहे थे सरकार द्वारा अपने ही सिटीजंस के खिलाफ।
यूथ ऑफ बांग्लादेश के खिलाफ एक एक्टिविस्ट ने अलजजीरा को बताया कि यूनिवर्सिटी के अंदर हेलीकॉप्टर से स्नाइपर गोलियां चला रहा था। आप सोच के देखिए कि एक यूनिवर्सिटी में उन्हीं के देश के सरकार की हेलीकॉप्टर, उन्हीं के देश के फोर्स गोलियां बरसा रही हैं और हेलीकॉप्टर शूटिंग का वीडियो एविडेंस भी बाहर आ रहा है। कहा जा रहा है कि कर्फ्यू के दौरान शूट-एट-साइट ऑर्डर्स थे। ऐसा भी हुआ कि अपने बालकनी से बाहर झांक रहे बच्चों तक को स्पेयर नहीं किया गया। पुलिस ने उन्हें भी गोली से मार गिराया। 16 ऐसे बच्चों की भी मरने की एक रिपोर्ट आ रही है। ये प्रोटेस्टर्स नहीं थे, ये बेचारे छोटे-छोटे बच्चे थे।
दुख की बात यह है कि सिर्फ पुलिस ही नहीं, बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश, आर्मी ऑफ बांग्लादेश जैसी संस्थानों ने भी इस कत्लेआम में हिस्सा लिया। उनका भी इस्तेमाल किया शेख हसीना ने। यह भी खबर आ रही है कि यूनाइटेड नेशन मार्क्ड आर्मर्ड पर्सनेल व्हीकल्स और हेलीकॉप्टर्स का इस्तेमाल किया गया हसीना गवर्नमेंट द्वारा इस प्रोटेस्ट को दबाने के लिए, जबकि यूएन मार्क्ड व्हीकल्स का यूएन मिशन के बाहर इस्तेमाल होना सख्त मना है। पैलेट गन्स की भी भारी इस्तेमाल की बात सुनी जा रही है। याद रखिए, पैलेट गन्स सबसे बड़ी प्रॉब्लम जो होती है कि वो एक क्लस्टर एम्युनिशन बोला जाता है, यानी बेसिकली एक बार फायर कर दिया तो कौन से इंसान को कैसी चोट पहुंचेगी, इस पर किसी का कोई कंट्रोल नहीं रहता है। और इन पैलेट से बहुत आसानी से आईसाइट खोने का खतरा रहता है। ढाका के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ऑप्समोलॉजिस्ट में पिछले कुछ हफ्तों में 500 से भी ज्यादा पेशेंट्स आए हैं पैलेट गन इंजरी के साथ। ये बाय द वे सिर्फ एक हस्पताल की बात कर रहा हूं मैं।
स्टूडेंट्स का सवाल यहां पर बहुत ही सिंपल है। एक आजाद देश की डेमोक्रेटिक सरकार अपने ही सिटीजंस पर इस तरीके से अत्याचार कैसे कर सकती है? और इंटरनेट वापस बहाल होने के बाद इस बर्बरता का पूरा जो मंजर लोग अपने फोन पर देख रहे हैं, जाहिर है कि लोगों में गुस्सा काफी ज्यादा है और इसीलिए हम एक और राउंड ऑफ प्रॉ प्रोटेस्ट देख रहे हैं। हसीना के किस्से और कांड अब दुनिया भर में लोग देख रहे हैं।
यूरोपियन यूनियन ने पुलिस की बर्बरता की निंदा की है और मांग की है कि जो गुनहगार हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए। बांग्लादेश और शेख हसीना को इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में ले जाने की अब कोशिश हो रही है फॉर क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी। लेकिन यह सब डिक्टेटर हसीना के लिए कोई नई बात नहीं है। यह जो तरीके हैं, ये इनके लिए काफी पुराने हो चुके हैं।
पिछले वीडियो में हमने बात की थी कि कैसे शेख हसीना ने जनवरी 2024 के बांग्लादेश इलेक्शन को कंप्लीट वन साइडेड बनाया। इलेक्शंस फ्री एंड फेयर नहीं थे, पर ये सिर्फ एक एग्जांपल था शेख हसीना का डिक्टेटोरियल रवैया दिखाने के लिए। ऐसे कई सारे उदाहरण आपको मिल जाएंगे। अपने डिक्टेटर टूलकिट का इस्तेमाल करके उन्होंने एक कंप्लीट अपोजिशन मुक्त बांग्लादेश बनाने की कोशिश की है। 2014 से अपोजिशन पार्टी बीएनपी की सुप्रीमो खालिदा जिया को हाउस अरेस्ट में रखा है। मेन अपोजिशन बीएनपी के सेक्रेटरी जनरल का कहना है कि 2023 और जनवरी 2024 मने इलेक्शन से ठीक पहले इसके बीच पूरे 27000 बीएनपी लीडर्स और एक्टिविस्ट को जेल में डाला गया था। करीबन 10000 कार्यकर्ताओं को असॉल्ट किया गया था और 30 अपोजिशन वर्कर्स की मौत भी हो चुकी थी।
ऑथर एंड एक्टिविस्ट मुश्ताक अहमद, जिन्होंने कोविड मिसमैनेजमेंट पर हसीना को क्रिटिसाइज किया और करप्शन का मुद्दा उठाया देश में, उनको साइबर सिक्योरिटी एक्ट के तहत जेल में डाला गया। छह बार उनको बेल डिनाई और फिर एक दिन अचानक जेल में मुश्ताक की मौत हो जाती है। इस तरीके से हसीना ने अपने क्रिटिक्स को साइलेंस किया है और दूसरों को चेतावनी दी है कि अगर वो अपनी आवाज उठाएंगे तो उनका क्या होगा।
2018 में कई स्कूल स्टूडेंट्स ने रोड सेफ्टी के मुद्दे पर एक पीसफुल रैली का आयोजन किया। नॉन-वायलेंट धरना और रास्ता रोको का मेथड अपनाया। तब भी शेख हसीना की पुलिस ने स्टूडेंट्स पर लाठियां बरसाई, टियर गैस का इस्तेमाल किया गया। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग का स्टूडेंट फ्रंट, जो छात्र लीग है, उनके मेंबर्स ने प्रोटेस्टर्स और जर्नलिस्ट पर हमला किया। आप सोच के देखिए, रोड सेफ्टी जैसा सिंपल और नॉन-कंट्रोवर्शियल मुद्दे पर भी डिबेट और क्रिटिसिज्म शेख हसीना को बर्दाश्त नहीं है।
जो बच्चे 2018 में इसी तरीके से प्रोटेस्ट कर रहे थे, यह रोड सेफ्टी के लिए, वही बच्चे आज यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स हैं और उनका ही यह कोटा रिफॉर्म प्रोटेस्ट। और भी भयंकर तरीके से हसीना ने उसको क्रैकडाउन करने की कोशिश की, लेकिन यह क्रैकडाउन उनके खिलाफ अभी बैकफायर कर चुका है।
मगर यह मत समझिए कि शेख हसीना बैक डाउन कर रही है। ना ना ना। उनकी सरकार तो उल्टा ब्लेम गेम खेल रही है, रिस्पांसिबिलिटी नहीं ले रही है और प्रोटेस्टर्स को अपोजिशन एजेंट्स और टेररिस्ट बुला रही है। सरकार का कहना है कि स्टूडेंट मूवमेंट को अपोजिशन बीएनपी और जमात के टेररिस्ट ने इफिट्रेस किया। स्टूडेंट्स को पार्टीज ने एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया और पुलिस और मिलिट्री पर अटैक करवाया। इस इस बुनियाद पर 1 अगस्त को हसीना सरकार ने जमात इस्लामी और उसके स्टूडेंट विंग इस्लामी छात्र शिबिर को भी अब बैन कर दिया है। उनके एंटी-टेरर लॉ के हिसाब से।
हसीना का मानना है कि जमात और शिबिर और बीएनपी मिलकर स्टूडेंट्स को यूज करके हसीना सरकार पर हमला कर रहे थे, उन्हें गिराने की कोशिश कर रहे थे। उधर स्टूडेंट्स का कहना है कि यह एकदम गलत बात है। उनका एक ऑर्गेनिक इंडिपेंडेंट मूवमेंट है। इसको एंटी-नेशनल, इसको टेररिस्ट, इसको अपोजिशन पार्टी ड्रिवन बोलकर डिस्क्रेडिट करने की कोशिश की जा रही है। ऊपर से अपोजिशन पार्टी का तो कोई प्रेजेंस ही नहीं है यूनिवर्सिटी कैंपस में। कैंपस में तो एक ही स्टूडेंट यूनियन एक्टिव है और वो शेख हसीना का छात्र लीग है। तो जब अपोजिशन को हसीना ने खत्म ही कर दिया है बांग्लादेश में, तो इफिट्रेस करने की बात कहां से आई?
विपक्ष की ऊपर से ढाका मेट्रो में किसने तोड़फोड़ की, किसने सरकारी दफ्तरों पर अटैक किया, इस चीज पर अभी क्लेरिटी नहीं है। बिना उस क्लेरिटी के पूरे मूवमेंट को दोषी बनाना, वो भी सही नहीं है। लेकिन इस बात का क्लेरिटी है, इस बात की वीडियो एविडेंस है कि पुलिस ने अन-आर्म स्टूडेंट्स पर गोलियां बरसाई। मगर हसीना सिर्फ मेट्रो रेल पर चिंतित है, सरकारी दफ्तर थोड़े से अटैक हो गए उस पर चिंतित है। स्टूडेंट्स की जाने गई इतनी ज्यादा, उस पर कोई खास चिंता नहीं है।
सरकार का तो यह भी कहना है कि प्रोटेस्टर्स ने उल्टा छात्र लीग के स्टूडेंट्स को बिल्डिंग से फेंक कर मार डाला और कुछ पुलिस वालों को को हमला करके उनके ऊपर उनको मार के लैंपोस्ट से टंगा दिया। यह गंभीर आरोप है। अगर यह बात सच है, इसका कोई भी एविडेंस निकलता है, तो सख्त कारवाही होनी चाहिए। मगर इन बातों का स्टूडेंट प्रोटेस्टर्स एकदम खंडन करते हैं, इसको डिनायर हैं। वो कहते हैं यह सरकारी प्रोपेगेंडा है लोगों को मिसगाइड करने के लिए और उन्हें डिस्क्रेडिट करने के लिए। तो एविडेंस इस चीज का हमें भी इंतजार है। मगर अबू सईद ने जिस तरीके से उसको मारा गया, पॉइंट ब्लैंक रेज पर मारा गया, उससे तो यही दिखता है कि पुलिस के तरफ से काफी ज्यादा बर्बरता हुई।
अगर सरकार पूरे प्रोटेस्ट को डेमोक्रेटिक होने देती, डेमोक्रेटिक रिजॉल्व कर लेती, तो शायद इतना बड़ा वायलेंस ना होता और ना शेख हसीना पर इतनी बड़ी आफत आती। मगर उल्टा सरकार ने सोचा नहीं, हेलीकॉप्टर इस्तेमाल करते हैं, पैलेट गन, शूट-एट-साइट, इंफॉर्मेशन ब्लैक आउट कर देते हैं, इंटरनेट खत्म कर देते हैं, छात्र लीग को गुंडागर्दी करने का लाइसेंस दे देते हैं। अब यह सब होने के बाद जब इंटरनेशनल क्रिटिसिज्म आ रहा है, तो सरकार कह रही है वो तो मजबूर थी यह सब कदम उठाने के लिए।
सरकार ने और भी ऊत-पटांग बयान देने शुरू कर दिए। यह भी डिक्टेटरशिप का एक अहम हिस्सा होता है। बांग्लादेश के मिनिस्टर फॉर स्टेट फॉर इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मोहम्मद अराफात ने यह कह दिया है कि सरकार ने इंटरनेट शटडाउन थोड़ा ही ना किया है, बल्कि ये तो प्रोटेस्टर्स थे जिन्होंने अंडरवाटर फाइबर ऑप्टिक केबल्स जला दिए, ठीक उस स्पॉट पर जहां अंडरवाटर केबल जमीन पर आते हैं, ग्राउंड स्टेशन पर आते हैं। इस बयान को एक जोक की तरह लिया जा रहा है बांग्लादेश में, क्योंकि इंटरनेट कटने से प्रोटेस्टर्स को ही सबसे ज्यादा नुकसान था। याद रखिए, 2018 के रोड सेफ्टी प्रोटेस्ट के दौरान भी इंटरनेट शटडाउन किया गया था।
अराफात साहब ने यह भी कहा कि यह कहीं ना कहीं एक्टिविस्ट जो ये अन-रूली एलिमेंट्स थे, इन्हें ड्रग्स दिए गए थे, इसीलिए प्रोटेस्टर सीना ठोक के पुलिस के सामने खड़े हुए थे, क्योंकि वो नशे में थे। लेकिन जिस पावर के नशे में हेलीकॉप्टर से यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स पर फायरिंग हो रही थी, वो नशा अराफात साहब को नहीं दिखा। मगर स्टूडेंट्स का बेखौफ पुलिस के सामने खड़ा होना, उनका मरना, वो उनको नशा दिख रहा है।
अब हसीना एक नेशनल डे ऑफ मॉर्निंग का ऐलान कर चुकी हैं। वायलेंस, वंडलिज्म, आर्सन और टेररिस्ट एक्टिविटीज के विक्टिम्स के लिए। यानी बेसिकली जो नरसंहार हसीना की डिक्टेटोरियल मिसमैनेजमेंट के वजह से हुआ, उसके लिए स्टूडेंट प्रोटेस्टर्स को टेररिस्ट ठहरा दो, अपोजिशन को ब्लेम कर दो, खुद अपने आप को विक्टिम बना दो और उसके बाद एक मेमोरियल सर्विस भी कर दो। वाह, गजब की फकीरी है।
अपने आप को निर्दोष दिखाने के लिए हसीना ने यह भी कह दिया है कि यूएन या कोई और देश अपने एक्सपर्ट्स बांग्लादेश भेज सकती है, वायलेंस को इन्वेस्टिगेट करा सकती है, क्योंकि इतना वायलेंस के चलते अब तो बांग्लादेश में एफडीआई इन्वेस्टमेंट्स और भी कम हो जाएंगी।
19 जुलाई को नाहिद इस्लाम, जो कि एक प्रोटेस्ट कोआर्डिनेटर है, उनको प्लेन क्लोज पुलिस वाले उठाकर ले जाते हैं। नाहिद को ब्लाइंडफोल्ड किया जाता है, हैंडकफ किया जाता है, टॉर्चर टेक्निक्स इस्तेमाल किए जाते हैं, पूछताछ की जाती है उनसे। 21 जुलाई को बेहोश नाहिद को एक सड़क किनारे छोड़ दिया जाता है। होश आने के बाद नाहिद घर पहुंचते हैं, उनको अस्पताल लिया जाता है। इस पूरे किस्से के बाद 23 ऑफ जुलाई को बिना डरे नाहिद ने एक बयान दिया, मूवमेंट रुकने वाला नहीं है। नाहिद अस्पताल में भर्ती हुए, पर 26 जुलाई को बांग्लादेश पुलिस के डिटेक्टिव ब्रांच ने फिर से नाहिद को हिरासत में ले लिया। इस पर काफी आउटरेज हुआ कि सरकार को अगर नेगोशिएट करना है, तो उनको प्रोटेस्ट कोऑर्डिनेटर से बात करनी होगी, ना कि पुलिस को बार-बार हिरासत में ले ले और उन्हें टॉर्चर करें।
28 जुलाई को नाहिद और पांच और कोऑर्डिनेटर्स, जो कि डिटेक्टिव ब्रांच की कस्टडी में थे, उनका स्टेटमेंट आता है कि वो प्रोटेस्ट को बंद कर रहे हैं, क्योंकि उनका कोटा रिफॉर्म डिमांड सुप्रीम कोर्ट ने पूरा कर दिया है, 30% रिजर्वेशन हटा दिया है। उसी दिन रात को, लेकिन दूसरे कोऑर्डिनेटर्स ने एक स्टेटमेंट इशू किया और यहां देखिए स्टूडेंट्स कितना नहीं डरते हैं इस तानाशाह से। स्टेटमेंट, "खून खराबा और मास अरेस्ट करने के बाद इस सरकार ने हमारे कुछ कोऑर्डिनेटर्स को हिरासत में लेकर गन पॉइंट पे मूवमेंट को बंद कराने की कोशिश की है। हम यह साफ-साफ कहना चाहते हैं कि स्टूडेंट बॉडी तब तक मूवमेंट कंटिन्यू रखेगी जब तक हमारी नाइन पॉइंट डिमांड मीट नहीं हो जाती है। हम समझौता करके शहीद स्टूडेंट्स के साथ गद्दारी नहीं करेंगे।"
वैसे कोटा पर जो जजमेंट आया है, वो भी कुछ अमेजिंग नहीं है। उसको लेकर भी कंट्रोवर्सी है, क्योंकि फ्रीडम फाइटर कोटा के साथ-साथ अरमेस्टिस का जो कोटा था, उसको भी ऑलमोस्ट खत्म कर दिया गया है। मगर अब यह मूवमेंट इस कोटे से बहुत आगे बढ़ चुकी है। डेमोक्रेसी, अकाउंटेबिलिटी, उसके बारे में अब यह मूवमेंट बन चुकी है और इसका क्रेडिट इस प्रोटेस्ट को बढ़ाने का क्रेडिट शेख हसीना को ही जाता है।
स्टूडेंट्स का नाइन पॉइंट डिमांड बहुत ही अब सिंपल है। हसीना इस मास किलिंग और एट्रोसिटी के लिए अपनी जिम्मेदारी एक्सेप्ट करें। होम मिनिस्टर, रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर, पुलिस मिनिस्टर, एजुकेशन मिनिस्टर, लॉ मिनिस्टर रिजाइन करें। पुलिस और अफसर और वो यूनिवर्सिटी वीसीज जिनकी निगरानी में स्टूडेंट्स मारे गए, वो रिजाइन करें। मारे गए स्टूडेंट्स और जख्मी स्टूडेंट्स के फैमिली को मुआवजा दिया जाए। जिन पुलिस वालों ने अन-आर्म स्टूडेंट्स पर गोली चलाई, उनको अरेस्ट किया जाए। यूनिवर्सिटी में छात्र लीग के जो ये वन-पार्टी पॉलिटिक्स हो रही है, उसे बैन किया जाए। एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस को रिओपन किया जाए और ये गारंटी दी जाए कि स्टूडेंट प्रोटेस्ट, जो प्रोटेस्टर्स थे, उन्हें किसी भी तरीके से एकेडमिक या एडमिनिस्ट्रेटिव हरासमेंट उनके साथ नहीं होगी।
तो प्रोटेस्ट जारी हैं, मगर उस लेवल पर नहीं जो कुछ हफ्ते पहले हमें दिखने को मिला था। याद रखिए, अभी 9000 से ज्यादा लोग अभी भी अरेस्टेड हैं। खबर यह भी है कि कई पर नॉन-बेलेबल धाराएं लगाई गई हैं, सुनवाई होने में महीने लग सकते हैं। ऊपर से बेलेबल ऑफेंसेस के लिए भी बेल बॉन्ड की प्राइस बहुत ज्यादा रखी गई है। सो बेसिकली आईडिया यह है कि सबको जेल में ही रखो, प्रोटेस्ट होगा ही नहीं।
ज्यादातर जगहों में अब सुबह के वक्त तो कर्फ्यू नहीं है, लेकिन पुलिस की भारी तैनात कीी है और अभी भी रैंडम लोगों को अरेस्ट या डिटेन किया जा रहा है। पर इस सब के बावजूद, 31 ऑफ जुलाई को चिटगांव पर प्रोटेस्ट दिने को मिला और आगे आने वाले दिनों में भी प्रोटेस्ट प्लान है। इन प्रोटेस्ट का जो एक पीक था, शायद वो निकल चुका है, मगर कई प्रोटेस्टर्स के हिसाब से यह शेख हसीना के लिए बिगिनिंग ऑफ दी एंड है।
पहले जो लोग सोचते थे कि देयर इज नो अल्टरनेटिव, अब वो सोच रहे हैं कि व्हाई इज देयर नो अल्टरनेटिव इन अ डेमोक्रेटिक सिस्टम? ऐसा क्यों है कि इंडिपेंडेंट वॉइसेस को इस तरीके से दबाया जा रहा है और अपोजिशन मुक्त बांग्लादेश बनाया जा रहा है? ऊपर से इकॉनमी की हालत खराब है, महंगाई और बेरोजगारी अभी उससे लोगों की हालत त्रस्त है। पहले तो यह डर था कि अगर हसीना नहीं, तो बीएनपी और जमात जैसे इस्लामिस्ट पार्टीज पावर में आ जाएंगी और बांग्लादेश पाकिस्तान की तरह फंडामेंटलिस्ट की गिरफ्त में आ जाएगा। मगर इस स्टूडेंट मूवमेंट ने एक तरीके से लीडरशिप और एकता भी दिखाई है और यह भी लोगों में एक आशा जगाई है कि यह जो पार्टी है, यह दूसरे पार्टी स्टूडेंट्स, दूसरे पार्टी के इन्फ्लुएंस में नहीं आएगी और हो सकता है कि इनमें से ही कुछ स्टूडेंट्स बाद में जाकर एक प्रोग्रेसिव अल्टरनेटिव फोर्स बने बांग्लादेश में।
तो क्या स्टूडेंट्स ही बांग्लादेश के लिए एक अल्टरनेटिव पॉलिटिकल फ्यूचर देंगे? हो सकता है। हमें तो यही आशा है। इफ नॉट हसीना, देन हू? बिकल पो के यही था नारा बांग्लादेश में कई सालों से। जवाब में अब स्टूडेंट्स कह रहे हैं, बिकल पो, आमी अल्टरनेट, मैं हूं।
इस हौसले के बावजूद, लेकिन एक प्रोग्रेसिव अल्टरनेटिव तलाशना आसान नहीं होगा, बनाना आसान नहीं होगा। याद रखिए, हसीना के पास इंटरनेशनल सपोर्ट भी है, चाहे इंडिया, चाइना, रशिया। मगर कहीं ना कहीं जुलाई 2024 बांग्लादेश पॉलिटिक्स के लिए एक बहुत बड़ा इंपॉर्टेंट चैप्टर होने वाला है।
हसीना को ज्यादा कुछ नहीं करना था, बस लोगों का ट्रस्ट वापस जीतने के लिए दो-तीन चीजें करना था। उसको एक डायलॉग बिटवीन गवर्नमेंट एंड प्रोटेस्टर्स। स्टूडेंट्स की दिक्कत क्या है, सामने बैठकर एक बार बात कर लो। नंबर टू, भाई रिवैल्युएशन कर लो आपकी लॉ इंफोर्समेंट टैक्टिक्स कैसे काम कर रही है। स्टूडेंट्स को गारंटी दो कि अगर वो शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट करेंगे, तो उनको गोलियों से, उनको छल्ली नहीं किया जाएगा। नंबर तीन, बांग्लादेश की इकॉनमी की हालत काफी टाइट है। अगर हसीना ने जॉब्स नहीं क्रिएट किए, तो डेमोग्राफिक डिविडेंड धरा का धरा रह जाएगा। तो फोकस तो इकॉनमी पे करना था, प्रोटेस्ट पर नहीं।
लेकिन ये सब कदम लेना, बातचीत करना, इकॉनमी प फोकस करना, ये डिक्टेटर के लिए बहुत मुश्किल काम होता है। और हो सकता है कि कुछ दिनों बाद ऊपर-ऊपर आप देखें कि बांग्लादेश में सब कुछ नॉर्मल हो जाए, मगर हसीना का फिर से जनता पर जो भरोसा है, उसको जीतना काफी कठिन होगा, खास कर कि जो युवा जनता है और यही वो युवा है जो आगे जाकर बांग्लादेश का पॉलिटिकल फ्यूचर तय करेगी। उनके पॉलिटिकल एस्पिरेशंस की बस अभी शुरुआत हो रही है और हसीना के लिए बिगिनिंग ऑफ दी [संगीत] एंड।