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हनुमान जन्मोत्सव पर सुंदरकांड का यह चमत्कारी प्रसंग सुनते ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण | Pujya Rajan Jee

Pujya Rajan Ji Official41:46

Transcription

पवन तन सिरो ना सबसे अंत में श्री हनुमान जी ने भगवान को दूर से प्रणाम किया और आपको बताऊं जब हनुमान जी ने प्रणाम किया तो भगवान आशीर्वाद नहीं दिए। भगवान ने हनुमान जी को अपने पास में बुला लिया। कहां बुला लिया? जोर से बोलिए। क्यों बुला लिया? इसलिए बुला लिया कि राम जी जान रहे हैं कि जा भले सब रहे हैं लेकिन मेरा काम तो मेरे हनुमान ही करके मेरे पास लौटेंगे। इसलिए राम जी ने केवल हनुमान जी को बुलाया।

हनुमान जी आए दंडवत किए। प्रभु ने सिर पर हाथ रखा अपना और अपनी संध्या वाली मुद्रिका अंगूठी निकाली और कहा ले जाकर सीता जी को दीजिएगा। बहु प्रकार सीतह समझाए हो कहि बल विरह बे तुम आए हो। हनुमान जाइएगा ये मुद्रिका सीता जी को दीजिएगा। वह समझ जाएंगे कि आपको मैंने भेजा है। अनेक प्रकार से उनको समझाइएगा मेरा विरह बल बताइएगा और बताकर शीघ्र वापस हनुमान आ जाएंगे। जाइएगा।

अब यहां दर्शन करिए। श्री राम जी ने हनुमान जी को जाने के लिए कहा और जाकर के वापस आने के लिए कहा। इसका क्या मतलब? अब हनुमान जी को लंका नहीं जाना है। भगवान का वचन ही हनुमान जी को लंका लेकर के जाएगा। और यह वचन ही सकुशल लेकर के वापस आएगा। मार्ग में कोई माई का लाल हनुमान जी को रोकने वाला नहीं है। घर से कोई काम करने निकलिए तो अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर निकलिए। आप असंभव को भी संभव कर सकते हैं।

हनुमान जी सभी कपियों को लेकर चले। रास्ते में एक गुफा में स्वयं प्रभा मिली। उन्होंने अपनी तपस्या के बल से सभी कपियों को समुद्र के किनारे भेज दिया। समुद्र के किनारे जटायु जी के एक भाई हैं। उनका नाम है संपाती। क्या नाम है? संपाती। उन्होंने सीता जी का पूरा एड्रेस बता दिया।

संपती बोले जामवंत जी मैं सीता जी को डेली देखता हूं। नित्य मैं देखहु तुम ना गह दृष्टि अपार। बोले गिद्ध अपार दृष्टि रखता है। मैं देख रहा हूं। जामवंत जी बोले कहां है? संपाती बोले समुद्र में 100 जोजन दूर त्रिकूट पर लंका नगरी है। उसी लंका में वो अशोक वाटिका है और वो अशोक वाटिका में देखिए अशोक वृक्ष के नीचे वो सीता जी बैठी है। दिखाई पड़ गई मुझे वो सीता जी विराजमान है। जैसे पता बताया कपिल लोग नाचने लगे। पता मिल गया सीता मैया का।

जामवंत जी बोले बहुत सुंदर और सहायता करिए। बोले और नहीं करूंगा और सहायता नहीं करूंगा। क्यों? बूढ़ भय नत करत कछु सहा। बढ़ा हो गया हूं नहीं तो सहायता अवश्य करता। एक काम कर सकता हूं। आप लोगों में से कौन वहां तक जाएगा? इसका इसका पता बता सकता हूं। यह बता सकता हूं। जामवंत जी बोले कौन जाएगा? बोले एक छलांग लगाकर आप में से जो भी कपी 100 जोजन की दूरी तय करने की शक्ति रखता है। वही राम जी का काम करेगा। कितनी दूरी? 100 जोजन समझते हैं कितना होता है? 1200 किलोमीटर। एक जोजन में 12 किलोमीटर। तो 100 जोजन में रायबरेली से कौन शहर दूर है? 1200 किलोमीटर। बाबू दिल्ली मुंबई मुंबई तब ठीक है तब बढ़िया है तब तो।

संपती बोले राम बरेली से छलांग लगावे और सीधे कोलकाता में जाकर उतरे एक छलांग में। इतनी लंबी छलांग लगाने की जो शक्ति कपी रखता है 100 योजन की वही राम जी का काम पूरा करेगा। संपाती बोल के चले गए। अब यह सारे कपी आपस में बैठ के मंत्रणा शुरू किए। कौन जाएगा हो 100 जोजन? इंपॉसिबल। इतनी दूरी कौन जाएगा? कोई नहीं जा सकता। हरी असंभव। अब नहीं हो पाएगा। अरे 10 20 होता तो हम ट्राई भी करते।

एक कपी बोला हम एक बार 20 जोजन की छलांग लगाए थे। कितनी जोजन की? दूसरा बोला तुम क्या लगाए हो? 30 लगा के मैं बैठा हूं। इधर 30 जोजन। एक कपी बोला बस बस 30 जोजन। जामवन जी लिखिए मेरे नाम के आगे 50 जोजन लिखिए। एक छलांग में 50 जोजन लगा सकता हूं। जामवन जी देखिए सब धीरे-धीरे बढ़ने लगे। 20 से 30, 30 से 50। जैसे कपी ने कहा 50 जोजन। जामवन जी पीठ थपथपाए बोले शाबाश। ये हुई ना बात। 50% कवर हो गया। बजाइए ताली इनके लिए। 50 जोजन एक छलांग में। और कोई वीर यहां बैठा है इससे आगे जाने वाला?

एक कपी बोला मैं 70 जोजन। एक छलांग में 70 जोजन। जामवन जी बोले डबल ताली। 70 जोजन जाएंगे। और हिम्मत बांधिए। कौन जाएगा? अब कोई सांस ना ले। एक कपी किनारे में जाके पूरा हिम्मत बांध रहा है। बोले जल्दी बोलो कितना लिखे तुम्हारे नाम के आगे? बोला 90 जोजन चला जाऊंगा एक छलांग में। 90 जोजन। जामवन जी बोले लगातार ताली मारिए इनके लिए। 90 जोजन। शाबाश। अब थोड़ा सा बचा है और हिम्मत बांधिएगा। 100 जोजन पूरा।

बाकी जितने कपी थे सब 90 जोजन वाले कपी का मुंह देखने लगे। बोले सही में जाओगे कि बस फेंक दिए हो? जावन जी बोले हिम्मत बांध नहीं। कौन जाएगा आप में से आगे? अब कोई सांस ना ले। 90 जोजन वाला बार-बार बोले हम जाए। जी बोले कहां जाओगे? 90 नहीं 99 जोजन भी जाओगे तो पानी में डूब जाओगे। आप लोग को शर्म नहीं आती अपने आप को युवा कहने में? मैं बूढ़ा हो गया हूं। शरीर में पहले के समान बल नहीं है। मेरे जब मेरी जवानी थी उस समय भगवान बलि को बांधने के लिए बामन अवतार लिए और त्रविक्रम रूप धारण किए थे। उस स्वरूप की मैंने दो घड़ी में सात परिक्रमा मारी थी। तब उस समय मेरी युवा अवस्था थी। मेरी जवानी रहती तो मैं बताता 100 जोजन किसे कहा जाता है।

जब जवानी को ललकारा ना अंगद जी बोले कि लिखिए लिखिए लिखिए मेरे नाम के आगे 100 जोजन लिखिए। मैं जा रहा हूं। 100 जोजन लिखिए। जामवंत जी बोले प्रसन्न होकर बोलो इतने उदास क्यों हो? अंगद जी बोले जा तो सकता हूं मैं। रिटर्न की गारंटी नहीं है कोई मेरी। अंगद कहे जाऊं मैं जी संशय कछु बारा। जामवंत जी मन में बोले जब जा के आ ही नहीं पाओगे तो काहे बीच में बोल रहे हो? अच्छा आप बताइए जाना किसको है? जिसको जाना है वो चुपचाप बैठा है और जिसको जिसको को नहीं जाना है। सब अपना अपना विजिटिंग कार्ड ले खड़े हैं। 20 जोजन 30 जोजन।

जामवंत जी अंगद से पूछे हनुमान जी कहां है? बोले पता नहीं। वही फैक्ट्री के कंपाउंड में जाकर बैठे हैं वहां पर। अभय दाता नाम है ना? उधर जाकर बैठे एकांत में। जामवंत जी ले सबको गए तो जाकर देख हनुमान जी महाराज बड़े आराम से। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। कहे रीछपति सुनो हनुमाना। कहे रीपति सुनो हनुमान। का चुप साधि रहो बलवाना। का चुप साधि रहो बलवाना। पवन तनय बल पवन समाना। पवन तनय बल पवन बुद्धि विवेक विज्ञान निधाना। बुद्धि विवेक विज्ञान निधाना।

जामन जी बोले हे बजरंगबली आप क्यों मौन है? बोलिए आप तो जा सकते हैं ना? पवन पुत्र हैं आप। पवन के समान बल और वेग है। कहिए जाइएगा ना? हनुमान आप हनुमान जी। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। जी बोले जय राम। कवन सुकाज कठिन जग माही। कवन सुखा आज कठिन जग माही। जो नहीं होई तात तुम पाहि। जो नहीं होई तात तुम। हनुमान जी जगत का कौन सा कार्य आपके लिए संभव है जो आप नहीं कर सकते? आप कुछ भी कर सकते हैं। बोलिए जाइएगा ना उस पार? हनुमान जी महाराज। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम राम सियाराम जय जय राम। राम सियाराम सियाराम जय जय राम।

जामवन जी बोले आप कीर्तन करने आए हैं यहां पर? ये कीर्तन का टाइम है? आपका अवतार क्यों हुआ है? कुछ याद है आपको? हनुमान जी बोले मुझे कुछ याद नहीं है। जामवंत जी स्मरण दिलाते हैं हे बजरंगबली राम काज लगता अवतारा। सुन ताहियो परम साकारा। राम का अवतारा पर्वता। जामन जी बोले हे बजरंगबली आपका अवतार केवल और केवल राम कार्य के लिए हुआ है।

हनुमान जी सुने कि राम काज लगी मम अवतारा। मेरा अवतार राम कार्य के लिए हुआ है। सुनने की देरी थी गोस्वामी जी कहते हैं सुनत ही भयो पर्वता। हनुमान जी महाराज लगे बढ़ने बढ़ते बढ़ते पर्वत का आकार धारण कर लिया। विशाल स्वरूप सिंह के आवाज में दहाड़ मारने लगे। बोले जामवंत जी आपने कहा कोई पार नहीं कर पाया। मैं समुद्र पार नहीं करूंगा। खेल खेल में ला जाऊंगा। जाऊंगा आज ही रावण को पकड़ के मसल के मार दूंगा। रावण को पूरी सेना के साथ रगड़ के समाप्त कर दूंगा। नहीं तो कहिए पूरी की पूरी लंका त्रिकूट पर्वत के साथ हाथ में उठाकर आपके सनुख लाकर रख दूं। मैं क्या करूं? रावण को मारू, सेना को मारू, लंका ले आऊं। क्या करूं? तुरंत बताइए।

जामन जी बोले पहले नीचे आइए। नीचे आइए। आप ना रावण को मारिएगा। ना सेना मारिएगा। ना लंका ले आइएगा। केवल एक काम करिएगा। इतना करहु तात तुम करहु ताई। सीह देख कहहु सुीत देख कह उधिया की सुरे। क्या कहा? चुपचाप जाइए सीता जी को देखिए और आकर के राम जी को बताइए बस इतना ही करना है। हनुमान जी बोले उतना दूर जाऊं रणवा को एक दो फाइट लगाए बिना चलाऊंगा ना? रावण को छुएगा भी मत। उसके लिए राम जी पर्याप्त है। हम लोग की सेना केवल कौतुक के लिए रहेगी। कप से संग संश राम सीतानी त्रोक पावन सुजस सुर मुनि नारदा। जो सुनत गावत कहत समझत परम पद नर पाव। जो सुनत गावत कहत सम परम पद नर पाव। रघुवीर पद पा मधुकर दास तुलसी गाव। रघुवीर पद पा मधुकर दास तुलसी गाव। हा दास तुलसी गाव। हा तुलसी गाव।

जामन जी बोले कपियों की सेना साथ में रहेगी। राम जी जाएंगे निशाचरों का अंत करेंगे और राम जी ही सीता जी को लेकर के आएंगे। यहीं से सुंदरकांड की कथा प्रारंभ होती है। सुंदरकांड के प्रारंभ में गोस्वामी जी ने तीन श्लोक लिखे और जामवंत जी की बात हनुमान जी को बड़ी अच्छी लगी। देखिए आपको मैं एक बात कहूं सरकार यदि जामवंत जी आज ना होते तो हनुमान जी महाराज आज ही राम कथा पूरा कर देते। जाते रावण को पटक के मार के सीता माई को लेकर चले आते। जामवंत जी ने समझाया। यह प्रसंग कहता है हर समिति में हर समूह में एक दो वृद्ध लोगों का होना बड़ा आवश्यक है। क्योंकि वृद्ध जितना श्रेष्ठ विचार कर सकते हैं युवान भाई नहीं कर सकते। जामवंत जी की बात बड़ी अच्छी लगी। हनुमान जी को यहीं से कथा प्रारंभ होती है।

जामवंत के वचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाई। तब लगी मोहि परहु तुम भाई। सह दुख कंद मूल फल खाई। जब लगी आह देखी हो का। मोहि हरस यह कह ना सब माथा। यह कह ना चले हर धर रघुनाथा। हर धर रघुनाथा। सिंधु तीर एकधर सुंदर ती। सुंदर कौतुक को चढ़े उतार। ऊपर कौतुक को चढ़े। हनुमान जी महाराज बार-बार रघुवीर संभारी। बार-बार रघुवीर समारी। क्यों पवन तने बल भारी। क्यों पवन तने बलारी। गिर चरण दे हनुमंता। गिर चयन चले सुगा पाताल तुरता। पाताल तुरता। अमोग रघुपति करना। अमोग रघुपति करना। भांति चले हनुमाना। भांति चले हनुमाना। जल निधि रघुपति दूत। जल निधि रघुपति दूत। बिचारे तै ना कहो समहारी। त ना कहो ब्रहारी। ना कहो।

श्री जामवंत जी की बात हनुमान जी को बड़ी अच्छी लगी। हनुमान जी ने कपियों से कहा देखिए मैं जा रहा हूं पता लगाने। लेकिन जब तक मैं पता लगाकर आ ना जाऊं। आप लोग यहां से जाइएगा मत। कहां से? कहां से? समुद्र के किनारे से। कहां से? समुद्र के किनारे से। मैं जानता हूं कि यहां व्यवस्था नहीं है। आप लोग को रहने में कष्ट होगा लेकिन थोड़ा कष्ट सहिएगा। जाइएगा मत। इसके दो कारण। एक तो हनुमान जी को याद है कि सुग्रीव ने कहा था खाली हाथ जो लौटेगा वो मेरे हाथ द्वारा मार दिया जाएगा। तो पहली बात कहीं लोग खाली जाए सुग्रीव मार ना दे और दूसरी बात यदि सुग्रीव मारे भी नहीं तो भी नहीं जाना है। क्यों? यदि आप लोग चले गए और मैं पीछे से पता लगाकर जाऊंगा तो कहा जाएगा हनुमान ने पता लगाया है। और यदि आप लोग रुके रहेंगे। हम लोग मिलकर के जाएंगे तो कहा जाएगा सब ने मिलकर के पता लगाया है। इसलिए जाइएगा मत आप लोग।

यह प्रसंग कह रहा है कि जीवन में श्रेय को बांटने का स्वभाव बनाइए। होता क्या है? ठीक उल्टा काम कोई और करता है। हम नाम आपन लिख लेते हैं। दूसरे का काम हम आप टैग छपवाए हैं। ले चिपका देते हैं। डन बाय मी। काम किया किसने है? दूसरे ने। यह स्वभाव ठीक नहीं है। भगत कभी नहीं बोलता कि मैं किया हूं। वह तो एक ही बात कहता है कि करते हैं मेरे राम जी। कौन करता है? और मेरा नाम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। करते हैं मेरे राम जी करते हैं मेरे राम जी। मेरा नाम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है। पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही होइए हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है। हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है। पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है। पतवार के बिना ही मेरी चल रही है। हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है। हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है। करता नहीं हूं कुछ भी। करता नहीं हूं कुछ भी। फिर भी सब काम हो रहा है। करता नहीं हूं कुछ भी सब काम हो रहा है। करते हैं मेरे राम जी करते हैं मेरे राम जी और मेरा नाम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। मुझे हर डगर डगर पर तुमने दिया सहारा। मुझे हर डगर डगर पर तुमने दिया सहारा। मेरी जिंदगी बदल दी तूने करके एक इशारा। मेरी जिंदगी बदल दी तूने करके एक इशारा। मुझे हर डगर डगर पर तुमने दिया सहारा। मुझे हर डगर डगर पर तूने दिया सहारा। मेरी जिंदगी बदल दी तूने करके एक इशारा। मेरी जिंदगी बदल दी तूने करके एक इशारा। तेरी कृपा से राघव। तेरी कृपा से राखो। ये कमाल हो रहा है। तेरी कृपा से राखो ये कमाल हो रहा है। करते हो मेरे राम जी करते हो मेरे राम जी और मेरा नाम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। तूफान आंधियों में तुमने ही मुझको थामा। आंधियों में तुमने ही मुझको धामा। तुम कृष्ण बनके आए मैं जब बना सुदामा। तुम कृष्ण बनके आए मैं जब बना सुदामा। तूफान आंधियों में तुमने ही मुझको। तू आंधियों में तुमने ही मुझको थामा। तुम कृष्ण बनके आए मैं जब बना सुदामा। तुम कृष्ण बनके आए मैं जब बना सुदामा। तेरा करम ये मुझ पर। तेरा कर्म ये मुझ पर। सरेआम हो रहा है। तेरा कर्म ये मुझ पर सरेआम हो रहा है। करते हो मेरे राम जी करते हो मेरे राम जी और मेरा नाम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। अरे मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा ह। सब काम हो रहा ह। आ रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है।

हनुमान जी बोले आप लोग जाइएगा मत। जब तक मैं पता लगाकर नहीं आता हूं यही बैठे रहिएगा और दर्शन करिए। हनुमान जी कह रहे हैं कि मैं जा रहा हूं तो कार्य अवश्य पूर्ण होगा। इतना विश्वास क्यों है? क्योंकि हनुमान जी कहते हैं मुझे प्रसन्नता हो रही है। होई ही काज मोहि कथा कह रही है कि जीवन में प्रसन्न मन से किया हुआ कार्य कभी विफल नहीं होता है। मनुष्य कोई भी काम दो प्रकार से करता है। एक रोरो कर और एक हंसते हंसते हुए। प्रसन्नता से किया हुआ कार्य अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करता है। इसमें कोई संशय नहीं है। हनुमान जी बोले कार्य अवश्य होगा क्योंकि मुझे प्रसन्नता हो रही है।

इतना कह के कपियों को प्रणाम करके बगल में एक पर्वत था जिसका नाम था सुंदर। पर्वत का क्या नाम है? सुंदर। इसी सुंदर पर्वत पर कथा प्रारंभ हो रही है और इसी पर्वत पर यहां इस कांड की कथा पूरी होगी। इसलिए गोस्वामी जी ने इस कांड का नाम रखा सुंदरकांड। ठीक ना? सब लोग सोचते हैं सब सुंदरकांड पढ़ने से सब सुंदर हो जाएगा। केवल सुंदरकांड पढ़ने से सुंदर नहीं होगा। सुंदरकांड पढ़ के सुंदर जीवन जीने से सुंदर होगा। केवल पढ़ने से कुछ नहीं होगा।

हनुमान जी पर्वत पर चढ़े। आप लोग हवाई जहाज में चढ़े हैं। कई लोग चढ़े होंगे बहुत सारे लोग। हवाई जहाज अपने गेट से निकलने के बाद धीरे-धीरे चलते चलते सरकार रनवे पर जाकर रुक जाती है। रनवे पर और उसके बाद जब एटीसी से क्लीयरेंस मिलता है तो पायलट दोनों इंजन का थ्रस्ट फुल करता है और फिर जहाज दौड़ के उड़ जाता है। यह जो सुंदर नाम का पर्वत है ना यह हनुमान जी का रनवे है। हनुमान जी कूद के चढ़ गए उस पर। अब एटीसी कौन है? तो जामवंत जी। जामवंत जी क्लीयरेंस दिए। अब आप जा सकते हैं। हनुमान जी आपन थ्रस्ट पूरा किए। सामान्य जहाज में या तो एक इंजन, छोटका में, बड़का में दो इंजन, सबसे बड़का में चार इंजन। चार से अधिक इंजन नहीं होते। हनुमान जी में 11 ठे इंजन है। 11 रुद्र के समन्वित अवतार हैं। हनुमान जी महाराज। हनुमान जी शुरू की अपना इंजन। गोस्वामी जी कहते हैं दर्शन करिए बार-बार। बार-बार रघुवीर संभारी। कैसे इंजन स्टार्ट हो रहा है हनुमान जी का। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय जय श्री राम। जय जय श्री राम। श्री राम। बार-बार रघुवीर संभारी। पवन हनुमान जी चले उड़ गए हो।

और देखिए थर्ड लॉ ऑफ मोशन आप लोग पढ़े होंगे। टू एव्री एक्शन देयर इज एन इक्वल एंड ऑोजिट रिएक्शन। हां हां किसने खोजा? न्यूटन ने। लेकिन न्यूटन के बाबा के जन्म के पहले गोस्वामी तुलसीदास जी मानस में लिख के गए हैं। अभी न्यूटन को छोड़िए। उनके बाबा जन्म नहीं लिए थे। हमको पढ़ाया गया न्यूटन ने लिखा थर्ड लॉ ऑफ मोशन। गोस्वामी जी लिखते हैं हनुमान जी जब ऊपर गए तो जितने फोर्स से हनुमान जी ऊपर गए उतना ही फोर्स अपोजिट डायरेक्शन में गया। नीचे चले उसोगा पाताल तुरंत। इतना फोर्स नीचे गया पाताल तक सब हिल गया। समुद्र में एक पर्वत है जिनका नाम है मैना। ये हनुमान जी के पिता पवन देव के मित्र हैं। मैनाक पानी से बाहर निकले और हनुमान जी से बोले हनुमान जी आप बहुत देरी से उड़ रहे हैं। थक गए होंगे। थोड़ी देर मेरे ऊपर उतर के विश्राम कर लीजिए। हनुमान जी बोले आप कौन है? बोले मैं आपके पिताजी का मित्र हूं। हनुमान जी बोले पिताजी का मित्र पिता जैसा होता है। रुकिए चाचा जी हम पहले आपको प्रणाम करेंगे। हनुमान तेह परसाकर उनकी प्रणाम विश्राम राम काज की बिनु मोह कहा। बोले जब तक भगवान का काम पूरा नहीं कर लेता विश्राम लेने वाला चले आगे। अच्छा आप बताइए हलचल कहां तक गई थी सरकार आपको बताएं रावण के डर के मारे देवता दो ही जगह भागते थे। कहां-कहां? एक थे पाताल में और दूसरा पर्वतों की गुफाओं में। कहां? तो क्या पर्वत की गुफा में रावण नहीं जा सकता? बोलिए। जा सकता है। लेकिन देवता जानते हैं कि आएगा नहीं। यहां रावण जा सकता है। लेकिन देवताओं को पूर्ण विश्वास है कि रावण यहां आएगा नहीं। क्यों नहीं आएगा? पर्वतों के गुफा का जो द्वार होता है वह छोटा होता है। और गुफा में जाने के लिए झुकना पड़ेगा। झुकना पड़ेगा। और सरकार रावण का सिद्धांत है झुकेगा नहीं। हमेशा कहा झुकेगा नहीं कुछ भी हो जाए। देवता जानते झुकी ना। अब बिना झुके गुफा में आ नहीं सकते हैं।

देवताओं को पता चला कि हनुमान जी जा रहे हैं लंका। हनुमान जी के बल और बुद्धि का पता लगाने के लिए देवताओं ने सुरसा को भेजा। सुरसा हनुमान जी जा रहे हैं। सामने आकर खड़ी हो गई। बोली मैं तुमको खाऊंगी। हनुमान जी बोले क्यों? बोली बहुत भूख लगी है। हनुमान जी बोले थोड़ा कंट्रोल कर लो। मैं बहुत जरूरी काम से जा रहा हूं। मां की सूचना ले प्रभु को दे दूं। उसके बाद तब तब बदन बैठ आई। मैं अपने आप तुम्हारे शरीर में चला जाऊंगा। विश्वास करो। सत्य कहो मोहि जान दे। मैं सही बोल रहा हूं जाने दो। बोली ना ना अभी खाऊंगी। हनुमान जी बोले लगता है बहुत तेज भूख लगी है तुमको। एक काम करो खाओ मुंह खोलो। सुरसा ने एक जोजन का शरीर बनाया। कितना बड़ा? एक जोजन में कितना किलोमीटर? 12। सुरसा एक जोजन की हुई तो हनुमान जी दो जोजन के हो गए। अब शुरू हुआ डबल का खेल। गोस्वामी जी कहते हैं जो जन भरत ही बदन पसारा। जो जन भरत ही बदन पसारा। कपन के सुगुण विस्तारा। तन के सुगुण विस्तारा। जोजन मुख तेहुउर जोजन भय पुरत पवन सुत भक्त भयौ। पुरत पवन सुत भक्त भयो। जस जस सुरसा बदन बढ़ावा। जस जस सुरसा बदन। हनुमान जी महाराज सासु कप रूप दिखावा। सासु कप रूप बढ़ते सत जो जनत आन के। सत जन आन अति गुरु पवन सुख लेना। अति रूप पवन सुख लेना। अखिल रूप पवन सुख लेना।

सुरसा एक जोजन की हुई तो हनुमान जी जोर से बोलिए। सुरसा चार जोजन की तो हनुमान जी। सुरसा 16 जोजन तो हनुमान जी। आप लोग तो ऐसे बता रहे जैसे आप लोग वही खड़े थे। बढ़ते बढ़ते सुरसा ने 100 जोजन का मुख खोला। क्या खोला? 100 जोजन का मुख। सत जोजन ते आन आनन की। आनंद माने मुख। हनुमान जी को खाने के लिए उसने जो खोला था मुंह। इसकी लंबाई है 1200 किलोमीटर। अब सोचिए उसका शरीर कितना बड़ा होगा। हनुमान जी बोले 100 जोजन का मुंह खोल दी। यदि मैं 200 जोजन का हो जाऊंगा तो मेरा दाहिना हाथ राम जी के पास पहुंच जाएगा। बाया हाथ सीता माई के लगे। फिर राम जी सोचेंगे हनुमान जी कर का रहे हैं क्या गारंटी है मेरे 200 के बाद ये 400 की नहीं होगी। जैसे सुरसा ने 100 जोजन का मुख खोला हनुमान जी चकमा दे दिए। अति लघु रूप पवन सुत। हनुमान जी क्या दे दिए चकमा? क्या दे दिए चकमा समझ में आता है आप लोगों को? कभी किसी को दिए हैं? दिए नहीं तो समझ में कैसे आएगा? हम लोग बचपन में खेल खेलते थे। छोटे थे तो पता नहीं आप लोग खेले हैं कि नहीं खेले हैं। खेले हैं? कौवा ओढ़ कबूतर ओढ़ चिरई ओढ़ गधा ओढ़। बहुत सुंदर बहुत सुंदर। और जो गधा उड़ाया वो फिर गधा पिटाता था तो उसमें सरकार चोर बनना पड़ता ऐसे करना पड़ता था। आज जितने लोग थे सब मारते थे तो उसमें चकमा देके मारा जाता है। मौलवा है ना? मौल तड़ त दोनों ओर से मारता है। हनुमान जी चकमा दिए। बढ़ा ते बढ़ाते 100 जोजन तक ले गए और उसके बाद लघु नहीं अति लघु रूप धारण किए और सुरसा के मुख में चले गए। बड़ी खतरनाक है। हो देखिए कैसे मोहबाई है। हनुमान जी उसके पेट में जाके आधा घंटा रहे। मालूम है क्या किए? मार गदाम मार गदा मार के सब फैटी लीवर उसका खत्म कर दिए। पूरा ब्लॉकेज वकेज कोलेस्ट्रॉल सब सब गला वला के। हनुमान जी बाहर निकले आधे घंटे बाद बाहर निकले और बोले अब तो मैं तुम्हारे पेट में से आया हूं। क्या अब भी मुझे खाओगी? सुर साहब बोले हनुमान जी मैं आपको खाने नहीं आई थी। देवताओं ने मुझे आपके बल कल और बुद्धि का पता लगाने के लिए भेजा था। हनुमान जी बोले क्या पता चला? बोली आपके बढ़े हुए रूप का दर्शन मिला। इससे आपके बल का पता चला और मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए आपने छोटा रूप बना लिया। इससे बुद्धि का पता चल गया। आप बल बुद्धि के अपार भंडार है।