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कल की कक्षा में हमने वेदों के बारे में एक परिचय लिया था। आज हम जानेंगे कि वैदिक साहित्य क्या-क्या है और यदि कोई ग्रंथ ईश्वरीय ग्रंथ है, तो उसमें क्या-क्या शर्तें होनी चाहिए, जिन्हें उसे पूरा करना चाहिए। यदि कोई भी आकर यह दावा कर ले कि यह ईश्वरीय ग्रंथ है, तो ईश्वरीय ग्रंथ में क्या-क्या गुण होने चाहिए, उसे भी आज के वीडियो में जानेंगे। तो ईश्वर स्तुति, उपासना, प्रार्थना कर लेते हैं, उसके बाद आज शुरू करते हैं।
ओम यो भूत च भव्य च सर्वम यशद तिष्ठति यर चच केवलम तस्म जेठाय ब्रह्माने नमः ओम शांति शांति शांति।
मैं भी स्क्रीन शेयर कर रहा हूँ। कृपया मैसेज करके पुष्टि करें कि स्क्रीन दिख रही है, सबको दिखाई दे रही है? स्क्रीन सबको दिखाई दे रही है? हाँ, ठीक है। चलिए आज की कक्षा प्रारंभ करते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आधार है। जब तक यह मन में स्पष्ट नहीं होगा, तब तक हम आगे की बातों को समझ नहीं पाएंगे। तो अच्छे से ध्यान से सुनिए।
तो देखिए, कोई भी पुस्तक या ग्रंथ ईश्वरीय ज्ञान है या नहीं, यह कैसे पता करें? क्योंकि आजकल समय-समय पर सभी यह दावा करने लगे हैं कि यह ईश्वरीय ज्ञान है, ईश्वरीय पुस्तक है, ईश्वर ने हमें दिया हुआ है। तो उसमें क्या-क्या गुण होने चाहिए? कुछ नियम हैं, जिन पर उन्हें खरा उतरना पड़ेगा। यदि वे इनका पालन करते हैं, तभी वह ईश्वर का ज्ञान है, अन्यथा वह ईश्वर का ज्ञान नहीं।
तो चलिए जानते हैं वे कौन-कौन से हैं। पहला, उसमें किसी भी इतिहास, कहानी, राजा-महाराजा या भूगोल का वर्णन नहीं होना चाहिए। क्योंकि ईश्वर से पहले कुछ भी नहीं था। ईश्वर अपने ज्ञान की पुस्तकों में किसी इतिहास का वर्णन नहीं करेंगे। हमने पुस्तक आज बना ली है, लेकिन अगर कोई दावा कर रहा है कि यह ईश्वर का ज्ञान है, ईश्वर की पुस्तक है, ईश्वर ने स्वयं हमें दिया है, तो सबसे पहली शर्त यह होनी चाहिए कि उसमें कोई इतिहास नहीं होना चाहिए। क्योंकि ईश्वर जब सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं, वह सृष्टि का आदि स्वरूप होता है, मतलब प्रारंभ होता है। तब कोई इतिहास बना ही नहीं है। जब इतिहास बना ही नहीं, तो इतिहास उसमें संभव नहीं है। और ईश्वर से महान इस सृष्टि में कोई नहीं। ईश्वर किसी मनुष्य का गुणगान नहीं करेंगे, कभी भी उसके बारे में नहीं लिखेंगे, कभी भी। ठीक?
तो पहली शर्त यह होनी चाहिए कि उसमें इतिहास नहीं होना चाहिए, कोई कहानियाँ नहीं होनी चाहिए, राजा-महाराजाओं का कोई उल्लेख उसमें नहीं होना चाहिए। उसमें भूगोल का भी वर्णन नहीं होना चाहिए। क्योंकि ईश्वर का जो ज्ञान है, वह सबके लिए होना चाहिए, पूरी सृष्टि के लिए होना चाहिए। सृष्टि में जहाँ-जहाँ मनुष्य है, इस पृथ्वी में जहाँ-जहाँ मनुष्य है, हर एक मनुष्य के लिए वह ज्ञान समान होना चाहिए। अगर वह भूगोल का वर्णन करते, जैसे हमारे देश का अगर वर्णन कर देते, उसमें यह भारत खंड की बात हो रही है या फिर अमेरिका की बात हो रही है, तो वह ज्ञान उस विशेष जगह के लिए है। ईश्वर के ज्ञान में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, न भूगोल के स्तर पर, न किसी और के स्तर पर, क्योंकि ईश्वर का ज्ञान सबके लिए बराबर होना चाहिए। तो पहली शर्त है: इतिहास नहीं होना चाहिए, कोई कहानी नहीं होनी चाहिए, राजा-महाराजा का कोई उल्लेख नहीं होना चाहिए, भूगोल मतलब किसी भी देश, काल, परिस्थिति का वर्णन उसमें नहीं होना चाहिए।
दूसरा, सृष्टि जैसी है, उसका ज्ञान वैसा ही होना चाहिए। सृष्टि के विरुद्ध कुछ भी नहीं होना चाहिए। हम सृष्टि को देख रहे हैं, सूर्य को देखते हैं, चंद्र को देखते हैं, पृथ्वी को देखते हैं। आज हम जिस प्रकार से जान पा रहे हैं, उस पुस्तक में, उस ज्ञान में बिल्कुल वैसा ही होना चाहिए। उसके विरुद्ध कुछ भी नहीं होना चाहिए। अगर उसके विरुद्ध कुछ भी हुआ, तो वह ईश्वर का ज्ञान नहीं है, क्योंकि वह सृष्टि को जानता ही नहीं। जो सृष्टि को जानता ही नहीं है, वह ईश्वर का ज्ञान हो ही नहीं सकता। सृष्टि जैसी है, ईश्वर का ज्ञान वैसा ही होना चाहिए। क्योंकि सृष्टि में जो मनुष्य की प्रथम उत्पत्ति हुई, आदि सृष्टि में, हमारा जो मनुष्य का पहला जनरेशन, पहली पीढ़ी जिसको हम बोलेंगे, उनको सृष्टि का ज्ञान इसलिए दिया गया था ताकि इस सृष्टि में जाकर के तुम्हें क्या करना है, कैसे खाना है, कैसे बैठना है, क्या-क्या व्यवहार करने हैं, क्या कर्मकांड करने हैं, फिर इस शरीर का क्या उपयोग करना है, अणु-परमाणु का ज्ञान, सब दिया गया था। तो सृष्टि जैसा है, वैसा अगर ज्ञान उनको नहीं मिला होता, तो आज ज्ञान-विज्ञान इतना फलता-फूलता नहीं। तो उसमें सृष्टि का ज्ञान, उस ग्रंथ में उनका जो ज्ञान है, ईश्वर का और सृष्टि का ज्ञान में कोई विरोधाभास नहीं होना चाहिए। एक जैसी बातें होनी चाहिए। इसका ज्ञान आज भी उतना ही उपयोगी होना चाहिए जितना आदि सृष्टि में था।
ईश्वर का ज्ञान, देखिए, ईश्वर सर्वज्ञ होने चाहिए। ईश्वर सर्वज्ञ हैं, मतलब वे सब जानते हैं। उन्होंने एक बार सब कुछ बना दिया और बनाने की आवश्यकता नहीं, उसमें कोई परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं। मनुष्य को परिवर्तन करने की आवश्यकता है क्योंकि हम अल्पज्ञ हैं। ईश्वर सर्वज्ञ हैं, इसलिए उन्होंने एक बार इस मनुष्य शरीर को बना दिया। उन्होंने एक ही बार में सूर्य को बना दिया, चंद्र को बना दिया, पृथ्वी को बना दिया और बार-बार उसमें कोई अपडेशन की आवश्यकता नहीं। क्योंकि ईश्वर सब जानते हैं, वे पूर्ण हैं और हम अपूर्ण हैं। हमसे गलतियाँ होती रहेंगी, हम अल्पज्ञ हैं। ईश्वर सर्वज्ञ हैं। तो ईश्वर का ज्ञान परिवर्तित नहीं होना चाहिए, है ना? ईश्वर का ज्ञान उतना ही ज्यादा उपयोगी होना चाहिए जितना आदि सृष्टि में था। सृष्टि के प्रारंभ में जैसा था, आज भी उतना ही उपयोगी होना चाहिए। मतलब, इसको हम अंग्रेजी में 'आउटडेटेड' हो गया, आज इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते, है ना? तो सृष्टि उत्पत्ति के समय ईश्वर का ज्ञान जैसा है, आज भी वैसा ही होना चाहिए, उतना ही उपयोगी होना चाहिए, तभी वह ईश्वर का ज्ञान है, अन्यथा वह कोई ईश्वर का ग्रंथ नहीं है, ईश्वर का ज्ञान नहीं।
उसका ज्ञान संपूर्ण मानव जाति के लिए होना चाहिए, उसमें कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिए। हाँ, अगर ईश्वर कोई ज्ञान दे रहे हैं, तो वह संपूर्ण मनुष्य के लिए होना चाहिए। इस पृथ्वी में, इस ब्रह्मांड में जहाँ भी मनुष्य हो, सबके लिए वह ज्ञान बराबर होना चाहिए। उसमें कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। वह ज्ञान आदि सृष्टि में ही दिया हुआ होना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सर्वज्ञ हैं, उन्हें अपने ज्ञान को परिवर्तित करने की आवश्यकता नहीं होगी। वह जो ज्ञान है, वह आदि सृष्टि में, जब सृष्टि प्रारंभ होगी, तब उनको मिलना चाहिए। आज अगर ज्ञान, मान लीजिए, सृष्टि बने हुए अरबों वर्ष हो गए, आज उनको ज्ञान दिया जा रहा है, आज उनको पुस्तक दिया जा रहा है, तो उस पुस्तक की कोई प्रासंगिकता है? सृष्टि तो तब बनी थी और ज्ञान तभी देना चाहिए। आज मैं अगर कोई मशीन बनाऊँ और उस मशीन का मैं मैनुअल आपको 10 साल बाद दूँ, क्या वह प्रासंगिक होगा? उस मशीन को मैं उपयोग कैसे करूँगा? अब वह मैनुअल ही नहीं पता मुझे। पहली मशीन है, किसी को पता भी नहीं है कैसे ऑपरेट करते हैं, कैसे चलाते हैं। अगर कोई सीखा होता पहले, तो उससे हम सीख सकते थे, ट्रेनिंग लेकर के। परंतु जब पहली बार बनी हैं कोई चीजें, तो आदि सृष्टि में उसका ज्ञान देना पड़ेगा, तभी तो मनुष्य आगे पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुरु-शिष्य परंपरा के द्वारा ज्ञान को आगे बढ़ाते चले जाएँगे। ईश्वर का ज्ञान आदि सृष्टि में होना चाहिए, जब सृष्टि बनी थी। बाद में अगर कोई आकर के बोल दे कि यह ईश्वर का ज्ञान है, 2000-5000 वर्ष बाद, तो यह ईश्वर का ज्ञान नहीं है। जैसे इस्लाम की उत्पत्ति आज से मात्र, मान लीजिए, 1500 वर्ष पहले हुई है। वही बीच में आकर 1500 वर्ष पहले क्या कोई सृष्टि नहीं थी क्या? ईश्वर अचानक 1500 वर्ष बाद में आकर के अचानक और उनका अलग-अलग पुस्तक आता रहता है अलग-अलग समय पर, तो ईश्वर पूर्ण नहीं हैं, सर्वज्ञ नहीं हैं, ईश्वर सब जानते नहीं हैं, अपडेट करना पड़ता है। उसी प्रकार बाइबल की उत्पत्ति भी वही है। बाइबल भी आज से 2400 वर्ष पहले ही उसकी उत्पत्ति हुई है। उससे पहले ओल्ड टेस्टामेंट था, फिर न्यू टेस्टामेंट, मतलब अलग-अलग पुस्तक बदल-बदल कर दी जा रही है। पुस्तक बदल-बदल कर दी जा रही है मतलब अपडेशन हो रहा है उनके ज्ञान पर। तो ईश्वर अगर अपडेट करने की आवश्यकता पड़े, वे ईश्वर नहीं हो सकते। ईश्वर संपूर्ण हैं। एक बार उन्होंने जो कह दिया है, एक बार उन्होंने जो कर दिया है, वह पूर्ण है। उसमें परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं। क्या आपको यह स्पष्ट है?
तो ईश्वर का ज्ञान केवल वही है जिसमें कोई इतिहास नहीं है, कहानियाँ नहीं हैं, राजा-महाराजा का कोई उल्लेख न हो, भूगोल का कोई उल्लेख नहीं होना चाहिए। जैसे बाइबल में आपको हर जगह उल्लेख मिलेगा, जहाँ उसकी उत्पत्ति हुई। इस्लाम की पुस्तक कुरान में आपको अरब देशों के पूरे उल्लेख मिलेंगे, बाकी और किसी देश का कोई भी उल्लेख वहाँ पर नहीं मिलेगा। तो मतलब वह जो ज्ञान है, उनका बस उसी देश तक सीमित है। परंतु जो ईश्वर की पुस्तक होगी, उसमें यह नहीं रहेगा। कोई भेदभाव नहीं रहेगा, कोई कहानियाँ नहीं होंगी, कोई राजा-महाराजा का उल्लेख नहीं, किसी भूगोल का उल्लेख नहीं होगा। सृष्टि जैसी है, उसका ज्ञान वैसा ही होना चाहिए। कोई चमत्कार उसमें नहीं होना चाहिए। सृष्टि में हम चमत्कार नहीं देखते। सृष्टि अपने आप नहीं बनी है, किसी ने इसको बनाया है, किसी ने इसको बनाया है क्योंकि सृष्टि अनुशासित है, नियम को नहीं तोड़ती है। अगर मैं एक कक्षा में जाता हूँ, तो कक्षा में मान लीजिए 60 विद्यार्थी हैं। 60 विद्यार्थी हैं कक्षा में। अगर कक्षा में अगर शिक्षक न रहे, तो क्या उस कक्षा के बच्चे क्या करेंगे? अपनी-अपनी मनमानी करेंगे, चिल्लाएँगे, हुड़दंग मचाएँगे। अब अगर शिक्षक उपस्थित हों, तब अनुशासित रहेंगे। उसी प्रकार से यह सृष्टि अनुशासित क्यों है? किसने इसे अनुशासित करके रखा है? हमारा शरीर भी अनुशासित है, नियम को नहीं तोड़ता है, लेकिन हम तोड़ देते हैं। इस शरीर तो हम हैं नहीं, हम तो जीवात्मा हैं। नियम हम तोड़ देते हैं। हम मनमर्जी कुछ भी करते हैं और इस शरीर में अंदर डालते रहते हैं, उसके नियम तोड़ते रहते हैं। उसी प्रकार जो सृष्टि है, सूर्य अपना नियम नहीं तोड़ता, चंद्र अपना नियम नहीं तोड़ता, पृथ्वी अपना काम कर रहा है। हर एक ग्रह-नक्षत्र अपने काम कर रहे हैं। दिन-रात स्वचालित हो रहा है, ऋतु परिवर्तन स्वचालित हो रहा है, हमारे शरीर की क्रिया स्वचालित हो रही है। कौन कर रहा है? किसी के बिना किए यह संभव नहीं है, क्योंकि किसी भी मशीन को आप अपने आप अगर उसको स्टार्ट करके छोड़ दो, तो कुछ दिनों बाद वह बंद हो जाएगा। उसको रखरखाव आवश्यक है। हर वस्तु एक मशीन है। जो भी चल रहा है, पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, ग्रह-नक्षत्र, सब मशीन हैं। कोई न कोई है जो इसका रखरखाव कर रहा है, तभी वह चल रहा है, नहीं तो वह काम करना बंद कर देंगे। जो रखरखाव कर रहे हैं, वही ईश्वर हैं। जो शक्ति है, वही ईश्वर है, क्योंकि उनके बिना कुछ भी संभव नहीं। सब अनुशासित हैं, कोई नियम नहीं तोड़ता। केवल मनुष्य स्वतंत्र है नियम तोड़ने के लिए। बाकी कोई भी, ग्रह-नक्षत्र से लेकर के सृष्टि का कोई भी नियम नहीं तोड़ सकता। पशु-पक्षी भी नहीं। पशु-पक्षी भी सृष्टि के बनाए हुए नियम को नहीं तोड़ सकते, उनके मन में इच्छा भी नहीं होती। परंतु मनुष्य के मन में इच्छा होती है, वह नियम तोड़ करके स्वतंत्र जीना चाहता है। और ईश्वर ने हमें उसका ज्ञान भी दिया: जो नियम तोड़ेगा उसके साथ क्या होगा, जो नियम के अनुसार पालन करेगा, जो वेदों के संग चलेगा, वेदों को धर्म के अनुसार आचरण करेगा, उसके साथ क्या होगा, और जो अधर्म का आचरण करेगा, वेद विरुद्ध आचरण करेगा, उसके साथ क्या होगा, क्योंकि हम कर्म के फलों में बंधे हुए हैं।
तो देखिए, वेदों का ज्ञान बिल्कुल ऐसा ही है जैसा यहाँ बताया जा रहा है कि वहाँ कोई भी कहानियाँ नहीं हैं, राजा-महाराजा, भूगोल का कोई उल्लेख नहीं। सृष्टि जैसी है, बिल्कुल वेद वैसा ही बात करते हैं। कोई विरोधी बात नहीं, कोई चमत्कार वाली बात नहीं है, क्योंकि ईश्वर चमत्कार नहीं करते। ईश्वर ने सब सामर्थ्य देकर रखा है, सभी वस्तुओं को देकर रखा है। मनुष्य का शरीर, मनुष्य के दिमाग से बड़ा चमत्कार और कुछ नहीं है। जितनी भी सृष्टि में आप देख रहे हैं, सब मनुष्य के शरीर से उत्पन्न हुए हैं, मनुष्य के दिमाग से उत्पन्न हुए हैं। ईश्वर ने सब सामर्थ्य हमें देकर रखा है, उसको चमत्कार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उनका ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है। वेदों का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक नहीं होता तो हम यहाँ पर वेदों के बारे में चर्चा नहीं कर रहे होते। अरबों वर्षों के बाद भी उनका ज्ञान संपूर्ण मानव जाति के लिए है, उसमें कोई भेदभाव नहीं मिलेगा। वहाँ ज्ञान आदि सृष्टि में दिया हुआ है। वेद की उत्पत्ति, वेद स्वयं बोलते हैं, "हमने आदि सृष्टि में हमारी उत्पत्ति हुई थी, हमने वेदों का ज्ञान दिया था।" ईश्वर स्वयं वेदों को बोलते हैं। एक-एक करके उसको देखेंगे। तो इसमें कोई परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि ईश्वर सर्वज्ञ हैं। हम अल्पज्ञ हैं। हम कितना भी प्रयास कर लें, सब कुछ नहीं जान सकते। हमारे दिमाग की, हमारे शरीर की एक सीमा है, लेकिन ईश्वर सीमित नहीं हैं, वे असीमित हैं, लिमिटलेस हैं। वेद बिल्कुल ऐसा ही कहता है। इससे हमें समझ में आ रहा है कि जो ज्ञान था, मूल ज्ञान, हमारी सृष्टि में आया हुआ है, कहाँ से? वेद से।
तो सबसे पहले हम थोड़ा सा वैदिक साहित्य के बारे में परिचय ले लेते हैं। क्योंकि वैदिक साहित्य को जब तक आप नहीं जानेंगे, तब तक मैं जब इन साहित्य का संदर्भ लूँगा कि इसमें यह कहा गया, इसमें यह कहा गया, इसमें यह कहा गया, तो आपके मन में एक प्रश्न रहेगा कि यह है क्या? तो मैं पहले वैदिक साहित्य को आपको स्पष्ट कर देता हूँ।
देखिए, वैदिक साहित्य में इतने ग्रंथ आते हैं। सबसे ऊपर आता है वेद। वेदों पर जो है, जब सृष्टि के आदि में वेदों की उत्पत्ति हुई, तब वेद जिस रूप में थे, वेदों के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने के लिए वेदों का अनुवाद किया गया संस्कृत में और उसमें से ब्राह्मण ग्रंथ उत्पन्न हुए। ठीक है? वेदों के बाद जो सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है, वह ब्राह्मण ग्रंथ है। ब्राह्मण ग्रंथ उस समय सब के सभी ब्राह्मण थे क्योंकि उस समय वर्ण व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई थी। उस समय सभी ब्राह्मण ही थे। तो वर्ण व्यवस्था विकसित न होने के कारण उस समय क्या हुआ? वेद को जाने, वेदों के ज्ञान को संश्लेषित किया उन्होंने फिर अपनी भाषा में। सबसे पहला जो वेदों का अगर भाष्य है, वह है ब्राह्मण ग्रंथ। हमारी सृष्टि में वेद का सबसे प्रथम भाष्य करने वाले ग्रंथ हैं ब्राह्मण ग्रंथ। उन्होंने वेदों के अर्थों को, वेदों की शिक्षा को फिर समाज को देना प्रारंभ किया। लेकिन यह जो भाष्य था, मूल संस्कृत भाष्य है। ठीक? उन्होंने पहला भाष्य किया। तो उसके पश्चात अरण्यक ग्रंथ बने, उसके बाद उपनिषद बने, उसके बाद दर्शनशास्त्र बने, उसके बाद स्मृति ग्रंथ बने, उपवेद बने, सूत्र ग्रंथ बने, फिर महाकाव्य वगैरह जो रामायण, महाभारत भी आते हैं, वे भी बने।
देखिए, सनातन आश्रम में, सनातन जो संस्कृति है, वह चार आश्रमों में विभाजित है। ठीक है? जैसे 25 वर्ष के लिए ब्रह्मचर्य है, फिर 25 वर्ष के लिए गृहस्थ आश्रम है, फिर 25 वर्ष के लिए वानप्रस्थ आश्रम है, फिर 25 वर्ष के लिए संन्यास आश्रम है। मतलब एक मनुष्य की आयु को 100 वर्ष में विभाजित किया गया है और 100 वर्ष माना गया है और 100 वर्ष को चार भागों में विभाजित किया गया। पहला जो है, 25 वर्ष में हमको ब्रह्मचर्य व्रत रखना है, मतलब ब्रह्मचर्य का पालन करना है। पहले जो है, अगर पहले गुरुकुल व्यवस्था हुआ करती थी, तो गुरुकुल में छह से आठ वर्ष की उम्र में बच्चों को प्रवेश करवाया जाता था। तो छह वर्ष से लेकर के 25 वर्ष तक उनको शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करनी है गुरुकुल में, वेदों की शिक्षा ग्रहण करनी है। अब वे स्वतंत्र थे, उनको क्या बनना है। अगर वे चाहें तो वहाँ से फिर शिक्षा-दीक्षा को और जारी रख सकते थे। ब्रह्मचर्य से संन्यास में जा सकते थे कि हमें और ज्यादा अधिक पढ़ना है और जानना है, तो फिर यहाँ पर दो जो आश्रम हैं, इनको छोड़ सकते थे, इनको हटा सकते थे। ठीक है? इसमें जाने की आवश्यकता नहीं। अब जिनको ब्रह्मचर्य से संन्यास में नहीं जाना है, वे फिर गृहस्थ में जाएँगे। 25 वर्ष की उम्र में उनका विवाह होगा। विवाह संस्कार के बाद, विवाह के बाद वे फिर गृहस्थ में जाएँगे और संतान उत्पत्ति वगैरह, समाज का संचालन वे करेंगे। उसके बाद जैसे उनकी उम्र हो गई 50 वर्ष, गृहस्थ में रहते हुए 50 वर्ष के पश्चात उनको वानप्रस्थ में जाना है। वानप्रस्थ में क्या होता था? हमें अब जो है, संसार को, परिवार को हमें त्याग देना है। अभी हमें कम से कम संसाधनों में हमें हमारा शरीर को चलाना है और ईश्वर की साधना में और जो भी हमने गृहस्थ आश्रम तक जाना है, अब तक जो भी हमारा ज्ञान हमने प्राप्त किया है, उसको क्या करना है? समाज को देना है और वन में जाकर के साधना करनी थी। इसलिए वन से संबंधित है यह वानप्रस्थ आश्रम है। तो अरण्यक जो यह ग्रंथ है, यह इसी से संबंधित है। वेदों के जो भी ज्ञान थे, उसको अरण्यक ग्रंथ में रखा गया है, शिक्षा को रखा गया है। और जितने भी ग्रंथ रचे गए, ऋषि-मुनि जब वानप्रस्थ आश्रम में थे, तो अरण्यक ग्रंथ की रचना उन्होंने इस समय की थी। गृहस्थ में रहकर के उन्होंने फिर ब्राह्मण ग्रंथों की रचना की थी। ठीक है? जो ऋषि-मुनि गृहस्थ हुए थे, तो ब्राह्मण ग्रंथ की रचना की उन्होंने। वेदों की शिक्षाओं को फिर एक गृहस्थ को क्या-क्या करने चाहिए, किस प्रकार से रहने चाहिए, उन शिक्षाओं को उन्होंने वहाँ पर स्थानांतरित किया, उनका वहाँ पर वर्णन किया। उसके बाद जो है, वानप्रस्थ में आपने 75 वर्ष तक हो गए, आपकी उम्र यहाँ तक 75 वर्ष हो गई है। अब 75 वर्ष के पश्चात जो है, आपको संन्यास आश्रम में जाना है। संन्यास आश्रम क्या होता था? कि अब जो है, इस संसार को त्याग देना है, मतलब संसार को त्याग कर पूर्ण भोग करना है, बहुत ही सीमित लेना है। न ही आपको कोई गृहस्थ का कार्य करना है, न ही आपको कोई अन्न वगैरह उगाना है, न ही कोई और कार्य करना। आपका एक ही कार्य है कि केवल और केवल समाज को जो भी ज्ञान आपने अर्जित किया है, उसको देना है और साथ ही साथ आपको क्या करना है कि कम से कम संसाधनों में जीवनयापन करना है और भिक्षा माँग करके। ठीक है? क्योंकि अब आप शिक्षा दोगे। संन्यासी क्या हुआ करते थे? संन्यासी तप करते थे, संन्यासी ध्यान करते थे और ईश्वर के साथ संपर्क। अब हमने अपने 75 वर्ष का समय जो है ज्ञान अर्जित करने में दे दिया है। उसके बाद हम क्या करेंगे? सीधा ईश्वर को कैसे हम जानेंगे? ईश्वर को पूरा समर्पित कर देना ही संन्यासी का परम कर्तव्य था, परम धर्म था। तो इस प्रकार से जो चार आश्रम हैं, इन चार आश्रमों में अलग-अलग ग्रंथों की रचना हुई अलग-अलग समय में।
तो वेद जो हैं, हमारे मूल धर्म ग्रंथ हैं। वेदों से ही हमारी उत्पत्ति। हम जो सनातनी अपने आप को बोलते हैं, सनातन शब्द भी वेदों से ही आया हुआ है। तो जितने भी ग्रंथ हैं, वे बाद में रचे गए हमारे ऋषि-मुनियों के द्वारा। तो वेदों का प्रथम भाष्य है ब्राह्मण ग्रंथ। उसके बाद अरण्यक बने, उपनिषद बने, दर्शन बने, स्मृति ग्रंथ बने, उपवेद बने, उसके बाद सूत्र ग्रंथ बने, महाकाव्य बने। इस प्रकार से यह ग्रंथ बने। अब देखते हैं यह कैसे-कैसे बने, किस प्रकार से बने और क्या-क्या हैं।
ब्राह्मण ग्रंथ। अब देखिए, वैदिक साहित्य में सबसे पहला जो ग्रंथ है, वह ब्राह्मण ग्रंथ है। क्योंकि वेद के जो अनुवाद हैं, वेदों को अनुवाद करके, भाष्य कर-कर के जो है संस्कृत में, वे समाज को शिक्षा देते थे। तो देखते हैं क्या है। ब्राह्मण ग्रंथ वेदों का प्रथम व्याख्यान ग्रंथ है। प्रथम बार व्याख्या अगर वेदों की की, तो ब्राह्मण ग्रंथ में की। इनमें यज्ञों के कर्मकांडों का विस्तृत वर्णन है। देखिए, कर्मकांड शब्द का अर्थ यह नहीं है कि खाली उसमें यज्ञ करना है। कर्मकांड व्यवहार से संबंधित है। हमें क्या खाना है, क्या उठना है, कैसे व्यवहार करना है, आचार-विचार, सब इसमें था। ठीक है? इसका विस्तृत वर्णन है। साथ ही साथ शब्दों की व्युत्पत्ति तथा प्राचीन राजाओं और ऋषियों की कथाओं तथा सृष्टि संबंधित विचार एवं प्रत्येक वेद के अपने ब्राह्मण ग्रंथ हैं। ब्राह्मण ग्रंथ में फिर जो है, यहाँ पर से बहुत सारी कहानियाँ वे लिखने लगे कि ये ये चीजें हुईं, इस प्रकार से हुईं। तो ये जो हैं, इस प्रकार के ग्रंथ हैं।
देखिए, ऋग्वेद का ग्रंथ है। ऋग्वेद से देखिए, उन्होंने संश्लेषित करके दो ब्राह्मण ग्रंथ बनाए: ऐतरेय ब्राह्मण, कौशीतकि ब्राह्मण। उसके बाद यजुर्वेद से बनाए: शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय ब्राह्मण। सामवेद से उन्होंने बनाया: पंचविंश, षड्विंश और जैमिनीय ब्राह्मण। और अथर्ववेद से बनाए: गोपथ ब्राह्मण। क्योंकि वेद चार हैं। चार वेदों से अलग-अलग ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। इसका अलग-अलग शिक्षाओं का इसमें वर्णन है। उसी प्रकार अरण्यक ग्रंथ भी बने। अरण्यक ग्रंथ में ऐतरेय है, कौशीतकि है। उसके बाद बृहदारण्यक उपनिषद भी इसमें बना है। यह देखिए, यहाँ पर भी है बृहदारण्यक उपनिषद। तो अरण्यक ग्रंथ में, यह जो अरण्यक ग्रंथ आप देख रहे हो, अलग-अलग वेदों से संबंधित हैं। ठीक है? उसी प्रकार उपनिषद भी ग्रंथ हैं जो वेदों से संबंधित हैं। मतलब हर एक वेदों का उपनिषदों में, अरण्यक में और ब्राह्मण ग्रंथ में आपको हूबहू बहुत सारे ऐसे-ऐसे मंत्र मिल जाएँगे जो वेदों के ठीक उठाकर उसकी व्याख्या की गई है, उसका वर्णन किया गया है। तो ऋग्वेद से संबंधित जो अरण्यक है, यहाँ पर है। यजुर्वेद से संबंधित अरण्यक जो है, यहाँ पर है। और सामवेद से संबंधित जो भी अरण्यक है, यहाँ पर है। ऋग्वेद के उपनिषद हैं। देखिए, ये कुछ 11 उपनिषद हैं जो कि बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। तो ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के सर्वप्रथम जो व्याख्यान ग्रंथ हैं, उनको कहा जाता है।
अब देखिए, वैदिक साहित्य के परिचय में देखते हैं उपनिषद। दूसरा जो हमारा साहित्य है, वह उपनिषद है। उपनिषद शब्द का अर्थ होता है बैठना। गुरु के समीप जाकर ज्ञान की अभिलाषा से बैठना। 'उप' का अर्थ होता है समीप, 'नि' का अर्थ होता है नीचे, 'सद' का अर्थ होता है बैठना। गुरु से प्रार्थना करना कि हमें ज्ञान की प्राप्ति हो, ब्रह्म ज्ञान की विद्या दें, ऐसी अभिलाषा करके। उपनिषद जो है, गुरु-शिष्य का एक प्रश्न-उत्तर प्रारूप में है। जब गुरु से जो शिष्य प्रश्न करता है, जानने की इच्छा करता है, अभिलाषा करता है, तो अलग-अलग ऋषियों ने जो अनुभव किया, उसके आधार पर अलग-अलग उपनिषद यहाँ पर रचे गए। वेदों के ज्ञान को उन्होंने जब जाना, जानकर के जब समाज को देना प्रारंभ किया, लोगों को बताना प्रारंभ किया, तो उनके जो शिष्य थे, वे जो प्रश्न करते थे, उसके अनुसार उपनिषदों की रचना यहाँ पर प्रारंभ हुई। उन्होंने जिस प्रकार से ब्रह्म को जाना, तत्व को जाना, इसी से उपनिषद बने। तो 11 जो उपनिषद हैं यहाँ पर, ये उपनिषद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। वैसे तो उपनिषदों की संख्या 108 है, 108 उपनिषद हैं, लेकिन 11 उपनिषद ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं। ये ही ज्यादा पढ़े जाते हैं। उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है। इनको वेदों का अंतिम भाग कहा जाता है, इसलिए वेदों का अंत कहा जाता है। क्योंकि वेदों का अंतिम भाग इसलिए, क्योंकि जो वेद हैं, उसके जो अंतिम अध्याय हैं, अधिकतम उपनिषदों में अंतिम अध्याय का ही इसमें वर्णन किया गया है, इसलिए वेदांत भी कहा जाता है। और अंत शब्द का अर्थ यह नहीं है कि यह अंत हो गया है। अंत शब्द का अर्थ होता है यहाँ पर उत्कृष्ट। वेदों का जो उत्कृष्ट ज्ञान है, ब्रह्म विद्या है, ईश्वर को जानने की विद्या, वह उपनिषदों में है। तो हर मनुष्य को उपनिषदों को पढ़ना चाहिए। उपनिषद बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। अगर आपको ब्रह्म को जानना है, ईश्वर को जानना है, तो ये 11 उपनिषद आपको पढ़ने चाहिए, बहुत ही ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।
अब देखिए, वैदिक साहित्य में हम देखते हैं वेदांग। वेदांग क्या हैं? वेदों के छह अंग हैं। अगर कोई वेदों का भाष्य करना चाहता है, वेदों के मत मतलब समझना चाहता है, मंत्र का अर्थ समझना चाहता है, तो उनको इन वेदांगों के बारे में जानना होगा, वेदांगों को पढ़ना होगा, वेदांगों में पारंगत होना होगा। तो पहला जो है, हमारे ऋषि-मुनियों ने क्या किया है? इसको अलग-अलग भागों में विभाजित कर दिया, छह अंगों में। ठीक है? तो पहला जो है, देखिए, शिक्षा। शिक्षा में क्या है? उच्चारण की विधि। वैदिक मंत्रों का उच्चारण कैसे होगा, उच्चारण इसमें सिखाया जाता है। कल्प में क्या होता है? कर्मकांड तथा आचार क्या रहेगा। छंद में क्या है? अक्षरों की गणना के आधार पर पाठ्य, पद्यक मंत्रों के स्वरूप निर्धारण इसमें होता है। तो अक्षरों की गणना वगैरह इसमें, स्वर वगैरह क्या है, कहाँ पर कैसे इसको उपयोग करना है, उसमें छंद के अंतर्गत ये आते हैं। निरुक्त क्या है? जैसे डिक्शनरी है अंग्रेजी में, उसी प्रकार निरुक्त जो है, एक डिक्शनरी है वैदिक संस्कृत का। ठीक है? वैदिक संस्कृत के अर्थ को अगर आपको समझना है, तो निरुक्त जो शास्त्र यास्काचार्य द्वारा रचा गया था, उन्होंने इसमें वेदों के जो भी शब्द आए हुए हैं, उनका अर्थ यहाँ पर उन्होंने उपयोग किया था, उसको बना करके उसकी व्याख्या की थी कि इस शब्द का क्या अर्थ है, इस शब्द का क्या अर्थ है, इस शब्द का क्या अर्थ है। तो हम इसको डिक्शनरी बोल सकते हैं, वैदिक डिक्शनरी। व्याकरण जो है, शब्दों की व्युत्पत्ति कैसे है, उसकी वर्णमाला, उसकी व्यवस्था वगैरह सब इसमें व्याकरण में। ज्योतिष क्या है? दिन, काल, स्थान, परिस्थिति का ज्ञान, ग्रह-नक्षत्रों का ज्ञान। दिन, काल, परिस्थिति, ग्रह-नक्षत्र, समय की चाल, ग्रहों की चाल, नक्षत्रों की गणना आदि का निरूपण जो है, इसमें सिखाया जाता था ताकि जब यज्ञ करे, कोई भी कार्य करे, कोई कर्मकांड करे, वह ग्रह-नक्षत्र, उनकी चाल को समझ करके, दिन, काल, परिस्थिति को समझ करके किया जा सके। तो हमें इन छह वेदांगों को सबसे पहले जानना होता है अगर वेदों का हम अर्थ जानना चाहते हैं तो। इसके लिए हम जो है, कम से कम हमें 10 से 15 वर्ष का समय इन शिक्षा को ग्रहण करने के लिए, जो हमारा आज के समय में यह दिया नहीं जाता है। इसलिए वेदों का जो है, आजकल वेदों में शोध भी नहीं होता है, वेदों पर कोई कार्य भी नहीं होता, इसलिए वेदों का ज्ञान जो है, समाज को दिया भी नहीं जाता है। इसके बारे में मैं आगे बताऊँगा कैसे यज्ञ कर सकते हैं। तो शिक्षा, कल्प, छंद, निरुक्त, व्याकरण और ज्योतिष, ये जो हैं, छह वेदों के अंग हैं। व्याकरण को वेदों का मुख कहा गया है, ज्योतिष को नेत्र कहा गया है, निरुक्त को श्रोत्र कहा गया, मतलब कान कहा गया है, कल्प को हाथ कहा गया है, शिक्षा को नासिका कहा गया है, तथा छंद को दोनों पैर कहा गया। तो यह मिलकर के वेदों का एक शरीर निर्माण करते हैं। ठीक? इनको आपको जानना होगा वेदों को जानने से पहले।
अब देखिए, वेदांग के रचयिता कौन-कौन हैं। देखिए, शिक्षा जो है, उसकी रचना पाणिनी और कात्यायन ने की है। महर्षि पाणिनी और कात्यायन। व्याकरण की रचना जो अष्टाध्यायी है, जो पाणिनी का व्याकरण है, वही जो है, अभी भी इनका ही चलता है। निरुक्त जो है, निघंटु या यास्काचार्य का है। ज्योतिष जो है, वह आर्यभट्ट का, वराहमिहिर का जो अलग का जो ज्योतिष ग्रंथ है, उसको हम यहाँ पर ज्योतिष के लिए उपयोग करते हैं। छंद जो है, वह पिंगल ऋषि ने किया था। और कल्प जो है, इसके बारे में वर्णन उन्होंने बौधायन वगैरह, जो गौतम ऋषि वगैरह, बहुत सारे कल्प हैं, बहुत सारे ऋषियों ने इसका वर्णन किया। तो यह जो है, कल्प है। इनका उपयोग किया जाता है। ये कल्प क्या होते हैं, इसके बारे में थोड़ा आगे जान लेंगे।
अब देखिए, दर्शनशास्त्र। दर्शन को अंग्रेजी में फिलॉसफी (Philosophy) कहा जाता है। 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्' (जिससे देखा जाए, वह दर्शन)। जिससे सत्-असत्, आत्मा-अनात्मा का ज्ञान हो, उसे दर्शन कहा जाता है। मतलब तत्व का ज्ञान हो, सृष्टि के मूल तत्व का ज्ञान हो, अणु-परमाणु का ज्ञान हो, सृष्टि के नियम का ज्ञान हो, सत्य का ज्ञान हो, उसे दर्शन कहते हैं। जिसने जिस प्रकार से जिसको जाना, उसने उस प्रकार से वर्णन किया। तो अलग-अलग ऋषियों ने अलग-अलग दर्शन यहाँ पर बनाए। ये सबसे वैज्ञानिक ग्रंथों में से हैं। सृष्टि के इनमें विज्ञान भरे पड़े हैं। क्योंकि ऋषियों ने यहाँ पर क्या किया था? सूत्र स्वरूप, एक लाइन में ही सब परिभाषित करते थे, कोड वर्ड में। जो विज्ञ हैं, जो बुद्धिमान हैं, जो विद्वान हैं, वही समझ सकते थे उन संस्कृत के श्लोकों का अर्थ। श्लोक तो नहीं थे, सूत्र कहा जाता था। इस समय जो है, सूत्र स्वरूप ग्रंथ रचना प्रारंभ हो गया था, मतलब एक ही लाइन में परिभाषित कर देते थे क्या है। तो देखिए, 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्'। ठीक है? दर्शन शब्द का अर्थ है, 'दृश' धातु से इसका बना हुआ है दर्शन शब्द, जिसका अर्थ होता है देखना। दर्शन का अर्थ है उचित व्यवहार का अध्ययन और ज्ञान की प्राप्ति। ठीक?
तो महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन की रचना की। वैशेषिक दर्शन में हमें न्यूटन के गति के जितने भी सिद्धांत न्यूटन ने दिए हुए हैं, सब इसमें उल्लेख हैं, सभी इसमें बताए गए। न्यूटन ने बस इसको कॉपी-पेस्ट करके हमें दे दिया। न्यूटन से भी कितने हजारों वर्ष पहले उन्होंने इसका उल्लेख किया है अपने ग्रंथ में। हम पढ़ते नहीं, हम जानते नहीं हैं, इस कारण से हमें लगता है कि सभी पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने किया है। सब के सब हूबहू न्यूटन ने बस कॉपी किया है। कैसे किया है, क्या-क्या किया है, हम उसको आपको बताएँगे। मनोज जी, यह आपने किया है, इसको हटा दीजिए। महर्षि गौतम कृत जो न्याय दर्शन है, उसमें न्याय दर्शन में उन्होंने बताया कि हाँ, पहले ऋषि कणाद का जो वैशेषिक दर्शन है, किससे संबंधित है? देखिए, यह संबंधित है अणु-परमाणु से, सृष्टि के कण के डिज़ाइन, उसकी संरचना से संबंधित नियमों से संबंधित। इसी से ही एटम और अणु-परमाणु वगैरह जो हैं, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन के बारे में पता चला है। क्योंकि वेदों के ज्ञान को संश्लेषित करके महर्षि कणाद ने यहाँ पर बहुत ही महान कार्य किया था इस दर्शन में। उसके बाद महर्षि गौतम द्वारा रचित न्याय दर्शन। इसमें न्याय व्यवहार है। समाज में कैसे क्या व्यवहार होने चाहिए, क्या उचित है, क्या अनुचित है, इस प्रकार के बारे में यहाँ पर पूरी तर्कसंगत व्याख्या की गई है। सब ने वेदों का उल्लेख किया। वेदों से ही हमने ज्ञान लिया है। महर्षि कपिल कृत जो है, सांख्य दर्शन। ठीक? सांख्य दर्शन में ज्ञान यह है, ज्ञान योग इसको बोला जाता है। इसी योग का जो है, श्री कृष्ण ने भी अपने कुछ समय-समय पर उन्होंने वर्णन किया है। भगवद्गीता में सांख्य दर्शन भी है, उसमें सांख्य का ज्ञान भी है। महर्षि पतंजलि का योग दर्शन। देखिए, योग जो है, आज हम समझते हैं कि केवल शारीरिक क्रिया बनकर रह गई। योग शब्द का अर्थ महर्षि पतंजलि बोलते हैं कि 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है)। योग वह है जिससे मन जो है, निर्विकार हो जाए। योग शब्द का अर्थ हुआ कि मन को निर्विकार करना। आज हम क्या करते हैं? योग में शरीर की क्रिया को करते हैं, शरीर की क्रिया को करते हैं और समझते हैं कि हम योग कर रहे हैं। योग शब्द का अर्थ होता है जोड़ना, दो वस्तु को जोड़ना। एक वस्तु में योग नहीं हो सकता, दो वस्तु को जोड़ना है। पर किसकी बात हो रही है? किसके साथ किसकी योग की बात हो रही है? आत्मा से परमात्मा के योग की बात। और हम योग करते हैं। योग शब्द भी आज 'योगा' हो गया। हम योग भी नहीं बोलते, हम 'योगा' बोलते हैं। अंग्रेजों का दिया हुआ शब्द जो है 'योगा', उसको बोलते हैं। कृष्ण को आज हम 'कृष्णा' बोलते हैं। ठीक है? तो हमने ही बिगाड़ लिया है, हमने ही अपनी संस्कृति को बिगाड़ रहे हैं। योग शब्द का अर्थ है यह: 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध करना ही योग है)। तो महर्षि पतंजलि का जो योग शास्त्र है, जिसके आधार पर आज हम योग कर रहे हैं, वह पूरी तरीके से उल्टा है। वे जो बोल रहे हैं, हम उसको कुछ भी नहीं कर रहे। हमको बस तो बस मनोरंजन चाहिए। बस वह मनोरंजन का साधन एक शारीरिक व्यायाम है और कुछ भी नहीं है। योग के द्वारा ही हम ईश्वर को जान सकते हैं। योग के आठ अंग हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। जब आप इस स्थिति में जाओगे, तभी आप ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते हो। वही करते थे हमारे ऋषि-मुनि। आप देखिएगा, जब भी वे कुछ भी जानने का प्रयास करते थे, तो ध्यानमग्न हो जाते थे। आत्मा से ही परमात्मा का संबंध हो सकता है, क्योंकि निराकार से निराकार का संबंध होगा। आकार का आकार से संबंध नहीं होगा। आत्मा का कोई चित्र नहीं है, आत्मा का कोई स्केच नहीं है, आत्मा का कोई फोटो नहीं है। तो आत्मा से ही परमात्मा को जाना जा सकता है। इसीलिए योग दर्शन की रचना की गई थी कि ईश्वर को जानने की यह जो है दर्शन है। ईश्वर को कैसे जानें? योग, आत्मा का परमात्मा के साथ योग की बात यहाँ पर हो रही है। महर्षि जैमिनी का मीमांसा दर्शन। यह भी समाज से संबंधित है। इसमें मीमांसा की गई, बहुत सारी। महर्षि वेदव्यास द्वारा कृत है वेदांत दर्शन। सभी जो दर्शन हैं, उनका एक सार है वेदांत दर्शन। आप अगर यह दर्शन नहीं भी पढ़ते हो, उसका अगर आपने वेदांत दर्शन पढ़ लिया, तो उसमें सभी का यहाँ पर विवेचना की गई है, उनका विश्लेषण किया गया है।
अब स्मृति ग्रंथ देख लेते हैं। देखिए, वेदों के ज्ञान को जब ऋषि-मुनियों ने जाना, तब अब समाज को वे देने लगे, समाज को बताने लगे वेदों में क्या है, वेदों के अनुसार चलना है। तो वेदों को, वेदों के ज्ञान को विषय-वस्तु के अनुसार व्यवस्थित करने का पहला जो ग्रंथ है, उसे स्मृति ग्रंथ कहते हैं। ठीक है? स्मृति ग्रंथ वेदों के ज्ञान को व्यवस्थित किया गया विषय के अनुसार। विषय के अनुसार जैसे पहला विषय हो गया संस्कार, उसके बाद हो गया सृष्टि उत्पत्ति। विषय के अनुसार उसकी व्याख्या सबसे पहले प्रारंभ हुई स्मृति ग्रंथों में। तो उसमें जो है, सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है मनुस्मृति। स्मृति का शाब्दिक अर्थ है 'याद किया हुआ'। ठीक है? जिस ऋषि ने वेदों के ज्ञान को अपने तरीके से लिखा, उसके नाम पर एक ग्रंथ बन गया जिसे हम स्मृति ग्रंथ कहते हैं। उस ऋषि की स्मृति और उसका आधार था वेद। तो प्रमुख जो स्मृति आज समाज में प्रचलित है, सबसे प्रामाणिक अगर स्मृति है, वह मनुस्मृति है। और आज सबसे ज्यादा विवाद अगर होता है, तो इसी ग्रंथ को लेकर के होता है और क्यों भी होता है, इसके बारे में बताऊँगा। याज्ञवल्क्य की स्मृति, नारद स्मृति। क्योंकि जितने भी ऋषियों ने उसके बाद स्मृति ग्रंथ रचे हैं, सबने मनु का उल्लेख किया है। मनु की स्मृति पर ही वे आधारित हैं, उस पर ही निर्भर हैं।
और मनु ने जो भी उल्लेख किया है, वेदों का उल्लेख किया है और सभी ने जो है, वेदों के साथ-साथ मनु ऋषि का भी उल्लेख किया है। तो सबसे प्रामाणिक इसलिए मनु ऋषि का ही स्मृति होता है, इसलिए मनुस्मृति का ही समाज में सबसे ज्यादा उपयोग किया जाता है। तो इन ऋषियों ने अलग-अलग समय में फिर स्मृति ग्रंथ रचना प्रारंभ किए।
अब देख लेते हैं थोड़ा सा उपवेद क्या है। देखिए ऋग्वेद का हमने ब्राह्मण ग्रंथ देख लिया, ऐतरेय और कौषीतकि। उसी प्रकार से ऋग्वेद का उपनिषद ग्रंथ भी है। उसी प्रकार ऋग्वेद का एक उपवेद भी है, ठीक है, उपवेद भी जिसको आयुर्वेद बोला जाता है। आज का जो आयुर्वेद है, ऋग्वेद और अथर्ववेद का मिश्रण है आज का आयुर्वेद। लेकिन एक्चुअल में जो आयुर्वेद निकला हुआ है, वह प्रारंभ में महर्षि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम आयुर्वेद की रचना की थी। महर्षि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम। उसके बाद जो है, आगे-आगे ऋषियों ने जैसे-जैसे आगे बढ़े तो धीरे-धीरे उसमें और बढ़ते गए। तो सुश्रुत आए, चरक आए, फिर अलग-अलग ऋषियों ने फिर उसको आगे संश्लेषित किया और उस ज्ञान को आगे बढ़ाया था। तो ऋग्वेद का जो है, यहां पर उपवेद आयुर्वेद है।
यजुर्वेद का जो है, उपवेद है धनुर्वेद है, जो आज गायब हो चुका है। यह हमारे पास नहीं है, बिल्कुल भी नहीं है यह। अगर यह विद्या होती तो विभिन्न प्रकार के जो महाभारत में अस्त्र-शस्त्र का उल्लेख होता है, हमारे पास वो हमें मिलते। वो कैसे बनाए जाते हैं, वो हमें मिलते। यह धनुर्वेद आज टोटली हमारे पास नहीं है, गायब है। बस खाली उल्लेख मिलता है इस प्रकार का एक उपवेद। हमारे पास सामवेद गंधर्व वेद, यह भी हमारे पास जो है, जितना भी है उतना बहुत ही मतलब नगण्य स्थिति में है, एकदम कम है, बहुत कम अध्याय के साथ अगर मिलते हैं। उसके बाद अथर्ववेद का जो है, ब्रह्म वेद, शिल्प वेद, यह भी बिल्कुल ना के बराबर ही हमारे पास उपलब्ध है। मान लीजिए तीनों जो है, अभी हमारे पास उपलब्धि ही नहीं है, गायब हो गया। समय-समय पर अंग्रेज के द्वारा भी कुछ ले लिए गए। उसके बाद हमारे जो बड़े-बड़े जो विश्वविद्यालय थे, उनको जला दिया गया। तक्षशिला विश्वविद्यालय था, नालंदा था। इस प्रकार के विश्वविद्यालय को अलग-अलग आक्रमणकारियों ने आकर के जला डाला। उस कारण से यह गायब हो गया। मेरे को लगता है कि धनुर्वेद जो वेद है ना, यह महाभारत के पश्चात ही गायब हो गया। महाभारत का युद्ध इतना भीषण था, तब से यह उपलब्ध ही नहीं है। क्योंकि इसी वेद के द्वारा अर्जुन ने विभिन्न प्रकार के अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था। यजुर्वेद से ही यह संश्लेषित है। तो सोचिए, यह सब उपवेद जो बने हैं, यह सब वेदों के ज्ञान को संश्लेषित करके उसको और आगे बढ़ा करके उन्होंने ऋषियों ने यह रचा था। तो कितना पुरुषार्थ ऋषियों ने किया था वेदों पर। वो हमें डिलीवर करके गए, आने वाली पीढ़ी को डिलीवर करके गए। लेकिन हम आज वेदों के ज्ञान से अनभिज्ञ हैं। हम जानने का प्रयास ही नहीं करते वेदों में क्या है। हम बस वही मान लेते हैं लोग जो बोल देते हैं, वेदों में ऐसा है, वेदों ने भेदभाव किया, वेदों ने वो किया है। ईश्वर का ज्ञान है वो, कभी वो भेदभाव नहीं कर सकते। अगर वो भेदभाव कर रहे तो वो ईश्वर का ज्ञान नहीं है, संभव नहीं है।
अब देखते हैं कल्प सूत्र ग्रंथ। जो कल्प हमने देखा था वेदांग, उसमें कुछ जो है, उसको सूत्र ग्रंथ भी बोला जाता है या फिर कल्प ग्रंथ भी बोला जाता है। देखिए उसमें बहुत सारे सूत्र ग्रंथ भी रखे गए हैं कल्प के अंदर। पहला जो है, श्रौत सूत्र है। श्रौत सूत्र में क्या है? वैदिक कर्मकांडों का, यज्ञों की प्रक्रियाओं का यहां पर वर्णन है। क्योंकि यज्ञ जो है, यज्ञ जो है, बहुत ही महत्त्वपूर्ण है हमारे समाज के लिए, हमारे लिए, हमारे स्वास्थ्य के लिए, पर्यावरण की रक्षा के लिए। वो क्यों है? जो यज्ञ का एक सेपरेट वीडियो आएगा, उसमें हम उसको बताएंगे। हमारे ऋषि-मुनि कोई भी कर्मकांड करते थे तो सबसे पहले यज्ञ किया करते थे। कोई भी शुभ कर्म करने से पहले यज्ञ क्यों किया करते? यज्ञ इतना शुभ क्यों है? श्री कृष्ण भी भगवद्गीता में बोलते हैं, यज्ञ, दान और तप, ये तीनों त्यागने योग्य कर्म नहीं हैं। इसको आप त्याग नहीं सकते, किसी भी परिस्थिति में नहीं, मनुष्य को त्यागने योग्य नहीं है। आज हम करते नहीं हैं यज्ञ, दान और तप। तप का अर्थ है कि अपने शरीर को अनुशासित रखना। तप का अर्थ है सर्दी हो, गर्मी हो, धूप हो, हर परिस्थिति में जो मनुष्य को करना उचित है, उसको करना, पुरुषार्थ करना, परिश्रम करना, नियमों के अनुसार चलना, उसको बोला जाता है तप। इसलिए यज्ञ, दान और तप, ये तीनों त्यागने योग्य नहीं हैं। हमने तीनों को त्याग दिया। हमने न श्री कृष्ण का सुना, न ऋषि-मुनि का सुना, न वेदों का सुना। हमने अपने मन से कुछ भी बना लिया और अपने अनुसार करते चले जा रहे हैं और हम दुखी हैं। फिर हम प्रश्न करते हैं, हम दुखी क्यों हैं? हमारे जीवन में इतनी समस्याएँ क्यों हैं? हमने तो अपने मूल को छोड़ दिया, हमने अपने शास्त्र को छोड़ दिया, महान ज्ञान को हमने छोड़ दिया। अज्ञानता में हैं, उसका आचरण कर रहे हैं तो उसका परिणाम हमें दुख स्वरूप भोगना भी पड़ रहा है।
तो देखिए सबसे पहले श्रौत सूत्र बने। श्रौत सूत्र में देखिए यज्ञ के प्रक्रियाओं का वर्णन है, कैसे करना है, किस प्रकार से करना, उसके नियमों का वर्णन है। फिर गृह सूत्र। गृह शब्द से ही समझ में आ रहा है कि गृह कार्य में जो भी हमें ध्यान में रखने हैं, उसके कर्मकांड क्या हैं, क्या व्यवहार रहेगा, क्या आचार रहना है, क्या हमें देखना है, किन नियमों को फॉलो करना है, ये सब जो है गृहसूत्र में परिवार से रिलेटेड है, संबंधित है, समाज से रिलेटेड है ये। धर्म सूत्र में क्या है? धर्म एवं सामाजिक नियमों, कर्तव्य, अधिकारों का वर्णन इसमें है। शुल्ब सूत्र में क्या है? शुल्ब शब्द का अर्थ होता है टेप, मतलब जिसे नापने की कोई वस्तु, रस्सी जिससे नापा जाए। तो इसमें जो है, यज्ञ वेदिका को कैसे बनाना है, उसका निर्माण करना, बहुत सारे और भी जैसे बीजगणित वगैरह भी इसमें है, उसका उल्लेख है। उसके बाद त्रिज्या निकालना, व्यास निकालना, डायमीटर निकालने की विधि, कैसे क्या करना है, उसका नाप का इसमें बताया। किसी भी वस्तु को कैसे उसका नाप लेना है। इस प्रकार से कल्प जो है, सूत्र बने, कल्प ग्रंथ बने।
अब देखिए अरण्यक ग्रंथ। अरण्य शब्द का अर्थ होता है वन। यह जो ग्रंथ है अरण्यक ग्रंथ, यह वेदों के ऊपर बेस्ड है। वेदों से अलग-अलग अरण्यक ग्रंथ बने जो कि आज उतने महत्त्वपूर्ण नहीं क्योंकि इनका स्थान उपनिषदों ने लिया। उपनिषदों में वही है जो अरण्यकों में है। तो इसका जो है, बहुत ही नगण्य स्थान है अभी आज के समय में। क्योंकि ये वानप्रस्थ आश्रम में जब ऋषि जाते थे तो ग्रंथ की रचना करते थे। ब्राह्मण ग्रंथ से संबंधित अरण्यकों की रचना वनों में हुई। ब्राह्मण ग्रंथों के समान यह भी सरल गद्य में ही लिखे गए हैं। इनका संबंध वानप्रस्थ आश्रम से था।
अब देख लेते हैं महाकाव्य। हम वैदिक साहित्य का देख रहे हैं, वैदिक साहित्य के बारे में पढ़ रहे हैं। तो वैदिक काल तक जो भी वेदों के अनुसार जहां तक चल रहा था, उसको वैदिक साहित्य के अंतर्गत रखेंगे। जो महाकाव्य है, महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित है। वैसे तो रामायण के बहुत सारे हमारे पास राइटर मिलते हैं, लेकिन महर्षि वाल्मीकि द्वारा जो रामायण है, वही सबसे प्रामाणिक रामायण है। क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे। तो महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचा गया रामायण भी वैदिक साहित्य का एक बहुत बड़ा अंग है। वेदों को अगर समझना है तो वाल्मीकि रामायण को भी समझना पड़ेगा। उस समय के समाज को भी समझना पड़ेगा। उसको समझेंगे तो वेदों के बारे में महात्म्य को हमको पता चल जाता है। क्योंकि इस समय का जो समाज था, उत्कृष्ट समाज था, इसलिए हम रामराज्य की बात करते हैं। राम जी क्या था? महाभारत का समाज जो है, महर्षि वाल्मीकि द्वारा जो है, महर्षि व्यास द्वारा जो है, महाभारत की रचना की गई थी। एक्चुअली ये उन्होंने रचा नहीं था, ये उन्होंने अपने शिष्य को गाथा के अनुसार, कहानी के अनुसार सुनाया था। उनके शिष्य द्वारा बाद में जो है, महाभारत ग्रंथ की रचना की गई है। महाभारत जो आज ग्रंथ हमारे पास है, उसमें लगभग एक लाख के ऊपर, डेढ़ लाख के आसपास श्लोक आपको मिलेंगे। लेकिन मूल जो महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत था, उन्होंने सुनाया था, वो मात्र 4000 थे उसके श्लोक। फिर 8000 हुए, फिर 25000 हुए, ऐसे भी हमें इतिहास के साक्ष्य मिलते हैं। महाभारत ग्रंथ के साथ हमारे जो है, जितने भी ग्रंथ हैं, उसके साथ समय-समय पर मिलावट हुआ है। उसके बारे में भी जानते हैं। भगवद्गीता देखिए, अलग से भगवद्गीता कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं है। यह महाभारत का ही एक अंग है। क्योंकि भगवद्गीता जो है, श्री कृष्ण का ज्ञान है। युद्ध क्षेत्र में श्री कृष्ण को दिए गए जो भी प्रवचन हैं, उनके जो उपदेश हैं, उनका संग्रह इसमें है। तो हमने क्या? बाद में जब महाभारत का युद्ध हो गया, उसके बाद जब एक समय आया जिसमें हमने क्या किया? उन उपदेशों को अलग करके ग्रंथ की रचना कर दी। आज जो टेक्स्ट फॉर्म में हमारे पास पुस्तकीय फॉर्म में है, लेकिन वह महाभारत का ही खंड है, वह महाभारत ही है, वह अलग से कोई ग्रंथ ऐसा नहीं है। हमने बस निकाल कर के उसको अलग किया है। यह भी महर्षि व्यास द्वारा ही रचित है, क्योंकि महर्षि व्यास ने ही जो ही लिखा है, वह महर्षि व्यास ने उनको उपदेश किया था।
देखिए, शास्त्रों को प्रमाणित करने का क्रम। अब यहां पर देखिए, मैंने एक स्थान दिया है वेदों को, ठीक। क्योंकि वेद जो है, स्वतः प्रमाण हैं, इसको किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। ईश्वर का ज्ञान है। और अन्य जितने भी शास्त्र हैं, मनुष्य द्वारा रचित, वो परतः प्रमाण, बाद में प्रमाणित होते हैं। पहला प्रमाण जो है, वेद होगा। मैंने एक वीडियो में कहा था पिछले वीडियो में कि सुप्रीम कोर्ट की बात की। किसी भी विवाद को हम ले जाते हैं, पहले जिला न्यायालय में जाते हैं। जिला न्यायालय से संतुष्ट नहीं हो रहे तो हम जाते हैं फिर हाई कोर्ट में। हाई कोर्ट से भी नहीं हैं तो वहां से फिर सुप्रीम कोर्ट में जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं हैं तो वो हमें मानना पड़ता है, ठीक है। और कोई ऑप्शन हमारे पास नहीं है, ऊपर और कुछ नहीं है। तो उसी प्रकार से हम सामाजिक विवादों का, समस्याओं का समाधान इस व्यवस्था से करते हैं। उसी प्रकार धर्म और अधर्म की जिज्ञासा का अंत कौन करेगा? अंतिम निर्णय वेद का होगा। वेद जैसा कहेंगे, एज इट इज आपको ऐसा मानना पड़ेगा। वो स्वतः प्रमाण हैं। हाँ, वेद मंत्रों के अर्थ हम अलग कर सकते हैं, उसको अनर्थ कर सकते हैं, गलत समझ सकते हैं। लेकिन वेदों में कहीं भेदभाव आपको नहीं मिलेगा, कहीं भी नहीं मिलेगा वेद में भेदभाव। वेदों में कोई ऐसी सृष्टि विरोधी बातें कहीं भी नहीं मिलेंगी। हम उसको अर्थ ग्रहण अलग से कर सकते हैं। क्योंकि वेदों का जो विज्ञान है, वेदों का जो संस्कृत है, उसको समझने के लिए अलग विज्ञ की आवश्यकता होती है। तो वेदों पर ही बेस्ड ये सभी ग्रंथ हैं, उपनिषद हैं, ब्राह्मण ग्रंथ हैं, स्मृति ग्रंथ हैं, दर्शन हैं, महाकाव्य हैं। मैंने पहले ही कहा है कि हम अल्पज्ञ हैं और ईश्वर जो है, सर्वज्ञ है। उसने सभी ज्ञान को हमें दे कर के रखे हैं। हमने क्या किया है? वेदों को जब पढ़ा, वेदों को जब जाना तो उससे अलग-अलग प्रकार के हमने ग्रंथों की रचना कर ली, ठीक है। और हमारे शास्त्रों में समय-समय पर मिलावट हुए हैं।
देखिए, जो हमारे ऋषि-मुनि थे ना, वो कोई साधारण पुरुष नहीं थे आपके और हमारी तरह। वो आप्त पुरुष थे, ठीक है। वो जो भी कहते थे, सोच समझ करके कहते थे। वो जो भी बोलेंगे, वो सोच समझ करके बोलेंगे। कोई साधारण पुरुष की बात मैं यहां नहीं कर रहा हूँ। जैसे श्री कृष्ण की बात मैं अगर करूंगा, वो जो भी बोलेंगे, सोच समझ करके बोलेंगे, अन्यथा वो नहीं बोलेंगे। ऐसे विज्ञ पुरुष थे ये लोग। तो जब वेदों का ज्ञान उन्होंने समाज को डिलीवर करना प्रारंभ किया, बताना प्रारंभ किया तो उन्होंने समाज को जो भी ज्ञान डिलीवर किया तो उन्होंने अलग-अलग ग्रंथ उन्होंने रचना प्रारंभ किया, उनको सहेजना प्रारंभ किया ताकि आने वाले पीढ़ी को जो है, उसका जो है, दिया जा सके, डिलीवर किया जा सके। ये वाले सभी जो ग्रंथ हैं, पहले जो है, सभी मौखिक रूप से सुनाए जाते थे, बताए जाते थे। बाद में हमने टेक्स्ट फॉर्म में उसको जो है, जब मनुष्य जो है, ज्ञान धारण करने, बुद्धि तीक्ष्ण से जो है, हम मंद होने लगी तब हमने उसको जो है, पुस्तकीय फॉर्म में उसको बना लिया। आज के समय जैसा नहीं था कुछ पहले। मौखिक गुरु-शिष्य परंपरा के द्वारा ये सब बताया जाता था, सुनाया जाता था। बाद में जब हम इसको रिकॉर्ड करके एक पुस्तकीय फॉर्म में दे दिया, हम समझते हैं कि वेद ऐसे हैं, पुस्तकीय फॉर्म में प्रेजेंट हुआ था। मनुस्मृति ऐसा है, उपनिषद ऐसा है, दर्शन ऐसा है। क्योंकि उस समय जब डिलीवर हो रहा था, महाभारत काल तक ये ज्ञान का प्रचार-प्रसार पूरा भारत में हो रहा था। ज्ञान-विज्ञान में जो है, हम समृद्ध थे। महाभारत काल के पश्चात जो है, जो पतन हुआ हमारा, उसके बारे में पूरा जो है, खंड के अनुसार चर्चा करेंगे। पतन हुआ हमारा, उसमें एक समय आया जहां पर जो है, हमारे शास्त्र में मिलावट करना शुरू हो गया। क्योंकि कुछ ऐसे षड्यंत्रकारी समाज में स्थापित हो गए जिनको वो शास्त्र सम्मत उनके मतों को प्रूफ करना था। हम जो बोल रहे हैं, वो शास्त्र सम्मत है। तो उन्होंने अलग-अलग ग्रंथों में जो समाज में प्रचलित है, जब तब जो है, उस समय तक जो है, स्क्रिप्ट आ चुके थे, स्क्रिप्ट आकर लिखना प्रारंभ हो गया था। गुरु-शिष्य परंपरा के द्वारा जो है, श्रुति के अनुसार, क्योंकि वेदों को श्रुति भी कहा जाता है, सुनाया जाता था। वेद के ज्ञान को सुना-सुना करके, रटा-रटा करके वेदों के मंत्र को यहां रखा जाता था, शास्त्र को यहां रखा जाता था। तो जब यह जो परंपरा समाप्त हुई, तब एक समय आया जब स्क्रिप्ट लिखना प्रारंभ हुआ। लेकिन वो तब कोई कॉपीराइट वाला सिस्टम नहीं था। जो था, जिसके प्रभाव में जो समाज था, वह उस हिसाब से ग्रंथों में मिलावट करते चले गए। उसी प्रकार से जब पौराणिक काल आया, उसके बाद मुस्लिमों का काल आया, अंग्रेजों का काल आया, उस समय बहुत बड़े लेवल पर मिलावट हुआ है। इसलिए जब भी विवाद की स्थिति उत्पन्न हो किसी भी ग्रंथ में, क्योंकि ऋषि-मुनियों ने कभी भी वेद विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखा। अगर वह लिखे हैं तो अप्रामाणिक हो जाएंगे, 100%। वो इतने विज्ञ थे। ऋषि का अर्थ ही होता है वैज्ञानिक। वो सोच-समझ के कोई बात करते हैं। इसलिए जब भी कोई मिलावट मिले, कोई भी ऐसे श्लोक मिले जिससे ऐसा लगता है कि विवाद की स्थिति है, जैसे मनुस्मृति कुछ और बोल रहा है, ब्राह्मण ग्रंथ कुछ और बोल रहे हैं, उपनिषद कुछ और बोल रहा है तो दर्शन शास्त्र कुछ और बोल रहा है। इस विवाद का सलूशन कौन करेगा? वेद करेगा। वेद क्या बोल रहे हैं? वेद अंतिम प्रमाण। किसी भी विवाद के निपटारे के लिए धर्म-अधर्म की जिज्ञासा का अंत केवल और केवल और केवल वेद के पास है और किसी के पास नहीं है। क्योंकि यह मूल ग्रंथ है। इसी का रेफरेंस देकर के सभी ग्रंथ रचे गए। भगवद्गीता में भी 40 शब्द जो है, वेद के हैं। 40 बार वेद शब्द का उपयोग वेद के द्वारा इस प्रकार से वेदों में ऐसा कहा गया, वेदों में ऐसा कहा। आज तक ऐसे रिकॉर्ड हमारे पास हैं। जितने भी ग्रंथ रचे गए, वेदों के आधार पर रचे गए। मूल ज्ञान यहां है। हाँ, समझने में गलती कर सकते हैं। और शास्त्र में इस प्रकार से मिलावट हुआ है कि बहुत सारे जो है, ग्रंथ में आपको एक ही श्लोक में दो अलग-अलग तरह की बातें आपको मिलेंगी।
तो देखिए, वेदों का जो है, ज्ञान स्वतः प्रमाण है, अपने आप प्रमाणित है क्योंकि ईश्वर का ज्ञान है। अन्य आदि शास्त्र जो है, मनुष्य द्वारा रचित हैं, इसलिए वो परतः प्रमाण, बाद में प्रमाणित होते हैं। इसलिए कभी भी ऐसा मत बोलना कि आप देखो, आप इस ग्रंथ में ऐसा लिखा है। वेद क्या कहते हैं इस विषय पर? इस विषय पर वेद क्या कहते हैं? वेद अगर कह रहे हैं, हाँ, अगर मैं भी कुछ लिखूं, आप भी कुछ लिखें जो वेद सम्मत, वेदों के अनुसार है, सृष्टि के अनुसार है, विज्ञान के अनुसार है, हाँ, वो मान्य है। अगर वो वेदों के विरुद्ध है तो अमान्य हो जाता है। मैंने यह मंत्र आपको दिया है, आज से इसको ध्यान में रखिएगा। इसका उपयोग आने वाले समय में होने वाला है। शास्त्र में मिलावट और प्रक्षेप को कैसे पहचानें? देखिए, शास्त्र में प्रक्षेप या मिलावट को कैसे पहचानें, देखते हैं। परस्पर विरोधी बातें नहीं होनी चाहिए। मतलब एक श्लोक में बोला जा रहा है कुछ और, दूसरे ही श्लोक में कुछ और विपरीत बातें। ये नहीं होनी चाहिए। ये कोई ऋषि नहीं करेगा, साधारण मनुष्य तक नहीं करेगा तो ऋषि तो कर ही नहीं सकते। ऋषि कौन थे? वो विज्ञ, वो बुद्धि के चरम स्तर पर थे। वो ऐसे लोग थे जो तीक्ष्ण बुद्धि रखते थे, सूक्ष्मदर्शी हैं वो। तो ऐसी बात तो कोई ऋषि नहीं कर सकता। ऐसी बात साधारण मनुष्य तक नहीं कर सकता, ऋषि की बात अलग है। जैसे अगर मनुस्मृति की बात करें कि उसमें आपको श्लोक, कई श्लोक में मिल जाएंगे, मांस भक्षण जो है, महापाप है। लेकिन और एक श्लोक में मिल जाएगा कि मांस खाने चाहिए। आपको मिलेगा कि शूद्र जो है, वो भी जो है, चार वर्णों के अंतर्गत आते हैं, एक श्लोक में मिलेगा। और एक श्लोक में मिलेगा, शूद्र सबसे नीचे है, उसको मारो, उसको दबाओ, उसको कुचलो, ऐसे मिलेंगे। एक श्लोक में मिलेगा, नारी की पूजा करनी चाहिए, नारी को विद्या सबसे पहले देनी चाहिए, पुरुषों से नारी को शिक्षित सबसे पहले करनी चाहिए। और एक श्लोक में मिलेगा, नारी को दबाना चाहिए, नारी को कोई शिक्षा-दीक्षा नहीं देनी चाहिए। तो ये जो परस्पर विरोधी बातें हैं, एक ही ग्रंथ में नहीं होनी चाहिए। क्योंकि एक व्यक्ति का एक ही विचार होगा, या तो विरोध करेगा या तो उसके पक्ष में होगा। तो परस्पर विरोधी जहाँ पर भी श्लोक मिल जाए तो समझ लेना, यहाँ पर कोई न कोई ऐसा कांड हुआ है जिससे हमारे शास्त्र को बदनाम करने का प्रयास किया गया है। तो इस प्रकार की बातें जहाँ पर भी मिलें, एक दूसरे को काट दें, इस श्लोक में यहाँ पर कुछ और, वहाँ पर कुछ और, जस्ट अपोजिट बातें। इसको बोलते हैं परस्पर विरोधी बातें मिलना। ऐसी बातें अगर मिल जाए कहीं पर तो वो जो नेगेटिव बातें की जा रही हैं, वो टोटली बाद में मिलाए गए हैं। प्रसंग विरोध नहीं होना चाहिए। प्रसंग विरोध मतलब जैसे एक टॉपिक चल रहा है, उस विषय को छोड़ कर के किसी और विषय में नहीं जाना चाहिए। उस टॉपिक को जब तक कंप्लीट न हो जाए। आप भगवद्गीता में देखना, किसी एक विषय में चल रहा है, विषय को चलते-चलते देखना, उसको छोड़कर किसी और विषय में चले जाते हैं। मनुस्मृति पढ़ोगे, उस विषय को बिना कंप्लीट किए किसी और विषय को प्रारंभ कर देते हैं। कंप्लीट नहीं हुआ। अब देखना, दो-तीन पेज पलटना, उसके बाद आप देखना, वो जो विषय है, वो विषय वहाँ से रिलेट कर रहे हैं। अब वहाँ से वो श्लोक जो है, उसको हटा कर के बीच से जो प्रक्षिप्त है, उसको हटा कर के उसको मिला देंगे तो लगेगा कि इसके बाद जो है, यही श्लोक बोला गया होगा। तो प्रसंग विरोध नहीं होना चाहिए। मतलब जिस टॉपिक को, जिस विषय पर बात हो रही है, उस विषय को जब तक समाप्त न हो जाए, तब तक नया विषय प्रारंभ नहीं होना। वेदों के विरुद्ध कोई भी बात नहीं। सबसे बड़ा प्रमाण है, वेदों के विरुद्ध कोई बातें न हों। महर्षि मनु ने जब भी मनुस्मृति उन्होंने अपने शिष्य को डिलीवर किया था तो सबसे पहला मंत्र उन्होंने दिया था कि "वेदो अखिलो धर्म मूलम्"। वेद ही सृष्टि का मूल है। धर्म-अधर्म की जिज्ञासा का अंत केवल वेदों से करना। तो जो भी मैं बता रहा हूँ, यह पूरा वेदों के आधार पर है, वेद सम्मत है। कुछ भी अगर वेद विरोधी मिले, वहीं पर नकार देना उसको, ठीक है। तो सबसे बड़ा जो प्रमाण यहाँ पर वेदों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। तो हम वेदों को जानते ही नहीं हैं ना, वेद हैं क्या? वेद कहना क्या चाह रहे हैं? जब हम वेदों को जानेंगे ही नहीं तो फिर हम कैसे समझ पाएंगे कि वेदों ने ये कहा? आज वेदों की शिक्षा-दीक्षा होती नहीं है कहीं पर भी, बताया नहीं जाता। कोई कुछ बता देता है, हम समझ लेते हैं वेद ही है। हम इंटरनेट पर जाते हैं, सर्च करते हैं ऋग्वेद और एक पीडीएफ मिल जाता है, हम पढ़ना शुरू कर देते हैं। हम समझते हैं कि यही वेद है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोग आए, आपके धर्म को, सनातन को नष्ट करने का प्रयास किया, शरारत करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने-अपने मनगढ़ंत कहानियाँ लिखीं, मनगढ़ंत मिलावट की अपने-अपने शास्त्र में ताकि सनातन को नीचे दबाया जा सके और अपने-अपने जो उनके मान्यताएँ हैं, उनको श्रेष्ठ दिखाया जा सके, उनकी जो मान्यताएँ उनको समाज में स्थापित किया जा सके। षड्यंत्रकारी आते रहेंगे, जाते रहेंगे, आते रहेंगे, जाते रहेंगे। लेकिन श्रेष्ठ पुरुष का कर्तव्य यह है, उनको पहचानें, पहचान करके उनको फिर से हटाएँ। तो ये जो है, तीन मूल मंत्र आप याद रखना। पहला, परस्पर विरोधी बातें नहीं होनी चाहिए। दूसरा, प्रसंग विरोध नहीं होना चाहिए। जो विषय को शुरू किया गया है, वो कंप्लीट होना चाहिए तभी नया विषय शुरू होना। और वो कुछ भी बातें वेदों के विरुद्ध नहीं होतीं।
अब हम शुरू करेंगे वेदों को जानना। अब जानते हैं पुराण। देखिए, पुराण जो है, वैदिक साहित्य में नहीं आते, टोटली नहीं आते। ये टोटली बाद में रचना है, अभी दो-तीन हजार वर्ष पहले की रचना है ये। वैदिक शास्त्र में, वैदिक साहित्य में इनका कोई स्थान नहीं है, अमान्य है टोटली, ठीक है। क्योंकि ये टोटली वेदों के विरुद्ध बात करते हैं। वेदों में जो है, ये इसके विरुद्ध है, उल्टा-पुल्टा जो भी मनगढ़ंत बात क्यों है? क्योंकि सृष्टि क्रम के विरुद्ध है, विज्ञान के विरुद्ध है। सृष्टि जैसा है, जिसका उल्टा बात करते हैं। इसलिए इनको वैदिक साहित्य में नहीं रखा जाता। ये टोटली अमान्य है और समाज इसी के अनुसार आज चल रहा है। पुराण शब्द का शाब्दिक अर्थ है प्राचीन आख्यान, प्राचीन कथा। ये कथा शब्द से समझ में आ रहा है, कहानी। बड़े-बड़े जो ईश्वरीय ग्रंथ, उसमें कहानियाँ नहीं होतीं। ईश्वर लीलाएँ नहीं करते। जब हम वेदों को जानेंगे तब उसको अच्छे से समझ पाएंगे। हमने प्रारंभ किया है। पुरा शब्द का अर्थ है अनागत एवं अतीत। अन शब्द का अर्थ होता है कहना और बतलाना। अतीत की जो भी कहानियाँ हुई हैं, स्त्रियाँ हुई हैं, उसके बारे में पुराण बोलते हैं कि हमारे पास रिकॉर्ड है, हमको पता है तो हमने उसको लिखा हुआ है। लेकिन महाभारत जो है, महाभारत काल का, द्वापर युग का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। अगर महाभारत की में श्री कृष्ण के कैरेक्टर के बारे में जो पुराणों में वर्णन है, वर्णन नहीं है तो इनको कैसे पता चला? महाभारत के इतने वर्ष पश्चात। महाभारत का खंड जो है, आज से मान लो 5000 वर्ष पहले है। इनकी रचना हुई है आज से 2500 वर्ष पहले। तो जो 2500 वर्ष बाद, महाभारत काल के 2500 वर्ष बाद अचानक इनको कहाँ से प्राप्त हो गया कि इतिहास में कि श्री कृष्ण के बारे में ये-ये चीज, इतनी कहानियाँ जो महाभारत में भी उल्लेख नहीं है, जो महर्षि व्यास ने लिखीं। महर्षि व्यास ने अगर कुछ नहीं लिखा है उसके बारे में, उन्होंने इतनी कहानियाँ कहाँ से ला दिया? ये बहुत बड़ा प्रश्न है। जब पुराणों का खंड आएगा, जब इसका समय आएगा, उसमें हम विस्तृत वर्णन करेंगे। तो पुराणों में देखिए, विष्णु, शिव, दुर्गा, पार्वती जैसे देवताओं के बारे में प्रारंभिक धार्मिक कहानियाँ बताई गई हैं। कुल 18 पुराण हैं हमारे पास आज के समय में। ये सब कुछ पुराण हैं। पुराण वैदिक शास्त्र नहीं हैं इनके। इनको बहुत बाद में रचा गया है महर्षि व्यास का नाम लेकर के। क्योंकि इसको प्रामाणिक सिद्ध करना था, इसलिए महर्षि व्यास का नाम लेकर के उन्होंने कह दिया कि ये महर्षि व्यास द्वारा पुराणों की रचना लगभग आज से 1500 से 2000 वर्ष पहले की गई है, जो अमान्य है टोटली। वैदिक शास्त्र में इनका कोई भी स्थान नहीं है। सनातन वैदिक संस्कृति में पुराणों की कोई भी मान्यता नहीं है। क्योंकि इसमें अनेक बुद्धि, तर्क, सृष्टि विरुद्ध, वेद और विरुद्ध बातें कही गई हैं जो अप्रासंगिक हैं। बस अभी इतना ही जान लीजिए। उसके बाद जब इसका चैप्टर आएगा, उसको हम डिटेल में पूरे तथ्य-प्रमाण के साथ अच्छे से चर्चा करेंगे।
अब देखिए, जब वेद का ज्ञान देते हैं तो किस फॉर्म में देते हैं? क्योंकि जब आदि जो सृष्टि थी, उस समय कोई ऐसा तो नहीं था कि उसको सिखाएँ तो वह सीख जाए। क्योंकि भाषा का भी ज्ञान नहीं था उस समय आदि सृष्टि में जब मनुष्य की पहली पीढ़ी थी, भाषा का भी ज्ञान नहीं था। तो आदि जो सृष्टि है, उसमें मनुष्य की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, कैसे हुई, यह हम नेक्स्ट वीडियो में देखेंगे। और फिर हम जानेंगे कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इसकी उत्पत्ति किस प्रकार से हुई। वेदों का ज्ञान किस प्रकार से प्रथम जो है, मनुष्य को दिया गया था, प्रथम पीढ़ी को कैसे डिलीवर किया गया था, वह क्या प्रोसेस था, उसको जानने का प्रयास करेंगे। तो आज के वीडियो में इतना ही। आज हमने वैदिक साहित्य के बारे में चर्चा की। नेक्स्ट वीडियो में फिर आगे के जो भी विषय हैं, उनको हम लेंगे। आपकी कोई भी अगर प्रश्न है, पूछ सकते हैं। किसी के कोई प्रश्न है, कोई डाउट है, कोई इससे रिलेटेड आप हैंड रेज़ करके क्वेश्चन पूछ सकते हैं, हाथ उठा करके क्वेश्चन पूछ सकते हैं। नहीं तो मैं सेशन एंड कर सकता हूँ अभी।
जी शिक्षा जी। जी प्रणाम सभी को। सर मेरा यह प्रश्न था कि आज हम, हम वेद जो हम पढ़ते हैं, वो भी हम बुक की फॉर्म में पढ़ते हैं, कि लिखे हुए पढ़ते हैं। तो उसमें नहीं मिलावट है, हम ये कैसे हमें पता चलेगा?
हाँ, बहुत अच्छा प्रश्न है। नेक्स्ट वीडियो में, कल के वीडियो में ये भी क्लियर हो जाएगा। वेदों में मिलावट संभव क्यों नहीं? अगला वीडियो देखिएगा, अगला क्लास ज्वाइन करिएगा। वेदों में मिलावट संभव क्यों नहीं है और बाकी ग्रंथों में मिलावट कैसे संभव है, वो मैं तथ्य-प्रमाण के साथ कल मैं क्लियर कर दूंगा।
जी रवि जी। सर जी नमस्कार। नमस्कार। मेरा प्रश्न ये है कि पुराणों में बहुत सारे मंत्र हैं, जैसे आपको पता होगा। तो हम मंत्रों के विषय में फिर आपका क्या विचार है जो हम जब मंत्र जाप करते हैं?
देखिए, ये जो बात आप कर रहे हैं ना, आप कुछ क्लास, आठ-दस क्लास होने दीजिए तब ये क्वेश्चन का आंसर आपको स्वतः ही मिल जाएगा, ऑटोमेटिक मिल जाएगा। अभी ना, जो भी जो भी शास्त्रों से, मतलब पुराणों से रिलेटेड जो भी प्रश्न आपके मन में चल रहे होंगे, कुछ क्लास होने दीजिए। अभी प्रारंभिक है, अभी आज पहला ही क्लास है जिसमें हम विषय को ले रहे हैं। तो कुछ क्लास होने दीजिए तो फिर ऑटोमेटिक आपके क्वेश्चन के उत्तर मिल जाएंगे।
जी सर, धन्यवाद। धन्यवाद। अर्चना जी। प्रणाम आचार्य जी। मैं यह पूछना चाहती हूँ कि हमारे जो सबसे विवादित जितने भी हमारे ग्रंथ हैं, जैसे एक मनुस्मृति, रामायण, महाभारत, इन पर हमेशा ही डिबेट होती रहती है। तो उसके बारे में हमें थोड़ा डीप नॉलेज चाहिए। जैसे अभी श्री राम भगवान का मंदिर भी बनाया तो अभी भी लोग बहुत सारे उनकी जो वो है, मानना ही नहीं चाहते कि भई वो वो है भी कि नहीं, वो थे भी कि नहीं। लोग उसको मानते ही नहीं हैं। मतलब हमारे सनातन धर्म में ही नहीं मानते तो बाकी लोगों को तो हम क्या ही समझाएँगे। अब जैसे-जैसे जो सिखों के ग्रंथों में राम जी का उल्लेख है तो वो लोग कहते हैं, हम दशरथ पुत्र राम को मानते ही नहीं। हम तो जो राम का उल्लेख है, वो वो है, उसका मतलब है कि कण-कण में हमारे राम हैं या कुछ और वो मतलब उसकी एक्सप्लेनेशन देते हैं। कहते हैं दशरथ पुत्र राम कुछ है ही नहीं, वो तो कुछ नहीं है, वो तो एक बहुत ही कमजोर इंसान की कहानी दिखाई है। ये सब मतलब वो लोग बोलते हैं क्योंकि हमें ठीक से पता ही नहीं कि ये सिर्फ महाकाव्य है या यह सचमुच सब कुछ है। तो हम लोग उसका एक्सप्लेनेशन नहीं दे पाते।
जी देखिए, कक्षा को आपने ज्वाइन किया है इसी उद्देश्य से कि आप सत्य को जान पाएँ, सत्य है क्या। और आपके प्रमाण, आपकी बात इतना अकाट्य हो, कोई काटे तो काटने के लिए सोचना पड़े आपकी बातों को। इतना ज्ञान तो हमें अर्जित करना है, इतना हमें शास्त्र को जानना है। तो आप एकदम सही जगह पर हैं। और यह जो चीज आपने जो प्रश्न किया है, इसको मैं अगर अभी संक्षेप में बता दूँगा तो मैं आपको सेटिस्फाई नहीं कर पाऊँगा। जैसे-जैसे क्लास आगे बढ़ेंगी, एक-एक चीज तथ्य-प्रमाणों के साथ जब आपके सामने रखी जाएगी, बताई जाएगी तो ऑटोमेटिक देखना आपके सभी प्रश्न के उत्तर मिलने प्रारंभ हो जाएंगे। आप समझ में आ जाएगा क्या है। हम सनातन फिर गर्व करना प्रारंभ कर देंगे। आपके सभी प्रश्नों का उत्तर मिलते चला जाएगा। आठ-दस क्लास कंप्लीट हो जाए तो लगभग 90% क्वेश्चन के आंसर आपके मिल जाएंगे।
जी जी, कंटिन्यू बने रहिएगा और कोई भी क्लास मिस मत करिएगा। हर एक क्लास महत्त्वपूर्ण होने वाला है। अगर आप ऐसा करते हैं कि आज का क्लास मिस कर दिया और उसको बिना देखे हमने नेक्स्ट क्लास देख लिया तो क्या होगा? उसमें आप को-रिलेट नहीं कर पाएँगे इसमें क्या बताया गया था, क्या नहीं। तो फिर समस्याएँ होंगी। इसलिए हर क्लास को अगर आप लाइव क्लास अटेंड नहीं कर पाते, आप रिकॉर्डिंग भी देख सकते हैं। तो रिकॉर्डिंग देखने के बाद ही लाइव क्लास अटेंड करिए तो ज्यादा बेटर होगा।
रिकॉर्डिंग का लिंक कहाँ से मिलेगा आचार्य जी? ग्रुप में मिलेगा। व्हाट्सएप ग्रुप में हम आज का जैसे सुबह का रिकॉर्डिंग आपको मिल जाएगा दोपहर तक। ओके, ठीक है। धन्यवाद। धन्यवाद।
जिनका हो जाए ना, हैंड डाउन कर लीजिएगा। शैलेश जी। हाँ सर, नमस्कार सभी को। प्रणाम सर। नमस्कार। नम। सर, मेरा सजेशन था, एक्चुअली प्रश्न नहीं है। मेरा यह कहना था कि यह जो रिकॉर्डिंग हम भेज रहे हैं, यह कितने दिन तक अवेलेबल रहेगी? मतलब डाउनलोड करके हम लोग रख सकते हैं क्या?
हाँ, हाँ, हाँ, डाउनलोड कर सकते हैं। बट हाँ, परंतु अभी मैं कोशिश कर रहा था कल आपने जो रिकॉर्डिंग दी है तो यदि ये जीमेल पे भेज देंगे तो हम लोग फिर डाउनलोड आसानी से कर सकेंगे। देखिए, जीमेल में अभी मोबाइल में डाउनलोड नहीं हो पा रही। मोबाइल में डाउनलोड होगा, आपको थर्ड पार्टी कोई लिंक यूज़ करना पड़ेगा उसके लिए। थर्ड पार्टी, थर्ड पार्टी कोई सॉफ्टवेयर यूज़ करना पड़ेगा जिस वेबसाइट में जा करके उसका डाउनलोड का लिंक आपको वहाँ मिल जाता है। जैसे ट्राई कर, बहुत सारे आपको वेबसाइट मिल जाएँगे जहाँ पर ना उस वीडियो का यूआरएल कॉपी करेंगे, वहाँ पेस्ट कर देंगे उनके वेबसाइट में। और दूसरा सर, स्लाइड शो कर रहे हैं, ये स्लाइड का पीडीएफ भी भेजने वाले हैं क्या आप लोग? नहीं, नहीं, इसका पीडीएफ नहीं मिलेगा। आप भले रिपीट कर सकते हैं क्लासेस, उसमें आपको डिटेल में मिल जाएगा। राइट, राइट, राइट। थैंक यू।
बाकी हमने ई-बुक दिया हुआ है, उसमें एक रेफरेंस भी मिलेगा आपको। ई-बुक में भी हमने विषय को संक्षिप्त में बताया हुआ है। ई-बुक सबको मिल गया होगा। अगर नहीं मिला होगा, बता सकते हैं। नहीं, पुस्तक मिल गई है सर। उसको भी पढ़ें, उससे भी बहुत सारी चीजें क्लियर होंगी। जरूरी। राइट सर। थैंक यू।
रवि जी। रवि वट। जी सर, सॉरी सर, हो गया। अच्छा, अच्छा। तो हैंड आप डाउन कर लीजिए। जी जी जी। राइटर। हेमाद्री। सभी को नमस्ते। जय श्री राम। सर, मेरा क्वेश्चन ये था कि आपने जैसे कहा कि उपनिषद बहुत जरूरी है पढ़ना आज के लिए। तो उपनिषद को आप पढ़ाएँगे ना डिटेल में जैसे मैं।
देखिए, एक महीने के अंदर सब कुछ संभव नहीं है। मैं आपको इतना तो रेडी कर दूँगा। आप ये मत सोचिए कि एक महीने में चारों वेद, आप 11 उपनिषद, छह दर्शन पूरा पढ़ लेंगे। हाँ, मैं आपको इतना तो रेडी कर दूँगा कि आप जो है, इतना ज्ञान तो रखिए कि अपने शास्त्रों के बारे में जो आपको सामाजिक जो दुर्व्यवस्था है, उसको उत्तर दे सकें। समझ रहे हैं ना? एक महीने में इतना ही किया जा सकता है। अगर डिटेल में आप लोग इंटरेस्ट रखेंगे तो फिर डिटेल में क्लासेस आगे लगाया जा सकता है। वो आप लोगों के ऊपर है टोटली। आप लोग का डिमांड रहेगा तो किया जा सकता है। लेकिन अभी जो एक महीने के क्लास में मैं आपको इस प्रकार से रेडी करने वाला हूँ कि हर प्रश्न का उत्तर आपके पास होना चाहिए। जो हम दर्शन को भी पढ़ेंगे, पूरा उसका सार निकालेंगे। उसमें हमारी जो भी शिक्षाएँ हैं, उनको ग्रहण करेंगे। उपनिषदों की शिक्षाएँ हैं, उपनिषद में क्या कहा गया है? हर विषय को, विषय मतलब हर टॉपिक को विषय के अनुसार समझेंगे। इसमें से सभी प्रसंग लेंगे लेकिन विषय के अनुसार। उपनिषद के लिए मेरी हार्दिक इच्छा है सर, अगर आगे क्लास बढ़ता है तो आप बताएँगे कंफर्म मुझे।
जी जी, बिल्कुल। देखिए, मैंने जीवन के 10 साल दिए हैं। फिर मैंने थोड़ा बहुत ज्ञान किया है। ये शास्त्र को आप ऐसा मत समझिए कि आपको दो-एक महीना आप पढ़ेंगे तो आप सब जान जाएँगे। हाँ, उनको मैं सार स्वरूप जो मेरी, मेरी जो अभी तक का परिश्रम है, मैं उसको सार स्वरूप आपको बता सकता हूँ। मैं यह बताना इसलिए चाह रहा हूँ कि जो सत्य है, वह छुपाया जा रहा है। लोग जानना भी नहीं चाहते। आप लोग जानना चाहते हैं, ऐसे लोगों तक मैंने पहुँचा और आपको बताने का प्रयास कर रहा हूँ। इसलिए एक-दो वर्ष का ये जो है, परिश्रम नहीं है, ये साध्य नहीं है। इसके लिए सालों लगते हैं। इसलिए 20 साल, 30 साल, 40 साल भी कम पड़ जाते हैं जानने के लिए। तो अगर सबका डिमांड रहेगा कि हमें उपनिषदों को जानना है, वेदों को और डिटेल में जानना है। पहले तो यह क्लास समाप्त हो जाए, आपके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो जानने की। जब तक मैं वेदों में आपका फेथ जनरेट नहीं कर पाऊँगा, वेदों में आपका विश्वास जनरेट नहीं कर पाऊँगा तब तक मुझे सफलता नहीं मिलेगी। तो मेरा काम यही है कि वेदों को सबसे पहले आप इस प्रकार से प्रस्तुत करूँ, इस प्रकार से बताऊँ वेदों का जो सत्य है ताकि आप उसको और भी जानने के इच्छुक हों।
जी बिल्कुल। आगे हम उसके बारे में भी देखेंगे, चर्चा करेंगे अगर सबकी इच्छा रही तो। धन्यवाद। जयंत वर्मा जी, अपने आपको अनम्यूट कर लीजिए। नमस्कार गुरु जी। जी नमस्कार। आपने बताया था सृष्टि जैसी है, वैसा ही ज्ञान होना चाहिए। इस पर थोड़ा और विस्तृत प्रकाश डालेंगे।
सृष्टि जैसा है, वैसा ही ज्ञान इस प्रकार से होना चाहिए जैसे हम मनुष्य हैं, हम शरीर नहीं हैं, हम आत्मा हैं। परंतु बाइबल, कुरान क्या कहता है? वह भी क्लेम करते हैं ना, ईश्वर ग्रंथ है। वह भी क्लेम करता है ईश्वरीय ग्रंथ है। ओल्ड टेस्टामेंट, न्यू टेस्टामेंट भी करता है। क्या ऐसा ही है? क्या हम हैं कौन? किसकी मृत्यु हो रही है? शरीर की हो रही है, आत्मा की हो रही है? एक व्यक्ति सामने, एक व्यक्ति सामने सोया हुआ है और खड़ा हुआ है। उसके भी दो हाथ हैं, दो कान हैं, उसके भी हार्ट है, उसकी भी किडनी है, उसके भी लिवर है, सब कुछ उसके पास है। वो सोया हुआ है, एक खड़ा हुआ है। क्यों? क्या कारण है? कौन है जो उस शरीर को त्याग चुका है? कौन है जो शरीर में है? तो इसलिए वो खड़ा है। समझ रहे हैं ना? सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, भूगोल विज्ञान, एस्ट्रोनॉमी, ये विज्ञान होना चाहिए उस पुस्तक में। जो जैसा है, वैसा होना चाहिए। बाइबल, कुरान में लिखा हुआ है कि ईश्वर जो है, सातवें आसमान में बैठा हुआ है। ऐसा है? सृष्टि विरुद्ध। चौथे आसमान पर बैठा हुआ है पुराण में लिखा हुआ है। ऐसा है? सृष्टि विरुद्ध। पृथ्वी चार डंडों के ऊपर खड़ा हुआ है। ऐसा है? पृथ्वी फ्लैट है उनके ग्रंथों में लिखा है, पृथ्वी फ्लैट है, गोल नहीं है पृथ्वी। पृथ्वी फ्लैट है। कैसे कहती है? हमारे शास्त्र, हमारे शास्त्र कहते हैं गोल। भूगोल शब्द यूज़ हुआ है, गोल है। तो जो सृष्टि जैसी दिख रही है, एग्जैक्टली उसमें ज्ञान वैसी होनी चाहिए। विरुद्ध कुछ भी हुआ इसमें हम ना, एक-दो-तीन क्लास होगा जिसमें वेदों में विज्ञान वाला क्लास, उसको समझ लेंगे ना। वो वाला क्लास जैसे अटेंड होगा ना, फिर आपको समझ में आएगा वेद है क्या। आपको समझ में आ जाएगा वेद से क्या होता है।
जी अभी जितने भी प्रश्न, बहुत सारे प्रश्न चल रहे होंगे आपके माइंड में, ऐसा बोल रहे हैं, ऐसा बोल रहे हैं, कैसे-कैसे-कैसे? क्योंकि थोड़ा क्लास होने दीजिए, आठ-दस क्लास हो जाएगा ना तो फिर आपके माइंड में सब जो है, क्लियर होता चला जाएगा।
जी विनोद गिरी जी। जी नमस्कार आचार्य जी। नमस्कार। मैं ये कह रहा था कि बार-बार यह कहा जाता है कि शास्त्र सम्मत जीवन जीना चाहिए, हर कोई शास्त्र के अकॉर्डिंग ही जीना चाहिए। तो शास्त्र एक्चुअली है क्या? क्योंकि शास्त्र की परिभाषा भी कई लोग, इस शास्त्र में ये लिखा है, उस शास्त्र में वो लिखा है, फिर ये भ्रम की स्थिति हो जाती है।
जी देखिए, शास्त्र शब्द जो है ना, ये इसका मूल जो अर्थ है, आपको सही और गलत में, धर्म-अधर्म में जो अंतर करवाए, जो सही-गलत, धर्म-अधर्म, उचित-अनुचित में जो अंतर करवाए। और यह जो शास्त्र हम कहते हैं, ये शास्त्र भी मनुष्य द्वारा रचित है। शास्त्र भी मनुष्य द्वारा रचित है। समय-समय पर ऋषि-मुनि आए तो अपने-अपने अनुसार जैसे उन्होंने जाना तो उन्होंने अपने अनुसार अलग-अलग शास्त्रों की रचना की जो आपको धर्म-अधर्म की अंतर करना सिखाए, जो आपको आध्यात्मिक बनना सिखाए। क्योंकि बिना आध्यात्मिक ज्ञान के हमारी उन्नति नहीं हो सकती। क्योंकि हम स्वयं आध्यात्मिक हैं, हम स्वयं निराकार हैं। हमारी ज्ञान की पिपासा कभी भी भौतिक वस्तु को संचय करके समाप्त नहीं हो सकती। तो सही-गलत में अंतर जो करवाए, जो उचित-अनुचित में अंतर करवाए, जो धर्म-अधर्म में अंतर करवाए, आपको वही शास्त्र है। और ये ऋषि-मुनि द्वारा रचित है। वेदों के ज्ञान पर उनका बेस था। वेदों के ज्ञान को उन्होंने जाना। क्योंकि वेदों में हर चीज जो है, पूरा एक्सप्लेन नहीं किया गया है। जैसे आजकल जो भी हम देखते हैं, गणित की शिक्षाएँ हम देते हैं, उसमें हम जोड़ना-घटाना सिखा देते हैं। मूल जो ज्ञान है, उसको दे देते हैं। बड़ी-बड़ी संख्या को हम जोड़ लेते हैं। हम केवल वर्णमाला का ज्ञान दे देते हैं। तो फिर मनुष्य को दिमाग क्यों दिया गया? अगर ईश्वर ने सब खोल-खोल के अगर वेदों में बता दिया होता, डिटेल में बता दिया होता तो फिर इस यंत्र की आवश्यकता नहीं होती, इसका उपयोग ही नहीं होता कुछ। फिर जैसे ऋषि-मुनियों ने वेदों को और जाना, डीप जानते गए तो उसके ज्ञान के आधार उन्होंने अलग-अलग ग्रंथ की रचना करने लगे। इसको शास्त्र हम कहते हैं कि व्यवहार कैसे करना है, कैसे उठना है, कैसे बैठना है, क्या खाना है, क्या नहीं खाना है, क्या बोलना है, क्या नहीं बोलना है, विवाह कैसे करना है, अपने लाइफ पार्टनर को कैसे चुनाव करना है, गृहस्थ में कैसे किन-किन आचरण को धारण करना है, गृहस्थ का क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए। समझ रहे हैं ना? यह है शास्त्र जो आपको हर जीवन के हर एक स्टेज में आपका मार्गदर्शन करे। यह है शास्त्र।
जी धन्यवाद। सविता जी। प्रणाम आचार्य जी। प्रणाम। जी बताइए तो। हाँ, एक्चुअली मुझे ये पता करना था कि आप आपके बारे में थोड़ा कि आप कहाँ पढ़े हैं, कितने सालों से यह पढ़ाई कर रहे हैं? थोड़ा सा आपके बारे में कि आपको इतना ज्ञान कैसे, कहाँ, कितने साल में आया?
जी जी, देखिए, मैं एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट हूँ, मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। और साथ ही साथ मैंने जब अपनी इंजीनियरिंग प्रारंभ की थी, उससे पहले बहुत पहले से ही मुझे शास्त्रों में रुचि थी। हाँ, तो मैं भी आप जैसे बैकग्राउंड से हूँ, उसी बैकग्राउंड से हूँ। मैं ऐसे बैकग्राउंड से हूँ जहाँ पर परिवार में वैदिक ज्ञान का कोई प्रचार-प्रसार नहीं था। इनका माइक ऑन है, अपने आपको म्यूट कर लीजिए। हाँ, तो वहाँ पर भी वैदिक ज्ञान का कोई प्रचार-प्रसार नहीं था। लेकिन यह जो भी आज हम करते हैं, पुराणों के अनुसार जो मूर्ति पूजा वगैरह करते हैं, मुझे इससे शांति नहीं मिलती थी। मैं जानना चाहता था एक्चुअल में सही क्या है। तो कुछ प्रश्न उठते रहते थे मन में। तो इन प्रश्नों को लेकर के मैं रिसर्च करता था। क्योंकि सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, मैं इंटरनेट में रिसर्च करता था इसके बारे में, कहीं कुछ मिले क्या, नहीं क्या है। तो मुझे कुछ सोर्स से पता चला जो हमारा जो शास्त्र है, वह वेद है, मूल है, वेद है। तो हमने धीरे-धीरे, धीरे-धीरे शास्त्र को पढ़ना प्रारंभ किया। अगर मूल है तो फिर हमने प्रामाणिक ग्रंथों को जाना, हमारे कौन-कौन से प्रामाणिक ग्रंथ, उसमें क्या है, उसको जानने का प्रयास किया। तो मैंने करीब आपके 2012 के आसपास मैंने प्रारंभ किया ये शास्त्र के बारे में पढ़ना शुरू किया। तो जैसे-जैसे मैंने हर एक शास्त्र को जाना तो फिर कुछ मेरी जो भी मान्यता थी पहले की, वो एक सेकंड में सब धराशायी हो गए। हमारे शास्त्र कुछ और कहते हैं, हमारी मान्यता कुछ और। हम दुखी क्यों हैं? पूरा कारण वो बनाकर बता करके गए। हमारे जीवन में समस्या क्यों है? सब बता करके गए। सब हमारे ऋषि-मुनि ने इतना पुरुषार्थ किया है ना, इतना परिश्रम किया है उन्होंने जिसकी कोई तुलना नहीं है। और किसलिए, किसके लिए किया था उन्होंने? हमारे लिए किया, आने वाली पीढ़ी को डिलीवर करना था इस ज्ञान को। तो जो मेरा ये जितना भी मैंने अभी तक जाना है, ईश्वर की दया से, यह मेरे लगभग 10 वर्षों का अनुभव है। 10 वर्षों में मैंने जो भी शास्त्रों को पढ़ा है, उनका अभी भी अध्ययन कर रहा हूँ। क्योंकि स्वाध्याय करना जरूरी है, बिना स्वाध्याय के संभव नहीं है कुछ भी। तो उसका ही यह, यह जो वैदिक ऑनलाइन क्लासेस है, यह उसी का ही परिणाम है।
अच्छा, धन्यवाद। जी 816956। जी सर, संदीप बात कर रहा हूँ। जी जी, संदीप जी बताइए। नमस्कार सर। सर, वैसे तो आपने बताया है कि डाउट आगे-आगे क्लियर होते रहेंगे। लेकिन आज की क्लास में जो मेरा डाउट एक है, आपने बोला कि ईश्वरीय ज्ञान जो है, वो किसी भी जगह और किसी भी व्यक्ति विशेष से नहीं हो सकता। तो इसके कंसर्न में मेरा जो क्वेश्चन है, वह है श्री कृष्ण जी को लेकर जो उन्होंने गीता का ज्ञान दिया था।
अभी ये क्वेश्चन मत करिए। कुछ क्लास होने दीजिए। आप पहले वेदों को समझेंगे ना, ऑटोमेटिक क्वेश्चन का आंसर मिलेगा। मैं यह जो प्रश्न आप कर रहे हो, जैसे-जैसे क्लास बढ़ेगा, सब क्वेश्चन, दस क्लास होने दीजिए। आठ से दस क्लास हो जाएँगे, सब खत्म। ठीक है? वैसे तो मेरे माइंड में कुछ आ रहा है। लेकिन अभी आप अगर ये क्वेश्चन करोगे, मैं अगर उत्तर दे दूँ इसको तो आप सेटिस्फाई नहीं होंगे। जी, मैं यह बोल रहा हूँ ना, क्योंकि ऐसे उत्तर तो सभी देते हैं। जी जी जी जी। आप जैसे क्वेश्चन कर रहे हो, ऐसे उत्तर तो सभी देते हैं। तो क्या सेटिस्फाई कर पाते हैं अपने उत्तर से वो आपको? मैं यहाँ पर तथ्य-प्रमाण के साथ बात करने वाला हूँ, विज्ञान के आधार पर बात करने, वेदों के आधार पर बात करने वाला हूँ। मैं यहाँ पर कोई भेदों की बातें बोल कर के आपको चला जाऊँगा और आप मान लेंगे, ऐसा नहीं है। जी, आप चिंतन करेंगे, मंथन करेंगे, बुद्धि लगाएँगे तब होगा। ठीक? तो अभी बोलूँगा तो मैं आप ऐसे विषय पे बात करिए। हाँ, मैं दो शब्दों में समझा दूँगा तो समझ जाएँगे। ऐसे विषय को दो शब्दों में नहीं समझाया जा सकता।
जी ठीक है आचार्य। तो नेक्स्ट क्लास में मिलते हैं आप सबसे। रेगुलर रहेगा। सुबह का बैच रेगुलर रहेगा और कंटिन्यू रहेगा। ये लोग 6 बजे आ जाइएगा डेली। तो चलिए आज की क्लास यहीं समाप्त करते हैं। ईश्वर स्तुति वंदना करके। ओम असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। ओम शांतिः शांतिः शांतिः। ओम पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ओम शांतिः शांतिः शांतिः। ओम सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु। सर्वेषां शान्तिर्भवतु। सर्वेषां पूर्णं भवतु। सर्वेषां मङ्गलं भवतु। सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्। ओम शांतिः शांतिः शांतिः। सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद इस क्लास को अटेंड करने के लिए। आपसे मिलते हैं नेक्स्ट क्लास में सभी के लिए। चलिए, यहीं क्लास को आज समाप्त करते हैं। आपको रिकॉर्डिंग मिल जाएगा इसका। अगर रिकॉर्डिंग भी देखना चाहेंगे तो देख सकते हैं। धन्यवाद।