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Hindi Diwas Seminar | Miranda House | 14 September | Dr Vikas Divyakirti

Vikas Divyakirti1:38:12

Transcription

जोरदार तालियों से सर का स्वागत [प्रशंसा] [संगीत] करिए। भारत मां का सम्मान है, अभिमान है, हर भारतवासी की कामना, हमारे साहित्य का गौरव गान है। हिंदी हमारी मातृभाषा, हमारी संस्कृति की पहचान है। नमस्कार, यहां उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्ति, आदरणीय शिक्षक गणों एवं मेरे साथियों को हिंदी दिवस की हृदयांग शुभकामनाएं। भारतीय परिषद मिरांडा हाउस की ओर से, मैं अभया, आज के हमारे इस कार्यक्रम में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करती हूं।

कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए, अब मैं स्तुति को आमंत्रित करती हूं। नमस्कार, भारतीय परिषद मिरांडा हाउस की ओर से, मैं स्तुति बाजपेई, आप सभी का इस वक्तव्य में स्वागत करती हूं। आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। हमारे आज के व्याख्यान का विषय है, बदलते परिदृश्य में हिंदी। और हमारे बीच मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में उपस्थित हैं, वे जो अपने नाम के ही अनुरूप हैं, डॉक्टर विकास दिव्य कीर्ति।

"चाहता तो बच सकता था, मगर कैसे बच सकता था, जो बचेगा कैसे रचेगा।" पूर्णता सटीक है श्रीकांत वर्मा की ये पंक्तियां, जब हम आपके जैसे व्यक्तित्व का परिचय देते हैं। आपका बचपन एवं स्कूली शिक्षा दीक्षा हरियाणा से पूर्ण हुई। आपके पिता हिंदी के प्राध्यापक व माता हिंदी की अध्यापिका रही। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि हिंदी आपको विरासत में [प्रशंसा] मिली। सन 1990 में आप दिल्ली आए तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज से स्नातक किया। स्नातक पश्चात आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही हिंदी में परास्नातक तथा एमफिल एवं पीएचडी पूरी की। इसके अतिरिक्त आपने समाजशास्त्र, फिल्म निर्माण, दर्शन, कानून और प्रबंधन आदि बहु विषयों में भी कुशलता प्राप्त की। पठन पाठन की ओर आपकी स्वाभाविक रुचि रही है। आपने अपने व्यवसायिक जीवन की शुरुआत दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी के प्राध्यापक के रूप में की। भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा को उत्तीर्ण करने की दौड़ में खड़े हजारों विद्यार्थियों के आदर्श हैं। सन 1996 में आपने अपने प्रथम प्रयास में ही भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर गृह मंत्रालय में भारत सरकार के राजभाषा विभाग में डेस्क ऑफिसर का पद संभाला। तत्पश्चात सन 1999 से आपने आधिकारिक रूप से यूपीएससी परीक्षार्थियों को पढ़ाना आरंभ किया एवं लोक प्रचलित संस्था दृष्टि आईएस की स्थापना [प्रशंसा] की। वर्तमान में आप दृष्टि के प्रबंध निदेशक के रूप में कार्यरत।

आपने अपने एक वक्तव्य में कहा था, "हिंदी आत्मा की भाषा है।" आपके इस कथन से यह तो विदित है कि आपका और हिंदी भाषा का संबंध कितना गहरा है। बचपन से हिंदी भाषी परिवेश में पले बड़े होने के फल स्वरूप आपने हिंदी को हर रूप से आत्मसात किया है। अब मैं आपसे आग्रह करूंगी कि कृपया आप अपने वक्तव्य से हम सभी का ज्ञान वर्धन [प्रशंसा] करें।

नमस्कार। सबसे पहले मिरांडा हाउस कॉलेज का धन्यवाद। मुझे ज्ञात है कि पिछले सात सालों से यह कॉलेज भारत का सबसे अच्छा कॉलेज हर साल बनता है और सबसे अच्छा कॉलेज देश का किसी को बुलाए तो ये उसके लिए एहसान की बात है ना कि उसके लिए जो वहां जा रहा है। विशेष रूप से धन्यवाद चंदा जी को। संज्ञा जी ने मुझे दो दिन पहले मैसेज किया। मैं भारत से बाहर था पर मेरा कुछ पुराना एहसान चुकाने का भाव था उनके प्रति तो जैसे उन्होंने कहा कि आप आए तो मैंने सीधे कहा कि जैसे भी होगा मैं जरूर आऊंगा। संगीता जी बाकी अध्यापिका है। मेरा सबसे परिचय निजी नहीं है। मैं नाम नहीं जानता हूं सबका और जो विद्यार्थी इस पूरे कार्यक्रम का संचालन कर रहे हैं। ये व्यवस्था बाहर देख के मुझे लगा कि आपको आईपीएस की ट्रेनिंग की जरूरत नहीं है। आप लोग तो पहले से वो सारी ट्रेनिंग अपने अंदर लेकर बैठे हैं। इसे आईपीएस की भाषा बंदोबस्त कहते हैं। किसी बड़े प्रोग्राम को मैनेज करना, सुरक्षा से लेकर हर चीज को ठीक से देखना तो यह सब तो आप लोग पहले से कर रहे हैं तो मुझे लगता है कि किसी बड़ी चुनौती के सामने आपको परेशानी आने वाली है नहीं।

शुरुआत में जो आपने कविता का जिक्र किया संयोग से वह मेरी सबसे प्रिय कविता भी है। श्रीकांत वर्मा हिंदी के एक बहुत ही महान कवि हुए। 1980 के दशक में उनकी मृत्यु हुई अमेरिका में कैंसर से लड़ते हुए और जो सबसे अच्छी कविता वो लिख केर गए और मुझसे कोई पूछे कि मैं क्योंकि साहित्य का व्यक्ति हूं और सैकड़ों कविताएं तो मुझे कम से कम याद होंगी ही क्योंकि मुझे बड़ा शौक है कविताएं सुनने का, पढ़ने का, याद करने का और यदि कोई मुझसे पूछे कि मुझे अगर एक कविता चुननी हो जो सबसे गहरे स्तर पर मुझे प्रभावित करती रही है तो वही कविता है जिससे आज के कार्यक्रम की शुरुआत इस बच्चे ने की। "चाहता तो बच सकता था, मगर कैसे बच सकता था, जो बचेगा कैसे रचेगा।" "चाहता तो करा सकता था, मगर कैसे करा सकता था, जो कराएगा कैसे निभाएगा।" और यह कविता कई ऐसे संदर्भों को लेकर आगे बढ़ती है और हर संदर्भ में जीवन का एक बड़ा महत्त्वपूर्ण पहलू हमारे सामने आता है।

मुझे खुशी है कि इस कॉलेज ने मुझे जिस विषय पर बात करने के लिए बुलाया है व विषय भाषा का विषय है। भाषा को लेकर मेरी राय का जिक्र परिचय में हुआ ही है। मैं मानता हूं कि हर भाषा आत्मा की भाषा नहीं होती है। भाषाओं के बहुत सारे काम होते हैं। अंग्रेजी भी मेरे लिए बड़ी प्रिय भाषा है, हिंदी प्रिय भाषा है, सारी भाषाएं प्रिय हैं। मैं उन लोगों में नहीं हूं जो किसी एक से प्रेम करने के लिए बाकी सबसे नफरत करना पसंद करता हो। मैं सबसे प्रेम करना पसंद करता हूं और उसमें हिंदी मेरी मातृभाषा है तो जो प्यार मां से होता है वह हिंदी से है। यह कहने में मुझे दुनिया के किसी भी मंच पर ना संकोच है, ना झिझक है, ना कोई भय है। तो हिंदी मेरी मां है और मां के मामले में ना समझौते होते हैं, ना चैन की सुविधाएं होती हैं, ना चैन की जरूरत होती है। पर हिंदी मेरी मां है का मतलब यह नहीं है कि तेलुगु मेरे दुश्मन है या कि उर्दू मेरे दुश्मन है या अंग्रेजी मेरे दुश्मन नहीं। मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि आप भी एक ऐसा मिजाज लेकर आगे बढ़े कि हम एक भाषा को सम्मान की निगाह से देखें और उसी तेवर से बाकी भाषाओं को अपमान की निगाह से देखें। ऐसा बिल्कुल ना चाहता हूं। मैं तो नहीं करता हूं, मैं चाहता हूं कि कोई भी ना करे। आप भी ऐसा ना करें।

संस्कृत मेरी परनानी है। संस्कृत की बेटियां अपभ्रंश हुई, प्राकृत हुई। उनकी बहुत सारी बेटियों में एक बेटी का मैं बच्चा हूं उसका नाम हिंदी है। उसी अपभ्रंश प्राकृत की बहुत सारी बेटियों में मराठी भी है, गुजराती भी है, पंजाबी भी है, बांगला भी है, असमिया भी है, ओड़िया भी है और उसी नानी के पड़ोस के परिवार की और जो बच्चियां हैं उनमें तेलुगु, तमिल और मलयालम, कन्नड़ यह सब भाषाएं भी है और इन नानी के समय में इन सब भाषाओं में बहुत अपनत्व था, बहुत सहयोग था। आज हम कितनी भी दूरी महसूस करें हमारी नानी के जमाने में इनमें बहुत लेनदेन हुआ, आदान प्रदान हुआ और इसलिए जब आप मलयालम सीखेंगे या तमिल सीखेंगे तो आप बड़ा आश्चर्य चकित हो जाएंगे कि कई बार संस्कृत के शब्द एज इट इज आपको उन भाषाओं में मिलते हैं और आपको समझ में आता है कि एक पीढ़ी का अंतर नहीं है। थोड़ा और पीछे जाएंगे तो कई पीढ़ी पीछे हमारी बड़ी गहरी दोस्ती रही है, तालुकात रहे हैं और इसलिए जब भाषा के प्रश् पर मुझे को बोलले को कहता है मुझे लगता है कि ये शायद दुनिया का सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल है। अलग बात है कि आजकल हम इसको एक हल्का सवाल मान लेते हैं पर मैं भी आपको समझाना चाह रहा हूं कि दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण सवाल क्यों है।

हिंदी दिवस के दिन एक परंपरा है कि हम आमतौर पर भावनात्मक मुहावरों से बात करते हैं। आज सुबह से मेरे पास आ 10 मैसेज आ चुके हैं जिन सब में एक वाक्य लिखा है कि "हिंदी भारत माता के माथे की बिंदी है।" हर साल ये मैसेज आता है। अच्छा मैसेज है, पढ़ के अच्छा लगता है पर मैं चाहता हूं कि हिंदी समाज हिंदी माथे की बिंदी से आगे बढ़कर कुछ और मुद्दों पर बात करें। केवल उन भावनाओं में डूब के बात करना काफी नहीं है। उससे कुछ आगे निकलना जरूरी है। मैं आपको दो कहानियों से बात शुरू करता हूं ताकि आप समझ सके कि यह मुद्दा कितना महत्त्वपूर्ण है।

एक किताब जो पिछले 152 साल में दुनिया के सबसे मशहूर किताबों में से एक बनी उसका नाम सेपियंस है। आपने शायद सुना होगा। मैं हिंदी के बच्चों से कहूंगा कि थोड़ा सा पढ़ने का अभ्यास अपना बनाए। हिंदी के समाज से मुझे गंभीर शिकायत है कि हम लोग पढ़ते कम हैं। हम लोग भावनाओं में ज्यादा बहते हैं। पढ़ने की आदत हमें कम है और आज के जमाने में जब दुनिया की हर अच्छी किताब हिंदी में भी उपलब्ध है तो हिंदी में ही पढ़िए लेकिन कम से कम पढ़िए क्योंकि पढ़ने से अच्छा कुछ नहीं है। एक किताब पढ़ने का मतलब किसी एक व्यक्ति के जीवन के 40 50 साल के निष्कर्षों को तीन दिन में समझ लेना और आप 50 साल मैचोर हो जाते हैं तीन दिन में केवल एक अच्छी किताब पढ़ लेने से।

बहरहाल सेपियंस किताब मानव जाति का इतिहास है। ये भारत का इतिहास, आधुनिक इतिहास, प्राचीन इतिहास नहीं है। मानव जाति का इतिहास है। माना जाता है कि 1400 करोड़ साल पहले बिग बैंग हुआ जहां यह पृथ्वी पहली बार बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। 450 करोड़ साल पहले पहली बार जीवन अस्तित्व में आया। अभी आया उसके बाद लंबे समय तक खूब घटनाक्रम होते गए होते गए होते गए हम कहीं नहीं थे उस समय। 3 लाख साल के आसपास पीछे जाए तो एक परिवार पैदा हुआ जिसको होमो कहते हैं। होमो का मतलब हमारा परिवार। उस होमो परिवार में एक हम है होमो सेपियंस क्योंकि हम होमो परिवार में सेपियंस नाम की शाखा है। उस परिवार में और भी शाखाएं थी। निएंडरथल एक बहुत प्रसिद्ध आपने नाम सुना होगा। ऑस्ट्रेलोपीथिसिंस में थे। चुनौती यह थी कि अंत में इनमें से कौन जीतेगा यह व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं था कि यह सारे साथ-साथ चल सके। यह बात सुनने में अच्छी लगती है कि सब साथ साथ चले पर इवोल्यूशन की हिस्ट्री में बहुत व्यावहारिक नहीं होता है। एक सवाल यह भी था कि होमो परिवार का कोई प्राणी क्या चिंपांजी को, बंदर को इन सबको हरा पाएगा क्योंकि उस समय तक यह सारी स्पीशीज लगभग बराबर संघर्ष में चल रही थी। आज से 7 हजार साल पहले तक यह सब यूं ही चल रहा था और फिर एक घटना घटी। उस घटना को सेपियंस किताब के लेखक ने जिनका नाम युवाल नोवा हरारी है उन्होंने संज्ञानात्मक क्रांति या कॉग्निटिव रिवोल्यूशन का नाम दिया और यह घटना 400 हजार साल तक चलती रही और इस बात पर बड़ा गहरा विचार किया कि क्या वजह थी कि होमो सेपियंस जिंदा रहा, निएंडरथल मर गया, हम मानते हैं कि निएंडरथल वह है जो यूरोप की आज की जो स्पीशी है उसका पूर्वज था। ओलो पकस मर गया, इरेक्टस मर गया और जितने परिवार के जंतु थे वो सब मर गए और होमो सेपियंस इन सब कमजोर होने के बावजूद बच गया और इतना सफल भी हो गया। निरथल के बारे में उसने लिखा कि अगर आमने सामने आ जाए तो निरथल होमो सेपियंस को मार मार के अधरा कर सकता था वह इतना ताकतवर था उसके बाद भी खत्म हो गया क्यों खत्म हो गया और तब आता है वह सिद्धांत जो आज की इस डिस्कशन की शुरुआत का बिंदु है। होमो सेपियंस इसलिए जिंदा रहा क्योंकि उसके पास भाषा की क्षमता थी। भाषा की क्षमता बाकियों के पास भी थी। चिंपांजी के पास भी है, बंदर के पास भी है पर बंदरों पर खूब प्रयोग हुए। बंदर हो अन्य स्पीशीज हो, तोता तोता हमसे ज्यादा ध्वनियां बोल सकता है हमसे ज्यादा। इसके बाद भी तोता सफल नहीं हो पाया क्योंकि व उतना सोच नहीं पाता है। चिंपांजी की भाषा, बंदर की भाषा, ंडर थल की भाषा सीमित भाषाएं थी। वो एक आवाज में पूरा एक वाक्य बोलते थे और ऐसे प्रयोग आज भी होते हैं। अगर आप जंगलों की आवाजें सुनेंगे तो बंदरों की एक आवाज का मतलब एक पूरा सेंटेंस होता है जैसे एक आवाज का मतलब है कि शेर आया। जैसे ही एक बंदर आवाज निकालेगा सारे बंदर पेड़ पर चढ़ जाएंगे। फिर दूसरी आवाज का मतलब होगा शेर चला गया। वो सुनके सब उतर जाएंगे नीचे। भाषा वैज्ञानिकों ने वो आवाज रिकॉर्ड कर ली और एक बार अच्छे म्यूजिक सिस्टम से एक जंगल में जाकर आवाज प्ले कर दी "शेर आया" और वो आवाज सुनते सारे बंदर पेड़ के ऊपर चढ़ गए और फिर आपस में देख रहे किसने बोला और 101 मिनट के बाद दूसरी आवाज प्ले की "शेर चला गया" सारे बंदर नीचे उतर गए। एक आवाज एक वाक्य। इंसान की भाषा की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि वह डिस्क्रीट भाषा है, विविक्त भाषा है जिसका मतलब कुछ 25 30 ध्वनियों से 50 ध्वनियों से हम अरबों शब्द बना सकते हैं और अरबों शब्दों से खरबों वाक्य बना सकते हैं। इतनी लचीली भाषा हमारी है जिसमें किसी भी बात को कहने के पचास तरीके हमारे पास हैं और यह तरीके इस संसार में किसी और स्पीशीज के पास नहीं है इसीलिए होमो सेपियंस होमो सेपियंस बन पाया और आज अगर हम जिंदा हैं आज हम चिंपांजी से बेहतर है, गोरिला से बेहतर है, बंदर से बेहतर है और होमो इरेक्टस से बेहतर है, निल से बेहतर है जिंदा है तो इसकी मूल वजह है हमारी भाषा की क्षमता।

जो चीज मुफ्त में मिलती है उसकी कीमत हम नहीं समझते हैं। भाषा ऐसी एक चीज है मुफत में मिल जाती है तो हमें लगता है कि य तो ऐसे ही है लेकिन जब आप इस नजरिए से समझेंगे कि भाषा ही वह चीज है जो हमें मनुष्य बनाती है तो शायद इस बात का महत्व ज्यादा अच्छे से हम समझ पाएंगे।

भाषा को लेकर झगड़ा जो आज के समय में है। हम आज हिंदी की बात कर रहे हैं। किसी और कोने में कोई किसी और भाषा की बात कर रहा होगा। ऐसा क्यों नहीं होता कि दुनिया में एक ही भाषा होती? ऐसा क्यों है कि भाषाएं बहुत सारी हैं? ना बहुत सारी भाषाएं होती ना झगड़े होते। सब एक ही भाषा बोल रहे होते। सोचने में कितना अच्छा लगता है। तो ओल्ड टेस्टामेंट में जो यहूदियों का बाइबल का हिस्सा है उसमें कहानी आती है उसको बोलते हैं बेबिलोनिया की या बाबल की कहानी। कहानी यह है कि एक बार ईश्वर ने यहूदियों के ईश्वर यवे ने जब देखा कि मनुष्य बहुत पाप कर रहे हैं तो उसने बहुत तेज बाढ़ पैदा की। यह वही बाढ़ है जो आपने आज से 10 साल पहले एक फिल्म 2012 में देखी होगी। यह उसी बाढ़ की कहानी है। इतनी ज्यादा बाढ़ की सारी इंसानी सभ्यता नष्ट हो जाए क्योंकि यह लोग इतने पापी हैं और ईश्वर को यह लगा कि मैंने गलती कर दी इन लोगों को मनुष्य बना के इनके तो पाप खत्म नहीं होते हैं। नाराज होकर उसने सारी सभ्यता को विनाश करने के कगार पर खड़ा कर दिया। हम भारतीय सभ्यता में प्रलय की कल्पना करते हैं कुछ कुछ वैसी कल्पना वहां पर एक बाढ़ की कल्पना है और तब ईश्वर को यह भी लगा कि अगर सारे खत्म हो जाएंगे तो सृष्टि बनाने का जो पर्पस था वो खत्म हो जाएगा तो ईश्वर ने अपने एक नबी को भेजा जिनका नाम था नूह या नोवा। य युवाल नोवा हरारी के बीच में जो नाम है नोवा वही नोवा नाम है और उनसे कहा कि तुम जाओ जितनी भी स्पीशीज है उन सबकी एक एक पेर को बचा लो ताकि सभ्यता को फिर से शुरू कर सके तो नोवा ने एक जहाज का निर्माण किया, पानी के जहाज का निर्माण किया, सारी स्पीशी के एक एक पेयर को उस पर रखा, अपने परिवार को रखा और बाढ़ से बचा लिया और उसके बाद नई सभ्यता शुरू हुई।

और जब नई सभ्यता शुरू हुई तो बेबिलोनिया के राजा के मन में विचार आया कि अगर हम एक इतनी ऊंची मीनार बना ले कि किसी भी बाढ़ में हम डूबे ही नहीं तो चिंता खत्म हो जाएगी तो बाबेल नाम के स्थान पर बेबिलोनिया का स्थान था एक टावर बनना शुरू हुआ। यह बाइबल में जेनेसिस की कहानी है। टावर बनने लगा काफी ऊंचा बन गया पर बनते बनते ईश्वर को यह लगा कि यह मेरी शान में गुस्ताखी हो रही है क्योंकि मैं बाढ़ ले आऊंगा उससे बचने के लिए यह मेरे खिलाफ साजिश कर रहे हैं तो ईश्वर ने क्या किया एक कमाल कर दिया। उसने उस टावर पर काम करने वाले व्यक्ति और बाकी व्यक्तियों को भाषाओं में बांट दिया ताकि वह एक दूसरे की बात ना समझ सके और एक कहानी चलती है कि अगर आप चाहते हैं कि सारे मनुष्य एक ना हो तो उनको भाषाओं में बांट दीजिए और उसके बाद से आज तक सारे मनुष्य आपस में झगड़ा कर रहे हैं। यह कहानी ऐतिहासिक रूप से कितनी सही है मुझे नहीं पता। मिथक है, धर्म की बात है पर ऐसी कहानियां किसी कांसेप्ट को समझने के लिए बहुत काम की कहानियां होती है।

और जब मैं भाषा के प्रश् को देखता हूं तो मैं दो नजरियों से देखना पसंद करता हूं। पहली बात भाषा वो है जो हमें मनुष्य बनाती है और इस संसार में जहां तीन ट्रिलियन या एक ट्रिलियन स्पीशी संघर्ष करती हैं उनमें हमें सबसे ज्यादा मजबूत बनाती है और दूसरा भाषा वह संरचना है जो दुनिया को बांटती है और क्योंकि बांटती है तो बहुत सारे संघर्षों को जन्म देती है। लोग कहते हैं कि धर्म बहुत ताकतवर है, जाति बहुत ताकतवर है। मेरी नजरिए में भाषा सबसे ताकतवर है। अगर धर्म बहुत ताकतवर होता तो पाकिस्तान बनने के बाद बांग्लादेश की जरूरत क्यों पड़ती? मुसलमानों के लिए नया देश चाहिए तो पाकिस्तान बन गया। पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमान ही तो थे। अंतर क्या था कि एक तरफ के मुसलमान उर्दू और पंजाबी बोलते हैं, एक तरफ के मुसलमान बांगला बोलते हैं। बांगला भाषी मुसलमान उर्दू भाषी मुसलमान के साथ एक नहीं हो पाएगा इसलिए उसको नए देश की जरूरत है और बांग्लादेश इसलिए बना। आप श्रीलंका के झगड़े को कितना भी हिंदू और बौद्ध झगड़ा कह लीजिए दरअसल वो तमिल और सिंगली भाषाओं का झगड़ा है।

ये जो भाषाओं के झगड़े हैं और भाषाओं का एक अस्तित्व होता है जैसे मनुष्य के जीवन में वक्र है कभी सफल कभी विफल ऐसी भाषाओं का जीवन होता है। आज से 300 साल पहले ब्रज भाषा का जो जोर था कोई सोच सकता था कि 300 साल बाद उसका नाम लेने वाला कोई बचेगा नहीं। ब्रज भाषा के नाम में भाषा है वो बोली बन गई और खड़ी बोली के नाम में बोली है वो भाषा बन गई तो इतिहास के दौर की बात है। इतिहास का कौन सा दौर किस भाषा को कहां से कहां उठाकर ले जाएगा। जब पुर्तगाली यूरोप से निकले थे दुनिया पर कब्जा करने के लिए उन्हें लगता होगा कि पुर्तगाली दुनिया की महान भाषा बनेगी। बाद में फ्रांसी सियों ने, हॉलैंड के डच लोगों ने, अंग्रेजों ने आपस में झगड़े किए, फ्रेंच लोगों ने झगड़े किए। उन झगड़ों में संयोग से अंग्रेजी जीत गई और क्योंकि अंग्रेजी जीत गई क्योंकि अंग्रेजी का असर भारत पर पड़ा, अंग्रेजी का असर अमेरिका पर पड़ा, अंग्रेजी का असर अफ्रीका पर ज्यादा पड़ा इसलिए आज अंग्रेजी दुनिया की सबसे प्रसिद्ध भाषा है, प्रचलित भाषा है। ऐसा थोड़ना कि अंग्रेजी बहुत महान भाषा है। भाषाए सारी महान है और अगर तकनीकी तौर पर देखे तो हिंदी भाषा वैज्ञानिक तौर पर अंग्रेजी से बेहतर भाषा है। केवल शब्दावली के अभाव को पीछे छोड़ दें चाहे वो ध्वनि का मामला हो, फोनेटिक्स का मामला हो, टेक्स का मामला हो, भाषा विज्ञान के किसी भी स्तर पर देखें तो हिंदी अपनी वैज्ञानिकता में अंग्रेजी से कहीं भी कम नहीं है। कई मामलों में बेहतर है।

इसलिए कौन सी भाषा का कितना राज होने वाला है यह बात तय होती है केवल इस बात से कि उस भाषा के समाज की दुनिया पर क्या पकड़ है। कौन उपनिवेश की भाषा बनी, कौन साम्राज्य की भाषा बनी, किस भाषा में ज्यादा विकास हुआ, किस भाषा में कम विकास हुआ। सहयोग की बात है कि आज हम एक ऐसी दुनिया में ग्लोबल दुनिया में जहां अंग्रेजी का वर्चस्व है। अंग्रेजी से दिक्कत ना आपको होनी चाहिए ना मुझे होनी चाहिए। हम हर भाषा का सम्मान करें, उससे फायदा उठाए, सीखें, अपने काम का लाभ ले पर मैं अंग्रेजी माध्यम का विद्यार्थी रहा हूं। मैंने बहुत सारी पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम में की है और मैं अंग्रेजी में लगभग उतना सहज जना हिंदी में हूं। मुझे इस बात की खुशी है। मुझे चिंता केवल तब होती है जब भारत में होते हुए कोई मुझसे यह उम्मीद करता है कि मुझे हिंदी बोलने में शर्म होनी चाहिए। चिंता केवल तब होती है भारत में होते हुए मैं अपनी भाषा बोलू, अपनी भाषा बोलने मुझे कहे की शर्म होनी चाहिए। मैंने जिन जिन देशों की यात्रा की आज दुनिया के हर देश पर दबाव है कि अंग्रेजी सीखे और वो दबाव इसलिए कि ग्लोबलाइजेशन का दौर है, अंग्रेजी में चीजें ज्यादा उपलब्ध है स्वाभाविक सी बात है पर मैंने कभी हॉलैंड में किसी व्यक्ति को डच भाषा की तुलना में अंग्रेजी को महत्व देते हुए नहीं देखा। वो लड़ने को तैयार हो जाते हैं। आप किसी फ्रेंच व्यक्ति से बात करें, आप इजराइल के किसी व्यक्ति से बात करें जहां भाषा के सम्मान की बात आएगी वो अंग्रेजी का नाम तक नहीं।

लेंगे, जहाँ पढ़ने की बात आएगी, सीखने की बात आएगी, फायदा उठाने की बात आएगी, निश्चित तौर पर सीखेंगे, क्योंकि उस भाषा से उनको फायदा होता है।

आज की जो बातचीत हमारी होने वाली है, वह कुछ-कुछ उसी तौर पर होने वाली है कि आज हमारी क्या स्थिति है, हमें क्या करना चाहिए, क्या घबराने की जरूरत है? ऐसा तो नहीं कि हम बिना बात के खौफ में हों? पर मुझे लगता है कि हम बिना बात के खौफ में ज्यादा रहते हैं।

और जब मैं हिंदी की बात सोचता हूँ और मेरा अंडा हाउस के संदर्भ में सोचता हूँ, तो मुझे लगता है कि हिंदी की स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसी द टेंपेस्ट नाटक की नायिका मिरांडा की थी। जब मॉरिस ग्वायर साहब ने इस कॉलेज की स्थापना की और इसका नाम मिरांडा हाउस रखा, तो उनसे कई लोगों ने पूछा। वो उस समय डीयू के वाइस चांसलर भी थे, भारत के चीफ जस्टिस भी थे। उस समय तो जब भारत आजाद हो गया और वो चले गए यहाँ से 1952 में, उन्होंने एक बात की व्याख्या की कि मैंने इस कॉलेज का नाम मिरांडा क्यों रखा। तीन वजह बताईं।

एक वजह बताई कि एक फिल्म की हीरोइन मुझे बहुत प्रिय है, उसका नाम मिरांडा है। एक कहा कि मेरी बेटी का नाम मिरांडा है। लेकिन जो असली वजह मुझे लगता है, तीसरी उन्होंने बताई, वो यह थी कि शेक्सपियर के नाटक द टेंपेस्ट में जो एक मात्र महिला कैरेक्टर मंच पर आती है, उसका नाम भी मिरांडा है। और वो कहते हैं कि मैं चाहता हूँ कि मिरांडा हाउस में पढ़ने वाली लड़कियां ऐसी व्यक्ति बनें। वह व्यक्ति आप मत ही बनिए, तो उसका महत्व रहा नहीं है। उस दौर में उसका महत्व था।

कुछ-कुछ छायावाद की श्रद्धा जैसी लड़कियां होती हैं, वो जो एकदम भारतीय किस्म का मिजाज नहीं होता है कि मेरा कोई अधिकार नहीं है, मैं सिर्फ त्याग करने के लिए पैदा हुई हूँ। कुछ-कुछ वैसा मिजाज उस लड़की का है, मिरांडा का उस नाटक में। बड़ी खास बात है, मिरांडा बहुत योग्य लड़की है, उसकी समझ बड़ी गहरी है, पर वो अपने पिता और अपने होने वाले पति, प्रोस्पेरो उसका पिता है, फर्डिनेंड उसका होने वाला पति है, वो उन दोनों के इतने कंट्रोल में है कि वो खुद को डिफाइन उन्हीं के नजरिए से करती है। बहुत योग्य होने के बावजूद उसमें आत्मविश्वास बिल्कुल भी नहीं है। अपने जीवन के फैसले वो अपने आप लेने को बिल्कुल तैयार नहीं है। अंत में लगता है कि फर्डिनेंड का फैसला उसने खुद किया है, पर आप ध्यान से पढ़ें तो समझ में आता है कि वो फैसला भी उसके पिता ने ही करवा दिया है।

और वो बेचारी इतनी कमजोर अपने आप को महसूस करती है। हिंदी की एक फिल्म में गीत आया था, एक पत्नी है जो अपने पति से बहुत प्रेम करती है, सुंदर नहीं है, पति उससे प्रेम नहीं करता है, पति कहीं और प्रेम करता है। तो वो लड़की, फिल्म का नाम था नसीब अपना-अपना, एकदम समझ लीजिए कि मिरांडा ही उसे बोल रही है, एकदम मिरांडा का भारतीय संस्करण है। और वो अपने पति के बारे में एक वाक्य बोलती है, "भला है, बुरा है, जैसा भी है, मेरा पति मेरा देवता है।" यह उस जमाने में चलता था। आज के जमाने में तो पत्नी या पति का हिसाब बराबर कर देती है। अगर कोई ऐसा करे तो, लेकिन उस जमाने में ऐसी हरकतें होती थीं।

और टेंपेस्ट की नायिका मिरांडा अपने प्रेमी से फर्डिनेंड से कह रही है, "अगर तुम मुझसे शादी कर लोगे, तो मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, और नहीं करोगे, तो मैं तुम्हारी दासी हूँ। तुम मुझे किसी भी रूप में रखो, मैं जिंदगी भर तुम्हारी दासी बन कर रहूँगी, नौकरानी बन कर रहूँगी।" और इस बात पर 16 सेंचुरी का ब्रिटिश समाज पागल हो गया कि लड़की हो तो वैसी, बीवी हो तो वैसी। कुछ-कुछ वैसा ही जैसे भारतीय परंपरा में छायावाद में श्रद्धा जैसी नारियां हमें दिखती हैं, जो केवल देने की बात करती हैं, अपने हक की बात बिल्कुल भूल के भी नहीं करती हैं।

हिंदी की स्थिति कुल मिलाकर मिरांडा जैसी है। आपको जब भी समझना हो कि हमारी भाषा किस हालत में है, तो हमारी भाषा द टेंपेस्ट की मिरांडा की हालत में है। ताकतवर है, पर उसको ताकत का एहसास नहीं है। समझदार है, पर उसको किसी ने बताया नहीं कि तुम कितनी समझदार हो। खुद फैसले कर सकती है, पर उसके नाम पर फैसले लेने वाले खुद इतने समझदार नहीं हैं कि उसके महत्व का अनुमान कर सकें। अपने ही मठाधीश से घिरी हुई, अपने ही परिवार के ओल-जलूल निर्णय करने वालों की दासी बनी हुई, कुछ-कुछ वैसी स्थिति।

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ कि हिंदी बहुत ताकतवर भाषा है, लेकिन हम बिना बात के डरते हैं? कुछ उदाहरण से बात समझ लेते हैं। और जब भी कोई आपसे पूछे कि हिंदी का भविष्य क्या है, हमेशा ध्यान रखना है, किसी जटिल प्रश्न का उत्तर एक नहीं होता है। हाँ या ना में नहीं होता है। उसका उत्तर बहुत सारे पहलुओं में होता है। और जब तक आप किसी जटिल प्रश्न को चार-पांच सरल प्रश्नों में तोड़ नहीं लेंगे, तब तक उस प्रश्न का उत्तर आप ठीक से दे ही नहीं पाएंगे।

इसलिए, जब भी कोई आप पूछे कि क्या हिंदी का कोई भविष्य है, या हिंदी का भविष्य कैसा है, तो हिंदी कोई एक वस्तु नहीं है। हिंदी में बहुत सारी चीजें आती हैं। मसलन, आपको बताना पड़ेगा कि बोलचाल की भाषा के रूप में हिंदी का भविष्य क्या है? राजभाषा के रूप में, ऑफिशियल लैंग्वेज के रूप में हिंदी का भविष्य क्या है? राष्ट्रभाषा के रूप में क्या है? संपर्क भाषा के रूप में क्या है? ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में क्या है? व्यापार की, वाणिज्य की, नौकरी की दुनिया में उसका भविष्य क्या है? और जब तक इन सारे प्रश्नों पर अलग-अलग आप चार वाक्य बोलने की स्थिति में नहीं हैं, तब तक हिंदी के भविष्य की बात कैसे करेंगे?

मसलन, क्या हिंदी का भविष्य बोलचाल की भाषा के रूप में है, या हम खत्म होने वाले हैं? यदि कोई आपसे कहे कि हम खत्म होने वाले हैं, उस मूर्ख की बात को बिल्कुल मानने की जरूरत नहीं है। वो निरा मूर्ख व्यक्ति होगा जो ऐसी बात कर सकता है। तथ्यों पर ध्यान देना है। हिंदी समाज की बुरी आदत है कि हम तथ्यों पर नहीं, अफवाहों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। तथ्यों पर ध्यान देना है। जनगणना निकाल के देख लीजिए। 1991 में प्रथम भाषा के रूप में हिंदी बोलने वालों की संख्या भारत में 39% थी। कुल 83 करोड़ आबादी थी, उसमें से लगभग 32 करोड़ के आसपास हिंदी प्रथम भाषा के रूप में बात कर रहा हूँ, मैं मातृभाषा।

2001 के सेंसस में यह परसेंटेज 39 से बढ़कर 41 हो गया, 41% हो गया। 2011 के सेंसस में जब हमारी आबादी 121 करोड़ हो गई, प्रथम भाषा के रूप में हिंदी बोलने वालों की परसेंटेज 43.6 हो गई। इसका सीधा सा मतलब है कि 53 करोड़ लोग, 52-53 करोड़ लोग भारत में हिंदी को मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। और अंग्रेजी को मात्र भाषा के रूप में कितने बोलते हैं? भारत में 2700000, 0.02%। 43.6% और 0.02% के बीच में अगर आपको ऐसा लगने लगे कि हमारी भाषा का अस्तित्व खतरे में है, तो मेरा ख्याल है कि हमारा दिमाग खतरे में है।

2021 से सेंसस हो नहीं पाया है, अब होगा, उम्मीद है कि 24 में हो जाएगा। हमारी आज के समय 143 करोड़ की है, अनुमान जो है अगले साल तक 145 के आसपास होनी चाहिए। 145 करोड़ में प्रथम भाषा के रूप में हिंदी बोलने वालों की संख्या अनुमान है कि 45 से 46% अगले साल होने वाली है। और जिसका मतलब यह है कि लगभग मान के चलिए कि 64 से 66 करोड़ के बीच में मातृभाषा बोलने वाले हिंदी समाज के लोग होने वाले हैं। अगर आपको लगता है कि 65 करोड़ लोगों की मातृभाषा खत्म होने वाली है, तो इससे हास्यास्पद क्या हो सकता है? कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, कल्पना भी नहीं करनी चाहिए इस चीज की।

फिर सवाल उठता है कि क्या हम दुनिया में बहुत कमजोर हैं? भारत की जनगणना सर्वेक्षण में 31 भाषाओं की बात होती है। दुनिया के सर्वेक्षण में 7115 भाषाओं की बात होती है। 7115 भाषाओं में आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 150 भाषाएं ऐसी हैं जिनको बोलने वालों की संख्या 10 से कम है। कुल 10 व्यक्ति, पांच व्यक्ति बोलते हैं, छह बोलते हैं, चार बोलते हैं, दो बोलते हैं, एक बोलता है, 10 बोलते हैं। 150 भाषाएं ऐसी। लगभग साढ़े 5000 से 6000 भाषाएं ऐसी जिनको बोलने वालों की संख्या एक लाख से कम है। और पूरी दुनिया में 800 करोड़ की आबादी में हिंदी का स्थान जानते हैं कौन सा? बोलने वालों में तीसरा स्थान।

[प्रशंसा] 7000, 7115 भाषाओं में जो भाषा तीसरे नंबर पर है, उसके बोलने वाले परेशान हैं कि हम खत्म होने वाले हैं। आप उनका हाल सोचिए जो 10 से कम पर चल रहे हैं, जो एक लाख से कम पर चल रहे हैं, 10 लाख से कम पर चल रहे हैं। और हम दुनिया की पूरी आबादी में 8% से ज्यादा जिस भाषा को बोलने वाले लोग हैं, हमसे ज्यादा केवल अंग्रेजी और मंडारिन दो ही भाषाएं हैं, जो 16 और 14% पर हैं। और हम नंबर तीन, 8% पर हैं। ना फ्रेंच हमसे आगे, ना स्पेनिश हमसे आगे है। और जितनी भाषाओं का नाम आप जानते हैं, वो सब हमसे कोसों पीछे हैं। इसलिए बोलचाल की भाषा, सांस्कृतिक भाषा, सामाजिक भाषा के तौर पर हिंदी पर ना खतरा है, ना खतरा आने की संभावना है। इसको मन से एकदम निकाल दीजिए, दूर-दूर तक निकाल दीजिए।

दूसरी बात है कि क्या हम व्यापार की भाषा, व्यवसाय की भाषा, नौकरी की भाषा में सफल हो पा रहे हैं? थोड़ा मुश्किल है, कम हो पा रहे हैं। और मेरे ख्याल से इसकी वजह हमारा एक औपनिवेशिक जो सोचने का तरीका है, वो है। मैं हिंदी के पक्ष में इसलिए बिल्कुल नहीं बोलूंगा कि मैं संयोग से हिंदी भाषी क्षेत्र में पैदा हुआ हूँ। क्योंकि मेरे पेरेंट्स हिंदी भाषा के अध्यापक रहे। अगर मैं सिर्फ इसलिए हिंदी के पक्ष में बोलूंगा, तो तो सामान्य बात है, हर व्यक्ति अपनी भाषा के पक्ष में बोलता है। मैं बोल रहा हूँ, मैं तथ्यों पर बात करना पसंद करूंगा, केवल भावनाओं पर नहीं टिकना चाहूंगा।

मैंने दुनिया के जितने देश देखे, मैंने किसी देश में मातृभाषा की उतनी बुरी गत नहीं देखी जितनी अपने देश में देखी। मेरे कुछ परिचित डॉक्टर बनने के लिए रशिया गए, पढ़ने के लिए यूक्रेन गए, पढ़ने के लिए। तो मैंने उनसे पूछा, मैंने कैसे पढ़ते हो भाई? वहां कौन सी भाषा पढ़ाते हैं? अंग्रेजी पढ़ाते हैं? बोले नहीं, रशियन में पढ़ाते हैं। मेडिकल साइंस यूक्रेन में, यूक्रेन की भाषा में पढ़ाते हैं। रशियन मेडिकल साइंस। लगभग हर देश में वैसा हाल है। तो मैंने उनसे पूछा कि फिर आप कैसे पढ़ते हैं? आपको तो भाषा नहीं आती है। तो बोले, नहीं, वहां का निश्चित सा नियम है कि पहले साल में हमें भाषा सीखनी होती है, फिर अगले चार साल में उस भाषा में सीखना होता है। तो मैंने कहा, इससे अच्छा वो अंग्रेजी में सिखा दे आपको, अंग्रेजी आती है। बोले, नहीं, वहां तो ऐसी बात करने से भी नाराज हो जाते हैं। अपनी भाषा को लेकर बहुत सम्मान करते हैं वो लोग। वहां पढ़ाई की भाषा वही है जो उनके समाज की भाषा है। अंग्रेजी भी है, रिसर्च में है, जहाँ जरूरत है, अंग्रेजी भी है, अंग्रेजी के विभाग हैं, वो भी एक भाषा के तौर पर है। पर जब उनको अपने यहाँ पढ़ाना होता है, तो इंश्योर करते हैं कि वो पढ़ाई उनकी अपनी भाषा में। दुनिया के हर देश में ऐसा होता है। तो हमारे ऐसा क्यों नहीं होता?

और ये बात केवल हिंदी की नहीं है, तमिल की भी है, तेलुगु की भी है, गुजराती, मराठी की भी है। मेडिकल साइंस पढ़ने के लिए हमें अंग्रेजी में ही मेडिकल साइंस क्यों पढ़ना पड़ेगा? इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए हमें अंग्रेजी में ही क्यों पढ़ना पड़ेगा? और मुझे खुशी है इस बात की कि हमारी केंद्र सरकार में गृह मंत्री ने पिछले साल एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। मध्य प्रदेश पहला ऐसा राज्य बना है, जहाँ मेडिकल साइंस, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई हिंदी में शुरू हो गई है। और किताबें, किताबें भी तैयार हो गई हैं इंजीनियरिंग की भी, मेडिकल साइंस की भी।

ऐसी कौन सी रॉकेट साइंस है इसमें? ऐसा कौन सी आश्चर्य की बात है? एक ही तनाव हो सकता है कि भाई, आप जब बात करेंगे टर्म्स की, तकनीकी शब्दों की बात करेंगे, तो तकनीकी शब्दों को आप दूसरी भाषा में आराम से नहीं ला सकते, क्योंकि उस भाषा में उतने शब्द विकसित नहीं हुए। कोई बात नहीं, आप बीमारियों के नाम, लेबोरेटरी के टेस्ट के नाम वैसे के वैसे अंग्रेजी में स्वीकार कर लीजिए। उसको देवनागरी लिपि में लिख लीजिए, जैसे आप वहाँ पर लिखते ही होंगे। अब हिंदी भाषा में रोमन मैसेज करते ही हैं, मतलब अंग्रेजी की लिपि में हिंदी लिखते ही होंगे कई बार। तू कहाँ जा रही है? टी यू के। अब तो आपने और छोटा कर दिया। के एच ए कहाँ हो गया? उसी में जा में जे से ही काम चल जाता होगा। आर एच से रही हो जाता होगा। और एच से है हो जाता होगा। इसी को भाषा का अपभ्रंश बनना बोलते हैं, जो आजकल हम नरे से बना रहे हैं। क्या समस्या है? मेडिकल साइंस की पूरी किताब हिंदी में हो और उसमें अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल वैसा का वैसा हो, इसमें क्या परेशानी है?

और जब भाषा हम सीखते हैं, आपको आश्चर्य होगा। मैं फिर कह रहा हूँ, मैं तथ्य की बात करूंगा, रिसर्च की बात करूंगा, भावनाओं की बात नहीं करूंगा। दुनिया में स्थापित सिद्धांत, यूनेस्को पीछे पड़ा हुआ है इस चीज के लिए। दुनिया में स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी बच्चा दुनिया का जितनी आसानी से अपनी भाषा में सीख सकता है, दूसरी भाषा में सीख ही नहीं सकता। इसमें एक्सपेरिमेंट हुए, बहुत सारे। जो लेटेस्ट एक्सपेरिमेंट हैं, उनमें से एक आप सर्च कीजिएगा। इथियोपिया में 1994 में एक्सपेरिमेंट हुआ। वो जो करने वाले, नाम है उनका व्यक्ति का नाम इरे सईद ऐसा कुछ नाम है, बहुत प्रसिद्ध। इथ 1994 मदर टंग इतना करके सर्च कर लीजिए, तुरंत सामने आ जाएगा। उस व्यक्ति ने बहुत गंभीर रिसर्च की। 1994 में इथियोपिया ने, जो कि एक अफ्रीकन देश है, क्या किया? एक नियम बनाया कि हमारे सारे स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा हमारी भाषा में दी जाएगी और चौथी क्लास के बाद हम बच्चों को अंग्रेजी में शिफ्ट करेंगे। दो ऑप्शन थे। एक है कि बचपन से पढ़ाएं, एक चौथी क्लास के बाद अंग्रेजी में शिफ्ट कर दें। क्योंकि उच्च शिक्षा के मामले में अंग्रेजी ज्यादा कारगर भाषा थी, वहाँ भी थी, यहाँ भी है, आज भी है कई मामलों में। इतना ही चेंज किया कि नर्सरी से नहीं पढ़ाएंगे, चौथी क्लास तक पढ़ाएंगे अपनी भाषा में। अंग्रेजी भी हल्का-फुल्का सिखाते रहेंगे और जब अंग्रेजी में एक ठीक-ठाक स्तर आ जाएगा, फिर मीडियम चेंज कर देंगे। वो रिसर्च आज की दुनिया में एजुकेशन साइंस की सबसे प्रामाणिक रिसर्च मानी जाती है और साबित करती है कि बच्चों की अटेंडेंस बढ़ने से लेकर, बच्चों की समझदारी बढ़ने से लेकर, बच्चों की जिज्ञासा बढ़ने से, बच्चों की पढ़ाई में रुचि बढ़ने से लेकर, और बच्चों की अपने परिवार, अपने समाज, अपनी संस्कृति के साथ लगाव बढ़ने के स्तर तक, हर मामले में मातृभाषा में पढ़ाई करने से बेहतर स्थितियां बनीं।

मैं फिर कह रहा हूँ, यह बात हिंदी की नहीं है, यह मराठी की भी है, तेलुगु की भी है, तमिल की भी है। मुझे दया आती है उन बच्चों पर जिनमें मेरा बच्चा भी शामिल है। मैं भी उसी समाज की पैदाइश हूँ, उसी समाज के दबाव मुझ पर भी काम करते हैं। और ये रिसर्च मैंने संयोग से अपने बच्चे के प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ी। पहले पढ़ी होती, तब भी मैं क्या करता? दिल्ली में आपको एक अच्छा स्कूल मिलेगा ही नहीं, जो मात्र भाषा में पढ़ाता हो। एक ऐसा माहौल है। मुझे दया आती है उन बच्चों पर। घर में जब 9-10 महीने के होते हैं या तीन साल के जब होते हैं, तब वो स्कूल जाना शुरू करते हैं। ढाई साल का बच्चा अपनी भाषा में कॉम्प्लिकेटेड भी पढ़े-लिखे। आप घरों में देखिए, छोटे बच्चों को अच्छे से वाक्य बोलेंगे। और ढाई साल का बच्चा तो नए वाक्य बनाने लगता है, वो भी जटिल वाक्य, सरल वाक्य नहीं। उस बच्चे की इतनी गहरी पकड़ एक भाषा में हो चुकी है, एक भी दिन स्कूल नहीं गया है। और इसलिए मातृभाषा का अध्यापन जब स्कूल में होता है, टीचर को पता होता है कि बच्चे को भाषा पहले से आती है, इसे दुरुस्त करना है, सिखाना नहीं है, जीरो से। और वो बच्चा बड़े अच्छे मूड से स्कूल गया, उससे मम्मी को टाटा किया, स्कूल जाकर पता लगा टाटा नहीं बोलना, बाय बोलना है। उसकी दुनिया खिसक जाती है, उसके पैर के नीचे से। वहाँ उसे पता लगता है कि भिंडी नहीं है, यह लेडी फिंगर है। तुम जो लाए हो, आलू नहीं है, पोटेटो है। रोटी नहीं है, ब्रेड है। ठीक ब्रेड तो वो होती है, नहीं, वो सब ब्रेड होती है। समोसा है ही नहीं इंग्लिश में। उसको पता लगा कि होता ही नहीं है। तो और वो बेचारा एक अजीब सी कशमकश में है। उसे अपनी भाषा में सीखना था कि जीरो क्या होता है, संख्या क्या होती है, एक क्या होता है। उसे अपनी भाषा में सीखना था कि सरकार क्या होती है, दुनिया क्या होती है, चलती कैसे है। उसे सीखना पड़ रहा है कि पहले यह समझो कि दुनिया नहीं, वर्ल्ड होता है। अब उसकी आधी से ज्यादा ऊर्जा वर्ल्ड पर अटकी हुई है। और बाकी बची-खुची ऊर्जा से वो समझ रहा है कि वर्ल्ड होता क्या है। उसकी आधी ऊर्जा लगी नंबर शब्द याद करने में, ना कि यह समझने में कि संख्या क्या होती है, नंबर क्या होता है।

एक अजीब सी साजिश दुनिया भर में चल रही है कि दुनिया के हर बच्चे को उसकी मातृभाषा से बचपन में ही वंचित कर दो। उसे एक ऐसी भाषा में सिखाओ, जहाँ उसके लिए भाषा सीखना अपने आप में च हो। और इसलिए आप देखेंगे कि अगर ज्ञान की दुनिया में दुनिया भर की भाषाओं के आम आदमी शिरकत नहीं कर पा रहे हैं, गलती से भी यह मत सोचिए कि दिमाग वाले लोग बहुत कम होते हैं और वही आगे बढ़ते हैं। दिमाग वाले अधिकांश लोगों को बचपन में ही खत्म कर देने की साजिश दुनिया भर में चल रही है। और जो अपनी भाषा में पढ़ ही नहीं पाएगा, वो कैसे आगे बढ़ेगा? कैसे सीखेगा?

मैंने दसवीं क्लास तक हिंदी माध्यम से पढ़ाई की है। उसके बाद अंग्रेजी सीखी है, ठीक से सीखी है। अंग्रेजी मुझे कहीं कोई समस्या नहीं आती है। इसमें क्या कोई परेशानी है? मैं आज भी अपनी भाषा में गीत सुनने में ज्यादा खुश होता हूँ। मुझे फिल्म देखनी है, हिंदी में पसंद करता हूँ। नाटक देखना हो, हिंदी पसंद करता हूँ। मजाक करना हो, हिंदी में पसंद करता हूँ। पढ़ना हो, कोई ऐसा विषय जो हिंदी में नहीं है, तो इंग्लिश में पढ़ता हूँ। इसमें क्या परेशानी है? लेकिन मुझे कोई बचपन से ही मजबूर करे कि मुझे दूसरी भाषा में। संयोग से अंग्रेजी, फ्रेंच भी हो सकती थी, पुर्तगाली भी हो सकती थी, जो जीत जाता, उसकी भाषा ढो रहे होते। ज्ञान-विज्ञान की दुनिया में मेरा निजी विश्वास है, इस वर्चस्व को तोड़ना बहुत जरूरी है।

हम हिंदी में हजारों शब्द क्रिएट नहीं कर पाएंगे दो दिन में, सही बात है, मुश्किल है। और हमें इतना शुद्धतावादी या पटन होने की जरूरत नहीं है कि हम सारे शब्द अपने ही गढ़ें। हम तो इंटरनेट को अंतर्जाल ही बोलेंगे, हम कंप्यूटर को संगणक ही बोलेंगे, तो आप अकेले ही बोलते रहेंगे, कोई पूछेगा नहीं आपको। जो शब्द अंग्रेजी के प्रसिद्ध हो गए, उनको मान लीजिए। जापानी भाषा का शब्द है रिक्शा। आप रोज रिक्शा में घूमते हैं। कभी आपने कहा कि रिक्शा को मैं नरयान बोलूंगा? कई लोग बोलते हैं नरयान, कि मनुष्य द्वारा चलने वाला एक विमान या वाहन। क्या बकवास है? अरे, जो शब्द जिस भाषा से आया, प्रसिद्ध हो गया, अपना लीजिए उस शब्द को। और उसके बाद भाषा में असली समस्या शब्द नहीं होती है। भाषा विज्ञान में एक होता है, जिसको मॉर्फोलॉजी कहते हैं। एक सीमेंटलॉजी होता है। लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण स्ट्रक्चर है, सिंटेक्स है। सिंटेक्स का मतलब है, वाक्य का निर्माण कैसे होता है? शब्दों का क्रम कैसे तय होता है? किसी नई भाषा को सीखने में सबसे बड़ी मुश्किल आती है सिंटेक्स सीखने में। आप हिंदी भाषा के सिंटेक्स में अंग्रेजी के शब्दों को शामिल कर लेंगे, रति भर समस्या नहीं आएगी।

और इसलिए, जिसको हम कहते हैं कि अंग्रेजी माध्यम में और हिंदी माध्यम में कहने-कहने की बातें हैं। मैं अंग्रेजी माध्यम में बच्चों को खूब पढ़ाता हूँ, आठ-आठ घंटे दिन में पढ़ाता हूँ। और वहाँ भी देखता हूँ कि जैसे कोई मुश्किल कॉन्सेप्ट आता है, जब तक अंग्रेजी में पढ़ाने के बाद हिंदी में भी ना समझा दूं, उनके चेहरे पर 12 बज रहते हैं। क्योंकि वो हिंदी भाषी समाज के, बचपन से लगातार हिंदी बोलने-समझने वाले और अंग्रेजी माध्यम लेकर एक ज्ञान की भाषा के तौर पर अंग्रेजी पढ़ने वाले व्यक्ति हैं। हंसी-मजाक हिंदी में हो, तो ठहाके मार हँसते हैं। इंग्लिश में हो, एकद हँसता है, बाकी इसलिए हँसते हैं कि हँसने की बात थी, तो हम भी हँस लेते हैं। नहीं बात बनती। मन की भाषा, आत्मा की।

भाषा अलग भाषा होती है। ज्ञान की भाषा अलग भाषा होती है। इसमें कहां कोई दिक्कत है? और इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि ज्ञान, विज्ञान की भाषा के तौर पर, व्यवसाय की भाषा के तौर पर जबरदस्ती एक वर्चस्व का दौर चल रहा है, जो खत्म होना चाहिए।

मुझे खुशी है कि हमारी वर्तमान सरकार इस मामले में... मैं किसी राजनीतिक दल से ताल्लुक नहीं रखता हूं। मुझे ना सरकार का समर्थक माना जाए, ना विरोधी माना जाए, क्योंकि मैं सच में दूरी बना के रखता हूं, बहुत दूर बना के रखता हूं। मैं मुद्दों पर तारीफ करता हूं, मुद्दों पर आलोचना करता हूं। भाषा के मामले में वर्तमान सरकार बेहतर काम कर रही है, यह सही बात है। कई स्तरों पर हमने देखा है।

मेडिकल साइंस मध्य प्रदेश से शुरू हुआ। एक ही साल में एमपी में, यूपी में, उत्तराखंड में शुरू भी हो गया। और मैं कई साल से सोचता था कि मेडिकल साइंस में ऐसा क्या है जो हिंदी में नहीं पढ़ सकते? सोचिए, डॉक्टर बनने के बाद करना क्या है आपको? आपको डॉक्टर बनके आम आदमी का इलाज करना है। भारत की आम आदमी की हालत क्या है? डॉक्टर के पास जाता है, उसको एक वाक्य समझ में नहीं आता है। डॉक्टर चार लाइन इंग्लिश के बोलता है, कुछ मुश्किल शब्द बोलता है, तो वह मान लेता है कि ज्ञानी आदमी है, ठीक बोल रहा होगा। उसे अपनी हेल्थ के बारे में एक वाक्य ठीक से समझ में नहीं आता है।

किसी विकसित देश में चले जाइए, डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है कि जब तक मरीज सारी बातों को ठीक से ना समझ ले, तब तक इलाज शुरू नहीं कर सकता। हमारे देश में भाषा का अंतर ऐसा है कि मरीज अपनी बीमारी को ठीक से कभी समझ ही नहीं पाता है। ऑपरेशन तक की सहमति ले लेते हैं अंग्रेजी बोल के। वह समझ नहीं पा रहा है, हा तो हो गया, साइन कर, साइन कर। उसमें क्या लिखा हुआ है कि तुम्हारा ऑपरेशन करेंगे, तुम मर भी सकते हो, मर गए तो तुम्हारी जिम्मेदारी है। पता ही नहीं उस बेचारे को।

क्यों भारत का हर डॉक्टर तमिलनाडु का डॉक्टर तमिल में क्यों ना बात करे पेशेंट के साथ? कर्नाटक का डॉक्टर कन्नड़ में बात करें, हिंदी का डॉक्टर हिंदी में बात करें। और अंग्रेजी मातृभाषा वाले जो 27 हजार लोग हैं, उनके लिए कुछ डॉक्टर इंग्लिश वाले रख लीजिए। डॉक्टर की भाषा तो समाज की भाषा होनी चाहिए। यही कानून के साथ है। हमारी जुडिशरी, इतना जबरदस्त जुडिशल फ्रीडम, जुडिशल इंडिपेंडेंस, संविधान का मूल ढांचा है, सब बातें बढ़िया है। पर जिस देश की आबादी में 2700 हज लोग अ मातृभाषा वाले हो, उस देश का सुप्रीम कोर्ट सारे निर्णय अंग्रेजी में ही देगा, यह कहां का लोकतंत्र है? यहां आपका जो जुडिशियस है या जुडिशियस बिलिटी है, वह कहां चली जाती है?

उस समय आपके सुप्रीम कोर्ट में मधु लिमय नाम के व्यक्ति जिद करते हैं कि मैं हिंदी में अपनी बात रखूंगा। आप उनको परमिशन देने के बाद नकार देते हैं कि हमसे गलती हो गई, ऐसा नहीं कर सकते हैं। मेरे देश में, मेरे सुप्रीम कोर्ट में अपनी भाषा में आप बोल भी नहीं सकते? आप 28 राज्यों में से केवल चार राज्यों में हिंदी में हाई कोर्ट में बात करने की परमिशन देते हैं। पर लोकतंत्र का मतलब क्या होता है? कुछ गिने चुने लीट्स के हिसाब से जनता अपनी भाषा बदलेगी, या जनता की भाषा से प्रशासक भाषा बदलेंगे अपनी? अगर लोकतंत्र है तो लोकतंत्र में जनता की भाषा ही केंद्र में होनी चाहिए। कोई और भाषा केंद्र में कैसे हो सकती है?

पर हम लोग इतने आदि हो चु चुके हैं, हम स्लेव मेंटालिटी के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि हम यह प्रश्न कभी नहीं करते। हमारे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस या कोई जज हिंदी में क्यों नहीं बात कर पाते? और नहीं कर पाते, मैं सिर्फ मैं फिर बार-बार कह रहा हूं, मामला सिर्फ हिंदी का नहीं। मेरी इच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे जजेस में कुछ को तमिल ठीक से आती हो, कुछ को तेलुगु अच्छे से आती हो, कुछ को मराठी आती हो, कईयों को हिंदी आती हो। और बेंच का फैसला करते हुए यह भी एक पॉइंट ध्यान में रखा जाए कि मामला कहां का है और उस मामले में ऐसे जज को प्राथमिकता मिले जो उस भाषा को जानता हो। ताकि केस मेरा है, मुझे हिंदी आती है, मेरा वकील अंग्रेजी में कुछ कुछ बोला, जज ने कुछ कुछ बोला, फैसला हो गया, मुझे पता ही नहीं कि क्या हुआ। और इ में पुलिस आगे मुझे ले गई और मैं परेशान हूं कि हुआ क्या? मेरे मामले के किसी प्रसंग में मेरी भूमिका ही नहीं है, क्योंकि सारी प्रक्रिया दो ऐसे व्यक्तियों के बीच में चल रही है जिनके पास एक भाषा है जो मेरी भाषा नहीं है, जबकि मामला मेरा है। और कहने को लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र नहीं है, यह भाषा के स्तर पर तानाशाही है। बुरी चीज है।

और मैं जब भी यह बात कहता हूं, बार-बार कहता हूं। ज्ञान की भाषा के तौर पर अंग्रेजी का सम्मान करना जरूरी है, क्योंकि रिसर्च आप उसके बिना नहीं कर पाएंगे। बहुत मामलों में सीखने की जरूरत है, उससे भी, जपनीज से भी, फ्रेंच से भी, सबसे सीखने की जरूरत है। लेकिन आपके देश के सुप्रीम कोर्ट में, हाई कोर्ट में आपकी भाषा बात ना होती हो, यह बुरी बात नहीं है, शर्मिंदगी की बात है। हमें एक समाज के तौर पर शर्म आनी चाहिए। यह उससे कम बात नहीं है।

इसलिए जब कोई मुझसे कहते कि राजभाषा के तौर पर आपकी क्या कल्पना है? 14 सितंबर का दिन आज है। हम आज के दिन ये सेमिनार क्यों कर रहे हैं? 14 सितंबर 1949 को शाम को 6 बजे एक फैसला हुआ था। एक अजीब सी अफवाह लोगों ने उड़ा रखी है। कहते हैं कि 14 सितंबर को मतदान हुआ कि भारत की राजभाषा कौन सी होनी चाहिए, हिंदी या अंग्रेजी? जी, वोटिंग हुई, आधे वोट हिंदी के पक्ष में उठे, आधे अंग्रेजी के पक्ष में उठे, एकदम बराबर हो गया। कई लोग संख्या बोलते हैं, 77, 77 हो गया। और तब स्पीकर ने, डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपना कास्टिंग वोट दिया, क्योंकि उनके पास अधिकार है कि वोट डाल सकते हैं, लास्ट में अगर बराबर हो जाए, तो हिंदी के पक्ष में दिया और इससे हिंदी भारत की राजभाषा हो गई। इससे बड़ा कोई झूठ नहीं है। ऐसा कुछ नहीं हुआ था। संविधान सभा में सफेद झूठ।

12 सितंबर को शाम 4 बजे इस मुद्दे पर बहस शुरू हुई। संविधान सभा की डिबेट पढ़ के देखिए, 180 पेज की डिबेट है राजभाषा की। 180 पेज, एक दो पेज का मामला नहीं है। संविधान सभा के वॉल्यूम नाइन में ध्यान से पढ़िए, पेज नंबर लगभग 1130 से 1390 के आसपास का मामला है। 180 पेज की डिबेट है। उसमें खूब मुद्दे हैं। छोटी-मोटी वोटिंग हो रही है। के मामलों में। संविधान सभा का बेसिक उसूल था कि अंतिम रूप से वोटिंग नहीं करेंगे, सहमति से काम करेंगे। वोटिंग बीच-बीच में होती रही। पहला विवाद यह था कि राजभाषा कौन सी हो? हिंदी हो की अंग्रेजी हो या हिंदुस्तानी हो? अंग्रेजी पर तो बात थी नहीं। हिंदी या हिंदुस्तानी? महात्मा गांधी हिंदुस्तानी कहते थे, पर 1949 में वह थे नहीं। उनका हिंदुस्तानी का मतलब था हिंदी-उर्दू का मिक्सचर, जो देवनागरी और फारसी में लिखी जा सके। दूसरा स्कूल ऑफ थॉट हिंदी की बात करता था। अंत में सहमति बनी, हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। राजभाषा यानी सरकारी कामकाज की भाषा।

दूसरा सवाल था कि लिपि कौन सी हो? देवनागरी हो? कुछ ने कहा देवनागरी और फारसी हो कि हिंदी को फारसी में भी लिख सके। कुछ ने कहा देवनागरी और रोमन हो, हिंदी को रोमन में जैसे ट में लिखते हैं, वैसे लिख सके। खूब विवाद हुआ। अंत में हुआ कि देवनागरी ही लिपि होगी। तीसरा विवाद यह हुआ कि जो हिंदी वाले जो एक से जीरो से नौ तक के अंक हैं, वह हम अंग्रेजी के ढांचे में लिखेंगे, हिंदी के ढांचे में लिखेंगे? इस पर मतभेद था। सबसे ज्यादा इस पर वोटिंग में बराबरी हुई थी और अंत में वोटिंग से नहीं, संविधान सभा के बाहर की बातचीत में समझौता हुआ। मुंशी साहब थे, केएम मुंशी थे, आयंगर साहब थे, उनकी बातचीत में समझौता हुआ कि ठीक है, अंतरराष्ट्रीय अंक मान लेंगे। और उसके बाद गहमागहमी के बाद, दो घंटे रिसस के बाद, 14 सितंबर शाम 6 बजे आखिरी सेशन इस मामले पर हुआ। ढाई दिन की बहस के बाद और तब ध्वनि मत से, बिना किसी वोटिंग के प्रस्ताव पारित हुआ कि हिंदी भारत की राजभाषा होगी, देवनागरी उसकी लिपि होगी और अंकों का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप उसका स्वरूप होगा।

इस झूठ को मन से निकाल दीजिए। यह झूठ मैंने भी हजार बार सुना था, अपने अध्ययन के दौरान। हमारे अध्यापकों को भी ऐसा लगता था, मुझे भी ऐसा लगता रहा कई साल तक। संविधान सभा की डिबेट बड़ तब समझ में आया कि यह श है। ऐसा कुछ नहीं हुआ था। पूरी सहमति के साथ भारत की राजभाषा हिंदी बनी थी 14 सितंबर को और इसलिए आज के दिन को हम लोग हिंदी दिवस मानते हैं। और क्यों ना बनती? आप सोच, क्यों ना बनती? दुनिया में दो तरह के देश हैं। एक इंग्लैंड जैसा है, फ्रांस है, स्पेन है, जर्मनी मान सकते हैं। आज के समय के जर्मनी मान सकते हैं, उस समय का तो नहीं, आज के जर्मनी मान लीजिए। आप ग्रीस को मान लीजिए। यह सब देश वो हैं जो एक देश, एक भाषा वाले लोग हैं। बांग्लादेश को मान लीजिए, बांग्ला बोलते हैं। एक देश, एक भाषा है। पर कुछ देश ऐसे होते हैं जहां एक भाषा नहीं होती है। स्विट्जरलैंड में देखिए, छोटा सा देश है, तीन राज भाषाएं वहां पर हैं। बेल्जियम में देखिए, छोटा सा देश है, पर वहां भाषाएं एक से ज्यादा चलती हैं।

तो उस समय डिबेट थी कि भारत का मॉडल कौन सा होगा? क्या हम इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी के मॉडल पर चलेंगे या हम स्विट्जरलैंड और बेल्जियम के मॉडल चलेंगे? तो क्योंकि भारत में भाषाएं बहुत ज्यादा थी, उस समय हमने 14 भाषाओं को संविधान में स्थान दिया। शुरू में 13 को दिया, बाद में एक और जोड़ दिया। तो अब तो र 22 भाषा अनुसूची में। डिबेट यह थी कि भारत की राजभाषा कौन सी हो? ऐसे मामले में दो ही फैसले हो सकते हैं। एक तो यह हो सकता है कि भाई जितनी महत्वपूर्ण भाषा, सबको बना दो। अगर सबको बनाएंगे तो हर डॉक्यूमेंट 10 भाषा में बनेगा, वह आसान काम नहीं है। दूसरा लोकतंत्र में क्या तरीका है? जिस भाषा को बोलने वाले, समझने वाले सबसे ज्यादा हैं, उसको बना दीजिए। यही सहमति बनी।

स्वाधीनता संग्राम में हिंदी को राष्ट्र भाषा, राजभाषा बनाने की बात किन लोगों ने की? आपने कभी गौर किया है? हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के सबसे बड़े समर्थक कौन थे? महात्मा गांधी, गुजरात के थे। केएम मुंशी, गुजरात के थे। पटेल, गुजरात के थे। आज भी गुजरात के दो लोग लगे हुए हैं। हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा बनाने की जो बात आई है, हिंदी समाज से ही नहीं आई है। महात्मा गांधी गुजराती व्यक्ति होकर हिंदी के पक्ष में सबसे ज्यादा पड़े हुए थे। महाराष्ट्र में तिलक थे, सावरकर थे, वह मराठी की बात नहीं कर, वह हिंदी की बात कर रहे थे। पंजाब में लाला लाजपत राय थे। आप बंगाल में जाएंगे, केशव चंद्र सेन से परंपरा शुरू होती है, सुभाष चंद्र बोस तक परंपरा जा रही है। वह सब हिंदी की बात कर रहे थे। पूरे भारत में, दक्षिण भारत तक में यह सहमति बन गई थी। महात्मा गांधी ने पूरी एक संस्था खड़ी की, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा। कितने साल तक काम करते रहे वहां पर, एक सहमति बनाई पूरे देश में। क्योंकि इतना बड़ा स्वाधीनता आंदोलन बिना एक भाषा के नहीं चल सकता। बेबीलोन की कथा बन जाती, बाबल जैसी कि सब लोग अलग भाषाएं बोलते हैं, लड़े कैसे अंग्रेजों से? इसलिए कांग्रेस ने 1915 के आसपास से ही भाषा पर काम करना शुरू किया और यह मान लिया कि जब तक अंग्रेजी में काम करेंगे, वकीलों का आंदोलन रहेगा, जनता का नहीं बनेगा। वह वकीलों का आंदोलन जनता का आंदोलन तब बना जब लोक भाषाओं में लड़ा गया और लोक भाषाओं में सबसे बड़ी भूमिका हिंदी की रही।

आज अगर कोई मुझसे पूछे कि भारत में कौन सी राजभाषा या संपर्क भाषा बन सकती है? आप डाटा देखिए, सेंसस को देखिए। हिंदी बोलने वालों की कुल संख्या, पहली, दूसरी, तीसरी भाषा के तौर पर भारत में कितनी है? इस समय 69 करोड़ है। 2011 के सेंसस में 57% ऑफ पॉपुलेशन। भारत की फर्स्ट, सेकंड, थर्ड, फर्स्ट लैंग्वेज में 43.6% है। तीनों मिला ले, 57%। 69 करोड़ संख्या है। क्यों है? 10 राज्य हिंदी भाषा वाले हैं। फिर वह सारे राज्य जो संस्कृत से ही बने हैं, वह हमारे ननिहाल के हैं। इसलिए आप महाराष्ट्र जाएंगे, क्योंकि मराठी संस्कृत से बनी है, आपको मराठी हिंदी में दिक्कत नहीं आती, क्योंकि दोनों की रूट सेम है। यही गुजराती में है, यही पंजाबी में है, यही सिंधी में है, यही असमिया में है, यही ओडिया में है, यही बांग्ला में है। यह सातों राज्यों की भाषाएं संस्कृत के रूट से बनी हुई हैं। इसलिए हमारी रूट सेम होने से दिक्कत नहीं आती है। केवल दक्षिण भारत की चार-पांच, चार भाषाएं मुख्य रूप से और उत्तर पूर्व की असम की आगे की भाषाएं। उत्तर पूर्व में भी आप अरुणाचल प्रदेश जाइए, हिंदी में कहीं कोई दिक्कत नहीं है। अरुणाचल प्रदेश में बड़ा आश्चर्य की बात है कि हिंदी सब बोलते हैं। अंडमान निकोबार जाइए, हिंदी सब बोलते हैं। वहां पर कहीं कोई समस्या नहीं। हैदराबाद में हैदराबादी हिंदी चलती है। मुंबई मराठी क्षेत्र होकर हिंदी का गढ़ बना हुआ है। और जो दक्षिण के चार राज्य हैं, उनमें भी क्योंकि दसवीं क्लास तक हिंदी आमतौर पर स्कूल में पढ़ाई जाती है। तमिलनाडु में कुछ गांवों को छोड़ देंगे, मैं पूरा भारत ठीक से घूमा हुआ हूं और मुझे आज तक हिंदी से काम चलाने में दिक्कत नहीं आई।

69 करोड़ की आबादी, 121 करोड़ में से। आज 145 करोड़ है, यह संख्या मिनिमम आप मान के चलिए कि 75 करोड़ के आसपास होने वाली है, 80 करोड़ होने वाली है। इस 69 करोड़ अगर 2011 की बात मान लूं तो तुलना में कौन है? नंबर दो पर कौन आता है? बांग्ला। हिंदी में कितना है? 57% है। बांग्ला में कितना है? 9% है। आप किसे बनाएंगे राजभाषा, भारत की संपर्क भाषा किसे बनाएंगे? 57% के बाद सीधा 9%। नंबर तीन पर मराठी आती है। अभी आ गई है। पहले नंबर तीन पर तेलुगु थी। अब मराठी आ गई है। कितना है? 8.7% है। नंबर चार पर तेलुगु है, 8% के आसपास है। यानी एक भाषा बोलने वाले 57%, नंबर दो वाले 9%, 8.7%, 8%, 6%, 4%, 3%। क्या लोकतांत्रिक तरीके से कोई कंपटीशन बनता है किसी तरह का? और संपर्क भाषा? संविधान लिखे या ना लिखे, संविधान में लिखा भी नहीं है। संविधान में कहीं नहीं लिखा कि भारत की संपर्क भाषा कौन सी है। ना लिखा भारत की राष्ट्र भाषा कौन सी है। केवल लिखे भारत की राजभाषा कौन सी है। 14 सितंबर को हुआ था, उस समय आर्टिकल 301 था। लेकिन जब संविधान फाइनल हुआ तो आर्टिकल 343 से 351 तक का हिस्सा, जो अंतिम प्रारूप संविधान का बना, उसमें राजभाषा का भाग 17 है, जो प्रारूप में भाग 14 था। इसलिए हमें डरने की जरूरत नहीं है। हम स्वाभाविक तौर पर भारत के भाषा के डेमोग्राफी के नक्शे में सबसे बुलंद आवाज हैं, तो हमारी आवाज की पहचान होनी चाहिए। हमें खौफ किस बात का होना चाहिए? क्यों मिरांडा बनने की जरूरत है भाई? अपने धस में रहिए, आत्मविश्वास से भर के रहिए।

और इसलिए आप भारत में कहीं चले जाइए, भारत का हर ऑटो वाला, टैक्सी वाला अपनी भाषा और काम चलाऊ हिंदी जानता है, क्योंकि उसको पता है कि भारत में काम करने के लिए बहुत मुफीद है, सहज है कि हिंदी आ गई तो अब सबसे काम चला लेते हैं। और इसी हिंदी संपर्क भाषा बनती है। राष्ट्र भाषा की पदवी संविधान में नहीं है। हमें उसकी ऐसी जिद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हम पर एक आरोप है, हमें उससे बचना चाहिए। हमें भाषा का सम्मान करना है, दूसरी भाषाओं का अपमान नहीं करना है। हमें भाषा के लिए संघर्ष उस तरह से नहीं करना कि सबको काट देंगे, मार देंगे। हमें यह नहीं कहना कि अंग्रेजी खत्म करो, तेलुगु खत्म करो, तमिल खत्म करो। नहीं, सबके साथ रहना है। जैसे संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री सारे मंत्रियों के बराबर किंतु उनसे एक पायदान ऊपर होता है, क्योंकि वह डिवीजन करता है। ठीक वैसे भारत की सारी भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं। तमिल भी राष्ट्र भाषा है भाई, तेलुगु है, मराठी है, कन्नड़ है, असमी है, सब राष्ट्र भाषाएं। इन सब में सबसे ज्यादा हमारी भाषा बोली जाती है, तो सिंबॉलिकली हम थोड़े ज्यादा राष्ट्र भाषा हैं, क्योंकि पूरा राष्ट्र हमें समझ पाता है। पर जिस दिन आपने यह तेवर अपना हटा लिया, अभी तेवर क्या है? आप बीच-बीच में बाकी भाषाओं के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, बड़ा खराब लगता है। अगर आप दक्षिण भारत की भाषाओं का विरोध करेंगे और फिर कहेंगे कि वह हिंदी सीखें, कोई मजाक है क्या? आत्मसम्मान क्या केवल हम में होता है? उनमें नहीं होता है।

एक भी व्यक्ति का आत्मसम्मान बिल्कुल भी प्रभावित ना हो, अगर इस तेवर के साथ अपनी भाषा को आगे लेकर बढ़ेंगे, तो भाषा आगे बढ़ेगी। हिंदी को संविधान सभा ने और संसद ने कम बढ़ाया है, शाहरुख खान ने ज्यादा बढ़ाया है, अमिताभ बच्चन ने ज्यादा बढ़ाया है। और आज की दुनिया में तेवर बदला है, उसका जिक्र भी करता हूं। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि हिंदी सच में राष्ट्र भाषा बने, राष्ट्र भाषा संविधान में कोई शब्द नहीं है। गुजरात हाई कोर्ट ने 2010 में स्पष्ट निर्णय दिया है कि राष्ट्र भाषा की धारणा भारतीय संविधान में कहीं नहीं। राष्ट्र भाषा होती है, राष्ट्र की आत्मा की भाषा और आत्मा की भाषा संविधान से नहीं बनती है, आत्मा से बनती है, बातचीत से बनती है, संवाद से बनती है, सहमति से बनती है।

अगर आप सच में चाहते हैं कि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, नागालैंड, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय के लोग हिंदी सीखें, तो बड़े होने का फर्ज निभाए, आगे बढ़ के उनकी भाषा सीखिए। इसी को त्रिभाषा फार्मूला कहा गया था। 1948 में पहली बार कहा गया था और बेल्जियम और स्विट्जरलैंड से ही प्रेरणा ली गई थी। 1968 में संसद ने प्रस्ताव पारित किया की भाषा फार्मूले के लिए, पर हमने उसको ठीक से अपनाया नहीं। मैं कल्पना करता हूं कि हिंदी समाज के लोग अपने स्कूलों में, कॉलेजेस में अगर दक्षिण की पांच में से कोई एक भाषा या उत्तर पूर्व की कोई एक भाषा या बांग्ला मान लीजिए, इतनी भर सिखा दें। मुझे दुख है कि मैं नहीं सीख पाया। हमारे स्कूल में ऐसा नहीं था। तीसरी भाषा के नाम पर संसद सिखाई गई। मैं संसद का बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन तीसरी भाषा के तौर पर संसद सिखाई जाए, इस नीति के पक्ष में नहीं हूं, क्योंकि इससे वर्तमान में हमारा भला नहीं हो रहा। वर्तमान में भला तब होता जब मुझे मराठी सिखाते या तमिल सिखाते या मेघालय की भाषा सिखाते और मैं कम से कम तमिलनाडु जाकर वहां के ऑटो वाले से तमिल के चार वाक्य बोल देता, तो वह कहता कि अरे वाह, क्या बात है यार, फिर कहता कि मैं भी सीखूं। अभी उसको लगता है कि वाह बेटा, तुम तो सीखोगे के दो, हम सीखेंगे तीन। और इसलिए जब तक हम थोड़ा आगे बढ़कर उन भाषाओं को नहीं अपनाएंगे, तब तक यह उम्मीद करना कि वह हमारी भाषा को अपना लेंगे, जबरदस्ती की बात है। और जबरदस्ती हिटलर की नहीं चली, तो हमारी क्या चलेगी? ना किसी की चली है, ना दुनिया में चलेगी, यह मान के चलिए। लोकतंत्र का जमाना है, समझा बुझाकर, संवाद से, बातचीत से फैसले होंगे। फैसले जोर-जबरदस्ती नहीं होंगे।

आजकल एक नया तमाशा हिंदी बनाम उर्दू को लेकर चल रहा है। आजकल हिंदी वाले अलग ही मूड में चल रहे हैं, उर्दू को खत्म कर दो, मुसलमानों की भाषा है। भाषा किसी धर्म की नहीं होती है। तमिलनाडु का मुसलमान तमिल बोलता है, केरल का मुसलमान मलम बोलता है। और किसी भी समाज का व्यक्ति होगा, उसका धर्म कुछ भी हो, उसकी भाषा वही होगी जो उसके भौगोलिक क्षेत्र की भाषा है। उर्दू हिंदी समाज की भाषा है। मेरठ के इलाके में पैदा हुई है। हमारे हमारे मतलब हमारी गोद में पली भाषा, हिंदी की गोद में बनी है। उसका व्याकरण पूरा का पूरा खड़ी बोली हिंदी का व्याकरण है। पाकिस्तान ने उर्दू को आयात किया है, क्योंकि पाकिस्तान की जमीन पर उर्दू पैदा नहीं हुई। उर्दू मेरठ के आसपास पैदा हुई। पाकिस्तान ने इंपोर्ट किया उस भाषा को, अपनी भाषा को। हम इस तौर से बोलते खत्म कर देंगे? पहली बात तो ऐसा बोलना नहीं चाहिए। दूसरी बात कर भी नहीं पाएंगे। किसी के चाहने से भाषा खत्म नहीं होती। भाषाएं तब खत्म होती हैं जब भाषाओं का आत्मसम्मान मर जाता है। और जिस भाषा में आत्मसम्मान होता है, उसको मारने वाला कोई दुनिया में पैदा नहीं हुआ। किसी भाषा को आप खत्म कर देंगे, ऐसा मिजाज मत रखिए।

कुछ दिन पहले जावेद अख्तर साहब कहीं मंच पर बोल रहे थे। किसने उनसे यही सवाल पूछ लिया? उन्होंने एक बड़ा अच्छा शेर बोला। अगर मैं ठीक याद कर रहा हूं, उन्होंने कहीं बोला था। वह शेर और यह शेर उर्दू पर नहीं है, इसको हिंदी पर अप्लाई कर लीजिए। कोई आपको हिंदी में डराए, तो हिंदी पर अप्लाई कर लीजिए। शेर यह बोला, "उर्दू को हम एक रोज मिटा देंगे जहां से।" किसीने कहा कि हम उर्दू को खत्म कर देंगे।

उर्दू को हम एक रोज मिटा देंगे, जहाँ से यह बात भी कम बख्श ने उर्दू में कही है। अजीबो गरीब बातें हैं। हिंदी बोलने वाला 10 वाक्य बोल के दिखाए, उर्दू का एक शब्द इस्तेमाल ना करे। उर्दू बोलने वाला 10 वाक्य बोल के दिखाए, संस्कृत से बदला हुआ कोई शब्द इस्तेमाल ना करे, करके दिखा दे। पाकिस्तान के लोग करके दिखा दें।

मैं एक बार पाकिस्तान के नेताओं की भाषा सुन रहा था, बहुत ध्यान से सुना, नोट किया और मैंने पाया कि 100 शब्द बोलते हैं तो कम से कम 30 शब्द संस्कृत से बदले हुए शब्द बोलते हैं। और तेवर क्या है कि हम तो उर्दू वाले हैं। उर्दू बोलने वाला कितनी भी ताकत लगा ले, संस्कृत से बच ही नहीं सकता। हिंदी वाला कितनी भी ताकत लगा ले, उर्दू से बच ही नहीं सकता। इतने शुद्धता वादी मत बनिए कि आप अलग थलग पड़ जाएं। एक टापू पर अकेले खड़े हो। भाषा बढ़ती है साथ चलने से, ना कि एकदम शुद्ध होकर अलग थलग हो जाने से। अंग्रेजी में हर साल नए शब्द आते हैं। इतालवी भाषा का शब्द माफिया है, अंग्रेजी ने लिया। दुनिया भर के लोग बोलते हैं माफिया, माफिया, माफिया। इटालियन का शब्द है, अंग्रेजी ने प्रचारित किया उस शब्द को।

समोसा खा खा के हम पगलाए रहते हैं। समोसा हमारा अपना शब्द नहीं। हमारे बहुत सारे ऐसे शब्द जो हमारे मूल शब्द मानते हैं, वो हमारे शब्द नहीं है। हमने सीखे हैं, सीखना चाहिए। भाषा दुनिया का हर समाज भाषा बना रहा है, क्यों हम उन सबसे ना सीखे? और अंतिम बात यह है कि एक भाषा होती है मनोरंजन की भाषा। हिंदी का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता उस भाषा के तौर पर। जब से सोशल मीडिया है, उसने क्रांति कर दी है। आप ही लोगों ने और किसने की है? और सोशल मीडिया पर एक अलग तेवर है।

मैंने कल यहां आने के लिए सोचा कि थोड़ा सा तथ्य देख लूं, क्या लेटेस्ट ते हैं। यू ट्यूब की इंडिया की रिपोर्ट निकाली कि कौन सी भाषा में कितने व्यूवर्स देखते हैं। अगर आप यू ट्यूब पर ट्रेंडिंग वीडियोस देखेंगे तो ट्रेंडिंग की लिस्ट में एक तीर बना होता है, उसमें हर देश का अलग-अलग है। आप पाकिस्तान का देखें, चीन का देखें, कहीं का। चीन का तो खैर क्या देखेंगे, जिन देशों में चलता है वहां का देखें। इंडिया के ट्रेंडिंग वीडियोस में 50 में से लगभग 45 से 48 हमेशा हिंदी के ही आपको मिलेंगे। तो मैं सोचता था कि कहीं ऐसा खेल तो नहीं कि दक्षिण भारत का अलग चलता हो और उत्तर पूर्व का अलग चलता हो। तो मैंने ठीक से चेक किया, पूरे भारत का एक ही चलता है। तो कल मैंने रिपोर्ट निकाली भारत की और रिकॉर्ड बता रहा हूं मैं, जितने तथ्य दे रहा हूं, रिकॉर्ड हो रहा है, सारे चेक कर लीजिएगा। यू ट्यूब की भारत में जितने वीडियो बनते हैं, नहीं देखे जाते हैं। व्यू, व्यूअरशिप, व्यू टाइम 54% व्यूअरशिप हिंदी की है और अंग्रेजी की 16%। और ये ठीक क्या संख्या है? 2011 के सेंसस में हिंदी बोलने वाले भारत में कितने हैं? 57% है। 57% आबादी 54% वीडियो देख रही है। इसमें आश्चर्य क्या है?

ओटीटी की दुनिया में देख लीजिए। वाई-कॉम 18 जिसका वूट नाम से चैनल आता है, मतलब ओटीटी प्लेटफार्म आता है, उसने एक सर्वे कंडक्ट किया। उन्होंने खूब कोशिश की अंग्रेजी में की और भाषाओं में की और अभी कुछ दिन पहले उन्होंने एक निकाली अपनी रिपोर्ट और बताया कि हम ओटीटी पर कितने भी एक्सपेरिमेंट्स कर लें, ओटीटी में हिंदी की भागीदारी 50% से ज्यादा ही रहती है, कम नहीं होती है। अंग्रेजी की 15% है, बाकी सारी भाषाओं की मिलाकर 35%। फिर वही बात है, जिस देश में बोलने वाले 57% हैं, वहां 50% वीडियो क्यों नहीं देखेंगे? और मनोरंजन आज की दुनिया का उभरता हुआ सबसे बड़ा व्यवसाय है। यूट्यूबर नाम का व्यवसाय हमारे बचपन में तो नहीं था, आजकल यूट्यूबर है। मैं तो बहुत यूट्यूब से परिचित हूं, बड़े अच्छे तरीके से। दोस्त है मेरे, कितना वो मतलब उनके सामने आईएस लोग बेचारे परेशान हैं कि हम क्यों आईएस बने, यही बन जाते। मत, एक-एक महीने के 10 लाख, 20 लाख, 50 लाख, एक करोड़, तीन करोड़ रुपए कमाते हैं। साथ प्रसिद्ध है, बहुत ज्यादा। ऐसी दुनिया कहां किसने देखी थी? कोई है और अपनी भाषा की वजह से।

अच्छा इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला ज्यादा है। मैंने कुछ दिन पहले एक फिल्म में थोड़ा सा काम किया। उस फिल्म का नाम 12th फेल है, अभी आने वाली अगले महीने 27 अक्टूबर को आएगी। वो फिल्म, उसमें मेरी भूमिका स्क्रिप्ट राइटिंग में ठीक-ठाक थी और बाद में एक्टिंग भी मुझे करनी पड़ी। मेरा अपना ही रोल है, अपना ही कैरेक्टर है, छोटा सा है। ऐसा-ऐसा नहीं है कि मैं फिल्म का हीरो हूं, छोटा सा रोल है। कहीं आप जाएं और आपको बड़ी निराशा हो, थोड़ा सा है। तो मैं स्क्रिप्ट राइटिंग कर रहा था। फिल्म हिंदी की है। विधु विनोद चोपड़ा उस फिल्म के डायरेक्टर हैं और प्रोड्यूसर भी हैं। तो उन्होंने मुझसे कहा कि स्क्रिप्ट हमने लिखी है, लेकिन उसमें थोड़ा सा काम करने की जरूरत है। फिर तय हुआ कि हम फिर से स्क्रिप्टिंग करेंगे उस फिल्म के। तो करीब 70 सीन, जिनमें से अनुमान से 20-22 मैंने खुद लिखे हैं। वो बड़ा मुश्किल काम होता है। मुझे लगता था कि दो-चार दिन का काम होगा, लेकिन वो छह से आठ घंटे में एक सीन हो पाता था। तो दो-दो दिन में जाकर एक सीन पूरा होता था। बड़ा मुश्किल काम था। फिर खारिज भी होता था, उसमें फिर अमेंडमेंट होते थे। 100 बार तो फाइनल ही हुआ, फाइनल नंबर टू, फाइनल नंबर थ्री, ऐसे करते-करते फाइनल होता था।

इंटरेस्टिंग बात क्या है कि जब स्क्रिप्ट मेरे पास आई, ओरिजिनल हिंदी भाषा में पर रोमन म लिपि में थी। यानी फिल्म में जैसे मान लीजिए सीन है कि मनोज के हाथ में दोनाली बंदूक है, तो क्या लिखे? एम ए एन ओ जे के एच ए टी एच एम ई डी ओ एन ए एल आई डी ए एन डी ओ ओ के एच ए आई। अच्छा, मुझे हिंदी रोमन लिपि में पढ़ने में बड़ी बाधा होती है, दुविधा होती है। एक तो बात यहां से वहां हो जाती है। जैसे कोई ध और ढ का अंतर बता ही नहीं सकता। अगर मैं रोमन में लिखूं, कोई ऐसा शब्द हो जिसमें ध और ढ में कंफ्यूजन हो जाए। अब मैं कुछ भी करके नहीं समझ सकता कि डी एच ध है कि ढ है, क्योंकि वो लिपि मेरी भाषा के हिसाब से बनी नहीं है। ड़ अंग्रेजी में मैं कितनी भी कोशिश करूं, लिख ही नहीं सकता हूं। ण लिख ही नहीं सकता हूं। मैं हरियाणा में जा रहा हूं और मैं हरियाणा में बोल रहा हूं कि बालक इधर आ। बा बालक नहीं बोलते हैं, ल बोलते हैं, जो ड़ भी नहीं है, ल भी नहीं है, दोनों के बीच के साउंड है। अब मैं रोमन में कितनी भी कोशिश करके लिख नहीं सकता वो चीज। और एक्टर को बोलना क्या है? बालक सड़क नहीं लिख सकता हूं। एस ए आर ए के या एस ए डी ए के कैसे लिखूं? या तो उस लिपि को उसके फोनेटिक्स के हिसाब से चेंज करूं, जो फिलोसोफी में हम करते भी हैं, नहीं तो कैसे काम चले?

तो मैंने उनसे कहा, मैंने कहा सर, मैं देखिए मुझे बड़ी असुविधा होती है इसमें। मैं देवनागरी में लिखूंगा और आप कहेंगे तो मैं उसको रोमन में कर दूंगा बाद में, पर पहली बार मैं आत्मा में उतरने दूं उसे, देवनागरी में लिखने दूं। तो उनको आश्चर्य हुआ कि ऐसा भी होता है, क्योंकि उस इंडस्ट्री में आमतौर पर ऐसा नहीं होता है। तो मैंने देवनागरी में एक सीन लिखा, लिख के भेजा। नियम था कि मैं रोज रात को 3:00 बजे ईमेल करता था। मेरा शेड्यूल था 3:00 बजे सोने का, उनका था 5:00 बजे उठने का। तो 5:00 बजे उठकर पढ़ते थे और 6:00 बजे तक कमेंट्स आ जाते थे। फिर मैं उठने के बाद उसको ठीक करता था। तो जब पहली बार मैंने भेजा उनको हिंदी में सीन लिख के, तो नेक्स्ट वीडियो कॉल हमारी चल रही थी। अब सोचिए, विधु विनोद चोपड़ा, जो कि बहुत बड़े डायरेक्टर प्रोड्यूसर इस इंडस्ट्री के, पांच-छह लोग टीम में हैं, बड़े-बड़े लेखक हैं, डायरेक्टर, वो सब उस टीम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में हैं, सबके सामने क्या बोले? बोले यार, ईमानदारी की बात है, पढ़ के मजा आ गया। मुझसे काफी बड़े, मुझे छोटे भाई की तरह मानते हैं। बोले विकास, तू ऐसे लिख, ऐसे ही मजा आता है। और बाकी टीम को बोले कि तुम्हें इंग्लिश में करना हो, करना बाद में हम हिंदी में करेंगे। उसके बाद वह पूरी फिल्म हिंदी में लिखी गई, बाद में इंग्लिश में हुआ। जब शूटिंग हुई तो उसको इंग्लिश में कुछ एक्टर्स के लिए किया गया, क्योंकि एक्टर नहीं समझ पाता। विशेष रूप से मान लीजिए कोई एक्टर दक्षिण भारत से आ जाए, उसको हिंदी में फिल्म शूट करनी है, कैसे करेगा बेचारा? उसको रोमन में लिख के देते हैं। पर कुछ लोग हैं, अमिताभ बच्चन एक जमाने में ऐसा करते थे, आशुतोष राणा इस समय ऐसा करते हैं। मेरे मित्र हैं, कुछ दिन पहले बता रहे थे कि उनकी स्क्रिप्ट अभी भी हिंदी में लिखी हुई आती है, देवनागरी में लिखी हुई आती है। उनका तेवर है कि देवनागरी में पढूंगा, रोमन में नहीं, आत्मा पकड़ में आती है। तो करते हैं।

उसमें मेरा जो कहना है, वो ये कि मनोरंजन की दुनिया में इतने अवसर हैं और उन अवसरों में हिंदी का मुकाबला किसी भाषा में नहीं हो सकता है। बस थोड़ा सा अपनी ताकत का एहसास करिए, घबराइए मत, डरिए मत। हिंदी समाज की सबसे बड़ी समस्या एक ऐसा डर है जो बिना किसी वजह के। जो मिरांडा को था, वह योग्य थी, समझदार थी, पर उसको यह एहसास करा दिया गया था कि तुम सही फैसले नहीं कर सकती हो, तुम्हारे फैसले हम करेंगे। यह हिंदी समाज की बात है। और हिंदी समाज से मेरा निवेदन सिर्फ इतना है, किसी से नफरत नहीं करनी है, बाहें फैलाकर सबका स्वागत करना है। अंग्रेजी से भी मोहब्बत करनी है, उससे ज्यादा तमिल, तेलुगु से करनी है, उससे ज्यादा हिंदी से करनी है। और सब भाषाओं को साथ लेकर, उर्दू को भी साथ लेकर, आत्मविश्वास से भरकर, बिना किसी हीन भावना से युक्त होकर, सोशल मीडिया के इस नए उत्सव को मनाते हुए, व्यापार, व्यवसाय की दुनिया में, विज्ञापन की दुनिया में हिंदी की ताकत का एहसास करते हुए, जब अपनी भाषा का सम्मान करेंगे तो नजारा कुछ और होगा।

मैं राम विलास शर्मा, आपने नाम सुना होगा उनका, हिंदी के विद्यार्थी हैं। उन्होंने बड़ी गहरी बात कही थी। उनका एक कॉन्सेप्ट है, आपने पढ़ाई होगा, हिंदी जातीयता को लेकर उन्होंने खूब बात की। उन्होंने कहा कि भारत की अकेली हिंदी भाषा है जिसमें जातीयता की भावना कम है। जो मैंने कहा ना कि स्पेनिश लोगों में, डच लोगों में, उन सब में अपनी भाषा के सम्मान का भाव है। जर्मन में, फ्रेंच में, वो भाव आपको मराठी में दिखेगा, तमिल में, तेलुगु में, कन्नड़ में, ओडिया में, बांग्ला में, सब में दिखता है। अपनी भाषा को लेकर एक गरिमा का भाव, सम्मान का भाव। पता नहीं क्यों, वह हिंदी में नहीं दिखता है। थोड़ा लाइए कॉन्फिडेंस से रहिए। कोई अंग्रेजी में डराए मत, डरिए। भारत में कोई आपसे कहे कि तुमको इंग्लिश नहीं आती है, उतना ही तेवर से कहिए, तुमको हिंदी नहीं आती है। क्योंकि जिस देश में 57% आबादी हिंदी बोलती हो, अंग्रेजी सेकंड, थर्ड लैंग्वेज में अच्छी खासी है, 10% से ऊपर है। कुल मिलाकर अगर तीनों स्तरों को मिला ले तो हिंदी के एकदम, अंग्रेजी आती है। फिर बांग्ला आती है, 10.5% के आसपास है। क्योंकि सेकंड लैंग्वेज, थर्ड लैंग्वेज में अंग्रेजी का बोलबाला बहुत ज्यादा है। फर्स्ट लैंग्वेज में वो केवल 27 हजार लोगों की भाषा है। तो भी हिंदुस्तान में हिंदी नहीं आना और अंग्रेजी नहीं आना, अगर यह दोनों शर्मिंदगी की बातें हैं, तो ज्यादा शर्मिंदगी की बात कौन सी है? हिंदी ना आना। तो कोई अगर आपसे बोले कि मुझको हिंदी नहीं आता है, तो आप ऐसे बोलना कि मुझको अंग्रेजी नहीं आता है। और और थोड़ी बहुत आती है, मेरा काम चल जाता है। अगर मुझे खेती करनी है, तो मुझे अंग्रेजी क्यों चाहिए? अगर मुझे छोटा-मोटा उद्यम करने, अंग्रेजी क्यों चाहिए? हां, अगर मुझे सुप्रीम कोर्ट का वकील बनना है, तो अंग्रेजी चाहिए। अगर मुझे एकेडमिक्स में, रिसर्च में जाना है, माइक्रोबायोलॉजी में जाना है, तो अंग्रेजी चाहिए। और उसमें भी धीरे-धीरे क्यों ऐसा ना हो कि हिंदी में पढ़ने-लिखने की संस्कृति बने?

एक अंतिम निवेदन आपसे कर रहा हूं। हिंदी समाज को लेकर मेरी गंभीर शिकायत है कि हम पढ़ते-लिखते नहीं हैं। अफवाहें फैलाते हैं, अफवाहें सुनते हैं, प्रभावित होते हैं। थोड़ा पढ़िए, तथ्यों को देखिए, रिपोर्ट्स को पढ़िए। किसी भी मुद्दे पर जो तथ्य हैं, उनको समझकर अपनी राय बनाइए। दिमाग की खिड़कियां खोलिए। और मेरा मानना है कि एक समाज के तौर पर यदि हम ऐसे हो जाएंगे, तो हमारा सम्मान खुद-ब-खुद। केवल भारत का मसला नहीं है, पूरी दुनिया में होगा। धन्यवाद।

सर, मैं अंग्रेजी मीडियम की छात्रा हूं, पर मतलब मैंने स्कूलिंग भी इंग्लिश मीडियम से ही की है। तो वहां भाषा बहुत सरल होती थी, पर जब मैं दिल्ली में आई, फिर बहुत बड़ी कंफ्यूजन हो गई मेरे को। मैं मतलब मेरे को लगता है मैं इंग्लिश में फिट नहीं बैठ पाती, हिंदी में भी फिट नहीं बैठ पाती। फिर इसका कोई सलूशन ना मेरे को ढंग से मतलब इंग्लिश में चीज, हिंदी में चीज समझने में ज्यादा अच्छा लगता है, पर मेरा मीडियम इंग्लिश है और हिंदी में मुझे ज्यादा इतनी मतलब जो डीप वाली पकड़ होती है, वह नहीं है।

आपकी भाषा कैसी है, इसका फैसला दो-तीन तरीके से होता है। पहला यह कि आपका सिंटेक्स, यानी भाषा में जो व्याकरण के नियम हैं, वाक्य बनाना, समझना, जटिल वाक्य बनाना, उन सब में आप सहज हैं या नहीं। यह पहला सवाल है। और दूसरा यह कि उसमें जितने नए-नए शब्द आते हैं, वो आपको समझ में आते हैं या नहीं आते हैं। मेरे ख्याल से अगर आप अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी हैं, तो आपको अंग्रेजी में सिंटेक्स में दिक्कत नहीं होगी। टेंसेस समझ में आते होंगे। मुश्किल से मुश्किल वाक्य भी आपको समझ में आता है कि वाक्य कैसे बना हुआ है, लिख भी लेती होंगी आप। मेरे अनुमान से आपकी दिक्कत ज्यादा इसलिए कि शब्द इतने सारे नए अचानक आ रहे होंगे कि उन सब को समझ पाना मुश्किल होता होगा। तो मेरा अनुमान यह कि यह समस्या तो एक उर्वर भूमि है, अपनी भाषा को अच्छा करने का एक तरीका है। और पहले के लोग बोलते थे कि रोज पांच नए शब्द सीखो, वह एक आउटडेटेड कॉन्सेप्ट है। आज का कॉन्सेप्ट यह कि जो भी शब्द आपके सामने पहली बार है, उसे नोट कीजिए, उसे दो-तीन तरह से वाक्यों में इस्तेमाल कीजिए। और उस डायरी के शब्दों को रोज कोशिश करके, एक-दो, एक-दो शब्दों का इस्तेमाल करते रहिए। तो अंग्रेजी को अच्छा बनाने के लिए दो-तीन महीने काफी हैं। कोई रॉकेट साइंस छोड़ना है, भाषा ही तो है।

मलब मेरी समझ है कि कोई भी भाषा, चाइनीज को लेकर थोड़ा पशु पेश में रहता हूं। सामान्यतः कोई भी भाषा सीखने के लिए तीन से छह महीने पर्याप्त होते हैं, ठीक स्तर तक सीखने के लिए, चाहे वह अंग्रेजी हो, चाहे वह हिंदी हो। तो अगर आपने अंग्रेजी में पढ़ाई अपनी की है, शुरू कर दी है, तो अंग्रेजी में पढ़ें और शब्द बढ़ाएं। और वैसे अगर आपके टीचर क्लास के बाद अलग से उसी बात को थोड़ा हिंदी में समझा दे, तो शायद ज्यादा अच्छे से समझ में आएगा। और मैं अंग्रेजी माध्यम के बच्चों को देखता हूं, वो कहने को इंग्लिश मीडियम के, पर जब हिंदी में समझाओ तो ज्यादा समझते हैं। तो टेक्निकल वर्ड्स अंग्रेजी के, बाकी हिंदी में। अगर टीचर ना भी समझाए, मुझे नहीं पता यहां का तरीका क्या है। तीन-चार दोस्तों का ग्रुप बना लीजिए कि क्लास में जो समझा इंग्लिश में, चलो हिंदी में डिस्कस करते हैं। तकनीकी शब्द इंग्लिश के रखिए, उसमें भाषा हिंदी रखिए, तो समझ में आएगा ठीक से।

जी सर, धन्यवाद सर। जी सर, मेरा नाम अक्षा मिश्रा है और मैं हिंदी विभाग की द्वितीय वर्षीय छात्रा हूं। सर, पहले तो आपके वक्तव्य के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। इससे पहले मैंने आपको हंसराज महाविद्यालय में सुना, मुझे वहां सुन के बहुत अच्छा लगा, पर आज अपने महाविद्यालय में इतने पास से आपको सुनकर बहुत ज्यादा अच्छा लग रहा है। सर, मैं आपसे बहुत प्रभावित हूं और इतनी उम्र में भी आप आकर, आपके जो मुख मंडल पर तेज हमेशा रहता है, उसके लिए भी बहुत ज्यादा प्रभावित हूं। आपको क्या लगता है कि मैं 80 साल का हूं, 90 साल का हूं? नहीं सर। सर, मैं आपके यहां आने से पहले मैंने आपकी उम्र झगड़ा उठा है। थोड़ा राजनीतिक पक्ष है, लेकिन मैं जानना चाहूंगी आपके विचार कि आज भारत जो भारत है और इंडिया शब्द है, इसको लेकर बड़ा विवाद छेड़ रहा है और जो मीडिया है, वह इस पर बड़ा मिर्च मसाला लगा के बताती है कि सरकार से पूछती है कि यह जनता जानना चाहती है, बल्कि जनता दोनों नामों में सुखी है। तो इस पर आपके क्या विचार हैं? क्या हमें उस इंडिया शब्द को अपना लेना चाहिए या दोनों ही हमारे लिए बेहतर हैं?

देखिए, मैं फिर कहूंगा कि मुद्दों को ना अलग करके समझना पड़ेगा। पहली बात, यह विवाद इस समय क्यों उठा? इसके पीछे राजनीतिक कारण है, आपको भी पता है, मुझे पता है। मेरी अपनी समझ यह है कि दो तरह से मुद्दे को देखने। पहली बात, यह उठा क्यों? और दूसरी बात, सही क्या है, गलत क्या है? यह उठा क्यों? इसके पीछे राजनीतिक पृष्ठभूमि, पूरा देश जानता है, आप भी जानती हैं, मैं भी जानता हूं। पर कोई मुद्दा राजनीतिक वजह से उठा, इसलिए मुद्दा ही गलत है, ऐसा नहीं होता है। राजनीति कई बार गलत काम करती है, कई बार सही काम कर देती है। और जनता के दबाव में अगर सही काम हो ही जाए, राजनीतिक वजह से ही हो, तो भी क्या बुरा है?

अब आते हैं इस सवाल पर कि भारत और इंडिया में से क्या सही है? संविधान सभा में इस पर खूब बहस हुई थी। यह हमारे संविधान का अनुच्छेद एक है और उसमें लिखा हुआ है, इंडिया दैट इज भारत शैल बी यूनियन ऑफ स्टेट्स। बड़ी इंटरेस्टिंग बात है कि उस समय डिबेट थी कि भारत का नाम भारत रखें या इंडिया रखें। कुछ लोगों ने आर्यव्रत भी कहा, आर्यव्रत कहा, कुछ ने हिंदुस्तान कहा, सब नाम चले। अंत में सहमति बनी कि नहीं, भारत और इंडिया ही ठीक है। नेहरू जी ने खुल के तो नहीं, पर नेहरू जी के पर्सपेक्टिव से जो बात वहां पर ज्यादा आई, वो यह थी कि हमारे संविधान के बनने की प्रक्रिया में जो बहुत सारे एक्ट थे, जो अंग्रेजों ने बनाए थे, जैसे इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 का है, 1935 का एक्ट था, उन सब में इंडिया का इस्तेमाल था। उस समय के भारत की तरफ से जो समझौते अंतरराष्ट्रीय थे, उन सब में इंडिया नाम था। पश्चिम की दुनिया हमें इंडिया के नाम से जानती थी, अमेरिका हो, फ्रांस हो, कोई भी हो, सब इंडिया जानते थे। नेहरू जी का मिजाज जो था, वो यह भी था कि हमें ग्लोबल पर्सपेक्टिव में चीजों को देखना है, पूरी दुनिया से संवाद करना है, क्योंकि उनकी रुचि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों में ज्यादा थी, बहुत ज्यादा थी। मेरे ख्याल से इन सब वजहों से तय हुआ कि हम अपना नाम इंडिया रखेंगे, पर इंडिया के बराबर महत्व का भी रहेगा। तो लिखा गया, इंडिया दैट इज भारत, इंडिया जो कि भारत है, राज्यों का एक संघ होगा।

चार दिन पहले की बात है, मैं हॉलैंड में एक टैक्सी में बैठा हुआ था। इंटरेस्टिंग मत सोच के देखिए, टैक्सी का ड्राइवर मोरक्को का रहने वाला था। उसको जैसे ही पता लगा मैं भारत से हूं, उसने मुझसे यही सवाल पूछा। उसने कहा, ओके, यू आर फ्रॉम इंडिया? मैंने कहा, यस। वी आर लिसनिंग टू ए डिबेट, इंडिया और भारत। व्हाट डू यू थिंक? मैं बड़ा चकित की ये मोरक्को का आदमी हॉलैंड में रहता है, इसके मन में ये सवाल आ रहा है। तो मैंने कहा कि यह तो राजनीतिक कारणों से हुआ है, लेकिन बात अपने आप में सही है। मैंने कहा, जैसे बॉम्बे मुंबई हुआ, मुझे खुशी हुई, क्योंकि मुंबई की आबादी के लिए मुंबई में जो मजा है, बॉम्बे में नहीं। बॉम्बे तो अंग्रेजों ने नाम दिया था। कोलकाता को कोलकाता, अंग्रेजों ने किया, तो बंगाल के लोगों ने कोलकाता कर दिया उसको। दिल्ली को दिल्ली के लोगों ने दिल्ली कर दिया, दिल्ली बना के रखा हुआ है। डी आई डबल एल आई। यह होना चाहिए, कहे कि दिल्ली भाई, हम क्यों दिल्ली बोलेंगे? दिल्ली को। यह सारे तर्क अगर सही हैं, अगर बर्मा का नाम म्यांमार होना सही है, क्योंकि उनकी जनता की आवाज तो म्यांमार में है, बर्मा में नहीं है। श्रीलंका और सीलोन की डिबेट में, वो अपने आप को सीलोन ना मानना चाहिए, श्रीलंका मानना चाहे, क्योंकि उनकी भाषा श्रीलंका बोलती है। तो मेरे मन में सवाल बड़ा साफ आता है कि भारत इंडिया क्यों होना चाहिए? मैं फिर स्पष्ट कर दूं, मैं सरकार के पक्ष में नहीं बोल रहा हूं, मुझे उनसे रत्ती भर मतलब नहीं। मैं एक विचार की बात कर रहा हूं। और मैं जब संविधान पढ़ाया करता था, अनुच्छेद एक पढ़ाते हुए, मैं हमेशा बोलता था कि मुझे चुभन होती है यह पढ़ते हुए कि इंडिया दैट इज भारत। दोनों ही लिखने थे, तो भारत दैट इज इंडिया कर देते। अगर दोनों ही लिखने थे।

थे, ठीक है। दोनों रख। क्या दिक्कत है? इंटरेस्टिंग बात इसके बाद है। मोरक्को के उस ड्राइवर ने उसके बाद पता है क्या कहा? हिंदी में अगर बताऊँ, बोले, "अच्छा, अच्छा, यह मामला है। अब समझ में आया।" फिर बोले कि बड़ी इंटरेस्टिंग बात है। हमारा नाम मोरक्को पड़ गया फ्रेंच लोगों की वजह से। मोरक्को के लोग मोरक्को को मगरिब बोलते हैं। और जब मैं सऊदी अरब गया, सऊदी अरब के लोगों ने मुझसे पूछा, "कहां से आए हो?" मैंने कहा, "मोरक्को।" उन्होंने इस भाव से देखा कि मैं पागल हूँ। बोले, "नहीं, मगरिब से आए हो।" अगर मगरिब की आबादी खुद को मगरिब कह के खुश है, तो उसे फ्रेंच लोगों की वजह से मोरक्को क्यों कहा जाए? इंडिया शब्द वेस्ट ने दिया और बुरे भाव से दिया। उनकी नजर में इंडियन होने का मतलब है बहुत पिछड़ा हुआ होना। रेड इंडियंस, वेस्ट इंडियंस। तो आज यह क्यों हुआ? मैं समझता हूँ कि राजनीतिक नेता और उस राजनीति में रुचि जरा सी भी नहीं है। लेकिन यह आज हो या कभी भी हो, मैं इस पक्ष में हूँ कि देश का नाम देश की भाषा में होना चाहिए। और देश की भाषा भारत के पक्ष में है। आप इंडिया भी रख लीजिए, इंडिया दैट इज भारत के बदले भारत दैट इज इंडिया मेरी पहली पसंद होगी। मुझे इंडिया से दिक्कत नहीं है, पर भारत मेरी पहली मोहब्बत है।

नमस्ते सर, मेरा नाम अदिति सिंह है और मैं हिंदी ऑनर्स की हूँ। मेरा सवाल आपसे यह है कि अगर आपको भारत का एजुकेशन मिनिस्टर बनने का अवसर मिले, तो आप हिंदी को लेकर कौन से नए बदलाव करना चाहेंगे या कौन सी नई पॉलिसी को इंट्रोड्यूस करना चाहेंगे?

पहली बात तो ऐसा होगा नहीं है ना। कोई मुझे क्यों बनाएगा? लेकिन अगर मैं इस हाइपोथेटिकल सिचुएशन में चला ही जाऊँ कि मैं भारत का शिक्षा मंत्री बन जाऊँ। इसमें एक समस्या यह है कि भारत में शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। समवर्ती सूची का मतलब है कि केंद्र सरकार के पास शक्तियां सीमित हैं, राज्यों की अपनी शक्तियां हैं। तो सबसे पहली बात, मैं राज्यों पर थोपूंगा कुछ भी नहीं। मैं सारे राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के साथ संवाद करूँगा। मैं उन सबको प्रेरित करूँगा, समझाऊँगा। मैं उनसे कहूँगा कि तमिलनाडु में मेडिकल साइंस तमिल में होनी चाहिए, कर्नाटक में कन्नड़ में होनी चाहिए, हिंदी क्षेत्र में हिंदी में होनी चाहिए। हिंदी में नहीं, इंग्लिश में होनी चाहिए। ऐसी कन्नड़ प्लस इंग्लिश में होनी चाहिए। तकनीकी शब्द अंग्रेजी में रहें। और वह शिक्षा सिर्फ मेडिकल साइंस क्यों? इंजीनियरिंग भी, लॉ में भी, जुडिशरी में भी। मैं यह भी चाहूँगा कि भारत के हर एग्जाम में, केंद्र के हर एग्जाम में अंग्रेजी और हिंदी का समान महत्व होना चाहिए। और राज्य स्तरीय हर परीक्षा में उस राज्य की राज भाषाओं का सम्मान होना चाहिए। महाराष्ट्र पीसीएस में मराठी की भूमिका अंग्रेजी से कई गुना ज्यादा होनी ही चाहिए, क्योंकि वहां के एसडीएम को, डीएसपी को मराठी लोगों से बातचीत करनी है। और यदि किसी राज्य में दो-तीन राज भाषाएं हैं, तो वहां की परीक्षा में उन दोनों-तीनों राज भाषाओं की परीक्षा होनी चाहिए, ताकि वह व्यक्ति सेवाओं में आए जो उन भाषाओं को बोल सकता है। कुछ ऐसे प्रयास।

और तीसरी बात, अभी हमें शिक्षा पर बजट हम बहुत कंजूसी से खर्च करते हैं। हमारा ज्यादा बजट सेना पर खर्च होता है और चीजों पर होता है। मजबूरी वह भी है। सेना को हम नहीं छोड़ सकते, क्योंकि सुरक्षित होंगे तो पढ़ेंगे। अगर युद्ध हो गया, किताब फेंक के तो मारेंगे नहीं। तो हमें यह हथियार चाहिए ही चाहिए। युद्ध तो करना ही पड़ सकता है। पर मैं चाहूँगा कि शिक्षा पर हमारा खर्च बढ़े। एक ऐसी हिंदी में समस्या क्या होती है? और यह हिंदी के साथ बाकी भारतीय भाषाओं में आपको हर विषय में अच्छे अध्यापक ही नहीं मिलते हैं। अच्छे अध्यापक क्यों नहीं मिलते? क्योंकि अच्छे कॉलेज ही नहीं हैं। अच्छे कॉलेज क्यों नहीं हैं? क्योंकि अच्छे शिक्षक पहले बने ही नहीं थे। अच्छे शिक्षक क्यों नहीं बने थे? क्योंकि उनको पता था कि नौकरी मिलेगी नहीं। अगर नौकरी इंग्लिश में ही मिलेगी, तो लोग इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ेंगे। इस बच्ची ने अभी-अभी कहा कि मैं अंग्रेजी माध्यम में, मुझे हिंदी ज्यादा समझ में आती है। पर यह अंग्रेजी माध्यम में क्यों है? क्योंकि नौकरी का संकट है। एक मजबूरी है कि नौकरी इंग्लिश में मिलेगी। अगर भारत सरकार ठान ले और राज्यों की सरकारें ठान लें, अपनी-अपनी भाषाओं में पढ़ाई-लिखाई की संस्थाएं करें। राम विलास शर्मा जी ने कहा था कि हर जिले में एक विश्वविद्यालय होना चाहिए, अपनी भाषा में। आंध्र प्रदेश के हर जिले में एक तेलुगु विश्वविद्यालय हो, जो उस जिले की विशेषताओं को केंद्र में रखकर ज्ञान-विज्ञान-कौशल का विकास करता हो। यह हिंदी पट्टी में होना चाहिए। हर जिले में विश्वविद्यालय हो, छोटा ही हो, एक विश्वविद्यालय हो। उस जिले में खेती कैसे अच्छी हो सकती है? उस जिले में उद्योग कैसे पनपेंगे? स्टार्टअप कैसे होगा? उस पर रिसर्च वहां पर हो, वहां की भाषा में हो, वहां के किसान को समझ में आती हो।

और देखिए, अनुवाद की दुनिया बड़ी समृद्ध हो चुकी है। आज से 4 साल पहले गूगल ट्रांसलेट करने पर हंसी आती थी। आज क्रिएटिव ट्रांसलेशन छोड़ दीजिए, तथ्यों का अनुवाद। मैं तो अक्सर, लगभग रोज इस्तेमाल करता हूँ। हम जिस संस्था में काम करते हैं, दृष्टि में, हमारी राजभाषा हिंदी भी, अंग्रेजी भी है। और मैं सुनिश्चित करता हूँ कि हमारी संस्था में जितने भी नोटिफिकेशन, पहले हिंदी में आते हैं, फिर अंग्रेजी में आते हैं। मैं खुद बनाता हूँ, दोनों भाषाओं में बनाता हूँ। पहले हिंदी में गूगल ट्रांसलेट पर जाता हूँ, एक सेकंड में अनुवाद हो जाता है। फिर उसको चेक करता हूँ। आश्चर्य आपको होगा कि पहले 40-50% सही होता था। आजकल 95-97% सही होता है। मुश्किल से दो साल रुक जाइए, यह मामला 100% का होने वाला है। जिस दिन 100% का हो गया, उस दिन हिंदी वालों का यह बहाना खत्म हो जाएगा कि हिंदी में कंटेंट नहीं है। आपको अंग्रेजी का जो अखबार पढ़ना है, आज से दो साल बाद पता क्या होगा? आप नेट पर जाएंगे, द हिंदू मान लीजिए पढ़ना है आपको। आप द हिंदू पर जाएंगे, नीचे क्या लिखा होगा? कौन सी भाषा में पढ़ेंगे? सारी भाषाओं के नाम होंगे, यहाँ तक स्पेनिश और फ्रेंच भी लिखा होगा। अब हिंदी क्लिक करेंगे, पूरा अखबार हिंदी में आएगा आपके सामने। फिर क्या बहाना बचता है? दुनिया की जो भी किताब पढ़नी है, एक टैबलेट आपके पास होगा या बुक रीडर होगा। दुनिया की जो किताब पढ़नी हो, अपनी भाषा में आप पढ़ेंगे। और अनुवाद की समस्या रत्ती भर नहीं होगी। मुश्किल से पांच से 10 साल के बाद ऐसी डिवाइसेस... कंट्रोल था, वहां हर चीज पोलिश भाषा में लिखी हुई थी। कहीं-कहीं अंग्रेजी थी। अब समझ में नहीं आ रहा कैसे पढ़ूं। गूगल... दो-तीन साल बाद क्या होगा? ऐसे हेडफ़ोन और माइक आ जाएंगे। आप अपने कंप्यूटर से या फोन से कनेक्टेड हैं। एक पोलिश व्यक्ति या मान लीजिए डच व्यक्ति आपसे बात कर रहा है, नीदरलैंड्स का। उसको केवल डच आती है, मुझे केवल हिंदी आती है। मैंने अपने फोन में डच से हिंदी सेट कर दिया। उसने अपने फोन में हिंदी से डच सेट कर दिया। वह डच बोल रहा है, मेरे हेडफ़ोन में जो माइक है, वो उसको सुन रहा है। कंप्यूटर कनेक्टेड है, फोन कनेक्टेड है। मेरा फोन तुरंत उसको हिंदी में कन्वर्ट करके मुझे हिंदी में सुना रहा है। मैं हिंदी बोल रहा हूँ, उसे डच में सुन रहा है। और यह मैक्सिमम अगले पांच साल का मामला है। पांच साल बाद बेबीलोन की मीनार बन जाएगी। पांच साल बाद आप दुनिया की किसी भी भाषा के साहित्य को, साहित्य में थोड़ी दिक्कत आ सकती है। ज्ञान-विज्ञान की बात कर लेते हैं। किसी भी भाषा के ज्ञान-विज्ञान को आसानी से पढ़ सकेंगे।

अगर मैं शिक्षा मंत्री बन गया, जो कि मैं नहीं बनूंगा, मैं जानता हूँ, क्योंकि लोग क्लिप काट के चलाएंगे कि देखो, बनना चाह रहा है। है ना? अगर ऐसा कभी हुआ, तो मैं सुनिश्चित करूँगा भारत के हर विश्वविद्यालय में हर ज्ञान की चीज हर भाषा में उपलब्ध हो। और 20-20 साल लगेंगे। जिस दिन हिंदी, मराठी, तमिल बच्चों को समझ में आ गया कि उनकी भाषाओं में भविष्य है, वह अपनी भाषाओं में पढ़कर आग लगा देंगे। ऐसी रिसर्च करेंगे, अभी हम कल्पना नहीं कर सकते हैं। और जिस दिन सारी भाषाओं में आत्म-सम्मान का भाव आ गया, रिसर्च होने लगी, पढ़ाई होने लगी, उसके बाद आप देखिए फिर क्या होता है? क्यों आपको उच्च अध्ययन के लिए केवल जेएनयू या अशोका समझ में आता है, जहां अंग्रेजी में ही चीजें मिल पाती हैं? क्यों ऐसा नहीं होता कि कुछ ऐसे विश्वविद्यालय हों, जहां हिंदी में इतने स्तर के ज्ञान की बातें होती हों, जो दुनिया के बेस्ट यूनिवर्सिटीज के लेवल की बातें हैं? क्यों हार्वर्ड जैसा स्ट्रक्चर हिंदी में नहीं बन सकता? यह नहीं बन सकता? एकदम बन सकता है। लेकिन सरकार को 20-20 साल ताकत लगानी होगी, एक विजन रखना होगा। और जो तकनीक हमारे जमाने में आ चुकी हैं, उन तकनीकों के होते हुए यह बिल्कुल मुश्किल काम नहीं है। एकदम आसान काम है। बस एक विजन हो, ढ़ इच्छा शक्ति हो और 20-20 साल का समय, एक पीढ़ी गुजरने का समय। आप ऐसे चेंजेज दो दिन में नहीं कर सकते। एक पीढ़ी लगती है और हर पीढ़ी के साथ वो चेंजेज आपको नजर आते हैं। मैं यह करूँगा।

बहुत-बहुत शुक्रिया सर। अब मैं धन्यवाद ज्ञापन हेतु हमारे विभाग प्रभारी चंदा मैम को आमंत्रित करना चाहूंगी। आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। विकास जी के इतने शानदार व्याख्यान के बाद धन्यवाद ज्ञापित करना मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती है, लेकिन मैं करूंगी। विकास जी, आपने इतनी लंबी यात्रा कराई है कि मुझे समझ नहीं आ रहा कि किस सूत्र को पकड़ूं और किसको छोड़ूं। आपने जो मिरांडा के कैरेक्टर से हमारे विद्यार्थियों को परिचित कराया है कि उसकी ताकत क्या है, उसका आत्मविश्वास क्या है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हमारे बच्चों में, जो हिंदी भाषियों में, जो हिता बोध है, वह आज इस ओडी से जब निकलेंगे ना, तो मुझे पूरा विश्वास है कि आपके मुख मंडल की आभा हमारे विद्यार्थियों के मुख पर होगी। यह मैं पूरे विश्वास से कह सकती हूँ। तो मैं सबको हृदय से एक बार धन्यवाद देती हूँ। और चूंकि मुझे पता है कि विकास जी की अगली मीटिंग है, इसलिए मुझे बात समेटनी पड़ रही है। और आत्मा और मिरांडा के एक्चुअल जो कैरेक्टर है, उसको लेकर जाएं और विकास जी के जो मुख मंडल की जो आभा है, वह अपने चेहरे पर बरकरार रखें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं विकास जी के साथ-साथ इस ओडी में उपस्थित प्रत्येक श्रोता को धन्यवाद देती हूँ।

[संगीत]