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Vaidik Jeevan Prabandhan Class - 2

Vaidik Gurukul Online1:22:31

Transcription

मैं पहले रिकॉर्डिंग शुरू कर लेता हूँ। तो, जिन्होंने कल की कक्षा देखी है और जिन्होंने नहीं देखी है, मैं उनसे अनुरोध करूँगा कि वे पहले कल की कक्षा देख लें। तो उससे क्या होगा? आने वाली कक्षाओं का आधार भी स्पष्ट हो जाएगा। तो चलिए, जिन्होंने कल की कक्षा देखी है, हम उसका कुछ पुनरावलोकन कर लेते हैं और थोड़ा समझ लेते हैं कि आपने कल की कक्षा से क्या समझा है। तो मेरा ऑडियो-वीडियो स्पष्ट है ना? एक बार पुष्टि करें फिर हम शुरू करते हैं। सबको ठीक से सुनाई दे रहा है ना?

जी, जी आ रही है। जी। जी, ठीक है। तो मैं स्क्रीन साझा कर रहा हूँ। स्क्रीन सभी को दिख रही है। हाँ जी, दिख रही है जी। आ रहा है।

ठीक है। तो पिछली कक्षा के प्रश्नोत्तर। हमने पिछली कक्षा में क्या सीखा, उसे थोड़ा जान लेते हैं। तो मैं उम्मीद करूँगा कि आप सभी इन प्रश्नों का उत्तर दे पाएँगे। तो चलिए, पहला प्रश्न है मनुष्य शब्द का अर्थ एवं मनुष्य कौन है? इसका उत्तर मुझे दीजिए यदि आपने कल की कक्षा देखी है, क्योंकि हमारा सत्र एकतरफा नहीं है। इसे दोनों तरफ से होना है। मैं जो बता रहा हूँ, वह आप लोगों को समझ में आ रहा है या नहीं आ रहा है, यह मुझे सुनिश्चित करना है। साथ ही, हम जो भी कक्षा करेंगे, उसमें से जो भी प्रश्न बनेंगे, अगली कक्षा में हम उन्हें देखेंगे। इससे क्या होगा? आप उसकी तैयारी करके आएँगे और तैयारी करके आएँगे तभी समझ में आएगा कि आप उसे समझ रहे हैं। अब यदि नहीं समझेंगे तो कक्षा में उपस्थित होने का कोई अर्थ नहीं है। कोई मतलब नहीं, क्योंकि हमें इन चीज़ों को व्यावहारिक रूप से जीवन में लागू करना है ना। तो मनुष्य कौन है? मनुष्य शब्द का क्या अर्थ है? मनुष्य कौन है? कल की कक्षा में हमने क्या सीखा? उसके बारे में बताइए।

नमस्ते। जी नमस्ते, कौन बोल रहे हैं? कल्पेश भाटिया बोल रहा हूँ जी। हाँ, कल्पेश भाटिया बोल रहा हूँ, जो कल आपने मनुष्य के बारे में एक सोच बताई थी, जो धर्म के आधार पर जीने की कोशिश करता है, मेरे हिसाब से वह आज के हिसाब से मनुष्य रहेगा, धर्म के आधार से हम।

ठीक है। और कोई प्रयास करेगा? और आप सीधा अपना माइक ऑन करिए और अपना नाम बताकर बोलना प्रारंभ कर सकते हैं। अनम्यूट कर सकते हैं। जी प्रणाम, विनोद जी बोलिए। जी, मनुष्य वह है जो मनुभव है, हमारे शास्त्रों में बोला गया है कि मनुभव है, यानी मनुष्य बनो। मनुष्य वह है जो मनन करे, चिंतन करे और उसके बाद उचित और अनुचित में फर्क कर सके, धर्म-अधर्म में फर्क कर सके, वही मनुष्य है। जो मतलब धर्म-अधर्म में फर्क कर सके, उचित-अनुचित में फर्क कर सके और उसके अनुरूप अपना कर्म करे, वही मनुष्य है।

जी, बहुत अच्छा। ठीक, ऐसे ही हमें हर एक विषय को समझना है। जी, और कोई? प्राची सिंह जी बोलिए। हाँ, प्रणाम गुरु जी। प्रणाम। हेलो। जी, जी, सुन रहा हूँ। हाँ गुरु जी, हाँ, मनुष्य शब्द का अर्थ अगर हम देखते हैं, तो पहले तो सबसे पहली चीज़ है कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह केवल एक शरीर न होकर वह एक चेतना भी है, जो हमें पशु से थोड़ा भिन्न करती है। और वह अपने आप को चेतना के, क्योंकि हमारे पास चेतना होती है, तो हम तर्क-वितर्क करके और अपने अंदर का जो भीतरी अज्ञान है ना, जिसके साथ हम पैदा होते हैं, उसको हम थोड़ा रोशनी की ओर लेकर आएँ और विद्या और ज्ञान के साथ अपने जीवन को आगे सुचारू रूप से जी सकें, तर्क-वितर्क के साथ। जी बिल्कुल, मनुष्य में चेतना होती है, हम चेतन स्वरूप हैं। जी। जड़, हम जड़ नहीं हैं। परंतु आज की बड़ी समस्या क्या हो गई? हम अपने आप को चेतन नहीं समझ पा रहे। हम अपने आप को शरीर समझते हैं। इसी के कारण सब भोग और भोग के पीछे ही सब भाग रहे हैं। और समस्या अधिकतर उसी कारण ही है हमारा जीवन और। सारी मनुष्यता इसीलिए बहुत ज़्यादा बेचैन और विक्षिप्त भी है अंदर आंतरिक रूप से। सही। जी, बहुत अच्छा। ऐसे ही समझना है हमें हर एक विषय को समझते हुए आगे बढ़ना है।

हाँ जी, राजभूषण जी बोलिए। जी, मनुष्य। जिनका हो जाए ना, आप अपने आप को म्यूट कर लीजिएगा। जी हाँ, बोलिए राजभूषण। मनुष्य 'मन' धातु से बना है और जो मनन कर सकता है, धर्म-अधर्म का विवेचन कर सकता है, वही मनुष्य है। और धर्म का चिंतन मन से ही होता है। इसलिए जो सोच-समझकर कर्म करता है, वही सच्चा मनुष्य है। मैं मनुष्य कुमार। जी, जी हाँ, बोलिए, बहुत अच्छा आपने कहा है।

जी, आचार्य ऋचा जी बोलिए। आचार्य ऋचा जी, आपने हैंड रेज़ किया है। यह हाँ जी, नमस्ते आचार्य, मुझसे वह अनम्यूट नहीं हो रहा था। अच्छा, अच्छा, ठीक है। तो आप इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालना चाहेंगी? हाँ जी, बिल्कुल। मैं इतना ही बोलना चाहती हूँ कि जैसे मनुष्य मतलब जो एक ही गुणवत्ता जो हमको पशुओं से अलग करती है, वह है हमारा मन, जिसके ऊपर हम अपना सचेत नियंत्रण कर सकते हैं। जीवन में अच्छी और बुरी दोनों चीज़ें आती रहती हैं, हमेशा आती ही रहेंगी। लेकिन उसके ऊपर जो हमारा रिएक्शन न होकर हमको सोच-विचार करके प्रतिक्रिया देनी चाहिए। यह हमें पशुत्व से और मनुष्यत्व से यह फ़र्क दिलाता है कि हम अपने को नियंत्रित कर सकते हैं। उस समय हम तुरंत प्रतिक्रिया न करें। सोच-समझकर व्यवहार करें। ठीक है।

चलिए, बहुत अच्छी बात है। आप लोग समझ रहे हैं। नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम रूपाली और। सबके इसमें एक ही अतिरिक्त बात है कि जो मनुष्य है, वह कर्म से बंधा हुआ रहता है, जो पिछले कर्म और इसमें और पशु में वह कर्म, पिछले कर्म, ये सब आते नहीं हैं, वह कर्म को कम नहीं कर सकते। ठीक है, कर्म आते हैं, लेकिन इसको हम थोड़ा सा जो कर्म का सिद्धांत समझेंगे ना, उसमें हम थोड़ा सा विस्तार से इसको समझेंगे। चलिए, बहुत अच्छी बात है आपने इसको जोड़ा, कर्म को। इसको समझेंगे आगे थोड़ा सा और विस्तार से। तो सबने उत्तर देने का प्रयास किया। दूसरा प्रश्न है, ज्ञान का मूल स्रोत क्या है? हमने क्या जाना कल? इस प्रश्न का उत्तर ज्ञान का मूल स्रोत वेद है। वेदों से ही यह ज्ञान सब निकल कर आया है। तो हमारा मूल स्रोत ज्ञान का वेद ही है। और। मैं मूल स्रोत की बात कर रहा हूँ। विनोद जी, मैं मूल स्रोत की बात कर रहा हूँ। मूल मतलब सबसे अंतिम। उसके पीछे और कुछ नहीं। परमात्मा के ऊपर। ही तो है। परमात्मा। सही। सही। परमात्मा से वेदों की उत्पत्ति हुई। वेदों से हमें ज्ञान की प्राप्ति हुई। तो मैंने मूल स्रोत पूछा है। मूल कहाँ से हमें ज्ञान मिला है? परमात्मा से। परमात्मा के ज्ञान से ही तो हमें वेद की उत्पत्ति हुई ना। उसके पश्चात हमने उससे फिर आगे संश्लेषित करके अलग-अलग शास्त्रों की रचना की।

तीसरा प्रश्न है, ज्ञान के कितने प्रकार हैं? कल की कक्षा में हमने देखा था जो दो प्रकार के ज्ञान हैं। वे कौन-कौन से हैं? उस पर थोड़ा सा प्रकाश डालिए। थोड़ा समझाइए क्या है वह? कल की कक्षा में हमने देखा था दो प्रकार के, मूल रूप से दो प्रकार के। दो प्रकार हैं ना? हाँ, हाँ जी। एक, जी, दो प्रकार के हैं, एक आध्यात्मिक ज्ञान, एक भौतिक ज्ञान। हम, ठीक। नहीं, कल की कक्षा में हमने जो समझाया था, कल की कक्षा। हाँ जी, सही, सही। ज्ञान के, ज्ञान के दो प्रकार हैं, परा और अपरा। परा विद्या और अपरा विद्या। ठीक है। लौकिक और आध्यात्मिक। लौकिक और आध्यात्मिक। ठीक है। आज जिसे हम भौतिक ज्ञान कहते हैं, किसके अंतर्गत आता है? लौकिक, लौकिक। तो वह परा या अपरा के अंतर्गत आता है? परा। परा के अंतर्गत। परा। परा के अंतर्गत आता है या अपरा के अंतर्गत आता है भौतिक ज्ञान? बहुत अंतर। परा के अंतर्गत। परा ही भौतिक। परा और अपरा दो ज्ञान हैं, उसमें भौतिक ज्ञान किसके अंतर्गत आता है? थोड़ा सोचिए, समझिए इसको। यही भ्रम हो रहा है हमें। परा और अपरा को समझिए। अपरा। इसको 'पर' ना, 'पर' शब्द को परलोक समझिए। ठीक है? जो परलोकीय ज्ञान, मतलब इस लोक की नहीं, मृत्यु लोक की नहीं है, इस पृथ्वी की नहीं है। इसको ऐसे-ऐसे समझिए तभी भ्रम स्पष्ट हो जाएगा। पर मतलब परा, परलोक। परलोक मतलब जहाँ आत्मा-परमात्मा की बात हो, तो आत्मा-परमात्मा की बात तो इस लोक में होगी नहीं, क्योंकि आत्मा-परमात्मा को हम बुद्धि से समझ नहीं सकते। वहाँ पर घुटने टेक देती है बुद्धि एक स्तर पर आ कर। फिर ठीक है, कुछ चीज़ें जो हैं हम इंद्रियों के द्वारा समझ सकते हैं। जैसे शरीर से संबंधित चीज़ें, जो चीज़ें हमें इंद्रियों से स्पर्श होकर या फिर इंद्रियों के माध्यम से हम देख सकते हैं, जान सकते हैं, छूकर। ठीक है? ऐसी चीज़ों को हम प्रत्यक्ष जान सकते हैं, समझ सकते हैं। लेकिन कुछ चीज़ें जैसे कर्मफल सिद्धांत, पुनर्जन्म सिद्धांत, आत्मा, परमात्मा इंद्रियों से परे हैं। जो इंद्रियों से परे हैं, इंद्रियाँ वहाँ तक नहीं पहुँच सकतीं। जो इंद्रियों से परे हैं, उसको हम दूसरों को सीधे-सीधे प्रत्यक्ष समझा नहीं सकते, दिखा नहीं सकते। इसलिए इन सब विषयों को लेकर यह भ्रम रहता है हर समय। अब इन सब विषयों को समझना कैसे है? जिन्होंने इनका अनुभव किया है, जिन्होंने इनके बारे में लिखा है, उनके द्वारा हम समझते हैं इसको। किनके द्वारा? ऋषियों के द्वारा। ऋषियों ने इनको समझा है, ऋषियों ने इनको जाना है और उसके द्वारा हम फिर उनको समझ पा रहे हैं। तो यह परा और अपरा में भेद समझ पाना बहुत ही ज़रूरी है। और परा और अपरा के बारे में कोई कुछ बता पाएगा थोड़ा सा और? गुरु जी, ठीक से हमको समझ में नहीं आया भौतिक ज्ञान, परा ना, अपरा। आप थोड़ा सा स्पष्ट कर दीजिए। जी, ऐसे प्रश्न पूछिए। प्रश्न पूछने के लिए ही यही कक्षा है। मन में मत रखिए, शर्माइए मत। प्रश्न करना ज़रूरी है। प्रश्न से ही आप सत्य तक पहुँचते हो। तो आपने पूछा कि परा-अपरा में भेद करिए। देखिए, सीधा-सीधा शब्द पर अब ध्यान दीजिए। परा - परलोक। जो आत्मा-परमात्मा की बात करेगा, तो वह क्या हो जाएगा? आध्यात्मिक ज्ञान। ठीक है? आत्म-उन्नति की बात करेगा, वह आध्यात्मिक ज्ञान हो गया। और अपरा क्या हो गया? भौतिक ज्ञान। जो लौकिक ज्ञान, जो आचार-विचार हम जो है सीखते हैं समाज में, आचार-विचार व्यवहार करने के लिए जो भी हम शिक्षा ग्रहण करते हैं स्कूल में, कॉलेज में, जो भी जितने भी विषय हैं, उनके विषयों के बारे में जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, जो हम पढ़ते हैं स्कूल-कॉलेज में, उसको हम बोलते हैं अपरा। तो भौतिक ज्ञान अपरा हो गया। लौकिक, आध्यात्मिक ज्ञान परा हो गया, परलोक ज्ञान, जहाँ आत्मा-परमात्मा की बात होती है। स्पष्ट है? हाँ सर। जी। जो हम अभी सीख रहे हैं, इसका मतलब है यह परा की तरफ हम जा रहे हैं। सही। मेरे हिसाब से। अपरा से परा की ओर जा रहे हैं। अपरा का उपयोग करके हम परा की ओर जा रहे हैं, क्योंकि अपरा महत्वपूर्ण है ना, क्योंकि अपरा से हम परा, क्योंकि इसके द्वारा हम जो है समझकर फिर जो है परलोकीय ज्ञान को समझेंगे, उसका विश्लेषण करेंगे, भीतर आत्मसात करेंगे, आत्मसाक्षात्कार करेंगे, निदिध्यासन करेंगे, उसके पश्चात हम जो है उसको आचरण में लाएँगे। तो अभी हम क्या कर रहे हैं? अपरा से परा की ओर जा रहे हैं। और आज यह है कि हम अपरा पर ही अटक गए, परा की ओर जाना सब भूल गए। अपने आप को सब जो है शरीर समझते हैं, आत्मा समझता कोई नहीं है। अर्जुन ने भी यही भूल की थी, अपने आप को शरीर समझ लिया था, इसलिए शरीर से संबंधित जितने भी उनके संबंध हैं, सामने जितने भी रिश्ते हैं, वही उनके जीवन की सबसे बड़ी बाधा बन कर उभरी थी वहाँ पर। तो श्री कृष्ण ने उनका यह भ्रम तोड़ा था कि आप जो है अपरा से परा की ओर जाओ। तभी आप जो है समझ पाओगे कि वर्तमान स्थिति में, वर्तमान परिस्थिति में तुम्हारा धर्म क्या है? तुम्हें क्या करना उचित है? जब हम अपरा से परा की ओर जाते हैं, तभी भ्रम मिटते हैं। तभी समस्या जो है हल होनी प्रारंभ होती है। हम यहीं पर अटके हुए हैं, भौतिक ज्ञान में अटके हुए हैं। और उसी दृष्टि से चीज़ों को हम देखना, देखना, देखना चाह रहे हैं। तो भौतिक दृष्टि से जब हम चीज़ों को देखेंगे, तो वहाँ पर भ्रम उत्पन्न होगा। अंधविश्वास उत्पन्न होगा, अज्ञानता उत्पन्न होगी, अविद्या उत्पन्न होगी। अब ये क्या करते हैं? हमें भ्रमित करते हैं। हम निर्णय नहीं ले पाते। सही निर्णय क्या है? वास्तव में जीवन बहुत ही सरल है। अगर हम अपने आप को समझ जाएँ, परमात्मा को समझ जाएँ, सृष्टि के नियम को समझ लें। आप बड़े से बड़े निर्णय चुटकी में ले लोगे। आप समझ जाओगे कि मैं हूँ कौन? अगर मैं ऐसा हूँ तो फिर ये सब कोई अर्थ नहीं बनता है। क्योंकि मुझे आना है फिर जाना है। आना-जाना यह लगा रहेगा। मेरी जन्म-मृत्यु का चक्र जो है चलता रहेगा। मेरी मृत्यु हो ही नहीं सकती। मुझे कोई मार ही नहीं सकता। जब हम समझ जाते हैं, तो बड़े से बड़े निर्णय जो है हम ले पाते हैं जीवन में। तो निर्णय लेना यहाँ से आता है जब हम परलोकीय ज्ञान को, आत्मा-परमात्मा, सृष्टि के नियम को समझकर आचार-विचार और व्यवहार को धारण करते।

अगला प्रश्न है, ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता में क्या अंतर है? कल हमने, कल की कक्षा में इसको देखा था हमने। ज्ञान जानने की शक्ति है। जी। और ज्ञाता जो जानता है, जीवात्मा जिसको हम लोग अपने जीवात्मा। जी। और ज्ञेय। इसमें एक चीज़ आपने छोड़ दी, ज्ञेय। ज्ञेय ब्रह्मा, ब्रह्म और आत्मा के संबंध, हम इसको ज्ञेय बोल सकते हैं। हम, ठीक, बहुत सुंदर। आगे और कोई? और कोई प्रयास करेगा इस पर, ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता में क्या अंतर है? देखिए, मैं सबसे उम्मीद करता हूँ कि सभी उत्तर दें, है ना? सभी व्यावहारिक रूप से इन चीज़ों को समझें। अपने जीवन में लागू करेंगे ना, तभी तो हम उसको उसका लाभ उठा पाएँगे ना इस कक्षा का। तो हम जब तक नहीं समझेंगे, तो बता नहीं पाएँगे ना। तो इससे समझ में आता है कि आप लोग अगर उत्तर नहीं दोगे, तो समझ में आता है आप समझ नहीं पा रहे। बस रोज़ के रोज़ हम कक्षा में उपस्थित रहेंगे, उससे कुछ होगा नहीं। जी। आचार्य जी, ज्ञान जो मूल ज्ञान है, जो मूल ज्ञान जो परमात्मा से हमें मिलता है। ज्ञाता जो हम स्वयं उसको जानने वाले हैं। और ज्ञेय मतलब जो जानने योग्य हम लोग जानते हैं। जी, ठीक, ठीक, बिल्कुल। जी, आगे कोई और? यह चीज़ समझना बहुत ज़रूरी है, आप क्या हो, ज्ञान हो, ज्ञेय हो या ज्ञाता हो? इन तीनों में अंतर बहुत आवश्यक। प्रणाम गुरु जी। जी, हर्षित जी, प्रणाम। सर, ज्ञान में ज्ञान, जो भी चीज़ें हम जीवन में जानकर अपने आप को एक संपूर्ण बना सकते हैं, परिपूर्ण बना सकते हैं, चाहे किसी प्रकार का ज्ञान हो। और यह जो, एक शिक्षक जो, ज्ञेय मतलब हम जो, एक छात्र जो भी प्राप्तकर्ता जो है। और ज्ञाता, एक जो भी प्रदाता कह सकते हैं, जो हमको प्रदान करने वाला है। सही। सही कहा आपने, एकदम तकनीकी शब्दों में बता दिया है, प्राप्तकर्ता, प्रदाता, ट्रांसमीटर, प्राप्तकर्ता करके। अच्छी बात है। बहुत अच्छा बताया आपने। और कोई जी, प्रयास करेगा इस पर? जी। सर, स्वयं प्रकाश बर्वे। जी, जी बोलिए। नमस्ते। सर, मेरे हिसाब से ज्ञान तो परमात्मा के जो, के द्वारा जो दिया जाता है, जो वेदों के रूप में हमको दिया है। और जो ज्ञान को जानने का जो इच्छुक है, जो जिज्ञासु है। वह ज्ञेय। जी। और उससे जो प्राप्त हो गया, जो प्राप्त कर रहा है, वह ज्ञाता है। सही, ठीक। चलिए, ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, ये तीनों में अंतर समझना बहुत आवश्यक है। तो हमने क्या समझा? ज्ञान क्या है? जो जानने का माध्यम है, जानने की जो शक्ति है, जो ज्ञान है। ठीक है? ज्ञेय क्या है? जो जानेगा, जिसको जाना जाएगा। देखिए, अपना जो है माइक जो है, वह बंद कर लीजिएगा, म्यूट कर लीजिएगा माइक को, नहीं तो समस्या होती है कक्षा में। तो ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता में क्या है? ज्ञान जानने की शक्ति। ज्ञेय है हमें जिस चीज़ के बारे में जानकारी प्राप्त करनी है, वह हो गया ज्ञेय। और ज्ञाता क्या हो गया? जिसे जानना है। किसे जानना है? मुझे जानना है। मैं कौन हूँ? मैं शरीर नहीं हूँ, मैं जीवात्मा हूँ। मैं आत्मा हूँ। जीवात्मा, आत्मा कोई अलग-अलग शब्द नहीं हैं। वही समान हैं। एक दूसरे के समानार्थी शब्द हैं। तो मैं कौन हूँ? मैं आत्मा हूँ। ठीक है? तो जानने वाला कौन हूँ? मैं। किसे जानना चाहता हूँ मैं? आत्मा को, अपने आप को, परमात्मा को, सृष्टि के नियम को। तो यह हो गया ज्ञेय। किसके द्वारा? किसी न किसी ज्ञान स्रोत के द्वारा ना। अपने आप तो मुझे कुछ भी पता नहीं हो जाएगा। कोई न कोई तो स्रोत चाहिए मुझे। जिसके द्वारा मैं उसको जानूँगा। वह हो गया ज्ञान। अब इसको थोड़ा सा आज की कक्षा में विस्तार से समझेंगे।

अगला प्रश्न है, सच्चा ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? अच्छे गुरु से। हम, कल की कक्षा में हमने इसको समझा था। सच्चा ज्ञान कहाँ से प्राप्त होता है? जी नमस्कार, बोलिए। जी, कल्पेश जी बोलिए। श्रवण से, मनन से, निदिध्यासन से और आचरण से। कल आपने पढ़ाया था तब मैंने इसका, मैंने इसको नोट किया था, तो कल की नोट को मैं रेफर कर रहा था, तो इसमें से मैं बता रहा हूँ कि श्रवण, मनन, निदिध्यासन और आचरण से ही होता है। और शास्त्रों को और उसका आचरण जीवन में उतारो। सही। तो देखिए, यहाँ पर जो एकदम सटीक अगर कोई उत्तर है, यही है, क्योंकि सच्चे गुरु से आपको ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि आपको ज्ञान लेना है ना। सच्चा गुरु तो उपदेश देकर चला जाएगा, लेकिन आपको क्या करना है? प्राप्ति तो उसको आपको करनी है ना। उसके लिए परिश्रम तो आपको करना है ना। श्रवण, फिर उस पर मनन करना है, फिर निदिध्यासन करना है, फिर जाकर के आचरण में लाना है, तभी तो ज्ञान सार्थक हुआ ना प्राप्त करने का, अन्यथा कोई मतलब नहीं। जानते तो हम बहुत कुछ हैं अपने जीवन में। जानते तो बहुत कुछ हैं, लेकिन लागू कितनी चीज़ों का करते हैं अपने जीवन में? ज्ञान का तभी अर्थ है, सार्थकता है प्राप्त करने का, जब हम उसको अपने जीवन में आचरण में लाएँ, अन्यथा कोई मूल्य नहीं उसका। सच्चा गुरु आवश्यक है, परंतु परिश्रम हमें करनी पड़ेगी। तो यह प्रक्रिया होता है ज्ञान प्राप्ति का, सच्चा ज्ञान। पहले हमें जानना है। श्रवण के द्वारा, श्रवण मतलब सुनना है। सुनकर, देखकर, ठीक है? फिर मनन करना है। कोई भी कुछ भी बोल दे, बता दे, आप विश्वास मत करो आँख बंद करके। आज का समय ऐसा नहीं है बिल्कुल भी। आज का समय तर्क का है। तर्क ही आपके ऋषि हैं। हमारे ऋषियों ने शास्त्रों में कहा है हमें कि एक समय ऐसा आएगा जब जो है आपके तर्क ही आपके ऋषि होंगे। वही आपको बताएगा सही क्या है? आपके गलत क्या है। आपकी बुद्धि सही दिशा में काम करनी चाहिए। कोई भी आकर के कुछ भी बोल देता है, आप उस पर आँख बंद करके विश्वास मत किया करो। चिंतन करो, मनन करो। मन इसलिए ही है तर्क-वितर्क करने के लिए है। बुद्धि इसीलिए है तर्क-वितर्क करने के लिए है। तो हमें क्या करना है? जो भी चीज़ें हमें पता चली हैं, उसका हमें क्या करना है? श्रवण करना है। श्रवण करके उसको मनन करना है। तोलना है। सही-गलत के पाले में तोलना है। उसको मापना है। मान नहीं लेना है। आँख बंद करके कोई भी कुछ भी बोल दे। मैं भी बोलूँ। कोई भी कुछ भी बोले। क्योंकि ईश्वर ने आपको स्वतंत्र बुद्धि दी है। बुद्धि दी है। बुद्धि से आप उसको तोलो, समझो। ईश्वर ने कहा है बुद्धि देकर उसको उपयोग करने के लिए, नहीं मना नहीं किया ईश्वर ने। ईश्वर ने इसलिए बुद्धि दी है कि उसका उपयोग करो। इस शरीर में ही मिला है बुद्धि हमें। इस शरीर में ही मन मिला है। तो उसको हमें क्या करना है? उपयोग करना है। तो मनन होगा, उपयोग करना उसका। मनन किया हमने उस विषय को समझा, जाना, शोध किया, जब तक हम संतुष्ट नहीं हो जाते। जब तक हम संतुष्ट नहीं हो जाते, तब तक हमने उस पर चिंतन किया, मनन किया। उसके पश्चात हमने उसको आत्मसात किया, हाँ, जान लिया यह सही है, बिल्कुल ऐसा ही है यह चीज़ें। उसको आत्मसात कर, उसको आत्मा के द्वारा समझने का प्रयास करो, साक्षात्कार करने का प्रयास करो, निदिध्यासन करेंगे। उसके पश्चात जैसे हमने इसको आत्मसात किया, स्वचालित रूप से आचरण में आ जाएगा। तो यह है प्रक्रिया ज्ञान प्राप्ति की। जी, और कोई इस पर थोड़ा प्रकाश डालना चाहेगा, सच्चा ज्ञान कैसे प्राप्त करेंगे या इस पर कोई संदेह है अभी भी किसी को? यह अच्छा हुआ, यह इसीलिए आपने यह सवाल-जवाब अभी आप कर रहे हो, इसलिए अच्छा है कि ताकि अपना कल, कल का जो ज्ञान जो आपने जो बाँटा था सबको, तो अगर अभी हम अब सही सुना है कि नहीं, समझा है कि नहीं, मनन किया है कि नहीं, तो आगे आप पढ़ाएँगे तो ही अच्छा रहेगा कि आज हमने आपने हमारा प्रश्नोत्तर से परीक्षा लिया, वह बहुत अच्छा किया गुरुजी।

देखिए, यह कक्षा केवल पंद्रह दिन की नहीं है। आप यह मत समझिए कि पंद्रह दिन की ही शिक्षा होगी। उसके बाद हमारा जो है संपर्क टूट जाएगा। यह अब जीवन भर का संपर्क है। और यह कक्षा निरंतर चलेगी। अब, अब जैसे हम धीरे-धीरे इसको आगे बढ़ेंगे, समझ में आता चला जाएगा। तो, अगला प्रश्न देखते हैं। समस्त दुखों का कारण क्या है? एक शब्द में उत्तर चाहिए। एक शब्द में बस। गुरु जी, बोलूँ मैं? हाँ जी, बोलिए, बिल्कुल। माया। ठीक है। आगे और कोई? ठीक है। आगे और कौन बोलना चाहेगा? अज्ञानता, अहंकार। एक शब्द, एक कोई भी एक शब्द। अहंकार। गुरु जी, हम। मैम, गुरु जी। हमारी इच्छाएँ हमारे दुखों का कारण हैं। ठीक है। आगे और कोई? सभी प्रयास करें। सभी, सभी को सक्रिय होना है यहाँ पर। अज्ञान से ही सब दुखों का निर्माण होता है। अज्ञान। ठीक है। राजेश शाबा जी, आप कुछ नहीं बोल रहे। वीडियो केवल ऑन कर रहे हैं। आपका भाग लेना है ना? जी, आपका साउंड ठीक से नहीं आ रहा है। ऑडियो स्पष्ट नहीं है। क्रोध, क्रोध। अविद्या, अविद्या ही, अविद्या ही समस्त दुखों का कारण है। ठीक है। जी हाँ सर, समस्त दुखों का कारण अविद्या तो है ही, साथ में आज के युग में अत्यधिक अपेक्षाएँ हैं जो और उसका जो भी किसी भी चीज़ को नकारात्मक दृष्टिकोण से देखना, उसके कारण भी आपके जीवन में दुखों की कमी नहीं रहती है। ठीक, तो दुख को मनुष्य समझना, आत्मा के साथ, मैं कौन, हम। गुरु जी, पहले तो निरंतर यह प्रश्न हर एक अध्यापक में या हर एक उम्मीदवार में होना चाहिए कि अध्यात्म की जो यात्रा है ना, जो जो इस जिस पथ पर हम चलना शुरू कर रहे हैं या जो भी हैं हम सारे, इन सबको यह जानना बहुत ज़रूरी है कि पहले तो यह प्रश्न उठना चाहिए, हम हैं कौन? मैं कौन हूँ? उसके बाद यह प्रश्न जब उठता है, तो आपको पता चलता है कि मुझे सबसे पहले अपने 'मैं' को ही गिराना है। मतलब हमें यही जानना है कि मैं हूँ ही नहीं। हम। और यह जो अविद्या है, अहंकार है, इसी की वजह से हम इतने बेचैन हैं और अपने आप को पूरा मन जान लिया है। मतलब अपने पूरे, मतलब अपनी पूरी अस्तित्व को हमने मन के इर्द-गिर्द ही खड़ा कर लिया है। तो। हम स्वयं को सिर्फ शरीर जानते हैं। इसीलिए आत्मा को भूल जाते हैं। यही दुखों का कारण है। हम, मतलब सीधा-सीधा अज्ञानता ही दुखों का कारण है। जी।

तो यह जो प्रश्न है हमारा, दुखों का कारण क्या है? सभी ने जो भी उत्तर दिया है और जो उत्तर आपने दिया, अज्ञानता, किसी ने कहा अविद्या, तो बिल्कुल अज्ञानता और अविद्या ही है, क्योंकि विद्या हमें जन्म से प्राप्त नहीं होती, अज्ञानता होती है हमारे अंदर। इस कारण से हमें क्या करना है? ज्ञान की तरफ आगे बढ़ना है ताकि हम जो है सही निर्णय ले सकें। और सभी दुखों का कारण एक चीज़ क्या है, पता है आपको? हम क्या समझते हैं कि जीवन में सभी प्रकार से दुखों से मुक्त हो सकते हैं। बिल्कुल भी नहीं, क्योंकि कुछ हमारे प्रारब्ध होते हैं, उसको हम बदल नहीं सकते। वे कर्म से हमारे बने हैं। तो दुख तो हमें भोगने ही पड़ेंगे। सुख-दुख तो आएँगे ही जीवन में। ठीक है? दुखों से आप पूरी तरीके से मुक्त नहीं हो सकते। आप क्या कर सकते हो? उसको संभालने का तरीका बदल सकते हो। ठीक है? आपकी समझ बदल सकती है। दुखों को देखने की दृष्टि आपकी बदल सकती है। उससे क्या होगा? दुख तो जीवन में आएँगे, लेकिन आपको प्रभावित नहीं कर पाएँगे। समझ रहे हैं ना? सुख-दुख जीवन में आता रहेगा। शरीर से उत्पन्न होते ही दुख प्रारंभ हो गया। हम रोने से ही सृष्टि में आए ना। पहले ही हम, जैसे हमारा जन्म हुआ, जन्म लेते ही हमने रोना प्रारंभ किया। बच्चा रोता है तभी तो सब हँसते हैं ना कि बच्चा चलो रो रहा है। बच्चा, बच्चा अगर जन्म के बाद अगर रोता नहीं है, तो फिर वह समस्या हो जाती है। तो जन्म से ही दुख प्रारंभ है। इस शरीर धारण करना ही दुख का कारण हो गया। तो हम जब आचार-विचार व्यवहार करते हैं हमारे इस मृत्युलोक में, इस पृथ्वी में, तो उससे जो है बहुत सारे हमारे शरीर के साथ बहुत सारे संबंध जुड़े रहते हैं। बहुत सारी चीज़ें जुड़ी रहती हैं। सृष्टि के कुछ नियम हमारे ऊपर लागू हो जाते हैं। क्योंकि हम सृष्टि के नियम को तोड़ नहीं सकते। उसके अधीन हैं हम। तो उससे संबंधित चीज़ों से हम, हमारे जीवन में दुख आते रहेंगे। लेकिन दुख को संभालने की, दुख को देखने की दृष्टि बदलनी पड़ेगी हमें। एक ऐसा चश्मा लगाना पड़ेगा जिससे हम दुखों को अलग दृष्टिकोण से देखें, तो क्या होगा यह दुख हमारे जीवन में आएँगे तो, लेकिन उसको प्रभावित नहीं कर पाएँगे। तो समस्त दुखों का एक ही कारण है अविद्या, अज्ञानता। तो हमें अज्ञानता से ज्ञान की तरफ बढ़ना है। तो इसी के लिए हमने वैदिक गुरुकुल की यह कक्षा प्रारंभ की है कि हम मनुष्य में, जो मनुष्य हैं, हम उनमें मानवीय गुण विकसित कर सकें, हम समझ सकें हम हैं कौन।

तो देखिए, मनुष्य के मूल लक्षण। अभी आप लोग जो है, कैमरा जिन्होंने ऑन कर रखा है, सभी बंद कर दीजिएगा। सभी अपना-अपना कैमरा बंद कर दीजिएगा। जी, ठीक है। तो चलिए, अभी कक्षा प्रारंभ करते हैं मूल रूप से। अभी तक हमने जो जाना है पिछली कक्षा के बारे में, जो भी प्रश्नोत्तर किए हैं। आगे थोड़ा सा आज की कक्षा में समझते हैं। मनुष्य के मूल लक्षण क्या हैं? अभी तक हमने कल की कक्षा में देखा है तो मूल लक्षण क्या है जो मनुष्य अपने आप को कहलाएगा? तो उस पर विवेक होना चाहिए, सही-गलत में भेद करना आना चाहिए, संयम होना चाहिए, मतलब आत्म-नियंत्रण होना चाहिए, अपने आप पर नियंत्रण होना चाहिए और सबसे मूल है यहीं पर इंद्रियों पर नियंत्रण, मन पर वश। अगर आप लोग चाहते हैं कि मैं इस कक्षा को एकदम गहराई से सनातन धर्म के मूल कारणों को पकड़ते हुए और उनके सिद्धांतों को पकड़ते हुए समझाते हुए आगे बढ़ूँ, तो मैं उसको विस्तार से कर सकता हूँ। नहीं तो मैं जो कल कक्षा के जो भी हमारे मॉड्यूल हैं, उनको मैं स्पर्श करते हुए चाहूँगा। यह मैं अंत में कक्षा में आपसे पूछूँगा कि आप लोग चाहते हो कि सनातन धर्म को आप एकदम गहराई से समझना चाहते हो, तकनीकी रूप से, तो मैं उसको उस हिसाब से आगे बढ़ूँगा कल की कक्षा से। तो आज मैं थोड़ा सा उसका अवलोकन दे देता हूँ। तो देखिए, विवेक सही-गलत का निर्णय करवाता है। संयम आत्म-नियंत्रण, इंद्रियों पर वश करना सिखाता है। ठीक है? कर्तव्य बोध, परिवार, समाज, सृष्टि के प्रति जो हमारे कर्तव्य हैं, उसका ज्ञान हमें करवाता है। तो हमारा कर्तव्य क्या है? पहला कर्तव्य तो हमारे, हमारे प्रति है, शरीर के प्रति। हमें यह शरीर क्यों मिला? कुछ समय के लिए मिला है। कितने दिन के लिए मिला है? साठ-सत्तर वर्ष के लिए मिला है। उसके पश्चात फिर से छीन ली जाएगी यह शरीर। हमसे ले ली जाएगी शरीर। कुछ समय के लिए मिला है। तो उधारी का यह जो शरीर हमें कुछ समय के लिए मिला है, तो उसमें हमें कौन-कौन से कर्तव्य हमें निभाने हैं? पहला कर्तव्य है हमारे शरीर के प्रति, अपने आप के प्रति, जीवात्मा के प्रति, जो हम हैं, उसके प्रति उसका उद्धार करना है। आत्मज्ञान की प्राप्ति करना है। उस पर आगे बढ़ना है। दूसरा है परिवार के प्रति। इस शरीर से संबंधित जितने भी हमारे संबंध हैं, रिश्ते-नाते हैं, उनके प्रति हमारा एक कर्तव्य होता है। अपने माता-पिता के प्रति, अपनी पत्नी के प्रति, अपने बच्चों के प्रति। ठीक है? उसके बाद एक समाज के प्रति, हमारे जो समाज में हम रहन-सहन करते हैं। जिस समाज से हमें सब कुछ प्राप्त हुआ है। उस समाज के प्रति हमारा एक कर्तव्य होता है। उसके बाद सृष्टि के प्रति, क्योंकि यह सृष्टि से ही हम हैं। सृष्टि है तभी हम हैं। उसने हमें सब कुछ दिया है। भरण-पोषण से लेकर के हमारी सब इच्छाओं की पूर्ति यह सृष्टि कर रही है। तो इस सृष्टि के प्रति भी हमारे कर्तव्य। तो यह हमें समझना पड़ेगा। कर्तव्य बोध हमारे हर एक जगह पर अलग-अलग हमारे होते हैं। सबको हमें निभाना पड़ता है। सब में संतुलन हमें स्थापित करने होते हैं। फिर दया होनी चाहिए हमारे अंदर। अन्य प्राणियों के प्रति करुणा होनी चाहिए। दया होनी चाहिए। हिंसा नहीं करनी चाहिए। अकारण, अकारण किसी को मारकर नहीं खाना चाहिए। बिना किसी कारण के हमें हिंसा नहीं करनी चाहिए। अब देखिए, बिना किसी कारण के हमने क्या कर दिया? आज हिंसा करके हम जो है पशु-पक्षियों को मार रहे हैं और उनको खा भी रहे हैं। मांसाहार कर रहे हैं। तो दया होनी चाहिए। ये मनुष्य के गुण हैं। अब ये मनुष्य दया भूल चुका है। बहुत बड़ा कारण होना चाहिए किसी भी प्राणी का जीवन लेने के लिए। आपके पास बहुत बड़ा कारण होना चाहिए। साधारण कारण से आप किसी की हत्या नहीं कर सकते। आपका अधिकार नहीं है। आपके पास बहुत बड़ा कारण होना चाहिए। उनको हम आगे समझेंगे। कौन-कौन से वो कारण हैं जब हम किसी का प्राण ले सकते हैं, तब भी किंचित मात्र भी हमें पाप नहीं लगता है। किंचित मात्र भी नहीं। ठीक है? धर्माचरण, अपने आचरण से धर्म को जीवित रखना। अब धर्म को समझ लेते हैं हम कि अलग-अलग मत-संप्रदाय को धर्म से जोड़ते हैं। बिल्कुल भी नहीं है। धर्म मैं आपको समझा रहा हूँ। सीधा मानव धर्म। मनुष्य का जो धर्म है। ईश्वर ने जिस उद्देश्य से इस शरीर को बनाया है, वही आपका धर्म है। क्या है? ईश्वर ने क्यों बनाया इस शरीर को? क्यों बनाया? इस शरीर में बुद्धि क्यों दी? इस शरीर में मन क्यों दिया? इस शरीर में विवेक क्यों दिया? किस लिए? मनमानी करने के लिए? कोई भी नहीं। अगर मनमानी करना ही होता तो पशु का शरीर सबसे उत्तम है। अगर भोग करना होता तो पशु का शरीर सबसे उत्तम है। पशु के शरीर में जाइए। वहाँ पर ना आपको करियर बनाना है, ना बच्चे पालने हैं, ना घर बनाना है। दिन भर मौज-मस्ती करिए, मनोरंजन करिए, घूमिए, फिर कोई कुछ नहीं कहेगा आपसे। ठीक है? तो वहाँ पर धर्म बिल्कुल भी नहीं है। वहाँ बुद्धि नहीं है। वहाँ आत्म-संयम नहीं है। वहाँ पर कर्तव्य नहीं है। वहाँ केवल और केवल भोग है। तो भोग ही अगर करने के लिए मनुष्य का शरीर मिला है, तो सबसे भोग करने वाला शरीर कौन सा है? पशुओं का शरीर, पशु-पक्षियों का। वहाँ केवल और केवल मनोरंजन है। मनोरंजन है। घूमिए, फिर भोग करिए। तो धर्म का आचरण करने के लिए ईश्वर ने हमें यह शरीर दिया है। और यह शरीर हमने कमाया है। मुफ्त में नहीं मिला है। मनुष्य का शरीर हमने कमाया है। उसके लिए मूल्य चुकाया है। बहुत बड़ा। मुफ्त में कुछ भी नहीं होता सृष्टि में। यह मत समझिए ईश्वर ने यह भोग-विलास के जो भी साधन मनुष्य शरीर के लिए बनाए हैं, उसका सबसे अधिक उपयोग, जितने भी संसाधन हैं इस सृष्टि में, इस पृथ्वी में, उसका सबसे अधिक उपयोग और सबसे अच्छा उपयोग जो है मनुष्य शरीर के द्वारा ही हो सकता है। तो ईश्वर ने यह हमें क्यों दिया है मनुष्य शरीर? ऐसे नहीं दिया, मुफ्त में नहीं मिला है। हमने इसको कमाया है, इसका मूल्य चुकाया है। कर्मों के द्वारा हम योग्य बने तभी यह शरीर प्राप्त हुआ, अन्यथा नहीं। जब आप जन्म लिए थे, आपके साथ-साथ अनेक पशु-पक्षी भी जन्म लिए। उनको वह शरीर क्यों प्राप्त हुआ? आपको यह शरीर क्यों प्राप्त हुआ? तो इसमें भी हमें विचार करने हैं। धर्म का आचरण करेंगे, तुम्हारा वर्तमान तो ठीक होगा ही, भविष्य भी सुधर जाएगा। आने वाला शरीर भी सुधर जाएगा। आने वाले समय जो है, भविष्य को भी हम जो है अपना निर्धारित कर सकते हैं। बोलते हैं ना, कर्म से ही भाग्य बनता है। कर्म आज ठीक करो तो भाग्य भी ठीक होगा आपका। दोनों एक से जुड़े हुए हैं। आध्यात्मिक जिज्ञासा होनी चाहिए मनुष्य के अंदर। मैं कौन हूँ? मैं क्या हूँ? यह प्रश्न उठने चाहिए। ऋषिकेंद्र, यह जानने की जिज्ञासा होनी चाहिए। सबसे पहला प्रश्न, मैं कौन हूँ? जब तक आप स्वयं को नहीं जानेंगे, आप कुछ भी नहीं जानते। आप कुछ भी नहीं जानते। अपने आप को नहीं जानते, कुछ भी नहीं जानते। अब बताइए, एक डॉक्टर जो एमबीबीएस, एमडी करता है या फिर कोई कुछ भी कर लेता है अलग-अलग पैथी में, तो बड़ी-बड़ी जो डिग्री ले लेता है, पंद्रह से बीस साल जो है इस शरीर का अध्ययन करता है। इस शरीर के अंगों का अध्ययन करता है उसे। ठीक है? उसके पश्चात भी क्या एक भी बीमारी वह ठीक कर पाते हैं? क्या अभी तक जान पाए क्या दो प्रतिशत भी इस शरीर को? बिल्कुल भी नहीं। तो इतनी लंबी पढ़ाई करने के बाद भी हम रोगों को ठीक नहीं कर पा रहे, इस शरीर को ठीक से जान नहीं पा रहे। ठीक है? तो मतलब यह हम समझ जाएँ कि सीधा-सीधा हम भौतिक हैं नहीं, हम आध्यात्मिक हैं। केवल एक ही मार्ग है इस शरीर को समझने का, इस सृष्टि को समझने का, इस पूरी जो है मोह-माया से बाहर आने का। एक ही मात्र तरीका है कि अध्यात्म के रास्ते में हमें जाना पड़ेगा। तो सबसे पहला पहला प्रश्न अध्यात्म में आता है कि मैं कौन हूँ? अध्यात्म शब्द का अर्थ क्या होता है? 'अध' का अर्थ होता है स्वयं का अध्ययन करना। अपने आत्मा का अध्ययन करना। परमात्मा का अध्ययन करना। उसका अध्ययन करना। सृष्टि के नियमों का अध्ययन करना। और उसके अनुसार जो है तालमेल बिठाना और अपने जीवन को सफल बनाना। हम समझ लेते हैं बहुत बड़ा धन-संपत्ति हमने प्राप्त कर लिया। बड़े-बड़े गाड़ी-घोड़े हमने बना लिए। बड़े-बड़े बँगले बना लिए। एक सामाजिक प्रतिष्ठा हमने प्राप्त कर।

लिया। यह सब हमने प्राप्त कर लिया और समझते हम सफल हो गए। बिल्कुल भी सफलता इससे इसका कोई संबंध नहीं। या भौतिक रूप से सफल है। आप भौतिक रूप से सफल है। फिजिकली आप बहुत ही सफल है। लेकिन भीतर से उतना ही आप अगर आप आध्यात्मिक से साथ जुड़े नहीं है तो। तो तो हमें अध्यात्म और भौतिक ज्ञान को दोनों को हमें क्या करना? बैलेंस करना पड़े। ईश्वर ने देखिए हमें इसलिए ही बनाया है और यह जो जितने भी संसाधन है और यह संपन्नता है। हमें दी है। हमें भोग करने के लिए दी है ना। ईश्वर ने ये सब विभिन्नता जो सृष्टि में है सब हमारे लिए ही बनाया है। हमें ही इसका भोग करना है। हमें मना नहीं किया गया है कि तुम जो है आर्थिक रूप से समृद्ध मत बनो। तुम ऐश्वर्य को प्राप्त मत करो। तुम शक्तिशाली मत बनो। वेद तो कहते हैं सीधे शब्दों में। आप सामर्थशाली बने, समृद्धिशाली बने, ऐश्वर्य युक्त बने, बलशाली बने। परंतु साथ-साथ बैलेंस क्रिएट करना। तभी जो है हम सुख को प्राप्त हो सकते हैं। तभी हमारा जीवन सफल होगा।

तो सबसे पहला प्रश्न क्या है? मैं कौन हूं? क्या हूं? ये प्रश्न सभी के अंदर उठने चाहिए। तो प्रश्न देखिए इस प्रकार से होने चाहिए कि मैं कौन हूं? समझिए पहले। मैं क्या मैं शरीर हूं? क्या मैं ये मन हूं? क्या मैं बुद्धि हूं? क्या कुछ और हूं मैं? मैं क्या हूं इसमें से? परंतु देखिए 98% लोगों के मन में यह प्रश्न उठते ही नहीं। हमने यह जब ऐड चलाया है लाखों लोगों तक ऐड गया है। लेकिन कुछ लोग ही जुड़े। क्यों जुड़े? उन्होंने समझा। उन्होंने जानने का प्रयास किया कि ये जो कक्षाएं हैं इसका महत्व क्या है? वैदिक जीवन प्रबंधन को अगर हम समझेंगे तो हमारा जीवन जो है एक सही दिशा में जाएगा। हम उसको अच्छे से समझ करके अपने जीवन में अप्लाई करेंगे तो सभी दुखों का जो है अंत यही से किया जा सकता है। समस्याओं का अंत यही से किया जा सकता है। इसके महत्व को हम समझते हैं। लेकिन 98% ने इसको ज्वाइन नहीं किया। क्यों नहीं जाइन किया? क्योंकि उनके मन में उठता ही नहीं यह प्रश्न आध्यात्म के प्रति उनकी रुचि ही नहीं है। क्यों नहीं है उनकी रुचि? वो क्यों है? आगे थोड़ा सा धीरेधी समझेंगे।

तो मैं कौन हूं? मैं क्या हूं? 98% पर्सन के मन में ये प्रश्न तो उठते ही नहीं। केवल जो है एक दो परस लोग जो है उनके मन में यह प्रश्न उठते हैं। पूरा संपूर्ण समाज जो है ये 98% के पीछे भाग रहा है। केवल भौतिक उन्नति और केवल और केवल धन संपत्ति बल शक्ति सामर्थ्य ऐश्वर्य इसके पीछे ही भाग रहा है। दो% लोग ही जो है मैं कौन हूं? परमात्मा क्या है? सृष्टि का नियम क्या है? ये चीज ऐसा क्यों है? ये चीज वैसा क्यों है? ये इस प्रकार से क्यों हो रहा है? ये जानने का प्रयास करते हैं। उसमें भी एक दो% लोग जो है सही में परमात्मा को समझते हैं। इन दो पर्सन में भी 98% के मन में तो कुछ उठता ही नहीं है। कोई प्रश्न उठता ही नहीं है। दो% के मन में प्रश्न उठते हैं। उसमें भी 1% लोग जो है इसको 100% समझिए। अब इसमें भी 1% लोग जो है सही-सही जो है चीजों को समझ पाते हैं जो प्रयास करते हैं। ठीक है? ज्ञान पूरा फ्री में पड़ा हुआ है। ज्ञान पूरा चारों तरफ फैला हुआ है। आज इंटरनेट के समय में ज्ञान तक पहुंचना कोई बड़ी बात नहीं है। सही ज्ञान तक पहुंचना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन प्रयास आपको करना पड़ेगा। वहां तक आपको पहुंचना पड़ेगा।

यही प्रश्न वेद और उपनिषदों का केंद्र है। जब तक आप अपने आप को नहीं समझेंगे, आप कुछ भी नहीं समझ सकते। ना इस सृष्टि को ना ही अपने जीवन की हर समस्या का अंत कर सकते हैं। तो आत्म का बोध होना चाहिए। आत्म बोध यही इसी को बोला जाता है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति। ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति। जब हम इसको कर लेते हैं तो धीरे-धीरे हर चीज जो होता है फिर संतुलित होना प्रारंभ हो जाता है।

एक गुणों के आधार पर तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं। देखिए हर मनुष्य में त्रिगुणात्मक प्रकृति होती है। सत रजो उत्तम। तो इसको हम ऊपर ऊपर से थोड़ा समझ लेते हैं। आज आगे की कक्षाओं में क्या हम इसको डीपली समझेंगे। आप लोग जैसा बताएंगे उस हिसाब से हम जाएंगे। तो गुणों के आधार पर तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं और संपूर्ण सृष्टि इनहीं तीनों गुणों से बनी हुई है सभी में चाहे चाहे वो जड़ हो चाहे चेतन तत्व हो चाहे पशु हो पक्षी हो सब में ये तीनों गुणों की प्रधानता होती है सत रज उत्तम ठीक है इसको हमने भगवत गीता में भी देखा है और सभी शास्त्र में इसी बात की इसी की बात हुई है त्रिगुणात्मक प्रकृति इसे कहा जाता है प्रकृति के तीन गुण है तीन कण है सत और तम तो देखिए सतोगुणी जो व्यक्ति होता है वो क्या करता है शांत रहता है सात्विक उसमें सात्विकता होती है उसमें विवेकशीलता होती है ज्ञान प्रिय होता है जीवन का उद्देश्य उसका होता है मुक्ति इससे दुखों से समस्या को सॉल्व करने का प्रयास करता है आत्म कल्याण होता है अपना कल्याण करना उसका ध्यान केवल धन पर नहीं होता उसका ध्यान शांत जीवन में होता है सात्विकता में होती है विवेकशीलता में होती है ज्ञान प्रियता होता है उसमें जीवन का उद्देश्य मुक्ति होता है समस्याओं का समाधान करना वो जानता है मोक्ष की तरफ वो अपने जीवन को ले जाता है और वो जानता है कि अल्टीमेट गोल जीवन का मोक्ष है। आप कुछ भी प्राप्त कर लो शांति आपको किसी भी चीज से नहीं हो सकती। केवल आध्यात्मिक ज्ञान से ही आपको शांति प्राप्त होगी। आप भौतिक उन्नति तो बहुत कर सकते हैं। ठीक है? लेकिन आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए आपको केवल और केवल ज्ञान के शरण में आना पड़ेगा। गुरु के शरण में आना पड़ेगा। स्वयं से प्रयास करने पड़ेंगे। तो सात्विक गुण जो सत्य का अनुसरण करता है और ज्ञान का अनुसरण करता है उसको जाने का।

रजोगुण वाले मनुष्य किस तरह के होते हैं? देखिए क्रियाशीलता होती है। उसमें गतिशीलता होती है। चंचलता उसमें होती है।त्वाकांक्षी होती है। बहुत अधिक बड़े-बड़े चीजों की इच्छा करता है। वो भौतिक उन्नति की रुचि रखने वाले लोग होते हैं। भौतिक उन्नति चाहिए उसे बहुत अधिक बहुत अधिक धन संपत्ति ऐश्वर्य उसे चाहिए। लेकिन उसे बैलेंस करने के लिए धन संपत्ति ऐश्वर्य तो आ गया लेकिन उसे बैलेंस करने के लिए आध्यात्मिक उन्नति उसे नहीं चाहिए। उसमें रजोगुण प्रधान होता है। राजा महाराजाओं का गुण क्या है? राजा महाराजा क्या होते हैं? ऐश्वर्य युक्त होते हैं। ठीक है? बलवान होते हैं। सामर्थ युक्त होते हैं। तो उनमें भी यही गुण होते हैं। रजोगुण प्रधान होते हैं। क्रियाशीलता होती है। होते हैं। भौतिक उन्नति में उनकी रुचि होती है। धन संपत्ति ऐश्वर्य में धन यश भोग के पीछे दौड़ते रहते हैं।

तमोगुणी जो व्यक्ति होते हैं उसके क्या होते हैं? देखिए वो आलसी होते हैं। करने की इच्छा नहीं होती। कुछ भी अज्ञानी होते हैं। एक तो जन्म से हम अज्ञानी हुए हैं और जन्म लेने के पश्चात भी हम अज्ञानी रहना पसंद करते हैं। ऐसे लोग मोहग्रस्त होते हैं। अत्यधिक मोह में पड़े रहते हैं। हिंसक होते हैं। विध्वंसक होते हैं। ये प्रवृत्त इनमें होती है। अधर्म की ओर इनका झुकाव होता है। हमेशा जो है देखना जो गलत चीजें हैं उन पर इनका जो है झुकाव होता है। वो हमेशा सृष्टि में कुछ ना कुछ गलत चीजें करते रहते हैं। जो सृष्टि के लिए उसके लिए भी खतरनाक होती है। ठीक है? ये हम जानते हैं इस प्रकार के लोग कौन लोग है तो आसपास आप जो भी अब लोग देखते हो अगर इन प्रकृति के हैं आप सबसे पहले जिससे भी उठते बैठते हो उनकी प्रकृति डिसाइड कर लो वो किस तरह की प्रकृति आप समझ लो उनको कि वो सतोगुणी है तो वो ज्ञान की तरफ उनका आकर्षण होगा अगर वो रजोगुणी है तो भौतिक उन्नति की तरफ उनका सबसे अधिक आकर्षण होगा अगर वो तमोगुणी है वो ना इन दोनों में किसी पर आकर्षण नहीं होगा उनका काम होगा केवल केवल पड़े रहना भोग करना जो उनका अभी वर्तमान स्थिति है उस पर ही वह चिपके रहते हैं। उस पर ही टिके रहते हैं। उसको सुधारने का प्रयास वो नहीं करते। ना ही आत्म उन्नति का प्रयास करते हैं ना ही भौतिक उन्नति का प्रयास करते हैं। जो है उसके पास उससे वो संतुष्ट हो जाता है। वो आलसी हो जाता है। अज्ञानी होता है। मोहग्रस्त हो जाता है। ठीक है? इस प्रकार के होते हैं। तो ये तीन कैटेगरी होते हैं मनुष्य के। एक ऊपर ऊपर का हमने ओवरव्यू ले लिया। अब आगे देखते हैं।

यह जो तीनों गुण है ना सभी मनुष्य में जो होते हैं लेकिन किसी एक गुण की उसमें प्रधानता होती है। तीनों गुण सभी मनुष्य में होते हैं। प्रकृति के सभी कण में तीनों गुण होते हैं। लेकिन किसी एक की प्रधानता उसमें अधिक होती है। जो जिसमें सतोगुण की अधिक प्रधानता होगी तो सतोगुणी बन जाएगा। जिसमें रजोगुण की अधिक प्रधानता होगी रजोगुणी बन जाएगा। जिसमें तमोगुण की अधिक प्रधानता होगी तमोगुणी बन जाएगा। होते तीनों गुण है सब में। परंतु जब जिस पर जो गुण हावी हो जाता है, प्रभावी हो जाता है, वह उस प्रकार का व्यवहार करने लगता है। इसका संबंध सीधा सीधा जो है कर्म से भी है। इसका संबंध सीधा-सीधा पुनर्जन्म से भी है। कर्म फल सिद्धांत से भी इसका संबंध है हमारे। ठीक है? तो आगे की कक्षा में इसको समझेंगे।

भक्ति भाव के आधार पर देखिए चार प्रकार होते हैं। जो हमने पिछली कक्षा में देखा था। एक दुखी प्रकार के होते हैं। भक्ति भाव मतलब जो ईश्वर पर आस्था रखते हैं। लेकिन वह दुख दूर करने के लिए ईश्वर को ईश्वर की पूजा अर्चना करते हैं। ईश्वर को जानना चाहते हैं। ईश्वर के पास अपना दुख लेकर के आते हैं। अर्थार्थी मतलब इच्छाओं की पूर्ति चाहते हैं। जिज्ञासु मतलब जानना चाहते हैं। एक्चुअल में सही क्या है? गलत क्या है? इसमें भी कुछ परसेंट लोग यह जानने का प्रयास जो लोग करते हैं उसमें भी कुछ परसेंट लोग ज्ञानी बन पाते हैं। जो सच्चा आत्मज्ञानी बन पाते हैं। निष्काम भक्त बन पाते हैं ईश्वर के। ठीक है? तो ये किसके आधार पर है? भक्ति भाव के आधार पर। तो आप किस कैटेगरी में आते हैं? किस में है? अभी आप स्वयं एनालाइज करिए। क्योंकि मैं यह एनालाइज करने के लिए मनुष्य को हमें समझना पड़ेगा। सबसे पहले हम कर क्या रहे हैं? हम है क्या?

आचरण के आधार पर दो प्रकार। अब आचरण के आधार पर है। यह भक्ति भाव के आधार पर है। उसके बाद पहला क्या था हमारा गुणों के आधार पर प्राकृतिक गुणों के आधार पर ठीक है आचरण के आधार पर दो प्रकार के एक धर्म का आचरण करने वाले धर्म के अनुसार चलने वाले और दूसरा जो धर्महीन मतलब अधर्म के अनुसार चलने वाले पशुव जीवन जीने वाले इनको कोई मतलब नहीं है धर्म से इनको कोई मतलब नहीं है आध्यात्मिक उन्नति से ये धर्महीन होते हैं अधर्म का कार्य करते हैं सृष्टि में हमेशा इनका काम होता है कि उत्पात मचाना यहां पर सृष्टि में जो जो भी उथलपुथल मचाना इनका काम होता है धर्महीन वाले होते हैं। तो आचरण के आधार पर एक होता है धर्म युक्त एक होता है अधर्म युक्त दो प्रकार के मनुष्य होते हैं।

उसके बाद जीवन के उद्देश्य के आधार पर तीन प्रकार के होते हैं। देखिए इसमें वेदांत वेदांत में ऋषियों ने कहा है कि एक होता है भोगी। केवल भौतिक सुख में रमा रहता है। एक होता है योगी संयम में रहने वाला होता है। साधना पथ पर चलता है। लेकिन एक लेवल तक ही वह साधना कर सकता है। पर एक ज्ञानी होता है जो आत्म स्वरूप में स्थित हो जाता है। जो ब्रह्म को जान लेता है या फिर ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति कर लेता है। तो भोगी, योगी और ज्ञानी ये तीन प्रकार के हमारे यहां पर जो होते हैं। जीवन के उद्देश्य के आधार पर तीन प्रकार के लोग होते हैं।

अब निष्कर्ष क्या निकला? देखिए इन तीन चीजों में चार चीजों में हमने क्या गुणों के आधार पर सात्विक रासिक तामसिक एक्चुअल में मेन ये है सात्विक रासिक तामसिक यही से सबकी उत्पत्ति हो रही है सात्विक रासिक और तामसिक इसको हमने अगर अच्छे से समझ लिया तो आगे जितने भी प्रकार के मनुष्य है उनमें क्या-क्या गुण है तो आप ऑटोमेटिकली देख करके थोड़ा सा बात करके उनसे चर्चा करके आप समझ लोगे कि सात्विक प्रकृति का है रासिक प्रकृति का है या तामसिक प्रकृति ऑटोमेटिकली आप समझ जाएंगे भक्ति के अनुसार ये चार होते हैं धर्म के अनुसार धार्मिक और अधार्मिक होते हैं और जीवन के उद्देश्य के अनुसार भोगी योगी और ज्ञानी होते हैं। मनुष्य शरीर में जन्म लेने लेकर भी कौन सा मनुष्य हम बनेंगे? किस प्रकार का मनुष्य हम बनेंगे? यह हमारे विचार, गुण और आचरण ही निर्धारित करते हैं। तय करते हैं। धन, संपत्ति, ऐश्वर्य पैसा नहीं करते। यह हमारे क्या करते हैं? आचरणों से, विचारों से, हमारे गुणों से। आप 10 मिनट किसी से विचार करेंगे, आचार आदान प्रदान करेंगे, चर्चा करेंगे तो आप समझ जाते हैं कि यह व्यक्ति का झुकाव किस प्रकार का है। सात्विक प्रकार का है, रासिक प्रकार का है या तामसिक प्रकार का है। ठीक है?

तो आज और एक समझ लेते हैं कि ज्ञान, ज्ञ और ज्ञाता को हमने लास्ट क्लास में समझा था। तो इसको थोड़ा सा और डिटेल में समझते हैं। ज्ञान जानने की शक्ति। हमने समझा ज्ञान क्या है? जानने की शक्ति एक माध्यम जिसके द्वारा हम ज्ञान की प्राप्ति करते हैं। गे जानने योग्य वस्तु क्या है? ब्रह्म आत्मा और सृष्टि ज्ञाता कौन है? जो जानता है जीवात्मा हम ज्ञाता है। तो जानने की शक्ति हमें कहां से प्राप्त होती है? इंफॉर्मेशन हमें कहां से प्राप्त होती है? देखिए ज्ञान का मूल सोर्स क्या था? हमारा वेद और शास्त्र। सबसे पहला सोर्स हमारा जो है वेद था। ईश्वर ने हमें वेद दिया था। किसके लिए? सृष्टि का ज्ञान प्राप्त करने के लिए और जितने भी ज्ञान आज विज्ञान की उन्नति हुई है इसी से ही हुई है। आप लोग चाहे माने ना माने रिसर्च करिए समझिए चीजों को। हमने रिसर्च किया है जाना है समझा है। जितने भी भौतिक उन्नति हुई है जितने भी वैज्ञानिक उन्नति हुई है। इसी के कारण हुई है। समय-समय पर इसी से ही ज्ञान जो है निकला हुआ है। ऋषि मुनियों के परिश्रम के द्वारा ही ये हुआ है। तो ज्ञान का मूल स्रोत कहां पर है? शास्त्रों में है वेदों में। वही से हम जानते हैं यह सृष्टि कैसा है? यह शरीर कैसा है? हम कौन है? परमात्मा के गुण कौन-कौन से हैं? परमात्मा को किस प्रकार से जानना है? सृष्टि के नियम कौन-कौन से है? जब हम यह जानते हैं तभी ज्ञान की प्राप्ति। तो ज्ञान का स्रोत क्या है? वेद और शास्त्र। इसके द्वारा ही हम ज्ञान की प्राप्ति करते हैं।

अब देखिए 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरुकुल में यह ज्ञान दिया जाता था। हमें बताया जाता था वेद पाठ करवाया जाता था। शास्त्रों का अध्ययन करवाया जाता था। अनेक प्रकार के और भी विषयों का अध्ययन वहां पर किया जाता था। आत्मिक उन्नति के साथ साथ भौतिक उन्नति पर भी वहां पर संतुलन स्थापित करवाया जाता था। तो ज्ञान का स्रोत वेद है, शास्त्र है। 25 वर्ष तक आयु तक कोई भी मनुष्य जो है गुरुकुल में जाता था पहले और ब्रह्मचर्य का व्रत पालन करता था 25 वर्ष की आयु तक और वो इस ज्ञान को धारण करता था। परंतु आज क्या हो गया? 25 वर्ष की आयु तक क्या हम इसके बारे में बात करते हैं? में कहीं पर भी बात होती है क्या? बिल्कुल भी नहीं। इसीलिए सारी समस्याएं हैं। क्योंकि मनुष्य का जीवन का जो पहला भाग है ना वो जिस प्रकार जाता है जिस संगति के साथ उठता बैठता है, जिन प्रकार के गुणों को वो धारण करता है, जो जिस प्रकार की शिक्षा को ग्रहण करता है, उसके आने वाले जीवन को भी वह निर्धारित करता है। उसको प्रभावित करता है। तो पहले 25 वर्ष की आयु तक क्या होती थी? ब्रह्मचर्य का जो है व्रत पालन करके गुरुकुल में यह शिक्षा दी जाती थी। धर्म अधर्म की वेदों के द्वारा शास्त्रों के द्वारा गुरु गुरु के द्वारा आचार्यों के द्वारा उसको कहा जाता था आश्रम ठीक है आश्रय लेकर श्रम करना मनुष्य के जीवन के देखिए चार आश्रम है एक है ब्रह्मचर्य तो ब्रह्मचर्य में हमें गुरुकुल में जाना होता था 25 वर्ष तक हमें शिक्षा दीक्षा ग्रहण करनी होती थी आज गुरुकुल व्यवस्था समाप्त हो गुरुकुल समाप्त होने के कारण ही सबसे बड़ी समस्या क्योंकि हमने कुछ भी जाना नहीं सीखा नहीं जब हम अध्यात्म विद्या को ग्रहण नहीं किया हमने किसी से नहीं जाना तो हम उसको बिना जाने जब हम आचार विचार व्यवहार करने लग गए लोग व्यवहार करना शुरू कर दिया तो सारी समस्या यही से उत्पन्न हुई जब हम पहले से जान लेते 25 वर्ष की आयु तक सब कुछ जान लेते आत्मा परमात्मा भौतिक उन्नति का ज्ञान सब कुछ प्राप्त कर लेते उसके पश्चात अगर हम गृहस्थ बनते वानप्रस्थ बनते सन्यासी बनते तो पहला जो समय है हमारा 25 वर्ष का ये बहुत ही ज्ञान और उन्नति का समय है हमारे जीवन में तो यह समय अगर सही प्रकार से सही दृष्टिकोण से सही दिशा में सही शिक्षा में व्यतीत हुआ तो आने वाला भविष्य जो है वो भी सही हो जाएगा। यह आजकल ब्रह्मचर्य का व्रत कोई पालन भी नहीं करता। गुरुकुल शिक्षा पद्धति भी नहीं है। जिस कारण से 25 वर्ष की आयु तक केवल और केवल भौतिक शिक्षाएं दी जाती है। कंपटीशन एंड कंपैरिजन सिखाया जाता है। जिस कारण से यह सारी समस्या हमारे जीवन में उत्पन्न हुई है।

हमारे वेद कहते हैं कि हमारा यह जो मनुष्य का शरीर है उसकी आयु 100 वर्ष का है। जीवेत शरद शतम 100 वर्ष तक जियो और अपने नाती पोते तक उन तक जो है अपने ज्ञान को प्रचार प्रसारित करो। तो हर एक जीवन के हर एक चरण को 252 वर्षों में बांट दिया गया है। मतलब 100 वर्ष का आपका जीवन है तो ब्रह्मचर्य 25 वर्ष का है। गृहस्थ 25 वर्ष का है। ब्राह्मण पस्त 25 वर्ष का है। सन्यास 25 वर्ष का है। मतलब आप 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य रहेंगे। आपकी अगर इच्छा हुई तो आप गृहस्थ में चले जाइए। फिर 25 वर्ष की आयु में गृहस्थ बन जाइए। विवाह करिए। समाज के संचालन में सहभागिता निभाइए और समाज को जो है शिक्षित करके धनधान्य से संपन्न बना करके एक अच्छे समाज का निर्माण यहां पर करना है। ठीक है? तो विवाह आश्रम में हम गए गृहस्थ आश्रम में उसके बाद 50 वर्ष की आयु जैसी हुई आप वनपस में चले जाओ। 50 50 वर्ष के पश्चात 75 वर्ष की आयु जैसी हुई आप सन्यास में चले जाइए। ये सिस्टम हमारे ऋषियों ने हमारे लिए बनाया था। तो 25 वर्ष की आयु में हमने ज्ञान प्राप्त किया। उसके पश्च उसी ज्ञान के आधार पर हमने विवाह आदि किया और उसी ज्ञान के आधार पर हम समाज का संचालन भी कर रहे हैं क्योंकि शिक्षा दीक्षा हमारी इसी प्रकार से हुई है। अब उसी ज्ञान के आधार पर हम जो है आगे जीवन में बढ़ेंगे तो हमारा कल्याण ही होगा। हमारे जीवन में समस्या आएंगी प्रॉब्लम आएंगी लेकिन उसको हम डील हम अलग प्रकार से करेंगे। हमारा मार्गदर्शन अलग प्रकार से होगा। हमारा दृष्टिकोण अलग प्रकार से होगा। ठीक है? तो आश्रम में हम क्या करते थे? इन चारों आश्रम में हम क्या करते थे? जिसका आश्रय लेकर मनुष्य जो है श्रम करे। जिसका आश्रय लेकर मनुष्य जो है परिश्रम करें। हर एक आश्रम का अपना अपना एक उत्तरदायित्व है जिसको हम आगे की कक्षाओं में समझेंगे। तो ये जो चीजें नहीं हो रही है आज ये चीजें नहीं हो रही है जिस कारण से जो पूरी समस्या है।

हमारे शास्त्र कहते हैं यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे। ठीक है? जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है। हम अलग नहीं है। अगर हमने इसको समझ लिया हमारे शरीर को समझ लिया। अंदर जाकर के हमने भीतर में जाकर के अपने आप को समझ लिया तो ऑटोमेटिकली आप पूरा ब्रह्मांड को समझ गए। जब अपने आप को समझ जाते हो संपूर्ण ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। तो आप उस प्रकार से फिर क्या हो जाते हो? आप न्यूट्रल हो जाते हो। पक्षपाती नहीं होते। जो धर्म के साथ है आप उसी का साथ देते हो। आप सत्य का अनुसरण करते हो। केवल और केवल जो है आपकी दृष्टि धर्म के प्रति जो होती है निर्दिष्ट हो जाती है।

अब देखिए न्याय दर्शन क्या कहता है? न्याय दर्शन कहता है कि ज्ञान के मुख्य तीन स्रोत है। मनुष्य ज्ञान प्राप्ति जो है इन प्रकार से कर सकता है। अब कैसे प्रत्यक्ष कोई चीज अगर कोई घटना अगर प्रत्यक्ष घटित हुई आपके सामने घटित हो रही है। देख के आपको ज्ञान की प्राप्ति होती है। प्रत्यक्ष न्याय दर्शन में आठ प्रकार के प्रमाण की बात हुई है। उसमें से मुख्य रूप से तीन जो प्रमाण होते हैं ये विशेष रूप से हर एक मनुष्य को जानना जरूरी है। तो न्याय दर्शन की बात मैं यहां कर रहा हूं। महर्षि गौतम ने इसकी रचना की है। दर्शन में उन्होंने इसको डिटेल से वर्णन किया है। अगर आपको तर्क वितर्क समझना है। तर्क क्या होते हैं? डिसीजन मेकिंग समझना है तो न्याय दर्शन आपको पढ़ने पड़ेंगे। न्याय दर्शन में पूरा डिटेल में इसको समझाया गया है। पहले तर्क वितर्क डेवलप होता है मनुष्य के। कैसे हम चीजों को जाने कि यह सही है या गलत है। क्योंकि कोई भी आकर के आज इंफॉर्मेशन का युग है और सभी अपनी-अपनी बातें करते हैं। तो कौन सही बोल रहा है, कौन गलत बोल रहा इसका निर्णय निर्धारण होगा कैसे? न्याय दर्शन से होगा। तो आठ प्रकार के प्रमाण यहां पर बताए गए हैं। जिसमें से तीन प्रमाण बहुत ही आवश्यक है। सबको जानना चाहिए। किसी भी शास्त्र को पढ़ने से पहले न्याय दर्शन को पढ़ना जरूरी है। क्योंकि यहां से हमें तर्क मिलता है। तर्क करने की शक्ति प्राप्त होती है।

तो ज्ञान के मुख्य तीन स्रोत है उसको जानते हैं। प्रत्यक्ष डायरेक्ट ऑब्जरवेशन। आंखों से देखना, कानों से सुनना जो इंद्रियों के द्वारा डायरेक्ट हमें प्राप्त होता है ज्ञान छू करके, देख के, टच करके जो इंद्रियों से सीधा अनुभव होता है वो प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। जैसे सूर्य उगता हुआ दिख रहा है यह प्रत्यक्ष ज्ञान है। सूर्य उगता हुआ दिख रहा है वो प्रत्यक्ष ज्ञान है। अगर कोई आपको बोल दे सूर्य का जो आकार जो है चौकोर है। ठीक है? सूर्य जो है चौकोर है। तो फिर आप उसको क्या कहेंगे? नहीं सूर्य तो गोल है तो सर्कल में है तो प्रत्यक्ष हमने देख लिया प्रत्यक्ष ज्ञान हमने प्राप्त कर लिया ठीक है तो प्रत्यक्ष देख करके आंखों के द्वारा इंद्रियों के द्वारा जो हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है उसको और किसी भी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती तो प्रत्यक्ष ज्ञान सबसे ऊपर है सबसे श्रेष्ठ है।

अब देखिए प्रत्यक्ष जैसे कुछ समय तक मान्यता रही कि पृथ्वी गोल है या फिर चपटी है या फिर समतल है क्या है जब हमने हमारे शास्त्र तो पहले से ही कह रहे हैं कि भूगोल हमारे वेदों में लिखा हुआ है पृथ्वी गोल है तो उसके बारे में पूरा डिटेल में वर्णन है | लेकिन आधुनिक समय में इसकी एक समय चर्चा हुई कि पृथ्वी गोल है या नहीं है जब विज्ञान में उन्नति हमने किया तो हम जब ऊपर गए हम अंतरिक्ष में जाकर के देखा तो पृथ्वी गोल है | गोल है तो ये प्रत्यक्ष प्रमाण हो गया हमने जाकर के देख लिया प्रत्यक्ष प्रमाण तो हमारे ऋषियों ने उसको जाना था और उन्होंने लिख दिया था ये पृथ्वी गोल है। तो इस प्रकार से प्रत्यक्ष देख के जो हमें ज्ञान प्राप्त होती है उसको बोलते हैं प्रत्यक्ष प्रमाण।

फिर अनुमान अनुमान के द्वारा हमें कुछ ज्ञान प्राप्त होती है। अब अनुमान कैसे होता है? किसी चीज को देख के उसके पीछे के कारण का ज्ञान लग जाता है। ठीक है? जैसे धुआ देख के समझना कि कहीं आग लगा है। आप धुआ देख रहे हैं और समझ गए कि बिना आग के तो धुआ होगा नहीं। तो पीछे का कारण जैसे आप जान लेते हो ऑटोमेटिकली समझ में आ जाता है कि इसके पीछे कौन है। तो इसी प्रकार से यह है जैसे किसी भी एक व्यक्ति को देख के आपको समझ में आ जाता है कि यह हो सकता है इसका पुत्र है। इसका पति अनुमान लग जाता है ना हमारा तो इसी यही होता है। प्रत्यक्ष के लिए भी अनुमान की आवश्यकता होती है कभी-कभी। जैसे आप जा रहे हैं तो एक्सीडेंट हुआ कोई तो एक्सीडेंट आपने देखा देख करके आपने क्या अनुमान भी लगाया ना वहां पर कैसे हुआ होगा? किस प्रकार से हुआ होगा? कितनी क्षति हुई होगी। ये तो अनुमान जो प्रत्यक्ष के साथ जुड़ा होता है प्रत्यक्ष भी अनुमान पर निर्भर होता है। तो आशा है आप समझ गए होंगे कि अनुमान हम क्या करते हैं पीछे के कारण को देख के जब हम ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं कि ये चीज ऐसा हुआ हो। ठीक है?

शब्द प्रमाण एक होता है प्रत्यक्ष एक होता है अनुमान। जब हम इन दोनों से नहीं जान पाते कोई चीजें तो हम क्या करते हैं? शब्द प्रमाण के शरण में चले जाते हैं। ये सबसे महत्वपूर्ण है। अब प्रत्यक्ष और अनुमान क्या है? जिसको हम इंद्रियों से सीधासीधा जान सकते हैं। अब इंद्रियों से सीधासीधा जान किसको सकते हैं? शरीर को जान सकते हैं और शरीर से संबंधित चीजों को जान सकते हैं। परंतु कुछ ऐसी चीजें है जो हम इंद्रियों से नहीं जान सकते। आपने श्री कृष्ण को देखा है, श्री राम को देखा है? नहीं देखा है। वो हमारे समय में नहीं गए। लेकिन उनके बारे में हमने बहुत सारी कहानी पढ़ी। किनके द्वारा? ऋषियों के द्वारा। तत्व दृष्टा ऋषियों के द्वारा। यही शब्द प्रमाण हो गए। हमने उनके द्वारा श्री कृष्ण को जाना। हमने उनके द्वारा श्री राम को जाना। हमारे महापुरुषों को जाना। परंतु हम उस समय उत्पन्न तो हुए नहीं थे। ठीक है? तो जो आप पुरुष है, जो श्रेष्ठ पुरुष है, सत्य वक्ता है, जो ऋषि है, उनके शब्द भी प्रमाण के अंतर्गत आते हैं। अगर ऋषियों ने कुछ लिखा है तो उसके पीछे कुछ ना कुछ कारण अवश्य है। तो उनकी प्रमाणिकता हो जाती है। तो इसे कहते हैं शब्द प्रमाण। ठीक है? सब चीज हम प्रत्यक्ष और अनुमान से नहीं जान सकते। हमें शब्द प्रमाण पर भी जाना पड़ेगा। जैसे इतिहास की जो भी घटनाएं हैं इतिहास में दर्ज की जाती है। उसको जो है उसमें रिकॉर्ड किया जाता है, लिखा जाता है, रखा जाता है। तो ये आने वाली पीढ़ी के लिए क्या हो जाते हैं? शब्द प्रमाण हो जाते हैं कि उस समय ये घटना घटित हुई थी। तो ऋषियों ने जो अनुभव से जाना उसे शब्द में प्रकट किया। रामायण, महाभारत, दर्शन, उपनिषद, गीता आदि में। यही शब्द प्रमाण है हमारे लिए। हमें क्या करना है? इनको आंख बंद करके विश्वास नहीं करना है। ईश्वर ने बुद्धि दिया है। अंधविश्वास हो जाता है। फिर ठीक है? ईश्वर ने हमें बुद्धि दिया है। हम रामायण, महाभारत, दर्शन, उपनिषद, गीता पढ़े, बुद्धि भी लगाए, तर्क भी करें, मनन करे, चिंतन करें तभी जो है हम सत्य तक पहुंच पाएंगे। यह पढ़ केवल मान लेना नहीं है। आचारों में, विचारों में लाना पड़ेगा। उसके लिए हमें क्या करना पड़ेगा? श्रद्धा रखनी पड़ेगी। श्रद्धा कैसे आती है? तर्क से आती है, प्रश्न से आती है। जब हम उसको समझ जाते हैं हां यही सत्य है। एकमात्र और कुछ भी नहीं। वो कहां से आएगी? चिंतन मनन से आएगी। तो गुरुजन आचार्य योग्य विद्वानों से सुना गया ज्ञान शास्त्रीय भाषा में इसे आप वाक्य भी कहते हैं। यही सबसे ऊंचा स्रोत माना गया है ज्ञान प्राप्ति। ठीक है? क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान कई बार धोखा दे सकते हैं। पर आप पुरुष के वाक्य सत्य वक्ता के जो वचन होते हैं वह अंतिम प्रमाण होता है।

अब देखिए वेदों की रचना तो हमारे समय में हुई नहीं है। हमें पिछली पीढ़ी से पता चला कि वेद इस प्रकार से उत्पन्न हुए। उनको ऐसे पता चला। उनको ऐसे पता चला। उनको ऐसे पता चला। तो पीढ़ी दर पीढ़ी जो ज्ञान आगे बढ़ा है। किसी से बढ़ा है। ये शब्द प्रमाण से आगे बढ़ा है। ठीक है? तो यह शब्द प्रमाण बहुत आवश्यक है। बहुत महत्वपूर्ण है। हर व्यक्ति को इस शब्द प्रमाण पर सबसे पहले श्रद्धा उत्पन्न करनी होगी। तभी हम सत्य ज्ञान तक पहुंच सकते हैं।

तो आज की कक्षा में इतना ही। अगली कक्षा में इसको आगे डिटेल में देखते हैं। अब मुझे एक बात आप बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए कि सनातन धर्म के जो सिद्धांत है उनको डीपली टच करते हुए आप लोगों के साथ आगे बढ़े या फिर हम केवल और केवल जीवन प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए इस कक्षा को आगे बढ़ाना चाहिए। जी

>> सर सनातन के जो थ्योरीज है उनको डीपली प्लीज समझा दीजिए एक बार फिर मौका नहीं मिलेगा हमको आप समझा दीजिए

>> ठीक है आगे और

>> जी नमस्ते

>> जी नमस्ते

>> मैं जो न्याय दर्शन का जो तीन पॉइंट बता है उसको मैं और थोड़ा डीपली समझना चाहता हूं।

>> ठीक है। देखिए इसका एक सेपरेट क्लास होगा जिसमें हम परमाणु की बात करेंगे तो उस कक्षा में इसको डिटेल में समझेंगे। आज जो है ऑलरेडी 7:00 बज चुका है। तो अगली कक्षा में या फिर आने वाले जो भी कक्षा जहां पर हम इसको डीपली जो है चर्चा करेंगे इस विषय पर वहां पर हम अच्छे से समझ लेंगे। गुरु जी

>> हां

>> दरअसल अभी जो आज की जो आप समाज में देख रहे हैं ना जो जो भी प्रॉब्लम्स चल रहे हैं वो रिलेटेबल स्यूशन के साथ अगर स्टडी हो पाए तो ज्यादा अच्छा है। ठीक है।

>> बिकॉज़ जो मॉडर्न मॉडर्न हमारी जो लाइफ स्टाइल है

>> उसी उसी को ध्यान में रखते ही हमने ये कक्षा प्रारंभ की कि आज के समय के अनुसार उसको रिलेटेबल कैसे बनाया जाए।

>> मेरे साथ में बहुत से लोग थे। उन्होंने डाउट को मतलब थोड़ा क्रिएट किया था कि इसमें क्या कंटेंट होगा? तो मैंने एक दो लोगों को बोला भी कि नहीं नहीं इसे मैं जानती हूं। वैदिक गुरुकुल का जो कंटेंट है तो काफी पहले नेटवट पे भी देखा हुआ था। बट लोग आने से थोड़ा इसलिए झिझकते हैं क्योंकि इनको मॉडर्न लाइफ स्टाइल से रिलेटेड जो भी प्रॉब्लम्स है ना उनके सशंस नहीं मिल रहे हैं। मतलब एवरीबody इस लाइक वेरी टिक फॉर टैड टाइप मतलब लाइक रेडी टू ईट वाला जो हमारा टाइम चल रहा है ना गुरु जी हम

>> तो उसमें थोड़ा डीप में आप जाएंगे

>> एक चीज एक एक चीज हमें ये भी समझनी पड़ेगी देखिए सृष्टि जब उत्पन्न हुई

>> ठीक पहली पीढ़ी की बात करो मनुष्य की पहली पीढ़ी तो कभी ना कभी उत्पन्न हुई थी ना हम

>> उस समय भी सूर्य वही था सृष्टि के नियम भी वही थे मनुष्य का शरीर भी यही था प्रकृति के नियम भी यही थे सब कुछ यही थे

>> कुछ परिवर्तन हुआ क्या आज के समय से उस समय में केवल एक परिवर्तन मनुष्य बदल गया उसके आचार विचार बदल गए सब कुछ वही वही सूर्य है वही सूर्य है वही चंद्र है वही सृष्टि के नियम है वही सब कुछ है वही परमात्मा है वही आत्मा है लेकिन बदल कौन गया बदल मनुष्य के

>> बट गुरुजी एक चीज थोड़ी समझनी पड़ेगी कि अगर जैसे अगर हम किसी से जुड़ते हैं आपके इस कोर्स के बाद या हम आपके साथ जुड़े हैं तब तो ये ये संबंध हमारा जीवन भर का है। लिए आपके साथ मैं इंटरेक्ट करती रहूंगी, सीखती रहूंगी। बट अगर हम इसको किसी बच्चे को डिलीवर करना है, किसी पेरेंट्स को समझाना है तो वो आज की जो मॉडर्न लाइफ स्टाइल है ना ये तो गुरुकुल का मतलब भी नहीं जानते। इतनी स्थिति दयनीय है इन लोगों की कि इन पे तरस भी आता है कि ये किस दिशा में जा रहे हैं। मतलब हर किसी को देख के बहुत बुरा फील होता है कि पूरी तरीके से मटेरियलिस्टिक हो चुके हैं हर हर कोई और पेरेंट्स ज्यादा पथ भ्रमित है। बच्चों पे तो तरस आता है कि किनके हाथों में है। सबसे बड़ी दयनीय स्थिति हमारे एज अ पेरेंट्स की है कि मतलब इनको सीखना ज्यादा जरूरी है। तो आई डोंट नो इस क्लास में इतने कम लोग क्यों हैं? जबकि अवेयरनेस की रिक्वायरमेंट तो अब बिल्कुल लास्ट स्टेज पर है। हम बिल्कुल इमरजेंसी में खड़े हैं। अगर हमारे पेरेंट्स जागरूक नहीं है तो वो तो आगे आने वाला जो हो रहा है वो आप देख ही रहे हो। बट इनको इनको कनेक्ट करने के लिए बहुत रिलेटेबल स्यूशन देना बहुत जरूरी है। आज की डेट में जो चल रहा है उससे हम कैसे क्योंकि ये तो सुनना ही नहीं चाहते। ये तो जानना ही नहीं चाहते। ये तो हिंदू होकर भी हिंदुत्व को नहीं समझना चाहते ना सनातन को समझना चाहते। ये बिल्कुल रिबेलियस हो रखा है। बहुत छोटेोटे बच्चे 121 साल जी प्राची जी प्राची जी सबसे पहले आप उनको समझाना क्यों चाहते हैं जो समझना ही नहीं चाहता। पहले प्रॉब्लम को समझिए। आप

>> हम आपके मन में नहीं है।

>> आप आपके मन में इसलिए दुख उत्पन्न होता है इन चीजों को देख के कि वो इंटरेस्ट ही नहीं है ना इस ज्ञान में। वो आध्यात्मिक है ही नहीं। वो जानना ही नहीं चाहता। क्यों आप जबरदस्ती उसको ले आना चाहते? जो जानना चाहेगा वो स्वयं से आएगा। स्वयं से आएगा।

>> वो तो मैं समझ रही हूं। आपकी बात समझ रही हूं। जी जी बिल्कुल सही कह रहे हैं आप।

>> अध्यात्म में ना क्या होता है पता है? थोपा नहीं जाता अध्यात्म। अध्यात्म में उंगली पकड़ा जाता है।

>> तो मैं समझ रही हूं। बिल्कुल

>> उंगली पकड़ा जाता है अध्यात्म में।

>> हां जी बिल्कुल बिल्कुल।

>> तो आपकी जो भी प्रॉब्लम है आपका जो प्रॉब्लम है मैं सिंपल से एक शब्द में बोल देता हूं। आज से हम जो भी सीखेंगे इस कक्षा में हम जो भी अटेंड कर रहे हैं जो भी विषय होंगे बिल्कुल रिलेटेबल होगा और आज के समय को ध्यान में रखते हुए उसका सलूशन देने का ही प्रयास करेंगे। हमने मॉड्यूल में वही रखा है।

>> जी जी

>> में वही हमने रखा है। उसके बाद हम डिस्कस करेंगे।

>> एक्चुअली यही होना चाहिए कि मतलब हम जो चल रहा है ना अभी तो चल ही रहा है। है ना? और अभी 50 60 सालों से तो और भी ज्यादा स्थिति दयनीय हो गई है। बहुत पहले ऐसा नहीं था अभी।

>> जी। हां वो होगा और और 50 साल में पृथ्वी की स्थिति ऐसी होगी देखिए कुछ भी पावरफुल लोग जो है पृथ्वी को कंट्रोल कर रहे हैं उनके जो चला रहे हैं

>> वो जो चाहते हैं वो प्रोडक्ट बना रहे हैं और हमें बेच रहे हैं पूरा का पूरा कंट्रोल उनका है

>> जब तक हम जब तक हम जागरूक नहीं हो जाएंगे हमें ये समझ में नहीं आ जाता है कि क्या गलत हो रहा है तब तक ये पृथ्वी जो है धीरेधी नष्ट

>> आप बिलीव नहीं करेंगे मैं एज अ टीचर गुरुजी वहां पढ़ा रही थी अपने स्कूल्स में तो मैंने वो जॉब इसलिए छोड़ दी इतना मटेरियलिस्टिक कंटेंट है बच्चे एक वो योगा इंस्ट्रक्टर रखा है वो भी बेचारा दुखी बीमार सा उसकी भी कोई रिकॉग्निशन नहीं है कोई सम्मान नहीं है मतलब लाइक वो योगा क्लास तो लाइक टाइम टाइम पास है तो हम जो ये मेहनत कर रहे हैं आप मेहनत कर रहे हैं ये जो आपने जो मॉड्यूल जनरेट किया है पढ़ाने का ट्राई कर रहे हैं ये है किसके लिए ये ये सीख कौन लोग रहे हैं मतलब प्रॉब्लम तो ये है कि ये बच्चों की कितने मतलब लाइक स्कूल में भी आप योगा क्लास में कोई अपने आप से नहीं आता। या तो अगर किसी की मदद योगा इंस्ट्रक्टर होगी तो वह भेज देगी अपने बच्चे को कि चलो इस क्लब को ज्वाइन

देखिए। लेकिन वहाँ भी बहुत बुरे हाल हैं। अर्थात्, यदि आप विद्यालय के भीतर जाकर देखेंगे तो बच्चों की बहुत ही विकट स्थिति है। बारह-बारह साल, दस-दस साल के बच्चे प्रेम-प्रसंग की बातें कर रहे हैं। प्रेमी-प्रेमिका की बातें कर रहे हैं। तो इसे कैसे... मतलब, यह शुरुआत ही बहुत, वास्तव में, बहुत ही दयनीय स्थिति है। तो मेरा तो आपसे कहना है, आप तो स्वयं भी देख रहे होंगे। तो इसे कैसे... मतलब, इसकी शुरुआत ही बड़ी है और न ही शिक्षक समझना चाहते हैं, और आप गुरुओं से मिलेंगे, शिक्षकों से मिलेंगे। अत्यधिक योग्य शिक्षक हैं और बहुत पेशेवर हैं, लेकिन यदि आप उनसे बात करेंगे, जैसे ही वे मुँह खोलेंगे, तो आपको उनकी स्थिति की दयनीयता का पता चल जाएगा कि हमारे बच्चे इनके हाथों में हैं।

>> जी, बिल्कुल सही। शिक्षा का जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, वह नौसिखियों के हाथों में, अनुभवहीन लोगों के हाथों में है।

>> बिल्कुल, बिल्कुल।

>> अनुभवहीन लोगों के हाथ में है। जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, हम यह भी विश्लेषण नहीं करते या जाँच-पड़ताल भी नहीं करते कि हमारे बच्चों को शिक्षा कौन दे रहा है।

>> पता नहीं यह कहाँ-कहाँ...

>> कौन दे रहा है?

>> बिल्कुल, और ये एकल माता-पिता हैं, केवल चार सौ के लिए भर्ती हो जाते हैं।

क्या वे वास्तव में बच्चों को शिक्षित करने के योग्य हैं? क्या उनमें गुण हैं? क्या उनमें गुरु के गुण हैं? यह बात है।

>> कोई गुण नहीं है। कोई गुण नहीं है। लेकिन फिर भी सभी वहाँ खड़े हैं, है ना? सेनापति बनकर। तो क्या ही करना है, स्थिति बहुत दयनीय है, गुरु जी।

>> जी।

और यहाँ पर अपने मन की बात और जो भी समस्या है, बिल्कुल उसे साझा कीजिए। उसका समाधान हम ढूँढने का प्रयास करेंगे, समझेंगे। उस पर आप भी कुछ चर्चा करेंगे, हम भी कुछ चर्चा करेंगे, तो उससे एक समाधान निकल कर आएगा कि हाँ, मतलब, वास्तव में हम लोगों को क्या चाहिए। हम क्यों जुड़े हैं, ये दो सौ बयालीस लोग हम आपसे किस लिए जुड़े हैं, है ना?

>> गुरु जी, नमस्ते। गुरु जी, नमस्ते। आप यहाँ बहुत बढ़िया शिक्षण कर रहे हैं। हम लोगों को समझ में आ रहा है। अब जिस सरल प्रक्रिया से आप सिखा रहे हैं। पहले तो हम लोग समझेंगे, तभी तो लागू करेंगे।

>> वास्तव में आप बहुत अच्छा पढ़ा रहे हैं।

>> जी, धन्यवाद।

>> आचार्य जी।

>> लोग जुड़े रहें।

>> आचार्य जी।

>> जी, ओम नमस्ते।

>> आचार्य जी।

>> गुरु जी, गुरु जी, प्रणाम।

>> एक-एक करके, एक-एक करके, कृपया एक-एक करके। राहुल कुमार जी, आप बोल रहे थे क्या? बोलिए। जी, जी, आचार्य जी।

आचार्य जी, मैं यह जानना चाह रहा था कि राजसी, तामसिक और सात्विक जो गुण आपने बताए थे, क्या वे व्यक्ति के कर्मों के अनुसार, पूर्व कर्मों के अनुसार ही आते हैं, या माता के गर्भ में और जब माता के गर्भ में शिशु होता है, तो उसके द्वारा किए गए कार्य से भी उसका प्रभाव पड़ता है?

>> देखिए, राहुल जी, आपका प्रश्न बहुत ही सुंदर है। बहुत ही अच्छा है। ऐसे प्रश्न मन में उठने चाहिए। लेकिन इसका उत्तर मैं इतने कम समय में नहीं दे पाऊँगा। मैंने इसीलिए कहा है कि मैं सनातन धर्म को गहराई से स्पर्श करते हुए चलूँ या फिर सीधा ऊपर-ऊपर की बात करते हुए आधुनिक समस्याओं को हल करूँ। इन सब प्रश्नों का उत्तर मैं आपको कुछ ही मिनट में नहीं दे सकता। यह हमें सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर कर्म फल सिद्धांत तक का समझना पड़ेगा, तो यह विषय थोड़ा सा गहरा है। आगे की कक्षाओं में यह स्पष्ट हो जाएगा। बने रहिए। बहुत सुंदर प्रश्न है। ऐसे प्रश्न मन में उठने चाहिए। जी, ओम गुरु जी, ओम गुरु जी, प्रणाम।

>> बिल्कुल, दीदी ने जो प्रश्न उठाए, वे बिल्कुल वाजिब हैं। मैं भी एक विद्यालय चलाता हूँ। मुझे पता है कि बाज़ार में किस तरह की समस्याएँ हैं। तो गुरु जी, आकर, हर घर में, जब आप जैसे इस तरह से हमें वैचारिक रूप से तैयार करेंगे, तो हम भी आगे इस ज्ञान की गंगा को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। उम्मीद से, उम्मीदों से सब कुछ होता है। जी, बिल्कुल।

और जैसा कि देख लें, पिछले दस वर्षों में हम लोगों ने, भारत के लोगों ने, मानसिक रूप से बहुत कुछ बदला है। तो उम्मीद करते हैं कि हम और आगे बढ़ें।

>> जी, देखिए, आप लोग समस्या को समझ पा रहे हैं, जी, बहुत अच्छा है। आप लोग समझ पा रहे हैं कि क्या समस्या है, और वही समझ सकता है जो जागरूक है, है ना? जो जागरूक है, जो समझता है। और यदि आप समस्या को समझ पा रहे हैं, तो उसे हल करने का दायित्व भी आपके पास है। आपका भी कर्तव्य बनता है कि इस समस्या के समाधान के लिए हम भी कुछ योगदान करें।

तो हमें सबको मिलकर योगदान करना पड़ेगा और समाज में जो भी समस्याएँ, जो भी कमियाँ हैं, उनको दूर करना होगा। जी, आगे बोलिए।

>> नमस्ते आचार्य जी, मुझे लगता है कि मतलब ठीक है, मतलब हम लोगों को अभी के हिसाब से भी सीखना चाहिए, पर यदि हम गहराई से जानेंगे कि वास्तव में क्या है, तो ही हम सतही ज्ञान को बाद में कवर भी कर सकते हैं।

>> इसलिए मैं यही कहना चाहती हूँ।

>> क्योंकि अभी हम लोग केवल सतही-सतही करते रहेंगे कि हम लोगों को अभी के आधुनिक ज़माने को सुधारना है। इसके लिए ही हमको ज्ञान चाहिए।

पर और गहराई से कुछ उसमें समझेंगे नहीं, तो मुझे नहीं लगता कि हम लोग आगे चलकर कुछ कर पाएँगे। मुझे मूल ही नहीं पता क्या है, हम केवल ऊपर का ज्ञान लेकर...

>> तो मुझे लगता है कि आप भी थोड़ा मतलब, एकदम पूरी तरह से हम लोगों को बताएँगे, तो उससे हम लोग भी पचास प्रतिशत या बीस प्रतिशत ही आगे ले जाएँगे। ऐसा नहीं कि आप हमको सौ प्रतिशत बता रहे हों तो हम भी सौ प्रतिशत आगे लेकर नहीं जा सकते।

देखिए, रूपाली जी, आपका प्रश्न बहुत अच्छा है। देखिए, मैं समझ रहा हूँ कि आज की समस्या क्या है? आज के जो बच्चे हैं, वे प्रश्न करते हैं, सवाल करते हैं, और वे हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर तोलते हैं। ठीक है? वे वैज्ञानिक रूप से समझना चाहते हैं कि यह क्या है? मुझे बताओ। जब यह उत्तर माता-पिता के पास नहीं होता, तो वे फिर समझने लग जाते हैं कि कोई न कोई समस्या है। तो उनको आज के समय में वैज्ञानिक रूप से सब चीज़ें सिद्ध चाहिए।

तो यदि आप इस कक्षा से बने रहते हैं, यदि हम इसको गहराई से समझेंगे कि वैदिक सनातन धर्म वास्तव में क्या है? इसका मूल कारण क्या है? कहाँ से कैसे उत्पन्न हुआ? तो क्या होगा? एक आपका आधार बनेगा और आप इन तर्कपूर्ण प्रश्नों के उत्तर बहुत अच्छे से दे पाएँगे। अपना पक्ष रख पाएँगे। क्योंकि आज की जो लड़ाई है, वह विचारधारा की लड़ाई है। विचारधारा की लड़ाई चल रही है, है ना? तो यदि आप अपना पक्ष तर्कपूर्ण दृष्टिकोण से रखना चाहते हैं, तो फिर मुझे गहराई से ले जाना पड़ेगा। आपका एक आधार बनाना पड़ेगा। उसके पश्चात हम धीरे-धीरे इसको आगे बढ़ाएँगे। तो इसी प्रकार से आगे बढ़ना ही सही रहेगा। हम इसी को ऐसे ही समझेंगे। जी, राज भूषण जी, आप कुछ बोलना चाह रहे हैं?

>> जी, मैं बोलना चाह रहा था। आपका प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है और इतने लोग जो जुड़े हैं, वे जिज्ञासु ही हैं। और विद्यालयों में क्या हो रहा है, यह तो दिक्कत तो है, लेकिन जो समर्थ हैं और जो पूरी शिद्दत से लगे रहेंगे, वे आपके ज्ञान का लाभ अपने आसपास फैलाएँगे। पहले वे खुद इस बात से अवगत हो जाएँ। अभी बहुत निराशा की बात नहीं है। गिरावट तो बहुत आई है, लेकिन इससे बचाव के लिए आपके जो ज्ञान और शिक्षा मिल रही है, जो प्रेरित हो रहे हैं इन बातों को समझने के लिए, तो यह हमें लाभ देगा। तो इसलिए निश्चित रूप से जो भी जुड़े हैं, वे बड़ी शिद्दत से और बिल्कुल इच्छा स्वरूप ग्रहण किए हैं कि आपसे कुछ ज्ञान पाने को, तो इसमें निराश न हों। हम बिल्कुल बदलेंगे। समय तो बदलेगा। परमात्मा की इच्छा तो है, इसीलिए आपने शुरू किया और इतने लोग, कम ही संख्या में सही, लेकिन जुड़े हैं, तो अवश्य हम अपने काम में बढ़ते चलें। यही हमें लगता है। मेरी इच्छा यही थी कि आपका प्रयास सार्थक होगा और ज़रूर होगा। क्योंकि मैंने प्रयास शुरू किया है और लोग ऐसे नहीं कि बहुत गिर चुके हैं। अंदर में उनके भीतर आत्मा तो ज़रूर है जो इस बात को समझते हैं कि अच्छा क्या है, बुरा क्या है? लेकिन उनको माहौल नहीं मिल रहा है। प्रश्न यही है।

विद्यालयों में भी मैंने बहुत प्रयास किया है। विद्यालय के शिक्षक भी भीतर से बहुत बेचैन हैं कि मैं जो चाहता हूँ, मैं जान रहा हूँ कि मैं गलत कर रहा हूँ। मैं गलत पढ़ा रहा हूँ। विषय को गलत ढंग से रख रहा हूँ। यह इसलिए क्योंकि उन पर प्रशासनिक दबाव होता है, इसलिए वे भीतर से बेचैन तो हैं लेकिन अवसर ढूँढते हैं। और अभी प्रत्येक सप्ताह के शनिवार को विद्यालयों में कार्यक्रम जो नई शिक्षा के आधार पर है कि बच्चों को पुस्तक नहीं पढ़ाना है, बिल्कुल आपको उनके दैनिक जीवन के महत्व की चीज़ बतानी है, तो मैं अनेक विद्यालयों का भ्रमण कर रहा हूँ और सभी शिक्षक, जैसे सूर्य नमस्कार सिखाना है, योग सिखाना है, तो उनके पास इसके लिए ललक है लेकिन कोई उनके पास जाते नहीं हैं। तो मैंने जो भी प्रयास किया है पिछले तीन-चार महीनों में, मैंने देखा है कि यह सफल हुआ है और बच्चे इसमें रुचि लिए और शिक्षक भी साथ दिए हैं, प्रशासन के विरोध के बावजूद भी, क्योंकि उनको नियम-रूटीन में ऐसा मिल चुका है कि आप बच्चों को संस्कारित करें और इन्हीं माध्यम से। तो उनके पास कोई पाठ्यक्रम नहीं है कि हम करें क्या, तो मैं जब इनके, आपके ज्ञान के आधार पर जब मैं प्रयास कर रहा हूँ, तो शिक्षक इसमें रुचि लेते हैं, इसलिए निराश नहीं होना। जी, बिल्कुल, आप लोगों को बता देना चाहता हूँ, राजभूषण जी बहुत समय से हमारे साथ जुड़े हुए हैं। हम लोगों ने बहुत सारी कक्षाएँ एक साथ की हैं। बहुत लंबी, एक-डेढ़ साल लगातार हमने कक्षाएँ ली हैं। उन्होंने समझा है। विनोद गिरी जी हैं। बहुत सारे लोग हैं और यहाँ पर हैं शायद आप लोग। तो इन लोगों ने हमारे साथ बहुत लंबी एक चर्चा की है। हम लोगों ने विचार-विमर्श किया है। अच्छे से समझा है और इन लोगों का प्रयास हर समय रहता है कि उस ज्ञान के द्वारा समाज में हम क्या परिवर्तन कर सकते हैं। हम जिस भी स्तर पर आज हैं, उस पर हम क्या प्रदान करें? एस.के. दीक्षित जी, आप भी शायद पहले से जुड़े हुए हैं।

>> जी, तो।

>> मैंने आपकी ऑफलाइन कक्षाएँ देखी थीं, तो मैंने अब ऑनलाइन, लाइव किया। अच्छा, अच्छा, जी, ठीक है।

तो बहुत सारे लोग हैं जो पहले भी जुड़े हैं, आज भी जुड़े हुए हैं। तो हम, देखिए, मेरे अकेले के प्रयास से कुछ नहीं होने वाला। सबको समझना होगा और या तो संगठित प्रयास करने होंगे या फिर अपने-अपने स्तर पर, जहाँ पर भी हैं, हम सबको प्रयास करने होंगे। तो और कोई प्रश्न है या फिर आज की...

>> गुरु जी।

>> गुरु जी।

>> विनोद जी।

आज जो प्रश्न आ रहा है, आपको याद होगा, शुरू में हम लोग भी इसी तरह से प्रश्न किया करते थे। होता क्या है, हम लोगों का भाव यह है कि थोड़ा सा यदि हम समझ गए कि हाँ, ये अच्छा बोल रहे हैं, आप अच्छी बात बता रहे हैं, तो हम अपनी उन्नति से पहले यह चिंता करने लगते हैं कि समाज को कैसे ठीक करें। यह इतनी जल्दबाजी हो जाती है जबकि पहले काम करना है अपने ऊपर, अपने ज्ञान के ऊपर, आत्मोन्नति के ऊपर। इसके ऊपर काम करने की ज़रूरत है। तो हम बहुत जल्दी चिंतित हो जाते हैं कि हम समाज को कैसे बताएँ, गुरु जी, कैसे सुधारें। तो अभी जो बात उठी कि शिक्षक इस तरह के हैं, गलत हैं, वह उनकी बड़ी दयनीय स्थिति है। कभी यह भी सोचा है कि क्या बच्चे हमारे उस लायक हैं? बच्चों को हमने तैयार किया है क्या? तो गलती तो शिक्षक बाद में लेता, बच्चों को संभाल रहा है। पहली गलती तो हम ही कर रहे हैं न, अपने परिवार में हमने क्या बनाकर भेजा है बच्चे को?

तो यदि आप शिक्षक का पक्ष सुनेंगे न, तो वे कहते हैं कि आजकल के बच्चे हैं, पाँच-पाँच साल, सात-सात साल के हैं, दस-दस साल के हैं, और इतने उद्दंड हैं या इतने इस तरह के, मतलब, कोई शिष्टाचार नहीं है। कई तरह की बातें शिक्षक कहते हैं। तो आप दोनों पक्षों को सुनिए। शिक्षक को भी बच्चों से बहुत शिकायत है और वे बच्चों से क्यों शिकायत करते हैं? क्योंकि वे पहली शिक्षा, प्रारंभिक शिक्षा जो घर से ले आ रहे हैं, माता-पिता से ले आ रहे हैं, वही गलत है। तो ज़्यादा हड़बड़ाने की ज़रूरत नहीं है। इस कक्षा को करने का उद्देश्य केवल यह होना चाहिए कि जो आप समाज से अपेक्षा कर रहे हैं, वह आप अपने में विकसित करें। पहली बात, क्योंकि हर एक व्यक्ति से ही एक परिवार बनता है और परिवार से समाज बनता है और राष्ट्र बनता है। तो ज़रूरी यह है कि व्यक्तिगत स्तर पर, अपने स्तर पर ज़्यादा काम करने की कोशिश करें। फिर अपने आप आप अपनी पीढ़ी को, अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देंगे और फिर वह विद्यालय जाएगा तो फिर उस प्रकार का बच्चा नहीं होगा जिसके लिए शिक्षक शिकायत करते हैं। तो मैं यही कहूँगा कि धैर्य रखा जाए और अपने पर काम किया जाए। समाज की अभी चिंता छोड़िए। जब हम ज्ञानी हो जाएँगे, तो समाज अपने आप हमसे कुछ न कुछ अच्छा ज्ञान पाएगा।

>> जी।

>> जी, बिल्कुल, बिल्कुल सत्य कहा है, विनोद जी, आपने।

देखिए, सबसे पहले अपना कल्याण।

>> सहमत हैं, सहमत हैं, गुरु जी। बिल्कुल सहमत हैं आपकी बात से, बिल्कुल सहमत हैं।

>> सबसे पहले अपना कल्याण है, अपना उद्धार करना है। उसके पश्चात ही हम जगत का कल्याण कर सकते हैं। लेकिन आत्मा का एक स्वभाव होता है कि यदि हम कुछ अच्छा जानें, तो स्वचालित रूप से उसे साझा करने की इच्छा होती है, समाज के कल्याण की बात होती है। यह आत्मा का स्वभाव है, जो जागरूक जीवात्माएँ हैं, उनकी तो यह स्वचालित रूप से हो जाता है हमसे। तो उतना व्यस्त न हों। पहले समझें, स्वयं जानें, स्वयं। फिर उसे हम अपने स्तर पर अपने घर में कैसे लागू कर सकते हैं। उसके बाद हम समाज का सोचें, फिर समाज में उसको कैसे ले जाएँ। तो आज की कक्षा में इतना ही। अगली कक्षा में कल इसी समय मिलते हैं, शाम छह बजे। तब तक के लिए, चलिए अभी प्रार्थना करके आज की कक्षा यहीं समाप्त करते हैं। कल से हम आप लोगों को कुछ व्यावहारिक कार्य देंगे। वह भी करना है।

ओम असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मा अमृतं गमय।

ओम शांति शांति शांति।

ओम पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।

ओम शांति शांति शांति।

ओम सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु।

सर्वेषां शांतिर्भवतु।

सर्वेषां पूर्णं भवतु।

सर्वेषां मंगलं भवतु।

सर्वे भवन्तु सुखिनः।

सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।

मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।

ओम शांति शांति शांति।

तो आज की कक्षा समाप्त करते हैं। प्रणाम।

>> जी गुरु जी, प्रणाम। जी, प्रणाम।

>> प्रणाम, प्रणाम, प्रणाम।