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कर्म फल सिद्धांत / भाग – 01 | स्वामी विवेकानंद जी परिव्राजक #कर्मफल #कर्मफलसिद्धांत #trending

अध्यात्म यात्रा – Adhyatm Yaatra1:07:54

Transcription

[संगीत] है पालन करता है फिर नष्ट करता है फिर बनाता है फिर पालन करता है फिर नष्ट करता है। यह चक्र अनादि काल से चल रहा है और अनंत काल तक चलेगा। ना कभी शुरू हुआ ना कभी खत्म होगा। बस इसी संसार सार चक्र को समझना है।

जो व्यक्ति इस संसार चक्र को समझ लेगा, वह स्वयं भी सुखी हो जाएगा। दूसरों को भी सुख देगा। नया कुछ भी नहीं है। सब कुछ पुराना है। वेदों और ऋषियों के अनुसार तीन ही पदार्थ हैं। संसार में मोटे-मोटे मुख्य रूप से तीन पदार्थ हैं। उनके नाम बोलिए ईश्वर, आत्मा, प्रकृति। बस जो भी है इन तीन में ही है सब कुछ।

इन तीन में से एक वस्तु हम हैं। आप और हम। इन तीन में से हम कौन हैं? आत्मा। ठीक है? हम भी असर अनादि काल से। हम भी सदा से हम कोई नए पैदा नहीं हुए। पहली बार पैदा नहीं हुए। यह पहली बार शरीर धारण नहीं किया हमने। पहले कितने अरबों खरबों और भी ज्यादा इतनी बार हम जन्म ले चुके हैं। और कितनी ही बार मोक्ष में जा चुके हैं।

कई लोगों को यह जचती नहीं बात कि हम पहले भी कभी मोक्ष में गए हैं क्या? दो बार चार बार नहीं। कितनी ही बार जा चुके हैं। कोई हिसाब ही नहीं है। और आगे भी जाएंगे। जैसे आप सुबह ऑफिस जाते हैं, शाम को घर आ जाते हैं। हां या ना? ऐसे ही हम मोक्ष में जाते हैं, फिर वापस आ जाते हैं। फिर चले जाते हैं, फिर आ जाते हैं।

एक व्यक्ति ने पूछा कि मोक्ष में जाएंगे फिर वापस भी आना है। मैंने कहा क्यों? क्या दिक्कत है आपको? बोले जब वापस ही आना है तो फिर जाने का फायदा क्या? जब वापस ही आना है मोक्ष से संसार में तो फिर मोक्ष में जाने का लाभ क्या? मैंने कहा आप सुबह ऑफिस जाते हैं, शाम को घर आते हैं। जब आपको शाम को घर आना ही था तो ऑफिस जाने का क्या फायदा? क्यों गए थे? बताइए जाना चाहिए ऑफिस या नहीं? तो फिर हमें भी मोक्ष में जाना चाहिए। उसमें क्या तकलीफ है? ऑफिस जाकर 6 आठ घंटे में आप वापस आ जाते हैं। मोक्ष में तो अरबों खरबों वर्षों तक रहते हैं। फिर क्यों नहीं जाए? तो यह कोई तर्क नहीं है कि मोक्ष में जाके फिर फायदा क्या?

अगर वापस ही आना है तो बहुत सारे काम हम करते हैं। हमें पता है बार-बार करने पड़ेंगे। फिर भी हम करते हैं। आपने सुबह नाश्ता किया। फिर दोपहर को खाना खाएंगे। फिर क्यों नाश्ता किया था? नहीं करना चाहिए ना। जब आपको पता है दोपहर में फिर भूख लगेगी तो फिर नाश्ता करने का क्या फायदा हुआ? आप कहते हैं हां फायदा हुआ। 6 घंटे तो समस्या हल हुई भूख की तो 6 घंटे के लिए भी नाश्ता करना ही चाहिए ताकि 6 घंटे दुख ना हो फिर आगे फिर भूख लगेगी फिर खा लेंगे। शाम को फिर भूख लगेगी तो फिर खा लेंगे। जब आप बार-बार भूख लगती है और बार-बार खाते हैं तो बार-बार संसार में आएंगे तो बार-बार मोक्ष में क्यों नहीं जाए? बिल्कुल जाना चाहिए। तो बहुत बार हम पहले भी मोक्ष में जा चुके हैं। आगे भी जाएंगे।

फिलहाल हम इस संसार में हैं। तो अब यह देखना है कि यह संसार कैसा है? हम कौन हैं? कहां से आए? कहां जाएंगे? यह सारी बातें समझनी है। कौन है संसार को बनाता है, चलाता है। वह समझना तो इसका उत्तर है ईश्वर इस संसार को बनाता है, चलाता है और अंत में वही नाश भी करता है।

कुछ लोगों ने यह कल्पना कर रखी है। तीन भगवान है। एक भगवान बनाता है, एक पालन करता है, एक नाश करता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश सुन रखा है ना? ब्रह्मा जी संसार को बनाते हैं। विष्णु जी पालन करते हैं और महेश जो है वह त्रनेत्र धारी विनाश करते हैं। तो यह बात ठीक नहीं है। तीन भगवान नहीं है। एक ही भगवान है। वह एक ही भगवान संसार को बनाता है। वही पालन करता है। वही विनाश करता है। एक ही आदमी है जो तीनों काम करता है।

अच्छा सुनार तो देखा होगा आपने सुनार सोने के आभूषण बनाता है। है ना? फिर वो कुछ टूटफूट हो जाए तो रिपेयरिंग भी कर देता है। मेंटेन भी करता है उसको। और उसको तोड़ के नए डिजाइन का भी बनाता है। एक छोटा सा सुनार आभूषण बनाता भी है। उसको मेंटेन भी करता है। फिर उसको तोड़ भी देता है। फिर नया बनाता है। जब एक सुनार छोटा सा तीन काम कर सकता है। तो एक सर्वशक्तिमान ईश्वर तीन काम नहीं कर सकता। वह भी कर सकता है। तो यह सोचना गलत है कि तीन अलग-अलग भगवान हैं जो अलग-अलग काम करते हैं। ऐसा नहीं है।

लोग ईश्वर को जानते नहीं, समझते नहीं। क्यों नहीं समझते? वेदों को पढ़ते नहीं। ऋषियों के ग्रंथ पढ़ते नहीं। इसलिए उनको समझ नहीं आती। इधर-उधर की फालतू किताब पढ़ते हैं या फालतू प्रवचन सुनते हैं बिना सिर पैर के। फिर वह भ्रांति में पड़ जाते हैं। भ्रांतियां फैलाते हैं। तो वेदों में लिखा है ईश्वर एक है। दो तीन चार पांच 10 नहीं है। एक ही है। और वो एक ही ईश्वर संसार को बनाता है। वही चलाता है। वही नाश करता है।

तो क्यों बनाता है? इतना बड़ा संसार है। बड़े-बड़े वैज्ञानिक बेचारे चक्कर खा गए। उनको समझ नहीं आ रहा कितनी बड़ी दुनिया है। अरबों खरबों यह गैलेक्सीज हैं जो आकाशगंगा बोलते हैं रात को यहां तो नहीं दिखती आकाशगंगा जंगल में दिखती है यहां अहमदाबाद में तो लाइट बहुत होती है ना रात को तो प्रकाश के कारण वो दिखते ही नहीं तारे हमारे यहां रोजड़ में आई है वहां दिखेंगे जंगल में दिखते हैं तारे एक युवक आया बीएससी साइंस पढ़ रहा था यहां अहमदाबाद में प्रोफेसर वर्मा जी उसको लाए थे हमारे साथ वो अपने साथ लाए थे वहां रोजड़ तो रात को उसने देखा आसमान में ओ रे ऐसा है आसमान उसने पहली बार देखा उसको बड़ा आश्चर्य हुआ 1820 साल उम्र थी 1820 साल में पहली बार उसने आसमान देखा रात को जंगल में तो इतने तारे दिखाई दिए उसको उसको बड़ा आश्चर्य हुआ ऐसा है आकाश तो यह तो बहुत छोटा सा दिख रहा था आंख से तो 3000 तारे दिखते हैं ऐसा वैज्ञानिक लोग कहते हैं खुली आंख से जो हम रात को देखते हैं 3000 तारे दिखते हैं और इस हमारी गैलेक्सी में 10 खरब तारे हैं। 10 खरब ये वर्मा जी ने सुना है स्टेटमेंट साइंटिस्ट वर्मा जी उन्होंने ये स्टेटमेंट बताया कि 10 खरब तारे हैं। फिर उनके अपने-अपने परिवार हैं। स्वरमंडल ये तो एक आकाशगंगा है जो बताई 10 खरब स्टार्स। फिर उन्होंने बताया ऐसी ऐसी 10 खरब आकाशगंगाओं का वैज्ञानिक लोग पता लगा चुके हैं। 10 खरब आकाशगंगाएं हर एक में इतने इतने तारे इतने इतने सूर्य तारा मतलब सूर्य और फिर कहने लगे अभी तो हमने आधी दुनिया देखी है। अभी तो आधी और बहुत सारी है। हमारे टेलिस्कोप फेल हो गए। हमारी मशीनें फेल हो गई। आगे हम देख ही नहीं पा रहे। बहुत लंबी चौड़ी दुनिया है। इतनी बड़ी दुनिया को एक अकेला ईश्वर बनाता है। आप सोचिए कल अपने प्रफुल जी कह रहे थे चित्रम ईश्वर बड़ा विचित्र है। जैसे-जैसे समझ में आता है बड़ा आश्चर्य होता है कि ईश्वर ऐसा है। ऐसे-से काम करता है। सच में ऐसा ही है। कभी-कभी तो लगता है ये सिर्फ कल्पना है। ऐसा जचती नहीं बात। ऐसा कैसे हो सकता है? एक एक ईश्वर इतनी सारी दुनिया को कैसे बनाएगा? कैसे चलाएगा? कैसे सबका हिसाब रखेगा?

संसार को बनाता है। इसका पालन करता है। सब आत्माओं के कर्मों का हिसाब भी रखता है। बड़ा कठिन है। एक व्यक्ति का हिसाब रखना भी बहुत कठिन है। यहां तो असंख्य जीवात्माएं हैं। तो ईश्वर इतने असंख्य जीवात्माओं का हिसाब रखता है। कभी भूलता नहीं, कभी गड़बड़ नहीं करता। एक के कर्म दूसरे के खाते में नहीं डालता। एक के कर्म का फल दूसरे को नहीं देता। पूरा हिसाब से काम करता है। कभी भी जरा भी गड़बड़ नहीं होती। यह सब वेदों में लिखा है। न किल्वशम अत्र वेद का मंत्र है जिसमें लिखा है कि ईश्वर की व्यवस्था में कोई गड़बड़ नहीं होती। किल्व विषम गड़बड़ टूटफूट कमी त्रुटि न्यूनता गलती। ईश्वर की व्यवस्था में कहीं कोई गलती नहीं होती। इतना परफेक्ट काम है। तो अकेला ईश्वर इतने बड़े संसार को बनाता है, चलाता है, सबके कर्मों का हिसाब रखता है और ठीक कर्मों का समय आने पर कर्मों का फल देता है।

कल जैसे बात चल रही थी हमारी कि तरह-तरह के बीज होते हैं जो अलग-अलग समय पर अपना फल देते हैं। पालक 1520 दिन में तैयार हो जाती है। चावल 60 70 दिन में मिल जाते हैं। गेहूं तीन-चार महीने में मिलते हैं। और केरी आम कई वर्ष लगते हैं। संतरा, आम हद आदि इनमें कई-कई वर्ष लग जाते हैं। तो जैसे बीजों का फसल उत्पत्ति का समय अलग-अलग होता है। ऐसे ही जो हमारे कर्म हैं इनका भी फल देने का समय सबका अलग-अलग होता है। कोई कर्म एक महीने में फल देता है। कोई कर्म 2 घंटे में फल देता है। कोई कर्म 2 महीने में फल देता है। कोई कर्म 6 महीने में देता है। ऐसे इसका भी अलग-अलग समय होता है। कोई कर्म इस जन्म में फल देता है। कोई कर्म अगले जन्म में फल देता है। कोई 10 20 जन्म बाद देता है। कोई हजार जन्म के बाद देता है। कोई कर्म मोक्ष में फल देता है और कोई कर्म मोक्ष से लौटने के बाद फल देता है। इतना लंबा चौड़ा हिसाब है इसका भी और ईश्वर सबका हिसाब रखता है। सबके कर्मों को ठीक समय पर न्याय से सबको फल देता है जीवात्माओं को।

तो ये जो संसार बनाया ईश्वर ने बनाया। हम हम तो सोच भी नहीं सकते। हमारे तो कुछ बुद्धि है ही नहीं। बहुत थोड़ी सी इतनी नाम मात्र केवल तो यह संसार ईश्वर बनाता है। तो किसी ने पूछा जी क्यों बनाता है? उसको क्या मिलता है? भगवान को कुछ नहीं मिलता है। हां। क्या उत्तर दिया? उसको कुछ चाहिए भी नहीं। भगवान को कुछ चाहिए ही नहीं। उसके पास कोई कमी है ही नहीं। जिसके पास कमी होती है, वह चाहता है कि मुझे इसके बदले में कुछ मिले। मैंने इतनी सेवा की है तो मुझे कुछ तो मिलना चाहिए। चाहे धन मिले, चाहे सम्मान मिले, कोई पद मिले, कोई प्रतिष्ठा मिले, कोई मेडल मिले, कोई चलो यह सब ना दो, मोक्ष तो दो या तो मोक्ष मिले या तो कुछ तो मिले ना। कोई भी जीवात्मा ऐसे मुफ्त में काम नहीं करता। क्या बोला? द्वारा ये करते हो भाई। आप कुछ भी नहीं दोगे तो मैं काम क्यों करूं? मैं कोई फालतू थोड़ी बैठा हूं। मेरे पास और 20 काम है। मैं क्यों करूं? फ्री में काम नहीं करूंगा। कुछ ना कुछ तो मिलना चाहिए। या तो संसार का सुख दो या मोक्ष दो। कुछ तो दो। अगर आत्मा को संसार का सुख भी ना दिया जाए और मोक्ष भी ना दिया जाए तो वह काम नहीं करेगा। बिल्कुल नहीं करेगा।

इसलिए कभी-कभी लोग कहते हैं कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर रे इंसान। यह सब झूठ है। कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर रे इंसान। जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान। यह है गीता का ज्ञान। कोई फिल्मी गाना था। ये बहुत पुराना है। अभी सुना था। ऐसे ऐसे गीता के नाम पर यह सुना रहे हैं। जबकि गीता में ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐसा लिखा ही नहीं कहीं भी कि कर्म करो और फल की इच्छा मत करो। गीता में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा। ये सब गीता के नाम पर झूठ बोलते हैं। समझते ही नहीं लोग।

गीता बहुत अच्छी पुस्तक है। इतिहास की पुस्तक है। धर्म की पुस्तक नहीं है। गीता कोई मोक्ष की पुस्तक नहीं है। लोग समझते हैं गीता पढ़ने से मोक्ष हो जाता है। मोक्ष नहीं होता। वो मोक्ष क्या होता है? उसको जानते ही नहीं। क्या होता है मोक्ष? कब मिलता है? कैसे मिलता है? किसको मिलता है? किसको नहीं मिलता? क्यों नहीं मिलता? यह सारा विषय तो दर्शन शास्त्र का है। मोक्ष की पुस्तक तो दर्शन है। वह बताएगा मोक्ष क्या होता है और कैसे मिलता है। गीता तो इतिहास की पुस्तक है। इतिहास जानना हो तो गीता पढ़ो। कौरवों पांडवों का युद्ध हुआ कुरुक्षेत्र में। वो इतिहास की बात है। इतिहास जानना हो तो गीता पढ़ो। और अध्यात्म को जानना हो तो दर्शन पढ़ो, उपनिषद पढ़ो, वेद पढ़ो, मनुस्मृति पढ़ो। तो वहां से इतिहास अध्यात्म की बात मिलेगी।

तो गीता में जो यह श्लोक आता है कर्मण्यवा अधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन इस श्लोक को लेकर के बोलते हैं लोग। कर्म में तुम्हारा अधिकार है। मा फलेशु फल में कोई अधिकार नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है। जो लोग यह अर्थ सुना रहे हैं यह गलत है। गीता के इस श्लोक का अर्थ है कर्म करने में तुम्हारा अधिकार है। अर्थात तुम्हारी इच्छा है। तुम अपनी मर्जी से जैसी इच्छा हो वैसा कर्म करो। इतना अधिकार है तुमको। लेकिन उस कर्म का परिणाम क्या आएगा? वह तुम्हारे अधिकार में नहीं है। परिणाम तुम्हारे अधिकार में नहीं है। फल तो अधिकार में है। हां बोलिए क्या कहा? परिणाम आपके अधिकार में नहीं है। फल तो आपके अधिकार में है।

एक विद्यार्थी को कहो साल भर पढ़ाई करो। परीक्षा दो। नंबर प्राप्ति में तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। नंबर तुम्हें कुछ नहीं मिलेंगे। बोलो पढ़ेगा? परीक्षा देगा। क्यों देगा? जब आप नंबर ही नहीं दोगे तो तो हम पढ़ेंगे क्यों? परीक्षा क्यों देंगे? आप पूछ के देख लो अपने बच्चों को। पढ़ाई करो साल भर परीक्षा भी दो और कोई मेडल इनाम कुछ नहीं मिलेगा। क्यों? क्यों पढ़ेंगे? देखो मना कर रहा है वो। ये बैठा बच्चा मना कर रहा है नहीं पढ़ेंगे हम। जब इनाम ही नहीं मिलेगा तो क्यों पढ़ेंगे? एक टीचर से कहो साल भर कक्षा में बच्चों को पढ़ाओ स्कूल में और वेतन की इच्छा मत करना। बोलो पढ़ाएगा? नहीं बढ़ाएगा। फल तो पहले चाहिए। कर्म तो बाद में करेंगे। पहले फल बताओ। फल क्या दोगे? फल समझ में आएगा तो काम करेंगे। नहीं तो नहीं करेंगे। आप अपनी दुकान पर किसी को नौकर रख लो। वाकई पूछेगा हां साहब तनख्वाह क्या दोगे? पहला सवाल तनख्वाह क्या दोगे? तनख्वाह समझ में आएगी तो काम करेंगे। तनख्वाह समझ में नहीं आएगी तो नहीं करेंगे। फल तो पहले पूछता है वह। तो फल में अधिकार कैसे नहीं है? फल में तो है।

हां, परिणाम में अधिकार नहीं है। अब आप सोचेंगे यह क्या नई समस्या है? फल अलग है, परिणाम अलग है। हां, दोनों अलग-अलग है। पर दो ही नहीं। एक और तीसरा भी है। उसका नाम है प्रभाव। क्या है? तीन कर्म करने के बाद तीन प्रतिक्रियाएं होती हैं। कर्म की। कितनी? तीन। उनके नाम बोलिए। कर्म का परिणाम, कर्म का प्रभाव, कर्म का फल, ये तीनों अलग-अलग चीजें हैं।

एक बच्चे ने थोड़ा शरारती बच्चा था। गार्डन में खेलते रहते हैं बच्चे। तो बहुत उन सारे बच्चों में से एक शरारती था। उसको थोड़ा शरारत सूझी। तो उसने एक पत्थर उठाया और गार्डन के सामने जो एक मकान थे उस मकान की खिड़की पर शीशे पे दे मारा। शरारती तो था ही तोड़फोड़ करता रहता था। पत्थर उठाया और शीशे पे दे मारा। शीशा टूट गया। टूटेगा या नहीं? टूटेगा। भारी पत्थर था मजबूत तो शीशा कमजोर था। पत्थर शीशे से टकराया। शीशा टूट गया। टूट गया तो आवाज हुई। आवाज हुई तो मकान मालिक को पता चल गया कि शीशा टूटा है। वह बाहर आया। उसने देखा क्या हुआ? अरे शीशा टूट गया। फिर इधर देखा तो एक बच्चा भाग रहा था। वो समझ गया इसी ने तोड़ा है। यह बच्चा भाग रहा है शीशा तोड़ के इसी ने तोड़ा होगा। तो उसने भी दौड़ लगाई उसके पीछे बच्चे के पीछे और उसको पकड़ लिया। और पूछा क्यों बेटा? तुमने तोड़ा है मेरा शीशा। बोले हां जी। क्यों तोड़ा? बस हमारी मौज है। तोड़ दिया। अच्छा तुम्हारी मौज है। ले अब मौज ले। लगाए दो थप्पड़ उसके निकाल ₹500। हमारा शीशा तोड़ दिया। इतना नुकसान कर दिया। निकाल ₹500 कि मेरे पास तो नहीं है। नहीं है तो चल तेरे बाप से वसूल करूंगा। वो पकड़ के उसके घर ले गया। उसके बाप को शिकायत की। देख तुम्हारे बेटे ने मेरा शीशा तोड़ा है। ₹500 निकालो। तो उससे ₹500 वसूल किए तब जाकर जान छूटी।

तो जब ऐसी घटना होती है तो अब इस घटना में हम तीनों चीजों को देखेंगे। कर्म का परिणाम बोलिए। कर्म का प्रभाव, कर्म का फल ये तीनों चीजें इस घटना में आ जाएंगी। ऐसी घटना होती है या नहीं? होती है। तो बच्चे ने पत्थर उठाकर शीशे पर मारा। यह कर्म है। हम पत्थर मारना क्या है? कर्म है। और जब पत्थर मारा शीशे पर यह था साइंस में इसको एक्शन बोलते हैं। कर्म एक्शन। तो साइंस में एक नियम है। जब कोई एक्शन होता है तो उसका रिएक्शन भी होता है। तत्काल उसका रिएक्शन होता है। तो कर्म कहें या कर्म को क्रिया भी कह सकते हैं। दर्शन शास्त्रों में कर्म भी कहते हैं, क्रिया भी कहते हैं। तो साइंस वाले कहते हैं जब कोई एक्शन होता है तो उसका रिएक्शन भी होता है। हिंदी भाषा में कहेंगे जब कोई क्रिया होगी तो उसकी प्रतिक्रिया भी होगी। तो पत्थर मारना क्रिया है और शीशा टूटना उसकी प्रतिक्रिया है। जो निकटतम प्रतिक्रिया है। क्रिया की निकटतम प्रतिक्रिया उसका नाम है कर्म का परिणाम। इसको परिणाम कहते हैं। पत्थर मारा शीशे पर शीशा टूट गया। ठीक है? परिणाम समझ में आ गया।

अब उस सेठ को पता लगा जिसके मकान का शीशा टूटा उसको पता चल गया। आवाज सुनी ना उसको पता चल गया ओ हो मेरा तो शीशा टूट गया फिर वो बाहर आकर उसने देखा वो देख के दुखी हुआ मेरा तो शीशा टूट गया यह है कर्म का प्रभाव क्या है यह कर्म का प्रभाव यह उसकी दूसरी प्रतिक्रिया है कर्म की दूसरी प्रतिक्रिया पहली प्रतिक्रिया कर्म का परिणाम पत्थर मारा शीशा टूटा यह पहला पहली पहली प्रतिक्रिया है। यह कर्म का परिणाम है। फिर जब उसको सेठ को दुख हुआ कि मेरा नुकसान हो गया। यह दूसरी प्रतिक्रिया है। इसको प्रभाव कहेंगे। कर्म किसने किया? बच्चे ने। पर प्रभाव किसने भोगा? सेठ ने। तो कर्म कोई और करता है। प्रभाव किसी और पर हो सकता है। उस पर भी हो सकता है। जो कर्म करता है उस पर भी हो सकता है। दूसरे पर भी हो सकता है।

परिणाम कहां होगा? जहां वह क्रिया होगी। जिस वस्तु पर क्रिया होगी, प्रतिक्रिया भी वहीं होगी। पत्थर शीशे पे मारा तो शीशा टूटा। किसी के सर में मारे तो सर फूटेगा। और कोई पिस्तौल उठा के अपने सर में मारे तो उसका सर फूटेगा। जहां क्रिया होगी वहीं प्रतिक्रिया होगी। यह प्रतिक्रिया परिणाम। क्रिया अपने ऊपर भी हो सकती है। दूसरे पर भी हो सकती है। किसी ने अपने ऊपर गोली चलाई तो उस पर क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया भी वहीं होगी। दूसरे पर गोली चलाई तो क्रिया वहां होगी तो प्रतिक्रिया भी वहां होगी। ठीक है?

और प्रभाव किस पर होगा? प्रभाव चेतन वस्तु पर होगा। जड़ वस्तु पर नहीं। क्या बोला? जड़ वस्तु पर प्रभाव नहीं होगा। प्रभाव चेतन पर होगा। जड़ वस्तु पर परिणाम हो सकता है। परिणाम हो सकता है। जैसे शीशा शीशा जड़ है। पत्थर मारा शीशा टूट गया। यह परिणाम है। परिणाम जड़ पर भी हो सकता है, चेतन पर भी हो सकता है। और जो प्रभाव है वह चेतन पर ही होगा। जड़ पर नहीं होगा। और चेतन पर भी उस पर होगा जिसको उस घटना की सूचना मिलेगी। क्या बोला दोहराइए? सूचना मिलेगी। प्रभाव उस पर होगा जिसको सूचना मिलेगी। उस घटना की सूचना मिलेगी। उस पर प्रभाव पड़ेगा।

अब सेठ को तो सूचना मिली कि मेरा घर का शीशा टूट गया। उसकी पत्नी बाजार गई थी। उसको पता ही नहीं चला। उसको सूचना नहीं मिली। तो उसकी पत्नी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उसके घर का शीशा टूट गया। इस बात का उसकी पत्नी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। क्योंकि उसको अभी सूचना ही नहीं मिली। और जब सूचना मिलेगी तब प्रभाव शुरू हो जाएगा। एक घंटे बाद उसकी पत्नी आ गई लौट के घर। आके उसने देखा अरे शीशा टूट गया। ये टुकड़े पड़े हैं शीशे के। वो शीशा टूट गया। अब उसको सूचना मिली कि घर का शीशा टूट गया। अब वह दुखी होना शुरू हो जाएगी कि हमारा नुकसान हो गया। एक घंटे तक उसको सूचना नहीं मिली। उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जैसे ही सूचना मिली उसको प्रभाव शुरू हो गया। तो प्रभाव चेतन पर होगा और उस चेतन पर होगा जिसको उसकी सूचना मिलेगी। यह प्रभाव अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है, सुखदायक भी हो सकता है, दुखदायक भी हो सकता है।

सेठ का शीशा टूटा। सेठ को इस घटना की जानकारी से सुख हुआ या दुख हुआ? दुख हुआ ना? उसका नुकसान हो गया। उसको दुख हुआ। मेरा शीशा टूट गया। फिर उसकी पत्नी को पता चला कि हमारे घर का शीशा टूट गया। उसको भी दुख हुआ। यह भी प्रभाव है। और उसके पड़ोस में सेठ के पड़ोस में एक उसका दुश्मन रहता था। उसको भी सूचना मिली। मेरे पड़ोसी दुश्मन सेठ के घर का शीशा टूटा। वह खुश हो जाएगा कि मजा आया। अच्छा हुआ इसके शीशा टूटा। यह भी प्रभाव है। तो जिसजिस को सूचना मिलेगी उस उस पर उसका प्रभाव पड़ेगा। और कुछ लोग ऐसे भी होंगे जिनका उनसे कोई संबंध नहीं है। सेठ से कोई दुश्मनी भी नहीं है, दोस्ती भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। ना राग है ना द्वेष है। उनको भी सूचना मिलेगी कि सेठ का मकान का शीशा टूट गया। उनको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ना सुख ना दुख कुछ नहीं। ठीक है। दुनिया है

चलती रहती है। टूटती रहती है। इसमें क्या मुसीबत है? सारी दुनिया में रोज दुर्घटनाएं होती हैं। आप भी समाचार पढ़ते रहते हैं, सुनते रहते हैं। ठीक है?

जापान में यह हो गया, चाइना में यह हो गया, रशिया में यह हो गया। यूक्रेन और रशिया की लड़ाई चल रही थी ना। हैं जी। अभी चल रही है या बंद हो गई? अभी भी चल रही है। तो वहां रोज लड़ाई चलती है। रोज नुकसान होता है। आपको कुछ भी नहीं फर्क पड़ता। समाचार भी कभी-कभी सुन पढ़ लेते हैं। तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता। ठीक है। होता है। होता रहे। तो जरूरी नहीं है कि सूचना मिलने पर प्रभाव होगा ही। यह भी जरूरी नहीं है। यदि कोई आपका लेना देना है उस घटना से कोई रिलेशन है तब तो कुछ प्रभाव होगा और आपका कोई लेना देना नहीं है तो कोई प्रभाव नहीं होगा। सिर्फ सूचना मिल जाएगी। ठीक है? आपने सूचना जान ली और साइड में रख दी। ठीक है? खत्म।

तो यह थी प्रभाव की बात। प्रभाव चेतन पर ही होगा। सूचना मिलने पर होगा। अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है और नहीं भी हो सकता है। और कभी-कभी प्रभाव शिक्षा के रूप में भी होता है। उसको एक लेसन सीखने को मिला। वो लेसन फल के बाद आएगा। पिछले थोड़ी देर बाद बताता हूं उसको। कभी-कभी जो घटना होती है उससे भी लेसन मिलता है। कभी-कभी घटना का जो फल होता है उसका दंड या इनाम उसको जानने से भी कुछ प्रभाव पड़ता है। तो यह तो प्रभाव की बात हुई।

अब फल फल की बात करें। फल हमेशा कर्मकर्ता को ही मिलेगा। दूसरे को नहीं। क्या बोला? देखो बिल्कुल सीधीसीधी स्पष्ट बात है। फल तो हमेशा कर्ता को ही मिलेगा और किसी को नहीं। अगर एक व्यक्ति के कर्म से दूसरे को हानि लाभ हो रहा है, सुखदख हो रहा है तो उसको फल नहीं कहेंगे। कर्म कोई और कर रहा है। सुखदख किसी और को मिल रहा है। उसको फल नहीं कहेंगे। फल तो कर्ता को ही मिलेगा। तो जो एक के कर्म से दूसरे को सुखदख मिल रहा है वह या तो कर्म का प्रभाव हो सकता है या परिणाम हो सकता है। उस दो में से कुछ होगा उसको फल नहीं कहेंगे।

तो बच्चे ने जो पत्थर मारा शीशे पर शीशा टूट गया। उसी घटना को लेते हैं। बच्चे ने पत्थर मारा यह कर्म किया। शीशा टूटा। यह कर्म का परिणाम हुआ। सेठ को पता चला मेरा शीशा टूट गया। वह दुखी हुआ। यह प्रभाव है। और फिर बच्चे की हुई पिटाई और ₹500 वसूल किए। यह उसका फल है। बच्चे को दंड मिला। दो थप्पड़ पड़े। यह उसका दंड है। कर्म का फल है।

अब इस उदाहरण में आप पूछेंगे कि जी बच्चे ने पत्थर मारा था। बाप को ₹500 का दंड क्यों भोगना पड़ा? बाप ने तो गलती नहीं की थी। फिर बाप को दंड क्यों भोगना पड़ा? बच्चे को मिलता ना। बाप को ₹500 का दंड इसलिए मिला कि बच्चे को संभालने की जिम्मेदारी बाप की है। बाप ने भी तो लापरवाही की। उसकी जिम्मेदारी है। बच्चे को सभ्य बनाना, बुद्धिमान बनाना। उसने बच्चे को नालायक क्यों बनाया कि तुम दूसरों के घर के शीशे तोड़ते रहो। ऐसी शिक्षा उसने क्यों नहीं दी बच्चे को कि सभ्यता से रहो। किसी का शीशा नहीं तोड़ने का। यह उसको सिखाना था। यहां उसने भी तो गलती की। अब उसका दंड उसको मिल रहा है। जो ₹500 भरने पड़े वो इसलिए मिल रहा है। जब तक बच्चा छोटा है 18 साल से कम है। उसको आप माइनर कहते हैं। माइनर माइनर है। अभी बच्चा है। अवयस्क है। तो तब तक उसके माता-पिता की जिम्मेदारी है। उसको संभालना। अगर उसका बच्चा कोई नुकसान करता है समाज में तो उसकी जिम्मेदारी माता-पिता पर आती है। इसलिए उनका भी दोष है। इसलिए उनको ₹500 दंड भरना पड़ा। वह भी कर्म का फल है।

एक व्यक्ति कुत्ते को ले जा रहा था सैर कराने। सुबह-सुबह लोग जो कुत्ता पालते हैं, सुबह-सुबह कुत्तों को ले जाते हैं ना घुमाने। घुमाने सैर भी हो जाती है, टॉयलेट भी हो जाता है। तो मान लो एक व्यक्ति ने कुत्ता पाल रखा था। और वह ले जा रहा था घुमाने। अब सड़क पर चलते चलते उसके कुत्ते ने एक दूसरे नागरिक को काट खाया। इसकी जिम्मेदारी कुत्ते पर है या कुत्ते के मालिक पर है? मालिक पर है। वो कुत्ते पर केस नहीं करेगा। उसके मालिक पे केस करेगा। जिसको काट खाया उसके मालिक पर केस करेगा। तुम्हारा कुत्ता तुम संभाल के क्यों नहीं रखते? यह तुम्हारी जिम्मेदारी और तुम्हारे कुत्ते ने हमको काट खाए तुम्हें दंड मिलेगा। तो जैसे किसी व्यक्ति का कुत्ता किसी दूसरे नागरिक को काट खाए तो उसकी जिम्मेदारी कुत्ते के मालिक पर है। तो जैसे उसने कुत्ता पाल रखा है। आपने बच्चे पाल रखे हैं। बच्चे आपने पाल रखे हैं तो आपका बच्चा नुकसान करता है। उसकी जिम्मेदारी किस पर है? आपके ऊपर। तो आपको दंड मिलेगा। अब प्रकेश चलेगा इसलिए उसके बाप को ₹500 दंड भरना पड़ा। तो अपने बच्चों को संभाल के रखें। जैसे अपने कुत्तों को संभाल के रखते हैं। अपने बच्चों को भी संभाल के रखें। उनको संभालने की जिम्मेदारी भी आपकी है। अगर आपने अच्छे बच्चे बना दिए। विद्वान, बलवान, बुद्धिमान, धार्मिक, सदाचारी, चरित्रवान, देशभक्त, ईमानदार, ईश्वर भक्त, बढ़िया बच्चे बनाए तो आपको इनाम मिलेगा। और अच्छे बच्चे नहीं बनाए। देश को नुकसान कर रहे हैं, दुख दे रहे हैं। झूठ बोलते हैं, चोरी करते हैं, रिश्वत लेते हैं, हेराफेरी करते हैं, घोटाले करते हैं, बदतमीजी करते हैं, चरित्रहीनता करते हैं तो फिर आपको दंड मिलेगा। आपने बच्चे ठीक नहीं पाले। आपकी ड्यूटी थी। या तो शादी करो मत मेरी तरह। फिर कोई जिम्मेदारी नहीं है। या तो मेरी तरह शादी मत करो, बच्चे पैदा ही मत करो तो फिर जिम्मेदारी नहीं आएगी। और अगर शादी की है, बच्चे पैदा किए हैं तो फिर आपके ऊपर जिम्मेदारी आएगी। उनको अच्छा इंसान बनाओ। वरना आपको दंड मिलेगा।

है कोई हिम्मत वाला मेरी तरह ब्रह्मचारी बने हैं। हाथ ऊंचा करो। कौन बनेगा? अगले जन्म में। चलो अगले जन्म में जो बनेंगे वो हाथ ऊंचा करो। ये बहुत बढ़िया। वाह बहुत अच्छे। बहुत बढ़िया। बहुत सारे लोग तैयार हुए। अच्छी बात है। बहुत अच्छे। आप तो इस जन्म में भी बन सकते हैं। बन सकते हैं। बनेंगे सोचेंगे? बनेंगे पक्का। चलो बहुत अच्छे। बहुत बढ़िया भाई। एक ब्रह्मचारी तो मिल गया हमको। ये भी पूछ और सोच के हमारे हां। इस बार जो गृहस्थ में आ गए और समझ में आ गया कि यहां समस्याएं ज्यादा है। ठीक है? वो एक्सपीरियंस से ही आती है। आ गए गृहस्थ में एक्सपीरियंस हो गया। समझ में आ गया कि भाई यहां समस्याएं बहुत है। ब्रह्मचारी रहेंगे तो इससे कम होंगी। समस्याएं तो सब जगह होती हैं। ब्रह्मचारी रहेंगे तो समस्याएं इनसे थोड़ी कम होंगी। तो अब आपका विचार बन रहा है। संस्कार बन रहा है कि अगली बार शादी नहीं करेंगे। अगले जन्म में ब्रह्मचारी बनेंगे। तो यह विचार संस्कार अपने साथ लेकर जाइए तो आपको इसका लाभ मिलेगा। आपकी बचपन से रुचि होगी कि इस बार ब्रह्मचारी बनेंगे। पिछली बार बोर मार बहुत मार खाई अब की बार नहीं खानी। अबकी बार ब्रह्मचारी बनेंगे और तपस्या करेंगे और सीधा मोक्ष की तैयारी करेंगे। तो यह लाभ आपको मिलेगा। जरूर मिलेगा। हर जन्म में जो हम कर्म करते हैं और जो हमारे संस्कार बनते हैं वह हमारे साथ चलते हैं। अगले जन्म में हमें साथ सपोर्ट करते हैं। हमें सहयोग देते हैं और उस दिशा में फिर हमारी प्रगति होती है। तो अच्छी बात है। जिन लोगों ने हाथ ऊंचा किया कि अगली बार ब्रह्मचारी बनेंगे। मेरी ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं और आशीर्वाद। भगवान आपकी इच्छा पूरी करें। तो ब्रह्मचारी बने तपस्या करें। बहुत प्रसन्न रहेंगे। हां जी। पूछिए बनेंगे। चलो बहुत अच्छा। उनके लिए भी ताली बजाइए। ऑनलाइन उन्होंने लिखा है मैं भी ब्रह्मचारी बनूंगा। बहुत बढ़िया। धन्यवाद।

तो यह कर्म फल की बात चल रही थी। जब कोई कर्म होता है तो उसके बाद तीन प्रतिक्रियाएं होती हैं। कर्म का परिणाम, कर्म का प्रभाव, कर्म का फल। तो उस बच्चे वाले उदाहरण में हमने देखा बच्चे ने पत्थर मारा। यह कर्म है। शीशा टूटा यह परिणाम है। उस मालिक को सेठ को दुख हुआ। यह प्रभाव है। फिर उसको दंड मिला। यह फल है। तो फल हमेशा कर्ता को ही मिलेगा। जिसने गलती की थी दंड तो उसी को मिलेगा। ये तो स्पष्ट है। सब जानते हैं। और सब समझते भी हैं। स्वीकार भी करते हैं। परीक्षा आप दे। नंबर किसी और को देवे चलेगा। देखो मना कर रहे हैं। नहीं चलेगा। जो परीक्षा देगा उसको नंबर मिलना चाहिए। यही तो न्याय है। जो कर्म करेगा उसको फल मिलना चाहिए। परंतु संसार में कई बार हम ऐसा देखते हैं कर्म तो कोई और करता है और उसका दुख कोई और भोगता है। तब वहां समस्या पैदा होती है। तब लोग भ्रांति में पड़ते हैं या शंका में आ जाते हैं कि यह क्या हो रहा है? यह तो कोई न्याय नहीं हुआ। गलती कोई और करे और दुखी कोई और हो, दंड कोई और भोगे यह तो न्याय नहीं हुआ।

अभी अभी थोड़े दिन पहले की घटना यहीं पर अहमदाबाद में एक विमान टूटा ना विमान दुर्घटना हुई ना यहीं पर ही हुई थी अहमदाबाद में 300 400 लोग उसमें चले गए और कुछ तो बेचारे अपने डॉक्टर लोग हॉस्पिटल में खाना खा रहे थे उनके ऊपर गिरा तो लोगों ने बहुत सारे समाचार सूचनाएं भी निकाली कुछ व्यंग भी कसे Facebook पर रोज लुकते रहते हैं लोग किसी ने लिखा भाई अब तो घर में भी सुरक्षा नहीं है। विमान घर पे ही आके गिर सकता है। जरा सावधान रहना। आंधी भूकंप पता नहीं कहां-कहां हो सकता है। कोई गारंटी थोड़ी है। तो अब तो विमान की भी गारंटी नहीं। हमारे ही घर पे आके गिरे। तो ऐसे लोगों ने बहुत सारे संदेश भी लिखे। तो उसमें थोड़ी सावधानी भी थी, थोड़ा व्यंग भी था। चलो खैर कहने का मतलब यह है कि कर्म कोई दूसरा करता है और नुकसान किसी और को भोगना पड़ता है। जैसे यह विमान दुर्घटना हुई और रोज भारत में 5700 लोग एक्सीडेंट में रोज मरते हैं। कोई ट्रक से मरता है, कोई कार से मरता है, कोई बम ब्लास्ट से मरता है, कोई जहर पी के मरता है, कोई पिस्तौल मार लेता है, गोली मार लेता है खुद को। कोई 10वें माले से कूद के गिरता है, मरता है। कोई नदी में डूब के मरता है। कोई तालाब में कोई जहर पी के मरता है। पता नहीं कैसे-कैसे लोग मरते हैं। तो यह बहुत सारी दुर्घटनाओं में 5700 लोग रोज मरते हैं। अब उसमें बहुत सारी घटनाएं तो दूसरे के कारण होती हैं। जैसे ट्रक ड्राइवर ने बेहिसाब ट्रक चलाया। शराब पी के चलाया। बहुत सारे लोग शराब पी के चलाते हैं गाड़ी। कार वाले भी चलाते हैं। ट्रक वाले भी चलाते हैं और भी बहुत से लोग। कभी-कभी विमान की भी सूचनाएं आती हैं कि पायलट ने भी शराब पी रखी थी। आपको याद हो तो कई वर्ष पहले अहमदाबाद में ऐसी ही एक और विमान दुर्घटना हुई थी कोई 30 35 साल पहले और यहां हवाई पट्टी से 2 कि.मी. दूर वो विमान को उसने खेत में ही उतार दिया। तो वह भी ऐसा ही हुआ था। जल गया था और काफी लोग मरे। एक बचा था उसमें भी। इसमें भी एक बचा इस घटना में। उसमें भी एक बचा था। कोई त्रिवेदी नाम का था व्यक्ति। वह भी विमान जब घिसट रहा था जमीन पर तो उसने भी देखा मैं भी कूद जाता हूं शायद बच जाऊं तो वह भी कूद गया ऐसे चलते-चलते विमान से कूद गया दो चार पलटी मारी और बच भी गया तो कभी-कभी ऐसी घटना हो जाती है संयोग की बात है ये तो गलती पायलट की ट्रक ड्राइवर की कार ड्राइवर ड्राइवर की और नुकसान दूसरों को तो लोग यहां आकर पूछते हैं यह क्या न्याय है क्या इनकी मौत यही लिखी थी? ऐसी बातें तब उठती हैं। और बहुत से लोग यही मान लेते हैं इनकी तो मौत यही लिखी थी। तभी तो यहां मरे आकर के कोई बाइक वाला जा रहा था हाईवे पर। ट्रक वाले ने पीछे से टक्कर मारी। वो गिर गया। वहीं मर गया। तो लोग कहते हैं इसकी मौत यहीं लिखी थी। तो यह बात गलत है, झूठ है। जो विमान दुर्घटना में मरे उनकी मौत यहां नहीं लिखी थी। जो इस तरह के एक्सीडेंट्स में लोग मरते हैं ट्रक के नीचे, कार के नीचे, बाइक के नीचे या किसी भी तरह से जो इस तरह दुर्घटना में मरते हैं उनकी मौत कहीं नहीं लिखी थी। पर जो लोग मानते हैं उनकी मौत यहीं लिखी थी। हमने उनसे पूछा। अगर इनकी मौत लिखी थी तो बताओ किसने लिखी थी? आप में से भी कुछ लोग ऐसा मानते होंगे कि हां हां उसकी मौत वहीं लिखी थी। जिसकी मौत जहां पर निर्धारित है वह व्यक्ति उस दिन वहीं मरेगा। ऐसा करोड़ों व्यक्ति मानते हैं। और कुछ तो यहां तक भी कहते हैं। जिसकी मौत भगवान ने जहां लिखी है, वह जमीन उसको खींच के वहीं ले आती है। ऐसे ऐसे भी बोलते हैं। वह जमीन उसको खींच कर वहीं ले आती है। उसको यहीं मरना है। तो हमने पूछा किसने लिखी थी मौत? बोले भगवान ने और कौन लिखेगा? एक ही तो है लिखने वाला। सबकी मौत भगवान ने लिख रखी है। कब कौन कहां कैसे मरेगा? सब पहले से तय है। निश्चित है। निर्धारित है। ऐसा करोड़ों व्यक्ति मानते हैं। जबकि यह झूठ है। यह सच नहीं है।

तो मैंने उन लोगों से पूछा कि ये मौत किसने लिखी थी? बोले भगवान ने लिखी। तो मैंने कहा भगवान ठीक लिखता है या गलत लिखता है? बोले भगवान तो ठीक लिखता है। वो गलत क्यों लिखेगा? वो तो ठीक ही लिखता है। भगवान कोई गलती थोड़ी करता है। मैंने कहा चलो मान लेते हैं भगवान ने लिखी थी और ठीक लिखी थी। तो जो व्यक्ति बाइक चला रहा था, हाईवे पर ठीक जा रहा था, ठीक नियम का पालन कर रहा था, हेलमेट भी लगाया था और उसकी स्पीड भी ठीक थी। वह सारे ट्रैफिक रूल्स का पालन कर रहा था और फिर ट्रक वाले ने आकर उसको ठोका और एक्सीडेंट कर दिया और वह बेचारा गिर गया। उसको चोट लग गई मर गया। उसकी मौत यदि भगवान ने लिखी थी तो ट्रक ड्राइवर ने ईश्वर के आदेश का पालन किया या नहीं किया? हैं जी। किया ना? अब बताइए ईश्वर के आदेश का पालन करना धर्म है या अधर्म? धर्म है। क्या सोच रहा है? धर्म नहीं है। है ना? सब शास्त्रों में लिखा है ईश्वर के आदेश का पालन करना धर्म है। तो ड्राइवर ने जो ट्रक ड्राइवर ने बाइक वाले को ठोक के मार दिया। उसने ईश्वर के आदेश का पालन किया। ईश्वर के आदेश का पालन करना धर्म है। धर्म का फल सुख है या दुख है? सुख है। धर्म का फल सुख है। तो क्या आप ट्रक ड्राइवर को सुख देंगे? उसने ईश्वर के आदेश का पालन किया है। धर्म का पालन किया है। धर्म का फल सुख है। आप ट्रक ड्राइवर को सुख देंगे? हां या ना? हैं? नहीं देंगे। क्यों? अब तो आप सब छोड़ के भाग गए मैदान। अभी तो कह रहे थे धर्म का फल सुख है और ईश्वर के आदेश का पालन करना धर्म है और अभी आप कह रहे थे वह भगवान ने मौत लिखी थी तो उसने ईश्वर के आदेश का पालन किया तो उसको इनाम दो फिर आप इनाम क्यों नहीं दे रहे फिर या तो आपकी बात गलत है या वो गलत है यदि आप उसको यह मानते हैं कि भगवान के आदेश का पालन किया तो फिर उसको इनाम दो और इनाम देते नहीं तो इसका मतलब वह ईश्वर का आदेश नहीं था यह तो दोनों बातें विरोधी हैं। एक तरफ आप कहते हैं वह ईश्वर ने मौत लिखी थी। लिखी थी तो उसको इनाम दो। जैसे जल्लाद को वेतन मिलता है। जल्लाद को वेतन मिलता है या नहीं? न्यायाधीश ने आदेश दिया भाई अपराधी है। इसको फांसी पर लटका दो। न्यायाधीश ने लटका दिया। तो नहीं न्यायाधीश ने आदेश किया। जल्लाद ने उसको लटका दिया। जल्लाद ने न्यायाधीश के आदेश का पालन किया या नहीं किया? जब किया तो क्या वह अपराधी है? तो वह तो ठीक काम कर रहा है। आदेश का पालन कर रहा है। उसको तो आप वेतन दे रहे हैं। तो जो न्यायाधीश के आदेश का पालन करे उसको तो वेतन। और जो ट्रक ड्राइवर ईश्वर के आदेश का पालन करे उसको दंड। यह कौन सा न्याय है? यह कोई न्याय है क्या? सोचिए। हैं। पिछले जन्म का किसने ड्राइवर को पता था इसने मेरे साथ पिछले जन्म में क्या किया? ड्राइवर को पता था और पिछले जन्म का बदला लेने का उसको अधिकार है। हां या ना? नहीं है। ना उसको पता है कि इसने मेरे साथ पिछले जन्म में क्या किया। मैं अपने कर्म का बदला ले लूं। ना तो उसका कर्म का पता और ना उसको अधिकार कि मैं इससे बदला ले लूं। बदला लेने का अधिकार भी नहीं है। वह तो न्यायाधीश को अधिकार है। वह दंड दे सकता है। हर आदमी को दंड देने का अधिकार नहीं है। न्यायाधीश को अधिकार है। ईश्वर को है, माता-पिता को है, टीचर को है, पंचायत को है। उनको अधिकार है दंड देने का। हर एक आदमी को नहीं है अधिकार। तो ट्रक ड्राइवर को ना तो अधिकार है फल देने का ना उसको पता है कि मैं किस कर्म का फल दे रहा हूं। जब उसको कर्म का ही पता नहीं तो फल का निर्णय कैसे करेगा? कितना फल दूं? दो हड्डी तोड़ूं, तीन हड्डी तोड़ूं, पांच हड्डी तोड़ूं या पूरी जान ले लूं। कितना दंड दूं? वो कैसे डिसाइड करेगा? कोर्ट में न्यायाधीश पहले मुकदमा सुनते हैं। हां या ना? मुकदमा सुनते हैं। उसकी जानकारी करते हैं। किसने अपराध किया? कितना किया, कब किया, कैसे किया, उसका प्रमाण लाओ, एविडेंस लाओ। जब सारी बातें सिद्ध हो जाती हैं, तभी तो वह नापतोल कर दंड देते हैं ना कि इतना अपराध है तो इतना दंड। अधिक अपराध है तो अधिक दंड। जितना अपराध है उतना दंड नापतोल कर दिया जाता है। और जो ट्रक वाला एक्सीडेंट है वो नापतोल कर ठोका जाता है। इसकी दो हड्डी तोड़ूं, उसकी तीन तोड़ूं। नापतोल के दिया जाता है वहां तो जो नापतोल कर नहीं होता उसको एक्सीडेंट कहते हैं। वह कर्म फल नहीं है। क्या बोला? जो बिना नापतोल के होता है। जिसमें कोई नापतोल नहीं होती उसको एक्सीडेंट कहते हैं। वह कर्म का फल नहीं है। और जो कर्म का फल होता है, वह नापतोलकर होता है। उसको एक्सीडेंट नहीं कहते। कर्म फल को एक्सीडेंट नहीं कहते। दोनों में अंतर है क्योंकि कर्म फल में नापतोल होती है और एक्सीडेंट में कोई नापतोल नहीं होती। एक मोटा सा अंतर है। तो ट्रक ड्राइवर ने जो बाइक वाले को चोट मारी वह नापतोल के मारी थी या ऐसे ही कुछ भी हो गया तो फिर वो कर्म फल नहीं है। ऐसे ही विमान दुर्घटना में जो हुआ कोई ट्रेन दुर्घटना हो, विमान दुर्घटना हो, स्कूटर की एक्सीडेंट हो हैं। कोई भूकंप हो, कोई आंधी हो, तूफान हो, बाढ़ हो, भूकंप हो, कुछ भी हो। यह सारी दुर्घटनाएं हैं। इनको एक्सीडेंट कहते हैं। कुछ प्राकृतिक दुर्घटनाएं हैं। आंधी, तूफान, बाढ़, भूकंप यह तो प्राकृतिक हैं। प्रकृति में होती रहती हैं। और मनुष्य की जो मानवकृत दुर्घटनाएं हैं, वह विमान दुर्घटना है, रेल दुर्घटना है, ट्रक की दुर्घटना है, साइकिल दुर्घटना है, वो मानवकृत है, मनुष्यकृत है। वो भी दुर्घटना है। उसमें कोई नापतोल तो है नहीं। और जो कुछ लोग गलती करते हैं आत्महत्या की वह जहर पी के मर जाते हैं। कोई पिस्तौल चला लेता है अपने ऊपर। यह भी दुर्घटना है। यह कोई मौत को लिखी थोड़ी है। वो तो खुद गलती कर रहा है। भगवान ने थोड़ी कहा तू मर जा। भगवान ने तो जीने को बोला है। ईश्वर ने हमको जीने के लिए समय दिया है। 50 60 70 80 90 साल 100 साल जियो। जीने के लिए भेजा है। मरने के लिए नहीं। जो लोग यहां समस्याओं से घबरा जाते हैं उनको कोई समाधान नहीं सूझता। वह ऐसी गलती करते हैं। तो आत्महत्या करना भारी अपराध है। भारत के संविधान में भी अपराध है और ईश्वर के संविधान में भी अपराध है। दोनों जगह अपराध है। इसलिए आत्महत्या कभी नहीं करनी चाहिए। उसका फिर दंड मिलेगा। कोई व्यक्ति आत्महत्या करने में सफल हो गया, मर ही गया तो भारत सरकार उसको पकड़ नहीं सकती। वह तो गया आज से ही उसको भारत सरकार दंड नहीं दे पाएगी। लेकिन ईश्वर तो पकड़ लेगा। हां या ना? जो आत्महत्या करेगा ईश्वर तो फिर भी उसको पकड़ ही लेगा। तो ईश्वर उसको दंड देगा। तुमने आत्महत्या क्यों की? तुमको यहां मरने के लिए नहीं भेजा था। जीने के लिए भेजा था। तुम्हारी कोई समस्या है तो अपने भाई को बताओ, बहन को बताओ, माता-पिता को बताओ, मित्रों को बताओ, किसी को बताओ, पुलिस को बताओ, सेना को बताओ, कोर्ट को बताओ, किसी को समस्या बताओ आपका समाधान करेंगे। मरना कोई समाधान नहीं है और ना कहीं लिखा है कि समस्या हो तो डूब मरो। ऐसा कोई समाधान नहीं है और उससे कोई समस्या हल होती भी नहीं है। उल्टा और समस्या बढ़ती है। यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करने में असफल हो गया, बच गया, नहीं मर पाया तो उस पर आत्महत्या का प्रयास इस नाम की कलम लगती है। इस पर इस धारा में उस पर केस होता है। आत्महत्या करने का प्रयास किया। यह भी अपराध है। यदि वह बच गया मरने से तो फिर भारत सरकार दंड देगी और अगर मर ही गया तो फिर ईश्वर दंड देगा। इसलिए यह अपराध है। ऐसा नहीं करना चाहिए। जो आपकी समस्या है किसी को बताइए। वह फिर आपका कोई समाधान

कर देगा। ठीक है? तो किसी ने पिस्तौल चलाई अपने ऊपर। यह कर्म है। और परिणाम क्या हुआ? वो मर गया। पिस्तौल चलाई, खोपड़ी फट गई, मर गया।

जब व्यक्ति अपने शरीर पर क्रिया करता है, हम ध्यान से सुनिए। जब कोई व्यक्ति अपने शरीर पर क्रिया करता है तो उसकी जो प्रतिक्रिया होती है, वह उसके कर्म का परिणाम भी है और फल भी है। वह दोनों हैं।

और जब दूसरे पर क्रिया करता है, पिस्तौल चलाई दूसरे व्यक्ति पर तो वह कर्म का परिणाम है। फल तो इसको मिला नहीं। फल तो इसको मिलेगा ना कर्ता को। गोली जिसने चलाई, फल तो उसको मिलेगा और बेचारा मर गया दूसरा। गोली इसने चलाई, मर गया दूसरा। ट्रक चलाया ड्राइवर ने, मर गया बाइक वाला। तो यह तो दूसरे पर क्रिया हुई, दूसरे पर परिणाम हुआ। परिणाम खुद पर भी हो सकता है, दूसरे पर भी हो सकता है। जहां क्रिया करेंगे वहीं परिणाम होगा। तो स्वयं पर क्रिया की तो स्वयं पर परिणाम होगा। दूसरे पर क्रिया की तो दूसरे पर परिणाम होगा। लेकिन फल, फल तो खुद को ही मिलेगा, कर्ता को ही मिलेगा। फल दूसरे को नहीं मिलेगा।

और वो परिणाम वाली बात फिर दोहराता हूं। जब हम अपने ऊपर क्रिया करेंगे, वह हमारा कर्म का परिणाम भी होगा और फल भी होगा। ऐसा शास्त्रों में लिखा है। जैसे योग दर्शन में लिखा है कि जो व्यक्ति व्यायाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है। बढ़ती है। आयुर्वेद में भी लिखा है जो व्यायाम करता है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है, संयम से खानपान करता है, दिनचर्या ठीक रखता है, यज्ञ करता है, संध्या करता है, उपासना करता है, परोपकार करता है, अच्छे काम करता है, दूसरों की मदद करता है। उसकी आयु बढ़ती है। वो प्रसन्नता है, उसकी प्रसन्नता बढ़ती है, आनंद बढ़ता है, उसकी आयु बढ़ती है, शरीर स्वस्थ रहता है, बलवान बनता है, बुद्धि बढ़ती है, सारे फायदे होते हैं।

तो जो अपने साथ क्रिया कर रहा है, व्यायाम आदि करना, इससे उसकी आयु बढ़ रही है और आयु को कर्म का फल बताया योग दर्शन दूसरा चैप्टर 13वां सूत्र उसमें आयु बढ़ना यह कर्मों का फल लिखा है। जाति, आयु, भोग तीन फल लिखे ना? तो आयु बढ़ रही है, यह फल है। तो जब अपने शरीर के साथ क्रिया कर रहा है तो वह परिणाम भी है और फल भी है, दोनों है। अपने साथ क्रिया करेंगे तो वह दोनों है, परिणाम भी और फल।

और कोई जहर पी के मर गया तो जहर पिएगा तो शरीर मरेगा। वो परिणाम हो गया और आयु खत्म हो गई। उसने अपना दंड भोगा। यह उसका फल भी है। आयु का घटना बढ़ना यह कर्म का फल है। तो इस तरह से जब अपने ऊपर क्रिया की जाएगी तो उससे जो भी प्रतिक्रिया होगी, वह परिणाम भी है और फल भी है।

और जब दूसरे पर क्रिया करेंगे तो वह परिणाम कहलाएगा, फल नहीं। तो ट्रक ड्राइवर ने बाइक वाले को मारा। यह परिणाम था। फिर अब वो पकड़ा जाएगा। ड्राइवर। उस पर मुकदमा होगा। उसको दंड मिलेगा। यह होगा उसका फल। फल तो अभी बाद में मिलेगा उसको। पहले तो उसको मारा, यह यह परिणाम है।

ऐसे ही प्लेन दुर्घटना, ट्रेन दुर्घटना, कोई भी दुर्घटना होती है, उसमें जो जो दोषी होते हैं, वह हैं कर्म करने वाले। सिग्नल मैन ने गलत सिग्नल दे दिया। एक पटरी पे दो गाड़ियां छोड़ दी। एक इधर से आ रही है, एक उधर से आ रही है। एक ही पटरी पे सिग्नल मैन ने दोनों को छोड़ दिया तो दोनों टकराएंगी। अब जिसकी गलती है, वह उसका कर्म है। गलती तो सिग्नल मैन की है। उसने गलत सिग्नल दिया। ड्राइवर ने चला दिया। ड्राइवर का तो कोई दोष नहीं। उसको तो जैसा सिग्नल मिलेगा, वैसे चलेगा। सिग्नल मैन ने गलती की। ड्राइवर ने उसका पालन किया और दो ट्रेन सामने सामने टकरा गई। बहुत से लोग मर गए। कुछ घायल हो गए। कुछ ठीक-ठाक बचे।

तो यह जो दुर्घटना में वह लोग मारे गए, यह उनका कोई कर्म फल नहीं है। कर्म तो किया सिग्नल मैन ने, गलती उसकी थी और मारे गए। ये लोग, यह उसके कर्म का परिणाम है। बोलिए समझ में आया परिणाम? तो ऐसे संसार में बहुत सारी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। उसमें कर्म कोई और करता है। परिणाम किसी और को भोगना पड़ता है। ऐसी विमान दुर्घटना हुई, जो 300 लोग मारे गए। गलती किसी और की थी। मारे गए बेचारे कोई और। यह कर्म का परिणाम था।

अब यह तो खोजने की बात है। किसकी गलती थी, वह तो आगे रिसर्च करने पर पता चलेगा। वह अलग विषय है। पर जिसने गलती की, वह था कर्ता और जो मारे गए, वह था कर्म का परिणाम। ऐसे दुर्घटनाओं में सब जगह समझ लीजिएगा। तो यह अन्याय है। जो विमान यात्री मारे गए, जो बाइक वाला मारा गया ट्रक के नीचे, यह उसके साथ अन्याय है। यह कर्म फल नहीं है।

जब कोई दुख बिना कर्म के भोगना पड़ता है, बिना अपराध के, बिना दोष के भोगना पड़ता है, उसको अन्याय कहते हैं। क्या कहते हैं? यह अन्याय है। क्या आप मानते हैं संसार में अन्याय होता है? होता है। थोड़ा या ज्यादा? एक के साथ होता है या सबके साथ? बस। तो फिर चिल्लाते क्यों हैं? शिकायत क्यों करते हैं? साहब, बड़ा अन्याय हो गया। अरे, वो तो होता ही है। कौन सी नई बात है? रोज होता है। सबके साथ होता है। अन्याय ज़्यादा होता है। न्याय कम होता है। इस संसार में अन्याय अधिक होता है और न्याय बहुत कम होता है। बोलिए। अन्याय सबके साथ होता है। अन्याय भी वैसे सबके साथ होता है, पर होता कम है। अन्याय ज्यादा होता है।

इसका प्रमाण यह है कि संसार में मनुष्य थोड़े से हैं और कुत्ते, गधे, कीड़े-मकोड़े बहुत ज्यादा हैं। यह प्रमाण है। प्रमाण समझ में आया? कुत्ते, गधे, सांप, बिच्छू लाखों हैं। लाखों योनियां और मनुष्य योनि एक। अच्छे कर्म करने से मनुष्य योनि मिलती है। बुरे कर्म करने से लाखों योनियां मिलती हैं। अब क्या मोटा-मोटा हिसाब देखें तो न्याय एक होता है। अन्याय लाखों होते हैं। मान लो 84 लाख योनियां हैं। जी, बचपन से सुन रहे हैं हम भी, आप भी। 84 लाख योनियां हैं। यदि हर योनि में एक प्राणी को माने। एक आत्मा, एक मनुष्य, एक कुत्ता, एक गधा, एक घोड़ा, ऐसे 84 लाख। मान लो इतना भी गिने हम। जब 84 लाख वैरायटी है तो प्रत्येक योनि में कोई एक आत्मा तो होगा ना? तो हम एक-एक की रेशियो भी मान लें, एक मनुष्य और उसके सामने 84 लाख दूसरे प्राणी। तो इसकी मोटी गिनती यह है। आप व्यापारी लोग हैं, हिसाब लगा लो। एक पुण्य होता है, 84 लाख पाप होते हैं। सीधा हिसाब बताओ, पुण्य अधिक हो रहा है या पाप अधिक हो रहा है? न्याय अधिक हो रहा है या अन्याय अधिक हो रहा है?

आपके साथ भी अन्याय होता होगा, हां या ना? जब अन्याय हो तो ऐसे चिल्लाना नहीं। यह क्या हो रहा है? हे भगवान! यह क्या हो रहा है? कहां गया तुम्हारा अन्याय? भगवान को गाली मत दो। यह भगवान का अन्याय नहीं है। यह इन मनुष्यों का है जो आपके साथ तंग कर रहे हैं आपको, जो आपको परेशान कर रहे हैं। यह इन मनुष्यों के द्वारा किया गया अन्याय है। ईश्वर द्वारा नहीं। ईश्वर पूर्ण न्यायकारी है। वह कभी अन्याय नहीं करता, ना किया आज तक, ना आगे करेगा। वह पक्का परफेक्ट काम करता है। उसके काम में कोई गड़बड़ नहीं है। वेदों में साफ लिखा है। हां, बोलिए। हैं। हां, जो एक्सीडेंट में मरता है। हां। प्राकृतिक दुर्घटना में, तूफान में मर गया, आंधी में मर गया, बाढ़ में डूब गया, उसको तत्काल दूसरा जन्म मिलता है। सबको मिलता है। चाहे कैसे भी मरे। कोई सुसाइड करके मरे, उसको भी तत्काल मिलता है। कोई स्वाभाविक मृत्यु से मरे, 90 साल की उम्र में, उसको भी तत्काल मिलता है। कोई एक्सीडेंट में मरे, कोई कैसे भी मरे, उसका दोष नहीं है। उसका दंड नहीं मिलेगा। पर दूसरा जन्म तो मिलेगा ना।

वह भूत-प्रेत बन के भटकता नहीं है। ध्यान रखना। बहुत से लोग सोचते हैं जो एक्सीडेंट में मर जाता है ना, वह 20 साल तक भटकता रहता है, धूप, भूत बनके, क्योंकि उसकी उम्र 20 साल बच गई। मान लो कोई 60 साल का व्यक्ति मर गया और उसकी उम्र थी 80 साल, मजबूत था शरीर, 80 तक जी सकता था और 60 में एक्सीडेंट में मर गया तो जल्दी मर गया तो 20 साल उम्र बच गई तो कुछ लोग ऐसा मानते हैं जितनी उम्र बच गई, तब तक वो भूत बन के भटकेगा और लोगों को हैरान-परेशान करेगा। ऐसा नहीं है। कोई भूत-प्रेत नहीं होता। ही नहीं कहीं भी नहीं लिखा शास्त्रों में, वेदों में, कहीं भी नहीं है। ऋषियों के ग्रंथों में कहीं भी नहीं है। बल्कि उसका खंडन तो किया है। भूत-प्रेत का खंडन तो किया है। कोई भूत-प्रेत नहीं होता।

यह जो तांत्रिक लोग ड्रामा करते हैं, मैं भूत निकाल दूंगा, मैं भूत डाल दूंगा, मैं आत्माओं को बुलाना जानता हूं, मैं निकालना जानता हूं। यह सब नाटक है। यह सब ड्रामा है। अगर कोई व्यक्ति इतनी ताकत रखता है कि मैं आत्माओं को बुलाना जानता हूं, मैं डालना जानता हूं, मैं निकालना जानता हूं। अगर इतनी कला है उसमें तो जब उसकी मां मर जाए तो अपनी मां को वापस आत्मा को बुलाओ। बोलो बुला देगा? हां जी। क्यों? अब क्या हुआ? अब कहां गई उसकी शक्ति? आत्मा को बुलाने की। जो अपनी मां की आत्मा नहीं बुला सकता, वो दूसरे की आत्मा बुलाएगा। आप सोचो बुद्धि आपके पास। जो अपनी मां को जिंदा देखना नहीं चाहता क्या? अपनी मां से उसको प्रेम नहीं है क्या? जो अपनी मां की आत्मा को वापस नहीं बुला सकता। दूसरे की आत्मा को क्या बुलाएगा? खामखा मूर्ख बना रहे हैं। धोखा दे रहे हैं लोगों को। जनता बेचारी भोली है। यह उसको मूर्ख बनाते रहते हैं। तो ऐसे दुष्टों से बच के रहें। यह केवल लूटने वाले हैं। धन लूटने वाले हैं। मूर्ख बनाते हैं। उल्टे-सीधे पाखंड करते हैं।

मैं पिछले 35-40 साल से मंच पर बैठकर यह चैलेंज कर रहा हूं। आज फिर कर रहा हूं। चलो, आज फिर एक चैलेंज सुना देता हूं। आज फिर मैं इस मंच पर चैलेंज करता हूं। कोई तांत्रिक, कोई भूत-प्रेत वाला एक आत्मा मेरे शरीर में डाल दे तो ₹1 लाख इनाम दूंगा। सबके सामने चैलेंज। और अगर नहीं डाला तो ₹1 लाख जुर्माना भी होगा। ध्यान रखना। जिसमें हिम्मत हो, आए सामने। अब तक तो आया नहीं। कोई 35-40 साल हो गए। एक भी नहीं आया।

मरने के बाद आत्मा बेहोश हो जाता है। क्या होता है? जब बेहोश हो जाता है, उसमें होश ही नहीं, कोई शक्ति नहीं, कोई शरीर नहीं, कोई ताकत नहीं, कोई ज्ञान नहीं। तो वह बताओ कहां भटकेगा? कहां चलेगा? चल ही नहीं सकता। आप में से किसी को 104-105 डिग्री फारेनहाइट का बुखार आ जाए और तब आपसे यह कहा जाए, चलो सड़क पर दौड़ लगाएंगे। आप 105 के बुखार में सड़क पर दौड़ लगाएंगे? लगा सकते हैं। आपकी इच्छा हो तो भी नहीं लगा सकते। अभी तो शरीर भी है, इच्छा भी है, पर शक्ति नहीं है। शक्ति के बिना आप इच्छा होते हुए भी 105 के बुखार में सड़क पर दौड़ नहीं लगा सकते। मरने के बाद तो इच्छा भी नहीं रही, शक्ति भी नहीं रही, होश भी नहीं रहा। अब बताओ कैसे दौड़ लगाएगा?

तो यह सब काल्पनिक बातें, व्यर्थ की बातें, भ्रांति की बातें हैं। भारत नहीं, अमेरिका तक यह भूत-भूत-प्रेत की भ्रांति दूर तक अमेरिका तक फैली हुई है। तो इससे बच के रहें। यह सब पाखंड की बातें हैं। इससे कुछ नहीं होने वाला। जब तक शरीर है, तब तक व्यक्ति होश में है, तब तक उसकी इच्छा है, तब तक वह काम कर सकता है। मरने के बाद वह तत्काल बेहोश हो जाता है। और बेहोश होते ही ईश्वर उसको अपने कब्जे में ले लेता है। और फिर ईश्वर उसके कर्म अनुसार उसको अगला जन्म देगा। उसको कहां जन्म देना? ईश्वर उसको उठा ले जाएगा। मान लो किसी को अफ्रीका में जन्म देना है। भारत में भोपाल में मर गया। उसकी मृत्यु भोपाल में हुई। 90 साल का बूढ़ा था। उसके कर्मों का हिसाब देखा ईश्वर ने। और यह डिसाइड किया कि इसको अगला जन्म कहां देना है? अफ्रीका में। वो दक्षिण अफ्रीका में। निग्रो जाति में देना है। ऐसे-ऐसे परिवार में देना है। उसके कर्म के हिसाब से। तो भोपाल से उठाकर दक्षिण अफ्रीका तक ईश्वर ले जाएगा। उसको तो होश ही नहीं है। और ना उसको पता है मेरे कर्म कैसे हैं और मुझे कहां अगला जन्म मिलेगा। उसके हाथ में है नहीं।

कर्म करना व्यक्ति के अधिकार में है। कर्मण्येवाधिकारस्ते। कर्म करना आपके अधिकार में है। परिणाम आपके अधिकार में नहीं है। फल आपको कर्म के हिसाब से मिलेगा। पर कहां मिलेगा, यह आप डिसाइड नहीं कर पाएंगे। यह तो ईश्वर डिसाइड करेगा। आपके कर्म का फल कहां बनता है, वह देगा। फल भोगने में आप परतंत्र हैं। फल मिलेगा इस बात की गारंटी है। डाउट कुछ नहीं है। लेकिन आपकी इच्छा से नहीं मिलेगा। क्या बोला? आपकी इच्छा से नहीं मिलेगा। आपकी चॉइस नहीं है कि मुझे जर्मनी में जन्म चाहिए तो भगवान जर्मनी में दे दे। आप चाहे मुझे जापान में जन्म दे तो जापान में देगा। ऐसा नहीं है। वह अपने हिसाब से देगा। जैसा आपका कर्म है, उसके आधार पर देगा। मनमानी कुछ नहीं करेगा। अन्याय बिल्कुल नहीं करेगा, पर आपकी इच्छा से भी नहीं देगा। अपने न्याय विधान के अनुसार देगा। फल भोगने में हम परतंत्र हैं। और परिणाम हमारे अधिकार में नहीं है। वह जो था मा फलेषु कदाचन, उसका अर्थ है परिणाम हमारे अधिकार में नहीं है।

उसका एक और एग्जांपल दे देता हूं, फिर समाप्त करेंगे। फिर बीच में 15-20 मिनट का ब्रेक। तो परिणाम हमारे अधिकार में नहीं है। एक उदाहरण देता हूं। एक अध्यापक बच्चों को पढ़ाता है। क्लास में 50 विद्यार्थी पढ़ते हैं। पढ़ाना अध्यापक का कर्म है। हां या ना? वह 10 महीने खूब मेहनत करके पढ़ाता है। क्या 50 के 50 विद्यार्थी एक जैसा विद्या प्राप्त करते हैं? नहीं करते। तो पढ़ाना अध्यापक का कर्म है। पढ़ना विद्यार्थी कितना पढ़ते हैं? कितना सीखते हैं? यह इसके कर्म का परिणाम है। हां। क्या बोला? परिणाम क्या है? विद्यार्थी कितना सीखते हैं, यह कर्म का? तो परिणाम तो अध्यापक के अधिकार में नहीं है ना? कौन कितना सीखेगा? वह तो उसके अधिकार में। वह तो विद्यार्थी के अधिकार में। कौन कितना सीखेगा? किसकी बुद्धि तेज है? किसकी स्लो चलती है? कौन रुचि लेता है? कौन नहीं लेता है? कोई सावधानी से पढ़ता है, कोई आलसी बनके बैठा रहता है, कोई अध्यापक की तरफ देखता है, कोई खिड़की से बाहर देखता है। अब वह तो अध्यापक के कंट्रोल में नहीं है। तो कौन कितना पढ़ेगा, यह अध्यापक के अधिकार में नहीं है। यह है परिणाम। तो परिणाम में अधिकार नहीं हमारा। वह श्लोक गीता का यह कह रहा है। कर्मण्यवाधिकारस्ते। आप पढ़ा तो सकते हैं। यह आपके अधिकार में है। अच्छे से अच्छा पढ़ाओ। बढ़िया से बढ़िया एग्जांपल दो। फटाफट दिमाग में घुस जाए। ऐसा आप पढ़ा सकते हैं, घटिया भी पढ़ा सकते हैं, बढ़िया भी पढ़ा सकते हैं। वह आपके अधिकार में है। पर कौन कितना सीखेगा, वह आपके अधिकार में नहीं है। हां, आपका वेतन तो आपके अधिकार में है। वेतन तो पक्का मिलेगा। वेतन पर डाउट हो जाए तो टीचर भाग जाएगा स्कूल छोड़ के। नहीं नहीं, मैं नहीं पढ़ाता। जब तुम वेतन नहीं दोगे तो मैं क्यों पढ़ाऊंगा? तो वेतन है फल। जो अध्यापक पढ़ाता है साल भर, उसका जो वेतन मिलता है मासिक, वह उसका फल है और विद्यार्थी कितना पढ़ते हैं, वह परिणाम है और जो पढ़ाता है, वह कर्म है।

अब जो मान लो अच्छा पढ़ाता है और विद्यार्थी भी अच्छा पढ़ गए और अच्छे नंबर दिए उस उन्होंने, अच्छे उत्तर लिखे और विद्यार्थियों को अच्छे नंबर मिले तो इस कार्य से विद्यार्थियों के जो माता-पिता हैं, वह बड़े प्रसन्न हो गए हैं और उनको यह बताया कि यह अध्यापक जी बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। विद्यार्थियों ने भी बताया कि हमारे टीचर, हमारे गुरु जी बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। देखो हम कितना अच्छा नंबर लेकर आए। उन्होंने पढ़ाया तो हम इतना पढ़ गए। तो अध्यापक के पढ़ाने से जो दूसरे लोग प्रसन्न होते हैं, वह अध्यापक के अध्यापन कर्म का प्रभाव है। और कभी-कभी तो इतने अच्छे अध्यापक होते हैं, उनकी आवाज, उनकी जो प्रशंसा है, जो प्रसिद्धि है, वह दूर तक चली जाती है। राष्ट्रपति जी तक पहुंच जाती है। और राष्ट्रपति जी और यह राज्यपाल जी कभी-कभी उनको इनाम भी देते हैं। देते हैं ना? कई अध्यापकों को राष्ट्रपति पुरस्कार भी तो मिलते हैं। हां, बहुत सारे लोगों को मिलते हैं। तो, यह जो पुरस्कार मिला, यह उनका फल है। उन्होंने पुरुषार्थ किया। राष्ट्रपति जी ने पुरस्कार दिया, यह उनका फल है। और राष्ट्रपति जी प्रसन्न हो गए। समाज के लोग प्रसन्न हो गए। यह उनके कर्म का प्रभाव। ठीक है? समय पूरा हो गया। बीच में थोड़ा ब्रेक, विश्राम कर लीजिए। कुछ बताएंगे आगे।

अब अब यह ब्रेक हो गया टाइम का। 11:00 बजे फिर हम दोबारा बैठेंगे। ऑनलाइन की शंका भी लेंगे, ऑफलाइन की सब की शंका समाधान करेंगे। ठीक है? हां, सूचना दे जी एक आध मिनट। हां, थोड़ा सा धैर्य बनाए। एक बार जोरदार तालियां हो जाए इस कर्म फल सिद्धांत के विषय में, जो अभी-अभी पूज्य स्वामी जी महाराज ने कर्म फल, परिणाम और प्रभाव भाव बहुत ही बारीकी से, बहुत विस्तार से समझाया। मैं जहां तक समझता हूं कि शायद ऐसे भी लोग होंगे इन अभी श्रोताओं में जिन्होंने इतनी बारीकी से कर्मफल सिद्धांत को आज शायद पहली बार भी सुना हो।

[संगीत]