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Yateem Ladke Ki Aqalmandi Jisne Badal Di Badshah Ki Taqdeer | Islamic Moral Story | Hindi Stories |

Mr. MR Voice 44:52

Transcription

पुराने जमाने की बात है। मगरबी सरजमीन के एक छोटे से गांव में एक नौजवान रहता था जिसका नाम इमरान था। इमरान दिखने में एक आम इंसान था। मगर उसकी निगाहों में एक अजीब सी चमक थी जो उसकी गहरी सोच और बुलंद हौसलों का पता था देती थी। उसकी एक निशानी थी। एक अद चाबी जो वह हमेशा अपनी कमीज के अंदर जंजीर से लटकाए रखता था। यह चाबी ना तो किसी संदूक की थी और ना किसी दरवाजे की बल्कि इमरान का यकीन था कि यह उसके मुकद्दर की चाबी है और इसका राज किसी को बताना उस वक्त तक मुनासिब नहीं जब तक यह खुद अपनी मंजिल ना पाले।

इमरान एक बेहद गरीब घर का चिराग था और उसकी वालिदा जुबैदा खातून उसे पालनेपसने में जिंदगी भर की मशकाकत उठा चुकी थी। एक रोज इमरान ने मुसलसल तीन रातें एक ही तरह का ख्वाब देखा। उस ख्वाब में वो एक आलीशान महल के सामने खड़ा था और उसकी चाबी उस महल के बड़े दरवाजे में फिट हो रही थी। मगर जैसे ही वह दरवाजा खोलता बेपनाह नूर उसकी आंखों को खीरा कर देता और ख्वाब टूट जाता।

चौथे रोज इमरान के चेहरे पर एक ऐसी खुशी नुमाया हुई जो जुबैदा खातून से छिपी ना रह सकी। "मेरे बच्चे," जुबैदा खातून ने शफकत से पूछा, "तेरी यह दिलकश मुस्कान किस बात की गवाही दे रही है? क्या तूने कोई अच्छा ख्वाब देखा है?"

इमरान ने अदब से सर झुकाते हुए कहा, "अम्मा जान, मैंने एक ख्वाब देखा है मगर मैं यह राज किसी पर जाहिर नहीं कर सकता। यह मेरे और मेरे खुदा के दरमियान का अहद है। जब तक इसका वक्त नहीं आता यह लबों तक नहीं आएगा।"

जुबैदा खातून जो तंगहाली से जूझ रही थी, उन्हें लगा कि शायद यह ख्वाब उनकी किस्मत बदल सकता है। इसलिए उन्होंने जिद पकड़ ली। "तुझे यह ख्वाब मुझे बताना ही होगा। मैं तेरी मां हूं और तेरी बेहतरीन ख्वाहिशमंद हूं। अगर तूने इंकार किया तो याद रख मैं तुझे इस घर में चैन से नहीं रहने दूंगी।"

इमरान ने हाथ जोड़ लिया। "अम्मा, यह ख्वाब मेरी जुबान पर कफल की तरह लगा है। मैं माफी चाहता हूं। मैं मजबूर हूं।"

मां को जबरदस्त गुस्सा आया और उन्होंने गरीबी की हताशा में इमरान को पहले तो सख्त डांट डपट की और जब बात ना बनी तो उसे मारना पीटना शुरू कर दिया। इमरान रोता रहा, चीखता रहा मगर अपने लबों पर ताला लगाए रखा।

इत्तेफाकत से उसी वक्त मुल्क के मशहूर वजीर-ए-आज़म अल्लामा फैज अपनी शाही बग्गी में उधर से गुजर रहे थे। उन्होंने किसी नौजवान की दर्दनाक चीखों की आवाज सुनी। अल्लामा फैज ने अपने खादिम से फरमाया, "जाओ और दरियाफ्त करो कि किस मजलूम पर जुल्म हो रहा है। मेरी रियासत में किसी की आह ओ फुगान को अनसुना नहीं किया जा सकता।"

सिपहियों ने जल्द ही लौट कर सारा माजरा वजीर एआम को सुनाया। अल्लामा फैज को यह सुनकर ताज्जुब हुआ कि एक मां अपने बेटे को सिर्फ एक ख्वाब ना बताने की वजह से पीट रही है। उन्होंने फौरन इमरान को अपने सामने हाजिर करने का हुक्म दिया।

"ए नौजवान," वजीर आजम ने शफकत से पूछा, "तुम्हारी इस दर्दनाक हालत की वजह क्या है और वह कौन सा राज है जिसे तुम अपनी वालिदा से भी नहीं कह सकते?"

इमरान ने अपनी नम आंखों को पोंछा और इल्तजा की, "जनाबे अली, मेरी मां मुझे इसरार कर रही थी कि मैं अपना ख्वाब बता दूं और मेरी मजबूरी यह है कि मैं उस ख्वाब की ताबीरर पूरी होने से पहले किसी को नहीं बता सकता।"

"यह वाकई एक अजीबोगरीब राज है," वजीर आजम अल्लामा फैज एक पल के लिए मुस्कुराए। उन्होंने इमरान की हिम्मत और राजदारी को भांप लिया। "वाह, मुझे यकीन है कि यह ख्वाब तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा राज होगा। सुनो, क्या तुम मेरे मुंह बोले बेटे बनोगे? मैं तुम्हारी तालीम और तरबियत, तुम्हारी परवरिश और तुम्हारे इल्म का जिम्मा अपने सर लेता हूं।"

इमरान की आंखों में हैरत और खुशी के आंसू छलक आए। "जी जनाब, यह मेरी खुशनसीबी होगी कि आप जैसे अकलमंद इंसान की शागिर्दी में रहूं।"

अल्लामा फैज ने फौरन एक पैगम जुबैदा खातून के पास भिजवाया कि वह इमरान को उनके हवाले कर दें। जब जुबैदा खातून ने यह सुना तो गहम के आंसू शुक्राने की खुशी में बदल गए। वह दौड़ती हुई आई और वजीर एआम से गुजारिश की, "आप मेरे बच्चे को ले जाइए। मुझे कोई ऐतराज नहीं।"

"ए मेरे बेटे," उन्होंने इमरान से कहा, "तू वजीर-ए-आज़म साहब का हर हुक्म मानना और उनके अदब का दामन कभी ना छोड़ना।"

वजीर-ए-आज़म की बग्गी शहर की सरहद से दूर निकल गई। रास्ते में अल्लामा फैज ने फिर से इमरान को बड़े प्यार से छेड़ा। "अब तो हम बाप बेटे का रिश्ता रखते हैं। क्या तुम मुझे भी वह ख्वाब नहीं सुनाओगे?"

इमरान ने अदब के साथ कहा, "माफ कीजिएगा। अब्बा हुजूर, अब मैं आपको यही कहूंगा। मैं यह ख्वाब किसी को नहीं सुना सकता। आपकी शफकत और मोहब्बत का मैं घायल हूं। मगर यह मेरे ईमान का हिस्सा है।"

वजीर एआम ने मुस्कुराकर यह मसला वहीं छोड़ दिया। क्योंकि उन्हें इस नौजवान की सच्ची लगन और अटूट इरादे पर यकीन हो गया था। उन्होंने सोचा कि वक्त आने पर यह राजक खुद ब खुद जाहिर हो जाएगा। शाखा मैगा और उन्होंने बग्गी में दूसरी बातें शुरू कर दी ताकि नौजवान का दिल बहल जाए।

आखिरकार वह अपनी आलीशान हवेली पहुंचे। वजीर आजम ने हवेली में अपने बच्चों यूसुफ, बड़ा बेटा, आयशा, बड़ी बेटी और सबसे छोटे फरहान को बुलाया और इमरान से मिलवाया। "देखो बच्चों, यह तुम्हारा नया साथी है इमरान। तुम सब इसके साथ मेलजोल से रहना और इसे तंग मत करना। इसने एक ऐसा ख्वाब देखा है जिसकी वजह से यह अपनी जान पर भी खेलने को तैयार है और यह उस राज को किसी को नहीं बताएगा।"

आयशा जो थोड़ी शरारती थी फौरन आगे बढ़ी और इल्तजा की। "इमरान, तुम मुझे ही सुना डालो। मैं किसी को नहीं बताऊंगी।"

इमरान ने इंकार में सर हिला दिया। "माफ करना। मैं किसी को नहीं सुना सकता।"

यूसुफ ने जोर दिया, "अपने भाई को भी नहीं।" इमरान ने फिर इंकार कर दिया। जब सबसे छोटा फरहान कहने लगा, "मैं तो जरूर सुनूंगा। मुझे बता दो।"

इमरान के सब्र का पैमाना छलक गया। उसने गुस्से से कहा, "बस, अगर अब किसी ने इस ख्वाब के बारे में पूछा तो मैं उसे सख्त सबक सिखाऊंगा।"

वजीर आजम अल्लामा फैज को यह बदतमीजी बिल्कुल भी नागवार गुजरी। वह गुस्से से लाल हो गए। "जाओ ले जाओ इस गुस्ताख लड़के को," उन्होंने अपने मुहाफिजों को हुक्म दिया और इसे शहर के दूरदराज के एक मकान में रखो। जब तक इसकी अक्ल ठिकाने ना आ जाए और यह अपने गुस्ताखाना रवय की माफी ना मांग ले। यह हवेली में दाखिल नहीं होगा।

जैसे ही मुहाफिज इमरान को ले जाने लगे। इमरान की जंजीर से लटकती पुरानी चाबी जोर-जोर से थरथराने लगी। जैसे कोई छुपी हुई ताकत जाग उठी हो। मगर इमरान खामोश रहा। उसने कोई ऐतराज नहीं किया।

मुहाफिजों ने इमरान के साथ बहुत ही अच्छा और शफकत भरा सुलूक किया। उन्होंने उसे तन्हा मकान में रखा मगर उसकी हर जरूरत पूरी की। जल्द ही इमरान सब कुछ भूल गया और उस नई जिंदगी में खुशी-खुशी रहने लगा।

मगर वजीर आजम की बेटी आयशा इस राज को जानने के लिए बेताब थी। एक दिन वह उस मकान के पास से गुजरी जहां इमरान को रखा गया था। उसे इमरान को देखते ही उसके ख्वाब की बात याद आ गई। उसने इमरान को इश्क अंगेज निगाहों से देखा और बड़े दुलार से कहा, "इमरान, अगर तुम अपना ख्वाब मुझे सुना दो तो मैं अपने अब्बा से कहकर तुम्हारी सजा माफ करवा दूंगी और मैं तुमसे निकाह भी करूंगी।"

यह सुनते ही इमरान को सख्त गुस्सा आया। उसे लगा कि लोग उसके मुकद्दर की चाबी को सौदा पे मोलभाव समझ रहे हैं। वह आगे बढ़ा और उसने आयशा को दो-तीन थप्पड़ जड़ दिए। "मैंने पहले ही कह दिया था कि जो कोई भी इस ख्वाब को पूछने की जुर्रत करेगा, मैं उसे सजा दूंगा। तुम मेरी इस ज़िद की तौहीन कर रही हो।"

आयशा रोती चिल्लाती हुई वजीर एआम के पास गई और उन्हें सारी बात बताई। अल्लामा फैज यह सुनकर आप इससे बाहर हो गए। "अब मैं इस बदतमीज और गुस्ताख लड़के को किसी कईमत पर माफ नहीं करूंगा। इस तरह की बेअदबी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।"

उसी दिन शाम को शाही महफिल में यह ऐलान किया गया कि इमरान को उसकी गुस्ताखी के लिए सजा-ए मौत दी जाएगी। शहर के बाहर एक ऊंचा चबूतरा तैयार किया गया और दूसरे रोज शहर भर के लोग यह मंजर देखने के लिए वहां जमा हो गए। सजा-ए-मौत का ऐलान सुनकर फजा में एक अजीब सा सन्नाटा तारी था। हर आंख में हैरत थी कि एक मामूली से ख्वाब के राज की हिफाजत के लिए एक नौजवान अपनी जान कुर्बान कर रहा है।

झल्लाद ने रस्सी उठाई और इमरान की आंखों पर पट्टी बांधने का इरादा किया। इमरान ने बेखौफ होकर जल्लाद की तरफ देखा और कहा, "बस एक लम्हे का इंतजार करो। मैं अपने मुकद्दर से नहीं डरता मगर मैं अंधेरे में मरना गवारा नहीं कर सकता।" इमरान ने अपनी कमर से बंधी हुई पुरानी चाबी को जोर से पकड़ा। जैसे ही जल्लाद उसे छूने के लिए आगे बढ़ा, वहां एक जोरदार धमाका हुआ। भीड़ में अफरातफरी मच गई। यह कोई बम या बारूद का धमाका नहीं था बल्कि दूर से आती हुई घोड़ों की तेज रफ्तार का शोर था जो हवा को चीर रहा था।

देखते ही देखते धूल का एक जबरदस्त बवंडर उठा और उस बवंडर से एक शाही रथ तेजी से मंच की तरफ आता दिखाई दिया। उस रथ पर मगरबी सल्तनत का शाही परचम लहरा रहा था और उसमें खुद मुल्क मुल्क मगरिब के ताकतवर बादशाह सुल्तान जाहिर खान तशरीफ फरमा थे। बादशाह अपनी रियासत में किसी की सजा पर कभी खुद हाजिर नहीं होते थे। सिवाय उस वक्त के जब कोई निहायत ही अहम मसला दरपेश हो।

सुल्तान ने अपने शाही मुहाफिजों को हुक्म दिया, "रुक जाओ, यह फांसी फौरन रोक दी जाए।" वजीर आजम अल्लामा फैज जो खुद भी इस सजा के लिए रंजीदा थे दौड़कर सुल्तान के कदमों में झुके। "जहां पनाह, मैं आपके इस अचानक तशरीफ लाने से परेशान हूं। यह नौजवान इमरान मेरी बेटी और मेरे अहद की गुस्ताखी का मुजरिम है। सो सजा देना जरूरी था।"

सुल्तान जाहिर खान ने अपनी बुलंद आवाज में फरमाया, "वजीर, मैंने सुना है कि इस नौजवान को सिर्फ इसलिए सजा दी जा रही है क्योंकि इसने एक ख्वाब का राज किसी को बताने से इंकार कर दिया। अगर इस छोटी सी बात के लिए किसी को सजा-ए मौत दी जाए तो यह हमारे मुल्क की अकलमंदी पर एक धब्बा होगा। हर इंसान को अपने निजी राज की हिफाजत का हक हासिल है।"

फिर सुल्तान ने सीधे इमरान की तरफ देखा। "ए नौजवान, तेरी जिद और तेरे सब्र में एक ऐसी ईमानी ताकत दिखाई देती है जिसे मैं आजमाना चाहता हूं। मैं तुझे माफ करता हूं। तेरी जान बख्श दी गई। अब तू मेरे साथ चलेगा। मुझे यकीन है कि तू अपना ख्वाब मुझे जरूर सुनाएगा।"

इमरान ने अदब से सर झुकाया। उसकी चाबी की थरथराहट कम हो गई थी। "जहां पनाह, आपकी इनायत का मैं शुक्रगुजार। मगर मेरे लिए आप भी वही शख्स हैं जिन्हें मैं यह राज नहीं बता सकता जब तक यह खुद ब खुद जाहिर ना हो जाए।"

यह सुनकर सुल्तान जाहिर खान को ताज्जुब हुआ मगर गुस्सा नहीं आया। उन्होंने वजीर एआम से कहा, "अल्लामा फैज, इस गुस्ताख को अब मेरे हवाले कर दो। मुझे इसका ना झुकना पसंद आया। तुम अपने घर लौट जाओ।"

वजीर आजम ने बेदिली से इजाजत दी। इमरान सुल्तान जाहिर खान के साथ शाही रथ में सवार हो गया। झल्लाद ने राहत की सांस ली और भीड़ अपनी हैरत लिए तितर-बितर होने लगी। शाही रथ महल की तरफ रवा। रास्ते में सुल्तान ने इमरान के साथ बहुत हंसीज़ाक वाली और दिल बहलाने वाली बातें की ताकि उसका दिल जीत सकें।

थोड़ी देर बाद सुल्तान ने आहिस्ता से पूछा। "मेरे प्यारे बरखुरदार, अब बता आखिर वह कौन सा ऐसा ख्वाब है जो तुम्हारी जान लेने पर तोला था और तुम किसी को बताना नहीं चाहते?"

इमरान ने अदब के साथ कहा, "जहां पनाह, आपकी शफकत मेरे लिए एक बहुत बड़ी नेमत है लेकिन जब तक उस ख्वाब की ताबीर पूरी नहीं होती मैं उसे किसी को नहीं सुना सकता। यह मेरी जिंदगी का उसूल है।"

सुल्तान मुस्कुराए और बोले, "कोई बात नहीं। अगर तुम मुझे नहीं सुना सकते, तो मैं तुम्हें अपनी बेटी शहजादी नूर बानो के पास भेजूंगा। वह होशियार, अक्लमंद और तेज फर्म है। मुझे यकीन है कि वह अपनी जहानत और मोहब्बत से तुम्हारा राज उगलवा लेगी।" फिर सुल्तान ने इमरान से कोई और बात नहीं की। और जब शाही काफिला महल के हरेभरे बागात के पास पहुंचा तो शहजादी नूर बानो वहां रेशमी लिबास में फूलों की क्यारियों में टहल रही थी। जैसे ही उन्होंने अपने वालिद मोहतरम का रथ देखा, वह दौड़ कर दरवाजे तक आई।

सुल्तान ने इमरान को रथ से उतारा और शहजादी से मुखातिब हुए। "देखो मेरी बेटी, मैं इस नौजवान को सजा-ए मौत के फंदे से उतार कर लाया हूं। यह एक ऐसा बेवकूफ और जिद्दी इंसान है जो सिर्फ एक छोटे से राज की हिफाजत के लिए अपनी जान दांव पर लगा चुका था। वजीर आजम ने भी इसे सजा देने की पूरी तैयारी कर ली थी।" सुल्तान ने मुस्कुराकर आंख मारी और आहिस्ता आवाज में कहा, "यह एक ऐसा ख्वाब का मालिक है जो किसी को नहीं बताना चाहता। अब यह तुम्हारे जिम्मे है कि तुम अपनी अक्लमंदी से इस राज को जानो। मैं इसे मेहमान खाने में ठहराता हूं और तुम इसकी इज्जत और खिद का ख्याल रखना।"

इमरान को महल के सबसे आलीशान मेहमान खाने में ठहराया गया। उसकी खिदमत में किसी तरह की कोताही नहीं रखी गई। लेकिन शहजादी नूरबानो की नजर हमेशा उसकी कमर से लटकी चाबी और उसके ख्वाब पर टिकी रही। वह जानती थी कि इस नौजवान में कोई खास बात जरूर है। वरना सुल्तान खुद उसे फांसी के तख्ते से ना उठाते।

शहजादी नूरबानो ने इमरान के राज को जानने के लिए अपनी तमाम जहानत और नफासत को आजमाने का फैसला किया। वह पहले तो बापर्दा रही मगर फिर उन्होंने इमरान से मुलाकातें करने का सिलसिला शुरू कर दिया। एक रोज शहजादी चमकीले लिबास में अपनी पूरी शान और शौकत के साथ मेहमान खाने के पास से गुजरी। उनकी खूबसूरती ऐसी थी कि देखने वाला पलक झपकाना भूल जाए। जैसे वह कोई परी हो। इमरान ने जब उन्हें देखा तो उसकी आंखें खुली रह गई। वह एक टक उन्हें देखता रहा।

इस वक्त शहजादी को मौका मुनासिब लगा। वह आहिस्ता से मुस्कुराई और इमरान के करीब आकर बोली, "ए नौजवान, सुल्तान ने तुम्हें खिदमत और राहत की हर चीज दी है। तुम्हारी सच्चाई और ईमानदारी ने मेरे अब्बा हुजूर का दिल जीत लिया है। अब तुम इतने बहशी क्यों हो? तुम अपना वह ख्वाब मुझे सुना दो। मैं तुमसे वादा करती हूं कि मैं तुमसे निकाह करूंगी और तुम्हें इस सल्तनत का दामाद बनाऊंगी। फिर तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं रहेगी।"

शहजादी का यह पैगाम इश्क सुनकर इमरान का दिल भी मुतासिर हुआ। लेकिन उसका रिस्क और इरादा किसी चट्टान की तरह मजबूत था। उसने सर झुका लिया और अदब से कहा, "ए शहजादी, आपकी यह पेशकश मेरे लिए बहुत इज्जत की बात है। और यह मेरे मुकद्दर से कहीं ज्यादा है। मगर मैं यह ख्वाब उस वक्त तक किसी को नहीं बता सकता। जब तक उसकी ताबीरर पूरी ना हो जाए। यह राजा मेरे सीने में बरसों से महफूज है और इसे इज्जत के साथ वहीं रहना है।"

शहजादी ने कई दिनों तक इमरान से इसरार किया। प्यार से समझाया खुशामद कि लेकिन इमरान अपनी बात पर कायम रहा। शहजादी का इसरार जब हद से बढ़ने लगा और उसने आखिरी जुर्रत दिखाते हुए इमरान का हाथ पकड़ कर कहा कि वह उन्हें राज बताए तो इमरान का सब्र जवाब दे गया। उसे याद आया कि कैसे उसने अपनी मां और वजीर आजम की बेटी को सजा दी थी। उसूल सबके लिए एक ही होना चाहिए।

इमरान ने गुस्से में आकर शहजादी को एक जोरदार थप्पड़ मार दिया। शहजादी नूरबानो के नाक से खून बहने लगा। वह चीखती चिल्लाती हुई वहां से भागी। सुल्तान जाहिर खान ने जब-जब अपनी प्यारी बेटी का यह हाल देखा तो वह सन्नाटे में आ गई। उनका सारा प्यार और एहतराम एक पल में गुस्से की शक्ल में बदल गया। जब सुल्तान को पूरी वजह मालूम हुई तो उन्होंने अपने शाही दरबार में ऐलान किया, "मैं इस गुस्ताख और एहसान फरामोश नौजवान को जिंदा नहीं छोडूंगा। इसने मेरी सल्तनत की सबसे मुअज्ज हस्ती की तौहीन की है।"

सुल्तान ने फौरन हुक्म दिया कि एक बहुत ऊंचा मीनार तामीर किया जाए। यह मीनार ऐसा हो कि कोई भी इंसान इसकी चोटी तक ना पहुंच सके। हजारों मजदूरों को लगाया गया और कुछ ही दिनों में एक अजीम शान मीनार तैयार हो गया।

इधर शहजादी नूरबानो का गुस्सा बकलमंदी और इंतकाम में बदल चुका था। वह जानती थी कि इमरान को यूं ही मर जाने देना उस राज को हमेशा के लिए दफन कर देना होगा। वह उस चाबी और ख्वाब की हकीकत जानना चाहती थी। शहजादी ने कुछ मजदूरों को निजी तौर पर बुलाया और उन्हें एक खुफिया हुक्म दिया। उन्होंने कहा कि मीनार के ऊपर एक ऐसी खिड़की बनाई जाए जो बाहर से किसी को नजर ना आए। यह खिड़की इतनी बड़ी हो कि इसके अंदर से खाना और पानी आसानी से दिया जा सके। मजदूरों ने चुपके से शहजादी के हुक्म की तामील की।

शाम होते ही इमरान को जिल्लत के साथ मीनार में कैद कर दिया गया। शहर के बहुत से लोग यह अंजाम देखने के लिए वहां जमा हुए थे। हर रोज सुल्तान एक सिपाही को भेजते कि वह मीनार के नीचे जाए और देखे कि वह गुस्ताखर अभी जिंदा है या नहीं। सिपाही हर रोज लौट कर इत्तला देता कि जहां पनाह, वह नौजवान ना सिर्फ जिंदा है बल्कि पहले से भी ज्यादा तंदुरुस्त और सेहतमंद है। दरअसल यह शहजादी नूरबानों की चाल थी। वह खुफिया खिड़की के अंदर से रोजाना बेहतरीन और साफ पानी भेजती थी ताकि इमरान जिंदा रहे और एक दिन अपना राज खोलने पर मजबूर हो जाए।

सुल्तान फिक्रमंद हो उठे। "जरूर यह लड़का कोई अजीब ताकत रखता है या कोई जादूगर है।" इमरान की यह कैद जहां एक तरफ सजा थी, वहीं दूसरी तरफ शहजादी नूरबानों के लिए इंतजार और मोहब्बत का सबब बन रही थी। वह रोजो उस खिड़की के पास जाकर बैठती और इंतजार करती कि शायद इमरान आज राज बता दे।

इसी बीच सल्तनत पर एक नई मुसीबत आ पड़ी। मशरिक का ताकतवर और खंखार हमलावर मंगोल खाने आजम जो अपनी जहानत और फौजी ताकत के लिए मशहूर था। सुल्तान जाहिर खान को नीचा दिखाना चाहता था। एक दिन मंगोल खान का एक दूत सुल्तान के दरबार में हाजिर हुआ। उसने सरकंडे की तीन एक जैसी छड़ियां सुल्तान को दी और अदब से कहा, "मेरे आका खाने आजम ने यह दरियाफ्त किया है कि इन तीनों छड़ियों में से कौन सी छड़ी सरकंडे की जड़ के करीब उगी थी, कौन सी दरमियान से ली गई थी और कौन सी छड़ी सिरे पर यानी सबसे ऊपर उगी थी। अगर आप इसका सही जवाब ना दे सके तो मंगोल फौज मगरिब की सरहद पर जंग के लिए तैयार खड़ी है।"

सुल्तान जाहिर खान यह सुनकर परेशान हो गए। उन्होंने तीनों छड़ियों का मुआयना किया। तीनों ही रंग, शक्ल और वजन में एक जैसी थी। कोई भी फर्क महसूस करना नामुमकिन था। यह एक इल्मी और अक्लमंदी की जंग थी जिसे हारना जंग को दावत देना था। सुल्तान की फिक्र को देखकर शहजादी नूरबानों ने हिम्मत की। वह सामने आई और बोली, "अब्बा हुजूर, आप हरगिज़ परेशान ना हो। अल्लाह ताला कोई ना कोई रास्ता जरूर निकालेगा। मुझे यकीन है कि मैं इसका हल ढूंढ निकालूंगी।"

यह कहकर शहजादी दौड़ती हुई उस मीनार के पास पहुंची जहां इमरान कैद था। उन्होंने खुफिया खिड़की खोली और आहिस्ता आवाज में इमरान को पूरा वाकया और मंगोल खान के सवाल की गंभीरता बताई। इमरान ने तवज्जो से सब कुछ सुना। फिर एक गहरी सांस ली और मुस्कुराकर कहा, "शहजादी, आप बादशाह को जाकर कहिए कि वह मुतमिन रहें। यह कोई मुश्किल सवाल नहीं है। बस एक ताकतवर उसूल को आजमाना होगा। आप उन्हें हिदायत दें कि वह तीनों छड़ियों को एक बड़े बर्तन या हौस के पानी में डाल दें।"

इमरान ने तफसील से बताया, "जो छड़ी पानी के बिल्कुल तह में डूब जाए तो समझ लेना वह छड़ी सरकंडे की जड़ में उगी थी क्योंकि यह हिस्सा सबसे भारी और ठोस होता है। जो छड़ी पानी के दरमियान में ठहर जाए वह छड़ी का दरमियानी हिस्सा है। और जो छड़ी पानी की सतह पर तैरती रहे वह सरकंडे का ऊपरला हिस्सा है क्योंकि यह सबसे हल्का होता है।"

शहजादी यह सादा मगर अक्लमंदी भरा जवाब सुनकर दंग रह गई। वह फौरन दरबार में वापस गई और सुल्तान को तफसीली हल बताया। सुल्तान ने फ़ौरन ऐसा ही किया। उन्होंने

तीनों छड़ियों को पानी में डाला और नतीजतन छड़ियों के हिस्सों की शिनाख्त हो गई। सुल्तान ने फ़ौरन तीनों छड़ियों पर निशान लगाए ताकि मंगोल कासिद को वापस करते वक्त कोई गलती ना हो। अगले रोज सुल्तान ने अदब और यकीन के साथ वह छड़ियां मंगोल कासिद के हवाले कर दी।

मंगोल खाने आजम यह सटीक जवाब पाकर हक्का बक्का रह गया। उसे यकीन नहीं आया कि सुल्तान जाहिर खान इतने जटिल सवाल का हल इतनी सुलझी हुई तरह से दे सकते हैं। इस तरह जंग का खतरा कुछ अरसे के लिए टल गया और सल्तनत पर सुकून वापस आ गया।

सुल्तान और शहजादी दोनों जान गए थे कि यह अक्लमंदी सिर्फ इमरान की हो सकती है। मगर सुल्तान का गुस्सा अभी भी उस पर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। सल्तनत को फौरन जंग के खतरे से महफूज़ करने के बावजूद सुल्तान जाहिर खान अब भी कशमकश में थे। एक तरफ इमरान की अक्लमंदी ने सल्तनत को बर्बादी से बचाया था। और दूसरी तरफ उसकी गुस्ताखी और शहजादी की तौहीन का वाकया सुल्तान के दिल से निकल नहीं पाया था। उन्होंने सोचा कि शायद कैद में रहकर इमरान को अपनी गलती का एहसास हो जाए।

इस बीच कई अरसा गुजर गया। मंगोल खाने आजम को चैन नहीं मिला। उसके दिल में जंग की आग फिर से भड़क उठी क्योंकि उसे मगरबी सल्तनत पर हमला करने के लिए कोई ना कोई वाहियात बहाना चाहिए था। मंगोल खान ने इस बार भी अपने दूत को उस सुल्तान के दरबार में भेजा। यह दूत अपने साथ एक ही रंग और एक ही कद के तीन चूजे लेकर आया। कासिद ने तल्खी से कहा, "हमारे आका-ए आजम ने मगरिब के सुल्तान से यह दरियाफ्त किया है कि इन तीनों चूजों में से कौन सा चूजा सुबह के वक्त पैदा हुआ। कौन सा दोपहर को और कौन सा शाम के वक्त? अगर सुल्तान जाहिर खान इस सादा मगर अजीम सवाल का जवाब नहीं दे पाए तो मंगोल फौज पलक झपकते ही तुम्हारी सल्तनत को तबाह कर देगी।"

यह सुनकर सुल्तान का दिल डूबने लगा। पिछली बार तो शहजादी ने किसी तरह हल ढूंढ लिया था। मगर इस साल मुल्क में महामारी के मर्ज से पहले ही बहुत नुकसान हो चुका था। मुल्क में मातम छाया हुआ था, और जंग लड़ने की ताकत बाकी नहीं थी। सुल्तान ने मायूसी से उन तीन चूजों को देखा। वह पूरी तरह एक जैसे थे। उन्हें पहचानने का कोई इमकान नजर नहीं आ रहा था।

शहजादी नूरबानों ने फिर से अपने वालिद को परेशान देखा। उन्होंने हिम्मत से कहा, "अब्बा हुजूर आप घबराएं नहीं। अल्लाह की रहमत से जरूर कोई तदबीर मिल जाएगी। मैं कब को जाती हूं और इंशा्लाह इसका हल लेकर आऊंगी।" शहजादी फौरन उस ऊंचे मीनार के पास गई जहां उनका गुस्ताख महबूब इमरान कैद था। उन्होंने खुफिया खिड़की खोली और सारा हाल और मंगोल खान का अजीब सवाल इमरान को सुनाया।

इमरान ने इत्मीनान से जवाब दिया। "ऐ शहजादी आप फिक्र ना करें। यह सवाल भी अकलमंदी से हल हो जाएगा। मगर इस बार इस राज को जानने के लिए आपको एक जुदा तरीका अपनाना होगा। आप आज की रात रोज की तरह सोने के लिए लेट जाइए। मगर रात के पिछले पहर अचानक उठकर बैठ जाइए। और फिर तार आवाज में मीनार की तरफ मुंह करके मातम कीजिए कि हाय सुल्तान मंगोल खाने आजम के सवाल का जवाब नहीं दे पाए हैं। अब मंगोल फौज आ रही है और मेरे अब्बा हुजूर को उठाकर ले जा रही है। हमारी सल्तनत तबाह हो गई।"

शहजादी हैरत अजदा थी। मगर उन्हें इमरान की बात पर यकीन था। उन्होंने पूछा, "यह कहने से क्या होगा?" इमरान ने मुस्कुराकर कहा, "आप बस मेरी बात मानिए। जब आप यह मातम कर रही होंगी तो देखिएगा कि इतनी ही देर में मीनार के अंदर से एक साया नुमाया होगा और वह मंगोलों के सवालों का जवाब दे देगा।"

अगले रोज सुबह शहजादी ने बिल्कुल वैसा ही किया जैसा इमरान ने कहा था। जब वह रात के पिछले पहर उठकर रोने और चिल्लाने का नाटक कर रही थी कि मंगोल आ रहे हैं तो सचमुच मीनार में एक जोरदार हलचल हुई। दरअसल इमरान ने मीनार में कैद रहने के दौरान ईंटों और गारे को ढीला कर लिया था। वह जानता था कि एक अहम वक्त आने वाला है। जब उसने सुना कि सल्तनत को खतरा है तो उसके लिए निजी राज से ज्यादा मुल्क की हिफाजत अहम हो गई।

सुल्तान ने फौरन मीनार को गिराने का हुक्म दिया और अपने कैदी को बाइ्जत उनके सामने हाजिर करने को कहा। जब इमरान सुल्तान के सामने आया तो सुल्तान ने उसे गले लगाया। "ए नौजवान तुमने तीन बार मेरी सल्तनत को तबाह होने से बचाया है। तुम्हारी सजा अब पूरी हो चुकी है। मैं तुम्हें फौरन आजादी देता हूं। मगर इस मुश्किल वक्त में मेरा साथ दो और मुझे बताओ कि इन चूजों को कैसे पहचाना जाए।"

सुल्तान ने मंगोल खान का खत निकालकर इमरान को दिया और कहा, "लो इसे पढ़ो अगर हम इसका जवाब ना दे सके तो हमारी तबाही और बर्बादी यकीनी है।" इमरान ने खत पढ़ा और इत्मीनान से कहा, "अली जहां आप बिल्कुल फिक्र ना करें। आप फौरन तीन एक जैसे प्याले मंगवा लीजिए। पहले प्याले में ज्वार, दूसरे में गेहूं और तीसरे में जौ भर दीजिए।"

इमरान ने अक्लमंदी से तफसील बताई। "जो चूजा गेहूं गेहूं खाए वह सुबह के वक्त पैदा हुआ क्योंकि गेहूं सबसे ताकतवर गजता है और सुबह की पैदाइश में चूजे में सबसे ज्यादा जोर और ताजगी होती है। जो चूजा जौ खाए वह दोपहर में पैदा हुआ क्योंकि जौ दरमियानी घसा है और दोपहर में चूजे की ताकत दरमियानी होती है। और जो चूजा ज्वार खाए वह रात को पैदा हुआ क्योंकि रात की पैदाइश में चूजे में कमजोरी होती है और वह हल्की गज पसंद करता है।"

सुल्तान हैरात और मसर्रत से उछल पड़े। उन्होंने फौरन इमरान की बात पर अमल किया और चूजों की शिनाख्त हो गई। सुल्तान ने तीनों चूजों पर निशान लगाए और उन्हें मंगोल खान के पास वापस भिजवा दिया।

मंगोल खान एआम का मंसूबा एक बार फिर धरा का धरा रह गया। वह इस बात से बेहद गुस्से में था कि कोई साधारण शख्स उसके बुद्धिमत्ता के जाल को काट रहा है। वह जानता था कि यह अक्लमंदी सुल्तान की नहीं बल्कि किसी नौजवान की है। उसने फौरन अपनी खाला को बुलाया जो मगरबी सर जमीन की सबसे खतरनाक जादूगरनी और चालाक औरत थी और उससे मशवरा मांगा। मंगोल खाने आजम का शायरा-ए आजम उसकी खाला बीबी जोहरा उसके सामने हाजिर हुई। जोहरा खाला एक शयातीन सिफत की औरत थी जिसकी आंखों में घिनौनी चमक थी। उसने मंगोल खान की सारी शिकायतें सुनी और एक ठंडी सांप जैसी आवाज में बोली, "मेरे आका आप गलत फिक्र कर रहे हैं। इन सवालों के जवाब बादशाह ने नहीं दिए हैं। इन तमाम पहेलियों को सुलझाने वाला एक गरीब बूढ़ी मां का बेटा है जिसका नाम इमरान है। मैंने अपने जादू के जोर से देखा है। अगर वह लड़का जिंदा रहा तो एक दिन ना सिर्फ मगरबी तख्त पर बैठेगा बल्कि आपके खानदान के लिए भी तबाहकारी साबित होगा।" उसने सख्त लहजे में कहा, "अगर आप जाहिर खान की सल्तनत को फतह करना चाहते हैं तो सबसे पहले उस नौजवान को यहां बुलाकर मार डालिए। वरना यह आपके अंजाम का सबब बनेगा।"

मंगोल खाने आजम जो पहले ही दो बार जिल्लत उठा चुका था। अपनी खाला की बात से मुतमिन हो गए। वन गया। उसने फौरन एक ताकतवर सिपाही के हाथ मगरबी सल्तनत को एक धमकी भरा पैगाम भिजवाया। पैगाम में लिखा था, "तुम्हारे महल में जो नौजवान ठहरा हुआ है तो फौरन हमारे पास भेज दिया जाए। अगर तुम इमरान को हमें हवाला नहीं करते तो हमारी नाकाबिल शिकस्त फौज तुम्हारे मुल्क को पल भर में तबाह बर्बाद कर देगी।"

सुल्तान जाहिर खान यह खत पढ़कर बहुत रंजीदा हुआ। वह इमरान की खिदमत और वफादारी के लिए बेहद शुक्रगुजार थे। उन्हें यकीन था कि इमरान को मंगोलों के पास भेजने का मतलब उसे मौत के मुंह में धकेलना होगा। जब सुल्तान ने यह बात इमरान को बताई तो इमरान जो उसे हंसने लगा।

अलीजाम इमरान ने इत्मीनान से कहा, "आप बिल्कुल फिक्र ना करें। आप बस मेरी इल्तजा मानिए। मुझे बचाने के लिए आप फौरन मेरे जैसे दो और हमशक्ल लड़के तलाश कीजिए। बाकी सारा मसला मैं खुद हल कर लूंगा।" सुल्तान को इमरान की अकलमंदी पर पूरा यकीन हो चुका था। उन्होंने फौरन अपने बेहतरीन जासूसों को मुल्क में भेजा और बेहद मशक्कत के बाद इमरान के जैसे दिखने वाले दो नौजवानों को तलाश कर लिया। इमरान ने उन दोनों हमशक्लों को अपने जैसे कपड़े और जूते पहनाए। अब तीनों में फर्क करना नामुमकिन था। यहां तक कि उनके सबसे करीबी रिश्तेदारों के लिए भी।

सुल्तान ने तीनों लड़कों को मंगोल खान के कासिद के साथ बाइ्जत मंगोल दरबार के लिए रवाना कर दिया। जब तीनों नौजवान मंगोल खान के महल पहुंचे तो उनकी खूब खिदमत की गई। मंगोल खान आजम और बीबी जोहरा ने उन्हें गौर से देखा मगर असली इमरान को पहचान नहीं पाए। मंगोल खान ने उनसे एक दरियाफ्त किया और तीनों लड़कों ने एक ही आवाज में एक ही लहजे और एक ही वक्त में जवाब दिया। मंगोल खान ने उन्हें बैठने के लिए इशारा किया तो तीनों एक ही वक्त में बैठे। जब उठने को कहा गया तो तीनों एक साथ खड़े हो गए। मंगोल खान मुतासिर हुआ मगर वह असली इमरान की शिनाख्त ना कर सका।

तब जादूगरनी छहरा खाला ने मंगोल खान को तन्हाई में बुलाया और मशवरा दिया। "मेरे आका आप परेशान ना हो। कल सुबह आप बड़ी आसानी से उस लड़के को पहचान लेंगे जिसकी आपको जरूरत है। आज रात मैं अपने जादू से उस नौजवान की आस्तीन का बाह का कपड़ा फाड़ दूंगी जो असली इमरान है। कल सुबह तुम जिस लड़के की आस्तीन फटी हुई देखो उसे फौरन कत्ल कर देना।"

रात के वक्त तीनों नौजवान एक ही कमरे में एक ही पलंग पर सो रहे थे। जादूगरनी बीबी जोहरा जो कि एक जादूगरनी थी। आधी रात के बाद उस कमरे में दाखिल हुई। उसने अपने जादू के जोर से तफ्तीश की और मालूम कर लिया कि असली इमरान कौन है क्योंकि उसकी चाबी और हौसला उसे एक खास नूर दे रहे थे। जादूगरनी ने चुपके से एक कैंची निकाली और असली इमरान की कमीज की दोनों आस्तीने फाड़ दी ताकि वह सुबह आसानी से पहचाना जा सके। फिर वह खामोशी से वहां से सरक गई।

सुबह जब तीनों लड़कों की आंख खुली तो उन्होंने देखा कि इमरान की आस्तीने फटी हुई हैं। इमरान ने एक लम्हे के लिए सोचा और फिर मुस्कुराया। उसने अपने हमशक्लों से कहा, "दोस्तों मंगोल खान ने हमें पहचानने के लिए एक साजिश की थी। अगर हम में से एक भी अलग दिखा तो हमारी जान जाएगी। हमें सबूत को खत्म करना होगा।" इमरान की अक्लमंदी का अंदाजा लगाते हुए उन दोनों हमशक्लों ने भी फौरन अपनीपनी कमीजों की आस्तीने फाड़ कर फेंक दी।

जब यह तीनों नौजवान नाश्ते के लिए मंगोल खान के दरबार में पहुंचे तो बीबी जोहरा एक खुफिया खडकी से उन्हें देख रही थी। अचानक उसने देखा कि तीनों लड़कों की आस्तीने फटी हुई हैं। जादूगरनी के होश उड़ गए। वह चीख पड़ी। मंगोल खाने आजम एक बार फिर असली इमरान को पहचानने में नाकाम हो गया।

मंगोल खान इस तरह बार-बार मात खाने और अपने मकसद में नाकाम होने से बेहद शर्मिंदा हुआ। उसने आखिरकार हार मान ली और तीनों लड़कों को इज्जत के साथ मगरबी सल्तनतया भेज दिया।

सुल्तान जाहिर खान और शहजादी नूर बानो इमरान को सही सलामत देखकर बेहद खुश हुए। उन्होंने इमरान को अपने सीने से लगाया। मगर सुल्तान को ज्यादा अरसे तक चैन से रहना नसीब ना हुआ। अभी चंद रोज ही गुजरे थे कि मगरबी सल्तनत में एक बार फिर मायूसी छा गई। मंगोल खाने आजम को अपनी लगातार शर्मनाक हार बर्दाश्त नहीं हुई। उसकी खाला बीबी जोहरा ने उसे दोबारा उकसाया। बीबी जोहरा ने इसरार किया, "मेरे आका। वह लड़का इमरान बहुत खतरनाक है। जब तक वह जिंदा है, शाश्ववास की फौज और ताकत किसी काम नहीं आएगी। इस बार उसे तन्हा बुलवाओ और उसे अपनी जात से किसी भी कीमत पर जुदा मत होने देना।"

इस बार मंगोल खान ने अपने सबसे तेज रफ्तार और जंगी कासिद को सुल्तान के यहां भेजा। कासिद ने आकर सुल्तान को फौरन पैगाम दिया। "खाने आजम ने फरमाया है कि वह नौजवान इमरान हमारे लिए एक कांटा बन चुका है। इसलिए उसे वापस हमारे पास भेज दिया जाए। लेकिन इस बार उसे अकेला भेजा जाए। कोई हमशक्ल या सिपाही उसके साथ ना हो। अगर तुमने इंकार किया कि अब आए ने आया दिन उतार दी नहीं तो जंग यकीनी है।"

सुल्तान जाहिर खान और शहजादी नूर बानो यह पैगाम सुनकर बहुत रंजीदा हुए। अब वह इमरान को किसी भी तरह खोना नहीं चाहते थे। सुल्तान ने मायूसी से इमरान की तरफ देखा। इमरान ने इत्मीनान और मुस्कुराहट के साथ सुल्तान से कहा, "अलीजा, आप बिल्कुल भी फिक्र ना करें। आपने मुझ पर जो एहसान किए हैं, मैं उनके लिए अपनी जान भी दे दूंगा। मैं हर इम्तिहान से गुजर कर काम को ठीक कर दूंगा। यह आखिरी सफर है।"

अगली सुबह इमरान अकेला ही मंगोल खान की राजधानी की तरफ रवाना हो गया। उसकी वफादारी और जुर्रत देखकर शहजादी की आंखें भर आई। जब इमरान कई दिनों के सफर के बाद मंगोल खान के आलीशान मगर जंगी महल के दरवाजे पर पहुंचा तो वहां बीबी जोहरा खुद खड़ी थी। उसने इमरान को देखकर एक मकरूहा हंसी-हंसी और कहा, "ए नौजवान तुम आखिरी बार ही इस दरवाजे से गुजर रहे हो। अब तुम्हें जिंदा इस सरजमीन से निकलना कभी नसीब नहीं होगा। तुम्हारा राज और तुम्हारी ताकत दोनों यहीं दफन हो जाएंगी।"

इमरान ने जोहरा खाला की बात पर कोई तवज्जो ना दी। मगर उसकी कमीज के अंदर लटकी हुई पुरानी चाबी जोर-जोर से थरथराने लगी। इमरान ने एक नजर उस चाबी को देखा और आगे बढ़ गया। जब इमरान महल के सहन में पहुंचा तो वहां दर्जनों मंगोल सिपाही अपनी नुकीली तलवारें लिए खड़े थे। वे खूंखवार निगाहों से इमरान को घेरने के लिए तैयार थे। जैसे ही मंगोलों के सरदार ने हुक्म दिया इमरान की पुरानी चाबी ने एक तेज नूर पैदा किया और ऐसा लगा जैसे तमाम ताकतें इस नौजवान के इरादे में सिमट गई हो।

इमरान ने बिजली की किसी तेजी से अपनी चाबी को कमीज के बाहर निकाला और जोरदार आवाज के साथ चाबी एक चमकती हुई तलवार में बदल गई। यह वही तलवार थी जो उसके ख्वाब में महल के दरवाजे पर नूर बरसाती थी। तलवार मन से निकली जो चाबी की जंजीर बन गई थी और इमरान ने अल्लाह का नाम लेकर वार करना शुरू किया। उसकी जंग की महारत ऐसी थी कि मंगोल सिपाही गाजर मूली की तरह कटने लगे। चंद लम्हों में ही इमरान ने पूरी फौज का सफाया कर दिया।

बीबी जोहरा यह हैबतनाक मंजर देखकर समझ गई कि यह चाबी नहीं बल्कि इमरान के मुकद्दर की तलवार है। उसने जादू के जोर से तलवार को छीनने की नाकाम कोशिश की। तलवार ने जादूगरनी की तरफ हरकत की और बिजली की तरह उसकी नाक को जड़ से काट दिया। जख्मी नाक लिए बीबी जोहरा चीखती चिल्लाती हुई मंगोल खाने आजम के पास भागी।

मंगोल खान ने यह हैरतंगेज वाकया सुना तो वह सन्न रह गया। उसने फौरन अपने बाकी बचे लश्कर को हुक्म दिया कि वह इमरान को पकड़ लें और उसकी जादुई तलवार छीन लें। मगर इमरान की तलवार ने उस पूरी फौज का भी सफाया कर दिया। और इमरान के बदन पर एक भी खराश तक नहीं आई।

इधर सुल्तान जाहिर खान को इमरान की फिक्र थी। उन्होंने फौरन एक बड़ा लश्कर इकट्ठा किया और जंग के लिए रवाना हुए। बगदाद के खलीफा ने भी सुल्तान की मदद के लिए एक जबरदस्त लश्कर भेजा। सुल्तान शहजादी नूर बानो और मुत्तहद फौज मंगोलों के मुल्क की सरहद के करीब पहुंची ही थी कि उन्हें सामने से इमरान आता हुआ दिखाई दिया। इमरान जो तन्हा ही मंगोलों को शिकस्त दे चुका था। दौड़कर सुल्तान के कदमों में गिर पड़ा। उसने सुल्तान को तफसील से बताया कि उसने खाने आजम की पूरी फौज को किस तरह तबाह कर दिया है और मंगोल अब जंग लड़ने के काबिल नहीं रहे।

पूरी फौज ने नारे लगाए। शहजादी नूर बानो की आंखों में फक्र के आंसू थे। लश्कर फतेह का जश्न मनाता हुआ इमरान के साथ मगरबी महल वापस लौट आया। सुल्तान ने शानदार दरबार लगाया। उन्होंने इमरान को अपने पास बिठाया और मोहब्बत से कहा, "मेरे बेटे, तुम्हारी अक्लमंदी, बहादुरी और बेमिसाल जुर्रत ने इस मुल्क को यकीनी बर्बादी से बचा लिया है। तुम्हारी वफादारी और इरादे ने यह साबित कर दिया कि तुम एक साधारण शख्स नहीं हो। अब मैं तुम्हें यह इज्जत देता हूं कि तुम मेरी बेटी शहजादी नूर बानो से निकाह करो।"

पूरे दरबार में खुशी की लहर दौड़ गई। हार्ट्स हार्ट्स हार्ट्स इमरान की आंखों में जज्बात का सैलाब उमड़ आया। यह वही नौजवान था जिसे कुछ ही अरसा पहले गुस्ताखी की सजा में फांसी और फिर मीनार की कैद नसीब हुई थी और आज वह बादशाह के बराबर बैठा था। खुशी के आंसुओं ने उसकी आंखों के किनारों को भिगो दिया।

इमरान ने अदब से उठकर सुल्तान जाहिर खान के कदमों को छूने की कोशिश की। मगर सुल्तान ने उसे रोक लिया। इमरान ने नम आंखों से कहा, "अली जान मैं एक मामूली सी गरीब वालिदा का बेटा हूं। शहजादी नूर बानो से निकाह मेरे लिए बाईसे फक्र होगा। यह मेरे मुकद्दर से कहीं बुलंद मर्तबा है। मगर क्या आपको वाकई मुझ पर मुकम्मल यकीन है? मैं अब भी वही हूं जिसने आपकी बेटी को थप्पड़ मारा था।"

सुल्तान जाहिर खान ने गहरी शफकत से इमरान के सर पर हाथ रखा और फरमाया, "ए मेरे होशियार बेटे तुमने तीन मुश्किल वक्तों में मेरी सल्तनत को तबाह होने से बचाया है। तुमने वफादारी, जुर्रत और अक्लमंदी का ऐसा सबूत दिया है जो किसी पैदाइशी शहजादे में भी मिलना मुश्किल है। तुमने अपनी जिंदगी के उसूलों को शाही हुक्म से ज्यादा अहमियत दी। अगर इस सल्तनत में कोई शख्स शहजादी नूर बानो के लायक है, वह सिर्फ तुम हो। मैंने तुम्हें परखा है और तुम्हें कामिल पाया है।"

शहजादी नूर बानो जो दरबार के एक कोने में खड़ी थी। अपने गौसे वाले आशिक की यह सादगी और ईमानदारी देखकर शर्मा गई। मगर दिल ही दिल में बेहद खुश थी। उन्होंने इमरान की तरफ एक तारीफ मोहब्बत भरी निगाह डाली। सुल्तान ने उसी वक्त निकाह की तैयारियां शुरू करने का हुक्म दिया। पूरे मुल्क में खुशी की लहर दौड़ गई। जहां एक तरफ जंग की मायूसी थी, वहीं दूसरी तरफ शादी का जश्न शुरू हो गया। हर तरफ चिरागाह किया गया। महल और शहर खुशियों में डूब गए।

शादी के दिन इमरान ने रेशमी लिबास पहना, मगर उसने एक चीज नहीं भूली। उसने अपनी कमर से वही पुरानी जंजीर और उससे लटकी हुई चाबी बांधी जो अब एक चमकदार तलवार बन चुकी थी। यह तलवार जो बचपन से उसके मुकद्दर का हिस्सा थी आज भी उसके साथ थी। जब निकाह मुकम्मल हुआ तो मौलवी ने दुआएं दी। उसी लम्हे अचानक आसमान पर काले बादल छा गए। तेजी से बिजली कड़कने लगी। और अजीब बात यह हुई कि इमरान की कमर से बंधी हुई तलवार जो चाबी से बनी थी जोरदार तरीके से चमकने लगी। उस तलवार से एक सफेद नूर फूट रहा था जिसने पूरे दरबार को रोशन कर दिया। दरबार में मौजूद तमाम लोग यह अजीब मंजर देखकर हैरान और परेशान रह गए।

अचानक आसमान से एक गूंजती हुई आवाज आई जो सिर्फ इमरान ने सुनी। "ए इमरान अब तेरा ख्वाब पूरा हो गया।" इमरान चौंक उठा और उसके चेहरे पर एक बेमिसाल इत्मीनान छा गया। सुल्तान जाहिर खान ने घबरा कर पूछा, "मेरे बेटे यह क्या माजरा है? यह तलवार अचानक क्यों चमक उठी?"

इमरान ने तलवार को हाथ में लिया। उसने उसे आसमान की तरफ उठाया। नूर के बादल छोंट गए और सूरज की सुनहरी किरणें सीधे महल पर पड़ी। इमरान ने खुले दिल से कहा, "अली जान आज मेरा ख्वाब मुकम्मल हुआ। मेरा ख्वाब यह था कि एक दिन मैं ऐसी तलवार का मालिक बनूंगा जो ईमान, सच्चाई और बहादुरी की अलामत हो। जिस दिन यह तलवार मेरे लिए नहीं बल्कि सल्तनत की हिफाजत के लिए नूर बरसाएगी, उस दिन मेरी गरीब जिंदगी का मकसद पूरा हो जाएगा। मैंने अपनी मां वजीर आजम और शहजादी से राज इसीलिए नहीं बताया क्योंकि यह तलवार सिर्फ उस वक्त चमकने वाली थी जब मेरी वफादारी और जुर्रत पर मोहर लग जाए।"

शहजादी नूर बानो आगे आई और अपनी चमकती आंखों से इमरान को देखकर मुस्कुराई। उन्होंने कहा, "इमरान अब बताओ क्या तुम्हारा ख्वाब मुकम्मल हो गया है?" इमरान ने मोहब्बत से शहजादे की तरफ देखा और अपनी तलवार को आहिस्ता से म्यान में रखा। "हां, ए मेरी जिंदगी की शरीक मेरा ख्वाब मुकम्मल हो गया है। मगर अगर तुम मेरी जिंदगी में हमेशा मेरे साथ रहो, तो यह ख्वाब हमेशा हमेशा के लिए जिंदा रहेगा।"

यह सुनते ही पूरे महल में जोरदार तालियों की गूंज सुनाई दी। सुल्तान जाहिर खान ने दोनों के सरों पर हाथ रखकर उन्हें दुआ दी और उन्हें अपनी सल्तनत का वली अहद घोषित किया। इमरान ने ना सिर्फ अपने मुकद्दर की चाबी और ख्वाब की ताबीरर हासिल की बल्कि अपने ईमान, सब्र और अक्लमंदी के चोर पर एक गरीब नौजवान से सल्तनत का वजीर और फिर शहजादा बन गया। और इस तरह इमरान और नूरबानों की ईमानी और अकलमंदी की कहानी मगरबी सल्तनत में हमेशा के लिए अमर हो गई।