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Shahzada Aur Sher Ka Anokha Qissa || Moral Stories in Urdu & Hindi

VibeElevate1:09:59

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पुराने जमाने की बात है कि एक मुल्क में एक मशहूर शहजादा रहता था जिसके चार बेटे थे। जिनमें यूसुफ सबसे छोटा था। छोटा होने की वजह से वह बाप का बहुत लाडला था। इसका बाप इसकी हर बात मानता और यूसुफ की वजह से इसके बड़े भाइयों को भी डांट देता। जिससे इसके बड़े भाई इससे बहुत जलते थे।

यूसुफ बहुत खूबसूरत नवजवान था। घुंघराले सुनहरे बाल, लैला चमकदार आंखें, सरक और सफेद रंग, खूब हराभरा जिस्म, लंबा कद और दराज। वह मर्दाना शक की एक चलती फिरती मिसाल था। बाप के लाड़ प्यार की वजह से वह कोई काम नहीं करता और तमाम दिन आराम से घूमता फिरता। इसे तलवार चलाने, तीरंदाजी और घुड़सवारी का बहुत शौक था। इसके बाप ने अपने जमाने के बेहतरीन उस्ताद इसकी तरबियत के लिए रखे हुए थे। असातजा की मेहनत की वजह से यूसुफ तलवारबाजी, तीरंदाजी और शाही सवारी में माहिर हो गया था।

इसके तीनों बड़े भाई बाप का कारोबार संभालते मगर यूसुफ तजारत में जरा भी दिलचस्पी नहीं लेता। जब इसका बाप या भाई इससे तिजारत करने को कहते तो वह साफ इंकार कर देता और कहता कि वह तिजारत का पेशा बिल्कुल पसंद नहीं करता। वह तो फौज में कोई बड़ा अफसर बनेगा। इसकी इस खूबी की वजह से इसके तमाम दोस्त इसे मजाक में शहजादा यूसुफ कहते और आहिस्ताआहिस्ता इसका नाम शहजादा यूसुफ ही पड़ गया। अब कोई इसे सिर्फ और सिर्फ शहजादा यूसुफ कहता। इस नाम पर इसके भाई इससे बहुत जलते और कभी कभार तंजिया लहजे में इससे मुखातिब होकर कहते जनाब शहजादा साहब आप धरा 2 मिनट दुकान पर बैठ जाएंगे। मगर शहजादा सिर्फ मुस्कुरा कर चला जाता। वह आज तक कभी भी अपनी दुकान पर नहीं बैठा था। या तो घुड़सवारी करता रहता या दोस्तों के साथ खेल कूद में मशगूल रहता।

एक रोज अपने दोस्तों के साथ बैठा शतरंज खेल रहा था कि एक बूढ़ा फकीरी खस्ता हाल वहां आ गया। इसने दो-तीन बार रुमाल से खैरात मांगी मगर शतरंज में इस कदर मग्न थे कि उन्होंने फकीरी की आवाज की तरफ तवज्जो ना दी। आखिर तंग आकर फकीरी ने जोर जोर कर हंगामा आराई शुरू कर दी। इन सबको परेशान देखकर इसके एक दोस्त ने शहजादा से मुखातिब होकर कहा यार शहजादा तू इसे खैरात देकर चलता कर हम खेल के लोग हैं। यूसुफ ने नजरें शतरंज पर जमाकर जीभ में हाथ डाला और एक छोटा सा सिक्का निकालकर फकीरी की तरफ बढ़ा दिया। मगर नाम शहजादा और खैरात में एक छोटा सा सिक्का। फकीरी ने भ्रम होकर कहा ऐ शहजादा बने फिरता है। अगर हकीकत में शहजादा होता तो शहजादी लैला की शर्तें पूरी कर देता।

यह आवाज यूसुफ के कानों में पड़ गई। वह चौंक पड़ा। इसने शतरंज छोड़कर फकीरी की तरफ गौर से देखा और फिर जीभ से सोने के सिक्कों की थैली निकालते हुए फकीरी की तरफ बढ़ाते हुए पूछा। बाबा यह शहजादी लैला कौन है? और इसकी शर्तें क्या है?

"शहजादी लैला दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की है। बड़े-बड़े नवाब शहजादे इससे शादी के लिए जान देने पर तैयार होते हैं।" मगर फकीरी ने सिक्कों की थैली जीभ में डालते हुए कहा, "मगर शहजादी लैला ने शादी के लिए कुछ शर्तें लगा दी हैं। वह सिर्फ उसी से शादी करेगी जो यह शर्तें पूरी करेगा। और जो पूरी ना कर सके उसे भरे दरबार में जूते लगाए जाएंगे।"

फकीरी ने तफसील बयान की। फिर किसी ने शर्तें पूरी की? शहजादा ने बड़े शौक से पूछा, तो भैया, वह शर्तें इतनी सख्त हैं कि दुनिया का बहादुर से बहादुर इन्हें पूरा नहीं कर सकता। इसलिए बड़े-बड़े बहादुरों शहजादों को दरबार में जूते खाकर वापस जाना पड़ता है। फकीरी ने जवाब दिया, "छोड़ो यार। इस चक्कर में ना पड़ो। यह फकीरी तुमसे मजीद रकम ऐठने के लिए ऐसी बातें कर रहा है।" इसके एक दोस्त ने इसे रोकते हुए कहा, "अरे नहीं दोस्त, मैंने पहले भी एक कहवा खाने वाले से शहजादी लैला का जिक्र सुना है।"

चार दिन इसे जवाब देते हुए कहा और फिर इसने जीभ से सोने की एक और थैली निकाली और फकीरी के हाथ में देते हुए पूछा, बाबा वह शर्तें क्या है और शहजादी लैला किस मुल्क की है?

"शहजादी लैला मुल्क बगदाद की शहजादी है और जहां तक शर्तों का ताल्लुक है कि वह हर नए आने वाले को नई शर्तें बताती है इसलिए शर्तों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।" फकीरी ने जवाब दिया।

"तो फिर शहजादी किसी खास शहजादे से शादी करना चाहेगी इसलिए वह हर बार नई शर्तें बता देती है। जब इसका पसंदीदा आएगा तो आसान शर्तें बता देगी। इस तरह वह आसानी से शहजादी की शर्तें पूरी कर देगा और इसकी शादी शहजादी से हो जाएगी।" शहजादा यूसुफ ने कहा।

"कुछ नहीं ऐसी बात नहीं। जब भी कोई शहजादी की शर्तें पूरी करने जाता है तो इसे शाही मेहमान खाने में रखा जाता है और शहजादी से शर्तें बयान करने को कहा जाता है। जब शहजादी शर्तें बता देती है तो भरे दरबार में इसे बुला लिया जाता है और शहजादी के सामने इसे शर्तें बताई जाती हैं।" फकीरी ने इसकी गलतफहमी दूर करते हुए कहा।

"फिर ठीक है। मैं जरूर जाकर शहजादी लैला की शर्तें पूरी कर दूंगा। अगर मेरी शादी शहजादी लैला से हो गई तो फिर मैं सच्चा शहजादा बन जाऊंगा और मेरे भाई मुझे ताने नहीं देंगे।" शहजादा यूसुफ ने जोशीले लहजे में सीने पर हाथ मारते हुए कहा।

"मत जाओ नवजवान तुम शहजादी की शर्तें पूरी ना कर सकोगे और फिर भरे दरबार में जूते खाने पड़ेंगे और नतीजा यह होगा कि तुम शर्म के मारे खुदकुशी करने पर मजबूर हो जाओगे।" फकीरी ने इसे रोकते हुए कहा।

"वहां नहीं बाबा मैं जरूर जाऊंगा। चाहे कुछ भी हो जाए।" यूसुफ ने जवाब दिया और फिर वह उठ खड़ा हुआ। वह सीधा घर आया। इसने बाप से मुल्क बगदाद जाने की इजाजत मांगी और तमाम का हिस्सा सुना दिया। बाप ने इसे रोकने की बहुत कोशिश की। मगर यूसुफ अपनी जिद पर अड़ा रहा। इसके भाइयों ने जब सुना तो वह दिल ही दिल में खुश हुए कि यूसुफ को जूते मिलेंगे तो दिमाग से शहजादा का भूत उड़ जाएगा। इसलिए उन्होंने इसकी हिमायत की और मजबूरन यूसुफ के जाने की इजाजत दे दी। क्योंकि यूसुफ ने अपना सामान लिया, तलवार कमर में बांधी और मुल्क बगदाद जाने के लिए तैयार हो गया। वह बाप से इजाजत लेकर और भाइयों को सलाम करके मुल्क बगदाद की तरफ चल पड़ा।

शहजादी लैला अपनी सखियों के साथ शाही बाग में एक खूबसूरत तालाब के किनारे बैठी थी। कुछ कनारियां इसे दिल बहलाने के लिए नच रही थी और बहुत सी सखियां सनसी बजाकर दिलकश लय में गा रही थी। इतनी में एक मुखदूम खातून आई और शहजादी से पूछा, "शहजादी हुजूर एक बात तो बताइए यह क्या बात है कि आपने शादी के लिए शर्तें रखी हैं और फिर आप इतनी कड़ी शर्तें बता देती हैं कि कोई भी पूरा नहीं कर सकता। आखिर आप चाहती क्या हैं कि आप तमाम उम्र कुंवारी रहेंगी?" सखी ने बड़े अदब से पूछा।

शहजादी का यह सवाल सुनकर हंस पड़ी और कहने लगी, "मेरी पगली सखी मैंने शर्तें जानबूझ कर रखी हैं। मैं चाहती हूं मेरी शादी उससे हो जो इस दुनिया में सबसे ज्यादा बहादुर और अकलमंद हो ताकि मैं अपने शौहर पर फक्र कर सकूं।"

"मगर शहजादी हुजूर अगर किसी ने भी आपकी शर्तें पूरी ना की तो?" एक और सखी ने सवाल किया।

"तो फिर मैं कुंवारी रहूंगी। बजदिल आदमी से शादी करने से बेहतर है कि मैं शादी ही ना करूं।" शहजादी ने फैसलाखून लहजे में जवाब दिया और इसकी इस बात पर सब सखियां खामोश हो गई। जहां है इस हिसाब से जरा तो ना कर सकती थी।

इससे पहले कि कोई बात होती एक खादिमा महल के अंदर से आई और शहजादी के सामने आकर सजदा की। यह खादिमा शाही खजाने की निगरान थी।

"क्या बात है खादिमा? कैसे आई हो?" शहजादी ने बड़े नर्म लहजे में पूछा।

"शहजादी हुजूर एक परेशान सा नवजवान आपसे शादी का तलबगार है। बादशाह सलामत ने कहला भेजा है कि आप शर्तें बता दें कि कल दरबार में इसे इन शर्तों से आगाह कर दिया जाए।" खादिमा ने तफसील बयान की।

"अच्छा तो कोई और जूते खाने आ गया।" शहजादी ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा। खादिमा क्या जवाब देती? वह खामोश खड़ी रही।

शहजादी चांदनी चंद लम्हे सोचती रही। फिर इसने खादिमा से कहा, "इस बार इसकी तीन शर्तें यह है। पहली तो यह नवजवान शेरनी का दूध लेकर आए। दूसरी यह कि ऐसा मोर लेकर आए जिसके परों में हजार रंग हो और तीसरी यह कि वह एक ऐसे आदमी को साथ लेकर आए जिसका कद सिर्फ 6 इंच हो।" शहजादी ने तीन शर्तें बताते हुए कहा।

खादिमा ने शर्तें दोहराते हुए कहा, "हां यह तीन शर्तें। शेरनी का दूध, हजार रंग का मोर और 6 इंच का आदमी।"

"हां यह तीन शर्तें।"

"शहजादी हुजूर, यह तो उन शर्तों से भी सख्त हैं जो आपने पहले कभी ना बताई।" एक सखी ने कहा।

"दरअसल, मैं नहीं चाहती कि कोई नवजवान मेरी वजह से दरबार में जूते खाए। इसलिए मैं इतनी सख्त शर्तें बता दूं कि वह नवजवान जूते खाने के बजाय वापस चला जाए।" शहजादी ने जवाब दिया, और वह दोबारा खुशगाइयों में मशगूल हो गई। मगर इसका दिल ना लगा क्योंकि वह इस नवजवान को देखना चाहती थी जो शादी का तलबगार था। इसे एक और बात भी खटक रही थी कि खातिमा ने किसी शहजादे का नाम ना लिया बल्कि एक परेशान सा नवजवान कहा था जिससे जाहिर है कि वह कोई गरीब शख्स होगा और किसी से छनवा कर आ गया होगा कि चलो एक रात शाही मेहमान खाने में रह सकते हैं। यही सोचती हुई वह अपने महल की तरफ चली गई।

शहजादा यूसुफ अपने घर से निकलकर एक काफिले के साथ मदीना से चला। फिर मुल्क बगदाद पहुंच गया। शाही महल के करीब पहुंचकर वह एक सराए में रुक गया और सराय के मालिक से शहजादी लैला और इसकी शर्तों के मुतालिक मालूमात हासिल की। दरअसल वह चाहता था कि दरबार जाने से पहले फकीरी की बात की हकीकत मालूम कर ले कि कहीं ऐसा ना हो कि फकीरी ने झूठ बोला और वह दरबार में जाकर बेइज्जत हो। मगर सराय के मालिक ने भी वही बताया जो फकीरी ने बताया था और इसकी बात सुनकर शहजादा को बहुत खुशी हुई। इसने सराय के मालिक को शुक्रिया अदा किया और दरबार जाने का इरादा कर लिया। सराय का मालिक समझ गया कि यह खूबसूरत परेशान सा नवजवान भी शहजादी से शादी करने के चक्कर में आया है। इसने इसे बहुत समझाया। मगर यूसुफ भला कहां मानने वाला था। इसने आखिर इस बात को टाला और फिर वह नहा धोकर और नए कपड़े पहनकर शाही दरबार की तरफ चल पड़ा।

इसने दरबारियों से अपना मुकदमा बयान किया तो दरबारियों ने पहले तो इसकी बात सुनने से इंकार कर दिया क्योंकि इससे पहले हमेशा शहजादे शर्तें पूरी करने आते हैं। जिनके साथ उनके बॉडीगार्ड और बेशुमार अराब होते हैं। मगर यह नवजवान अकेला था। जब यूसुफ ने अपनी बात पर एतराज किया तो दरबानों को मजबूरन इसे बादशाह सलामत के सामने पेश करना पड़ा। बात सुनी सुनाई गई तो मर्दाना वजह से बादशाह को यह खूबसूरत और दरिस्त नवजवान बहुत पसंद आया। क्योंकि बादशाह सलामत ने इसे देखते हुए कहा, "देखो नवजवान मैं मानता हूं कि तुम बहुत बहादुर और अकलमंद हो। क्योंकि तुम्हारी फ्रिक पर बहादुरी और आंखों में मौजूद चमक अकलमंदी जाहिर करती है। मगर मेरी बेटी शर्तें इतनी सख्त और कड़ी बता देती है कि किसी इंसान के पूरी करने की ताकत नहीं होती। इसलिए जूते खाकर वापस जाना पड़ता है। लिहाजा तुम इस इरादे से बाज आ जाओ। मैं वैसे तुम्हें अपनी फौज में ऊंचा ओहदा दे दूंगा।"

"बादशाह हुजूर आपकी इस इनायत का बहुत शुक्रिया। मगर मैं तो बड़ी दूर से सिर्फ शहजादी की शर्तें पूरी करने आया हूं। यह और बात है कि आप मुझे इस काबिल ना समझ रहे कि मैं आपका दामाद बन सकूं क्योंकि मैं काजल का बेटा हूं।" यूसुफ ने सर झुकाते हुए तहे दिलाबी और दबाने लहजे में कहा।

"नहीं नौजवान तुम किसी शहजादे से कम नहीं हो और हर बहादुर इंसान की हम इज्जत करते हैं। अगर तुम ऐसा सोच रहे हो तो फिर मजबूरी है। अब तुम शाही मेहमान खाने में आराम करो। हम कल सुबह दरबार में शहजादी के सामने शर्तें बता देंगे।" बादशाह ने जवाब दिया और यूसुफ बादशाह को सलाम करके शाही मेहमान खाने की तरफ चल पड़ा।

शाही मेहमान खाने में इसकी तमाम रात शहजादी लैला और इसकी शर्तों के जिक्र में गुजरी। वह सुबह का इंतजार बेचैनी से कर रहा था ताकि दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की को देख सके और इसकी शर्तें भी मालूम हो सके। आखिर खुदा की खुदा करके सुबह हुई। वह नहा धोकर नए लिबास पहनकर दरबार जाने के लिए तैयार हो गया। काफी दरबारी इसे बुलाने के लिए हाय और वह बाण के पीछे बड़े बावकार अंदाज में चलता हुआ दरबार में पहुंच गया। बादशाह का दरबार पूरी शान और शौकत से सजा हुआ था। वह दरबार के दरमियान जाकर खड़ा हो गया। अभी बादशाह सलामत और शहजादी दरबार में ना आए थे। इसलिए तमाम दरबारी इसके मुतालिक बातें कर रहे थे। कोई तो इसके हुस्न की तारीफ कर रहा था और कोई इसकी जवानी पर रहम करते हुए अफसोस कर रहा था कि इतना खूबसूरत नवजवान दरबारियों से जूते खाएगा।

फिर दरबारियों ने बादशाह की आमद का ऐलान किया और यूसुफ बड़े शौक से उस राह को देखने लगा जहां से शहजादी निकलने वाली थी। थोड़ी देर के बादशाह सलामत नाजिर हुए और तमाम दरबारियों ने अदब से सजदे किए। दरबारियों के साथ-साथ यूसुफ ने भी सजदा किया। हालांकि इसकी ख्वाहिश थी कि वह शहजादी को आते हुए देख सके। एक मगर शाही दरबार के आदाब की वजह से मजबूरन सर झुकाए खड़ा रहा। थोड़ी देर बादशाह ने सर उठाने का मौका दिया और यूसुफ ने भी सर उठा लिया। इसकी निगाहें शहजादी पर जमा गई क्योंकि शहजादी इतनी खूबसूरत थी कि इसका सर भी ना हट सकता था।

"नौजवान क्या तुम हकीकत में शहजादी की शर्तें जानना चाहोगे?" बादशाह की कर्बलास्तार आवाज से दरबार गूंज उठा और यूसुफ को जैसे होश में आ गया। इसने शहजादी के चेहरे से नजर हटाकर अदब से सर झुका लिया। आपने शहजादी को देखने से पहले तो शायद वह अपने फैसले पर नजरानी कर लेता। मगर अब तो नामुमकिन था। इसने फैसला कर लिया कि चाहे कुछ भी हो वह हर कीमत पर शहजादी को हासिल करेगा।

उधर शहजादी भी बड़ी पसंदीदा निगाहों से यूसुफ को देख रही थी। आज तक जितने भी शहजादे आए थे कोई भी यूसुफ इतना दरिस्त ना था। अब शहजादी भी दिल में पछताती थी कि इसने इतनी कड़ी शर्तें क्यों रखी। इतना खूबसूरत और दरिस्त नवजवान जलील होने वाला है। वह दिल ही दिल में यूसुफ को पसंद करने लगी थी। मगर क्या करती? मजबूरी थी कि वह अपनी बात से कैसे हट सकती थी। इसलिए खामोश बैठी रही।

"जी हां हुजूर। मैं शर्तें सुनने के लिए तैयार हूं।" यूसुफ ने तह ए दिलाबी में जवाब दिया।

"तो सुनो शहजादी ने तीन शर्तें बताई हैं। अगर तुम यह तीनों शर्तें पूरी कर दो तो तुम्हारी शादी शहजादी से कर दी जाएगी और अगर तुम पूरी ना कर सके तो फिर तुम्हें भरे दरबार में जूते मारे जाएंगे।" बादशाह ने इसे शर्तों से आगाह करते हुए कहा।

"मुझे मंजूर है।" यूसुफ ने एक बार फिर जवाब दिया।

"नौजवान तुम्हारे लिए एक और बात भी है। यह भी है कि शर्तें सुनने के बाद अगर तुम वापस जाना चाहो तो जा सकते हो तो तुम्हें जूते ना मारे जाएंगे। अगर तुमने हामी भरी तो फिर तुम्हें जूते खाए बगैर वापस जाने की इजाजत ना होगी।" बादशाह ने वाज किया।

"बादशाह सलामत आप शर्तें बताएं। मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि मैं शादी का हाथ थाम कर इस दरबार से जाऊंगा।" यूसुफ ने कहा और सब दरबारी इसकी इस बात पर मुस्कुरा गए।

"सुनो नौजवान पहली शर्त यह है कि तुम शेरनी का दूध लेकर आओ। तुम्हारे लायका होगा दूध। इसे शेर के बच्चे को पिलाया जाएगा। अगर इसने पी लिया तो समझ लिया जाएगा कि हकीकत में तुमने शेरनी का दूध लाया है। दूसरी शर्त यह है कि तुम मोर को लेकर आओ जिसके हजार रंगों वाले पर हो। और तीसरी शर्त यह है कि तुम ऐसा आदमी लेकर आओ जिसका कद सिर्फ 6 इंच का हो।" बादशाह ने यूसुफ को तीनों शर्तें बता दी और यूसुफ भी शर्तें सुनकर हैरत से सस्त रह गया। ऐसी शर्तें भला इसने पहले कहां सुनी थी? यह तो ऐसी शर्तें थी कि इनके मुताल्लिक सोच भी नहीं सकता था। वह दिल में सोचने लगा कि आखिर यह शर्तें कैसे पूरी करेगा?

इसे सोच में गुम देखकर बादशाह ने इससे मुखातिब होकर कहा, "नौजवान तुम किस सोच में गुम हो गए? क्या तुम्हें शर्तें कबूल है?"

यूसुफ चौंका और फिर इसने पूरे एतमाद से जवाब दिया। "जी हां, मुझे शर्तें मंजूर हैं। मैं अपनी जान देकर भी शर्तें पूरी करूंगा। मुझे कुछ मोहल्लत दीजिए।"

"तुम कितनी मोहल्लत चाहते हो?" बादशाह ने पूछा।

"एक साल ले लूं। मैं ठीक एक साल बाद यह तीनों चीजें शहजादी के सामने पेश कर दूंगा।" यूसुफ ने शहजादी की तरफ देखते हुए कहा।

"हम्हें एतराज नहीं।" शहजादी ने पहली बार जवाब दिया। और इसका मीठा लहजा यूसुफ के कानों में घंटियों की तरह बजने लगा।

"अली जान इसके लिए मेरी भी एक शर्त है। वह यह कि एक साल तक किसी और को शर्तें पूरी करने का मौका दिया जाएगा। ताकि ऐसा ना हो कि मैं शर्तें पूरी करके आया हूं तो मालूम हो कि कोई और शख्स पहले ही शर्तें पूरी करके शहजादी को हासिल कर लिया है। आप मेरा इंतजार कीजिएगा।" यूसुफ ने तहे दिलाबी लहजे में कहा।

"हम तुम्हारा इंतजार करेंगे।" शहजादी ने मीठे लहजे में कहा।

"शुक्रिया शहजादी हुजूर।" यूसुफ ने सर झुका कर कहा।

उधर बादशाह और दरबारी हैरत से एक दूसरे को देखने लगे। क्योंकि इससे पहले कभी भी शहजादी ने किसी तलबगार से बात की ना थी। वह सब समझ गए कि शहजादी इस नौजवान में दिलचस्पी ले रही है।

"ठीक है नवजवान शहजादी ने तुम्हारी शर्त मान ली। हम तुम्हारे हक में दुआ करेंगे। अब तुम जा सकते हो।" बादशाह ने कहा और यूसुफ बादशाह को सलाम करके और एक अलविदाई नजर शहजादी पर डालते हुए वापस मुड़कर दरबार से बाहर निकल गया। दरबार से निकलकर सीधा शाही मेहमान खाने में गया। वहां जाकर इसने अपना घोड़ा लिया और फिर घोड़ा दौड़ाते हुए महल से बाहर आ गया। वहीं वह दिल में सोच रहा था कि अब कहां जाएगा और किससे पूछे कि ऐसी चीजें इसे कहां मिलेंगी। यही सोचता हुआ वह आगे बढ़ता चला गया। बस इसकी निगाहों में तो शहजादी लैला की सूरत बस गई थी। बस इसका दिल चाहता था कि कहीं वह इसे यह तीनों चीजें ला दे और वह लेकर जाकर शहजादी के हुजूर पेश कर दे। फौरन इससे शादी कर ले। मगर वह जानता था कि ऐसा सोचना ही ख्वाब है। बलस सोच में गुम वह घोड़ा दौड़ा कर आगे बढ़ता जा रहा था।

चलते-चलते शहजादा यूसुफ शहर से निकलकर एक जंगल में दाखिल हो गया। यह जंगल खांसा बदनाम था। मगर शहजादा यूसुफ के लिए जंगल का डरने वाला क्या था? वह घोड़ा आगे बढ़ाता जा रहा था। इसके ज़हन में कोई मंजिल तो थी ही नहीं। बस वह यूं ही आगे बढ़ता चला गया। जंगल में गुजरते हुए इसे रात हो गई और वह सोचने लगा कि रात गुजारने के लिए कोई झोपड़ी तलाश करेगा। क्योंकि चेहरे की तलाश में वह आगे बढ़ता गया तो अचानक इसे दूर झाड़ी की मध्यम सी रोशनी टिमटिमाती नजर आई। वह इतने खतरनाक और घने जंगल के दरमियान रोशनी देखकर हैरान रह गया। मगर वह आगे बढ़ता गया और फिर इसे जंगल के अंदर एक झोपड़ी दिखाई दी।

शहजादा जब झोपड़ी के करीब पहुंचा तो इसे झोपड़ी में से किसी के कराने की आवाज सुनाई दी। आवाज इंसान ही की थी और बहुत कमजोर मालूम हो रही थी। जिससे वह समझ गया कि बूढ़ा शख्स तकलीफों के मारे कराह रहा है। वह झोपड़ी के करीब पहुंचकर घोड़े से उतरा और फिर झोपड़ी का दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल हो गया। अंदर इसने देखा कि झोपड़ी में एक चारपाई पड़ी हुई थी जो बिल्कुल खाली थी और इसके दरमियान में एक अंतिहाई बूढ़ा आदमी। जिसकी अब्रूइयों मूछ और दाढ़ी के बाल बिल्कुल सफेद थे। मगर इसकी शक्ल इंतिहाई नरम थी। बूढ़े की आंखें बंद थी और वह दर्द से कराह रहा था। यूसुफ को पूरा मंजर बहुत रहम आया जो यह जंगल में अकेला पड़ा हुआ था और कोई इसे पूछने वाला भी ना था। वह चारपाई के पास बैठ गया और इसे पूछने लगा, "बाबा अब तो क्या तकलीफ है?"

काफी देर तक जब यूसुफ ने आवाज दी तो बूढ़े ने आंखें खोली और करहते हुए कहा, "पानी।"

यूसुफ तेजी से घड़े की तरफ बढ़ा मगर घड़ा तो खाली था। इसमें पानी का एक कतरा भी ना था। यूसुफ दोबारा बूढ़े के पास आया और इससे पूछा, "पानी कहां से मिलेगा?" बूढ़े ने हकलाते हुए जवाब दिया कि यहां करीब एक चश्मा है। मगर वहां बहुत खतरनाक शेर और चीते होंगे।

मगर यूसुफ ने इसकी बात सुनते ही घड़ा उठाया और फौरन बाहर निकल गया और बूढ़े की बताई हुई चश्मे की तरफ जाने लगा। थोड़ी देर दूर जाने के बाद इसे शेर की गरज सुनाई दी और यूसुफ ने तेजी से तलवार निकाल ली और आगे बढ़ने लगा। फिर इसने चश्मे का पानी चमकता हुआ देख लिया। मगर इसी वक्त चश्मे पर दो शेर पानी पी रहे थे। यूसुफ खामोशी से इनके जाने का इंतजार करने लगा। मगर शेरों ने शायद इसकी बॉन्ड बांधी सुनी थी। उन्होंने पानी पीना छोड़ दिया और करहते हुए यूसुफ की तरफ बढ़े। यूसुफ ने तलवार की तरफ रुख किया और फौरन।

तलवार संभालकर खड़ा हो गया। मगर शेर इसकी तरफ आते-आते अचानक एक तरफ मुड़ गए और फिर तेज़ी से भागते हुए जंगल में गायब हो गए। यूसुफ ने घड़ा उठाया और चश्मे से पानी भरकर वापस झोपड़ी की तरफ चल पड़ा। झोपड़ी में आकर इसने पहले घड़े में पानी डाला और बूढ़े आदमी के हलक में उतारना शुरू कर दिया। जब आधा पैमाना खाली हुआ तो बूढ़े ने कराहना बंद कर दिया और आँखें खोल दीं और सिर्फ़ मध्यम से एक तरफ़ बैठ गया।

"क्या बोलूँ?" थोड़ी देर बाद उठकर बैठ गया और यूसुफ से मुख़ातिब होकर कहने लगा, "तुम्हारा बहुत शुक्रिया, बेटे। तुमने मुझे नई ज़िंदगी दी है।" बूढ़े ने आसिफ रेया से मुख़ातिब होकर कहा। "कोई बात नहीं, बाबा जी। यह तो मेरा फ़र्ज़ था। आप इस जंगल में अकेले क्यों रहते हैं?" यूसुफ ने हैरत भरे लहजे में पूछा। "बस बेटा, दुनिया से दिल उचटता गया तो जंगल की तरफ़ चला आया। अब जंगल के फल खाकर और चश्मे का पानी पीकर ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ।" बूढ़े ने जवाब दिया और यूसुफ इसकी बात सुनकर खामोश हो गया।

"बेटा, तुम इस जंगल में कैसे आ गए हो और तुम मुझे कुछ परेशान मालूम पड़ते हो।" बूढ़े ने इसे देखते हुए कहा। "कुछ नहीं, बाबा जी, कोई बात नहीं।" यूसुफ ने इसे टालते हुए कहा। "नहीं बेटा, मुझे बताओ। शायद मैं तुम्हारे किसी काम आ जाऊँ।" बूढ़े ने दर्दमंद लहजे में कहा और फिर यूसुफ ने सारी बात बता दी।

बूढ़े ने बात सुनकर कहा, "इसका मतलब यह हुआ कि तुम शेरनी का दूध, हज़ार रंग का मोर और 6 इंच के आदमी की तलाश में निकले हो।" "जी हाँ जी। मगर मुझे यह चीज़ें कहाँ मिलेंगी?" यूसुफ ने कहा। "बेटा, बेहतर तो यह है कि तुम अपने इरादे से बाज़ आ जाओ। यह तमाम चीज़ें हासिल करना बहुत कठिन काम है और इसमें जान जाने का भी ख़तरा है।" बूढ़े ने इसे समझाते हुए कहा। "बाबा जी, चाहे कुछ भी हो जाए, मैं शहज़ादी से किया हुआ वादा ज़रूर निभाऊँगा। अगर आप इस सिलसिले में मेरी कोई मदद कर सकते हैं तो आपकी मेहरबानी होगी। वरना कोई बात नहीं। मैं रात आपके पास यहाँ रुककर सुबह चला जाऊँगा। अल्लाह पर मुझे भरोसा है। वह ज़रूर कोई न कोई रास्ता निकालेगा।" शहज़ादा यूसुफ ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा।

बूढ़ा कुछ देर सोचता रहा। फिर इसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। इसने यूसुफ से मुख़ातिब होकर कहा, "बेटा, तुम बहुत दिलेर हो। मुश्किल मसाइल का सामना करने वाले भी हो। दर्दमंद और रहमदिल भी हो और अल्लाह पर भरोसा करने वाले भी। इसलिए तुम्हारी मदद ज़रूर की जाएगी। तुम घबराना नहीं। रास्ता मैं तुम्हें बता दूँगा। आगे तुम्हारी क़िस्मत।" "बाबा जी, आपकी बड़ी मेहरबानी। बस मुझे बताएँ कि यह चीज़ें कहाँ से मिलेंगी। बाक़ी मुझे अल्लाह पर भरोसा है कि मैं कामयाब हो जाऊँगा।" इसने अदब से जवाब दिया। "बेटा, तुम्हारी इन तीनों में से सबसे अहम चीज़ वह 6 इंच का आदमी है। 6 इंच का आदमी सिर्फ़ दुनिया में एक है। अल्लाह ने इसका क़द सिर्फ़ 6 इंच रखा है। मगर इसे बेपनाह ताक़तें भी दी हैं। वह बहुत ताक़तवर है, ज़ालिम है और अपने क़द की वजह से किसी के सामने नहीं आता। अगर यह तुम्हारा दोस्त बन जाए तो बाक़ी दो चीज़ें इसकी मदद से हासिल कर लोगे।" बूढ़े ने तफ़सील बताई।

"बाबा जी, आप मुझे बताएँ कि वह कहाँ रहता है। बाक़ी मैं ख़ुद इसे रिआयत करूँगा।" यूसुफ ने इसकी मदद करते हुए कहा। बूढ़ा उठा और फिर इसने झोपड़ी के कोने से खसरा हटाकर एक छोटी सी लाल रंग की गेंद निकाली और यूसुफ के हाथ में देते हुए कहा, "सुबह तुम यह गेंद ज़मीन पर डाल देना। यह बहुत तेज़ी से भागने लग जाएगी। तो इसके पीछे चलते रहना। यह तुम्हें उस जगह पहुँचा देगी जहाँ वह आदमी मौजूद है। इसका नाम अफ़रीत है और जादुई ताक़तों वाला है। वह तुम्हारा रंग सब हो जाएगा।" बूढ़े ने बताया। "शुक्रिया, बाबा जी। मैं आपकी मेहरबानी हमेशा याद रखूँगा।" यूसुफ ने गेंद हाथ में लेते हुए उन्हें शुक्रिया अदा करते हुए कहा।

"और बेटा, यह तावीज़ अपने बाज़ू पर बाँध लो। इंशा अल्लाह हमेशा तुम्हारी हिफ़ाज़त करेगी।" बूढ़े ने अपनी जेब से एक तावीज़ निकालकर इसे देते हुए कहा और यूसुफ ने बड़े शुक्रिया से वह तावीज़ लेकर बूढ़े के सामने अपने बाज़ू पर बाँध लिया। "अब तुम सो जाओ, मैं इबादत करूँगा।" बूढ़े ने कहा और यूसुफ एक कोने में सो गया। बूढ़ा सर झुकाकर इबादत में मशगूल हो गया। यूसुफ बहुत थका हुआ था। इसलिए लेटे ही इसे नींद आ गई और वह ख़्वाब में भी शहज़ादी को अपने साथ हँसते-बोलते देखता रहा।

फिर जब इसकी आँख खुली तो तेज़ धूप इस पर पड़ रही थी। वह चौंककर उठ बैठा और फिर इसने देखा कि वह झोपड़ी के बजाय खुली जगह पर सोया हुआ था। इसने इधर-उधर देखा तो इसे दूर कोई झोपड़ी दिखाई न दी। वह बहुत हैरान हुआ। इसने फ़ौरन जेब में हाथ डाला तो गेंद मौजूद थी। फिर इसने तावीज़ देखा तो वह भी वहीं मौजूद था और समझ गया कि अल्लाह ताला की तरफ़ से इसकी मदद है और बूढ़ा अल्लाह ताला का भेजा हुआ था। यूसुफ उठा, इसने इर्द-गिर्द के पेड़ों से फल खाए, चश्मे का पानी पिया और घोड़े को भी खिलाया-पिलाया और उसे भी ताज़ा कर लिया। फिर घोड़े पर सवार होकर इसने जेब से लाल रंग की गेंद निकाली और ज़मीन पर फेंक दी।

जैसे ही गेंद ज़मीन पर गिरी, वह उछल-उछल कर तेज़ी से एक तरफ़ बढ़ने लगी। आगे घास के बड़े-बड़े मैदान थे। यूसुफ गेंद के पीछे चलता रहा। रात को गेंद एक पहाड़ी के दामन में आकर ठहर गई। यूसुफ भी रुक गया और गेंद उठाकर पहाड़ी की चट्टान में लेट गया। सुबह उठकर फिर आगे बढ़ गया। इसी तरह चलते-चलते एक हफ़्ता गुज़र गया। एक हफ़्ते बाद वह एक ऐसी वादी में जा पहुँचा जहाँ हर चीज़ लाल थी। पहाड़ियों और मिट्टी का भी ऐसा मालूम होता था जैसे थमा दी गई हो, पर सिर्फ़ लाल का गुलाल चढ़ा हुआ हो। और जैसे ही गेंद वादी में दाख़िल हुई, इसका रंग सब हो गया। और फिर वादी के अंदर पहुँचकर गेंद अचानक गायब हो गई। यूसुफ समझ गया कि वह अफ़रीत के इलाक़े में पहुँच गया है। गेंद की राहदारी का शुक्रिया अदा करके वह घोड़े से उतरा और इधर-उधर देखने लगा।

अभी वह वादी को देख रहा था कि अचानक एक पहाड़ी के दामन से फूटी और इसमें से लाल रंग का एक घोड़ा बाहर आया। इस पर सफ़ेद रंग का ही शख़्स सवार था। इसके हाथ में लाल ही तलवार थी। घोड़ा दौड़ाता हुआ यूसुफ की तरफ़ बढ़ा। इसके अंदाज़ से मालूम हो रहा था कि हमला कर देगा। इससे यूसुफ ने भी तलवार संभाल ली और फिर जैसे ही वह लाल रंग का शख़्स क़रीब आया तो इसने तलवार से धोकर लगाया। अफ़रीत ने पहले तो अपने घोड़े की तरफ़ इसे रोकना चाहा, यूसुफ एक तरफ़ हट गया और फिर जैसे ही घोड़े की रवानी आगे बढ़ी। इसने भरपूर वार इसकी टाँगों पर किया। इसका वार इतना भरपूर था कि घोड़े की पिछली टाँग कट गई और घोड़ा मुँह के बल गिर पड़ा और अफ़रीत भी ज़मीन पर गिर पड़ा।

यूसुफ तेज़ी से आगे बढ़ा और इसने उठते हुए ऊपर वार करने की कोशिश की। मगर अफ़रीत ने अचानक कलाबाज़ी की और इसकी घूमती हुई तलवार तेज़ी से यूसुफ के हाथ पर लगी जिसमें इसने तलवार संभाल रखी थी। इसका वार इतना ज़ोरदार था कि यूसुफ के हाथ से तलवार निकलकर दूर जा गिरी। इससे पहले कि यूसुफ संभलता, अफ़रीत तेज़ी से उछला और इसने लाल तलवार का भरपूर वार यूसुफ पर किया। मगर यूसुफ पेंचिंग और फुर्ती का अच्छा उस्ताद था। वह सचमुच फुर्ती से एक तरफ़ हटा और फिर इसने पूरी क़ुव्वत से घूँसा मारकर अफ़रीत के पेट पर टक्कर मारी। अफ़रीत जैसे ही लड़खड़ाया, यूसुफ ने अपनी कमर से ख़ंजर निकाला और इसका ख़ंजर बिजली की तेज़ी से बढ़ता हुआ अफ़रीत के सीने में उतर गया। अफ़रीत के गले से एक चीख़ निकली और दूसरे ही लम्हे घास पर गिरकर तड़पने लगा। यूसुफ का ख़ंजर इसका दिल फाड़ देता था। नतीजे में चंद लम्हों में इसकी साँस थम गई और जिस्म ठंडा हो गया।

यूसुफ ने आगे बढ़कर इसके सीने से ख़ंजर निकाला और फिर फ़ख़्र से अपनी तलवार उठाई। अफ़रीत जैसे ही हारा, इसके जिस्म से धुआँ निकलने लगा और इस धुएँ ने यूसुफ को अपनी लपेट में ले लिया। फिर यूसुफ ने इस धुएँ से निकलने की बहुत कोशिश की। मगर इसका दम घुटने लगा और फिर यूसुफ हाथ-पाँव मारता हुआ बेहोश हो गया।

एक बहुत बड़े महल में एक छोटी सी मेज़ पर पानी का प्याला पड़ा हुआ था और इसके गिर्द 101 अफ़रीत खड़े थे। उनके चेहरों पर ख़ौफ़ और दहशत के साए लहराते थे। फिर इनमें से एक अफ़रीत ने कुछ पढ़ा तो फिर प्याले में से धुआँ निकलने लगा। जब धुएँ का काम ख़त्म हुआ तो मोर के चूज़े जितना एक 6 इंच का अफ़रीत बाहर आ गया। इस अफ़रीत का छोटा सा चेहरा था। मगर इसकी आँखें इसके क़द से भी बड़ी थीं। इसकी छोटी-छोटी आँखों में बहुत जलाल था। फिर इसकी बारीक साँस कमरे में गूँजने लगी। यह छोटा अफ़रीत था जिसका क़द सिर्फ़ 6 इंच का था।

"क्या बात है? मुझे क्यों बुलाया है?" इसने सामने खड़े अफ़रीत से तेज़ लहजे में पूछा। "हुज़ूर, एक आदमी वादी में दाख़िल हुआ है। हमारे अफ़रीत ने इसका मुक़ाबला किया मगर इस आदमी ने हमारे अफ़रीत को हरा दिया। हमने इसे बेहोश कर दिया है। अब आपके हुक्म का इंतज़ार है।" एक अफ़रीत ने बड़े अदब से कहा। "अफ़रीत को हरा दिया? यह कैसे मुमकिन है?" अफ़रीत के लहजे में गुस्सा आ गया और इसकी आँखें लाल हो गईं। "हुज़ूर, हम दुरुस्त कहते हैं। इस आदमी ने इसके दिल पर ख़ंजर मारा इसलिए वह मर गया।" उसी अफ़रीत ने अटकते-अटकते जवाब दिया। "इसका मतलब है वह दमदार है। इसे ज़िंदा लाकर बेहतर होगा। वरना आदमियों की तो दोनों को देखकर ही रूह काँप जाती है। इसे हमारे हुज़ूर ले आओ।" अफ़रीदों ने कहा। इसके हुक्म पर एक अफ़रीत तेज़ी से चलता हुआ हॉल से बाहर निकल गया।

फिर चंद लम्हों बाद जब वह वापस आया तो इसने अपने हाथों में बेहोश यूसुफ को उठा रखा था। इसने बड़े अदब से अफ़रीत के सामने लिटा दिया और ख़ुद पीछे हटकर दस्तबस्ता खड़ा हो गया। "इसे होश में ला दो।" अफ़रीत ने हुक्म दिया और इस अफ़रीत ने आगे बढ़कर यूसुफ पर कमर फूँका और दूसरे लम्हे में यूसुफ ने आँखें खोल दीं। फिर जैसे ही इसकी आँखों में ज़िंदगी का शोर पैदा हुआ, वह उछलकर खड़ा हो गया और इधर-उधर देखने लगा। और दूसरी तरफ़ इसकी नज़र मेज़ पर पड़े हुए इस छोटे से अफ़रीत पर पड़ी और वह चौंक पड़ा।

इससे पहले कि अफ़रीत कोई बात करता, यूसुफ तेज़ी से आगे बढ़ा और इसके सामने हाथ बाँधकर खड़ा हो गया और बहुत अदब से कहने लगा, "मैं अफ़रीत की अज़मत को सलाम करता हूँ। मैं इनकी दोस्ती की पनाह में आना चाहता हूँ।" इसकी इस बात पर अफ़रीत की आँखों में चमक पैदा हुई और इसने मुस्तशिर लहजे में यूसुफ से मुख़ातिब होकर कहा, "अफ़रीत साहब, तुम हमारे नाम से कैसे वाक़िफ़ हो और क्यों यहाँ आए हो?" "अगर मैं अफ़रीत का मानता हूँ तो अर्ज़ करूँ?" यूसुफ ने जानबूझकर लहजा ख़ुशामद जैसा करते हुए कहा। "हम तुम्हें जानते हैं, तमाम बात बताओ।" अफ़रीत ने अपना छोटा सा हाथ ऊपर उठाते हुए कहा। यूसुफ को ग़नीमत दानिशता इसने कहा, "अफ़रीत साहब, मैंने तुम्हारी अज़मत के चर्चे पूरी दुनिया में सुने हैं, इसलिए मैं तुम्हारी दोस्ती की आस लेकर आया हूँ ताकि मेरी मदद कर सको और मैं वापस जाकर पूरी दुनिया को यह बता सकूँ कि अफ़रीत बहुत अज़ीम है। वह जिसको दोस्त बनाए उसका साथ निभाता है और मैं तुम्हारी तारीफ़ पूरी कर सकूँ और हर शख़्स को बताऊँ कि अफ़रीत जैसा अज़ीम दोस्त मेरा है।" यूसुफ ने इस पर नरमी का असर डालने वाला एहतराम डालते हुए कहा क्योंकि इसे मालूम था कि अफ़रीत की कमज़ोरी इसका छोटा सा क़द है। इसलिए जितनी इसकी अज़मत के क़सीदे किए जाएँगे, वह उतना ही ख़ुश होगा।

क्योंकि यही हुआ, अफ़रीत ने फ़ौरन हाथ हिलाया और कहा, "आज से तुम मेरे दोस्त हो। अब घबराने की कोई बात नहीं। मेरा दोस्त पूरी दुनिया का मालिक है।" अफ़रीत के लहजे में फ़ख़्र आया और वह फ़ैलकर उठा। "बहुत-बहुत शुक्रिया, दोस्त। अब मैं एक बात करना चाहता हूँ।" यूसुफ ने बड़ी ख़ुशी से कहा। "क्यों? अफ़रीत, इसे मेरे कमरे-ख़ास में पहुँचा दो।" अफ़रीत ने हुक्म दिया और फिर वह दोबारा प्याले में घुस गया। इसके पानी में जाते ही दोबारा धुआँ पैदा हुआ और फिर अफ़रीत गायब हो गया। अब उस प्याले में सिर्फ़ पानी था। दूसरे अफ़रीत ने आगे बढ़कर यूसुफ पर कमर फूँका और यूसुफ का धुआँ हो गया और वह फिर बेहोश हो गया।

जब दोबारा यूसुफ को होश आया तो इसने अपने आप को एक बेहद खूबसूरत कमरे में पाया जिसमें एक तरफ़ छोटा सा तख़्त लगा हुआ था जिस पर अफ़रीत बैठा था। अफ़रीत ने यूसुफ को सामने रखी एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और कहने लगा, "हाँ दोस्त, अब खुलकर बताओ।" और यूसुफ ने तमाम बात बता दी। अफ़रीत ने कुछ सोचा और फिर कहने लगा, "शहज़ादी लैला की एक शर्त तो पूरी हो चुकी है कि मैं तुम्हारा दोस्त बन गया हूँ और तुम्हारे साथ शादी के पास पहुँच जाऊँगा। अब रह गईं बाक़ी दो शर्तें तो इनके लिए रास्ता मैं तुम्हें बता दूँगा और हरसंभव मदद भी कर दूँगा। मगर हिम्मत तुम्हें ख़ुद करनी है।" "क्या मतलब? मैं समझा नहीं?" यूसुफ ने बहुत बेवकूफ़ बनने के लहजे में कहा। "दोस्त, मैंने तुम्हें ऐसे ही दोस्त नहीं बनाया। मैं तुम्हारी बहादुरी और अक्लमंदी पर ख़ुश हुआ हूँ। और क्योंकि मैं यहाँ अकेला रहता हूँ, इसलिए मैंने तुम्हें दोस्त बना लिया।" अफ़रीत ने मुस्कुराते हुए कहा। "मुझे तुम्हारा दोस्त बनकर बहुत ख़ुशी हुई।" यूसुफ ने भी जवाब दिया। "तो बात दरअसल यह है कि शेरनी का दूध और हज़ार रंग का मोर हासिल करने का चक्कर यह है कि इन्हें बहादुर शख़्स ही अपनी हिम्मत से हासिल कर सकता है। वैसे मैं चाहूँ तो एक लम्हे में दोनों चीज़ें हासिल हो सकती हैं। मगर होगा यह कि शेरनी का दूध यहाँ आते ही ख़राब हो जाएगा और मोर के हज़ार रंग के पर ख़राब हो जाएँगे। इसके रंग उड़ जाएँगे। तुम्हारी मेहनत ज़ाया हो जाएगी। इसलिए मैंने इन्हें हासिल करने के लिए शर्त रख दी है कि अगर तुम हासिल करो तो ख़राब हो जाएँगे और अगर इंसान हासिल करे तो ठीक रहेंगे।" अफ़रीत ने तफ़सील समझाई। "ठीक है। अब तुम मुझे बताओ कि मैं कैसे कर सकता हूँ। इसके बाद मैं ख़ुद कोशिश करूँगा।" यूसुफ ने बात को समझते हुए कहा।

"तुम ऐसा करो, पहले शेरनी का दूध हासिल करो। यह यहाँ से बहुत दूर एक जंगल में है। वहाँ एक तालाब है जहाँ शेरनी का दूध जमा होता है और जंगल के शेर इसका पहरा देते हैं। वहाँ से दूध हासिल करने के लिए बेशुमार शेरों से मुक़ाबला करना होगा।" अफ़रीत ने बताया। "मगर शेरनी वहाँ दूध क्यों जमा करती है?" यूसुफ ने पूछा। "इस जंगल में क़ुदरत का यह इंतज़ाम है कि शेर का बच्चा पैदा होते ही अपनी माँ का दूध नहीं पीता बल्कि इस तालाब में आकर दूध पीता है। और न ही शेरनी वहाँ बैठती है तो उनका दूध निकलकर इस तालाब में चला जाता है। यह दुनिया में वह जगह है जहाँ से शेरनी का दूध हासिल हो सकता है।" अफ़रीत ने समझाते हुए कहा। "क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम किसी शेरनी को ज़िंदा पकड़कर इसका दूध किसी बर्तन में भरें?" यूसुफ ने सोचते हुए कहा। "नहीं, भोले दोस्त, तुम्हें यह नहीं पता कि इंसान जैसे ही शेरनी का दूध हासिल करने की कोशिश करेगा, इसका दूध हवा में उड़ जाता है। इसीलिए तो यह नामुमकिन शर्तें रखी गई हैं। वरना तो कोई भी शिकारी आसानी से यह शर्त पूरी कर देता।" अफ़रीत ने कहा। "फिर अब क्या किया जाए? मैं अकेला तो हज़ारों शेरों से लड़ न सकूँगा।" यूसुफ ने कराहते हुए कहा। "मायूस होने की ज़रूरत नहीं, अगर तुम हिम्मत करो तो दूध हासिल हो जाएगा।" अफ़रीत ने मुस्कुराते हुए कहा। "फिर ठीक है, मुझे बताओ मैं क्या करूँ?" यूसुफ ने ख़ुश होकर कहा।

"मैं तुम्हें ऐसा घोड़ा देता हूँ जो इस वादी को एक ही साँस में पार कर जाएगा और इसकी बेहद तेज़ी होगी। तुम ऐसा करो, एक लोटा उसके साथ ले लो और इस जंगल में चले जाओ। जब तुम वहाँ पहुँचोगे तो शेर तुम्हारी तरफ़ भागेंगे। तुम किसी तरह घोड़े को संभालकर इस तालाब पर पहुँचा देना और घोड़े को एड़ लगा देना। घोड़ा एक ही छलाँग में तालाब पार कर जाएगा। जैसे ही तुम थोड़ा भागते हुए शेरों से निकल जाओगे तो घोड़ा मेरे पास आ जाएगा। इसके बाद तुम हज़ार रंग वाले मोर के लिए चले जाना। जब यह दोनों चीज़ें तुम हासिल कर लोगे तो फिर हम शादी के पास चलेंगे और तुम शर्तें जीतकर उससे शादी कर लेना।" अफ़रीत ने बताया। "ठीक है। तुम मुझे वह घोड़ा दे दो और मुझे इस चश्मे तक पहुँचा दो।" यूसुफ ने ख़ुश होकर कहा। "ऐसा करो, अब तुम आराम करो। जब तुम्हारी आँख खुलेगी तो तुम इस जंगल में मौजूद हो जाओगे। घोड़ा तुम्हारे पास होगा। रस्सी और लोटा भी वहीं तुम्हें मिल जाएँगे। बाक़ी हिम्मत तुम्हें ख़ुद करनी है।" अफ़रीत ने समझाते हुए कहा। यूसुफ बहुत थका था इसलिए इसकी बात मान गया। फिर अफ़रीत ने इसके लिए खाना मंगवाया और खाना खाकर वहीं एक पलंग पर सो गया।

यूसुफ की जब आँख खुली तो इसके कानों में परिंदों के चहचहाने की आवाज़ आई और वह चौंक पड़ा और उठकर बैठ गया। चंद लम्हे तो वह इधर-उधर देखता रहा। फिर इसे याद आ गया कि वह अफ़रीत के कहने के मुताबिक़ इस वक़्त इस जंगल में है जहाँ शेरनी के दूध से भरा तालाब मौजूद है और फिर इसे क़रीब बिल्कुल सफ़ेद रंग का घोड़ा दौड़ता हुआ नज़र आया। क़रीब एक लोटा भी पड़ा हुआ था जिसकी गर्दन के साथ एक बड़ी सी रस्सी बँधी हुई थी। यूसुफ उठा और इसने लोटा उठाकर इसकी रस्सी को पकड़ लिया और फिर वह रस्सी लगाकर घोड़े पर सवार हो गया। इसके सवार होते ही वह घोड़ा झटके से हिला और दूसरे लम्हे वह इस घने जंगल में सरपट दौड़ने लगा। वह जंगल बहुत घना था। मगर घोड़ा इस हिसाब से दौड़ रहा था कि कोई भी शाखा इसके रास्ते में रुकावट न बन सकती थी। यूसुफ बड़े इस्तग़फ़ार पढ़ते हुए इस तालाब की तरफ़ बढ़ता रहा। फिर इसे दूर से शेरों की गरजने की आवाज़ें सुनाई देने लगीं और वह समझ गया कि अब तालाब क़रीब आ गया है। इसलिए वह संभलकर बैठ गया। फिर इसे ख़्याल आया और इसने रस्सी का एक सिरा अपनी कमर में मौजूद बेल्ट से अच्छी तरह बाँध लिया और फिर लोटे को हाथ से पकड़ लिया। घोड़ा भी बिजली की रफ़्तार से भगा चला जा रहा था और यूसुफ इसे संभालता बैठा हुआ था।

अचानक इसे जंगल के दरमियान से शेरों का एक हुजूम नज़र आया। यूसुफ इतने शेर देखकर घबरा गया क्योंकि जहाँ नज़र जाए वहीं इसे शेर नज़र आ रहे थे। घोड़ा इन शेरों को देखने के बावजूद इनकी तरफ़ बेहद तेज़ी से बढ़ रहा था। थोड़ा सा और यूसुफ को ऐसा महसूस हुआ जैसे ठहरा सा वक़्त और गुज़र गया हो। दूसरे लम्हे इसकी निगाह उस तालाब पर पड़ी जो दूध से भरा हुआ था। यूसुफ इतना देखकर घबरा गया क्योंकि कोई भी शख़्स यह नहीं कर सकता था कि कोई घोड़ा इतने बड़े तालाब को एक ही छलाँग में पार कर सकता है। मगर इसे अफ़रीत पर यक़ीन था। इसलिए तालाब के क़रीब पहुँचते ही यूसुफ ने घोड़े को एक ज़ोरदार एड़ लगाई और दूसरे लम्हे में घोड़े के पाँव एक झटके से ज़मीन से उठकर चले गए थे। और यूसुफ को यह महसूस हुआ जैसे घोड़ा हवा में उड़ रहा हो। शेरों में खलबली सी मच गई। वे भागने लगे। मगर क्योंकि घोड़ा तालाब के ऊपर से गुज़र रहा था, इसलिए शेर तालाब में छलाँग न मार सकते थे। तालाब से जैसे ही घोड़ा गुज़रा, यूसुफ ने लोटा नीचे फेंक दिया और दूसरे ही लम्हे में लोटा दूध में धँसकर आगे चला गया और रस्सी ने इसे अंदर खींच लिया। इससे पहले वह शेरों से निकल गया था और तालाब पार कर चुका था। तालाब के दूसरे किनारे पर मौजूद शेर तेज़ी से उछलने लगे और फिर यूसुफ की बदक़िस्मती शुमार करो कि लोटे के साथ लटकी हुई रस्सी एक शेर की गर्दन में फँस गई थी।

यूसुफ को ज़ोरदार झटका लगा। उधर यूसुफ पहले ही रस्सी को अपनी कमर से छोड़ चुका था। इसलिए ज़ोरदार झटका लगने से यूसुफ उछलता हुआ नीचे शेरों में जा गिरा और घोड़ा आगे बढ़ता चला गया। नीचे गिरते ही यूसुफ के मुँह से भूखे शेर की चीख़ने की आवाज़ निकली और फिर वह ज़मीन से टकराने के बजाय बड़े ज़ोर से एक शेर की कमर से जा टकराया। इस तरह गिरने से शेरों में खलबली की भगदड़ मच गई और यूसुफ तेज़ी से ज़मीन से उठा। इसने अपने होशोहवास फ़ौरन संभाल लिए थे। इसलिए इससे पहले कि शेर इस पर हमला करें, इसने छलाँग लगाई और वह दौड़ता हुआ तालाब में जाकर रस्सी पकड़ ली। अभी तक तालाब के दूध के अंदर लोटा था। तालाब में गिरते ही यूसुफ ने लोटे के क़रीब से रस्सी को पकड़ा और फिर दूसरे हाथ से अपनी कमर से ख़ंजर निकालकर रस्सी को काट दिया और इसके साथ ही इसने रस्सी को अपनी कमर की पट्टी से भी काट दिया। नतीजा यह हुआ कि दूध का लोटा वह...

दोनों फंस गए। पर नहर जैसा दमदार शेर की गर्दन में फंस गई थी और इसके खींचने से लोटा खींच गया और यूसुफ दोनों तरफ से बाहर आ गया।

अब यूसुफ का यह हाल था कि वह शेरनी के दूध से भरे हुए लोटे को पकड़े हुए शेर के इस तालाब में तैर रहा था और इसके चारों तरफ अपने शेर का जबरदस्त हमला था जो वह अपने वसूल में गरज रहे थे। इनका बस नहीं चलता था कि कैसे यूसुफ को पकड़े और उधर यूसुफ बहुत बेचैनी महसूस कर रहा था क्योंकि यहां से बचकर निकलने के लिए कोई सूरत नजर ना आ रही थी।

वह अब भी इसी उधेड़बुन में था कि अचानक शेर में एक बार फिर खलबली मच गई और फिर यूसुफ ने देखा कि वह घोड़ा हवा में तैरता हुआ वापस आ रहा है। इस बार घोड़े का अंदाज ऐसा था जैसे वह तालाब में छलांग लगाने वाला हो और फिर वही हुआ। घोड़ा तालाब के बाल में उतर गया। तालाब में उतरते ही घोड़ा यूसुफ के करीब आ गया। घोड़े की आंखें परेशान अंदाज में चमक रही थी। यूसुफ घोड़े के करीब आते ही तेजी से इस पर सवार हो गया और तालाब के किनारे की तरफ तैरने लगा।

शेर यह सूरते हाल देखकर बुरी तरह गरज रहे थे। उधर यूसुफ सोच रहा था कि अब क्या होगा क्योंकि घोड़ा जमीन पर कदम जब तक ना रखे वह तो दौड़ ना सकता और जैसे ही इसने जमीन पर कदम रखा शेर इस पर टूट पड़ेंगे। यूसुफ ने लौटा हाथ में पकड़ रखा था और थोड़ा तैरता हुआ किनारे की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। अचानक इसे ख्याल आया और इसने किनारे के करीब एक हाथ से तेजी से दूध उछालना शुरू कर दिया। दूध की छींटों से शेर चंद कदम पीछे हटे थे। उसी वक्त घोड़े ने किनारे पर कदम रखा और फिर दूसरे लंबे में आगे बढ़ गया।

शेर ने भी घोड़े पर हमला करने की कोशिश की। मगर घोड़ा तो बिजली बन गया था। शेरों के अंदाजे गलत साबित हुए और वह एक दूसरे से टकरा गए जबकि घोड़ा इनके दरमियान से साफ निकलता हुआ आगे बढ़ गया और पंचम नौ रसम में शेर पीछे रह गए। शेरों ने घोड़े का पीछा करने की कोशिश की मगर वे इसकी रफ्तार को भी दबा ना सके। अब यूसुफ शेरनी के दूध से भरे लोटे को पकड़े मुतमिन से बैठा हुआ था।

काफी दूर आ जाने के बाद घोड़े की रफ्तार आहिस्ता हो गई और पांव एक जगह रुक गए। घोड़ा जैसे ही रुक गया यूसुफ घोड़े से नीचे उतरा और दूसरे लम्हे फिर भाग पड़ा। यूसुफ हैरानी से इसे देखता रहा मगर इसे कुछ समझ ना आया। लौटा एक तरफ रखकर थका हारा जमीन पर बैठ गया। इसका तमाम जिस्म दूध से भीगा हुआ था। फिर जैसे ही जमीन पर बैठा अचानक इसकी आंखें बंद होने लगी। इसे ऐसा महसूस हुआ जैसे बहुत जोर की नींद आ रही हो और फिर चंद लम्हों में सो गया और जब इसकी आंख खुली तो वह अफरीद के सामने बैठा था।

"मुबारक हो यूसुफ तुम पहली शर्त पूरी करने में कामयाब हो गए।" अफरीद की आवाज आई।

"हां और मैं भी शर्त पूरी करने में कामयाब हो गया।" यूसुफ ने फक्र से जवाब दिया।

"नहीं यूसुफ इसमें तुम्हारी बहुत बड़ी अकलमंदी का हाथ है। तुमने जिस तरह तालाब में छलांग लगाई और रस्सी काटने में फर्ती दिखाई और फिर जिस तरह तुमने किनारे पर दूध उछालकर घोड़े को कदम रखने का मौका दिया यह सब तुम्हारी अकल का काम है।" अफरीद ने मुस्कुराते हुए कहा।

"शुक्रिया यह काम तो हो गया। अब रह गई मोर हजार रंग।" यूसुफ ने कुछ सोच कर कहा।

"घबराना नहीं वह भी हो जाएगा। अब तुम पहले नहाकर कपड़े बदलो फिर बातें करेंगे।" अफरीद ने नहाने की तरफ इशारा किया और यूसुफ नहाने के लिए चला गया।

दूसरे रोज नहा धोकर जब दोनों इकट्ठे हुए तो यूसुफ मोरज़ार रंग की बात करने लगा।

"मोरज़ रंग कहां से मिलेगा?" यूसुफ ने पूछा।

"जहां तक मोर हजार रंग का ताल्लुक है, ऐसा सिर्फ एक मोर है जो मुल्क कूफा के बादशाह के पास मौजूद है। मगर बादशाह इसकी बहुत हिफाजत करता है और किसी भी कीमत पर किसी को देने के लिए तैयार ना है।" हरीत ने देखते हुए बताया।

"क्या तुम्हारी सिफारिश पर भी ना देगा?" यूसुफ ने पूछा।

"मेरी सिफारिश पर तो वह इस मोर को ज़बाह करने पर तैयार हो जाएगा। मगर देगा ना क्योंकि मेरी इसके साथ बेपनाह दुश्मनी है। इसीलिए तो मैं कूफा से बाहर रहता हूं।" अफरीद ने तफसील बताई।

"फिर तो बुरा हुआ दोस्त। अब मोर हजार रंग कैसे हासिल किया जाएगा?" यूसुफ ने कुछ सोचते हुए कहा।

"हिम्मत ना हारो। अगर तुम हिम्मत करो तो यह मोर हासिल कर सकते हो।" अफरीद ने कहा।

"वह कैसे?"

"ऐसे कि तुम कूफा में दाखिल हो जाओ। गहरे पहरेदार तुम्हें पकड़ कर बादशाह के पास ले जाएंगे। मैं तुम्हें एक नायाब मोती दे दूंगा। तुम वह मोती बादशाह को तहफे के तौर पर दे देना। बादशाह खुश हो जाएगा और वह तुम्हें अपना मेहमान बनाएगा। बस इसके बाद मोर हजार रंग हासिल करके वहां से निकलना तुम्हारा अपना काम होगा।" अफरीद ने तफसील बताई।

"ठीक है एक दफा वहां पहुंच जाऊं। फिर हासिल करना मेरा काम है। मगर यह तो बताओ कि वहां से निकलने के बाद मैं तुम तक पहुंचूंगा कैसे?" यूसुफ ने कहा।

"इसकी फिक्र तुम मत करो। मुझे तुम्हारा हाल मालूम हो जाएगा। जैसे ही तुम कूफा से बाहर निकलोगे, मैं तुम्हें यहां ले आऊंगा।" अफरीद ने कहा।

"बस ठीक है। तुम मुझे वह मोती देकर कूफा पहुंचा दो। आगे मैं जानता हूं मेरा काम।" यूसुफ ने कहा, और अफरीद ने पानी में छलांग लगा दी। दूसरे लम्हे यूसुफ कूफा में दाखिल हो गया।

"कूफा पहुंचने वाला मुसाफिर सैथ क्या जाए?" अफरीद ने हुक्म दिया और कमरे में मौजूद अफरीद चले गए। चंद लम्हों बाद एक छोटी सी डिब्बा लेकर आया और इसने बड़े अदब से अफरीद के सामने रख दिया और उलटे पांव वापस चला गया।

अफरीद ने डिब्बा खोली तो यूसुफ इसे देखकर दंग रह गया। इसमें दुनिया का नायाब और नायाब तरीन छह कोहिनूर हीरा पड़ा हुआ था। जिसके छह रुक्सार थे। इसकी कीमत सात बादशाहों के खजानों से भी ज्यादा थी।

"कूफा के बादशाह की जिंदगी की सबसे बड़ी हसरत इसी हीरे का हासिल है। वह इसे देखकर तुम्हें मेहमान बनाएगा।" अफरीद ने डिब्बा बंद करके इसके हवाले करते हुए कहा।

"बहुत-बहुत शुक्रिया दोस्त। तुमने दोस्ती का हक अदा कर दिया। अब मेजबानी करो और मुझे कूफा पहुंचा दो। मैं मोड़ रंग हासिल करने के लिए निकला हूं।" यूसुफ ने अपनी कमर की जीभ में रखते हुए कहा।

अफरीद ने सर हिलाया और फिर इससे आंखें बंद करने को कहा। इसने आंखें बंद कर ली। आंखें बंद करके इसे महसूस हुआ जैसे हवा में उड़ रहा हो। काफी देर तक इस पर यह हालत रही। फिर इसके कानों में हल्की सी तकरार हुई।

"आंखें खोलो।" अफरीद की आवाज सुनाई दी।

यूसुफ ने आंखें खोली और फिर देखकर हैरान रह गया कि वह पहाड़ के दामन में चट्टान की आड़ में खड़ा था और ऊपर पहाड़ की चोटी पर दो बहुत बड़े खतरनाक देव खड़े थे जो बहुत लंबी दहाड़ मार रहे थे। पहाड़ बहुत ऊंचा था और दोनों देव पहाड़ की चोटी पर खड़े थे। मगर नीचे से भी वह इतने बड़े नजर आ रहे थे कि आदमी देखकर हार मान ले। यूसुफ सोचने लगा कि ना जाने असली में वह कितने बड़े देव होंगे। बल क्योंकि इसे कूफा जाना था इसलिए वह चट्टान की आड़ से निकला और तेजी से पहाड़ की चोटी की तरफ चढ़ने लगा।

अब इसने चंद कदम उठाए होंगे कि अचानक इसे यह महसूस हुआ जैसे पहाड़ हिल रहा हो। यह पहरेदार देव की आवाज थी जिसने शायद यूसुफ को देख लिया था। यूसुफ ने जैसे ही निगाहें उठाई तो इसने दोनों देव को अपनी तरफ बढ़ते देखा। देव लंबे-लंबे कदम उठाते आ रहे थे और फिर चंद लम्हात में यूसुफ की गर्दन एक देव के हाथ में आ गई और यूसुफ के कदमों तले से जमीन निकलती चली गई।

"आज तो बहुत अच्छा नाश्ता मिल गया।" देव ने कोशिश बेकार जैसा मुंह खोलते हुए अपने साथी से कहा।

"मुझे ना मारो। मैं तुम्हारा दोस्त दुश्मन ना हूं। मैं कूफा शहर करने आया हूं। मुझे अपने बादशाह के पास ले चलो।" यूसुफ ने फरियाद में कहा क्योंकि इसकी गर्दन पर बुरी तरह देव के पंजे में फंस गई थी और इसे यह महसूस हो रहा था कि देव की गिरफ्त से अभी इसका गला निकल जाएगा। इसके अलावा इसे यह भी खतरा था कि देव इसे यहीं खा जाएगा। इसलिए इसने बोलना जरूरी समझा।

"क्यों? तुम्हें बादशाह के पास क्यों ले जाएंगे? हम तो यहीं खा जाएंगे।" देव ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा।

"नहीं बादशाह मेरा इंतजार कर रहा है। अगर तुमने मुझे वहां ना ले जाया तो वह तुम्हें सजा देगा।" यूसुफ ने चाल चलते हुए कहा।

"मगर वह तुम्हारा इंतजार क्यों कर रहा है?" देव ने कराने वाला लहजा ना छोड़ा।

"इसलिए कि मैंने इसे खास राज की बात बतानी है।" यूसुफ ने कहा।

"इसे यहीं ले चलते हैं। ऐसा ना हो कि बादशाह हमसे नाराज हो जाए।" दूसरे देव ने मशवरा दिया।

"तुम ठीक कहते हो। वो मजबूरी है।" देव ने कहा और इसे हाथों में लटकाए ऊपर चढ़ने लगे।

"मेरी गर्दन छोड़ो वरना वह बादशाह के पास जाने से पहले ही मर जाऊंगा।" यूसुफ ने देव को समझाते हुए कहा और देव ने इसकी गर्दन छोड़कर इसकी कमर पकड़ ली। अब यूसुफ की कमर पर सख्त दबाव था। मगर फिर भी इतनी तकलीफ ना थी जितनी गर्दन पकड़ने से थी।

बहरहाल दो चोटी पर पहुंचे तो एक देव वहीं ठहर गया और दूसरा यूसुफ को पकड़े दूसरी तरफ उतरने लगा। यूसुफ ने देखा दूसरी तरफ बहुत खूबसूरत वादी थी। हर तरफ सब्झा झार और फूलों वाले बागात थे जिनमें हरेभरे दरख्तों के साथ खूबसूरत परियां भी चलती फिरती थी। देव लंबेलंबे डग भरता आगे बढ़ा चला गया। दूसरे द्वार परियों ने देखकर ठटक गई। मगर इससे किसी ने बात ना की।

थोड़ी दूर चलने के बाद इसे एक अंतिहाई खूबसूरत और आदिम उलझण महल दिखाई। दिया जो बिल्कुल सोने का बना हुआ था। यूसुफ समझ गया कि यही शाही महल है। थोड़ी देर बाद देवशाही महल के बड़े दरवाजे के सामने पहुंच गया। देव से अंदर पहरेदारों ने कुछ बात की और पहरेदारों ने दरवाजा खोल दिया और देव अंदर दाखिल हो गया। यूसुफ ने इतना खूबसूरत महल जिंदगी में ना देखा था। इसलिए वह अपनी तकलीफों को नजारों में भूल गया।

देव मुतलिका कमरों से गुजरता। फिर एक ऐसे कमरे पर रुक गया जिसके दरवाजे पर कीमती हीरे जड़े थे। दरवाजे के सामने एक खूबसूरत पेरी पहरेदार खड़ी थी। देव को शायद यूसुफ की आमद की खबर पहले से दे दी गई थी। इसलिए जैसे ही देव इसे लेकर वहां पहुंचा पेरी ने जल्दी से दरवाजा खोल दिया और देव अंदर दाखिल हो गया। यूसुफ ने देखा कि बहुत बड़ा तख्त था जिसके दरमियान में हीरों से जड़े हुए बहुत खूबसूरत तख्त पर एक इंतहाई लंबी दाढ़ी वाला देवसर पर ताज पहने बैठा था। इसके चारों तरफ खूबसूरत परियां यादवार अंदाज में खड़ी थी।

देव ने पहले तो बादशाह को सलाम किया और फिर यूसुफ को देव के सामने खड़ा कर दिया। साथ ही इसने बादशाह को यूसुफ की बताई हुई बात बता दी।

"अब तुम जा सकते हो।" देव से मुखातिब होकर कहा और वह दर्द और सलाम करके उलटे पांव वापस चला गया।

इसके जाने के बादशाह ने यूसुफ को गौर से देखा और कराने वाली आवाज में पूछा।

"कौन हो तुम और यहां क्यों आए हो? तुमने हमें क्यों गुमराह किया?" बादशाह ने गुस्से भरे लहजे में पूछा जिसमें झलकती थी।

"बादशाह सलामत मैं फकीरी आदमी हूं। हीरों की तिजारत करता हूं। मुझे कूफा शहर का शौक था तो नचा। मैं यहां सैर करने आ गया और साथ ही दुनिया का एक बेमिसल और खूबसूरत छह रुखसार वाला हीरा आपके लिए तहफे के तौर पर ले आया हूं।" यूसुफ ने बड़े अदब से जवाब दिया।

"छह रुखसार वाला हीरा।" बादशाह इसकी बात सुनकर चौंक पड़ा।

"जी हां, यह नायाब हीरा है। उम्मीद है आप मुझे कूफा में चांद अपना मेहमान बनाकर रखेंगे।" यूसुफ ने जवाब दिया।

"धरा दिखाओ।" बादशाह ने बेचैन लहजे में जवाब दिया।

यूसुफ ने कमर की जीभ से डिब्बा निकाला और फिर इसे खोल दिया। हीरा देखते ही बादशाह खुशी से उछल पड़ा। इसने झपटा मारकर हीरा यूसुफ के हाथ से छीन लिया। और फिर इसे गौर से देखकर वाहवाह करता रहा। खुशी से इसकी बाहें खिल गई थी। थोड़ी देर बाद जब इसका जोश ठंडा हुआ तो वह तख्त पर बैठ गया और बार-बार हीरे को देखने लगा।

"मेरे लिए क्या हुक्म है जनाब?" यूसुफ ने अब भी अदब से पूछा।

"अब से तुम मेहमान हो। तुमने मेरे लिए दुनिया की सबसे कीमती तहफबा लाया है। इसलिए हम इसके नाम पर तुम्हें अपना मेहमान बनाते हैं। तो मुझे इजाजत है कि तुम जब तक चाहो कूफा में रह सकते हो और हमारे महल की सैर कर सकते हो। तुम्हें कोई ना रोकेगा।" बादशाह ने खुशी से ऐलान करते हुए कहा और यूसुफ ने झुक कर सलाम करते हुए बादशाह का शुक्रिया अदा किया।

"इस आदमी को शाही मेहमान खाने में ले जाओ और मेरा यह ऐलान पूरे कूफा में फैला दो।" बादशाह ने खादिम को हुक्म दिया और यूसुफ इशारे पर बादशाह को सलाम करके वहां से बाहर निकल गया। खादिम इसे महल के हिस्से में ले गई और फिर एक बहुत ही खूबसूरत कमरे में पहुंचाकर इसने यूसुफ को बताया कि तुम्हारा कमरा है और बादशाह के ऐलान के बाद अब पूरा कूफा तुम्हारा है। तुम्हें जिस चीज की जरूरत हो तो कहना तुम्हारी जरूरत पूरी हो जाएगी।

"खादिम अच्छी पेरी।" यूसुफ ने आराम से बिस्तर पर बैठे हुए कहा और बड़ी खामोशी से वापस चली गई।

यूसुफ ने कमरा देखा और फिर वह आरामदेह बिस्तर पर काफी देर पड़ा रहा और आराम करता रहा। करीब दो-तीन घंटों के बाद वह कमरे से निकला और शाही महल में घूमने लगा। किसी ने भी कुछ ना कहा और वह बड़े यकीन से घूमता रहा। घूमतेघूमते वह शाही बाग में पहुंच गया। यह बाग इतना खूबसूरत था कि यूसुफ हैरान होकर खड़ा हो गया। अजीबोगरीब फूल और पौधे बहुत मशहूर थे। बाकी कश्तियां इतनी खूबसूरत थी कि एक ही नजर देखने के काबिल थी। वह दुनिया भर के परिंदे मौजूद थे। ऐसे भी जो यूसुफ ने देखे थे और ऐसे भी जिन्हें इसने जिंदगी में कभी ना देखा था।

काफी देर बाद इसकी सैर खत्म हुई तो वह आगे बढ़ा और बाघ की सैर करने लगा। घूमते-घूमते वह एक ऐसे हिस्से में आ गया जो सबसे ज्यादा खूबसूरत था और फिर अचानक उठकर कहां रुके? आप इसे सामने ही क्यारियों में मोर हजार रंग घूमता हुआ दिखाई दिया। वह जैसा मद और सपनों की सूरत के लिहाज से अमोग चेतना था। मगर इसके जिस्म पर मौजूद पर बेशुमार रंग थे। हर पर का रंग और शेड दूसरे से अलग था। इतने बेशुमार रंग थे कि आदमी बस देखता ही रह जाएगा। तक कि वह दुनिया का सबसे खूबसूरत मोर था।

यूसुफ की मंजिल उसी के सामने थी। मगर अब मसला था मोर को पकड़ना और फिर कूफा शहर से बाहर निकलना। यूसुफ काफी देर तक वहां खड़ा रहा और सोचता रहा। फिर वह वापस मुड़ा और चलता अपने कमरे में पहुंच गया। वह यकीन से इस सिलसिले में कोई मंसूबा सोचना चाहता था। सोचते-सचते आंखें इसकी बंद हो गई और रात हो गई। इसने इस मंसूबे के हर पहलू पर गौर किया और फिर मुतमिन हो गया।

मगर अचानक इसे एक और ख्याल आया। इसने सोचा कि अगर मोर के साथ-साथ इस बादशाह से वह दुनिया का कीमती हीरा भी ले जाकर शहजादी लैला को पेश करेगा तो वह कितनी खुश होगी। इस ख्याल से इसने वही रात गुजारने का इरादा कर लिया। यह रात गुजारते ही वह उठा और महल से बाहर निकल आया। अब इसका रुख हिमैन घर की तरफ था जो सिर्फ बादशाह के लिए मुकरर था क्योंकि इसके लिए हुक्म था कि इसे रोका जाएगा। इसलिए किसी ने इसे ना रोका और वह आगे बढ़ता चला गया।

अचानक इसने पेरी से मुखातिब होकर कहा कि वह बादशाह का अज़ायब घर देखना चाहता है।

"वैसे तो बादशाह की खुशी के बगैर कोई भी बादशाह के अज़ायब घर में दाखिल ना हो सकता था। मगर तुम्हारे लिए क्योंकि बात है बादशाह ने इजाजत दे रखी है। इसलिए आओ मैं सैर कराऊंगा।" पेरी ने अदब से कहा और फिर वह पेरी के पीछेछे चलता गया।

अजाइब घर के बंद दरवाजे के सामने जाकर रुक गई। इसने वहां के पहरेदार से कुछ बात की और पहरेदारों ने दरवाजा खोल दिया।

"क्या आप अकेले घूमेंगे?" यूसुफ ने पूछा।

"नहीं, तुम भी मेरे साथ चलो। तुम मुझे बताओ तो सही कौन-कौन सी चीज है?" यूसुफ ने पेरी से मुखातिब होकर कहा और पेरी इसके साथ अंदर दाखिल हो गई।

यूसुफ अज़ायब घर में एक-एक चीज को देखकर हैरान होता रहा। पेरी हर चीज के मुतल्लिक इसे बताती रहती और यूसुफ देखता रहा। फिर एक जगह इसे वह डिब्बा नजर आ गया जिसमें छह रुक्सार वाला हीरा था। यूसुफ ने वह देख लिया और दोबारा सैर में मशगूल हो गया। अचानक चलते-चलते इसने पेरी से कहा, "मुझे प्यास लगी है, धरा शरबत तो पिलाओ।"

पेरी ने सर हिलाया और तेजी से चलती कमरे से बाहर निकल गई। इसके बाहर निकलते ही यूसुफ ने जीभ से कलम और कागज निकाला। जल्दी से इस पर एक पत्थर लिखा और मेरी अमानत वापस ले जा रहा हूं। यूसुफ आदमी लिखा और तेजी से आगे बढ़ा। डिब्बा खोली और फर्ती से हीरा निकालकर कमर की जीभ में रख लिया और हीरे की जगह धरा सी मिट्टी भर दी। डिब्बा बंद कर दिया और खुद वही जगह आकर खड़ा हो गया जहां पेरी इसे छोड़कर गई थी। अब इसे वहीं खड़ा चंद लम्हों बाद पेरी आई जिसके हाथ में शरबत का गिलास था।

"मिल गया।" यूसुफ ने दो गिलास पीते हुए कहा और फिर दोबारा सैर में मशगूल हो गया।

वह फिर जल्दी-जल्दी कमरे की सैर की। अपने कमरे से बाहर निकला। अज़ायब घर का दरवाजा बंद किया और फिर पेरी को अलविदा कह दिया। दुनिया की नायाब चीजें देख ली। पर एक चीज के मुतलिक पेरी ने यूसुफ को बता दिया था। वह सोचकर बहुत खुश हुआ।

पेरी के जाने के बाद यूसुफ दोबारा कमरे से निकला और शाही बाग की तरफ चल पड़ा। वहां के पहरेदार से इसने कहा कि वह इसके लिए तेज रफ्तार घोड़ा ले आए क्योंकि बादशाह का हुक्म था इसलिए पहरेदार ने फौरन एक तेज रफ्तार घोड़ा ले आया। यूसुफ घोड़े पर सवार होकर चला और फिर वह बाहरी दरवाजे से बाग के मुकाबिल दरवाजे की तरफ निकल गया।

थोड़ी देर बाद यूसुफ अपने अंदाज के मुताबिक इस जगह पहुंच गया जहां मोर हजार रंग था। चारों तरफ खामोश था। यूसुफ ने घोड़ा दीवार के साथ एक बड़े से दरख्त के करीब बांधा और फिर इधर-उधर देखते हुए दीवार पर चढ़ गया और चंद लंबे बांधनों दीवार के ऊपर पहुंच गया। फिर इसने अंदर छलांग लगाई। हल्का सा धमाका हुआ और यूसुफ पत्थर के पीछे छिप गया। वही दबका बैठा रहा। मगर वहां दूर ना झेक कोई पहरेदार ना था। जो धमाके की आवाज सुनकर इधर आ जाए। वह शाही बाग था और कूफा शहर के अंदर था। वहां किसकी क्या जरूरत थी कि कोई गलत हरकत करे इसलिए पहरेदारों की जरूरत ना थी। बाद के दरवाजे पर तो पहले से ही पहरेदार मौजूद थे कि किसी को अंदर जाने ना दें।

चंद लम्हे चुपके रहने के बाद वह उठा और तेजी से आगे बढ़ा और इस हिस्से की तरफ जाने लगा जहां इसने मोर हजार रंग देखा था। वह काफी देर तक ढूंढता रहा। फिर मोर एक झाड़ी के नीचे दबका हुआ नजर आया क्योंकि उस वक्त रात थी इसलिए मोर बड़े एहतियात से बैठा था। यूसुफ ने इसे देखा तो वह इस पर झपट पड़ा। मोर ने हल्की सी चीख मारी और फिर कामों की आप आंख समझ गया कि मोर पकड़े जाने का डर है। इसलिए सोचा कि जरूर बादशाह मोर को पकड़ कर प्यार से इस पर हाथ फेरता होगा। यह बात यूसुफ के हक में अच्छी साबित हुई क्योंकि मोर ने कथन शोर मचाया था। और यूसुफ मोर को बगल में दबाए तेजी से वापस इसी जगह की तरफ बढ़ता गया जहां से उतरा था।

वहां पहुंचकर इसने इधर-उधर देखा और फिर इसे अंदर की तरफ एक बड़ा दरख्त दीवार के साथ लगा हुआ नजर आया। यूसुफ इस बड़े दरख्त पर चढ़ा और फिर वह दीवार पर पहुंच गया। दीवार पर पहुंचकर वह इसी जगह आया जहां इसका घोड़ा बांधा था। वहां पहुंचकर वह दरख्त के जरिए नीचे उतरा और फिर इसने घोड़ा छोड़ा और उछलकर इस पर सवार हो गया। और जहां इसका पास मौजूद था, घोड़े पर सवार होते ही इसने इसे ईड़ लगाई और इसका रुख इस तरफ कर दिया जहां से वह कूफा में दाखिल हुआ था क्योंकि आते वक्त इसने रास्ता अच्छी तरह देख लिया था। इसलिए वह बड़े यकीन से आगे बढ़ता चला गया।

घोड़े की रफ्तार काफी तेज थी। इसलिए वह जल्दी कूफा शहर पहुंचने में कामयाब हो गया। मगर शहर के दरवाजे पर पहरेदारों ने इसे रोक लिया।

"तुम बाहर ना जा सकते और यह मोर हजार रंग तुम ले जा रहे हो।" एक पहरेदार ने सख्त लहजे में कहा।

"यह मोर बादशाह ने मेरे हीरे के बदले में इनाम के तौर पर दिया है और अब मैं कूफा शहर करके वापस जा रहा हूं तो तुम मुझे ना रोक सकते।" यूसुफ ने बहुत एतमाद से कहा।

"हमारे पास बादशाह का यह हुक्म अभी ना पहुंचा कि तुम्हें मोड़ समीत बाहर जाने दिया जाए। इसलिए या तो तुम वापस जाओ या फिर हम पकड़ कर तुम्हें बादशाह के पास ले जाएंगे।" पहरेदार ने समझाया।

तिरस से पहले कि कोई जवाब देता इसे दूरशाही महल में बेपनाह शोर सुनाई दिया और समझ गया कि मोर की गुमशुदगी का राज खुल गया है और अगर इसने जल्दी ना की तो वह पकड़ा जाएगा और फिर इसे मौत से दुनिया की कोई ताकत ना बचा सकती। दूसरे देव ने भी शोर सुना और वह चौंक कर इधर देखे। इस मौके को गनीमत दानिश्ता युसुफ ने अपने घोड़े को ईड लगाई और घोड़ा बिजली की रफ्तार से आगे बढ़ा। घोड़ा तेजी से चट्टान फलांगता पहाड़ से नीचे उतर रहा था। मगर फिर भी यूसुफ जानता था कि वह ज्यादा देर इन देव से ना बच सकेगा था। इसलिए इसने चीख मारकर कहा "ए अफरीद मेरे दोस्त मुझे बचा।"

उसी वक्त इसके कानों में अफरीद की आवाज गूंजी।

"आंखें बंद करो।" और यूसुफ ने आंखें बंद कर ली। दूसरे लम्हे इसे ऐसा लगा जैसे वह घोड़े के बजाय हवा में तैर रहा हो। थोड़ी देर बाद इसके कदम जमीन पर टिक गए।

"आंखें खोलो।" अवरीद की आवाज सुनाई दी।

यूसुफ ने आंखें खोली और खुशी से उछल पड़ा। वह फरीद के महल में पहुंच चुका था और मोर हजार रंग अभी तक इसकी बगल में मुसत था।

"मुबारक हो यूसुफ। तुम तीसरी शर्त पूरी करने में भी कामयाब हो गए।" अफरीद ने मुस्कुराते हुए कहा।

"अफरीद कूफा के देव का बादशाह यहां तो ना आएगा।" यूसुफ ने डरतेडरते पूछा।

"अरे ना कूफा शहर से बाहर तो कोई कुछ ना कर सकता।" अफरीद ने तसल्ली दिया।

फिर यूसुफ ने इसे तमाम हाल बताया और जब इसने बताया कि वह हीरा वापस ले आया है तो अफरीद बहुत खुश हुआ। यूसुफ ने हीरा निकालकर अफरीद के सामने रख दिया।

"यह हीरा अब मैं तुम्हारी दुल्हन को अपनी तरफ से तहफे में दूंगा।" अफरीद ने कहा।

"अब मुझे जल्द से जल्द शहजादी के पास पहुंचा दो।" यूसुफ ने कहा।

"बेसब्री ना करो। आज यहां आराम करो कल चलेंगे मैं तुम्हारे साथ जाऊंगा।" अफरीद ने मुस्कुराते हुए कहा और यूसुफ इहसार कर गया। फिर खाने के बाद इसे आराम का कहा गया और वह बिस्तर पर लेट कर सो गया।

"क्या यूसुफ फौरन सोए हुए यूसुफ के कानों में अफरीद की आवाज आई? और यूसुफ ने चौंक कर आंखें खोल दी और दर्द के मारे उठकर बैठ गया। इसे देखकर हैरान रह गया कि वह एक जंगल में मौजूद है। वह अफरीद के करीब है और शेरनी के दूध से भरा लोटा और मोर हजार रंग भी वहीं थे।"

"उठो यूसुफ सामने तुम्हारी शहजादी लैला का शहर है।" अफरीद ने मुस्कुराते हुए कहा और यूसुफ खुशी से उछल कर खड़ा हो गया।

"ऐसा करो कि मुझे अपनी जीभ में डाल दो और निकल पड़े।" अफरीद ने कहा। यूसुफ ने इसे उठाकर जीभ में रख लिया और फिर इसने मोर हजार रंग को पकड़ कर बगल में दबाया और दूसरे हाथ से शेरनी के दूध का लोटा उठाकर शहर की तरफ चल पड़ा क्योंकि शहर वालों को अफरीद के बारे में पता था इसलिए उन्होंने जब अफरीद हजार रंग के साथ देखा तो तमाम शहर में शोर मच गया एक आदमी इसके पीछे चलने लगा। सिपाहियों ने बादशाह तक खबर पहुंचा दी। बादशाह ने फौरन दरबार लगाने का हुक्म दिया और शहजादी को बुला लिया कि आप आइए।

जब यूसुफ महल में पहुंचा तो बादशाह और शहजादी दरबार में मौजूद थे। यूसुफ की जब शहजादी पर नजर पड़ी तो शहजादी के चेहरे पर अफसोस का तसवुर उठा क्योंकि इसे यकीन था कि यूसुफ इतनी जल्दी तीनों शर्तें पूरी ना कर सकता। इसके लिए इसे जूते खाने पड़ेंगे। अगर यूसुफ शहजादी को देखकर मुस्कुराया और फिर अदब से झुककर बादशाह को सलाम किया।

"नौजवान क्या तुम तीनों शर्तें पूरी करने में कामयाब हो गए हो?" बादशाह ने सवाल किया।

"जी हां हुजूर मैंने शर्तें पूरी कर दी हैं।" यूसुफ ने यकीन से जवाब दिया।

"पेश करो।" बादशाह ने कहा और यह सुनकर तमाम दरबारी हैरत से भर गए।

यूसुफ ने आगे बढ़कर पहले मोर हजार रंग बादशाह के सामने रख दिया। बादशाह ने मोर को पकड़ कर हैरत से देखा और बेहद इसकी खूबसूरती की तारीफ करने लगा। इसने इसके एक-एक पर को अच्छी तरह उंगली रगड़ कर देखा कि कहीं कृत्रिम तो ना लगा गया मगर मोर असली था। इसने मोर शहजादी की तरफ बढ़ाया और शहजादी ने मोर को गोद में लेकर प्यार से इस पर हाथ फेरा। इसके चेहरे पर खुशी के तजरात थे।

"ठीक है तुम पहली शर्त में कामयाब हो गए।"

"दूसरी शर्त।" बादशाह ने कहा और यूसुफ ने शेरनी के दूध से भरा हुआ लोटा पेश कर दिया। बादशाह ने देखा फिर अपने शिकारी को कहा कि दूध को किसी खुले बर्तन में डाल दिया जाए और फिर शाही चिड़िया घर से शेर का पालतू बछड़ा ले लाया जाए। जल्द ही बादशाह के हुक्म की तामील हुई। शेर के बच्चे को जब दूध पिलाया गया तो वह फौरन पीने लगा और शहजादी के चेहरे पर खुशी का तसवुर आ गया।

"यूसुफ दूसरी तरफ भी पूरी कर चुका है।"

"ठीक है नवजवान तुमने तो शर्तें पूरी कर दी। अब तुम तीसरी शर्त के मुताबिक 6 इंच का आदमी पेश करो।" बादशाह ने कहा और यूसुफ ने जीभ में हाथ डालकर अफरीद को बाहर निकाला और इसे हथेली पर रखकर बादशाह की तरफ बढ़ा दिया। बादशाह ने अफरीद को अपनी हथेली पर उठाकर इसे गौर से देखा और फिर मुस्कुराते हुए सलाम किया और अफरीद गायब हो गया।

शहजादी के चेहरे पर खुशी का विपन आ गया क्योंकि इसका पसंदीदा नवजवान नामुमकिन शर्तें पूरी करने में कामयाब हो गया था।

"ठीक है नवजवान तुम कामयाब हो गए हो मुबारक हो।" बादशाह ने ऐलान किया और इसके साथ ही तमाम शहर में खुशियों के शामियाने बिछने लगे। फिर बादशाह ने शहजादी की तरफ देखा और फिर शहजादी ने मुस्कुराकर रज्जामंदी के तौर पर सर हिलाया और इसके साथ ही बादशाह ने तीन दिन बाद शहजादा यूसुफ और शहजादी की शादी का ऐलान कर दिया और एक हफ्ते तक मुल्क में जश्न मनाने की इजाजत दी। इसके साथ ही दरबार बर्खास्त हो गया।

बादशाह शहजादी और यूसुफ आरामगाह की तरफ चल पड़े। शहजादी मोरज़ार रंग को लेकर अपने महल की तरफ चली गई। आरामगाह में पहुंचकर यूसुफ ने बादशाह को तमाम हाल बताया और अफरीद का तारुफ करवाया। बादशाह बहुत खुश हुआ और अफरीद ने भी बादशाह से दोस्ती का ऐलान करते हुए कहा, "अब आइंदा कोई ताकत इस शहर पर हमला ना कर सकती।"

फिर तीन दिन बाद यूसुफ और शहजादी लैला की शादी बड़े धूमधाम से हो गई। पूरे मुल्क में खुशी का जश्न मनाया गया और शादी के मौके पर अफरीब ने दुनिया का कीमती छह रुखसार वाला हीरा शहजादी लैला को तहफे के तौर पर दिया। शहजादी बहुत खुश हुई। बादशाह ने भी शादी के बाद तख्त ताज युसुफ के हवाले कर दिया और खुद इबादत में मशगूल हो गया। अब यूसुफ शहजादा से एक तरफ बादशाह बन गया। वह दोनों कुरम जिंदगी गुजारने लगे। और बादशाह यूसुफ ने अपने वालिद और भाइयों को अपना दरबार बुलाया। शादी बहुत प्रोफाइल और आतिशबाजी पर बेपनाह खर्च किया। अब वह अकबर से अपनी सहेलियों को कह सकती थी कि इसने दुनिया के सबसे बहादुर मस्तकल मिर्च और बे हिम्मत नवजवान से शादी की।

अफरीद कभी कभार वह उनसे मिलने आ जाता और वह कभी कभार दोनों को हवा में उड़ाकर मेहमान बन जाते थे। इस तरह की जिंदगी ऐशो इशरत और होशियार मसरत से गुजरने लगी।