Transcription
वैसे जप की दृष्टि से वाचिक जप की अपेक्षा उपाम जप इतने जोर से बोले कि स्वयं सुनाई पर मनुस्मृति से बोल रहा हूं। इतने जोर से बोले स्वयं सुनाई परे। उपा ठ जी बहुत धीरे से। मन वैरी वा वैरी जप की अपेक्षा उपा जप का अधिक फल होता। मन एकाग्र हो तो उपास जप की अपेक्षा मानस जप। अब शब्द तो है वाक इंद्री का योग नहीं है। मन ही मन राम कृष्ण शिव चल रहा है। ये मध्यमा वाक हुआ ना।
कृष्ण बौद्ध आश्रम जी महाराज जो श मत के शंकराचार्य जी आंख मीच लेते थे। सुबह सवा घंटे उपनिषदों के शास्त्रों के वचन याद थे उसको मन से पाठ करते। इतना मन उनका एकाग्र और 30 या 40 दिन में जाकर एक आवृत्ति होती थी। इतना वचन उनको याद था शास्त्र सवा घंटे। आज जितना दूसरे दिन उससे आगे मन से। इतना मन एकाग्र था। वाणी का योग ना करें तो मन भटक जाता है। लेकिन को मन पर इतना नियंत्रण था जितना उनको शास्त्रों का वचन याद था। भगवत परक धर्म परक वह सब जाकर 30 दिन या 40 दिन में एक आवृत्ति कर पाते थे। मान लीजिए सवा घंटे रोज 30 घंटे हो गए तो कितने हो गए। इतने घंटे की सामग्री उनके मन में सनि तो मानस जप का अधिक महत्व हो गया।
और लो आठ मास मुख जपे 16 मास कंठ जाप 32 मास हदय जपे फिर नाभी से 64 मास। फिर क्या होता रग रग बोले राम। इन्होने लिखा चरण दास चरण दास जीने आठ मास मुखो जपे बैकरी बा 16 मास कंठ जाप दुगुना 32 मास हृदय से जपे 64 मास नाभी से जपे तब क्या हो जाता है रगर बोले राम।
फूल चोर बा को देखा है ना दाढी वाले नहीं ध्यान नहीं होगा। 108 वर्ष के कितने थे व ना यह बताते थे कहां के हैं ना किस जाति के हैं। गोरे चट्टे महात्मा हमको मालूम था व लीलाधर जी ने बताया मुल्तान के थे खत्री थे। उन्होंने हमको बताया अरे यार कहके बोलते थे। कोई पांव छूले तो लात मार देते थे और जो पाव छू ले और मार दे उसका काम सिद्ध हो जाता। फोटो खींच ले तो काल बन जाते थे ना उनका कोई फोटो खींच सकता उनके सामने किसी का खींच सकता। और फिर दुर्वासा बन जाते। फूल चुराकर ही बिहारी जी को देते थे। कोई इतना फूल दे देगा फेंक देते। फूल चुराने जाते थे लोग पिटाई भी हो जाती थी। फिर चुरा के जो फूल लेंगे वही बिहारी जी को इसलिए उनका नाम फूल चोर बाबा था। और बंबई भी में जाते थे भिक्षा मांग के पाते। किसी वृंदावन में एक जगह उनकी सामग्री नहीं उस आश्रम में इतने अलबरी वो एक जगह भोजन भी नहीं करते थे। बहु गुण उन्होंने हमसे कहा देख सुन ले ऐसे बोलते थे।
नर्मदा तट पर में घूम रहा था युवक था। सूर्यास्त के समय बाबा ऐसा लेटा हुआ था जगा था। मैंने कहा बाबा बनाया राम राम जप फल चरवा भगवान का भजन कर सूरत के समय लेटा है लाज नहीं आती। वह ऐसे देखकर मुस्कुरा दिया। फिर इन्होंने कहा सूरत के समय लेटा हुआ है नर्मदा की त उठ भजन कर। फिर उन्होंने मुस्कुरा दिया। फिर तीसरी बार क उन्होने कहा इधर आ यहां कान लगा यहां कान लगा यहां कान लगा जहां कान लगावे राम राम। तब उन्होने पांव पकड़ लिया कि मेरी भूल थी।
करवी वाया किसकी थी ना एक जा रहे थे सिद्ध महात्मा दो दो चार माताएं आपस में लड़ रही थ कंडे होते ना गोबर के उपले हमारे कंडे तुमने चुरा लि हमारे चने चुना लिए व सिद्ध थी उसी के दर्शन के लिए कोई संत आ रहे थे। न ने कहा कि वह है वो अरे वो सिद्ध है व लड़ झगड़ रही आपस में वो समझ गई बाबा इधर आ तू न्याय कर दे यह जो सौत है यह कहती है तेरे कंडे नहीं है मेरे कंडे मुझको दे दे कैसे दू मुझे तो कुछ पता नहीं। जिस कंडे से राम निकले वो समझो ये मेरे कंडे तो देखा जितने कंडे से राम राम निकले उतने अलग कर दिया। अब कहा देख तूने मिला लिया लेकिन हमने इस बाबा के द्वारा अलग करवा दिया यह हुआ ना कंडे में भी राम घुस गया रग रग बोले राम।
इसलिए आठ मास फिर इतना ना करे तो एक दो एक दो चार आ 16 का अनुपात बना ले मिनट एक मिनट बैकरी दो मिनट उपांशु चार मिनट मन से हृदय से और फिर हा कंठ से दो ज दोनों यही से हो फिर कंठ से फिर हदय से फिर नाभी से तो एक दो चार आ 16 एक दो चार आ 16 ये क्रम बना ले। एक ही जप के दो भेद हो गए बैकरी और पामस तो क्या है फिर धीरे धीरे रग रग बोले राम राममय हो जाता उसका शरीर अर्थात स्थूल शरीर में मन की इतना मन के द्वारा जप किया हुआ जो है उससे पक जाता है स्थूल शरीर स्थूल शरीर में भी मंत्र का संचार हो जाता है क्योंकि प्राण का संचार है या नहीं।
प्राण के सहारे मंत्र का जप करते करते क्या होता है प्राण में जो मंत्र का सनिवेशालु आठ मांस कंठ जाप मुख के ही दो भेद हो गए जरा कुछ जोर से राम राम ऐसे राम राम राम कंठ से हो गया फिर उसके बाद हृदय से फिर उसके बाद नाभी से तो यहां क्या बखरी मध्यमा कंठ को में मन को ले आईए तो क्या होगा हमारी य बीमारी खत्म हो जाएगी हम हल जानते हैं लेन कष्ट पाते रहते हैं देखने पड़ने में इतना मन लगा रहता कि दूसरे को बता दे तो लाभ हो जाए अपने लिए नहीं करते। कंठ कप में मन को लाकर पाच मिनट भी रो ध्यान करेंगे प्यास खत्म हो जाएगी सीमित रह जाए य महीने यहां से माने आठ मिनट हृदय से क्या हुआ बैकरी मध्यमा पश्यंति हृदय से यहां यह क्रम फिर नाभि से नाभि में कुंडलिनी शक्ति है वहां जाकर परा वाक का रूप हो जाता है।
अब जिसको परा वाक से मन को मिला देने का ज्ञान हो गया वह फिर जो लिखेगा व समाधि भाषा में उस का लेख माना जाए यह पकड़ लिया था हमको श्रृंगेरी में यह जो गोपाल कृष्ण मूर्ति यह जो आपके हैं गीता पर यह तो व कश्मीरी वेदांती बहुत अच्छे थे यह तो परा वाक में गति ना होने पर कोई लिख नहीं सकता है शंकराचार्य ने लगाया था सिंगरी वाले की इनके सब सुनो रिपोर्ट दो रोज क्या क्या लिखा तो हमने कहा आप समझ तो हम क्या बता परावा परावा व वहा गणेश जी का स्थान है या नहीं सट चक्र भेदन है ना सट चक्र में फिर इतने जब इस दे इस देवता को समर्पित अजपा जाप तंत्रों में होता है ना इतने हजार जप होते हैं रोज प्राण के द्वारा।
अब बुद्धि पूर्वक भी एक एक चक्र में जो देवता है उनको नित्य समर्पित कर दे बुद्धि से तो स्वाभाविक जो जप होता है उसका फल मिल जाता है अजपा जाप स्वास की जितनी गति है स्वस्थ व्यक्ति के जीवन में उपनिषद में भी लिखा है जितने बार स्वास चलते हैं उतने बार जप होता है और जप तो होता है हम जाने या ना जाने सो हम हम स सो हम हम स सो हम जब रहता है जहां क्रिया है वहां शब्द है जहां गति है वहां शब्द है प्राण स्पंदन है तो वहां जप होता है स्वाभाविक रूप से सोहम हमसा हमसा सोहम सोहम हम स हमसा सोहम होता है वो बुद्धि पूर्वक फिर सत चक्र में जो जो देवता है किस चक्र में कौन उनको समर्पित कर दिया जाए तो 24 घंटे में जो अजपा जाप बिना बुद्धि पूर्वक जप होता है उसका फल बट्टे खाते मिल जाता लो जब तो होही रहा है लेकिन जब की संख्या निर्धारित की गई है तब त चक्र के देवता का नाम है उतना जप करने का बुद्धि पूर्वक जप करने का फल मिल जाता।
इतना बहुत कह दिया यह सब तो गुरु लोग 10 द वर्ष तक सेवा करा के कचूमर निकाल के भी य सब नहीं बताते जो हमने आपको ऐसे ही बता दिया साल सेवा लेकर के भी मुश्किल से जो एक एक बात बताते व हमने वैसे ही बता दिया।