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Ek Gareeb Mchuware Ka Sabr Aur Tawakkul Jisne Badal Di Taqdeer | Islamic Moral Story | Islamic Video

Mr. MR Voice 55:06

Transcription

बहुत समय पहले की बात है। वीराने का सन्नाटा और सब्र का इम्तिहान। एक वीरान साहिल के करीब, जहां खामोशी सिर्फ लहरों के शोर से टूटती थी, एक बहुत ही खस्ताहाल बस्ती आबाद थी। यह बस्ती इतनी पुरानी थी कि इसके बाशिंदे खुद भूल चुके थे कि यहां पहली ईंट कब रखी गई थी।

इसी बस्ती के आखिरी सिरे पर, जहां रेत के टीले समंदर की गीली मिट्टी से गले मिलते थे, एक कच्चा मकान खड़ा था। मकान क्या था? बस मिट्टी और खजूर के पत्तों का एक सहारा था, जो तेज हवा चलने पर कांप उठता था। यहां कासिम नाम का एक मछुआरा रहता था। कासिम की उम्र तो जवानी की दहलीज पार कर चुकी थी, मगर उसके चेहरे पर वक्त से पहले ही झुर्रियों का जाल बिछ गया था। यह झुर्रियां उम्र की नहीं, बल्कि उन दुश्वारियों की गवाह थीं जो उसने हर रोज सूरज निकलने से लेकर डूबने तक झेली थी। कासिम की कुल जमा पूंजी उसका पुराना जाल, एक छोटी सी टूटी-फूटी कश्ती और उसका अटूट सब्र था।

उसके घर में दो औरतें थीं, जो उसकी दुनिया थी। मगर दोनों दो अलग-अलग सिरों की तरह थीं। एक उसकी बूढ़ी मां जनाब, जिनकी आंखों की रोशनी मुद्दतों पहले आंसुओं और बीमारी ने छीन ली थी। वह घर के एक कोने में अपनी पुरानी चटाई पर बैठी तस्बीह फेरती रहती। उनकी जुबान पर हर वक्त अल्लाह का शुक्र और बेटे के लिए दुआएं होती थीं।

दूसरी तरफ कासिम की बीवी सलमा थी। सलमा का मिजाज रेगिस्तान की उस धूप जैसा था, जो बदन को झुलसा देती है। वह हर वक्त अपनी किस्मत को कोसती, गरीबी का रोना रोती और कासिम के वजूद को अपनी तानेबाजी से छलनी करती रहती।

घर में एक और जान थी, जो इंसान नहीं, मगर कासिम का सबसे वफादार साथी था। एक बाज। यह बाज उसे एक रोज जख्मी हालत में चट्टानों के बीच मिला था। कासिम ने उसका इलाज किया, उसे पाला और अब वह बाज, जिसे उसने शाहबाज नाम दिया था, उसकी कश्ती के मस्तूल पर बैठा रहता। कासिम की गरीबी का यह आलम था कि कई बार चूल्हा ठंडा रहता और पेट खाली, मगर शाहबाज के लिए वह हमेशा मछली का एक टुकड़ा जरूर बचाता।

वह सुबह भी हमेशा की तरह ही थी। फज्र की अजान फिजा में गूंज रही थी। कासिम अपनी चटाई से उठा, वजू किया और नमाज अदा की। मां के पास जाकर उनके घुटनों को हाथ लगाया। बूढ़ी जनाब ने कांपते हाथों से बेटे का सर टटोला और दुआ दी। "जा मेरे लाल। अल्लाह तेरे रिज़्क़ में बरकत दे और तुझे हर बला से महफूज रखे। याद रखना, सब्र का फल मीठा होता है, भले ही देर से मिले।"

कासिम ने मां के माथे को चूमा और कहा, "अम्मी जान, आपकी दुआ साथ है तो मुझे किसी तूफान का डर नहीं।"

अभी वह मुड़ा ही था कि सलमा की तेज आवाज ने सुबह के सुकून को चीर दिया। वह बर्तन पटकते हुए बोली, "दुआएं। बस दुआएं ही तो हैं इस घर में। खाने को तो सूखी रोटी का टुकड़ा भी नहीं। ए जी, कब तक यूं ही खयाली पुलाव पकाते रहोगे? कल पड़ोसी की बीवी नई रेशमी चादर ओढ़कर निकली थी और मैं... मैं वही फटे पुराने कपड़ों में। शर्म से पानी-पानी हो गई मैं। क्या इसीलिए निकाह किया था मैंने कि भूखे मरूं और दुनिया के ताने सुनूं?"

कासिम ने एक गहरी सांस ली, जैसे वह इस रोज-रोज के जहर का आदि हो चुका हो। उसने नरमी से जवाब दिया, "सलमा, अल्लाह पर भरोसा रख। वह रज़्ज़ाक है, देने वाला वही है। मैं कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ता, मगर समंदर की मर्जी पर किसी का ज़ोर नहीं। आज इंशाल्लाह जाल खाली नहीं आएगा।"

सलमा ने नफरत से मुंह फेर लिया और बड़बड़ाई, "रोज यही सुनते हैं। आज जाल खाली आया तो घर मत आना, या फिर मुझे इस घर में मत पाना।"

यह लफ्ज़ कासिम के दिल पर नश्तर की तरह लगे। मगर वह खामोश रहा। उसने अपना पुराना जालीदार थैला उठाया, शाहबाज को कंधे पर बिठाया और समंदर की तरफ चल पड़ा।

समंदर उस दिन कुछ अलग ही रंग में था। लहरें खामोश थीं और पानी का रंग गहरा नीला, लगभग काला सा लग रहा था। कासिम ने अपनी कश्ती को पानी में उतारा और चप्पू चलाने लगा। शाहबाज कश्ती के किनारे पर बैठा अपनी तेज नजरों से पानी को घूर रहा था। कासिम ने बिस्मिल्लाह कहकर जाल फेंका।

सूरज सर पर आ गया। धूप तेज हो गई। पसीना कासिम के जिस्म से बहकर कश्ती के तख्ते भिगोने लगा। उसने जाल खींचा, मगर वह हल्का था। सिर्फ कुछ छोटी मछलियां और ढेर सारी समुद्री घास। उसने दोबारा जाल फेंका, फिर खींचा। नतीजा वही नाकामी। दोपहर ढलने लगी और कासिम की उम्मीदें भी डूबने लगीं। उसे सलमा के ताने याद आने लगे। "आज जाल खाली आया तो घर मत आना।" यह वाक्य उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था। उसने आसमान की तरफ देखा और बेबसी से कहा, "यार रब, मेरी मां की लाज रख ले। मैं अपनी बीवी की कड़वी बातें सह सकता हूं, मगर मां को भूखा नहीं देख सकता।"

तभी शाहबाज ने एक अजीब सी आवाज निकाली और आसमान में उड़ गया। वह कश्ती के ऊपर चक्कर लगाने लगा और फिर अचानक कुछ दूर पानी की सतह के करीब गोता लगाने लगा। कासिम समझ गया कि शाहबाज ने कुछ देखा है। उसने अपनी थकी हुई बाजुओं में जान डाली और कश्ती को उस तरफ मोड़ दिया। वहां पहुंचकर कासिम ने देखा कि पानी की सतह पर कुछ हलचल हो रही है। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर आखिरी बार जाल फेंका। जाल पानी में जाते ही भारी हो गया। ऐसा लगा जैसे वह किसी चट्टान में फंस गया हो। कासिम ने खींचने की कोशिश की, मगर जाल टस से मस न हुआ। उसका दिल जोर से धड़कने लगा। क्या यह कोई बड़ी मछली है, या फिर जाल वाकई किसी पत्थर में उलझ गया है? उसने रस्सियों को अपने हाथों पर लपेटा और या अल्लाह कहकर ज़ोर लगाया। जाल धीरे-धीरे ऊपर आने लगा। पानी में बुलबुले उठने लगे।

जैसे ही जाल सतह पर आया, कासिम की आंखें फटी की फटी रह गईं। जाल में मछलियां नहीं थीं, बल्कि एक अजीब सी चीज फंसी हुई थी। यह पीतल का एक पुराना, जंग लगा संदूक था, जिस पर अजीबोगरीब नक्काशी की गई थी और उस पर एक बड़ा सा ताला लगा था। संदूक के साथ एक बड़ी सुनहरी मछली भी थी, जो आम मछलियों से बिल्कुल अलग थी। उसके जिस्म पर ऐसे निशान थे, जैसे किसी ने अरबी में कुछ लिखा हो और उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी।

कासिम ने कांपते हाथों से संदूक और मछली को कश्ती में खींचा। संदूक भारी था, मगर मछली का वज़न उससे भी ज़्यादा महसूस हो रहा था। शाहबाज वापस आकर संदूक पर बैठ गया और उसे अपनी चोंच से खटखटाने लगा। कासिम ने माथे का पसीना पूछा। वह हैरान था। यह संदूक यहां कहां से आया और यह मछली? ऐसी मछली उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं देखी थी। उसने सोचा, शायद इस संदूक में कोई खजाना हो, या शायद पुराने ज़माने के सिक्के। अगर ऐसा हुआ तो मेरी और मेरे घर की तकदीर बदल जाएगी। सलमा को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा और मां... मां के लिए हकीम से दवा ला सकूंगा।

लेकिन मछली... वह मछली अब भी तड़प नहीं रही थी, बल्कि कासिम को घूर रही थी। उसका मुंह खुला और बंद हुआ, जैसे वह कुछ कहना चाहती हो। कासिम को एक पल के लिए वहम हुआ कि मछली ने इंसानी आवाज़ निकाली, मगर उसने सर झटक दिया। "धूप की वजह से मेरा दिमाग फिर गया है," उसने खुद से कहा।

शाम का अंधेरा गिरने लगा था। उसे वापस लौटना था। उसने संदूक और मछली को एक पुराने टाट से ढक दिया और कश्ती को साहिल की तरफ मोड़ दिया। जब वह किनारे पर पहुंचा तो चांद निकल आया था। बस्ती में सन्नाटा था। वह भारी संदूक और मछली को लेकर किसी तरह घर पहुंचा।

दरवाजा खोलते ही सलमा सामने खड़ी थी। उसकी निगाहें सवालों से भरी थीं। "क्या लाए हो आज? या फिर से खाली हाथ और बहाने?" उसने तल्खी से पूछा।

कासिम ने बिना कुछ कहे संदूक ज़मीन पर रख दिया और टाट हटा दिया। पीतल की चमक और उस अजीब मछली को देखकर सलमा की आंखें फैल गईं। "यह... यह क्या है?" उसकी आवाज़ में हैरत थी। गुस्सा गायब हो चुका था।

"मुझे नहीं पता," कासिम ने हांफते हुए कहा। "समंदर ने आज मुझे यही दिया है।"

बूढ़ी मां ने आहट सुनी और पूछा, "बेटा कासिम, क्या लाया है? तेरी सांसे क्यों फूली हुई हैं?"

कासिम मां के पास जाकर कहा, "अम्मी, आज अल्लाह ने कुछ अलग ही दिया है। एक संदूक और एक अनोखी मछली।"

सलमा तुरंत संदूक के पास बैठ गई और ताला तोड़ने की कोशिश करने लगी। "अरे छोड़ो भी अम्मी को बताना," सलमा ने लालच भरी आवाज़ में कहा। "जल्दी से इसे खोलो। हो सकता है इसमें सोना हो, जवाहरात हो, हमारी गरीबी दूर हो जाएगी।"

कासिम ने संदूक का ताला देखा। वह बहुत मज़बूत था और उस पर कोई चाबी का सुराख नहीं था। बस एक अजीब सा निशान बना था। एक बाज का निशान। कासिम की नज़र कोने में बैठे अपने बाज शाहबाज पर गई। शाहबाज संदूक को एकटक देख रहा था। कासिम ने एक पत्थर उठाया और ताले पर मारने ही वाला था कि उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

"रुक जाओ। ए आदमज़ाद।" आवाज़ इतनी साफ और गूंजती हुई थी कि कासिम का हाथ हवा में ही जम गया। सलमा चीख पड़ी और पीछे हट गई। "कौन... कौन बोला?" कासिम ने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। फिर उसकी नज़र मछली पर पड़ी। मछली का मुंह हिल रहा था।

"लालच में आकर अपनी तबाही को दावत मत दो," मछली ने फिर कहा। अब यकीन करना मुश्किल नहीं था कि आवाज़ उसी मछली की थी। कासिम के रोंगटे खड़े हो गए। "या खुदा, यह क्या माजरा है?" उसने लड़खड़ाती जुबान से कहा।

मां जैना, जो देख नहीं सकती थी, लेकिन उनकी रूह ने कुछ महसूस कर लिया था। वह घबरा कर बोली, "बेटा, यह कैसी आवाज़ है? मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा। इस चीज़ को घर से बाहर निकाल दे।"

लेकिन सलमा का लालच उसके खौफ पर भारी पड़ गया था। वह चिल्लाई, "चुप रहो बुढ़िया। यह कोई शैतानी चाल नहीं, बल्कि हमारी किस्मत है। मछली बोलती है तो बोलने दो। हम इसे बाज़ार में नुमाइश के लिए बेचेंगे। लोग इसे देखने के लिए दीनार लुटाएंगे और यह संदूक... इसे तो मैं खोल कर ही रहूंगी।"

कासिम दुविधा में था। एक तरफ मां का डर और मछली की चेतावनी। दूसरी तरफ सलमा की ज़िद और गरीबी से छुटकारा पाने की उम्मीद। उसने मछली की तरफ देखा और पूछा, "तू कौन है? और इस संदूक में क्या है?"

मछली ने अपनी सुनहरी आंखों से उसे देखा और कहा, "मैं समंदर के राज़ों की निगहबान हूं और इस संदूक में वो है जो तुम्हारी किस्मत बदल सकता है, लेकिन यह तुम्हारी नियत का इम्तिहान भी लेगा। अगर तुम लालच से पाक होकर इसे खोलोगे तो खैर पाओगे, लेकिन अगर दिल में खोट हुआ तो यह घर वीरान हो जाएगा। याद रखना, जो मिला है उस पर शुक्र करना, वरना जो है वह भी खो दोगे।"

सलमा ने नफरत से कहा, "बकवास बंद। कासिम, तोड़ दे इस ताले को। मैं कहती हूं तोड़ दे।"

कासिम ने एक पल के लिए सोचा। उसकी मां तस्बीह तेज़-तेज़ पढ़ने लगी। बाज ने पंख फड़फड़ाए और एक तीखी चीख मारी। कासिम ने पत्थर उठाया और पूरी ताकत से ताले पर दे मारा। एक चिंगारी निकली, हिली और एक जोरदार खट की आवाज़ के साथ ताला टूट गया।

संदूक का ढक्कन धीरे-धीरे खुलने लगा। अंदर से एक तेज रोशनी निकली, जिसने पूरे कमरे को जगमगा दिया। सलमा की आंखों में लालच की चमक थी। मां के चेहरे पर खौफ था और कासिम... कासिम बस हक्का-बक्का होकर उस रोशनी को देख रहा था। यह जाने बिना कि उसने अभी-अभी अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े तूफान को आज़ाद कर दिया है।

लालच का पत्थर और खामोश चेतावनी। सलमा की आंखों में लालच की चमक थी। मां के चेहरे पर खौफ था। और कासिम... कासिम बस हक्का-बक्का होकर उस रोशनी को देख रहा था, जो संदूक के भीतर से फूट रही थी। मगर धीरे-धीरे वह तेज रोशनी सिमटने लगी और कमरे में वापस वही पुरानी लालटेन की मध्यम पीली रोशनी छा गई।

जब कासिम की आंखें उस चमक से संभलीं, तो उसने देखा कि संदूक खाली नहीं था। लेकिन उसमें सोने के सिक्कों का ढेर भी नहीं था, जैसा सलमा ने सोचा था। संदूक के बीचों-बीच, गहरे काले मखमल के कपड़े पर, एक मुट्ठी के बराबर सुर्ख लाल रंग का एक पत्थर रखा हुआ था। वह कोई मामूली पत्थर नहीं था। वह याकूत रूबी जैसा लग रहा था, मगर उसकी रंगत खून जैसी गाढ़ी थी और उसके अंदर एक अजीब सी हरकत हो रही थी, जैसे पत्थर के भीतर कोई दिल धड़क रहा हो। उस याकूत के पास ही एक पुराना, पीला पड़ चुका चमड़े का कागज़ रखा था, जिस पर ऐसी तहरीर लिखी थी, जो सदियों पुरानी मालूम होती थी।

सलमा, जो सिक्कों की उम्मीद लगाए बैठी थी, पहले तो मायूस हुई। उसका चेहरा लटक गया और वह झुंझला कर बोली, "बस इतनी मशक्कत, इतना ड्रामा और निकला क्या? एक पत्थर? ए जी, क्या हमारी किस्मत में बस पत्थर ढोना ही लिखा है?"

लेकिन कासिम की नज़र उस पत्थर से हट नहीं रही थी। उसे महसूस हो रहा था, जैसे वह पत्थर उसे अपनी तरफ खींच रहा है। उसने डरते-डरते हाथ बढ़ाया और उस लाल याकूत को उठा लिया। पत्थर छूते ही उसे एक अजीब सी गर्मी महसूस हुई, जो उसकी उंगलियों से होती हुई सीधे उसके दिल तक पहुंच गई।

तभी कोने में रखी उस सुनहरी मछली ने फिर से हरकत की। पानी में एक तेज छपाक की आवाज़ आई और मछली ने अपना सर पानी से बाहर निकाला। उसकी आवाज़ अब पहले से ज़्यादा गंभीर और चेतावनी भरी थी। "ए कासिम, यह संग-ए-इब्तला है। आज़माइश का पत्थर। यह बादशाहों के ताज की ज़ीनत भी बन सकता है, और किसी बदनसीब के गले का फंदा भी। इसे अपने घर में मत रखो। यह उस दौलत की चाबी है, जिसके पीछे तबाही का साया चलता है। इसे वहीं दफ़न कर दो, जहां से लाए हो, या किसी ऐसे के हवाले करो, जो इसका हक़दार हो।"

कासिम के हाथ कांप गए। वह पत्थर को वापस रखने ही वाला था कि सलमा ने झपट्टा मारकर वह पत्थर उसके हाथ से छीन लिया। उसकी आंखों में अब हवस और जुनून था। वह पत्थर को रोशनी में घुमा-घुमा कर देखने लगी। "पागल हो गए हो तुम दोनों," सलमा चीखी। "मछली की बातों में आकर अपनी अक्ल खो बैठे हो। कासिम, गौर से देखो इसे। यह बाज़ार के ज़हरीयों की दुकान में रखे पत्थरों से हज़ार गुना ज़्यादा कीमती है। इसे बेचकर हम शाही महल जैसा मकान बनवा सकते हैं। मेरे जिस्म पर रेशमी लिबास होंगे। हमारे आगे-पीछे नौकर-चाकर होंगे। और तुम... तुम इसे फेंकने की बात कर रहे हो।"

बूढ़ी मां जैनाब ने अपनी जगह से ही कांपती आवाज़ में कहा, "बहू, ज़िद मत कर। मुझे इस चीज़ से खून की बू आ रही है। यह हमारे लिए नहीं है। परायों की अमानत में खयानत और ऐसी तिलिस्मी चीज़ें गरीबों को रास नहीं आतीं। कासिम बेटा, मेरी मान, इस बला को घर से दूर कर दे।"

मगर सलमा पर तो जैसे लालच का भूत सवार था। उसने मछली की तरफ नफरत से देखा और पास पड़ा एक मोटा कपड़ा मछली के बर्तन पर डाल दिया। "बहुत बोलती है यह मनहूस मछली। कल सबसे पहले इसे ही पकाऊंगी। और रही बात इस पत्थर की, तो सुबह होते ही कासिम, तुम शहर जाओगे। शहर के सबसे बड़े ज़हरी शेख मंसूर के पास। सुना है वह बादशाहों के लिए जेवरात बनाते हैं। वही इसकी सही कीमत देंगे।"

रात गहरा गई थी, मगर उस टूटी झोपड़ी में नींद किसी को नहीं आई। कासिम अपनी चटाई पर करवटें बदलता रहा। उसे बार-बार ऐसा लगता, जैसे संदूक के अंदर से फुसफुसाने की आवाज़ें आ रही हों। कभी उसे लगता कि छत पर कोई भारी कदमों से चल रहा है। उसका वफादार बाज शाहबाज भी पूरी रात सो नहीं पाया। वह अपनी जगह पर बैठा हुआ गर्दन घुमाकर उस संदूक को घूरता रहा। उसकी आंखों में एक शिकारी जैसी चौकसी थी।

उधर सलमा ने उस याकूत को अपने सीने से लगाकर रखा था, जैसे कोई मां अपने बच्चे को थामे हो। वह पूरी रात जागती रही, अपनी आने वाली अमीरी के सपने बुनती रही। कभी वह खुद को हीरों के हार पहने देखती, तो कभी कासिम को शाही लिबास में। मगर उन सपनों में कहीं भी कासिम की बूढ़ी मां और वह बाज शामिल नहीं थे।

जैसे-तैसे रात गुज़री और पूरब से सूरज की पहली किरण फूटी। सुबह होते ही सलमा ने कासिम को झिंझोड़ कर उठाया। "उठो, देर मत करो। शहर का रास्ता लंबा है। यह लो।" उसने पत्थर को एक पुराने रुमाल में लपेट कर कासिम की हथेली पर रखा। "खबरदार जो इसे सस्ते में बेचा। इसकी कीमत इतनी मांगना कि हमारी सात पुश्तें बैठकर खाएं।"

कासिम ने भारी मन से पत्थर अपनी जेब में रखा। उसने मां के पैर छुए। मां ने कुछ नहीं कहा। बस खामोशी से उसके सर पर हाथ रख दिया। मगर उनके चेहरे की उदासी बता रही थी कि उनका दिल किसी अनहोनी से डरा हुआ है। कासिम ने शाहबाज को अपने कंधे पर बिठाना चाहा, मगर बाज ने पहली बार उसके पास आने से इंकार कर दिया और उड़कर घर की छत पर जा बैठा। यह कासिम के लिए दूसरा झटका था। "शायद यह भी मुझसे नाराज़ है," उसने सोचा। उसने मछली के बर्तन से कपड़ा हटाया। मछली अब खामोश थी। वह पानी की तह में जाकर बैठ गई थी और बिल्कुल पत्थर की मूरत लग रही थी। कासिम ने एक गहरी आह भरी। "अल्लाह, अल्लाह मालिक है।" और घर से निकल पड़ा।

रेगिस्तान का सफर दुश्वार था। मगर कासिम के कदमों में आज एक अजीब सी तेज़ी थी। शायद उस पत्थर का असर था, या सलमा की बातों का दबाव। दोपहर होते-होते वह शहर की पनाहगाह में दाखिल हुआ। यह शहर कासिम की बस्ती से बिल्कुल अलग था। यहां ऊंची मीनारें थीं, बाज़ारों में बेतहाशा भीड़, मसालों और इत्र की मिली-जुली खुशबू और हर तरफ शोर-शराबा। अमीर सौदागर अपने ऊंटों और घोड़ों पर सवार होकर गुज़र रहे थे और गरीब मज़दूर उनके रास्तों से हट रहे थे। कासिम ने अपनी फटी हुई कमीज़ को संभालने की कोशिश की और लोगों से ज़हरीयों के बाज़ार का रास्ता पूछता हुआ आगे बढ़ा। हर कोई उसे हिकारत की नज़र से देखता, मगर उसे इसकी परवाह नहीं थी। उसकी जेब में जो पत्थर था, वह उसे इन सबसे ऊपर महसूस करा रहा था।

चलते-चलते वह एक आलीशान दुकान के सामने पहुंचा। यह दुकान बाकी दुकानों से अलग थी। इसका दरवाज़ा आबनूस की लकड़ी का बना था और उस पर चांदी का काम किया गया था। ऊपर सुनहरे अक्षरों में लिखा था: "शेख मंसूर अल ज़हरी"। कासिम ने एक बार अपनी जेब टटोली, पत्थर की मौजूदगी महसूस की और बिस्मिल्लाह कहकर दुकान की सीढ़ियां चढ़ने लगा।

दुकान के अंदर ठंडक थी और चारों तरफ कांच की अलमारियों में कीमती ज़ेवरात सजे हुए थे। एक गद्दी पर एक भारी-भरकम शख्स बैठा था, जिसकी उंगलियों में कई अंगूठियां थीं और आंखों पर एक मोटा चश्मा चढ़ा हुआ था। वह एक मोती को लेंस से परख रहा था। यह शेख मंसूर थे। उनके पास दो मुहाफ़िज़ नंगी तलवारें लिए खड़े थे। कासिम को अंदर आते देख एक मुहाफ़िज़ ने उसे रोका और कड़कती आवाज़ में कहा, "ए फकीर, यह खैरात का अड्डा नहीं है। बाहर निकल यहां से।"

कासिम सहम गया। मगर उसने हिम्मत जुटाकर कहा, "मैं भीख मांगने नहीं आया। मैं शेख साहब से तिजारत (व्यापार) करने आया हूं। मेरे पास एक ऐसी चीज़ है, जो शायद उनकी पूरी दुकान से ज़्यादा कीमती है।"

यह सुनकर शेख मंसूर ने सर उठाया। उनकी आंखों में एक तंजिया मुस्कान थी। उन्होंने हाथ के इशारे से मुहाफ़िज़ को पीछे हटने को कहा और अपनी भारी आवाज़ में बोले, "अरे वाह, एक मछुआरा और शाही खजाने की बात। दिलचस्प। आओ, नज़दीक आओ। दिखाओ, ऐसा क्या नायाब ले आए हो तुम समंदर की गहराइयों से? कोई सीप या उगा हुआ पत्थर?"

कासिम धीरे-धीरे आगे बढ़ा और मेज़ के सामने खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से वह मैला-कुचैला रुमाल निकाला। शेख मंसूर के चेहरे पर अभी भी मज़ाक का भाव था, लेकिन जैसे ही कासिम ने रुमाल की गांठें खोलीं और वह सुर्ख याकूत मेज़ पर रखा, दुकान का माहौल यकायक बदल गया। उस पत्थर से एक हल्की सी लाल रोशनी निकली और कांच की चीज़ों पर उसका अक्स पड़ने लगा।

शेख मंसूर की हंसी उनके गले में ही अटक गई। उनका मुंह खुला का खुला रह गया। उन्होंने झपट कर अपना चश्मा ठीक किया और पत्थर को हाथ लगाने के लिए आगे बढ़े। मगर फिर रुक गए, जैसे उन्हें किसी करंट का डर हो। उनके मुंह से बेसाख्ता निकला, "यह... यह तो खून-ए-अजदहा (अजगर का खून) है। यह याकूत सदियों से गायब था। तू इसे कहां से लाया, ए बदबख्त?"

शेख की आवाज़ में अब मज़ाक नहीं, बल्कि एक खौफनाक संजीदगी और बेहिसाब लालच घुल गया था। कासिम ने घबराते हुए जवाब दिया, "जी, जी, मुझे यह समंदर में मिला। जाल में फंस गया था। क्या... क्या यह कीमती है?"

शेख मंसूर ने अपनी धूर्त नज़रों से पहले पत्थर को देखा। फिर कासिम के भोले चेहरे को। वह समझ गया कि इस मछुआरे को इस पत्थर की असलियत और इसकी बेहिसाब कीमत का कोई अंदाज़ा नहीं है। शेख ने अपने चेहरे के भाव बदले। एक झूठी मुस्कान ओढ़ी और बोले, "कीमती? हां, थोड़ा बहुत है। पुराना पत्थर है, लेकिन इसमें कई खामियां हैं। देखो, यहां दरार है और रंग..."

भी थोड़ा फीका है। फिर भी, क्योंकि तुम इतनी दूर से आए हो, मैं तुम्हें मायूस नहीं करूंगा। इसके बदले, मैं तुम्हें 100 दीनार दे सकता हूं।

100 दीनार! कासिम के लिए यह रकम पूरी जिंदगी की कमाई से भी ज्यादा थी। उसका दिल जोरों से धड़कने लगा। सलमा तो 10 दीनार में भी खुश हो जाती। उसने सोचा कि सौदा पक्का कर ले।

वह ना कहने ही वाला था कि अचानक दुकान के बाहर एक शोर मचा। घोड़ों की टापों की आवाज गूंजी और दुकान का दरवाजा जोर से खुला। एक नकाबपश आदमी, जिसका लिबास शाही सिपाहियों जैसा था। उसने जोर से ऐलान किया।

"शहर के कोतवाल का हुक्म है। बाजार बंद कर दिए जाएं। शाही खजाने से चोरी की खबर मिली है। हर दुकान और हर अजनबी की तलाशी ली जाएगी।"

शेख मंसूर का चेहरा पीला पड़ गया। उसने फौरन पत्थर पर अपना हाथ रख दिया ताकि उसे छुपा सके और कासिम की तरफ घूरते हुए फुसफुसाया। "निकल जा यहां से। अगर यह पत्थर सिपाहियों ने देख लिया तो तुझे और मुझे दोनों को सूली पर लटका देंगे। पिछले दरवाजे से भाग जा।"

लेकिन कासिम हक्का बक्का खड़ा रहा। उसके दिमाग में मछली की चेतावनी गूंजने लगी। "यह दौलत की चाबी है जिसके पीछे तबाही का साया चलता है।" क्या तबाही आ चुकी थी?

बाजार की भूल भुलैया और परछाइयों का पीछा। लेकिन कासिम हक्का बक्का खड़ा रहा कि शेख मंसूर का चेहरा, जो पल भर पहले लालच से तमतमा रहा था, अब खौफ से पड़ गया। शाही सिपाहियों और चोरी का लफ्ज सुनते ही उस जहरी की सारी हेकड़ी हवा हो गई। उसने बिजली की सी तेजी दिखाई, जो उसके भारीभरकम शरीर से उम्मीद ना थी। उसने मेज पर रखे उस सुर्ख याकूद को झपट कर उठाया और वापस कासिम के मैले रुमाल में ठूंस दिया।

"पागल! खड़ा क्या देख रहा है?" शेख मंसूर ने दबी हुई मगर घबराई हुई आवाज में फुसफुसाते हुए कहा। "यह पत्थर नहीं, मौत का परवाना है। अगर शाही निगबानों ने इसे मेरी दुकान में देख लिया तो मेरी गर्दन धड़ से अलग होगी और तुझे तो वो जिंदा दीवार में चुनवा देंगे। भाग यहां से, अपनी जान बचा और मेरी भी।"

इससे पहले कि कासिम कुछ समझ पाता या कोई सवाल करता, शेख ने उसे बाजू से पकड़ा और दुकान के पिछले हिस्से में मौजूद एक छोटे और अंधेरे रास्ते की तरफ धकेल दिया। "उस पिछले दरवाजे से निकल जा और पीछे मुड़कर मत देखना। और खबरदार, अगर किसी से मेरा नाम लिया तो मैं तुझे पाताल से भी ढूंढ निकालूंगा।"

कासिम किसी कठपुतली की तरह लड़खड़ाता हुआ उस तंग गलियारे में जा गिरा। पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई और फिर कुंडी लगाने की खटखट। अब वह दुकान के पीछे वाली एक बदबूदार और वीरान गली में खड़ा था, जहां कूड़े के ढेर लगे थे और आवारा बिल्लियां भोजन की तलाश में गुर्रा रही थीं। उसकी मुट्ठी में वह रुमाल अभी भी दबा हुआ था, जिसके अंदर वह मनहूस पत्थर अंगारे की तरह दहक रहा था।

कासिम का दिल पिंजरे में फड़फड़ाते पंछी की तरह धड़क रहा था। उसके माथे से पसीना बहकर आंखों में जा रहा था। उसने एक गहरी सांस ली, जिसमें सड़ी हुई सब्जियों और नालियों की बास थी, और फिर बेतहाशा दौड़ पड़ा। उसे नहीं पता था कि वह किस तरफ जा रहा है, बस इतना पता था कि उसे उस मनहूस जगह से दूर, बहुत दूर जाना है।

कासिम शहर की टेढ़ीमेढ़ी गलियों में भाग रहा था। यह शहर, जो सुबह उसे उम्मीदों का महल लग रहा था, अब किसी डरावनी भूल भुलैया जैसा महसूस हो रहा था। हर मोड़ पर उसे लगता कि शाही सिपाही खड़े हैं। बाजार की भीड़, जो पहले रौनक लग रही थी, अब उसे दुश्मनों का हुजूम लग रही थी। लोग उसे अजीब नजरों से देख रहे थे। एक फटे हाल मछुआरा, जो किसी चोर की तरह भाग रहा है और अपनी छाती से एक पोटली चिपकाए हुए है।

कई बार वह राहगीरों से टकराया। "अंधा है क्या?" एक तांगे वाले ने उसे चाबुक दिखाते हुए गाली दी। "माफ करना भाई," कासिम ने हांपते हुए कहा और भीड़ में गुम हो गया।

भागते-भागते वह शहर के पुराने हिस्से में पहुंच गया, जहां इमारतें खंडहरनुमा थीं और रास्ते संकरे। शाम का साया गहराने लगा था और अजान की आवाजें फिजा में गूंजने लगी थीं। मगर कासिम के कानों में तो सिर्फ शेख मंसूर के वो अल्फाज गूंज रहे थे। "चोरी की खबर, शाही खजाना, मौत।"

वह एक पुरानी मस्जिद की सीढ़ियों पर सुस्ताने के लिए बैठ गया। उसकी सांसे लोहार की धोंकनी की तरह चल रही थीं। उसने अपनी जेब पर हाथ रखा। पत्थर अभी भी वहीं था। भारी और गर्म। उसने सोचा, "क्या वाकई यह चोरी का माल है? क्या वह संदूक किसी लुटेरे ने समंदर में फेंका था? या फिर यह किसी पुराने बादशाह की खोई हुई अमानत है?"

तभी उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है। उसने घबराकर सर उठाया। मस्जिद के चबूतरे के नीचे अंधेरे में एक साया खड़ा था। एक बूढ़ा फकीर, जिसके बदन पर चिथड़े लटक रहे थे और बाल जटाओं की तरह उलझे हुए थे। वह अपनी धुंधली आंखों से कासिम को ही घूर रहा था।

कासिम उठने ही वाला था कि फकीर ने एक अजीब सी बात कही। "पानी की चीज पानी ही मांगती है। ए मुसाफिर, जो चीज आग से बनी है, वो तेरे कच्चे मकान को जला देगी।"

कासिम के पैरों तले जमीन खिसक गई। इस फकीर को कैसे पता? क्या यह कोई जासूस है या कोई जादूगर? कासिम ने जवाब देने की हिम्मत नहीं की और वहां से उल्टे पैर भागा। अब उसे अपनी ही परछाई से डर लगने लगा था।

जैसे तैसे छुपते-छुपाते कासिम शहर पनाह से बाहर निकला और रेगिस्तान के रास्ते पर आ गया। चांद निकल आया था और रेत चांदी की तरह चमक रही थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही कदमों की आवाज किसी पीछा करते हुए दुश्मन की चाप लग रही थी। घर का रास्ता लंबा था, मगर डर ने उसके पैरों में एक अजीब सी ताकत भर दी थी। वह बिना रुके चलता रहा।

रास्ते भर वह सोचता रहा कि सलमा को क्या जवाब देगा। वह तो 100 दीनार के सपने संजोए बैठी होगी। और मां? मां को कैसे बताएगा कि उनकी बदशगुनी सच साबित हो रही है।

जब वह अपनी बस्ती के करीब पहुंचा तो आधी रात बीत चुकी थी। दूर से ही उसे अपनी झोपड़ी में जलता हुआ दिया दिखाई दिया। वह रोशनी, जो कभी सुकून देती थी, आज उसे किसी अदालत के कटघरे जैसी लग रही थी, जहां उसे अपनी बेगुनाही साबित करनी थी। उसने दरवाजे पर हाथ रखा। एक पल के लिए रुका। अल्लाहू अकबर पढ़ा और दरवाजा धकेल दिया।

अंदर का मंजर वही था जैसा वह छोड़ गया था। बस तनाव और बढ़ गया था। मां अपनी चटाई पर लेटी थी। शायद जाग रही थी। सलमा दरवाजे की तरफ पीठ करके बैठी थी। मगर आहट पाते ही वह ऐसे पलटी जैसे कोई भूखी शेरनी शिकार पर झपटती है। उसकी आंखों में नींद नहीं, इंतजार और लालच का लाल डोरा था।

कासिम की खाली और लटकी हुई सूरत देखकर सलमा के चेहरे की रौनक उड़ गई। वह तेजी से उठी और कासिम के पास आकर उसका कुर्ता टटोलने लगी। "कहां है? दीनार कहां है?" उसने कासिम की जेबें टटोली। मगर जब उसे सिवाय उसी कपड़े में लिपटे पत्थर के कुछ ना मिले तो वह बिफर पड़ी।

"यह क्या? तुम यह पत्थर वापस ले आए? क्या शहर का बाजार बंद था या तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे? मैंने कहा था ना कि इसे बेच कर आना, चाहे जो दाम मिले?"

कासिम ने निढाल होकर जमीन पर बैठते हुए कहा। "पानी, थोड़ा पानी दे दो सलमा। मेरी जान हलक में अटकी है।"

सलमा ने मटके से लौटा भरकर पानी तो दिया मगर पटकते हुए। कासिम ने एक ही सांस में पानी पिया और फिर रुक-रुक कर पूरी दास्तान सुनाई। शेख मंसूर का डर, शाही सिपाहियों का छापा और वह भागदौड़।

"सलमा, यह पत्थर नहीं, आफत है। जहरी कह रहा था कि यह खून अजदहा है। शाही खजाने की चोरी। अगर हम पकड़े गए तो कोई नहीं बचेगा। हमें इसे अभी, इसी वक्त समंदर में वापस फेंक देना चाहिए।"

यह सुनकर सलमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने हिकारत से थूकते हुए कहा, "बुज़दिल! डरपोक कहीं के! एक मामूली सिपाही की आवाज सुनकर तुम दुम दबाकर भाग आए? अरे, वो जहरी जरूर तुम्हें बेवकूफ बना रहा होगा ताकि तुम पत्थर छोड़कर भाग जाओ और वो उसे हड़प ले। तुम मर्द होकर इतना नहीं समझते? यह शाही खजाने की चीज है तो क्या हुआ? अब यह हमारे पास, हमारा नसीब है। अगर इस शहर में नहीं बिका तो हम दूसरे शहर जाएंगे, बगदाद जाएंगे, बसरा जाएंगे। मगर मैं इस दौलत को हाथ से जाने नहीं दूंगी।"

इसी शोर शराबे में मां जनाब उठ बैठीं। उन्होंने कांपती आवाज में कहा, "बहू, खुदा के लिए बस कर। मेरा बेटा सही सलामत घर लौट आया। यही लाख रुपए की दौलत है। कासिम सच कह रहा है। हराम की कमाई और चोरी का माल कभी फलता फूलता नहीं। फेंक दे बेटा इसे। मेरी कसम है तुझे।"

मां की बात सुनकर कासिम ने पत्थर उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ा। मगर सलमा ने उसका रास्ता रोक लिया। उसके हाथ में सब्जी काटने वाला पुराना चाकू था। "खबरदार!" वह चीखी। "अगर तुमने इस पत्थर को घर से बाहर ले जाने की कोशिश की तो मैं अपनी जान दे दूंगी या तुम्हारी जान ले लूंगी। गरीबी की इस हिल्लत से तो मर जाना बेहतर है।"

माहौल में एक खौफनाक खामोशी छा गई। कासिम अपनी बीवी की आंखों में वो पागलपन देख रहा था जो उसने पहले कभी नहीं देखा था।

तभी कमरे के कोने से एक आवाज आई। यह आवाज पानी के बर्तन से आ रही थी। "मछली।" वह सुनहरी मछली फिर से सतह पर आ गई थी। इस बार उसका रंग थोड़ा गहरा हो गया था, जैसे तांबे का रंग हो। उसने अपनी भारी और गूंजती आवाज में कहा, "इंसान का लालच समंदर से भी गहरा है। ए औरत, तू जिसे दौलत समझ रही है, वो एक इम्तिहान है। आज रात इस घर में एक मेहमान आएगा। अगर तुमने उस मेहमान की खातिरदारी की तो शायद बच जाओ। लेकिन अगर लालच ने तुम्हारी आंखों पर पट्टी बांधे रखी तो सुबह का सूरज तुम में से कोई एक नहीं देख पाएगा।"

सलमा ने डर और गुस्से में चाकू मछली की तरफ फेंका, जो बर्तन के किनारे से टकरा कर गिर गया। "चुप रह शैतान!" वह चिल्लाई।

कासिम ने सर पकड़ लिया। "यह कैसी मुसीबत है? एक तरफ शाही फौज का डर, दूसरी तरफ बीवी का पागलपन और तीसरी तरफ यह रहस्यमई मछली और उसकी पहेलियां।"

अभी मछली की बात खत्म ही हुई थी कि अचानक झोपड़ी के बाहर सन्नाटे को चीरती हुई घोड़ों की टापें सुनाई दीं। कासिम का खून जम गया। आवाज बहुत करीब थी। शायद बिल्कुल उनके दरवाजे के बाहर। फिर एक भारी आवाज गूंजी। "दरवाजा खोलो। हमें खबर मिली है कि शहर से भागा हुआ मुजरिम इसी तरफ आया है।"

कासिम ने सलमा की तरफ देखा, जिसका चेहरा अब सफेद पड़ चुका था। चाकू उसके हाथ से छूट कर गिर गया। मां जनाब ने "या अल्लाह" कहकर अपनी चादर मुंह पर डाल ली। बाहर कोई था। क्या वह शाही सिपाही थे? या मछली जिस मेहमान की बात कर रही थी, वो कोई और था?

कासिम ने कांपते हुए पत्थर को उठाकर जमीन में चटाई के नीचे बने एक छोटे से गड्ढे में छुपा दिया और फिर लरजते कदमों से दरवाजे की तरफ बढ़ा। उसका दिल कह रहा था कि दरवाजा खोलते ही कयामत टूट पड़ेगी।

कासिम ने अपनी कांपती हथेलियों को आपस में रगड़ा। एक नजर उस जगह पर डाली जहां चटाई के नीचे वह मनहूस पत्थर दफन था। और फिर "या रब्ब" कहकर दरवाजा खोल दिया।

बाहर का मंजर कासिम के होश उड़ाने के लिए काफी था। दरवाजे पर कोई एक-दो नहीं, बल्कि शाही घुड़सवारों का एक पूरा दस्ता खड़ा था। उनके हाथों में जलती हुई मशालें थीं, जिनकी लपटें हवा में लहरा रही थीं और उनके साए कासिम के छोटे से मकान पर राक्षसों की तरह नाच रहे थे। सबसे आगे एक लंबा, तगड़ा शख्स घोड़े पर सवार था, जिसका लिबास बाकी सिपाहियों से अलग और ज्यादा शानदार था। उसके कमरबंद में एक नंगी तलवार लटक रही थी और सर पर लोहे का खुद हेलमेट था। यह शाही फौज का सिपा सालार गाजी जुबैर था, जिसकी सख्ती और बेरहमी के किस्से पूरे शहर में मशहूर थे।

जुबैर ने अपनी तेज नजरों से कासिम को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर उसकी निगाहें झोपड़ी के अंदरूनी अंधेरे को चीरती हुई सलमा और बूढ़ी मां तक गईं। "कौन हो तुम?" जुबैर की भारी आवाज गूंजी, जैसे बादलों की गरज हो। "और इतनी रात गए तुम जाग क्यों रहे हो? क्या तुम्हें शाही फरमान नहीं मिला कि बागी और चोर शहर के आसपास छिपे हो सकते हैं?"

कासिम ने हाथ जोड़ते हुए, लड़खड़ाती जुबान से कहा, "हुजूर, मैं... मैं एक मामूली मछुआरा हूं, कासिम। हम गरीब लोग हैं। दिन भर की मेहनत के बाद बदन इतना टूट जाता है कि नींद भी रूठ जाती है। हमारा किसी चोर या बागी से कोई वास्ता नहीं।"

जुबैर ने एक हुंकार भरी और घोड़े से नीचे उतर आया। उसके जमीन पर पैर रखते ही उसके भारी बूटों की आवाज से सलमा का दिल दहल गया। "मछुआरे हो?" जुबैर ने नाक सिकोड़ते हुए कहा। "मगर तुम्हारे घर से खौफ की बू आ रही है। एक मछुआरे के पास छिपाने को क्या हो सकता है? सिवाय अपनी गरीबी के।"

उसने अपने सिपाहियों को वहीं रुकने का इशारा किया और खुद अकेले झोपड़ी के अंदर कदम रखा। यह वही मेहमान था जिसकी भविष्यवाणी मछली ने की थी। कासिम का गला सूख रहा था। जुबैर की नजरें बाज की तरह हर कोने का जायजा ले रही थीं। टूटे बर्तन, पुरानी रस्सियां, कोने में बैठी सहमी हुई सलमा और तस्बीह पढ़ती हुई बूढ़ी मां।

जुबैर ने कमरे के बीचों-बीच आकर अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखा और बोला, "सुनो मछुआरे, हमें खबर मिली है कि जौहरियों के बाजार से एक शख्स भागा है जिसके पास शाही खजाने की एक बेशकीमती चीज है। वह इसी तरफ आया है। अगर तुमने उसे पनाह दी है तो सच बता दो। शायद तुम्हारी जान बख्श दी जाए। लेकिन अगर तलाशी में कुछ मिला तो इस झोपड़ी को तुम्हारी कब्र बना दिया जाएगा।"

सलमा का चेहरा पड़ गया था। उसे लग रहा था कि जुबैर की नजरें सीधे उस चटाई को घूर रही हैं, जिसके नीचे वह लाल पत्थर दबा हुआ है। तभी जुबैर की नजर उस पानी के बर्तन पर पड़ी, जिसमें वह सुनहरी मछली थी। मछली इस वक्त बिल्कुल शांत थी। पानी की सतह पर बिना हिले डुले तैर रही थी। जुबैर कुछ पल के लिए उसे देखता रहा। फिर अजीब सी हंसी-हंसा। "वाह! घर में खाने को दाने नहीं और शौक देखो, सुनहरी मछली पाल रखी है।"

फिर वह मुड़ा और एक ऐसी बात कही, जिसने कासिम को मछली की भविष्यवाणी याद दिला दी। जुबैर ने अपनी गर्दन सहलाते हुए कहा, "खैर, तलाशी तो मैं लूंगा ही। मगर उससे पहले मेरा गला रेगिस्तान की धूल से अटा पड़ा है। थोड़ा पानी पिलाओ। एक मुसाफिर और मेहमान की खातिरदारी करना अरब का पुराना दस्तूर है, भले ही मेजबान गरीब मछुआरा ही क्यों ना हो।"

मछली ने कहा था, "अगर तुमने उस मेहमान की खातिरदारी की तो शायद बच जाओ।" कासिम को लगा जैसे अंधेरे में एक उम्मीद की किरण जागी हो। वह फौरन दौड़ा और मटके से मिट्टी का कटोरा भरकर पानी ले आया। उसने बड़े अदब से नजरें झुकाकर पानी पेश किया। "लीजिए हुजूर, गरीब का पानी है मगर मीठा है।"

जुबैर ने कटोरा थामा और एक ही सांस में पी गया। पानी पीकर उसके चेहरे की सख्ती कुछ कम हुई। उसने अपनी लंबी मूछों को पोंछा और वहीं उसी चटाई के एक कोने पर बैठ गया। ठीक उसी जगह के करीब, जहां पत्थर दफन था। सलमा की सांसे रुक गईं। अगर जुबैर थोड़ा भी खिसका तो उसे वह उभार महसूस हो जाएगा।

जुबैर ने सुस्ताते हुए कहा, "तुम लोग शायद नहीं जानते कि वह चोरी हुई चीज क्या है। वह संग इब्तला है। कहते हैं उस पत्थर पर जिन्नात का साया है। वह जिसके पास भी रहता है, उसका खून चूस लेता है। उसकी अक्ल पर पर्दा डाल देता है। आज जो चोर उसे लेकर भागा है, समझो वह अपनी मौत साथ ले गया है।"

मां जनाब ने यह सुनकर धीरे से कहा, "बेशक हुजूर, हराम की दौलत इंसान को जला देती है।"

जुबैर ने बूढ़ी मां की तरफ देखा और नरमी से कहा, "बड़ी अम्मा, आपकी बात में सच्चाई है। मुझे लगता है मैंने यहां आकर वक्त जाया किया। आप लोगों की हालत देखकर नहीं लगता कि आपके पास कल की रोटी का भी इंतजाम है। शाही खजाना तो दूर की बात है।"

जुबैर उठने ही वाला था कि एक अनहोनी हो गई। शायद जमीन के नीचे दबे उस पत्थर की गर्मी थी या उसका जादुई असर, जिस जगह जुबैर बैठा था, वहां की चटाई सुलगने लगी थी। एक बहुत ही हल्की मगर तेज जलने की बू कमरे में फैल गई। जुबैर, जो अभी जाने के लिए मुड़ा था, अचानक रुक गया। उसने हवा में सूंघा। "यह कैसी बू है?" उसने संदिग्ध आवाज में पूछा।

सलमा ने घबराहट में अव्वल दर्जे की बेवकूफी की बजाय चुप रहने के। वह तेजी से आगे बढ़ी और बोली, "कुछ नहीं हुजूर, वो... वो मैंने चिराग की बत्ती ठीक की थी, शायद कपड़ा जल गया होगा। आप... आप तशरीफ ले जाइए।"

सलमा की आवाज में जो हड़बड़ाहट और डर था, उसने जुबैर के सिपाही वाले दिमाग को चौकन्ना कर दिया। उसे याद आया कि चिराग तो दूसरी तरफ रखा है। उसकी नजरें फिर से जमीन पर गईं, जहां से धुएं की एक बहुत बारीक लकीर उठ रही थी। जुबैर की आंखों में फिर से वही दरिंदगी लौट आई। उसने एक झटके में अपनी तलवार म्यान से खींच ली। तलवार की चमक ने अंधेरे कमरे को रोशन कर दिया।

"झूठ!" वह दहाड़ा। "मछुआरे की बीवी झूठ बोल रही है। इस चटाई के नीचे क्या है?"

कासिम बीच में आया। "हुजूर, रहम करें। कुछ नहीं है। बस जमीन की नमी है।"

लेकिन जुबैर ने कासिम को एक जोरदार धक्का दिया, जिससे वह दीवार से जा टकराया। जुबैर ने अपने भारी बूट की ठोकर से चटाई को उलट दिया और वहां... वहां जमीन की मिट्टी खुदी हुई थी और उसके बीच से वह रुमाल दिख रहा था, जो अब गर्मी की वजह से थोड़ा झुलस गया था और उसके अंदर से सुर्खी माइल लाल रंग की रोशनी फूट रही थी।

जुबैर ने तलवार की नोक से रुमाल को हटाया। नंगा याकूद, संग इब्तिला, अपनी पूरी शान और दहशत के साथ चमक चमक रहा था। उसकी रोशनी इतनी तेज और खूनी थी कि पल भर के लिए सबकी आंखें चंदी आ गईं। "या खुदा!" जुबैर के मुंह से निकला। वह भी इस पत्थर की खूबसूरती और दहशत से मंत्रमुग्ध हो गया। बाहर खड़े सिपाहियों ने रोशनी देखी तो वे भी अंदर झांकने लगे।

जुबैर ने धीरे से झुककर पत्थर उठाना चाहा। लेकिन तभी एक और अजीब वाकया हुआ। घर के कोने में उस बाज ने, जो अब तक खामोश बैठा था, एक भयानक चीख मारी और सीधा जुबैर के हाथ पर झपट्टा मारा। जुबैर ने अपना हाथ पीछे खींचा और गुस्से में तलवार हवा में लहराई। मनहूस परिंदे!

बाज वार बचाकर छत की शहतीर पर जा बैठा। लेकिन इस अफरातफरी में पत्थर अपनी जगह से लुढ़क गया और सीधे सलमा के पैरों के पास जा रुका। सलमा, जिसके ऊपर लालच का भूत फिर से सवार हो गया था, ने जान की परवाह किए बिना पत्थर को उठा लिया। "यह मेरा है!" सलमा चीखी, उसकी आवाज बदल चुकी थी। भारी और डरावनी हो गई थी। "इसे कोई नहीं ले जा सकता। ना तुम, ना तुम्हारा बादशाह।"

जुबैर हैरान रह गया। एक निह्ती औरत तलवार के सामने खड़ी होकर ऐसी गुस्ताखी कर रही थी। "पागल औरत! दे दे इसे, वरना तेरी गर्दन उड़ा दूंगा!" जुबैर चिल्लाया और तलवार तानते हुए आगे बढ़ा। कासिम अपनी पत्नी को बचाने के लिए दौड़ा। "नहीं हुजूर, नहीं! यह पागल हो गई है। इश्कि माफ कर दें।"

लेकिन सलमा ने कासिम को भी परे धकेल दिया। उसकी आंखों में अब इंसानियत नहीं, सिर्फ उस पत्थर का अक्स दिखाई दे रहा था। माहौल में तनाव इतना बढ़ गया था कि हवा भी भारी लगने लगी थी।

तभी बर्तन में मौजूद मछली ने एक ऐसी आवाज निकाली, जो किसी जानवर की नहीं, बल्कि तूफान की गड़गड़ाहट जैसी थी। "खामोश!" वह आवाज इतनी तेज थी कि झोपड़ी की कच्ची दीवारें हिल गईं और छत से धूल गिरने लगी। जुबैर, उसके सिपाही, कासिम और सलमा, सब के सब बनकर रह गए।

मछली पानी से ऊपर उठी। उसका जिस्म अब बढ़ने लगा था और उसकी सुनहरी रंगत अब आग जैसी लाल हो गई थी। "खून का बदला खून मांगता है," मछली ने कहा। "तुम सब इस पत्थर के लिए लड़ रहे हो, मगर तुम नहीं जानते कि यह पत्थर अपने मालिक को बुला रहा है और उसका मालिक इंसान नहीं है।"

जुबैर का चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया। उसने ऐसी जादूगरी जंग के मैदान में भी नहीं देखी थी। उसने तलवार नीचे कर ली। मगर उसकी नजर अभी भी सलमा के हाथ में दबे पत्थर पर थी। "यह... यह क्या बला है?" जुबैर बुदबुदाया।

कासिम, मछली ने कासिम को पुकारा। "अब फैसला तेरे हाथ में है। या तो इस सिप है सालार को यह पत्थर सौंप दे और अपनी जान बचा, या फिर इस पत्थर को लेकर समंदर में कूद जा। तीसरा कोई रास्ता नहीं है।"

कासिम ने सलमा की तरफ देखा, जो पत्थर को छाती से लगाए हाफ रही थी। फिर जुबैर की तरफ, जिसकी तलवार अब भी प्यासी लग रही थी। और फिर उसने मां की तरफ देखा, जो कोनों में दुबकी "या हफीज" बिर्द कर रही थी। कासिम को फैसला लेना था, और उसके पास वक्त बिल्कुल नहीं था, क्योंकि बाहर से और भी घोड़ों के आने की आवाज आ रही थी। शायद और ज्यादा सिपाही, या शायद वो जिसका जिक्र मछली ने पत्थर के असल मालिक के तौर पर किया था।

बल्कि एक भयानक तूफान की गड़गड़ाहट में तब्दील हो चुकी थी। ऐसा लग रहा था जैसे समंदर अपनी हदों को तोड़कर रेगिस्तान को निगलने के लिए आगे बढ़ रहा हो। झोपड़ी की छत पर लगी खजूर की पत्तियां फड़फड़ाने लगीं और दीवारों में दरारें उभरने लगीं। जुबैर, जो अब तक अपनी तलवार और ताकत के नशे में था, बाहर के उस शोर को सुनकर पहली बार सहम गया। उसकी बाजुओं की पकड़ ढीली पड़ गई।

इसी मौके का फायदा उठाकर कासिम ने अपनी बीवी सलमा को पीछे खींचा और जुबैर और उस मनहूस पत्थर के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया। "हुजूर!" कासिम ने चिल्लाकर कहा। उसकी आवाज तूफान के शोर में दब रही थी। "यह पत्थर सिर्फ तबाही लाएगा। इसे जाने दीजिए, वरना हम सब यहां जिंदा दफन हो जाएंगे।"

लेकिन जुबैर की आंखों पर लालच का पर्दा पड़ा हुआ था। उसे बाहर का तूफान नहीं, बल्कि सलमा के हाथ में चमकता हुआ वह खू अजदहा दिखाई दे रहा था। उसने कासिम को एक जोरदार धक्का दिया और सलमान की तरफ लपका। "दे दे मुझे!" वह दहाड़ा।

सलमा, जो अब तक पत्थर के मुंह में थी, अब दर्द से कराने लगी थी। वह पत्थर, जो पहले ठंडा था, अब अंगारे की तरह दहक रहा था। सलमा की हथेली की खाल जल रही थी। धुआं उठ रहा था, मगर उसकी बदकिस्मती देखिए कि वह चाहकर भी अपनी मुट्ठी नहीं खोल पा रही थी। पत्थर जैसे उसके मांस से चिपक गया था। "कासिम, बचाओ!" वह चीखी। "यह मुझे जला रहा है। यह शैतान है।"

उसकी चीख ने कासिम के दिल को छलनी कर दिया। मां जनाब ने कोठरी के कोने से रोते हुए दुआ मांगी। "ए रब्बे कायनात, मेरे बच्चों पर रहम कर। हमें दौलत नहीं चाहिए। हमें हमारी जान बखश दे।"

इसी अफरादफरी के बीच पानी के बर्तन में मौजूद उस सुनहरी मछली ने अपना आखिरी फरमान सुनाया। मछली का जिस्म अब इतना बड़ा हो गया था कि बर्तन उसके लिए छोटा पड़ रहा था। उसकी आंखों से नीली रोशनी निकली और उसने बाज की तरफ देखकर एक अजीब सी जुबान में कुछ कहा। ऐसी जबान, जो इंसानों की समझ से बाहर थी, मगर बाज उसे बखूबी समझता था।

छत की शहतीर पर बैठा शाहबाज, कासिम का वफादार बाज, एक तीर की तरह नीचे आया। उसने जुबैर पर हमला नहीं किया, ना ही कासिम के पास गया। वह सीधा सलमा के पास पहुंचा और अपने तेज पंजों से उस जलते हुए पत्थर को पकड़ने की कोशिश की। सलमा ने दर्द के मारे हाथ झटका और इसी छीना झपटी में पत्थर उसकी हथेली से छूट कर हवा में उछला। वक्त जैसे थम गया।

जुबैर ने हवा में ही पत्थर को लपकने के लिए छलांग लगाई। उसकी उंगलियां पत्थर को छूने ही वाली थीं कि शाहबाज ने बिजली सी फुर्ती दिखाई। उसने हवा में ही उस लाल अंगारे को अपनी चोंच में दबोच लिया। पत्थर की गर्मी से बाज की चोंच से धुआं निकलने लगा, मगर उस वफादार परिंदे ने उफ तक ना की। वह एक जोरदार चीख मारकर खुले दरवाजे से बाहर तूफान के अंधेरे में उड़ गया।

"नहीं!" जुबैर पागलों की तरह चिल्लाया और नंगी तलवार लिए बाज के पीछे-पीछे बाहर भागा। कासिम भी अपनी बीवी और मां की परवाह किए बिना यह देखने के लिए बाहर लपका कि आखिर होने क्या वाला है।

बाहर का नजारा कयामत से कम ना था। समंदर की लहरें पहाड़ जितनी ऊंची उठ रही थीं और साहिल से टकराकर झाग उड़ा रही थीं। आसमान में काले बादलों के बीच बिजलियां कड़क रही थीं। शाहबाज़, उस नन्हे से वजूद के साथ, उन तेज हवाओं का सीना चीरता हुआ सीधा समंदर के बीचोंबीच जा रहा था। जुबैर साहिल पर खड़ा होकर बेबसी से देख रहा था। वह पानी में घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।

कासिम ने देखा कि शाहबाज ने समंदर की सबसे ऊंची लहर के ऊपर जाकर अपनी चोंच खोली और उस पत्थर को नीचे गिरा दिया। जैसे ही वह संग इब्तला पानी की सतह से टकराया, एक तेज धमाका हुआ। पानी के अंदर से लाल रंग की एक रोशनी फूटी, जिसने पूरे समंदर को खून जैसा लाल कर दिया। लहरों ने एक भयानक शोर मचाया, जैसे हजारों जिन्नात एक साथ रो रहे हों। और फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया। हवा रुक गई, लहरें थम गईं और आसमान साफ हो गया।

वह पत्थर, जो जमीन पर फसाद की जड़ था, अपनी असल जगह समंदर की गहराइयों में वापस जा चुका था। जुबैर घुटनों के बल रेत पर गिर पड़ा। वह जानता था कि उसने अभी-अभी मौत को छूकर वापस कदम खींचा है। उसे समझ आ गया था कि यह मामला इंसानी ताकत से बाहर का है। वह बिना एक शब्द कहे, अपने घोड़े पर सवार हुआ और अपने सिपाहियों को लेकर शहर की तरफ सरपट भाग गया। उसने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा, इस डर से कि कहीं वह बला उसका पीछा ना कर रही हो।

कासिम दौड़कर घर के अंदर आया। सलमा जमीन पर पड़ी सुबक रही थी। उसकी हथेली पर जले हुए का निशान हमेशा के लिए छप गया था, उसके लालच की निशानी बनकर। मां जनाब अब भी तस्बीह पढ़ रही थीं और वह मछली, बर्तन अब खाली था। मछली गायब हो चुकी थी। शायद वह भी उसी तूफान के साथ अपने ठिकाने पर लौट गई थी।

कासिम ने सलमा को सहारा देकर उठाया और मां के पास ले गया। उस रात उस टूटी हुई झोपड़ी में किसी ने खाना नहीं खाया। मगर सबके दिलों में एक अजीब सा सुकून था। जान बच गई थी और सबसे बड़ी बात, वह मनहूस लालच उनके घर से निकल गया था।

अगली सुबह जब कासिम उठा तो मौसम बहुत खुशगवार था। वह उदास था, क्योंकि उसका बाज शाहबाज वापस नहीं लौटा था। उसने सोचा कि शायद पत्थर की गर्मी ने उसे मार डाला होगा। वह भारी कदमों से साहिल पर गया, जहां उसकी कश्ती बंधी थी। लेकिन वहां पहुंचते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसकी पुरानी कश्ती की जगह लहरों ने ढेर सारी सीपियां और कीमती मोती किनारे पर लापटके थे। और कश्ती के मस्त पर उसका प्यारा बाज शाहबाज बैठा अपने पंख साफ कर रहा था। उसकी चोंच पर थोड़ा सा जले का निशान था, जो उसकी बहादुरी का तमगा था।

कासिम ने बाज को गले लगाया और आसमान की तरफ देखकर अल्लाह का शुक्र अदा किया। उन मोतियों को बेचकर कासिम ने अपना घर ठीक करवाया, मां का इलाज करवाया और एक नई मजबूत कश्ती खरीदी। सलमा, जिसके हाथ पर वो निशान बाकी था, अब पूरी तरह बदल चुकी थी। उसने शिकायत करना छोड़ दिया था और जो मिलता उसी में खुश रहती। उसे समझ आ गया था कि असल दौलत संदूक में बंद पत्थर नहीं, बल्कि दिल का सुकून और अपनों का साथ है। वे अब अमीर नहीं थे, मगर मोहताज भी नहीं रहे। कासिम हर रोज समंदर में जाल फेंकता और जितना मिलता उसी पर अल्हम्दुलिल्लाह कहता। समंदर ने उस दिन सिर्फ उनका इम्तिहान ही नहीं लिया था, बल्कि उन्हें जिंदगी जीने का सलीका भी सिखा दिया था।

इस किस्से से हमें यह सबक मिलता है कि हवस और लालच इंसान की आग अक्ल पर पर्दा डाल देते हैं और उसे तबाही के रास्ते पर ले जाते हैं। इंसान को जो भी रिस्क मिले, उस पर सब्र और शुक्र करना चाहिए। हराम की दौलत या बिना मेहनत के मिला खजाना कभी सुकून नहीं देता। वह अपने साथ सिर्फ मुसीबतें लाता है। जैसा कि सलमा ने सीखा, असली अमीर वह है जिसका दिल मुतमिन हो, ना कि वह जिसके पास सोने चांदी के ढेर हों। मुसीबत के वक्त में सब्र और वफादारी, जैसे कासिम और उसके बाज ने दिखाई, ही इंसान को बचाती है।

दोस्तों, उम्मीद है कि अरब के रेगिस्तानों और समंदर की गहराइयों से जुड़ी यह रहस्यमई और सबक आमोस दास्तान आपको पसंद आई होगी। अगर इस कहानी ने आपके दिल को छू लिया है और आप ऐसी ही और रूहानी इबरतनाक सबक देने वाली और जादुई कहानियां सुनना चाहते हैं, तो मेरी आपसे एक छोटी सी गुजारिश है। इस सफर में मेरा साथ देने के लिए चैनल को अभी सब्सक्राइब करें और घंटी का बटन जरूर दबाएं, ताकि जब भी मैं कोई नया किस्सा लेकर आऊं, तो सबसे पहले वह आप तक पहुंचे। आपकी हर लाइक और कमेंट मेरा हौसला बढ़ाती है। तो देर किस बात की?