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नमस्कार दोस्तों, यह बात है अर्ली 1970 की। गुजरात के जामनगर डिस्ट्रिक्ट में एक छोटा सा गांव धुंधो राजी, जहां की आबादी करीबन डेढ़-2 हजार लोग। यहां रहता था वीरानी परिवार।
गांव के सब लोग किसान थे। वीरानी परिवार भी उन्हीं में से एक गरीब किसान का परिवार था जिनके पास साइकिल तक नहीं थी। जहां जाना होता था, यह लोग चलकर जाते थे। पूरे गांव में कोई बिजली भी नहीं थी। लोग इस दरिद्रता में ही राम रमते हैं। गर्मियों के समय कभी कबभार कोई बाहर से गोला बेचने आता तो बच्चे 5 पैसे का गोला खाते, मूंगफली खाते। गांव वाले अपनी जमीन पर फसल उगाते। फसल बेचकर जो मिलता उसी से ही दिन की दो रोटी खाते।
लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि आसमान की तरफ देखते हुए उनकी आंखें पथरा गई क्योंकि बारिश नहीं हुई। उनकी फसलें सूख गई। बारिश आई तो सीधा 2 महीने बाद फिर से उन्हें उम्मीद जगी। फिर से उन्होंने हिम्मत की। फिर से बोया लेकिन फिर एक बारिश ने धोखा दे दिया। इस बार जो बोया वो भी सूख गया। अकाल की नौबत आ गई।
क्या आप इमेजिन कर सकते हो दोस्तों? ऐसे गांव में रहने वाला, ऐसी हालातों में रहने वाला एक 15 16 साल का लड़का आगे चलकर एक बिलियनर बन गया। यह कहानी अनबिलीवेबल लगती है, इंपॉसिबल लगती है, लेकिन यह कहानी सच्ची है। यह कहानी अकाल से जूझते हुए ऐसे परिवार की है जिसने 50 साल बाद जाकर Fortune इंडिया के एफएमसीजी बिलियर्स की लिस्ट में एंट्री की। यह कहानी है बालाजी वेफर्स की, भीखू भाई, कन्नू भाई और चंदू भाई तीन भाइयों द्वारा शुरू की गई वो कंपनी जो आज Pepsio जैसी बड़ी-बड़ी कंपनीज को टक्कर दे रही है।
[संगीत]
वीडियो शुरू करने से पहले दोस्तों एक बड़ी ही यूज़फुल चीज के बारे में आपको बताना चाहूंगा। आजकल आपने देखा होगा कई सारी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स पर बड़ी सेल शुरू होने वाली है। जैसे कि Flipkart की बिग बिलियन डेज सेल, Amazon पर ग्रेट इंडियन फेस्टिवल सेल। इन सेल्स को बड़े-बड़े डिस्काउंट्स वाली डील्स के साथ प्रमोट किया जाता है। कहीं पर कहते हैं 50% ऑफ होगा, कहीं 60% ऑफ, 80% ऑफ, कहीं कहते हैं बिग बिलियन डे प्राइस। ऐसे टैग्स के जरिए लोगों को अट्रैक्ट किया जाता है।
लेकिन क्या रियलिटी में इतना ऑफ होता है? सच्चाई यह है कि इनमें से कुछ डील्स तो सही होती हैं, लेकिन कुछ में एक स्कैम हो रहा होता है। आपको भी कई बारी डाउट हुआ होगा कि ये जो डिस्काउंट लिख रहे हैं, क्या सही में उतना ही डिस्काउंट मिल रहा है? मुझे भी कई बारी ऐसे डाउट्स होते हैं। लेकिन इस डाउट को कंफर्म कैसे किया जाए? अब 4 महीने पहले किसी प्रोडक्ट का एक्चुअल प्राइस क्या था? यह याद रखना लगभग इंपॉसिबल है। तो, मुझे इसके लिए एक बड़ा यूज़फुल टूल मिला है।
यह बाय हट के नाम का एक Google Chrome एक्सटेंशन है जिसे आप बड़ी आसानी से अपने इंटरनेट ब्राउज़र में इंस्टॉल कर सकते हैं। यह एक्सटेंशन आपको किसी भी प्रोडक्ट की रियल प्राइस हिस्ट्री दिखाता है और आपको बताता है कि क्या कोई एक्चुअल प्राइस डिस्काउंट है या आपको बेवकूफ बनाया जा रहा है। इसमें कई एआई बेस्ड फीचर्स भी हैं। आइए देखें कि वो क्या है। उदाहरण के तौर पे इसका प्राइस ग्राफ देखते हैं। ग्राफ में प्राइस में कोई गिरावट नहीं है बल्कि सिर्फ बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। तो यह सो कॉल्ड स्पेशल प्राइस अपने हाईएस्ट प्राइस पर है जो कि एवरेज प्राइस और ऑल टाइम लो प्राइस से भी ऊपर है। यह देखकर आप चौंक जाएंगे और बाय हटके के प्राइस कंपैरिजन फीचर को mntra पर यही प्रोडक्ट 1899 में मिला है। एi फीचर कॉल्ड लुक अलाइक ने डिफरेंट ब्रांड्स के सिमिलर लुकिंग प्रोडक्ट्स की खोज की और उन्हें यहां लिस्ट कर दिया। इसके अलावा इस पर ऑटो कूपन और प्राइस ड्रॉप जैसे कई फीचर्स भी हैं। तो यह टूल तो रेगुलर शॉपिंग के लिए भी काफी यूज़फुल है क्योंकि आप यहां काफी पैसे बचा सकते हो। अगर आप फ्रीक्वेंट ऑनलाइन शॉपिंग करते हो तो आपको यह बाय हट के एक्सटेंशन जरूर ट्राई करना चाहिए। इसको डाउनलोड करने का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन और पिंड कमेंट में मिल जाएगा।
अब अपने टॉपिक पर आते हैं। बालाजी वेफर्स का एनुअल रेवेन्यू आज ₹6000 करोड़ तक पहुंच चुका है। क्या आप सोच सकते हो दोस्तों कि कभी आपका भी इतना बड़ा बिजनेस हो सकता है? इमेजिन करना मुश्किल लगता है। है ना? क्योंकि ऐसा करने के लिए आपको पहले कुछ शुरुआत करनी पड़ेगी और शुरुआत ना करने के यहां पर 10 कारण है आपके पास। जैसे कि पैसा नहीं है, हमें बिजनेस की समझ नहीं है, हमें काम करना नहीं आता या हमें अपना पैशन नहीं पता। लेकिन यह वीडियो देखने के बाद शायद आपके पास कोई बहाना नहीं बचेगा। अगर इस वीडियो को आपने ध्यान से एंड तक देखा तो हो सकता है यह सही मायनों में आपकी जिंदगी बदल कर रख दे। क्योंकि असल जिंदगी में इस लेवल की इंस्पिरेशनल और मोटिवेशनल कहानियां बहुत कम होती हैं। लेकिन यह कहानी उन्हीं में से एक है।
आइए टाइम में वापस पीछे चलते हैं। 1970 के समय में एक गरीब किसान का परिवार एक छोटे से गांव में रहने वाला। इसी गांव में रहता था एक 15-16 साल का लड़का चंदू भाई वीरानी। गांव में जब अकाल पड़ा तो उनके पिताजी पोपट भाई वीरानी ने अपनी सूखी जमीन को बेचने का फैसला किया। जमीन बेचकर अपने बेटों को ₹1000 दिए और कहा, अब गांव में कुछ नहीं रखा। तुम बाहर जाओ अपने हिसाब से कमाओ।
चंदू भाई बताते हैं कि पिताजी ने सब कुछ बेच दिया था। इस बात ने उनके ऊपर एक जिम्मेवारी डाल दी। लगा कि पिताजी ने जो विश्वास जताया है हम पर उसे व्यर्थ नहीं जाने देंगे। कुछ तो करके दिखाएंगे। सबसे छोटे भाई कन्नू भाई गांव में मां-बाप और दो बहनों के साथ रह गए और बाकी तीनों भाई भीखू भाई, चंदू भाई और मेघजी भाई जेब में रुपए और आंखों में सपने लिए राजकोट शहर की ओर पहुंच गए। क्योंकि यह किसान परिवार से थे तो सबसे पहले इनके दिमाग में आया कि उसी से ही रिलेटेड कुछ करते हैं। फार्म इक्विपमेंट और फर्टिलाइज़र्स का पहले इन्होंने धंधा शुरू किया लेकिन धोखा खा गए। किसी ट्रेडर ने इन्हें नकली सामान बेच दिया। इन्हें बिजनेस की ज्यादा समझ तो थी नहीं। तो देखते ही देखते इनका बिजनेस अगले 2 साल में ही फ्लॉप हो गया। कहां इन्होंने सोचा था कि इसके बाद एक डेयरी रिटेल आउटलेट शुरू करेंगे। लेकिन घर का सारा रुपए डूबने के साथ इनका सपना भी डूब गया। पिताजी को अब ये क्या मुंह दिखाते इन भाइयों ने सोचा कि अब गांव वापस नहीं जाना है। अब तो जो करना है यहीं पर करना है।
लेकिन फिलहाल उनके सामने सवाल था कि अपना गुजारा कैसे चलाएंगे? रोजी रोटी कैसे खाएंगे? समस्या यह भी थी कि चंदू भाई की पढ़ाई केवल 10वीं तक हुई थी। तो क्या ही काम मिलेगा 10थ पास होने पर? इन्होंने बहुत काम की खोज करी। आखिरकार जाकर राजकोट के एस्ट्रोन सिनेमा में इन्हें एक छोटी सी नौकरी मिली। कैंटीन बॉय के तौर पर। इनका काम था सिनेमा हॉल के कैंटीन में लोगों को खाना सर्व करना।
यहां आता है इनकी कहानी का पहला लाइफ लेसन, पहला जीवन का मंत्र, कर्म ही धर्म है। इनके दिमाग में कभी यह नहीं आया कि यह छोटा काम है या बड़ा काम है। जैसा जो काम मिले, उस काम को ईमानदारी से करो। इसलिए कैंटीन बॉय के काम के अलावा फिल्मों के पोस्टर भी चिपका देते। कभी दरवाजे पर खड़े होकर टिकट चेक करते तो सिनेमा हॉल में ऑडियंस की कभी एंट्री करवाते। कभी इन्होंने सेठ से यह नहीं कहा कि आप इस काम के एक्स्ट्रा पैसे दीजिए। रात को शो के बाद सिनेमा हॉल की फटी हुई सीटों की भी मरम्मत करते हैं तो उन्हें चटनी के साथ एक प्लेट चोराफली खाने को मिल जाती। इस वक्त ये किराए के कमरे में रहते थे। इनके महीने की पगार थी ₹90 जबकि इनके भाई को ₹150 मिलते थे महीने के। इन ₹240 में मुश्किल से गुजारा हो पाता था। एक बार तो इन्हें अपने किराए के मकान से रात को चुपचाप भागना पड़ा क्योंकि किराया देने के लिए ₹50 तक नहीं थे। बाद में जाकर उन्होंने मकान मालिक को यह बकाया पैसे चुकाए और फिर जाकर वह किसी जान पहचान वालों के पास रहने लगे।
इंग्लिश में एक कहावत है लेट योर वर्क डू द टॉकिंग। यानी खुद की तारीफ करने की जरूरत नहीं होती। आपका काम खुद आपके लिए बोलेगा। चंदू भाई और उनके भाई की मेहनत को देखकर उनके एंप्लॉयर गोविंद खुंत ने कहा, अब तुम ही लोग चलाओ कैंटीन। क्योंकि वह इतने जज्बे के साथ मेहनत के साथ काम कर रहे थे कैंटीन में। उन्हें ₹1000 पर मंथ पर कैंटीन का कॉन्ट्रैक्ट दे दिया गया।
यह साल था 1976 जब एस्टन सिनेमा पर अमिताभ बच्चन स्टारर फिल्म कभी-कभी की स्क्रीनिंग हो रही थी। स्क्रीन पर अमिताभ बच्चन गा रहे थे। कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है। लेकिन चंदू भाई के पास ख्यालों में खोने का समय नहीं था। फिल्म में बस 5 मिनट का इंटरवल होता था जिसमें उन्हें बिजली की स्पीड से आर्डर देने होते थे। कोई आर्डर नहीं दे पाते थे तो फिर सिनेमा हॉल के अंदर जाकर कस्टमर को ढूंढते अंधेरे में और वहां सर्व करते। हां। 5 मिनट में स्पीड में काम कर रहा। इतनी प्रैक्टिस थी। ठीक है। इसमें से कोई आदमी बुला के पैसा अंदर चला जाता था। अंदर जाके ढूंढ लेता था मैं।
कस्टमर्स के बीच एक बड़ी पॉपुलर डिमांड थी। वेफर्स यानी पोटैटो चिप्स। लेकिन अब एक भारी समस्या उनके सामने आ गई थी। जो सप्लायर चिप्स डिलीवर करता था वो डिमांड के हिसाब से डिलीवर नहीं कर पा रहा था। डिलीवरी अक्सर लेट भी हो जाती थी। इसलिए कुछ समय बाद सप्लायर बदलना पड़ा। लेकिन बात नहीं बनी। तो फिर एक तीसरा सप्लायर ट्राई किया। लेकिन प्रॉब्लम वही ना रेगुलर माल मिलता और ना ही क्वालिटी कमाल की थी। एक सप्लायर, दूसरा सप्लाई, तीसरा सप्लाई। तीन सप्लायर ने लिया फिर भी रेगुलर माल नहीं मिलता था। क्वालिटी नहीं माल मिल रहा था।
यहां आता है इनकी जिंदगी का दूसरा मंत्र। चिंता नहीं चिंतन करना है। कोई प्रॉब्लम आए, कोई मुसीबत आए, चिंता नहीं, चिंतन करना है। वो कहते हैं कि कुदरत एक तरफ अगर दरवाजा बंद करती है तो कहीं और दूसरी तरफ कोई और दरवाजा खुल जाता है। इस पोटैटो चिप्स वाली प्रॉब्लम में भी उन्हें एक ओपोरर्चुनिटी दिखी कि क्यों ना हम खुद के ही अपने पोटैटो वेफर्स बनाने लगे।
साल था 1982। इस समय तक उनका परिवार गांव में अपना सब कुछ बेचकर राजकोट शिफ्ट हो चुका था। खुद का मकान ले लिया था। उनका परिवार सिनेमा हॉल की कैंटीन में मसाला सैंडविच सप्लाई कर रहा था जो लोगों की वन ऑफ द मोस्ट फेवरेट चीजें थी। लेकिन दिक्कत यह थी कि सैंडविच एक पेरिशेबल प्रोडक्ट था। आसानी से खराब हो जाता था। जबकि वेफर्स जल्दी से खराब नहीं होते थे। पैकिंग करते हुए एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ट्रांसपोर्ट भी किया जा सकता था उन्हें।
यहां आता है तीसरा लाइफ लेसन। कूद पड़ो। चंदू भाई कहते हैं कि ज्यादा पढ़े लिखे लोगों के लिए बिजनेस करना मुश्किल होता है क्योंकि वो बहुत ओवरथिंक करते हैं। बाकी ज्यादा पढ़े लिखे लोग बिजनेस नहीं कर सकेंगे। उसको ज्यादा विचार आएगा। यह करेंगे, ऐसा होगा, वैसा करेंगे, वह होगा, वह करेंगे, तो यह होगा। यह सोचते डर जाएंगे। कूद जाओ। हम्। यह बात तो सही है कि पहले अपॉर्चुनिटी ढूंढनी चाहिए। फिर उस पर मार्केट रिसर्च की जाए। लेकिन जो एमबीए कर लेते हैं, वह इसके बाद भी सोचते रह जाते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा, वैसा हुआ तो क्या होगा? और इसी रीजन से कई बारी बहुत पढ़े लिखे लोग घबराते हैं एक्शन लेने से। जबकि होना यह चाहिए कि अगर आपने अपॉर्चुनिटी ढूंढ ली है, मार्केट रिसर्च कर ली है, आपको बेसिक मॉडल ठीक लग रहा है तो फिर बस कूद पड़ो।
चंदू भाई भी कूद पड़े लिटरली नहीं मेटाफोरिकली। चंदू भाई ने अपने घर के आंगन में शेड लगाया और कढ़ाई चढ़ा दी। आलू छीलने और काटने वाली मशीन ₹10,000 की थी। वैसी ही मशीन ₹5,000 में बनवाई। इसे मिलाकर कुल 10,000 की इन्वेस्टमेंट हुई है। उन्हें पोटैटो वेफर्स बनाने का कोई अनुभव तो था नहीं। तो कैंटीन में काम करने के बाद वो एक्सपेरिमेंट करने लगे। थोड़ी मदद के लिए उन्होंने एक लड़के को हायर किया। लेकिन दिक्कत यह थी कि वो कई बारी काम पर ही नहीं आता था। तो चंदू भाई खुद ही रात भर जागकर पोटैटो वेफर्स फ्राई करते हैं। शुरुआत में बहुत सारी वेस्टेज होती लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे उन्होंने अपना ऑथेंटिक पोटैटो वेफर तैयार कर लिया। बहुत सारे ट्रायल एंड एरर के बाद इसका स्वाद ऐसा बनाया इन्होंने जो लोगों को रास आ गया।
अब तक इनके पास तीन कैंटीन थी। दो एस्टन सिनेमा में और एक कोटेचा गर्ल्स हाई स्कूल में। अपनी इन कैंटीन में इंटरनल सप्लाई के अलावा अब उन्होंने बाहर भी कदम बढ़ाने की कोशिश की। 25-30 दुकानदारों को अपने चिप्स के पैकेट्स दे दिए। साल 1984 वो अपने चिप्स के इन पैकेट्स के लिए एक ब्रांड नेम चुन लेते हैं बालाजी वेफर्स। दरअसल इससे कुछ समय पहले ही सिनेमा हॉल की कैंटीन में हनुमान जी का एक छोटा मंदिर सेटअप किया गया था। यहीं से ही इंस्पिरेशन लेकर इन्होंने ये ब्रांड नेम चुन लिया।
लेकिन कुछ समय बाद फिर एक बड़ी मुसीबत ने उन्हें आ घेरा। दुकानदार उन्हें परेशान करने लगे। अक्सर दुकानदार उन्हें आधे खाए हुए पैकेट वापस कर देते और यह कहते कि यह तो बासी हैं। चंदू भाई पेमेंट कलेक्ट करने जाते तो यह दुकानदार कभी फटे हुए नोट दे देते तो कभी झूठ बोलते कि हम तो तुम्हें पहले ही पेमेंट कर चुके हैं। लेकिन चंदू भाई के लिए मुसीबत का मतलब चिंतन करना था। समाधान निकालना। और इस प्रॉब्लम सॉल्विंग के प्रोसेस से सीखना।
अब अपने भाई के साथ उन्होंने साइकिल पर वेफर्स का थैला बांधा और निकल पड़े दूर दराज के गांव और कस्बों में। बाद में मोटरसाइकिल और रिक्शा पर भी यही किया। जरूरत बस यही थी कि इन पोटैटो चिप्स को एक बार कस्टमर्स तक पहुंचाया जाए। उसके बाद तो उनकी क्वालिटी और उनका टेस्ट काफी था लोगों को बांधे रखने के लिए। अगले कुछ सालों में दोस्तों पूरे शहर में इनका नाम हो गया। अब वीरानी बंधु महीने के 20-30,000 कमा रहे थे। डिमांड इतनी बढ़ चुकी थी कि 1989 में उन्होंने 50 लाख का लोन ले लिया और राजकोट के एजीआईजीआईडीसी इंडस्ट्रियल एरिया में एक प्लांट लगा लिया। यह दोस्तों उस समय गुजरात का सबसे बड़ा पोटैटो वेफर्स प्लांट था।
लेकिन मुसीबतें अभी भी उनके पीछे इस तरह लगी थी जैसे विक्रम की कमर पर बेताल चढ़ा हो। प्लांट की नई मशीनरी सही से काम नहीं कर रही थी। कंपनी के इंजीनियर्स को बुलाते तो वह हर बार 500 के होटल वगैरह के बिल थमा देते। उफ समय की मार जाने किसी से क्या-क्या करवाएगी। अब उन्होंने मशीनों को स्टडी किया और खुद से उनकी मरम्मत करने लगे। 10वीं पास चंदू भाई अब पार्ट टाइम इंजीनियर बन चुके थे।
कुछ साल बाद यह बिजनेस बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम से कंपनी की शक्ल ले चुका था। कंपनी के तीन डायरेक्टर्स थे। भीखू भाई, कन्नू भाई और चंदू भाई। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
यहां आता है चौथा लाइफ लेसन। चंदू भाई कहते हैं कि लोगों ने मीराबाई को रोका। लेकिन वो अपनी धुन में रही। किसी काम को लेकर ऐसी धुन होनी चाहिए। आपको वो काम इतना अच्छा लगना चाहिए कि आप उस पर पूरा जम के फोकस कर सकें। इसीलिए जब कंपनी को बेचने का ऑफर आया तो उन्होंने यह ऑफर ठुकरा दिया। जब यह बात चल रही थी तो उनके पास 500 से ज्यादा कस्टमर्स के लेटर्स आए थे और वो बालाजी वेफर्स खाते हुए बड़े हुए थे। आप नहीं मानोगे 500 लेटर आया। आप हम बालाजी से जुड़े हुए हैं सालों से। अगर एमएसी को बेच दिया तो एमएसी इसका दाम भी बढ़ा देगी और टेस्ट भी शायद यह नहीं रहेगा। अगर आप किसी एमएसी कंपनी को दे देंगे तो रेट बढ़ना जरा बढ़ा देंगे। ये ऐसा होगा हम तो चिप्स खा के बड़े हुए हैं।
चंदू भाई ने कहा कि अगर उन्होंने हमें पार्टनरशिप ऑफर की होती तो हम ले सकते थे। 510% का स्टेक उन्हें दे सकते थे। लेकिन इससे ज्यादा नहीं। उन्होंने सोचा था कि गवर्नेंस पॉलिसी और एक्सपेंशन सीखने के लिए Pepsi एक अच्छी पार्टनर हो सकती है। लेकिन बाद में उन्होंने खुद ही से ही यह सीख लिया। स्ट्रांग प्रोफेशनल्स को हायर किया जाता है। पहले कंपनी में मैक्सिमम सैलरी थी ₹25 लाख। अब ₹1.5 करोड़ के पैकेज पर लोगों को हायर किया जाने लगा। फिर हमने डेढ़ ₹1.5 करोड़ में साल में एक पुणे से आदमी टंकी प्रोजेक्ट वाला एक लाया। आईपीओ रिलीज़ करने का भी प्लान कैंसिल कर दिया गया। उनका विचार है कि जिस तरह पानी में तरंग आगे बढ़ती है वह भी इसी तरह स्टेडीली आगे बढ़ते रहेंगे।
गुजरात में उन्होंने अपना किला तैयार कर लिया है। जहां अंकल चिप से लेकर पेप्सिको के लेस चिप्स भी उन्हें टक्कर नहीं दे पाए हैं। 2009 का यह इकोनॉमिक टाइम्स का आर्टिकल देखिए जिसमें बताया है कि लेस और हल्दीराम्स वाले उनके पास सीखने के लिए आए। लेस ने यह कहा कि बालाजी वेफर्स के ऑपरेशन की एफिशिएंसी और सिंपलीसिटी को देखकर प्रभावित हैं। उनके ऑपरेशंस का कीवर्ड है सेटिस्फेक्शन। सप्लाई चेन में जितने भी लोग हैं सभी को सेटिस्फाइड रखना। सप्लायर से क्वालिटी वाला कच्चा माल खरीदना और टाइम पर पेमेंट करना।
चंदू भाई ने द प्रिंट को बताया कि उनके 2000 सप्लायर्स हैं और उनमें से 80% लोग किसान हैं। वो कहते हैं कि बिजनेस केवल अपने आप को थ्राइव करने के लिए नहीं होता। आसपास के सभी लोगों की मदद करनी चाहिए। डिस्ट्रीब्यूटर्स, डीलर्स, रिटेलर्स के साथ उनके इतने क्लोज कनेक्शंस कि कोई भी उनसे डायरेक्टली मिल सकता, बात कर सकता। वह गर्व से कहते हैं कि उनके साथ ही लोकल डिस्ट्रीब्यूटर्स की वेल्थ भी बढ़ती रही। salesforce.com पर बताया गया है कि किस तरह उन्होंने अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स की मदद करने के लिए एक डीलर मैनेजमेंट सिस्टम भी बनाया। रिकॉर्ड कीपिंग जैसे बोरिंग मोनोटोनस टास्क को ऑटोमेट किया गया। बिलिंग में विजिबिलिटी बढ़ गई। पहले फील्ड विजिट्स और ऑडिट्स का डाटा, स्प्रेडशीट्स, ईमेल्स, टेक्स्ट मैसेजेस में बिखरा हुआ होता था। लेकिन अब चैनल पार्टनर्स का डाटा यूनिफाई किया गया, स्ट्रीमलाइन किया गया ताकि इससे एक्शनेबल इनसाइट्स मिल सके।
बात करें उनकी कंपनी के 7000 एंप्लाइजस की तो वो उनकी टीम का हिस्सा है। सब खुद की मोटिवेशन से काम करते हैं। किसी को कोई सेल्स टारगेट नहीं दिया जाता और यहां आता है पांचवा लाइफ लेसन। सेल्स नहीं सर्विस। चंदू भाई कहते हैं कि सेल्स का मतलब हुआ अपनी तरफ से कस्टमर पर पुश करना। वो ऐसा नहीं करते। कस्टमर को उनका प्रोडक्ट इतना पसंद आता है कि वह सामने से ही डिमांड आने लग जाती है और वह उसी हिसाब से सर्विस करते हैं। सेल करने का हमारे डिक्शनरी में शब्द नहीं है। सेल मतलब जबरदस्ती बेचो उसको सेल बोलते हैं। सर्विस दो। सर्विस क्यों दो के माल तो खत्म हो जाता है। कंज्यूम करता है। सर्विस दो। यानी कि एक पुल स्ट्रेटजी है। उनके डीलर को माल बेचना नहीं होता। सिर्फ डिलीवरी करनी होती है।
वो कहते हैं लोग लक्ष्मी के पीछे भागते हैं। लेकिन आप नारायण नारायण करते हुए अपना काम करते रहो। जहां नारायण है वहां लक्ष्मी अपने आप आ जाएंगी। लोगों को जोड़ने से यह हो जाता है। नारायण नारायण करते रहो। लक्ष्मी अपने आप आती है। यानी आप अपनी टीम को सेटिस्फाइड रखते हुए कस्टमर्स को क्वालिटी प्रोडक्ट दो। आपका बिजनेस बढ़ेगा और बिजनेस बढ़ने से प्रॉफिट तो आएगा ही।
आज के दिन दोस्तों बालाजी वेफर्स का प्रॉफिट बढ़ते ही जा रहा है। इंडिया में अब उनकी चार फैक्ट्रीज हैं। गुजरात में राजकोट और वसाड़। मध्य प्रदेश में इंदौर और उत्तर प्रदेश में लखनऊ। चिप्स के अलावा वो नाचोस, आलू सेब, सेव मुरमुरा, खट्टा मीठा, मिक्स नमकीन, मूंग दाल, पंजाबी तड़का, सॉल्टेड पीनट्स, चनाजोर गरम, पॉप रिंग्स जैसे 50 से ज्यादा स्नैक्स भी बेचते हैं। 14 स्टेट्स में आज के दिन इनकी प्रेजेंस है और इसके अलावा यूएई और ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी इनका सामान एक्सपोर्ट होता है। पूरे देश भर में अब यह स्नैक्स मार्केट में पेप्सिको और हल्दीराम्स के बाद थर्ड नंबर पर है। जबकि वेस्टर्न इंडिया में यानी गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान में यह एक डोमिनेंट प्लेयर है।
आज के दिन भी बालाजी वेफर्स एक फैमिली बिजनेस है। चंदू भाई के भाई उनके साथ जुड़े हुए थे और अब उनके और उनके भाइयों के बेटे कमान संभाल रहे हैं। ऐसे में एक सवाल आपके दिमाग में आएगा। क्या कभी इनके भाइयों के बीच में या परिवार में कोई ब्लेम गेम हुआ? कोई लड़ाई हुई कभी? इस पर चंदू भाई कहते हैं कि महाभारत में मेरा मेरा करते रहे और सब मारे गए। मेरा मेरा मेरा सबको मार दिया। हमारा इतिहास है भारत का रामायण तेरा 13 इसको तार दिया। जबकि रामायण में राम ने भरत को कहा कि राज्य तेरा है। भरत ने कहा कि नहीं भैया राज्य आपका है और इस तरह तेरा करते हुए सब पार उतर गए। इसीलिए यह देखना चाहिए कि भले ही कोई गलती कर दे लेकिन आप किसी पर उंगली मत उठाओ। यह ध्यान रखो कि सब टीम में काम कर रहे हैं। कुछ भी हो किसी का मन नहीं टूटना चाहिए। मान लो कि एक भाई हीरो है और तीन जीरो हैं। लेकिन जब एक के पीछे तीन जीरो लगते हैं तो वह 1000 बन जाता है। यानी कि जिसकी जो स्ट्रेंथ है उसे लेवरेज किया जाए और कोऑपरेशन में काम किया जाए। इनकी फैमिली आज भी दोपहर को 1:00 बजे एक बहुत बड़ी डाइनिंग टेबल के अराउंड बैठकर इकट्ठे लंच करती है।
आज वेंचर कैपिटल फंडिंग फास्ट एंड फ्यूरियस बिजनेस एक्सपेंशन के दौर में बालाजी वेफर्स की कहानी एक बड़ी अनोखी कहानी है जो हमें स्लो एंड स्टेडी विंस द रेस का पार्ट पढ़ाती है। चंदू भाई वीरानी कहते हैं कि हमने खुद चुन चुनकर माल खरीदा, प्रोसेसिंग की, उसको फ्राई किया। मसाला डालकर पैकिंग करी, बाइक से बेचा, रिक्शा और टेमो से बेचा। फिर लोगों को जोड़ा और जोड़ते जोड़ते लाखों लोग जुड़ गए क्योंकि हमने हर चीज को सीखा अपने बिजनेस में हर चीज खुद से करी इसलिए आज हमको हर चीज की समझ है।
तो आप भी दोस्तों अपने कर्म को धर्म मानते हुए ईमानदारी से काम कीजिए। अपने इंटरेस्ट के आधार पर बिजनेस की अपॉर्चुनिटी ढूंढिए। मार्केट रिसर्च करने के बाद ठीक लगे तो उसमें कूद जाइए और एक धुन के साथ बिजनेस को चलाइए। अपने साथ में काम करने वालों को सेटिस्फाइड रखिए। कस्टमर्स को अफोर्डेबल प्राइस पर बढ़िया प्रोडक्ट दीजिए। बीच में मुसीबतें आएंगी। कहां नहीं आती? लेकिन आपको चिंता नहीं करनी, चिंतन करना है।
कमेंट्स में बताइए आपको इस वीडियो से क्या सीखने को मिला और आपका क्या सपना है। अगर आपको यह कहानी इंस्पिरेशनल लगी दोस्तों, तो इस वाले वीडियो में एक और बहुत ही इंस्पिरेशनल और मोटिवेशनल कहानी मैंने बताई है। यह वाली कहानी आपके रोंगटे खड़े कर देगी। यहां क्लिक करके देख सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।
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