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एक ही रात में किसी जमाने में सुल्तान अब्दुल्लाह नाम का एक बादशाह था। जब इसकी उम्र बहुत ज्यादा हो गई तो इसने बादशाही छोड़ दी और दरीश की जिंदगी बसर करने की ठानी। इसकी बेटी शहजादी लैला खूबसूरती में चांद को भी शर्मा देती थी। मगर बाप की तरह हर किस्म के आराम और आसाइश के बावजूद इबादत में वक्त गुजारती थी।
सुल्तान अपनी बेटी को छोड़ने से पहले शहजादी लैला से कहा। बेटी मैं अब दुनिया छोड़कर तन्हाई के गुजरे हुए अयाम की याद में जिंदगी बसर्र करना चाहता हूं। इसलिए मेरी ख्वाहिश है कि तू किसी शहजादे से शादी कर लो और आरामो आसाइश से रहो।
लैला ने कहा बाप आपकी सिरमात पर सब आराम कुर्बान करने को तैयार हूं। शादी के झमेलों में पड़कर आपकी हमारी से महरूम रहना बदबख्ती की दलील है। सुल्तान ने हरचंद इसरार किया। मगर लैला ने बाप से जुदा होने से इंकार कर दिया। बाप बेटी अपनी जिंदगी खुदा की इबादत और इसकी लातिनी के खेतों में फसलें करते रहे।
कुछ दिनों बाद सुल्तान का खुदा के पास से बुलावा आ गया। इसकी मौत हो गई। अब बेटी ही रह गई थी। अमीरों, मजदूरों ने शादी की तजवीजों और इसरार से इसका नाक में दम कर दिया। इसके बाद के वफादार बूढ़े वजीर ने शहजादी को मोहब्बत से समझाया कि बादशाह के वफात के बाद शादी से इंकार करना दुनिया की रिवायत के मुताबिक मुनासिब मालूम नहीं होता। औरत जात को हर किसी से सलाम मशवरा लेकर आखिर वजीर के कहने पर लैला ने एक बड़े साहूकार से जिसका नाम करीम था शादी कर ली।
लैला और करीम बड़े प्यार व मोहब्बत से रहते थे। 2 साल बाद करीम ने अपनी बीवी से कहा, बगदाद में मेरा कारोबार है। अब मैं कुछ अरसे के लिए आपसे इजाजत चाहता हूं कि वहां जाकर अपना कारोबार देखूं क्योंकि इस दुनिया का ऐशो आराम रुपयों से ही मिलता है। आप यहां मेरे भाई हसन की हिफाजत में रहें। मैं आंधी की तरह जाऊंगा और बगले की तरह वापस आऊंगा।
लैला ने कहा, मैं खुद भी तो आपसे ज्यादा नहीं होना चाहती। तरफ जाना जरूरी है। करीम लैला को रुखसत देकर सफर पर रवाना हुआ।
कुछ अरसा गुजरा तो हसन के पास आता जाता बंद हो गया। करीम का शहर बगदाद में मजाज बहुत खराब पड़ गया। इसके भाई हसन ने लैला से उन दिनों हीरी वाली अंगूठी मांग ली जो करीम ने इसे शादी में दी थी। किसी औरत को अपने शौहर की दी हुई अंगूठी किसी और को दे देना बड़ी बुराई की बात समझी जाती थी। ऐसी औरत के मुताबिक लोग समझते थे कि इसने शौहर को दिल से निकाल दिया है और ईरान के पुराने जमाने के कानून के मुताबिक ऐसी बेवफा बेवफाई की सजा मौत ही थी।
हसन की इस कमीना हरकत पर लैला को बहुत रंज हुआ। हसन ने तमाम जतन किए मगर शहजादी की एक ना चली। लैला ने हसन को बहुत मलामत की और अपने घर पर इसका आना-जाना बंद कर दिया। अब हसन अजीब मुश्किल में फंसा था कि वह समझता कुछ और हुआ। कुछ और किया। इसे अंदेशा था कि लैला हसन की कमीना हरकतों की शिकायत इसके भाई करीम से जरूर करेगी।
हसन ने लैला की खादिमा की मारफत इसकी अंगूठी चोरी करवा ली। और इस अंगूठी को हाकिम के सामने पेश करके दावा किया कि इसकी भाभी यानी मेरे सगे भाई की बीवी ने अपनी शादी की अंगूठी एक बदमाश को दे दी थी। इसलिए इसे शौहर से बेवफा बेवफाई करने की सजा मिलनी चाहिए।
अब क्या था? पहले जमाने में बहुत सख्त इंसाफ होता था। अंगूठी को दूसरे के कब्जे में देखकर यह तस्लीम कर लिया गया कि शहजादी बेवफा बेवफाई की मुजरिम है। इसलिए इसे मौत के घाट उतार देना चाहिए। मौत का हुक्म टाला नहीं चलता। लैला अपनी बेगुनाही पर रोती रही। मगर खुदा के सिवा इसकी बेगुनाही को कोई जानता ही नहीं था। तो मानता क्यों? लैला को शाम के वक्त गर्दन तक जमीन में गाड़ दिया गया और इस पर पत्थर बरसाए गए कि रात को सर्दी में काम तमाम कर देगी।
आधी रात को उमर नामी डाकू निहायत खूबसूरत और तेज रफ्तार घोड़े पर सवार उधर से गुजरा। घोड़ा शहजादी को देखकर डर गया और रुक गया। डाकू इस मुकाम पर घोड़े को वापस लाया और इसने सुना ऐ खुदा मुझे मौत से डर नहीं। मगर यह कैसा कसूर है? हम बेगुनाह हैं और कोई नहीं। मगर तू जरूर जानता है।
डाकू अंधेरे में खड़ा ब्याह सुन रहा था। वह घोड़े से उतरा। डाकुओं की इसी फुर्ती के साथ शहजादी को गली से निकालकर अपने घोड़े पर बिठाया और हवा हो गया।
लैला को जब होश आया तो इसने डाकू से पूछा। आप कौन हैं और मुझे कहां ले जा रहे हैं? डाकू ने कहा, "मैं डाकुओं का सरदार हूं। तेरी मुश्किल पर मेरा दिल पिघल गया और मैं तुझे अपने घर ले जा रहा हूं। डरो मत। मैं तुझे निहायत आराम व इज्जत से रखूंगा। रात की तारीकी में हवा की तरह बातें करता चला जा रहा था। दो घंटे बाद डाकू एक मकान पर पहुंचा। शहजादी को उतारा और अपने घर में दाखिल हुआ।
डाकू की बीवी इसके इस्तकबाल के लिए दौड़ी आई और एक नौजवान लड़की को देखकर हैरान हुई कि आज कैसा माल उड़ाकर लाया है। इसने पूछा तो डाकू ने कहा यह मुश्किल की मारी है। मैं इसे मौत के मुंह से निकाल लाया हूं। इसे अपना मेहमान समझो और इसकी हर तरफ हिम्मत और दिलजोई करो।
लैला डाकू के घर में पूरे इत्मीनान से रहने लगी और खुदा की याद में अपना वक्त बस करती। डाकुओं के घर से इसे मोहब्बत भी हो गई। वह डाकू के बेटे यूसुफ से प्यार करती थी और डाकू की बीवी की संगदेल की कस्से सुनकर हैरान होती थी और इस खुदा का शुक्र अदा करती थी जिसने ऐसे बेरहम डाकुओं के दिल को एक बेबस लड़की के लिए रहम से भर दिया था।
मगर मुश्किल ने यहां भी इसका पीछा ना छोड़ा। डाकू सरदार का एक हबशी गुलाम लैला को वी करना चाहता था। डाकुओं की तरफ से कभी कभार कुछ चुराता और छुपाकर इसे दे दिया करता। लैला अगर बुरी हालत में थी मगर इज्जतदार खातून थी। वह ऐसी बुराई की हरकतों पर क्यों उतर आए? इसने अपने गुलाम को ना सिर्फ ठुकरा दिया बल्कि इसे कई हफ्ते तक मारा। वह बड़ा बदमाश हबशी गुलाम शहजादी के आने से इसे बड़ी तकलीफ हुई थी। इसने शहजादी से कहा तू ना मानो एक दिन यही डाकू जो तुझे सर आंखों पर बिठा के रखता है तेरी सर तन से जुदा ना कर दे तो मेरा नाम नहीं इतनी गर्म हो तो तुझे जहन्नुम दिखा दूंगा और तेरी इस परसकून की कैद का मजा भी तो मैं सिखा दूंगा।
शहजादी लैला एक गुलाम की उल्टी सीधी बातें सुनकर खून के घूंट पीकर रह गई। अब ज़द नामी गुलाम एक रात उठा और डाकू के बेटे के कमरे में गया और और एक लम्हे दिल कातिल के तौर पर इसने यूसुफ को अंदर से हिला दिया। खून से लथपथ पड़ा वह ज़द दबे पांव शहजादी के कमरे में गया और वह खंजर शहजादी के तकिए के नीचे छोड़ दिया और खुद जाकर अपने कमरे में लेट कर सो गया।
सुबह सवेरे ही डाकू अपने बेटे यूसुफ को जगाने गया। बेटे के कत्ल के नजारे से इसकी आंखों में दुनिया अंधेर हो गई। इसने देखा कि इसके कलेजे का टुकड़ा कत्ल हो चुका है। इस पर सदमा सा लग गया। डाकू की बीवी ने कमरे में दाखिल होते ही अपने रोने से आसमान को हिला दिया। बदमाश भी दौड़ा हुआ पहुंचा और यह हालत देखकर इसने भी रोना शुरू कर दिया। वह बहुत रोया, पीटा और चीखा चिल्लाया। वह चिल्लाता था और कहता था अगर मुझे मालूम हो जाए कि यह किसका काम है तो जब तक इसके से बदला ना लूं मुझ पर खाना पीना हराम है।
थोड़ी देर के बाद कहने लगा देखें तो सही मां यह अंदर की चीजें हैं जो फर्श पर पड़ी हैं। शायद सराग लगाने में मदद दे सकें कि कातिल कौन है? खून के धब्बों पर वह चलता हुआ डाकू और इसकी बीवी को साथ लेकर शहजादी के कमरे में पहुंचा। शहजादी लैला अब भी सो रही थी। कमरे में पहुंचते ही इसने चिल्लाना शुरू कर दिया। मेरे मालिक इस डायन ने तेरे बेटे को हल्ला दिया है। हाय जालिम तूने नरमी का क्या बदला लिया? शहजादी का जो हाल हुआ वह बयान से बाहर था। वह परेशान व बेजुबान खड़ी थी और बदमाश भी लपक लपक कर इसे कत्ल करना चाहता था। जब शहजादी के तकिए के नीचे से खंजर भी निकल आया तो इसने शहजादी पर तलवार उठा ली। मगर डाकू ने इशारे से इसे रोक दिया। अब सीधा रहकर तलवार तोलता और शहजादी को कत्ल करने के लिए लपकता।
डाकू ने इसे कमरे से बाहर निकल जाने का हुक्म दिया। बीवी से खामोश रहने का इंतजार किया और दिल में सोचा लैला पर शुभा करना ठीक नहीं। मगर फिर भी इससे पूछो तो सही कि आखिर मामला क्या है? शहजादी से पूछा गया तो इसने कहा मैं बेगुनाह हूं। आपके घर के हर हाल में यह जल मुझ पर मेरे फसाने को तोड़ा गया है। मुझ पर इल्जाम लगा है क्या कि खुदा मेरी बेगुनाही पर कब्जा है और मेरी इससे आ जाना दुआ है कि एक दिन मेरी जिंदगी में ही आपको यह हकीकत वजह कर दे।
डाकू को यकीन हो गया कि यह काम इसके का नहीं है। इसके बेटे को गुलाम ने कत्ल किया। मगर डाकू की बीवी पर बच्चे के कत्ल का सदमा बहुत ज्यादा था। और क्योंकि बाजार शुभा लैला पर था तो डाकू की बीवी ने कहा लैला का मेरे सामने मौजूद रहना मेरी आंखों में कांटा और दिल में नश्त्र चुभोने जैसा है। यह किसी सूरत मेरे सामने नहीं रह सकती।
डाकू ने कहा मैं मजबूर हूं। आप यह तो खुद ही बेहतर जानती हैं कि मेरे बेटे को किसने कत्ल किया। मगर अब तेरी यहां से रुखसत हो जाना ही मुनासिब है। ये लो पांच अशरफियां किसी वक्त तेरे काम आएंगी। लैला ने सर झुकाकर अदब से कहा, सरदार आपने मुझे मौत के मुंह से छुड़ा लिया। मैं तमाम जहान से आपका एहसानमंद हूं। यह मेरी बात है कि आपके बेटे का कत्ल का शोभा मुझ पर किया गया। मैं यहां से चली जाऊंगी। मगर आप यकीन जानिए। शरीफ मर्द ने ही यह किया है। अगर मैं आपकी इज्जत बचा सकती तो आप पर यह जुल्म ढाना मुझे क्यों कर मुकिन होता। वह खुदा जिसने पहले मौत के पंजे से बचाया। अब भी मेरी हिफाजत करेगा। खुदा करे कि एक दिन इस कत्ल का सही आपको मालूम हो जाए। आपके इन अशरफियों के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। मैंने बहुत दुख देखे हैं। मुझे इनकी जरूरत नहीं।
डाकू ने इसरार किया और कहा, अशरफियों की थैली साथ ले जा। रुपया हर मुश्किल का हल है और तू शरीफ वि इज्जतदार लड़की है। कमजोर हो जाएगी। लैला ने अशरफियों की थैली संभाली और डाकू को आखिरी सलाम करके वहां से चल पड़ी।
हांटा दिन भर में 10 पांच कोस चली। शाम होने को थी कि एक गांव में पहुंच गई। क्या करें और किसके पास जाए? ना कोई घर था ना ठिकाना। इसने जाकर एक दरवाजा खटखटाया। यह फातिमा नामी बूढ़ी औरत का मकान था। इसने दरवाजा खोला। लैला ने कहा, बूढ़ी मां, मैं मुसाफिर हूं। अब यहां पहुंच गई हूं। मुझे अपने यहां रात बस करने की इजाजत दे दीजिए तो बहुत मेहरबानी होगी। बूढ़ी ने कहा, बेटी आओ इस गरीब घर को अपना घर समझो। लैला बूढ़ी के पास बैठ गई और बूढ़ी को पैसे देकर बाजार से अपने लिए खाना मंगवाया और दोनों ने मिलकर खाना खाया। लैला ने अपनी कहानी सुनाई। अपनी आप बीती और कुछ देर बाद रोकर सो गई।
सुबह उठते ही लैला बूढ़ी को साथ लेकर सामान खरीदने के लिए बाजार की तरफ रवाना हुई। रास्ते में एक जगह देखा कि बड़ी भीड़ चल रही है। सिपाही एक आदमी की मूछें कसे हुए ले जा रहे हैं। पूछने पर पता चला कि एक शख्स अपना कर्ज अदा ना कर सका। इसी वजह से इसे फांसी पर लटकाया जा रहा है। लैला ने पूछा इस कर्ज का क्या है? मालूम हुआ कि 400 दिहम के करीब है। लैला ने पूछा। अगर इस वक्त यह कर्ज अदा कर दिया जाए तो क्या तुम इसे छोड़ दोगे? लोगों ने जवाब दिया हां, लैला ने लोगों को रोका और कर्जदार को दरहम गिनकर तमाम अशरफियां अदा कर दी। सिपाहियों ने कर्जदार अहमद को आजाद कर दिया।
लोग हैरान थे कि आखिर यह कौन अल्लाह की नेक बंदी है जिसने एक आदमी की जान बचाई। वह भागा-भागा उसी तरफ गया और शहजादी को दो कोस पर जाकर ढूंढ लिया। इसने शहजादी को सलाम किया और बाकायदा इसके शुक्रिया अदा करने के बजाय इसे पूछने लगा। आपके पास और कितनी अशरफियां हैं? क्या अच्छा हो अगर आप मुझसे शादी कर लें? शहजादी ने इसे बहुत बुरा भला कहा। डराया धमकाया मगर वह कमीना इसका पीछा ना छोड़ता था।
लैला एक चश्मे के किनारे जरा दम लेने को बैठ गई। अब इस बदमाश की शरारत सुनिए। करीब ही एक जहाज खड़ा था। इसके कप्तान के पास पहुंचा और इसे कहने लगा, "मेरी यह कैसी लौंडी है जिसके सामने कोई भी काफी बड़ी भी पानी भरती नजर आती है। मुझसे वह शादी करने पर राजी नहीं होती। मैं इसे बेचने पर मजबूर हूं। अगर आप 500 अशरफियां दे दें तो आप ऐसी लौंडी के मालिक बन सकते हैं जो बादशाहों को भी नसीब नहीं। कप्तान राशिद बदमाश के साथ चल पड़ा। और दूर से लैला की एक हल्की सी झलक देखकर इसने बदमाश को 500 अशरफियां दे दी। बदमाश तो सर पर पांव रखकर अपने घर की तरफ भागा और कप्तान लैला के पास आकर हंसकर कहने लगा ऐ चांद के टुकड़े जो आसमान से जमीन पर उतर आया है। मैंने तुझे चांदी के दरहम खरीदा है। मगर जान से ज्यादा जी रखूंगा। मेरी इससे ज्यादा खुशनसीबी और क्या हो सकती है कि तेरे जैसी मूरत मेरे हाथ लग गई जहाज पर चलो और तू मेरे वीरान व अंधेरे घर को आबाद व रोशन कर दे।
लैला बड़ी तकलीफ और बेताबी से यह बातें सुन रही थी चिल्ला कर बोली पागल नरगिस कौन मरा मुझे बेचने वाला और कौन गधा मुझे खरीदने वाला है तू क्या बकवास कर रहा है कप्तान राशिद आखिर सिपाही आदमी था गुस्से से चमक कर बोला यह गुलाह तुझे बेचने वाला वह अपने दाम ले जा रहा है। चलो। यह कहते हुए इसने लैला को कंधे पर लादा और जहाज पर कर दिया। लैला बेचारी चीख ही चिल्लाई। मगर कप्तान इसे जल्दी से जहाज पर डाल दिया और लंगर उठाकर झटपट जहाज को चलता कर दिया।
शहजादी की परेशानी का अंदाजा कीजिए। एक वेश्या आदमी के पंजों में गिरफ्तार है और बचने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। कप्तान तो लैला को कोई कसर खाली लौंडी समझता था। इसने तमाम जतन किए मगर लैला की परेशानी का एक पल भी कम ना हुआ। आखिर खुदा का करना चाहिए। हुआ कि एक दिन सख्त तूफान आया और जहाज समुंदर के बीच में थपड़े खाने लगा और मुसाफिर कलमा पढ़-पढ़ कर खुदा को याद करने लगे। तूफान बढ़ता ही चला गया। यहां तक कि जहाज डूब गया। लकड़ियां बिखर गई और सब मुसाफिर भी डूब गए। मगर लैला और कप्तान अलहदा अलहदा तख्तों पर सवार वहीं चले जा रहे थे। लैला तो 24 घंटे की मुश्किल के बाद एक मकाम पर किनारे पर जा लगी और कप्तान बहते-बहते इस मकाम से दूर किसी दूसरे शहर में जा पहुंचा।
लैला जिस जजीरा निसवान के किनारे पहुंची, वह बहुत आबादी वाली और खुशहाल थी और मुल्क का सारा इंतजाम औरतों के पास था। जिस दिन लैला टूटे फूटे तख्ते पर सवार जजीरे के करीब ही जा रही थी। उस दिन बहुत सी औरतें एक झालर बनाने समुंदर के किनारे जमा थी। इनमें से चंद मल्लिका सफिया के हुक्म से लैला को अपनी कश्ती में किनारे लगा लिया। बहुत सी औरतें लैला के इर्द-गिर्द जमा हो गई और लगी तरह-तरह के सवाल पूछने। मल्लिका ने सबको मना कर दिया। लैला को खिलाया पिलाया और अच्छे-अच्छे कपड़े बनवाए। जब इसकी तबीयत संभली तो कहा अच्छी बेटी अब तू अपनी दास्तान सुनाओ।
शहजादी लैला ने अपनी रंज गम से भरी हुई आपबीती शुरू से आखिर तक सुना दी। मल्लिका निहायत मुतासिर हुई। शहजादी को प्यार किया और कहा अच्छी बेटी मर्दों की मछली से तू इस लायक ना थी कि तू इसकी ज़ैनत बनती। अच्छा हुआ तू यहां आ गई। इत्मीनान से रहो। इस मुल्क में औरतों की बादशाही है। यहां तुझे कोई बेकार मर्द परेशान ना कर सकेगा।
लैला इस जजीरे में आराम के साथ रहने लगी। इबादत व सेवाओं से कोई काम ना था। चंद ही दिनों में बड़ी परहेजगार मशहूर हो गई। जिस किसी को कोई तकलीफ होती, वह इसके पास दुआ कराने पहुंच जाता और इसकी दुआओं से लोगों के दुख दर्द दूर हो जाते और हर किस्म की बीमारियां दूर हो जाती। आखिर बात यह हुई कि मल्लिका सफिया ने अपने दिल में पहचान लिया था कि इसके बाद सिर्फ वही इसकी रियासत की मलिका होने के लायक है। चुनांचे इसने एक दिन दरबार में ऐलान किया और लैला को अपना जनशीन मुकर्रर कर दिया। इस ऐलान पर जजीरा भर की औरतें खुश हो गई क्योंकि लैला से बेहतर मलिका उन्हें नजर ना आती थी। एक साल के अंदर ही बूढ़ी मलिका सफिया जन्नत को सजा गई और लैला मलिका बनकर तख्त पर बैठी।
लैला तो आखिर बादशाह की बेटी हुकूमत के सब रंग ढूंढती थी। इसने मुल्क के इंतजाम में वह असलाह की कि देखते ही देखते वह मलिका निसवान हो गई। लैला की शोहरत भी साथ बढ़ती गई। हर तरफ इसकी दुआओं की बरकत की शोहरत दूर-दूर मुल्कों में फैल गई और हाजतमंद लोग दूर और नजदीक से दुआ कराने खींचे चले आने लगे।
एक दिन दरबारियों ने मुल्क के खजाने के आगे अर्ज किया कि शहर की सराय में छह मुसाफिर आए हैं जो किसी दूसरे मुल्क से आए हैं और मल्लिका के दरबार में हाजिर होने की इजाजत चाहते हैं। इनमें से एक अंधा है, एक गुलाम है और एक को मिर्गी का दौरा है। मल्लिका ने हुक्म दिया कि इन लोगों को हाजिर किया जाए। जब वे लोग दरबार में हाजिर हुए तो मलिका और इसकी दरबारियां ऐसे पर्दे में बैठी हुई थी जिससे वह तो बाहर वालों को देख सकती थी मगर बाहर वाले उन्हें देख ना सकते थे। मुसाफिरों ने मल्लिका को झुक कर सलाम किया और मल्लिका ने उनसे पूछा कि वे कहां से हैं और क्या चाहते हैं? इनमें से एक ने दूसरों की तरफ से कहा ए मल्लिका हम जानते हैं कि खुदा आपकी दुआओं को कबूल फरमाता है। हम बड़े पापी हैं। आपकी मारफत में हाजिर हुए हैं। आपकी जरिया खुदा से माफी मांगने।
मलिका ने कहा, मैं यह माहिरत नहीं समझती तो सबसे पहले हर एक अपने गुनाहों का इकरार करे। इस तरह की इनमें धरा बराबर झूठ की मिलावट ना हो। कोई दूसरी बात ना करूंगी। एक ने बढ़कर अर्ज किया मलिका का हुक्म सर आंखों पर हम बारी-बारी अपने-अपने गुनाह सुनाते हैं। सबसे पहले मैं अपनी हालत अर्ज करता हूं। मैं एक साहूकार हूं। मेरी शादी कई साल पहले एक ऐसी खूबसूरत खातून से हुई जिसके सामने परी भी शर्मा जाती थी और अल्लाह ने खूबसूरती के साथ अकल भी दी थी। मुझे कारोबार की जरूरत से अपने वतन से बाहर जाना पड़ा और मैं इसे अपने भाई की हिफाजत में छोड़ गया। वापसी पर भाई ने मुझे बताया कि वह मेरी तरफ से बेवफा हुई थी और मुल्क के कानून के मुताबिक इसे जिंदा गाड़ दिया गया था। हमारे लिए बड़ी बेइज्जती की बात थी और मेरा भाई इस राज में इस कदर रोया कि इसकी आंखें चली गई। आप दुआ फरमाएं कि मेरे इस भाई को हुई बिनाई वापस मिल जाए।
मल्लिका ने साहूकार को पर्दे के अंदर से देख लिया और पहचान लिया। मगर साहूकार को कुछ इल्म ना था कि मल्लिका कौन है? मल्लिका ने पूछा। वह औरत शादी जिसे जिंदा गाड़ दिया गया था। तेरी वफादार साथी थी ना? साहूकार ने जवाब दिया। मल्लिका, जब मैं इसकी खूबियों और मोहब्बत को याद करता हूं। तो इसकी बेइज्जती को मानने से इंकार करता हूं। मगर कहने वाला भाई है जो इसके पास मौजूद था। इसके पर ऐतबार ना करना मुश्किल नजर आता है। खुदा ही बेहतर जानता है कि हकीकत क्या थी। मेरा दिल मानने को तैयार नहीं। दिल नहीं चाहता कि इस बात को सच मानूं। मल्लिका ने कहा अच्छा मैं इस मामले पर और करूंगी और कल तुझे बताऊंगी कि तेरे भाई के लिए मैं दुआ करने को तैयार हूं या नहीं।
दूसरा मुसाफिर बोला हुजूर यह मेरा वफादार गुलाम कई साल से नाबिना है। मैंने इसे बचपन से पाला और बच्चों की तरह रखा। दुआ फरमाइए कि खुदा इसे बिनाई दे। मल्लिका ने पहचान लिया कि यह डाकुओं का सरदार उमर है। जिसके यहां वह मेहमान रह चुकी थी और यह बीमार इसका वही नालायक हबशी गुलाम ज़द है। मल्लिका ने फरमाया अच्छा तेरी दास्तान कल सुनूंगी। तुझे जवाब दे दिया जाएगा।
तीसरा मुसाफिर उठा मैं तो मलिका मिर्गी के मरीज में गिरफ्तार हूं। दुआ फरमाइए कि खुदा मुझे इस दुख से निजात दे। मैंने तो बहुत सोचा एहसास हुआ कि मैंने सिवाय इसके कोई गुनाह ना किया कि खूबसूरत लौंडी जो मैंने खरीदी थी इसके साथ सख्ती का सलूक किया। यह इसकी मुनासिब सज्जा मालूम होती है।
चौथा मुसाफिर उठा भाई एक नेक दिल और आजाद आदमी को झूठमूठ में लौंडी बेचने की सजा मुंह को दर्द गर्दा की सूरत में मिल रही है। मेरा गुनाह तो और भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि उस औरत ने तो मेरी जान बचाई थी। मलिका पहचान गई कि यह वही बदमाश अहमद है जिसकी जान इसने कर्ज अदा करके बचाई थी।
मलिका ने यह सारी दास्ताने सुनने के बाद कहा अच्छा आज जाओ और आराम करो। कल किसी वक्त हाजिर होना। अंधा और गुलाम अपनी-अपनी दास्ताने सुनेंगे। वे भी मेरी दुआ के मस्तक हो जाएंगे। मगर अगर वे झूठ बोलेंगे तो इनको सजा दी जाएगी और खुदा इनको सबके सामने रुसवा करेगा। मैं इनकी सबकी हकीकत से वाकिफ हूं। जिन लोगों ने सच कह दिया है उनके लिए आज ही दुआ करूंगी।
जब सब मुसाफिर सराए में वापस आए तो सच कह देने वाले साहूकार डाकू और अहमद को सुकून था। मगर अंधा हसन और गुलाम ज़द दोनों को ऐसा मालूम होता था कि अंगारों पर लौट रहे हैं। वे एक मुश्किल में गिरफ्तार थे। सच कहें तो उम्र भर की बीमारियों का पोल खुलता है। झूठ करें तो मल्लिका की तरफ से चौक और सख्ती है। इन्होंने कुछ खाया, ना पिया और मारे शर्म व खजालत के अल्मोड़ा हो गए।
दूसरे दिन दरबार में जो पहुंचे तो सबसे पहले हबशी गुलाम ज़यद तैयार होकर अंधे हसन ने अपनी बदमाशी और लैला की बेगुनाही की दास्तान सुनानी शुरू की। अभी वह कमीना सुन पाता था कि इसका भाई करीम गुस्से से इसके पर हमला करने को दौड़ा और कहने लगा मलिका इस संधि के लिए दुआ फरमाइए कि यह बिना हो जाए मुझे और मेरी बेगुनाह बीवी पर इसने जो जुल्म किया है उसकी तो यह कोई सजा नहीं। इसी तरह जब हबशी गुलाम ज़द ने शहजादी की बेगुनाही और अपने कमीनेपन का इकरार किया तो डाकू सरदार उमर की आंखों में खून उतर आया और वह गुलाम की तरफ लपका कि ऐसे पाजी का काम तमाम कर दूं मगर मल्लिका के हुक्म से दरबार में सन्नाटा छा गया।
मलिका ने कहा मैं आप सबके लिए दुआ करूंगी क्योंकि सब ने अपने-अपने गुनाहों का इकरार कर लिया है। यह कहने के बाद मलिका ने करीम और डाकू सरदार उमर से कहा आप लोग कल फिर आए और मेरे साथ खाना खाएं। दोनों ने मलिका का शुक्रिया अदा किया और दूसरे दिन वो वक़ पर हाजिर हुए। मल्लिका ने दोनों से बात शुरू की और करीम से पूछा। आपके लिए दुआ करूं कि आपको दूसरी बीवी मिल जाए। करीम ने कहा हुजूर अब दूसरी लैला ना हो सकती है और ना मैं किसी और की खातिर इसे भुला सकता हूं। मल्लिका ने कहा खुदा बेहतर जानता है उसके पास क्या कमी हो जाएगी अगर लैला तुझे मिल जाए।
फिर सरदार उमर से पूछा अच्छा तेरे लिए दुआ करूं कि खुदा तुझे दूसरा बेटा दे। सरदार ने अर्ज किया बेटा तो खुदा के फजलल और आपकी दुआ से मुझे मिल भी चुका है। मेरी इनायत यह है कि मुझे उसी जाट की दोबारा वापस मिल जाए ताकि इसे अपनी गलती की माफी मांग लूं। मल्लिका ने कहा बेहतर तो दोनों के लिए दुआ करूंगी।
शहजादी ने हाथ उठाकर कहा ऐ खुदा जो सब ताकतों का मालिक और इंसान का आखिरी सहारा है वह बिछड़े गमों को मिलाने वाला अलग कर देने वाला और दर्द भरी सदाएं सुनने वाला है। अपनी रहमत और इनकी सच्चाई की तरफ से करीम को लैला और सरदार को यूसुफ दिखा दे। करीम और सरदार अभी हां भी ना कह पाए थे कि मलिका ने दरमियान से पर्दा हटा दिया। और इसकी खूबसूरती इन दोनों आदमियों की निगाह में खुदा की कुदरत बन गई।