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बहुत समय पहले की बात है, जब नूरपुर की बस्ती से दूर पहाड़ियों के दामन में वाकई एक छोटा सा मोहल्ला था, जिसका नाम था दस्ते सुलह। यह मोहल्ला अपनी तंग गलियों और पुराने मकानों के बावजूद दिल में एक अजीब सी पुरसुकून खामोशी और अल्लाह पर ईमान की रोशनी रखता था।
इस माहौल में मिट्टी के कच्चे मगर मजबूत घर सा हार्सट्स रहता था, जिसका नाम था इब्राहिम। इब्राहिम की उम्र तकरीबन 50 बरस थी, मगर जिंदगी की सख्तियों और मशक्कतों ने उसे वक्त से पहले ही बूढ़ा कर दिया था। तकरीबन 15 बरस पहले एक हादसा पेश आया था, जब बस्ती में फैली एक मोहल्लिक बीमारी ने उसकी आंखों की रोशनी छीन ली थी। आंखें सलामत थी, मगर उन आंखों में दुनिया की रंगीनियां देखने की कुत बाकी नहीं रही थी।
इब्राहिम अपनी इस नाबिनाई को कभी अल्लाह की आजमाइश से कम नहीं समझता था। वह जानता था कि अल्लाह ने अगर एक नेमत वापस ली है, तो यकीनन इसके बदले में उसे कोई और खास नेमत जरूर अता फरमाई होगी। खास नेमत थी बसीरत। उसकी अंदरूनी आंखें, यानी उसकी समझ और महसूस करने की कुत आम लोगों से कहीं ज्यादा बेदार और तेज थी। वह आवाज की लहरों, हवा के रुख, कदमों की आहट और माहौल की हल्की सी तब्दीली से ही पूरा नक्शा अपने जेहन में खींच लेता था।
इब्राहिम का गुजर-बसरर उसकी इकलौती इत्र और जड़ी बूटियों की दुकान से होता था, जिसे उसने बरसों पहले कायम किया था। अब तो वह दुकान एक छोटी सी टिकाऊ जगह में तब्दील हो चुकी थी, जहां वह खुशबूदार तेल, अतरी यानी जड़ी बूटियां और कुछ हर्बल दवाएं बेचा करता था। यह काम उसके लिए मुफीद था, क्योंकि इसमें देखने से ज्यादा सूंघने और महसूस करने की कुत दरकार थी। अतरी की शनाख्त, तेलों की मिलावट और जड़ी बूटियों की खुशबू को वह अपने नाक की कुत से पहचान लेता था, और इस मामले में कोई बीना शख्स भी उसे मात नहीं दे सकता था।
मगर इब्राहिम की जिंदगी में एक और साथी था, जो ना सिर्फ उसके लिए आंखें था, बल्कि उसका सबसे वफादार दोस्त, उसका साया और उसके दिल का एक सुकून भी था। वह था उसका कुत्ता वफा। वफा एक निहायत ही आला नस्ल का गहरे भूरे रंग का मजबूत और फुर्तीला कुत्ता था। जब इब्राहिम की बीनाई गई, उस वक्त वफा महज एक छोटा सा पिल्ला था, जिसे इब्राहिम ने एक जख्मी हालत में पाया और पाला था। वफा ने अपने मालिक की लाचारी को महसूस किया और अल्लाह की तरफ से अता की गई एक खुदसाख्ता ट्रेनिंग से गुजरा। अब वह इब्राहिम के लिए उसकी लाठी, उसके कान और उसका इशारा फम साथी था।
वफा की खासियत थी कि वह इब्राहिम की हर नब्ज़ और हर एहसास को भांप लेता था। जब इब्राहिम चलने को होता, वफा उसकी कमर से बंधी हुई चमड़े की पट्टे को अपने मुंह से थाम लेता और बड़े देर देख ही नरमी से रास्ता दिखाता। जब इब्राहिम किसी अजनबी या खतरे की आहट महसूस करता, तो वफा अपनी गुर्राहट को आवाज में लाए बिना महज अपने जिस्म की हरकत और पट्टे पर हल्की सी खिंचाव से इब्राहिम को आगाह कर देता था। वफा सिर्फ एक कुत्ता नहीं था, बल्कि इब्राहिम की जिंदगी का एक अहम साथी था।
दुकानदारी के बाद इब्राहिम की जिंदगी एक रवायती सादगी का नमूना थी। वह नमाजों का पाबंद था और अक्सर मोहल्ले की मस्जिद में तन्हाई में बैठकर कुरान की तिलावत करता, जिसे वह जुबानी याद कर चुका था। रात को वह और वफा अपनी ओठ वाली दुकान के सामने बैठते, जहां वह आसपास के माहौल को महसूस करता और वफा उसके कदमों के पास दुबक कर सो जाता।
लेकिन दस्ते सुलह का यह पुर अमन माहौल उस वक्त खत्म होने लगा, जब करीबी शहर अजमत नगर का एक जागीरदार, जिसका नाम था नवाब आरिफ शाह, इस मोहल्ले की जमीनों पर नजर डालने लगा। नवाब आरिफ शाह एक लालची मगर जाहिर में बददा ही अखलाक शख्स था। वह चाहता था कि इस पूरे मोहल्ले को खरीद कर वहां अपनी एक आलीशान हवेलियों की रिहाइशगाह बनाए। इस वजह से वह तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगा था। वह कभी कीमतों का लालच देता, तो कभी जबरदस्ती जमीन छीनने की धमकियां देता। मोहल्ले के बुजुर्ग और जमींदार खौफजदा थे, क्योंकि नवाब आरिफ शाह की पहुंच बादशाह के दरबार तक थी।
चंद ही दिनों में नवाब आरिफ शाह को यह बात नागवार गुजरी। उसने कई बार अपने मुंशी गुलाम हसन को इब्राहिम के पास भेजा, जिसने तरह-तरह के लालच दिए और धमकियां भी दीं। "इब्राहिम साहब, नवाब साहब आपको बाजार से दुगनी कीमत अदा करने को तैयार हैं। यह मामूली सी दुकान और एक कच्चा मकान छोड़ दिए और आराम की जिंदगी बसर कीजिए," गुलाम हसन ने एक रोज नरमी से कहा।
इब्राहिम उस वक्त अपनी दुकान पर बैठा एक खास किस्म का तेल तैयार कर रहा था, जिसकी खुशबू सारे माहौल में फैली हुई थी। उसने अपनी लाठी, जो हमेशा उसके करीब होती थी, को जमीन पर हल्के से ठोका। वफा, जो करीब बैठा था, फौरन उठकर इब्राहिम के पहलू में खड़ा हो गया। उसकी नजरें गुलाम हसन की तरफ थी, मगर वह खामोश था। इब्राहिम ने बद संजीदगी से जवाब दिया, "गुलाम हसन, तुम जानते हो कि मैं दुनिया की दौलत को सिर्फ एक मिट्टी का ढेर मानता हूं। मेरी आंखें दुनिया नहीं देख सकती, मगर मेरी बसीरत मुझे बताती है कि जो चीज अल्लाह की तरफ से सुकून देती है, उसे चंद फानी अशरफियों के बदले बेचना हिकमत तो नहीं है। इस जगह की हर जर्रा मेरे ईमान से वाबस्ता है। यह दुकान, यह माहौल मेरी जिंदगी है। मैं अपनी जिंदगी नहीं बेचूंगा।"
गुलाम हसन मायूस होकर लौट गया। नवाब आरिफ शाह को यह जवाब सुनकर बदादा गुस्सा आया। उसने तय कर लिया कि अब वह दूसरे तरीके अपनाएगा। अगले कुछ दिनों में इब्राहिम की दुकानदारी में अचानक अजीबोगरीब रुकावटें आने लगीं। एक दिन उसका सबसे बेहतरीन कीमती इत्र, जिसका नाम खुशबू जन्नत था, वह महज एक रात में ही गायब हो गया। दूसरे दिन किसी ने उसकी दुकान के पिछवाड़े में जानबूझकर गंदा पानी फेंक दिया, जिससे जड़ी बूटियां खराब हो गई। तीसरे दिन जब इब्राहिम मस्जिद की तरफ जा रहा था, तो अचानक एक भारी लगदिधी का लट्ठा पास की छत से नीचे गिरा। इब्राहिम तो अपनी सुनने की कुत से और वफा की तेज झटके से बाल-भर बच गया, मगर उसके दिल में शक पैदा हो गया।
इब्राहिम जानता था कि यह महज हादसे नहीं है। यह सब नवाब आरिफ शाह की साजिश है। वह अपनी बसीरत से महसूस कर सकता था कि उसके आसपास अमन और खौफ की दो कुतें कशमकश में हैं। एक शाम इब्राहिम अपनी छोटी सी चौकी पर बैठा था। वफा उसके पैरों के करीब था। इब्राहिम ने अपने कान हवा की तरफ किए। उसने महसूस किया कि बस्ती में हर तरफ सन्नाटा है, लेकिन इस सन्नाटे में तीन अलग-अलग किस्म की आहटें हैं। पहली आहट गधे की टापों की, जो दूर किसी पक्की सड़क पर तेजी से चल रहा था। यह नवाब के सिपाहियों की आहट थी। दूसरी आहट दो लोगों की धीमी सरगोशी की, जो उसकी दुकान के करीब ही किसी अंधेरे कोने से आ रही थी। और तीसरी गरीबों के घरों के चूल्हों से निकलने वाले धुएं की धीमी, उदास महक, जो मोहल्ले की मायूसी बयान कर रही थी।
इब्राहिम समझ गया कि यह मामला अब धमकी और नुकसान से आगे बढ़ चुका है। वह जानता था कि नवाब अब उसे फिजाई तौर पर खत्म करने की कोशिश नहीं करेगा, क्योंकि इब्राहिम का वजूद मोहल्ले में एक नेक और ईमानदार शख्सस्त का था और नवाब अपनी नेकनामी को खराब नहीं करना चाहता था। इब्राहिम ने अपने दिल में सोचा, "वह मेरी अक्ल को चुनौती देगा। वह जानता है कि उसकी सबसे बददी कुत उसकी समझदारी है। नवाब आरिफ शाह अब कोई ऐसी चाल चलेगा जो कानूनी तौर पर मजबूत हो, मगर इब्राहिम की बसीरत के लिए अंधेरे का जाल बजाए।" इब्राहिम ने वफा के सर पर हाथ फेरा और धीमी आवाज में, जो महज एक फुसफुसाहट थी, कहा, "मेरे दोस्त, अब इम्तिहान हमारी अक्ल का है, उनकी दौलत का नहीं।"
अगले दिन सुबह की पहली अजान के बाद एक ऐसा वाकया पेश आया, जिसने इब्राहिम की जिंदगी को एक नया मुद्द दे दिया और नवाब की साजिश की बुनियाद रखी। वकफ का मसला। मोहल्ले के बचे हुए चंद लोगों ने एक जमात की शक्ल में इब्राहिम की दुकान के सामने पनाह ली। उनके साथ मोहल्ले का काजी मौलाना गजनफर भी था, जो बधा नेक दिल मगर नवाब के रसूख से डरा हुआ था। मौलाना जजनफर ने बद संजीदा लहजे में कहा, "इब्राहिम साहब, एक बहुत बड़ा मसला खड़ा हो गया है। कल शाम नवाब आरिफ शाह ने ऐलान किया है कि आपकी जमीन और आपकी दुकान की जगह वफ की जमीन है।"
इब्राहिम ने अपनी भें ऊपर की, मगर उसके चेहरे पर कोई तब्दीली नहीं आई। उसने खामोशी से सवाल किया, "वफ की जमीन? यह कब से?"
मौलाना गजनफ्फर ने घबराते हुए कहा, "नवाब साहब ने बादशाह के दरबार से एक पुराना दस्तावेज पेश किया है, जिसमें दर्ज है कि यह जमीन बरसों पहले किसी अजीम मुसाफिर खाने के लिए वाकिफ की गई थी। उस दस्तावेज के मुताबिक, जो शक इस वाकिफ की हिफाजत और देखरेख करेगा, जमीन का मुतव्ली बनेगा और उस पर मकान बनाकर रह सकता है। मगर एक शर्त है।"
इब्राहिम ने सधे हुए लहजे में कहा, "बयान कीजिए, मौलाना। अल्लाह के हुजूर हर शर्त आजमाइश होती है।"
मौलाना ने इधर-उधर देखा और फिर धीमी आवाज में बताया, "शर्त यह है कि उस मुतव्ली को सच्चाई का अलमबरदार होना चाहिए। और सबसे जरूरी बात, उसे हर साल आजमाइश एहिकमत से गुजरना होगा, जिसमें उसे रियासत के तीन सबसे मुश्किल और छिपे हुए राज को अपनी अक्लों से खोलना होगा। अगर वह नाकाम रहा, तो वोकेफ की जमीन सरकार जब्त कर लेगी और नवाब को मुसाफिर खाना बनाने की इजाजत मिल जाएगी।"
यह शर्त सुनकर मोहल्ले के लोगों में फुसफुसाहट फैल गई। इब्राहिम के दिल ने तस्दीक कर दी कि यह नवाब का आखिरी और सबसे बददा दाम है। वह जानता था कि एक अंधे शख्स से रियासत के छिपे हुए राज मालूम करने का इम्तिहान लेना कितना नामुनासिब है। नवाब उसे लाचार साबित करके महज कानूनी तरीके से उसकी जमीन छीनना चाहता था। लेकिन इब्राहिम के चेहरे पर ईमान और इत्मीनान की एक रोशनी थी। उसने अपने करीब बैठे वफा को थपथपाया, जिसने अब अपनी गर्दन उठाकर खामोशी से इब्राहिम की तरफ देखा। इब्राहिम ने फैसला कर लिया था। उसने अपनी लाठी उठाई और सीधा होकर खड़ा हो गया। उसका लहजा सुलझे हुए अज्म से भरपूर था।
"मौलाना गसनफर और दस्ते सुलह के बाशिंदों, यह जमीन अगर अल्लाह के रास्ते में वफ है, तो मैं इसकी हिफाजत के लिए तैयार हूं। नवाब आरिफ शाह को मेरा पैगाम दे दीजिए कि इब्राहिम, जो बिनाई नहीं रखता, आजमाइश ए हिकमत कबूल करता है। मैं अपनी बसीरत और अल्लाह के अफजल से उन तीन राजों को खोलूंगा, जो रियासत के दिलों में दफन है। यह नवाब की आजमाइश नहीं, यह मेरी अक्ल और मेरे ईमान की आजमाइश है।"
अजमत नगर के दरबार खास में इब्राहिम को अगले जुमेरात को पेश होने का हुक्म दिया गया। अगले दिन इब्राहिम वफा के साथ अपनी लाठी थामे शहर की जानिब चल पड़ता। उसकी धुंधली आंखें तो रास्ता नहीं देख सकती थी, मगर उसकी कुत समात और वफा की वफादारी उसके लिए किसी भी रोशनी से कम नहीं थी।
अगले दिन इब्राहिम वफा के साथ अपनी लाठी थामे शहर की जानिब चल पड़ा। उसकी धुंधली आंखें तो रास्ता नहीं देख सकती थी, मगर उसकी कुत समात और वफा की वफादारी उसके लिए किसी भी रोशनी से कम नहीं थी। वफा चमदे की मजबूत पट्टे को बर्थडे दे एहतियात से इब्राहिम के हाथ के करीब थामे हुए था और उसकी राहदारी कर रहा था। यह सफर दस्त ए सुलह की सुकून भरी खामोशी से निकलकर अजमत नगर के शोर और तेज रफ्तार की तरफ था, जहां खतरे और साजिश का अंधेरा गहरा था। जैसे ही वह शहर के करीब पहुंचे, इब्राहिम की बसीरत ने माहौल की तब्दीली को महसूस किया। कदमों की आहटें बेतरतीब थी, घुदों की टापें घुरूर भरी थी और हर तरफ दौलत और ताकत की बदबू महसूस हो रही थी। इब्राहिम ने इस शोर में भी खामोशी राजों को सुनना शुरू कर दिया था। उसने वफा को धीमे से इशारा किया और वफा ने रफ्तार आहिस्ता कर दी।
सफर के दो दिन बाद इब्राहिम और वफा अजमत नगर के आलीशान और मजबूत शाही महल के सामने खड़े थे। यह महल महज पत्थर और ईंटों का ढेर नहीं था, बल्कि इख्तेदार और हसद की दास्ताओं बयान करता था। वफा महल के दरबान को देखकर हल्का सा गुर्राया, जो इब्राहिम को बता रहा था कि यह शख्स वफादार नहीं है।
**दरबार खास में पेशी**
जुमेरात की सुबह इब्राहिम को वफा के साथ दरबार में पेश किया गया। दरबारी, वजीर और नवाब आरिफ शाह अपनी-अपनी जगह पर बैठे थे। बादशाह सुल्तान स्कंदर तख्त पर जलवा अफरोज़ थे। सुल्तान स्कंदर एक इंसाफ पसंद मगर शकी मिजाज के बादशाह थे, जो रियासत के अंदरूनी मामलात में छिपी हुई साजिशों से बेजार थे।
जब इब्राहिम दरबार के बीचोंबीच पहुंचा, तो हर तरफ फुसफुसाहट फैल गई। दरबारी एक अंधे शखहस को देखकर ताज्जुब कर रहे थे, और नवाब आरिफ शाह के चेहरे पर छिपा हुआ गुरूर और एक मुस्कुराहट थी, क्योंकि वह जानता था कि इब्राहिम इस इम्तिहान में यकीनन नाकाम होगा।
सुल्तान सिकंदर ने गंभीरता से कहा, "यह नाबीना शख्स, मुझे बताया गया है कि तुम वह शख्स हो जिसने नवाब आरिफ शाह के पेश किए गए वकिफ के दस्तावेज को कबूल किया है। क्या तुम्हें मालूम है कि इस आजमाइश हिकमत में क्या करना होगा?"
इब्राहिम ने बदी आजजी और इत्मीनान से सर झुकाया। "जहां पनाह, मैं इस इम्तिहान को कबूल करता हूं। मेरी आंखें दुनिया नहीं देखती, मगर मेरी बसीरत और अल्लाह का अफजल मुझे सच्चाई की राह दिखाता है। अगर मैं नाकाम रहा, तो वाकिफ की जमीन सरकार को सौंप दी जाएगी। लेकिन अगर मैं कामयाब रहा, तो मैं उस जमीन का मुतव्ली रहूंगा और नवाब का झूठ जाहिर हो जाएगा।"
नवाब आरिफ शाह ने बीच में टोकते हुए कहा, "हां, जहां पनाह, मगर इस शकस की आंखों में रोशनी नहीं है। यह राज कैसे मालूम करेगा? यह तो इंसाफ के खिलाफ है।"
सुल्तान सिकंदर ने संजीदगी से नवाब की तरफ देखा। "इंसाफ यह है कि हर शक हर्स को अपनी अकुल साबित करने का मौका मिले। इब्राहिम, हम तुमसे रियासत के तीन राज मालूम करेंगे। अगर तुमने तीनों राज सही बता दिए, तो ना सिर्फ तुम मुतव्ली रहोगे, बल्कि तुम्हें शाही खिताब भी अता किया जाएगा। तुम्हारा पहला इम्तिहान यह है।"
बादशाह ने अपने वजीरों की तरफ इशारा किया और कहा, "रियासत ए अजमत नगर को यह जानना जरूरी है कि मेरा सबसे अजीज और खास हाकिम, जिसे मैंने दूरदराज के इलाके की हुकूमत सौंपी थी, क्या वह अब भी मेरे साथ वफादार है या नहीं? हाल ही में उसने मुगलिया हुकूमत को बेहद कम लगान अदा किया है, जबकि उस इलाके में फसलें अच्छी हुई थी। मेरे खुफिया जासूसों ने भी कोई ठोस रिपोर्ट नहीं दी है। तुम नाबीना होने के बावजूद महज अपनी अक्ल और बसीरत से बताओ। क्या मेरा हाकिम ईमानदार है या गद्दार?"
यह राज सुनते ही दरबारी हैरान हो गए। यह एक ऐसा पेचीदा सवाल था, जिसका जवाब सिर्फ शाही जासूस ही दे सकते थे और वह भी महीनों की तहकीक के बाद। इब्राहिम ने आंखें बंद कीं, हालांकि वह पहले से ही नाबीना था। उसने दरबार खास के माहौल, वजीरों की धदधकने और नवाब की तेज होती सांस को महसूस किया। वफा ने भी अपने सर को नीचे झुका लिया, जैसे वह अपने मालिक के ज़हन को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।
इब्राहिम ने करीब के दरबान से धीमी आवाज में पूछा, "क्या वह हाकिम इस वक्त दरबार में मौजूद है?"
दरबान ने सुल्तान के हुक्म पर जवाब दिया, "जी नहीं। जहां पनाह ने उसे इस इम्तिहान के लिए शहर के करीबी सराय में ठहराया है।"
इब्राहिम ने कहा, "तब मुझे महज एक छोटी सी मोहलत दरकार है, जहां पनाह। मुझे इस हाकिम से तन्हाई में मिलना होगा। मैं सिर्फ 5 मिनट में उस हाकिम की ईमानदारी या गद्दारी का राज खोल दूंगा।"
सुल्तान स्कंदर को उसकी इत्मीनान भरी मांग पर ताज्जुब हुआ। नवाब आरिफ शाह जोर से हंस पिट देता। "यह क्या मजाक है? 5 मिनट में, वह भी एक नाबीना शख्स? यह हाकिम को पहचान भी नहीं पाएगा।"
इब्राहिम ने नवाब की आवाज की तरफ रुक लिया। "नवाब साहब, मैं शख्स को आवाज से और उसके जिस्म के राज से पहचानता हूं, और यह राज आंखों से नहीं, अक्ल से पढ़े जाते हैं।"
सुल्तान स्कंदर ने नवाब को खामोश रहने का हुक्म दिया और अपने खास सिपाही सालार को हुक्म दिया, "इब्राहिम को उस हाकिम के पास ले जाओ। मगर सिर्फ 5 मिनट का वक्त होगा, और यह मुलाकात बिल्कुल तन्हाई में होगी।"
से पैसा इब्राहिम और वफा को लेकर शहर की सराय में पहुंचा। हाकिम, जिसका नाम अमीन बेग था, वह एक आलीशान कमरे में आराम कर रहा था। सिपा सालार ने दरवाजे पर दस्तक दी और अमीन बेग को इब्राहिम की मुलाकात के लिए तैयार रहने को कहा। इब्राहिम और वफा कमरे में दाखिल हुए। सिप सालार दरवाजे के बाहर कदमों की दूरी पर ठहर गया। इब्राहिम ने वफा को इशारा किया और वफा जाकर कमरे के दरवाजे की कुंडी के करीब बैठ गया, जैसे वह दरवाजे की हिफाजत कर रहा हो।
इब्राहिम ने अमीन बेग की तरफ रुख किया, इना अमीन भय किया, जो तशवीश और नासमझी के साथ बैठा था। इब्राहिम ने कहा, "अमीन बेग साहब, मैं अजमत नगर के बादशाह का एक अदना सा खादिम हूं। मैं महज एक नाबीना शखस हूं और मैं यहां आपका इम्तिहान लेने नहीं, बल्कि आपकी परेशानी जानने आया हूं।"
इब्राहिम ने महज 2 मिनट तक अमीन बेग की आवाज, सांसों की रफ्तार और उसके कदमों की मामूली आहट को महसूस किया, जब वह अपने कमरे में बेकरारी से इधर-उधर चल रहा था। फिर इब्राहिम ने अपनी लाठी को जमीन पर रखा और वफा के सर पर हाथ फेरा। अचानक उसने तेज और सख्त लहजे में पूछा, "अमीन बेग, तुम अपने गांव के उन गरीब किसानों का लगान क्यों हटधप रहे हो? उन्हें बेसहारा क्यों कर रहे हो?"
अमीन बेग के हाथ से पानी का गिलास छूट गया। वह डर के मारे कांपने लगा। उसने जल्दी से कहा, "यह, यह आप क्या कह रहे हैं? मैं तो, मैं तो बिल्कुल नेक और ईमानदार हूं।"
इब्राहिम मुस्कुराया और कहा, "नहीं, अमीन बेग, तुम झूठ बोल रहे हो। तुम्हारी आवाज की धक्कन, तुम्हारे कदमों की आहट और तुम्हारे जिस्म की ठोकर मुझे बता रही है कि तुम किसी बड़े राज को छुपा रहे हो। इब्राहिम ने फिर कहा, "मगर मुझे यह भी मालूम है, अमीन बेग, कि तुम गद्दार नहीं हो। तुम बादशाह से मोहब्बत करते हो और तुम चोर भी नहीं हो, क्योंकि चोरी के राज में लापरवाही होती है। मगर तुम्हारी आवाज में गहरा खौफ और मजबूरी है। तुम ईमानदार हो, मगर लाचार हो। अब सच बताओ, वरना मैं बादशाह को तुम्हारे गुनाह का राज खोल दूंगा।"
अमीन बेग रोपटदा। उसने इब्राहिम के कदमों पर गिरते हुए कहा, "हां, मैं मजबूर हूं। मेरे इलाके के जंगलों के करीब एक भयानक कातिलों का गिरोह आ चुका है। वह गिरोह इतना ताकतवर है कि अगर मैंने उन्हें रिश्वत ना दी, तो वे मेरे तमाम किसानों को कत्ल कर देंगे और फसलें जला देंगे। मैंने बादशाह को यह बात बताने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि मुझे डर था कि वह मेरी बेबसी को कमजोरी समझेंगे और मेरा ओहदा छीन लेंगे। मैंने अपने लगान से कुछ रखोम उन्हें दी है, ताकि वह मेरे किसानों को नुकसान ना पहुंचाएं। मैं गद्दार नहीं, गांधी, मैं मजबूर हूं।"
इब्राहिम ने उसकी बात को इत्मीनान से सुना। वफा ने अमीन बेग को सूंघा और फिर नरमी से अपनी पूंछ हिलाई, जो इस बात का इशारा था कि अमीन बेग सच्चा है।
**दरबार में वापसी और राज का इशा**
5 मिनट खत्म हुए और इब्राहिम वफा के साथ दरबार में वापस आ गया। सुल्तान स्कंदर और नवाब आरिफ शाह बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। सुल्तान ने पूछा, "इब्राहिम, तुम्हारा क्या फैसला है? क्या हाकिम अमीन बेग गद्दार है या वफादार?"
इब्राहिम ने पूरे दरबार को अपनी बसीरत से महसूस किया। उसने नवाब आरिफ शाह की उम्मीद को भी महसूस किया कि वह इब्राहिम की हार देखना चाहता था। इब्राहिम ने अपनी आवाज को पुख्ता किया। "जहां पनाह, मैं पूरी जिम्मेदारी से कहता हूं कि हाकिम अमीन बेग ना तो गद्दार है और ना ही बेईमान। वह एक सच्चा और वफादार खादिम है, जिसने लगान की रकम हिज हदपी नहीं है, बल्कि अपने किसानों को जिंदा रखने के लिए एक कातिलों के गिरोह को रिश्वत दी है। उसकी मजबूरी यह थी कि वह अपनी लाचारी को कुत के सामने जाहिर नहीं कर सका, क्योंकि उसे डर था कि आप उसकी बेबसी को कसूर समझेंगे।"
यह राज सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया। सुल्तान सिकंदर ने ताज्जुब से अपनी आंखें फैला लीं। सुल्तान ने फौरन अपने सिपाह सालार को हुक्म दिया कि वह अमीन बेग को दरबार खास में लेकर आए और उससे इस कातिलों के गिरोह के मुतालिक पूछताछ करें। अमीन बेग ने दरबार में आकर वही बात दोहराई, जो उसने इब्राहिम को तन्हाई में बताई थी।
सुल्तान सिकंदर अपनी जगह से उठ खड़े हुए। उन्हें इब्राहिम की असाधारण अक्ल पर यकीन आ गया था। उन्होंने गुस्से से नवाब आरिफ शाह की तरफ देखा, जो अब शर्मिंदगीगी और गुस्से से अपनी गर्दन झुकाए हुए था। सुल्तान ने इब्राहिम से कहा, "इब्राहिम, तुम्हारी बसीरत मेरी बीनाई से कहीं ज्यादा तेज है। तुमने महज 5 मिनट में वह राज खोल दिया, जिसे हमारे जासूस महीनों में ना खोल पाए। पहला राज तुमने खोल दिया है।"
सुल्तान ने मुस्कुराते हुए कहा, "मगर अभी दो इम्तिहान बाकी हैं। और अब दूसरा..."
परीक्षा इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा और मुश्किल होगी। क्योंकि वह इंसानी ज़ेहन के एक ऐसे राज़ से मुताल्लिक़ होगी जो हमारे महल के अंदर है। इब्राहिम ने आजज़ी से सर झुकाया और वफ़ा ने ख़ामोशी से अपनी पूंछ हिलाई, जैसे वह कामयाबी का इक़रार कर रहा हो।
सुल्तान सिकंदर रहमत की इस पहली जीत से मुतासिर ज़रूर हुए थे, मगर नवाब आरिफ़ शाह के चेहरे पर शिकन गहरी होती जा रही थी। नवाब ने अपने दिल में सोचा कि यह नाबीना शख़्स महज़ इत्तेफ़ाक़ से कामयाब हुआ होगा। मगर दूसरा राज़ ऐसा होगा जिसे सिर्फ़ बादशाह का ख़ास वज़ीर ही जान सकता है, और इब्राहिम यकीनन इसमें मात खाएगा।
सुल्तान सिकंदर ने दरबारी माहौल की संजीदगी को भांपते हुए अपने वज़ीर-ए-आज़म सादत अली ख़ान की तरफ़ इशारा किया, जो निहायत ही मज़बूत और ख़ुशहाली भरा जिस्म रखता था और महल की तमाम दौलत का हिसाब-किताब उसी के हाथ में था। सुल्तान ने एक गहरी सांस ली और ऐलान किया, "इब्राहिम, तुम्हारा दूसरा इम्तिहान हमारे महल की सबसे अहम और ख़ूफ़िया तिजोरी से मुताल्लिक़ है। कुछ हफ़्ते पहले हमारी तिजोरी से एक निहायत क़ीमती शाही मुहर चोरी हो गई है। यह मुहर महज़ एक मुहर नहीं, बल्कि हुकूमत की बुनियाद है, जिसके ग़ायब होने से शाही ख़ज़ाने पर सवाल उठ रहा है। तमाम दरबारी, सिपहसालार और ख़ज़ाने के निगरान अपनी बेगुनाही की क़सम खा चुके हैं, मगर मुहर ग़ायब है। मैं यह राज़ किसी भी जासूस या सिपाहियों के हवाले नहीं कर सकता था, क्योंकि इस चोरी से हमारी हुकूमत की इज़्ज़त जुड़ी हुई है। अब तुम, जो बीनाई नहीं रखते, अपनी बसीरत से बताओ कि यह शाही मुहर किस शख़्स ने और किस मक़सद से चोरी की है।"
यह सवाल सुनकर पूरे दरबार में एक लंबी, डरावनी ख़ामोशी छा गई। इब्राहिम जानता था कि यह मसला अब ज़मीन या जान का नहीं, बल्कि सीधे शाही इज़्ज़त और महल के अंदरूनी दुश्मनों से जुड़ा हुआ है। इब्राहिम ने अपने कानों को मज़ीद तेज़ किया और महल के माहौल को महसूस करना शुरू किया। उसने वहां मौजूद हर शख़्स की सांस की रफ़्तार, दिल की धड़कन और क़दमों की छोटी से छोटी हरकत को अपने ज़ेहन में क़ैद करना शुरू किया।
फिर उसने एक निहायत ही नाज़ुक और ख़तरनाक मांग रखी, "जहां पनाह, यह राज़ किसी जागीरदार या हाकिम का नहीं है। यह महल के किसी ख़ास दरबारी का राज़ है। इस राज़ को खोलने के लिए मुझे महज़ 5 मिनट की नहीं, बल्कि एक दिन की मोहलत दरकार है। और मुझे इस दरबार के तमाम ओहदेदार और वज़ीरों से तन्हाई में महज़ उनके क़दमों की आहट को महसूस करने की इजाज़त चाहिए। मैं हर शख़्स की क़दमों की आवाज़, उसके जिस्म के वज़न और चलने के तरीक़े से यह जान लूंगा कि उनमें से कौन मुहर का चोर है।"
सुल्तान सिकंदर इस अजीबोगरीब मांग को सुनकर हैरत में पड़ गए। नवाब आरिफ़ शाह ने फ़ौरन एतराज़ किया, "माफ़ कीजिएगा जहां पनाह, यह सरासर बेवकूफ़ी है। क्या यह अंधा शख़्स महज़ क़दमों की आहट से चोर को पहचानेगा? यह तो फ़िज़ूल की बात है। इसे फ़ौरन नाकाम क़रार दिया जाए।"
इब्राहिम ने मुस्कुराते हुए नवाब की तरफ़ रुख़ किया, "हर इंसान का अमल उसके जिस्म पर नक़्श हो जाता है। एक चोर का क़दम डर से दबता है, एक ईमानदार का क़दम इत्मीनान से उठता है, और एक गद्दार का क़दम लालच से हल्का हो जाता है। मैं रोशनी नहीं देखता, मैं इंसानियत की रूह को सुनता हूं।" इब्राहिम की इस फ़लसफ़ा भरी बात ने सुल्तान सिकंदर को मुतासिर कर दिया और उन्होंने एक दिन की मोहलत दे दी। मगर एक शर्त रखी कि यह सिलसिला उनके सामने महल के एक तन्हा कमरे में होगा और हर शख़्स को आंख पर पट्टी बांधकर चलना होगा, ताकि वह जानबूझकर अपने चलने का तरीक़ा न बदल सके।
अगले दिन, महल के एक तन्हा और गुंबददार कमरे में यह अजीब इम्तिहान शुरू हुआ। इब्राहिम अपने वफ़ादार साथी वफ़ा के साथ ज़मीन पर चटाई बिछाकर बैठा था। वफ़ा उसके क़दमों के पास दुबका हुआ था और इब्राहिम ने अपने कान ज़मीन से थोड़े ऊंचे कर लिए थे। एक-एक करके दरबार के तमाम ओहदेदार कमरे में आते, आंख पर पट्टी बांधते और एक ख़ास बिछी हुई कालीन पर कुछ क़दम चलते, जबकि इब्राहिम उनकी हर आहट, क़दमों के बीच का फ़ासला, जूते की घिसावट और जिस्म के वज़न का तनाज़ुन महसूस करता। क़रीब 30 शख़्स वहां से गुज़र चुके थे और इब्राहिम ख़ामोशी से बैठा था।
तभी वज़ीर-ए-आज़म सादत अली ख़ान की बारी आई। जैसे ही उसने क़दम बढ़ाए, इब्राहिम का जिस्म सख़्त हो गया। वफ़ा ने भी अपने कान खड़े कर लिए और उसकी गुर्राहट इब्राहिम के क़दमों पर ही दम तोड़ गई। इब्राहिम ने महसूस किया कि सादत अली ख़ान का दायां क़दम अपने आप पीछे की तरफ़ ज़्यादा ज़ोर लगाता है, जबकि बायां क़दम महज़ रस्म पूरी कर रहा है। उसके चलने में घमंड और दबाव दोनों थे।
जब सादत अली ख़ान कमरे से बाहर निकल गया, तो इब्राहिम ने फ़ौरन सुल्तान की तरफ़ रुख़ किया, "जहां पनाह, मुझे मेरा चोर मिल गया है। मुहर हमारे वज़ीर-ए-आज़म सादत अली ख़ान ने चोरी की है।" यह सुनते ही दरबार में हड़कंप मच गया। सुल्तान सिकंदर तो हक्के-बक्के रह गए। सादत अली ख़ान, जो दरवाज़े के बाहर अपनी कामयाबी का इंतज़ार कर रहा था, वह अंदर आया और ग़ुस्से से लाल हो गया, "यह नाबीना शख़्स झूठ बोल रहा है! मैं वज़ीर-ए-आज़म हूं, मुझ पर इल्ज़ाम लगाने की जुर्रत कैसे हुई?"
इब्राहिम ने अपनी लाठी उठाई और वज़ीर की आवाज़ की तरफ़ इशारा किया, "वज़ीर साहब, आप चोरी करने के बाद से ही एक क़ुदरती सच्चाई को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। चोरी की मुहर आपके बाएं जूते की तली में छिपाई गई है, ताकि आप जब भी चलें तो मुहर आपके क़दमों के नीचे रहे और आप यह महसूस करते रहें कि आपकी दौलत हमेशा आपके क़दमों में है। इस वजह से आपके दाएं पैर पर चलने का वज़न ज़्यादा है और आप अनजाने में अपने बाएं पैर से हल्का क़दम उठा रहे हैं।"
सुल्तान सिकंदर ने फ़ौरन सिपहसालार को हुक्म दिया कि वज़ीर-ए-आज़म सादत अली ख़ान के जूते की जांच की जाए। जैसे ही जूते को पलटा गया, तो सिपाहियों ने देखा कि जूते की तली में एक छोटा सा मगर बारीक सुराख़ बनाया गया था, जिसमें शाही मुहर को चालाकी से चिपकाया गया था और ऊपर से चमड़े का एक हल्का पर्दा लगा दिया गया था। मुहर बरामद होते ही वज़ीर-ए-आज़म का चेहरा शर्मिंदगी और ख़ौफ़ से ज़र्द पड़ गया। वह माफ़ी मांगने लगा, मगर सुल्तान सिकंदर का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने इब्राहिम की तरफ़ हैरत से देखा और कहा, "सुभान अल्लाह! इब्राहिम, तुम्हारी अक़्ल ने उस राज़ को खोल दिया जो हमारे महल के अंदरूनी राज़ों में सबसे गहरा था। तुमने दूसरा राज़ भी खोल दिया है, और तुम्हारी बसीरत यकीनन अल्लाह का एक ख़ास इनाम है।"
इब्राहिम ने ख़ामोशी से सर झुकाया। नवाब आरिफ़ शाह के चेहरे पर अब ग़ुस्से की आग और हार का एहसास साफ़ ज़ाहिर था। वह समझ गया था कि यह नाबीना शख़्स कोई मामूली इंसान नहीं, बल्कि अक़्ल और बसीरत का धनी है।
सुल्तान ने ऐलान किया, "इब्राहिम, अब आख़िरी और सबसे मुश्किल इम्तिहान बाक़ी है, जो हमारी शाही ख़ानदान के सबसे बड़े और पेचीदा राज़ से मुताल्लिक़ होगा।" यह सुनते ही नवाब आरिफ़ शाह और दरबार के बाक़ी बचे लोग अपनी सांसें रोक कर बैठ गए, क्योंकि वह जानते थे कि बादशाह जब तक शाही ख़ानदान का राज़ नहीं खोलेगा, तब तक इब्राहिम को इस राज़ का पता लगाना नामुमकिन है, और इस बार वह यकीनन मात खा जाएगा। नवाब आरिफ़ शाह के चेहरे पर फिर से उम्मीद की एक धीमी रोशनी लौट आई।
सुल्तान सिकंदर ने अपनी आवाज़ को गहरी संजीदगी दी, "इब्राहिम, यह राज़ मेरी तक़दीर से जुड़ा है और यह मेरे दिल पर बरसों से एक बोझ बनकर बैठा है। मैं जानना चाहता हूं कि क्या मैं वाक़ई इस सल्तनत का हक़ीक़ी वारिस और अपने वालदैन का फ़रज़ंद हूं, या जैसा कि कभी-कभी मेरे दिल में शक पैदा होता है कि मेरी वालिदा ने मुझे किसी और शख़्स से पाला है ताकि वह तख़्त-ओ-ताज की विरासत को महफ़ूज़ रख सकें। यह राज़ सिर्फ़ मेरी वालिदा जानती हैं, और उन्होंने आज तक इसे किसी पर ज़ाहिर नहीं किया। तुम अपनी बसीरत से बताओ, क्या मैं इस सल्तनत का वाक़ई ख़ानदानी वारिस हूं?"
यह सवाल सुनकर पूरा दरबार सख़्ते में आ गया। यह बादशाह की सबसे ज़्यादाती और ख़ूफ़िया बात थी, जिसे सुनना भी गुस्ताख़ी समझी जाती थी। इब्राहिम ने एक लंबी और गहरी सांस ली। उसने महसूस किया कि महल का माहौल इस वक़्त ख़ौफ़, उम्मीद और तजस्सुस के बीच डोल रहा है। वफ़ा ने भी अपने जिस्म को सख़्त कर लिया और इब्राहिम की तरफ़ मुंह उठाकर देखा, जैसे वह अपनी वफ़ादारी से उसे हिम्मत दे रहा हो।
इब्राहिम ने बड़ी ही आजज़ी मगर इत्मीनान से कहा, "जहां पनाह, अगर आप यह राज़ जानना चाहते हैं, तो यह राज़ मेरी बसीरत से नहीं, बल्कि आपके अख़लाक़ और रवैये से खुलेगा।" सुल्तान ने ताज्जुब से पूछा, "इसका क्या मतलब?" इब्राहिम ने कहा, "हुज़ूर, मुझे आपके शाही ख़ानदान से मुलाक़ात की ज़रूरत नहीं है, ना ही मुझे आपकी वालिदा से बात करने की हाजत है। आप सिर्फ़ मुझसे दो सवाल के जवाब इत्मीनान से दें, और मैं आपको अभी बता दूंगा कि आप हक़ीक़ी वारिस हैं या नहीं।"
सुल्तान सिकंदर ने नवाब आरिफ़ शाह की तरफ़ देखा, जिसके चेहरे पर अब शर्त हारने का डर झलक रहा था, और फिर रज़ामंदी में सर हिलाया, "ठीक है इब्राहिम, तुम जो भी पूछना चाहो, पूछो।"
इब्राहिम ने निहायत ही नरमी और तहज़ीब से पहला सवाल पूछा, "जहां पनाह, मैं नाबीना हूं और आपके दरबार में दो राज़ खोल चुका हूं, जो रियासत के लिए निहायत ही अहम थे। क्या आपने इन दोनों कामयाबियों के एवज़ में मुझे अब तक कोई ऐसा इनाम या इक़राम अता किया है, जो मेरे जैसे एक अदना ख़ादिम की खिदमत के शाया हो?"
सुल्तान सिकंदर का चेहरा शर्मिंदगी से लाल हो गया। वह कुछ कह न सके, क्योंकि इब्राहिम ने वाक़ई उन्हें कोई अशरफ़ी या शाही इनाम नहीं दिया था। उन्होंने महज़ तारीफ़ की थी। नवाब आरिफ़ शाह ने फ़ौरन सुल्तान को देखा और अपने दिल में ख़ुशी महसूस की, क्योंकि उसे लगा कि इब्राहिम बादशाह को लालची साबित कर रहा है।
इब्राहिम ने दूसरा सवाल पूछा और उसकी आवाज़ में गहरा यक़ीन था, "जहां पनाह, जब आपने यह आज़माइश क़ुबूल की थी, तो आपने यह ऐलान किया था कि अगर मैं कामयाब हुआ तो मुझे वक़्फ़ की ज़मीन का मुतवल्ली बनाया जाएगा। मगर आपने यह ऐलान नहीं किया कि मेरे छोटे भाई सलीम और हमारे उस छोटे से मोहल्ले, दस्त-ए-सुल्ह के बाशिंदों के लिए आप क्या ख़ुशहाली लाएंगे? क्या आपकी फ़िक्र महज़ मेरे तक़ महदूद है, या आप सल्तनत की तमाम रईयत के लिए सोचते हैं?"
इब्राहिम के यह दोनों सवाल तारीखी और फ़लसफ़ा भरे थे। सुल्तान सिकंदर तख़्त पर ख़ामोश बैठे रहे। उनके माथे पर पसीना आ गया। वह समझ गए कि इब्राहिम ने महज़ अपनी बसीरत से उनके ख़ुद के दिल का राज़ खोल दिया है।
इब्राहिम ने अपनी लाठी को ज़मीन पर हल्के से ठोका और आहिस्ता से फ़ैसला सुनाया, "जहां पनाह, आप इस सल्तनत के तख़्त पर बैठे हैं, मगर आप एक हक़ीक़ी बादशाह की औलाद नहीं हैं। आप एक निहायत ही मुतास्सिब और दिलदार वज़ीर के फ़रज़ंद हैं, जिसकी तमाम फ़िक्र दौलत और ख़ज़ाने के बजाय इल्म और बसीरत पर थी। आप महज़ रियासत की नहीं, बल्कि एक दरबारी की औलाद हैं।"
सुल्तान सिकंदर के हाथ-पांव कांपने लगे। वह फ़ौरन अपने तख़्त से उठे और सीधे महल के हरम की तरफ़ दौड़े, जहां उनकी वालिदा मल्लिका नूर बानो बैठी थी। सुल्तान ने ग़ुस्से और बेक़रारी से अपनी वालिदा से पूछा, "मां, सच बताओ, क्या मैं वाक़ई अपने वालिद का बेटा हूं, या इब्राहिम ने जो कहा वह हक़ीक़त है?" मल्लिका नूर बानो ने कांपते हुए अपने बेटे को गले लगा लिया और रोते हुए कहा, "मेरे बेटे, इब्राहिम ने सच कहा। तुम हमारे अपने नहीं हो। तुम्हारे वालिद सुल्तान नसीर और मैं तुम्हें एक मुतास्सिब वज़ीर के घर से लाए थे, जिसने इल्म और ईमानदारी में अपना सब कुछ ख़र्च कर दिया था और उसकी औलाद के लिए उसके पास दौलत नहीं बची थी। तुम्हारे वालिद ने तुम्हें अपना ख़ून और जान से ज़्यादा चाहा। मगर यह सच है कि तुम हमारे ख़ानदानी वारिस नहीं। तुम इल्म और बसीरत की विरासत हो।"
सुल्तान सिकंदर एक अजीब से एहसास के साथ वापस दरबार में आए। उनके चेहरे पर अब ग़ुस्सा नहीं, बल्कि अफ़सोस था। उन्होंने इब्राहिम की तरफ़ देखा और कहा, "इब्राहिम, तुम्हारी बसीरत ने सिर्फ़ राज़ नहीं खोले। तुमने मेरे दिल में छुपी सच्चाई को भी ज़ाहिर कर दिया। यह मेरा सबसे बड़ा राज़ था और तुमने इसे मेरी कंजूसी और सिर्फ़ अपनी जात तक महदूद फ़िक्र से पहचान लिया। हां, तुमने ठीक कहा। मैं एक वज़ीर की औलाद हूं, ना कि उस महान बादशाह की जिसने दौलत से ज़्यादा लोगों की ख़ुशहाली को अहमियत दी। तुमने मेरा तीसरा राज़ भी खोल दिया है।"
इस जीत पर इब्राहिम के चेहरे पर आजज़ी की मुस्कुराहट थी और वफ़ा ने ख़ुशी से क़ुर्रा कर अपनी वफ़ादारी का सबूत दिया। नवाब आरिफ़ शाह शर्मिंदगी से अपना सर झुका चुका था और अब इब्राहिम को वक़्फ़ की ज़मीन सौंपने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था।
सुल्तान सिकंदर ने नवाब की तरफ़ ग़ुस्से से देखा, जिसने महज़ अपनी लालच की ख़ातिर एक नेक और ईमानदार शख़्स को आज़माने की जुर्रत की थी। सुल्तान ने अपने तख़्त से उठकर ऐलान किया, "इब्राहिम, तुम सिर्फ़ एक नाबीना अक़लमंद नहीं, बल्कि अजमत नगर के अक़्ल व बसीरत की निशानी हो। तुमने तीन ऐसे राज़ खोले हैं, जिन्हें रोशनी की आंखें भी नहीं देख सकती थीं। आज से तुम अपनी वक़्फ़ की ज़मीन के मुतवल्ली हो और तुम्हें शाही मशर का ओहदा अता किया जाता है, जिसका मक़ाम वज़ीर-ए-आज़म से भी बुलंद होगा।"
सुल्तान ने फ़ौरन एक थैली भरकर शाही अशर्फ़ियां इब्राहिम के हाथ में दीं और साथ ही इब्राहिम के छोटे भाई सलीम के लिए और तमाम दस्त-ए-सुल्ह के बाशिंदों के लिए ख़ुशहाली के फ़रमान जारी किए, ताकि उनके लिए तालीम, तिजारत और खेती की नई राहें खुल सकें। इब्राहिम ने तमाम इनाम और मर्तबा बड़े ही आजज़ी से क़ुबूल किया। मगर उसने सुल्तान से सिर्फ़ एक इल्तेजा की, "जहां पनाह, मेरी सबसे बड़ी आरज़ू यह है कि मैं अपनी बसीरत का इस्तेमाल आपके इख़्तेदार को और भी इंसाफ़ पसंद बनाने में कर सकूं। हुज़ूर, इनाम व इक़राम सिर्फ़ मेरी जात के लिए नहीं, बल्कि दस्त-ए-सुल्ह के लोगों के लिए ज़्यादा है, ताकि उनकी मायूसी ख़त्म हो सके।"
सुल्तान सिकंदर इब्राहिम की इस दरियादिली से और भी मुतासिर हुए और उन्होंने इब्राहिम को 'इल्म व अदल' का ख़िताब अता किया। मगर नवाब आरिफ़ शाह, जो दरबार में ही मौजूद था, अपनी शदीद बेइज़्ज़ती और ज़मीन खोने की हार बर्दाश्त नहीं कर सका। उसके चेहरे पर ख़ौफ़ अब ख़तरनाक बदले की शक्ल ले चुका था।
जब दरबार ख़त्म हुआ और इब्राहिम को शाही रिहाइशगाह की तरफ़ ले जाया जा रहा था, तो नवाब आरिफ़ शाह ने अपने मुंशी गुलाम हसन को एक ख़ूफ़िया इशारा किया। नवाब जानता था कि वह इब्राहिम की अक़्ल का मुक़ाबला नहीं कर सकता। इसीलिए उसने इब्राहिम की सबसे बड़ी क़ुव्वत, यानी उसके वफ़ादार साथी वफ़ा को निशाना बनाने की साज़िश की। नवाब ने गुलाम हसन को हुक्म दिया, "उस नाबीना की आंखें उसका कुत्ता है। अगर वह कुत्ता मर गया या ग़ायब हो गया, तो यह नाबीना शख़्स महल की गलियों में भटक जाएगा और इसकी तमाम अक़्ल नाकाम हो जाएगी। इसे तख़्त और ज़मीन, दोनों से महरूम कर दो। मगर मेरे नाम का कोई ज़िक्र नहीं होना चाहिए।"
गुलाम हसन ने फ़ौरन ज़हर मिलाया हुआ एक गोश्त का टुकड़ा लिया और अगली शाम, जब इब्राहिम शाही बाग़ में टहल रहा था, गुलाम हसन ने अंधेरे का फ़ायदा उठाकर वह ज़हरीला टुकड़ा वफ़ा की तरफ़ फेंक दिया। वफ़ा ने अपनी मासूम फ़ितरत के मुताबिक़ उसे सूंघा और खाने ही वाला था कि इब्राहिम की असाधारण क़ुव्वत-ए-शम्मा ने उस गोश्त में मिली इत्र की ख़ुशबू के पीछे छुपी ज़हर की महक को पहचान लिया। इब्राहिम फ़ौरन झुका और वफ़ा को पीछे हटाते हुए उस टुकड़े को ज़मीन पर पैर से दबा दिया।
इब्राहिम जानता था कि यह क़ातिलाना साज़िश है। उसने वफ़ा के सर पर हाथ फेरा और ख़ामोशी से वापस महल आ गया। वह इस वाक़ये को फ़ौरन सुल्तान को बता सकता था, मगर उसने सोचा कि नवाब आरिफ़ शाह को सज़ा देने से ज़्यादा ज़रूरी है कि उसे बेइज़्ज़ती से मात दी जाए, ताकि उसका ग़ुरूर हमेशा के लिए टूट जाए।
अगले दिन इब्राहिम दरबार में पहुंचा और सुल्तान सिकंदर को एक ख़ास इल्तेमास पेश किया, "जहां पनाह, मैं आपकी खिदमत के लिए हमेशा हाज़िर हूं। एक और इम्तिहान की गुज़ारिश करता हूं। यह मेरी जान को महफ़ूज़ रखने के लिए नहीं, बल्कि वफ़ादारी और गद्दारी के बीच का फ़र्क़ बताने के लिए है। हुज़ूर, कल रात किसी ने मेरे वफ़ादार साथी वफ़ा को ज़हर देने की कोशिश की। यह हरकत कमज़ोर और डरे हुए शख़्स की है, जो मुक़ाबला नहीं कर सका। मैं चाहता हूं कि आप दरबार में तशरीफ़ लाने वाले तमाम वज़ीरों और दरबारी के जूते मेरे सामने पेश करें। मैं सिर्फ़ उनकी जूतियों की हालत से बता दूंगा कि क़ातिल कौन है।"
सुल्तान सिकंदर को इब्राहिम की यह अक़्लमंदी फिर हैरान कर गई। उन्होंने फ़ौरन हुक्म दिया कि दरबार में मौजूद सभी 40 लोगों के जूते एक क़तार में रखे जाएं। इब्राहिम वफ़ा के साथ क़तार के पास गया। उसने हर जूते को सिर्फ़ सूंघा और महसूस किया। एक के बाद एक वह जूते के क़रीब जाता और वफ़ा भी साथ-साथ सूंघता। जब वह नवाब आरिफ़ शाह के क़रीब पहुंचे, तो वफ़ा धीमी और ख़तरनाक गुर्राहट करने लगा और इब्राहिम ने नवाब के जूते को हाथ में उठाया।
इब्राहिम ने सुल्तान से कहा, "जहां पनाह, यह शख़्स नवाब आरिफ़ शाह है। उसकी जूते की तली में एक ख़ास क़िस्म की मिट्टी लगी है और इस मिट्टी में ज़हर वाले गोश्त की महक मौजूद है। हालांकि नवाब ने अपने इत्र की ख़ुशबू से इस महक को दबाने की कोशिश की है, मगर ज़हर की कड़ी महक और मिट्टी की ख़लावत को वह छुपा नहीं सका। यह क़ातिल है जिसने मेरी बीनाई को छीनने की कोशिश की।"
नवाब आरिफ़ शाह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। जब सिपाहियों ने उसकी जांच की, तो उसके कुर्ते की आस्तीन से ज़हर की शीशी बरामद हुई, जिसमें से कुछ ज़हर कम हो चुका था। नवाब की तमाम दौलत ज़ब्त कर ली गई और उसे शाही क़ैदख़ाने में डाल दिया गया।
इब्राहिम ने न सिर्फ़ अपनी और अपने मोहल्ले की ज़मीन बचाई, बल्कि सुल्तान सिकंदर को इंसाफ़ पसंद बनने की सही राह दिखाई। सुल्तान सिकंदर ने उस दिन अपनी कंजूसी और शक्की मिज़ाज को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया, और इब्राहिम को अपना सबसे अज़ीम वज़ीर बनाया। इब्राहिम ने अपनी अक़्ल व बसीरत से अजमत नगर में इंसाफ़ और ख़ुशहाली का ऐसा नया दौर शुरू किया, जिसने अंधेरे में रोशनी का मक़ाम हासिल कर लिया।
इस कहानी का सबसे बड़ा सबक़ यह है कि हक़ीक़ी बसीरत आंखों की मोहताज नहीं होती। दौलत या ताक़त से ज़्यादा अक़्ल, समझदारी और नेक नीयती ताक़तवर होती है। अल्लाह जब किसी से एक नेमत लेता है, तो उसके बदले में उसे सब्र और बसीरत ज़रूर अता करता है।
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