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Drishtikon Ep-4 | Science, Religion, and Superstition | Dr. Vikas Divyakirti | Drishti IAS

Drishti IAS2:56:38

Transcription

इस मंथन से थोड़ा जहर निकलेगा, थोड़ा अमृत निकलेगा।

एग्जजेक्टली धर्म क्या है? हरारी साहब के हिसाब से धर्म एक कहानी है।

बिल्ली रास्ता काट दे तो फिर वो अंशगुण है। उस रास्ते से नहीं जाना चाहिए।

कौन सी बिल्ली काली या सफेद?

कई लोग ये मानकर चल रहे हैं कि ईश्वर नहीं है।

अगर आप ईश्वर को नहीं मानते हैं तो नहीं मानते हैं तो ठीक है। दावा नहीं करना है कि नहीं है। न्यूटन के आर्गुमेंट्स ने बाइबल को गलत साबित किया। भगवान को नहीं।

क्या जो विज्ञान है उसने यह साबित कर दिया है कि भूतों का अस्तित्व नहीं है क्योंकि कुछ एक लोग ऐसे भी हैं सर कि वो कहते हैं कि हमसे उसने बीड़ी मांग ली थी।

बीड़ी मांग ली थी भूत ने।

हां सर।

तो गांव का भूत होगा और गरीब वर्ग का भूत रहा होगा।

जो बाबा हैं क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती है कि अंधविश्वास को वो रोके? अमेरिका में जिस दिन 13 तारीख को फ्राइडे पड़ जाता है ना पूरा अमेरिका मरणसन हो जाता है उस दिन [संगीत] उनके सामने शीशा टूट जाए तो अगले सात साल के लिए जीवन खराब हो जाता है उन लोगों का सात-साल बात बातत पर टच वुड करते हैं जो यहां भी हमने सीख लिया आजकल हम भी टच वुड करने लग गए हैं वहीं से आया है आप इमेजिन कीजिए कि आप सड़क पे जा रहे हैं कोई रैंडम व्यक्ति आपको बुलाए और कहे कि यार यह बताओ तुम्हारा नाम अमित है और आप कहें हां नाम तो अमित थी। देखो शक हो रहा है इसको कैसे पता लग गया लेकिन डर भी लग रहा है।

अंतिम प्रश्न का उत्तर अंत में विज्ञान ही देगा। कोई और देगा नहीं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है। और इसी के विपरीत धारणा यह भी है कि जहां विज्ञान है वहां धर्म नहीं और जहां धर्म है वहां विज्ञान नहीं। तो आखिर सच्चाई क्या है? क्या यह दोनों एक दूसरे के सामने खड़े शत्रु हैं या एक दूसरे के पूरक हैं? और इसी बहस के बीच एक सवाल यह भी क्या धर्म, अंधविश्वास और विज्ञान इन्हें एक ही तराजू में तोलना ठीक है? 21वीं सदी में भी इन सवालों के जवाब बहुत जटिल हैं और बड़े ही रोचक भी हैं। तो इसी गु्थी को सुलझाने के लिए दृष्टिकोण के आज के सेशन में हमने फिर से इनवाइट किया है विकास सर को। नमस्कार सर। आपका बहुत-बहुत स्वागत है।

सर, सवालों की फेहरिस्त पूरी टीम ने तैयार की है और सवाल बहुत ज्यादा तो कुछ लोगों ने कहा कि हम ही लोग पूछ लें यानी कि एंकर हम लोग पूछ लें और कुछ सवाल ये खुद पूछना चाह रहे थे।

तो सर पहले सवाल से शुरुआत करते हैं कि सर आजकल YouTube में और सोशल मीडिया में बहुत सारे ऐसे वीडियो आते हैं जहां पे हम देखते हैं कि जादू टोने की बात हो रही है। तंत्रमंत्र की बात हो रही है या चमत्कार की बातें हो रही हैं। दूसरी तरफ ऐसे वीडियो भी आते हैं जिसमें कहा जाता है कि ये सब फालतू की बातें हैं। इस पे विश्वास मत करिए। आप लोग साइंटिफिक टेंरामेंट अपनाइए। तो आखिर यह साइंटिफिक टेंपरामेंट है क्या जो विज्ञान को मानने वाले सबसे मनवाना चाहते हैं?

साइंटिफिक टपर जो शब्द है वो भारत में नेहरू जी ने लोकप्रिय बनाया। टेंपर का मतलब होता है स्वभाव। टेंपरामेंट मतलब नेचर स्वभाव। जब साइंस आपका स्वभाव बन जाए तो उसको बोलते हैं साइंटिफिक टेंपर। इसका मतलब क्या हुआ? कि हम लोग जनरली मानते हैं कि साइंस एक विषय है। जिसने बीएससी किया उसने साइंस पढ़ा, पीसीएम, पीसीबी किया उसने साइंस पढ़ा। जिसने सोशियोलॉजी पढ़ा या जिसने मान लीजिए कोई और विषय आर्ट्स का पढ़ा हम मानते हैं कि उसने साइंस नहीं पढ़ा। पर धीरे-धीरे ये सहमति बनी पश्चिम में कि साइंस दरअसल एक विषय नहीं है। साइंस एक मेथड है। एक एप्रोच है। अगर आप उस मेथड से कोई भी विषय पढ़ेंगे तो वो साइंस हो जाएगा। जैसे पॉलिटिकल साइंस हो जाएगा, होम साइंस हो जाएगा, सोशल साइंस हो जाएगा। है ना? मेथड साइंटिफिक होना चाहिए। साइंटिफिक मेथड का मतलब है कि आप कोई भी विषय पढ़ेंगे तो उसमें प्रॉब्लम को उठाएंगे। उस प्रॉब्लम पे एक्सपेरिमेंट करेंगे या ऑब्जरवेशंस करेंगे। ऑब्जेक्टिव रहेंगे। अपनी ओर से अपनी मान्यताएं थोपेंगे नहीं। उसके ऊपर रिसर्च करते हुए जो निष्कर्ष ईमानदारी से निकलेगा उसको मान लेंगे। जो नहीं निकलेगा उसे खारिज करेंगे। जो निष्कर्ष निकलेगा भी तो यह जिद नहीं करेंगे कि हमेशा के लिए फाइनल है। यह मान के चलेंगे कि बाद में गलत हो सकता है। जैसे आइंस्टीन गलत हो सकते हैं। आइंस्टीन नहीं मानते थे कि क्वांटम फिजिक्स में थोड़ी बहुत रैंडमनेस हो सकती है। पर बाद में साबित हुई कि हो सकती है। तो वो भी गलत साबित हुए। है ना? अरस्तु गलत साबित हुआ। अरस्तु का मानना था कि भारी चीजें कम भारी चीजों से जल्दी गिरती हैं। पर न्यूटन ने साबित किया कि नहीं बराबर गिरती हैं। तो साइंस वाला व्यक्ति यह मान के चलता है कि वह कितना भी ज्ञानी हो, कितना भी समझदार हो, कितनी भी अच्छी रिसर्च करे, उसकी रिसर्च भविष्य में कभी ना कभी गलत साबित हो सकती है। तो यदि आप यह टेंपरामेंट बना लें जीवन का कि जीवन में कोई भी बात होगी, मैं ऐसे ही नहीं मान लूंगा। मैं सवाल पूछूंगा। अगर मेरे तार्किक प्रश्नों पर जवाब मिल जाएगा तो मानूंगा। जवाब नहीं मिलेगा तो नहीं मानूंगा। जब तक जवाब नहीं मिलेगा वेट करूंगा। रिसर्च करता रहूंगा। अगर जवाब मिल ही नहीं सकता तो ब्रैकेट में रखूंगा ना खारिज करूंगा ना मानूंगा वेट करूंगा उसका। और उन्हीं बातों को सच मान के जीवन में उतारूंगा जिनके लिए मेरे पास अनुभव से या तर्क से पर्याप्त प्रमाण है। उसके बाद भी यह मान के चलूंगा कि मैं गलत हो सकता हूं। कल को किसी ने साबित कर दिया कि मैं गलत हूं तो ईमानदारी से मान लूंगा। तो जिस व्यक्ति का स्वभाव ऐसा हो आप कह सकते हैं कि उसके अंदर साइंटिफिक टपर है। और मेरे ख्याल से समझदारी की बात है। कोई भी व्यक्ति अगर समझदार है तो साइंटिफिक टेंपर के आसपास ही होगा।

लेकिन सर एक सवाल यह भी यहीं से उठता है कि जैसे हजारों लाखों सालों से इंसानों का इतिहास तो है इस दुनिया में तो लोगों के मन में सवाल आता है कि साइंटिफिक टेंपरामेंट के बिना तो काम चल ही रहा था तो क्या अभी नहीं चल सकता काम तो चल ही सकता था काम चलने में क्या दिक्कत है ये वैसे सवाल होगा जैसे मोबाइल फोन अभी आया है स्मार्टफोन सदियों से काम चल रहा था उसके बिना कंप्यूटर के बिना भी चल ही रहा था इंटरनेट के बिना बिजली के बिना एआई के बिना चल ही रहा था पर आ गया अब नहीं चलेगा उसके बिना काम क्योंकि अब हम उसके अभ्यस्त हो गए हैं। उसने हमारे जीवन को बेहतर बना दिया है।

फिर आपको तुलना करनी पड़ेगी। मैं तो यह मानता हूं कि उद विकास से इवोल्यूशन के प्रोसेस में हम ह्यूमन बीइंग्स बने हैं। और इतिहास देखें अगर हम जीवन का इतिहास अगर देखें धरती पे लगभग 350 400 करोड़ के आसपास का इतिहास है साल का। 350 400 करोड़ साल के इस इतिहास में मनुष्य जो अलग हुआ अपने आसपास की स्पीशीज से वह केवल 3 लाख साल पहले अलग हुआ। आसपास कौन? बंदर हैं, चिंपांजी हैं। ये सब हैं। आप अगर ध्यान से देखेंगे तो बंदरों की औसत आयु जिसको आप लाइफ एक्सपेक्टेंसी कहते हैं, जीवन प्रत्याशा कहते हैं। वो तब भी 30 साल थी, आज भी 30 साल है। बल्कि 20 के आसपास है। 30 तब होती है जब उनको आप डोमेस्टिकेट करते हैं। चिड़ियाघर में रखते हैं या घर में रखते हैं। चिंपांजी की 35 साल के आसपास है जंगल में। अगर आप डोमेस्टिकेट करेंगे तो 45 साल के आसपास है। बंदरों की, चिंपैंजियों की, कुर्तों की, बिल्लियों की जो जीवन प्रत्याशा है वह कभी बदली नहीं है। इंसानों की अगर बात करें 1947 में हमारे देश की जो लाइफ एवरेज लाइफ थी 32 साल थी। आज वो 71 है। इसकी मूल वजह क्या है? साइंस। तो अगर आप 32 साल के हो गए हैं तो उसके बाद की पूरी जिंदगी साइंस के लिए समर्पित कर दीजिए क्योंकि उसने बचाया है आपको एवरेज मतलब कुछ लोग पहले भी 70 80 के होते ही थे ऐसा नहीं कि नहीं होते थे पर एवरेज लाइफ 32 साल थी क्योंकि बहुत सारे लोग बचपन में मरते थे आज से पांच छह पीढ़ी पहले किसी घर में 10 बच्चे होते थे तो एक बचता था उनमें से आज के जमाने में अगर आपके घर में किसी घर में चार बच्चे पैदा होते हैं चारों बचते हैं चारों जीते और इस सब से लाइफ की हमारी इफेक्टेंसी बढ़ती जा रही है। तो यदि हम अपने देश में 32 से 71 पर आए हैं केवल 75 साल में लगभग यह ना धर्म की वजह से आए हैं, ना अंधविश्वासों से आए हैं, ना जादू से आए हैं, यह विज्ञान से आए हैं। क्योंकि स्मॉल पॉक्स से 30% लोग नहीं मरते हैं। अब रेबीज का टीका लग जाए तो कोई नहीं मरता है। अब टीबी का कोई ट्रीटमेंट ले ले एमडीआर बस ना हो तो कोई नहीं मरता है। अब निमोनिया से इलाज मिल जाए टाइम पर तो कोई नहीं मरता है। पहले सब मरते थे। टीबी आता था पूरे-पूरे शहर साफ हो जाते थे। यह सारा जो हो रहा है क्यों हो रहा है? क्योंकि साइंटिफिक टेंपरामेंट के लोगों ने रिसर्च की। रिसर्च करते-करते उन बैक्टीरिया तक पहुंचे, वायरस तक पहुंचे, फंगी या फंगाई तक पहुंचे। उनका ट्रीटमेंट ढूंढा। ट्रीटमेंट ढूंढा तो हमें दवाइयां मिली। हमें वैक्सीनंस मिले। कोविड था। आपको पता होगा कि कोविड से 100 साल पहले स्पेनिश फ्लू आया था। हमारे देश की बात है। आप सेंसेस देखेंगे 18 82 81 से इफेक्टिवली शुरू हुआ। 72 में एक रफ सा हुआ था। 81 से 1881 से 2011 तक हर बार पॉपुलेशन बढ़ी है। केवल 1921 एकमात्र है जहां पॉपुलेशन कम हुई है। क्यों कम हुई है? क्योंकि 1919 से स्पेनिश फ्लू आया था। 25 करोड़ के आसपास की आबादी में लगभग 2 करोड़ लोग मरे थे। कोविड से क्यों नहीं मरे? क्योंकि कोविड में वैक्सीन आ चुका था। स्पेनिश फ्लो में वैक्सीन नहीं आया था। और यह वैक्सीन क्यों आया है? क्योंकि साइंटिफिक टेंपरामेंट के लोगों ने कोशिश करके, रिसर्च करके, बीमारियों से बचाने के लिए हमें उपहार दिया। हमने वैक्सीन लगवाया और हम बच गए। मैं सरकार का प्रचार नहीं कर रहा हूं। कुछ लोग मानते हैं कि वैक्सीन से ही लोग मरे हैं। मुझे नहीं पता क्या हुआ है। मैं वैक्सीन से बचा हूं और मैंने पाया है कि वैक्सीन लगा दुनिया को इसलिए दुनिया में उतना नुकसान नहीं हुआ जितना नुकसान स्पेनिश फ्लू जैसा हो सकता था।

सर अगर अब यहीं से हम इतिहास से थोड़ा वर्तमान में अगर पहुंचते हैं तो हम यह देखते हैं कि एक समय था जब लोग ज्यादा लॉजिकल बातें नहीं करते थे। आजकल माना जाता है लोग ज्यादा लॉजिकल बातें करते हैं। लेकिन उसके साथ यह भी माना जाता है कि अगर कोई बहुत आस्तिक व्यक्ति है तो वो लॉजिकल बातें नहीं करता होगा। बड़ा लॉजिकल नहीं होगा। तो यह बात कहां तक कितनी सही हो सकती है?

दिक्कत यह है कि हम आस्तिक और नास्तिक को ब्लैक एंड वाइट में देखते हैं डकोटमी में कि यह नास्तिक यह आस्तिक। अब सच देखेंगे तो पूरा एक स्पेक्ट्रम है जिसमें घोर नास्तिक से ले घोर आस्तिक के बीच में कई लेवल्स आते हैं। घोर नास्तिक वो है जो बोलता है कि ईश्वर है ही नहीं। मैं दावे से कहता हूं ईश्वर नहीं है। घोर आस्तिक वह है जो ईश्वर को मानता है और जो ईश्वर की धारणा मानता है उसमें पूरा यकीन रखता है। तार्किक रूप से मेरे ख्याल से ये दोनों ही व्यक्ति गलतफहमी के शिकार हैं। जो साइंटिफिक टेंपर का आदमी होगा तार्किक व्यक्ति होगा वह इनके बीच में होगा। बीच में कैसे हो सकता है? जैसे मान लीजिए मैं यह मानता हूं कि भाई जो साबित होगा मैं वही मानूंगा बाकी नहीं मानूंगा। क्योंकि ईश्वर नजर नहीं आता है। तो ईश्वर है। यह साबित करने की जिम्मेदारी है। ओनस ऑफ प्रूफ। बर्डन ऑफ प्रूफ किसके ऊपर है? जो कहता है कि ईश्वर है। जो कहता है कि नहीं है उसके ऊपर तो बर्डन ऑफ़ प्रूफ नहीं आना चाहिए। मसलन अगर मैं आपसे कहूं कि आपके और मेरे बीच में लाल प्रकाश की रेखा है कि आपको दिख रही है। आप कहेंगे नहीं दिख रही है। और अगर मैं कहूं कि मुझे दिख रही है। और फिर मैं कहूं कि आप कहें कि साबित करो। मैं कहूं मैं साबित नहीं कर रहा। तुम साबित करो कि नहीं है। आप कहेंगे मैं क्यों साबित करूं? मैं तो कह ही नहीं रहा। जो कह रहा है साबित तो वह करेगा। ठीक वैसे ही अगर आपको ईश्वर में विश्वास है और किसी को नहीं है तो साबित करने की जिम्मेदारी किसकी है? जो दावा कर रहा है जो दावा नहीं कर रहा उसकी जिम्मेदारी नहीं है। लेकिन एक लॉजिकल इमेजिनेशन के रूप में यह मानना बहुत अजीब नहीं है कि इस पूरे संसार के पीछे कोई परम शक्ति हो सकती है। होनी चाहिए। अब तीन चार लेवल्स हो सकते हैं। जो कायदे का वैज्ञानिक और तार्किक व्यक्ति होगा वह तो यह कहेगा कि भाई मैंने खूब कोशिश कर ली। मैं ईश्वर साबित नहीं कर सकता। और जिन लोगों ने ईश्वर को साबित करने की कोशिश की है, मैंने प्रमाण पढ़ लिए, उनके आर्गुमेंट्स पढ़ लिए, वो भी बहुत मीनिंगफुल है नहीं। जिन्होंने ईश्वर को खारिज करने के प्रमाण दिए हैं, वो भी मीनिंगफुल नहीं है। सच में नहीं है। तो मैं बटा हुआ हूं। मैं परेशान हूं। मैं बेचैन हूं कि ईश्वर है या नहीं। अब मेरे पास दो ऑप्शंस हैं। या तो मैं हड़बड़ी में इनमें से एक फैसला मान लूं या मैं कहूं कि जब तक फैसला नहीं होगा मैं वेट करूंगा। जो वेट करते हैं उनको बोलते हैं इग्नोस्टिक्स अज्ञयवादी। मैं उसी कैटेगरी में आता हूं कि हम वेट कर रहे हैं। जब फैसला होगा होगा तब तक हमारा काम चल रहा है उसके बिना भी। पर मैं वेट करूंगा तो सवाल है कि मेरे व्याहारिक जीवन में ईश्वर होगा या नहीं? इसके भी दो ऑप्शन हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जब तक साबित नहीं होगा तब तक हम धार्मिक जीवन नहीं जिएंगे। कुछ कहते हैं ना जब तक साबित नहीं होगा कि ईश्वर नहीं है। हम मान के चलेंगे कि है क्योंकि मानने से हमें मनोवैज्ञानिक फायदा होता है। एक बहुत प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। आप तो साइंस के बैकग्राउंड के व्यक्ति हैं शायद। ब्लेस पास्कल आपने नाम सुना होगा। जिसके नाम पर प्रेशर की यूनिट आप लोग पढ़ते होंगे फिजिक्स में उसी पास्कल की बात कर रहा हूं। 17 सेंचुरी फ्रांस का वैज्ञानिक था। पास्कल के सामने भी यही दो विधा थी। पास्कल मैथमेटिशियन भी था, फिजिसिस्ट भी था और एक धार्मिक व्यक्ति भी था। और अंतिम हिस्से में जीवन के बहुत धार्मिक हो गया था। उसको कुछ ऐसे रहस्यात्मक अनुभव हुए कि वो धार्मिक हो गया बहुत ज्यादा। और उसने कहा बीइंग ए साइंटिस्ट एंड बीइंग ए मैथमेटिशियन साबित तो कुछ होता नहीं है। पर मैंने यह महसूस किया कि अगर मैं ईश्वर को मान लेता हूं तो मेरा जीवन ज्यादा आसान हो जाता है। फिर एक आर्गुमेंट भी दिया कि अगर ईश्वर है और मैंने नहीं माना तो बाद में दंड मिलेगा। नहीं है और मान लिया तो कोई नुकसान की बात नहीं है। तो कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस में ईश्वर को मानना बेहतर बात है। तो मान लेते हैं। उसने माना 19 सेंचुरी के अंत में 20 सेंचुरी के शुरुआत में अमेरिका में एक व्यक्ति हुए विलियम जेम्स अमेरिकन साइकोलॉजी के फादर माने जाते हैं। और विलियम जेम्स पर बुद्ध का भी असर हमें दिखता है क्योंकि बुद्ध ने कहा कि आत्मा नहीं है। चेतना की का प्रवाह है। स्ट्रीम ऑफ कॉन्शियसनेस है। यह बात जेम्स ने भी कही। विलियम जेम्स ने सेम बात कही कि ईश्वर है या नहीं। हम साबित ना कर पाए हैं ना कर पाएंगे। पर जब साबित ना यह हो रहा है ना वह हो रहा है तो फिर मैं क्या देखूंगा? वह प्रगमेटिक फिलॉसफर है। प्रगमेटिज्म का मतलब है कि जो व्याहारिक रूप से फायदे में है उसको मानेंगे। उसने कहा मैं मनोविज्ञान का प्रोफेसर भी हूं, विद्यार्थी भी हूं और मैं मानता हूं कि ईश्वर को मान लेने से सुकून, शांति, विनम्रता ज्यादा होती है। तो जब साबित होगा कि नहीं है तब का तब देखेंगे। तब तक के लिए मैं मानना चाहता हूं। मैं मानूंगा। ऐसे लोग भी आप इनको इलॉजिकल नहीं कह सकते हैं। तो लॉजिकल व्यक्ति ऐसा नहीं होता कि रेडिकल एथिस्ट होगा या रेडिकल थिस्ट होगा। बीच की बहुत स्थितियां हो सकती हैं। एग्नोस्टिसिज्म मुझे लगता है कि सबसे अच्छी स्थिति है। प्रैक्टिकल और सॉफ्ट थिज्म जो मैंने आपको बताया इन लोगों का कि प्रैक्टिकली मानेंगे। सैद्धांतिक रूप से हम जानते हैं कि साबित नहीं हो सकता। यह मान लेंगे। कुछ लोग संदेह में रहते हैं। जैसे डेविड ह्यूम रहा संदेहवादी होते हैं। वह भी अच्छे हैं। वो खारिज नहीं कर रहे। सिर्फ यह कह रहे हैं कि मुझे डाउट है। मैं स्केप्टिकल हूं। मुझे क्लेरिटी नहीं है। और जब तक क्लेरिटी ना मिले मैं कैसे मानूं? जो घोर ईश्वरवादी हैं उनमें से बहुत लोग ऐसे हैं जो तार्किक नहीं है। जब आप ईश्वरवादी होंगे तो आप कई ऐसी धारणाएं मानेंगे। आपने अगर दर्शन पढ़ा हो तो ईश्वर की धारणा में एक होती है सगुण धारणा। एक निर्गुण धारणा होती है। पर्सनलिस्टिक इमपर्सनलिस्टिक सगुण धारणा दिल को बहुत सुकून देती है क्योंकि आपको ईश्वर का चेहरा दिखता है। ईश्वर शक्तिशाली है। ईश्वर दयालु है। आप परेशान होंगे तो प्रार्थना करेंगे। वह आपको हेल्प करेगा। यह सब फीलिंग्स आती हैं। तो इमोटिवली बहुत सपोर्ट करता है। पर जब आप आर्गुमेंट्स की बात करेंगे तो उसको बचाना बड़ा मुश्किल हो जाता है वहां पर। क्योंकि इतने डिफिकल्ट आर्गुमेंट्स हैं कि सगुण ईश्वर को बचाना बड़ा मुश्किल है। और लगभग सभी धर्मों में ईश्वर सगुण है। ध्यान रखना है। जैसे इस्लाम में ईसाइयत में यहूदियों में ईश्वर दिखता नहीं है। तब भी सगुण ही है। सगुण और साकार दो अलग-अलग बातें हैं। सगुण ईश्वर साकार हो भी सकता है। सगुण निराकार भी हो सकता है। इस्लाम में अल्लाह, ईसाइयत में गॉड, यहूदी में जावे। सगुण निराकार ईश्वर के उदाहरण है। सगुण है वह भी। तो जो ईश्वर को मानना चाहता है पर लॉजिकली कंसिस्टेंट रहना चाहता है कि मुझे लॉजिकली कोई परेशान ना कर सके। उसे फिर शंकराचार्य और हीगल का रास्ता चुनना पड़ेगा। निर्गुण ईश्वर निर्गुण ईश्वर लॉजिकली कंसिस्टेंट है। उसको खारिज करना बड़ा मुश्किल है। क्योंकि आप कुछ बता ही नहीं रहे। उसमें क्या है? नीति नीति कह रहे हैं कि वह ऐसा भी नहीं है, वैसा भी नहीं है। आप कुछ बताएंगे तो फंस जाएंगे। लेकिन आप नीति नीति के माध्यम से आप उसको इनस्क्राइबल बता रहे हैं। अनिर्वचनीय है या मतलब इनकेबल है, अव्याख्यय है तो फिर कंट्राडिक्शन नहीं आते। खैर पूरी बात का क्योंकि ये बहुत लंबे मुद्दे हैं। इस पर बहुत संक्षेप में समझाना मुश्किल है। पर संक्षेप में आपके प्रश्न का जवाब यह है कि तार्किक व्यक्ति नास्तिक होगा। यह जरूरी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति घोर नास्तिक है तो ज्यादा संभावना है कि उसका तर्क एक सीमा के बद चुक जाता है। अगर कोई व्यक्ति घोर आस्तिक है तो भी उसका तर्क एक सीमा के बदकर चुक जाता है। जो तार्किक व्यक्ति होगा चाहे वह आस्तिक हो चाहे नास्तिक हो। वो यह मान के चलेगा कि अंत में कुछ और साबित हो सकता है और इतना ओपन माइंडेड होगा कि कुछ और साबित होगा तो मान लेंगे। तब तक इस विश्वास के साथ चलने में कोई बुराई नहीं है।

सर हमारे टीम में बहुत सारे लोगों के पास भी बड़े तार्किक सवाल हैं। इनका मानना है तो वो पूछना चाहते हैं।

इनका मानना है।

तो एक बार जिनके सवाल हैं एक बार पूछ लीजिए आप लोग।

मैं आपसे विश्वास और अंधविश्वास के बीच के डिफरेंस के बारे में जानना चाहती हूं। जैसे कई लोग ऐसा मानते हैं कि अगर बिल्ली रास्ता काट दे तो फिर वो अंशगुण है। उस रास्ते से नहीं जाना चाहिए।

कौन सी बिल्ली काली है?

काली काली सर। काली।

इसमें रंगभेद भी है।

अगर सर ये अंधविश्वास है तो क्या कुछ साल पहले तक यह भी एक अंधविश्वास नहीं था कि इंसान चांद पर पैर नहीं रख सकता? तो किसी का विश्वास अंधविश्वास बन गया है यह कब डिसाइड होता है?

देखिए नौ शब्द हैं। तीन सेट में एक है विश्वास, एक है अविश्वास। एक है श्रद्धा, एक है अश्रद्धा। एक है आस्था, एक है अनास्था। अब इन सब में अंध लगा लीजिए तो 6 * 2 12 हो जाएंगे सभी। अंधविश्वास, अंध अविश्वास, अंधश्रद्धा, अंध अश्रद्धा, अंध आस्था, अंध अनास्था। ये 12 शब्द बनते हैं। आपने मुझसे दो पूछे विश्वास और अंधविश्वास। विश्वास का मतलब है कि किसी चीज पर मुझे भरोसा है कि यह है। मैं साबित कर पाऊं या ना कर पाऊं पर मुझे भरोसा है। अविश्वास का मतलब है कि मुझे भरोसा है कि यह नहीं है। अंध कब होता है? जब मैं ऐसी चीज पर विश्वास करूं या अविश्वास करूं। जो अनुभवों से या लॉजिक से सीधे-सीधे खारिज हो सकता है। मैं तब भी विश्वास कर रहा हूं। अगर मेरा कोई विश्वास ईजीली रेफ्यूटेबल है या तो एविडेंस से या लॉजिक से तो वह अंधविश्वास है। अगर वो रेफ्यूटेबल नहीं है ईजीली।

तो हम कहेंगे कि विश्वास है या अविश्वास है। अंधविश्वास नहीं है। उदाहरण लेकर देखते हैं। और यह भारत की बात नहीं है। विकसित देशों में खूब अंधविश्वास चलते हैं। आज भी चलते हैं। अमेरिका में जिस दिन 13 तारीख को फ्राइडे पड़ जाता है ना, पूरा अमेरिका मरणसन हो जाता है। उस दिन सब अधूरे होते हैं कि यहां से कुछ ना कुछ होके रहेगा। 13th एंड फ्राइडे एक साथ अगर आ गया, उनका जीना मुश्किल हो जाता है।

उनके सामने शीशा टूट जाए तो अगले सात साल के लिए जीवन खराब हो जाता है उन लोगों का। साथ-साथ अगर शीशा टूट गया तो बात बात बात पर टच वुड करते हैं, जो यहां भी हमने सीख लिया। आजकल हम भी टच वुड करने लग गए हैं। वहीं से आया है इंग्लैंड से, अमेरिका भी गया इंग्लैंड से, यहां भी आ गया। तो टच वुड हम नहीं कर रहे, इंग्लैंड वाले करवा रहे हैं हमसे। 13 नंबर का अंधविश्वास इंग्लैंड का है बेसिकली, जो अमेरिका में भी चला गया है, भारत में भी आ गया है। आजकल फिंगर्स क्रॉस्ड, अरे कुछ होने वाला है, क्रॉस कर लो फिंगर। यह भी इंग्लैंड का अंधविश्वास है। हमने इंग्लैंड से बहुत कुछ लिया है, अंधविश्वास भी लिए हैं। बहुत सारे। काली बिल्ली वाला अंधविश्वास भी इंग्लैंड का है, जो अमेरिका में भी चलता है। पर इंग्लैंड के कुछ हिस्सों में काली बिल्ली अच्छी मानी जाती है। कुछ में काली बिल्ली खराब मानी जाती है। अमेरिका और भारत ने काली बिल्ली को खराब मान लिया, उतना ले लिया है।

एक तो इसमें रेसिज्म है कि काली ही बिल्ली क्यों खराब है भाई? दूसरा इसमें इलॉजिकल जो पक्ष है, वह यह है। अगर हम चाहें तो हम स्टडी कर सकते हैं इस चीज को। इसमें क्या परेशानी है? आप 10 लोगों को और 10 लोगों को, 20 लोगों को सब्जेक्ट बना लीजिए। अगले तीन महीने तक या एक साल तक रोज इन 10 के सामने काली बिल्ली गुजारिए। इन 10 के सामने ना गुजारिए। फिर इन 20 की जिंदगी कैसी चल रही है, स्टडी कीजिए। शर्त यह है कि इन 20 को पता ना हो कि काली बिल्ली गुजारने से क्या होता है। पता होगा तो यह उसी भरोसे में खुद ही सिर्फ फोड़ लाइन कहीं जाके अपना। क्योंकि ये जो सुपरस्टिशंस हैं, इनका जब दिमाग पर असर पड़ता है, एक प्लेसिबो और नोसिबो शायद सुने होंगे आपने, उसका बड़ा गहरा असर होता है। ऐसे 20 लोग जिनको काली बिल्ली का रास्ता काटने से क्या होगा, पता ही नहीं है, उन पर स्टडी कीजिए। 10 इधर, 10 इधर, एक साल, दो साल स्टडी कीजिए। और आप पाएंगे कि रिजल्ट यही निकलेगा कि बिल्कुल साबित नहीं हो रहा कि जिनके सामने काली बिल्ली गई थी, उनका जीवन खराब हुआ है। क्योंकि यह ईजीली रेफ्यूटेबल है, इसलिए अंधविश्वास है। लॉजिकली भी भाई मनुष्य इतना ताकतवर है। मनुष्य का रास्ता बिल्ली काट गई और मनुष्य का जीवन खराब हो गया। यह ह्यूमनिज्म है या कैटिज्म है? हम तो ह्यूमनिज्म की बात करते हैं कि मनुष्य सबसे ताकतवर है। होमोसेपियंस है। यह कितनी लॉजिकल बात है। फिर काली ही बिल्ली क्यों? अगर बिल्ली से कुछ तरंगें निकलती हैं, जो नुकसान करती हैं, वो काली बिल्ली में ही क्यों निकलेंगी? सफेद में भी निकलेंगी। क्योंकि बिल्ली के रास्ता काटने से नुकसान होता है। यह रेफ्यूटेबल है। एविडेंस के साथ भी, एररिकली भी, लॉजिकली भी। इसलिए अंधविश्वास है।

लेकिन आज से 100 साल पहले लोग कह रहे थे कि चंद्रमा पर हम जा ही नहीं सकते। उस समय कल्पनाएं होती थीं। जैसे हमारी परंपरा में चंदा मामा कहते हैं कि तो चंद्रमा मामा हैं हमारे। बहुत इंटरेस्टिंग कहानी अगर आप सुनना चाहें, आप बहुत जल्दी में तो नहीं हैं। थोड़ी कहानी सुनाऊंगा इस बीच में। एक कहानी आपको सुनाता हूं। यह कहानी 17th सेंचुरी की शुरुआत की है। अभी पांच-छह दिन पहले हमारी रिसर्च टीम रिसर्च करते-करते कहानी हमें मिली और बड़ा मजा आया पढ़ के हमें। हमारी एक रिसर्च टीम है जो साइंस, माइथोलॉजी इन सब पर खूब रिसर्च करती रहती है और हम लोग लगभग रोज बात करते हैं। तो चार-पांच दिन पहले एक कहानी लेकर आए। आपने एक वैज्ञानिक का नाम सुना होगा केप्लर, जोहनेस केप्लर उसका नाम था। जर्मनी का था वो। और वो 16-17 सेंचुरी की शुरुआत में और 16th के अंत में जीवित था। उसने एक फिक्शन लिखा। एक कहानी लिखी जर्मन भाषा में लिखी। उस कहानी का अंग्रेजी में अनुवाद करें, नाम का तो नाम है द ड्रीम। ठीक है? वो पहली फिक्शन वेस्ट की मानी जाती है। साइंटिफिक फिक्शन सफाई जिसको बोलते हैं ना, पहला साइंटिफिक फिक्शन उसको मानते हैं। उसमें उसने क्या इमेजिन किया? इमेजिन किया कि एक बच्चा चंद्रमा पर पहुंच गया है और चंद्रमा पर एक पूरी बस्ती है। लोग रहते हैं वहां पर। वहां एक महिला रहती है। उस महिला का वर्णन करते हुए उसने सबकॉन्शियसली अपनी मां जैसा चेहरा बना दिया। जैसे उसकी मां दिखती थी। कैथरीना नाम था उसकी मां का। जितनी वो लंबी थी, जैसा उसका फेशियल एक्सप्रेशन से, उसकी मां काफी बुलंद महिला थी। समाज में काफी पॉपुलर थी। तो वैसा ही हुलिया, वैसा ही व्यक्तित्व उस महिला का बनाया और वह चंद्रमा की बस्ती पर क्या करती थी? जादू, जादू का मतलब टोना भी, जादू टोना, ब्लैक मैजिक, वो सब करती थी। लोग उससे डरते थे। जादू का सामान बेचती थी बच्चों को।

अब वो उपन्यास जब छपा, बल्कि छपने से पहले उसकी जब मैनुस्क्रिप्ट बाहर निकलनी शुरू हुई, उसी के इलाके के लोगों ने पढ़ ली। वो यह नहीं समझ पाए कि यह एक फिक्शन है। उनको लगा कि यह सच है और उनको लगा कि ऐसी दिखने वाली औरत एक ही हमारे समाज में है, कैथरीना, केप्लर की मम्मी। वो सब उसके खिलाफ खड़े हो गए। केस कर दिया। 49 केस बनाए उसके खिलाफ। कुछ हत्या के, कुछ बच्चा चुराने के। पता नहीं क्या-क्या केस। जो-जो लोग मरे थे पिछले कुछ समय में अज्ञात कारणों से, उन सबका नाम लगा दिया किसी ने मारा है। 24-25 लोगों ने गवाही दी कोर्ट में कि हां, हमने देखा था यह ले जा रही थी उसको। उन गवाहों में केप्लर का सगा भाई भी शामिल था। मां का बेटा भी शामिल था। उसने भी गवाही दी मां के खिलाफ और केप्लर ने अपनी जिंदगी के पांच-छह साल खर्च किए। उनकी मां जेल में रही 14 महीने। जेल से छूटी और इतनी ट्रॉमा में थी कि एक साल में उसकी मौत हो गई। और केप्लर की जिंदगी का ठीक-ठाक हिस्सा यह साबित करने में खर्च हुआ कि उसकी मां टोना नहीं करती है, जादू नहीं करती है। और यह मेरा एक काल्पनिक उपन्यास था जिसको पढ़ के लोगों ने ऐसा मान लिया। उसने साबित किया कोर्ट में, मां को छुड़वा लिया और उसके बाद ही मां उसकी बची नहीं। उसकी मां चल बसी।

तो चंद्रमा हमारी कल्पनाओं में कब से है और उसने एक कहानी लिखी चंद्रमा कि उसके बाद क्या-क्या उसके साथ हो गया। अगर कोई उस समय यह कहता कि हम चंद्रमा पर कभी नहीं जा सकते, कभी नहीं जा सकते, अंधविश्वास है। मुझे लगता है कि चंद्रमा पर शायद कभी ना जा पाएं, यह अविश्वास है। नहीं जा सकते वो भी कभी। इसका मतलब आपने ह्यूमन कैपेबिलिटीज को हमेशा के लिए खारिज कर दिया। अगर आप यह कहें कि मुझे लगता है कि आज हम सूर्य पर नहीं जा सकते, ठीक है? नहीं जा सकते। पर अगर आज कोई कहता है कि मुझे लगता है हम सूर्य पर कभी नहीं जा सकते, अंधविश्वास से अंध अविश्वास है, कह सकते हैं। तो अंधापन तब आएगा जब हम ज्यादा रिजिड होंगे, खारिज करेंगे चीजों को, भविष्य की संभावनाओं को भी खारिज करेंगे। मैं तो यह मान के चलता हूं कि आज से 20, 25, 50 साल के अंदर हम एलियंस अगर हैं तो खुश रहेंगे, उनसे हमारी बातचीत होगी। हम अपनी गैलेक्सी की लिमिट से बाहर शायद अगले 100 साल में निकल पाएंगे। इंटर गैलेक्सिकल कम्युनिकेशन होना शुरू हो जाएगा। यात्राएं होनी शुरू हो जाएंगी। हो सकता है कि 1000 साल के बाद इंटर गैलेक्सिकल जर्नी उतनी ही आसान हो जितनी दिल्ली से कानपुर की जर्नी है। कौन सी बड़ी बात है? स्पेस ट्रेवल शुरू हो ही गया है। तो मनुष्य की संभावना में मुझे तो चरम विश्वास है। और मैं मानता हूं कि जब तक सृष्टि का अंतिम रहस्य नहीं खुलेगा। अगर तब तक कुछ मूर्ख राष्ट्रपति, प्रधानमंत्रीियों की वजह से दुनिया खत्म नहीं हो गई और वैज्ञानिक बचे रहे तो कभी ना कभी अंतिम सत्य हम खोज ही लेंगे। चाहे उसमें हजार साल लगे, चाहे लाख लगे, चाहे करोड़ लगे। अगर इंसानी सभ्यता बची रही तो अंतिम उत्तर खोज ही लेंगे। इसलिए अंधविश्वास वहां होता है। हम कभी चंद्रमा पर नहीं जाएंगे। अंधविश्वास है। नहीं जा सकते। हम लगता है कि चंद्रमा पता नहीं देख पाएंगे या नहीं। यह अविश्वास है। अंधा नहीं है। और कभी ना कभी चंद्रमा देख ही लेंगे। यह विश्वास है। आज ही देख लेंगे शाम तक। यह अंधविश्वास है। मतलब अंधे होकर विश्वास कर रहे हैं विज्ञान के ऊपर क्योंकि वह लॉजिकली एक्सप्लकेबल नहीं है।

ठीक सर, इसी को थोड़ा सा और आगे बढ़ाएं। तो अंधविश्वास के मामले में ही एक सवाल मेरा यह बनता है कि अभी कुछ दिन पहले चंद्र ग्रहण की घटना हुई थी। और चंद्र ग्रहण की उस घटना के बारे में जानने के लिए मैंने न्यूज़ चैनल ऑन किया। तो वहां पर एक आदमी बता रहा था कि महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। सब्जी नहीं काटनी चाहिए। खाना नहीं बनाना चाहिए, खाना नहीं पकाना चाहिए। और दूसरी तरफ कुछ वैज्ञानिक यह भी बता रहे थे कि यह सब अंधविश्वास है। इसे मानने की जरूरत नहीं है। इंसानों को इसका कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। लेकिन उसके बाद भी मैं देखता हूं लोग मानते नहीं है। उस चीज को फॉलो करते हैं।

आपने जो टीवी डिबेट्स देखी होंगी, मेरे ख्याल से उसमें छह, सात, आठ लोग बैठे होंगे डिस्कशन में। उन आठ में से वैज्ञानिक एक या दो ही होंगे। पांच ऐसे धार्मिक लोग बैठे होंगे। है ना? यह हमारे टीवी का मिजाज आजकल है। यह मैं अंदाजे से कह रहा हूं। मैं तो टीवी नहीं के बराबर देखता हूं। तो पर मुझे अनुमान है कि टीवी की दुनिया में क्या चलता है। आपका सवाल है कि लोग क्यों नहीं मानते? और यह लोग ऐसा क्यों कहते हैं? यह बात पूछना चाह रहे हैं ना। थोड़ा सा पीछे चलिए कि ऐसा क्यों हुआ होगा? क्योंकि आप में से किसी ने एक सवाल में चमत्कार शब्द का इस्तेमाल किया था। वहां से थोड़ा बात शुरू करते हैं। हम 70 हजार साल पहले कॉग्निटिव रिवोल्यूशन नाम की एक चीज हुई। कहते हैं कि वहां से इंसान ने लॉजिकली सोचना शुरू किया। ध्यान से समझना है। इस ब्रह्मांड की आयु 1400 करोड़ साल है। पृथ्वी की आयु 450 करोड़ साल है। जीवन की उत्पत्ति को 350 करोड़ साल हो चुके हैं। इन 350 करोड़ साल में केवल 3 लाख साल पहले होमो सेपियंस बने हैं। और इनमें केवल 70,000 साल पहले इंसान ने सोचना शुरू किया है लॉजिकली। तो हमारे जीवन की कुल आयु 350 करोड़ साल में से सोचने समझने की आयु 7000 साल की है सिर्फ। और कम से कम 3 लाख साल होमो सेपियंस वाले। लेकिन उसके पीछे की मेमोरीज भी तो आ ही रही होंगी जेनेटिक तरीके से हमारे पास।

कई लाख सालों से इलॉजिकल इररेशनल अनसाइटिफिक चीजें हमारी परंपरा में कल्चर में हमें मिलती हुई आ रही हैं। यह हमारा मेकअप है। हम ऐसे बने हैं। इन 70 हजार साल में भी अगर आप थोड़ा ध्यान से देखें। पहली बार लोगों ने दार्शनिक वैज्ञानिक प्रश्न कब शुरू किए? हम अगर वेद को सबसे पहला मान लें। हम अगर कहें कि भाई जो हमारे वेद लिखे गए वैदिक पीरियड में, अर्ली वैदिक पीरियड में, ऋग वैदिक पीरियड में, वह सबसे पुराना मान लेते हैं तो भी हम कितना मान लेंगे? 5000 साल पहले मान लेंगे। अगर पश्चिम में देखेंगे तो मेसोपोटामिया थोड़ा सा पहले दिख जाएगा, ग्रीक वगैरह आपको करीब 2500 साल पहले के दिखेंगे। 600 बीसी, आज 2100, तो 2500 साल मान लीजिए। तो 5000 साल पहले सिर्फ 5000 साल पहले दार्शनिक प्रश्न आने शुरू हुए। कुछ वैज्ञानिक भारत में भी हुए, कुछ वहां भी हुए। लेकिन विज्ञान एक एस्टैब्लिश ट्रेडिशन के रूप में वैज्ञानिक क्रांति के साथ अगर देखें तो 500 साल की बात है। मुश्किल 17-16 सेंचुरी की बात है।

अब सोचिए कि इंसान, इंसान की खास बात क्या है? उसके पास लॉजिक है। और हमारी पूरी कल्चर की डेवलपमेंट का जो सबसे बुनियादी लॉजिक है, वह पता है क्या है? कि हर कार्य के पीछे कारण होता है। कॉजेशन। देयर इज अ कॉज बिहाइंड एव्री इफेक्ट। यह मोस्ट बेसिक आर्गुमेंट है, प्रीमाइस है जिस पर हमारी सारी की सारी दुनिया तरक्की चलती है कि कुछ हुआ है तो कारण तो होगा ही होगा। ऐसे तो हो नहीं सकता है। अब पीछे एक-दो एक-दो लाख साल का सोच के देखिए कि सब लोग जग रहे हैं। अचानक इतने में अचानक दिन के 12:00 बजे सूर्य गायब हो गया और बादल नहीं, अंधेरा हो गया अचानक और अंधेरा होने के 10 मिनट के बाद फिर से सूरज चमक गया और दिन के 12:00 बजे हुआ। ऐसा कभी नहीं होता है। आमतौर पर एक व्यक्ति के पूरे जीवन में शायद इतना बड़ा दृश्य एक-आध बार ही दिखेगा उसको। सब परेशान हैं कि यह क्या हुआ अचानक? अब उनको व्याख्या चाहिए कि क्यों हुआ। पता कुछ है नहीं उनको। फिर एक दिन क्या देखा कि शाम को 8, 9, 10 बजे चंद्रमा निकला। अचानक चंद्रमा लाल हो गया पूरा। फिर आधा गायब हो गया। होते पूरा गायब हो गया। एकदम लाल रंग का हो गया। उनको व्याख्या चाहिए इस चीज की। व्याख्या है नहीं। एक दिन अचानक बरसात के बाद देखा इंद्रधनुष निकला हुआ है। ठंडे प्रदेश में एक पानी के झरने में गरम-गरम पानी निकल रहा है। वहां से गर्म पानी का चश्मा है। उनको रीजन नहीं पता कि इसके पीछे जियोथर्मल एनर्जी काम कर रही है। उनको नहीं पता। इंद्रधनुष के पीछे क्या रीजनिंग है? प्रकाश के सात रंग कैसे काम करते हैं? उनको नहीं पता। उनको नहीं पता कि सूर्य ग्रहण का मतलब सिर्फ इतना है कि सूर्य जो है, मतलब पृथ्वी और चंद्रमा और सूर्य की जो गति है, उसकी वजह से हमें थोड़ी देर के लिए सूर्य नहीं दिखता क्योंकि चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ गया। चंद्र ग्रहण में पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ गई। इनको यह नहीं पता है। चंद्रमा लाल इसलिए हुआ क्योंकि पृथ्वी के वायुमंडल को चीर के वही प्रकाश किरणें पहुंच पाईं जो लाल रंग की थीं क्योंकि उनका वेवलेंथ ज्यादा था। जिनकी वेवलेंथ कम थी, वो पहुंच ही नहीं पाईं। इस सिर्फ लाल दिखा। इसलिए रोज सुबह चंद्रमा आपको आसमान लाल दिखता है। रोज शाम को लाल दिखता है। क्यों? क्योंकि उस समय जो समुद्र सूर्य उगता है। इस गति से उसकी किरणें जाती हैं ना कि ऊपर से आती हैं सीधी। ऊपर से चीर कहती है वायुमंडल को। ऐसे नहीं चीर पाती हैं। तो केवल लंबी वेवलेंथ वाली किरणें जो आमतौर पर लाल होती हैं, वही क्रॉस कर पाती हैं तो आसमान लाल हो जाता है। चंद्रमा भी लाल हो जाता है। यह उनको नहीं पता है।

जब नहीं पता है और लोग पूछ रहे हैं, व्याख्या करना जरूरी है, तो लोग क्या करते हैं? चीन में लोग मानते हैं कि एक आसमानी राक्षस है जो चंद्रमा को निगल जाता है। भारत में क्या मानते रहे? राहु ने डस लिया है। एक व्याख्या यह भी आई कि हनुमान जी ने नाराज होकर सूर्य को निगल लिया था। यह व्याख्या भारत की नहीं है। हर धर्म में ऐसी व्याख्याएं हैं। मेसोपोटामिया में देखिए, रोम में देखिए, यूनान में देखिए, जहां-जहां बहुदेववाद चल रहा था, उन सब ने किसी एक देवता के नाम से व्याख्या कर रखी है कि इसने सूर्य को निगल लिया, इसने चंद्रमा को निकल लिया। क्योंकि साइंस में ही है। नहीं पता है। आप आज टीवी चैनल की बात करें। भारत में पांचवी सदी में आर्यभट्ट हुए थे। आर्यभट्ट उनकी पुस्तक है। आर्यभट्ट में साफ-साफ लिखा है कि सूर्य ग्रहण क्यों होता है? चंद्र ग्रहण क्यों होता है? हमारे समाज को कम से कम पिछले 1700 साल से, 1600 साल से पता है कि चंद्र ग्रहण क्यों होता है? पश्चिम में फिफ्थ सेंचुरी बीसी में, यानी 1000 साल और पीछे जाएंगे। एनेक्सागोरस एक वैज्ञानिक और दार्शनिक दोनों था। वो हुआ। एनेक्सागोरस और भारत के चार भाग लगभग सेम फिलॉसफी है मेटाफिजिक्स को लेकर। एनेक्सगोरस ने साफ-साफ लिखा हुआ है कि सूर्य ग्रहण क्यों होता है? चंद्र ग्रहण क्यों होता है? एकदम क्लियर है। कोई कंफ्यूजन ही नहीं है इसमें। उससे कुछ दिन बाद अरस्तु ने चंद्र ग्रहण के दिन चंद्रमा पर पृथ्वी की गोल परछाई देखकर दावा किया कि पृथ्वी गोल है। इसीलिए चंद्रमा पर परछाई गोल पड़ रही है। चकोर नहीं पड़ रही है। यह सब पुरानी बातें हैं। पर वहां भी आज तक कई लोग ऐसा मानते हैं। यहां भी मानते हैं। क्यों मानते हैं? क्योंकि वैज्ञानिक ने अपनी लैबोरेटरी में साबित कर दिया। किताब में लिख दिया। पर वो किताब स्कूलों में पहुंची नहीं। स्कूलों में बच्चे पहुंचे नहीं। स्कूलों में अध्यापकों ने बच्चों को विज्ञान इस तरीके से पढ़ाया नहीं कि सच यह है। धर्म की पहुंच व्यक्तियों तक, परिवारों तक, बच्चों तक विज्ञान की तुलना में ज्यादा रही। इसलिए विज्ञान द्वारा साबित करने के 1600 साल बाद भारत में, 2600 साल बाद यूरोप में तब भी अगर चंद्र ग्रहण पर लोग डरते हैं, तो इसका मतलब है कि विज्ञान नहीं पहुंच पाया है।

और यह क्यों कहते हैं कि महिलाएं दूर रहें। आप उस खौफ को देखिए। आज से केवल चार पीढ़ी पहले मैंने आपसे कहा था कि एक-एक घर में 10-10 बच्चे हुआ करते थे। आप एक काम करना अपने दादाजी से पूछना कि आपके दादाजी कितने भाई-बहन थे? जिंदा-मुर्दा दोनों, जो मर गए बचपन में, उन सबको मिला के जनरली वो संख्या 10 से ऊपर रहेगी। कहीं-कहीं 15 होगी। कहीं-कहीं 16-17 होगी। एक महिला 15-16 बच्चों को जन्म देती थी। केवल आज से 100 साल पहले की बात कर रहा हूं। मैं बहुत पुरानी बात नहीं कर रहा हूं। ऐसा क्यों होता था? 15 बच्चे होंगे, एक या दो बचेंगे। गर्भावस्था के दौरान, बच्चे को जन्म देने के प्रोसेस में 1 लाख में से लगभग 1000 महिलाओं की मौत हो जाती थी। हर 100वीं महिला मरेगी बच्चे को जन्म देते समय। उस समाज में बच्चा कितनी कीमती चीज है कि जो पैदा हुआ मर ना जाए। 15 में से 12-13 मरने ही मरने हैं। गर्भवती महिला मर सकती है। कुछ भी अजीब सा हुआ तो लोगों ने क्या कहा भाई तुम संभल के रहो कहीं कोई किरण तुम्हें परेशान ना कर दे। आजकल हम क्या करते हैं? छोटा बच्चा होता है, बोलते हैं सोते हुए मोबाइल फोन दूर रख के सो। हमें नहीं पता कि मोबाइल फोन के विकिरण से नुकसान होगा या नहीं होगा। कोई स्टडी नहीं है। मोबाइल फोन आए हुए 20-25 साल हुए हैं। मोबाइल फोन के रेडिएशन से हम सब पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह पता लगते 20-30 साल और लगेंगे भी। पर अज्ञात का भय हमें भी तो है। मैं खुद भी सोता हूं तो मोबाइल फोन थोड़ा सा दूर रख के सोता हूं। दिन भर साथ में रखता है। रात को दूर कर देते हैं कि भाई कहीं विकिरण का असर ना पड़ जाए। चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण में उनको तो डर लगता होगा। कहीं रेडिएशन का असर ना पड़ जाए। गर्भवती महिला के घर पर ना पड़ जाए। बच्चा मर ना जाए पेट में। यह औरत ना मर जाए। इसलिए हर समाज अपनी ज्ञान की अवस्थाओं के हिसाब से डर, खौफ पैदा करता है और वह ठीक है। दिक्कत यह कि आज ऐसा क्यों है? क्योंकि हम वैज्ञानिक बातों को पहुंचाना कम जरूरी समझते हैं। और टीवी चैनल्स के बारे में अगर आप समझें, टीवी चैनल का धर्म यह बिल्कुल नहीं है कि वो ज्ञान दें। उनका क्या पर्पस है? प्राइवेट चैनल्स हैं। पर्पस क्या है कि प्रॉफिट कमाएं। प्रॉफिट कैसे आएगा? ऑडियंस बंधे रहेंगे तो आएगा। आज की दुनिया में आप में से कौन टीवी देखता होगा? आप सब YouTube वाले हैं। फोन देखते होंगे। आजकल टीवी कौन देख रहा है? बड़े-बूढ़े देख रहे हैं। टीवी देखने वालों की औसत आयु 40 प्लस जा चुकी होगी अब तक मेरे ख्याल से। बड़े-बूढ़े लोग टीवी ज्यादा देख रहे हैं। उनको आस्था, अंधविश्वास में फंसाना ज्यादा आसान भी होता है क्योंकि उनके बचपन से परवरिश ऐसी रही है। इसलिए आठ में से छह धार्मिक लोग होंगे। दो वैज्ञानिक होंगे जो कम बोल पा रहे होंगे। और डर सबसे ज्यादा बिकाऊ वस्तु मानी जाती है। अगर आप विज्ञापन की दुनिया के नियम पढ़ेंगे, किसी को प्रभावित करना हो, कन्वेंस करना हो, सबसे अच्छा तरीका मनोविज्ञान मानता है। उसको डरा दो। इसलिए इंश्योरेंस बेचना हो तो पहले ऐसा विज्ञापन दिखाओ कि एक महिला का पति अचानक मर गया। बेघर हो गई क्योंकि इंश्योरेंस नहीं था। और फिर कहो तुम्हारा पति जिंदा है, तुम तो ले लो इंश्योरेंस। अब सब महिलाएं पति का इंश्योरेंस करवा देंगी। तुरंत खौफ पैदा हो गया ना? डर से ज्यादा कुछ नहीं बिकता है। और इसलिए जब आप कहेंगे चंद्र ग्रहण में डरना है, तो लोग चिपक के टीवी देखेंगे। आप कहेंगे डरने की बात नहीं है, चैनल चेंज कर लेंगे। बांध के रखना है ना? तो टीवी की अपनी इकॉनमी है। उस विज्ञापन की इकॉनमी की बात करना अलग है। तो आपके सवाल के मैंने तीन जवाब दिए कि टीवी ऐसा क्यों दिखाता है, खौफ क्यों पैदा करता है, क्योंकि क्योंकि उसका ऑडियंस वैसा है और चिपकाने के लिए भय की अपनी कीमत है। और यह ज्ञान हमें है या नहीं? तो बहुत पहले से ज्ञान है। फैला क्यों नहीं है? क्योंकि हमने विज्ञान को ठीक

से फैलाया नहीं है। हमने अब तक उतनी मेहनत नहीं की। अगर उतनी मेहनत करेंगे तो चीजें ठीक रहेंगी।

>> सर मेरा सवाल यह है कि आजकल कई लोग यह मानकर चल रहे हैं कि ईश्वर नहीं है। तो क्या यह ईश्वर को ना मानना भी एक तरीके का अंधविश्वास नहीं है?

हां है। अगर आप यह मान के चल रहे हैं कि ईश्वर नहीं है तो यह अंध अविश्वास है। मतलब इस पर फिर ध्यान रखना है। ईश्वर नजर नहीं आता है। जो नजर नहीं आता है पर आप मानते हैं तो साबित करने की जिम्मेदारी किस पर आएगी? आप पर ही आएगी। ईश्वर को मानने वाला आज तक कोई भी ईश्वर को साबित नहीं कर पाया है। जो आर्गुममेंट्स होते हैं, छह आर्गुमेंट्स हैं दुनिया में फेमस वो छह के छह आर्गुमेंट्स हम फिलॉसफी में पढ़ते हैं। उनमें से कोई भी एब्सोल्यूट लेवल पर साबित कर नहीं पाता है। केवल संभावना ही साबित होती है। तो पहला पक्ष यह है कि ईश्वर साबित नहीं हो पाता है। कोई भी नहीं कर सकता है। लेकिन अगर ईश्वर को मानने वाले ईश्वर साबित नहीं कर पा रहे तो यह भी ध्यान रखना है कि ईश्वर इतनी रैंडम कल्पना नहीं है। पूरी दुनिया हमें दिख रही है। उस दुनिया के पीछे कोई फैक्टर रहा होगा। यह कोई इतनी रैंडम बात भी नहीं है कि आप सीधे खारिज कर देंगे। तो अभी तक ईश्वर का ना होना भी साबित नहीं हुआ है। इसे बहुत आसान एग्जांपल में समझना होगा। मान लीजिए कि ए नाम के व्यक्ति पर आरोप लगा कि उसने चोरी की है। अदालत में बहस हुई साबित नहीं हो पाएगी चोरी की है उसने। तो कोर्ट क्या करेगी? कोर्ट कहेगी निर्दोष है। ब्इज बरी किया जाता है। ए ने चोरी की साबित नहीं हुआ। इससे यह साबित नहीं हो गया कि ए ने चोरी नहीं की थी। ए ने चोरी की यह साबित नहीं हो पाया। इससे यह साबित नहीं हुआ कि ए ने चोरी नहीं की। हम तो जानते चोरी की थी। उसने प्रमाण नहीं छोड़े थे। बहुत सफाई से काम किया था। तो यदि यह साबित नहीं हुआ कि ए ने चोरी की है तो दो संभावनाएं हैं। या तो ए ने चोरी की ही नहीं थी या बहुत सफाई से की थी। तीन संभावनाएं हैं और लॉजिक की दुनिया में जहां दो से ज्यादा ऑप्शंस हो वहां ऑप्शंस को दो ही मान के साबित करने का प्रयास करना कि यह नहीं तो वो यह एक फैलेसी है। तर्क दोष है। यहां संभावनाएं दो नहीं है। एक क्या है? ईश्वर है साबित हो सकता है। ईश्वर है साबित नहीं हो सकता। ईश्वर नहीं है यह साबित हो सकता है। ईश्वर नहीं है पर यह साबित नहीं हो सकता। चार संभावनाएं हैं। तो अगर एक संभावना खारिज हुई तो भी तीन संभावनाएं खुली हुई हैं। इसलिए एक कायदे का वैज्ञानिक व्यक्ति तार्किक व्यक्ति क्या कहेगा कि भैया ईश्वर का होना साबित नहीं हो पाता है। ईश्वर नहीं भी हो सकता है। हो भी सकता है। होगा तो ठीक है। नहीं होगा तो ठीक है। तब तक के लिए मैं यह मान के चल रहा हूं कि है या नहीं है। जो मेरी चॉइस है। चॉइस की बात है। आप मानना चाहे तो माने। ना मानना चाहे तो ना माने। पर यह दावा ना करें। हम फिलॉसफी में एक स्टेटमेंट पढ़ते हैं अक्सर। मैं मानता हूं कि ईश्वर है परफेक्ट है। मैं जानता हूं कि ईश्वर है। गलत बात है। मैं मानता हूं कि ईश्वर नहीं है। परफेक्ट। मैं जानता हूं कि ईश्वर नहीं है। गलत बात है। आप नहीं जानते हैं। रति भर नहीं जानते हैं। इस ब्रह्मांड का डेसिमल 050 1% भी अब तक नहीं जान पाए हम। और आप इतनी बड़ी-बड़ी हांक रहे हैं कि हमें पूरे ब्रह्मांड के पीछे क्या वो ही पता है। यह तो हाकने वाली बात हो गई ना। इसलिए थोड़ा सा विज्ञान पढ़ के कई लोग इतना उछलने लगते हैं कि पगला जाते हैं। आइंस्टीन ईश्वर को मानते थे पता है आपको? जब आइंस्टीन से क्वांटम फिजिक्स वालों ने सवाल पूछे। आइंस्टीन ने क्वांटम फिजिक्स का एक नियम है जिसको हम बोलते हैं कि जो प्रकाश है वो कभी बिहेव करता है पार्टिकल की तरह से, कभी बिहेव करता है वेव की तरह से। ऑब्जर्व करेंगे तो पार्टिकल बन जाएगा। ऑब्जर्व नहीं करेंगे तो वेव बन जाएगा। इसको डबल स्ट्रीट एक्सपेरिमेंट से लोगों ने साबित किया है। तो उनसे जब कहा गया कि भाई ऐसा होता है और यह भी कहा कि ऐसा साबित हो रहा है कि एक सब एटॉमिक पार्टिकल यहां हो और एक कहीं और हो और उनमें एक रिलेशनशिप बनी हुई है। लगातार बनी हुई है। तो वो इसको मानने को तैयार नहीं थे। और यह रेंडमनेस जो है कि पार्टिकल और वेव एक ही चीज हो सकती है ऑब्जर्व करने और नहीं करने पर वह इसको मानने को हरगिज़ तैयार नहीं थे। और खारिज कैसे किया? उनका बहुत फेमस वाक्य है। गॉड डजंट प्ले डाइस। यह आइंस्टीन का वाक्य है कि भगवान जुआ नहीं खेलता है। भगवान पासे नहीं खेलता है। आइंस्टीन हम सबसे बुद्धिमानी रहा होगा। और वह भी यह मान रहे हैं कि ये पूरा ब्रह्मांड जो है इतना सिस्टेटिक है। न्यूटन का आप आर्गुमेंट पढ़ के देखिए। केप्लर भी भगवान को मानता रहा। हालांकि उसके तर्कों ने बाइबल को गलत साबित किया। भगवान को नहीं। न्यूटन के आर्गुमेंट्स ने बाइबल को गलत साबित किया। भगवान को नहीं। और न्यूटन भगवान को खूब मानता था। न्यूटन साइंस में इसलिए उतरा था कि मैं साबित कर दूं कि बाइबल में ठीक लिखा हुआ है। साबित उल्टा हो गया अलग बात है। पर उसकी नियत ये थी। न्यूटन ने भी यह कहा कि यह वर्ल्ड इतना परफेक्ट है, इतना परफेक्ट डिजाइन अपने आप नहीं बन सकता है। देयर हैज़ टू बी गॉड। तो मैं यह नहीं कह रहा कि उनकी बात अंतिम सत्य है। मैं सिर्फ ये कह रहा हूं कि न्यूटन ने, आइंस्टीन ने इतने बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने अगर माना है तो ऐसा थोड़ी ना कि हम मतलब हंसीज़ाक में खारिज कर दें और खारिज हो जाएगा। तो अगर आप ईश्वर को नहीं मानते हैं तो नहीं मानते हैं तो ठीक है। दावा नहीं करना है कि नहीं है। इतनी इतना ज्ञान नहीं है आपके पास और यदि मानते हैं तो मानते हैं। यह दावा नहीं करना कि मैं जानता हूं। मैं मानता हूं बस।

>> सर मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़ा हूं। तो मेरा

>> ग्रामीण पृष्ठभूमि से यहां

>> हां सर।

>> अच्छा अच्छा। तो सर जब हम गांव में जाते हैं तो हर गांव में कुछ ऐसे हमको मूर्धन्य भूत स्पेशलिस्ट मिल जाते हैं।

>> भूत विशेषज्ञ तो वो हमारा हाथ पकड़ के कुछ विशेष जगहों पर ले जाते हैं और कहते हैं कि यहां पर फला भूत अपनी फैमिली के साथ रहता है। तो केवल भारत के गांव हां सर केवल भारत के गांव में ही नहीं बल्कि विश्व के लगभग हर कोने में कुछ-कुछ ऐसे लोग हैं जो भूतों में यकीन रखते हैं। तो सर सवाल मेरा यह है कि क्या जो विज्ञान है उसने यह साबित कर दिया है कि भूतों का अस्तित्व नहीं है या फिर थोड़ी बहुत उनकी संभावना बची है क्योंकि कुछ एक लोग ऐसे भी हैं सर कि वो कहते हैं कि हमसे तो उसकी उठापटक हुई थी कुछ कहते हैं हमसे उसने बीड़ी मांग ली थी तो ऐसे भी हैं तो एक द्वंद ये भी है सर

>> बीड़ी मांग थी भूत ने

>> हां सर

>> तो गांव का भूत होगा और गरीब वर्ग का भूत रहा होगा तो जीएसटी कम लगता ना बीड़ी पे सिग्रेट की तुलना में

देखिए ईश्वर के बारे में जो आर्गुमेंट है भूत पर वो लागू नहीं होगा। भूत अंधविश्वास है। यह लगभग साबित किया जा सकता है। लगभग साबित किया जा सकता है। लगभग क्या पूरा साबित हो सकता है मेरे ख्याल से? मेरे तो आज तक सामना हुआ नहीं भूत से। कोई ऐसा एक्सपीरियंस मेरा तो है नहीं। पर मैं ऐसे कुछ लोगों को जानता हूं जिनका सीधा एक्सपीरियंस हुआ है। एक का झगड़ा भी हुआ था भूत से। एक की टक्कर हो गई थी भूत के साथ। बीड़ी तो नहीं मांगी किसी से लेकिन कुछ कुछ ऐसी बातें उनकी हुई है भूत के साथ। हम भी हॉस्टल में ऐसी कहानियां कईयों को सुनाते थे कि हमने भूत देखा है ताकि डर जाए वो लोग पर हमारा एक्सपीरियंस ऐसा रहा नहीं कभी। भूत वाली बात क्यों इररेशनल इलॉजिकल है? एस पर माय अंडरस्टैंडिंग। मैं दो बातें आपको समझाता हूं। एक हम एेरिकल एविडेंस लेंगे और एक लॉजिक से बात करेंगे। पहले लॉजिक से बात करते हैं। दुनिया में जो भी कहता है भूत है उससे पूछो कि भूत क्या है? तो वह कहेगा कि एक व्यक्ति मर गया था। उसकी आत्मा असंतुष्ट थी। किसी वजह से परेशान थी। वो आत्मा भटक रही है। यही कहते हैं सब लोग। आप किसी मुस्लिम से पूछेंगे वह रूह बोल देगा। आत्मा ही रूह वहां पर हो जाती है। इंग्लैंड में पूछेंगे तो सोल बोल देंगे। है बात वही है। सब लोग आत्मा ही भटका रहे हैं कि जो आत्मा मतलब शरीर मर गया है। पर आत्मा किसी वजह से यहां छूट गई है वो भूत है। तो अगर आप उन धर्मों के हिसाब से या हमारे धर्म के हिसाब से बात करेंगे तो आपको आत्मा का कांसेप्ट समझना पड़ेगा। आत्मा क्या है? आत्मा एक कॉन्शियस एलिमेंट है। इसकी व्याख्या भी अलग-अलग होती है। हम उस पे भी नहीं जा रहे हैं। लेकिन मोटे तौर पर सब मानते हैं कि आत्मा एक कॉन्शियस यानी कि चेतन वस्तु है। चेतन का मतलब क्या होता है? जैसे कुछ लोग कहते हैं कि आत्मा एक एनर्जी है। नहीं एनर्जी नहीं है। एनर्जी जब भी बनेगी वह फिजिकल चीज से ही बनेगी। चाहे मैकेनिकल हो, चाहे केमिकल हो, चाहे सोलर हो, कोई भी एनर्जी होगी वह किसी फिजिकल चीज के ट्रांसफॉर्मेशन से या मास के ट्रांसफॉर्मेशन से ही बनेगी। उसके बिना नहीं बन सकती है। कुछ कहेंगे आत्मा हवा जैसी नहीं हवा जैसी नहीं है। हवा हमें फील होती है। हवा चलती है हमें टच होती है। जो चीज पांचों इंद्रियों में से किसी भी इंद्रिय से जानी जा सकती है वह फिजिकल है। वह मैटर है। तो हवा मैटर है। कुछ कहते हैं जैसे करंट है वैसे आत्मा नहीं वैसा नहीं है। करंट क्या है? इलेक्ट्रॉन्स का फ्लो है। इलेक्ट्रॉन भौतिक वस्तु है। आत्मा ना करंट है। आत्मा ना हवा है। आत्मा ना एनर्जी है। पहले इन झूठों से बाहर निकल जाइए। आत्मा कॉन्शियस है। कॉन्शियस का मतलब समझना आसान भाषा में तो विचार, भावना, फीलिंग, अनुभूति, मनस्थिति यह होता है। आप मुझे यह बताएं आप जा रहे थे, करंट लग गया। यह तो हो सकता है। आप जा रहे थे, हवा लग गई। यह भी हो सकता है। कभी आपने सुना कि मैं जा रहा था, एक विचार आके लगा मुझे या दो भावनाएं आके टकराई मेरे साथ? तो भावना नहीं टकराती हमारे साथ। विचार नहीं टकराता कभी हमारे साथ क्योंकि वह कॉन्शियस है। फिलॉसफी की सबसे बड़ी समस्या पता है क्या है कि शरीर मटेरियल है। चेतना कॉन्शियस है और दोनों कनेक्टेड है आपस में। यह वेस्टर्न फिलॉसफी में कम से कम दो 300 साल तक सबसे बड़ी प्रॉब्लम रही कि भौतिक शरीर और चेतना या आत्मा इनमें कनेक्शन होता कैसे है? और वैज्ञानिक सोच सोच के मर गए। आज तक इसका फाइनल आंसर कोई नहीं दे पाया है। सिवाय इसके कि चेतना कोई अलग चीज है ही नहीं। वह ब्रेन का ही एक रिजल्ट है जो आजकल हम न्यूरो साइंस से मानते हैं। इसलिए अगर कोई यह कहे कि मेरा भूत से टक्कर हो गई। यह हो सकता है कि उसको सच में ऐसा लग रहा हो। वो झूठ नहीं बोल रहा। या तो वो झूठ बोल रहा है या वो गलतफहमी का शिकार है। कुछ लोग झूठ बोलते हैं आपको प्रभावित करने के लिए। जो भूत विशेषज्ञ आप बता रहे हैं वह झूठ बोलने वाले लोग हैं मेरे ख्याल से क्योंकि उनकी रोजी रोटी इसी पर चल रही है। वो चार भूति कहानियां सुनाएंगे। आप उनसे कहेंगे भूत से मुक्त करवा दो। फिर वो कुछ करेंगे आपका प्रयास करेंगे तो उसके बदले उनकी आमदनी हो जाएगी। वो एक अलग बात है। इसका मतलब यह नहीं है कि जो कह रहे हैं कि मेरे ऊपर भूत सवार हो गया। वह झूठ बोल रहे हैं। ऐसा नहीं है। ऐसा क्यों होता है? एक कॉन्शियसनेस तो हमने समझ लिया। मनोविज्ञान में न्यूरो साइंस की शुरुआत हम मोटे दौर मानते हैं कि 100 साल पहले हुई थी। देखो खेल क्या है? फिजिकल स्टडीज तो बहुत पहले से होनी शुरू हो गई थी। 17 सेंचुरी के आसपास से पश्चिम में और मेरे ख्याल से अभी 20वीं सदी में भारत में और पहले जो शुष्क का समय था तब की बात अलग है। ह्यूमन बॉडी को समझने का तरीका क्या सबसे अच्छा है? खोल के देखो उसके अंदर क्या-क्या है? खोलेंगे तो मुर्दा आदमी कोई सीधी सी बात है। तो मेडिकल साइंस में यह विचार हुआ कि जो लोग मर जाते हैं हम उनको ओपन करके डसेक्ट करके समझ सके कि हमारी बॉडी कैसे काम करती है। तो यहां से मेडिकल साइंस की शुरुआत हुई। यह पश्चिम में 17 सेंचुरी के आसपास से डेकार के बाद से आम तौर पर मानते हैं कि शुरू हुआ। उनको धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि इतने सारे मतलब वायरिंग हमारे शरीर के अंदर है। यह हार्ट है। समझ में आया कि जो हार्ट है उसका काम ब्लड की सप्लाई करना है ना कि इमोशंस की सप्लाई करना है। क्योंकि दिल से इमोशंस की सप्लाई नहीं होती है। वो कविताओं में होती है। बॉडी में नहीं होती है। लीवर समझ में आया, लंग्स समझ में आई, किडनी समझ में आई उनको। धीरे-धीरे ह्यूमन बॉडी समझ में आने शुरू हो गई। जो मन के अंदर चलता है विचार, भावना, अनुभूति यह सब कैसे होता है? किसी को समझ में नहीं आ रहा। सब तुक्का लगा रहे हैं। 1850 के आसपास पहली बार दुनिया में जर्मनी में एक विश्वविद्यालय में साइकोलॉजी डिपार्टमेंट शुरू हुआ। उसके पहले साइकोलॉजी फिलॉसफी का हिस्सा था। फिलॉसोफी का वो हिस्सा जो आत्मा के बारे में बात करता था। उसका नाम था साइकोलॉजी। 1850 के आसपास पहली बार साइकोलॉजी डिपार्टमेंट शुरू हुआ। जिसने कहा कि हम स्टडी करेंगे। साइंटिफिक स्टडी करेंगे और साइंटिफिक स्टडी कहां करें? यही नहीं पता कि इमोशंस कहां से आ रहे हैं, दिल से आ रहे हैं, कहां से आ रहे हैं। कितनी सदियां बीत गई लोग बाएं सीने पे हाथ रख के बोलते हैं कि तुम मेरे लिए तुम ही हो, तुम मेरे लिए। जबकि वो आ यहां से रहा होता है। राइट ब्रेन से इमोशंस आ रहे हैं। उसी समय दिल धड़क रहा है जोर-जोर से क्योंकि ब्लड की सप्लाई बढ़ गई है। और आपको लग रहा है इमोशन यहां से आ रहा है। जबकि यहां से नहीं आ रहा इमोशन। 1920 के आसपास मेरे ख्याल से 1924 में पहली बार एक मशीन बनी जिसको बोलते हैं ईईजी इलेक्ट्रोइफेलोग्राफ जो उससे होता है इलेक्ट्रोइस इंसेफेलोग्राफी बोलते हैं उसको उसने क्या किया कि दिमाग के बहुत सारे सिर के बहुत सारे हिस्सों पे इलेक्ट्रोड्स लगाए और ये स्टडी हो गया कि जब दिमाग के अंदर कुछ भी होता है कुछ भी इमोशन आए थॉट आए कुछ भी आए तो हल्का सा करंट फ्लो होता है बहुत हल्का हल्का सा इतना नहीं कि हाथ लगाएंगे तो कोई मर जाएगा। हल्का सा करंट फ्लो होता है। जैसे यह समझ में आ गया उनको लगा करंट को स्टडी कर लेते हैं। तो ईईजी से यह स्टडी करना शुरू किया कि जब कोई व्यक्ति गुस्से में है तो दिमाग के कौन से हिस्से में करंट ज्यादा फ्लो हो रहा है। जब कोई मोहब्बत में है तब कहां फ्लो हो रहा है? जब कोई थॉटफुल है तब कहां फ्लो हो रहा है? ये सब करना शुरू कर दिया। आगे चलके एमआरआई आपको पता है मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग बोलते हैं। उसमें एक और नेक्स्ट लेवल है फंक्शनल एमआरआई वो आया दिमाग को स्टडी करता है। वो क्या स्टडी करता है कि किस समय दिमाग के कौन से हिस्से में ऑक्सीजन और ब्लड की सप्लाई ज्यादा है। क्योंकि जहां एक्टिव होगा वहां ब्लड की सप्लाई बढ़ेगी। ऑक्सीजन चाहिए वहां पर ज्यादा और बहुत एग्जैक्ट इमेज बनती है उससे। अब ईईजी प्लस फंक्शनल एमआरआई से यह स्टडी होना शुरू हुआ कि जब कोई कहता है कि मेरे ऊपर भूत चढ़ गया तब उसके दिमाग में क्या चल रहा है? यह तो क्लियर हो गया कि सारी भावनाएं, सारी थॉट सब कुछ दिमाग से ही आता है। दिल से नहीं आता है। ना हाथ पैर से आता है। सब कुछ यहां से आता है। यह भी समझ में आ गया कुछ मुर्दा लोगों का सिर फाड़ के कि दिमाग के दो हिस्से होते हैं। लेफ्ट हेमिस्फयर है, राइट हेमिस्फयर है। उसको भी काट के देखा तो अंदर बहुत सारे हिस्से दिखे। ये भी क्लियर हो गया कि दिमाग के कई हिस्से हैं। अब सवाल था इनमें कनेक्शन कैसे होता है? ये जो कोशिकाएं दिमाग की न्यूरॉन्स इनको बोलते हैं कैसे काम करते हैं? वह सब सवाल बचे हुए थे और तब यह स्टडी हुआ। हालांकि 1908 में विलियम जेम्स एक किताब लिख के गया था जिसका नाम था वैरायटीज ऑफ़ रिलीजियस एक्सपीरियंसेस। उसने उसने बताया था कि कुछ अल्टरनेटिव स्टेट्स ऑफ कॉन्शियसनेस ऐसी होती हैं जो सामान्य से अलग हैं। जिनमें एक मिस्टिकल है। स्पिरिचुअल एक वो फीलिंग है। उसको ही बोलते हैं हिप्नोसिस आपने नाम सुना होगा। वो एक अल्टरनेटिव स्टेट ऑफ कॉन्शियसनेस है। एएससी एक बड़ा वर्ग मानते हैं। इसी में एक स्टेट ऑफ माइंड क्या होती है? जब हमें लगता है कि हमारी बॉडी पर किसी और का कंट्रोल हो गया है। पहले इसके लिए नाम था मल्टीपल पर्सनालिटी डिसऑर्डर बोलते थे। कुछ लोग कुछ लोग इसको हिस्टरिया कहते थे। अब यह दोनों शब्द नहीं चलते हैं आजकल इसको डिसोसिएटिव डिसऑर्डर कहते हैं। अगर किसी को यह लगने लगे कि मेरे ऊपर कोई दूसरी आत्मा हावी हो गई है। इसका बेसिक मतलब है कि उसको एक मानसिक समस्या है जिसका नाम है डिसोसिएटिव डिसऑर्डर। उसको सच में ऐसा लग रहा है कि कोई दूसरी आत्मा हावी हो गई है। पर हुआ सिर्फ इतना है कि उसके दिमाग में एक हिस्सा है। वो हिस्सा थोड़ा सा पैसिव है। जो हिस्सा उसको यह बताता है कि तुम यह हो और बाकी लोग यह हैं। उनका अंतर डम हो गया है। एक लोभ है। पेरिएटल लोब कहते हैं उसको। वह थोड़ा सा पैसिव हो गया है। तो जब कोई कहे कि मेरे ऊपर भूत प्रेत आ गया है। वह झूठ नहीं बोल रहा जनरली। उसको ऐसा ही फील हो रहा है। पर आज न्यूरो साइंस इस लेवल पर आ चुकी है कि वह समझा सकती है कि भूत नहीं आया है। तुम्हें एक मनोरोग है और ऐसा महसूस हो रहा है। ऐसे एक ट्रांस की अवस्था आपने नाम सुना होगा। गाना भी बहुत फेमस चलता है ट्रांस नाम से। है ना? जब आप कीर्तन में बैठेंगे भजन चल रहे हैं जोर-जोर से मंत्रोार चल रहा है। अब उस फ्लो में चले जाते हैं। फ्लो स्टेट बोलते हैं। जैसे ही आप वहां जाएंगे, आप एक खास किस्म का सुकून महसूस करेंगे। वह भी एक एएससी है। ट्रांस का मतलब है कि अब क्रिटिकल थिंकिंग आप नहीं कर रहे इस समय। आप फ्लो में हैं, जॉय में हैं। और इस समय यदि कोई आपको कोई सजेशन देगा, आप तुरंत मान लेंगे उस बात को और वो भी सबकॉन्शियस लेवल पे ही मान लेंगे। इसी को लोग हिप्नोसिस कहते हैं। गंदे लोग इसको हिप्नोटिज्म की तरह से यूज करते हैं। अच्छे लोग इसको हिप्नोथरेपी की तरह से चिकित्सा विज्ञान में यूज़ करते हैं। तो पूरी बात का सार यह है कि भूत प्रेत जादू टोना ये सब चीजें एक्सटर्नली एक्सिस्ट नहीं करती हैं। कोई भूत बाहर घूम नहीं रहा है। ठीक? जो चढ़ जाएगा आपके ऊपर। पर आपको लग सकता है और इसको समझने का सिंपल एग्जांपल है। भूत प्रेत महानगरों में नहीं के बराबर दिखते हैं। शहरों में कम दिखते हैं। गांवों में ज्यादा होते हैं। भूत प्रेत उसी को चढ़ेगा जिसको बचपन से भरोसा है कि भूत प्रेत होता है। जिसको भूत प्रेत का भरोसा बिल्कुल नहीं है। उस पर नहीं चढ़ेगा जब तक आप बार-बार उसको परेशान करने के लिए भूत की कहानी ना सुने। तो क्योंकि मुझे पहले से विश्वास है और कुछ हुआ और मैंने तुरंत इमेजिन कर लिया कि भूत ही मेरे ऊपर आ गया है। यह एक तरीका है। एक प्लेसीबो शब्द है। आगे डिस्कशन में कभी जरूरत पड़ेगी तो मैं आपको समझाऊंगा। तो जो लोग उसका इलाज कर रहे हैं इलाज की बात में करेंगे। मोटी-मोटी बात यह है कि भूत प्रेत का ऑथेंटिक एग्जिस्टेंस आज तक साबित नहीं हुआ है और मेरे ख्याल से कभी होगा भी नहीं क्योंकि मनोविज्ञान न्यूरो साइंस लगभग साबित कर चुका है कि जब जब किसी को भूत प्रेत होता है उसके दिमाग के कुछ हिस्से पैसिव हो जाते हैं। कुछ हिस्से एक्टिव हो जाते हैं। इतना ही मामला है और जैसे ही वो ठीक होता है व्यक्ति ठीक हो जाता है। यह बात साबित हो रही है। आप में से किसी को भूत प्रेत हुआ कभी? आप शहर में रहते हैं ना कभी कुछ होगा तो मतलब साइकेटिस्ट के पास जाना। झाड़फूंक मत करवाना अपनी। है ना? साइकेट्रिस्ट आपका स्टडी करेगा न्यूरोसाइ से दवाई देगा आप ठीक हो जाएंगे। इतना ही मामला होता है।

>> जी

>> सर बिहार में हाल ही में भूत प्रेतों के शक में एक परिवार के पांच लोगों को जिंदा जला दिया गया।

>> डायन डायन के शक में मरा हुआ होगा ना?

>> डायन के शक में एक ही परिवार के पांच लोगों को जिंदा जला दिया गया। ऐसे ही तमाम अंधविश्वास है जो डर पर आधारित हैं। जैसे अशुभ होने का डर या बीमार होने का डर। वहीं दूसरी तरफ वैज्ञानिक दृष्टिकोण पूरी

तरह से तर्कों पर टिका हुआ है। तो सर मेरा सवाल आपसे यह है कि जो हमारा समाज है वो डर या भय को तो बहुत आसानी से अपना लेता है पर तर्क को क्यों नहीं?

आपके सवाल के दो हिस्से हैं। पहले डायन वाला समझ लेते हैं। फिर इस पे आते हैं कि हम भय को क्यों फॉलो करते हैं? तर्क को क्यों नहीं करते हैं? डायन का मतलब वही जैसे मैंने आपको केप्लर की मम्मी की कहानी सुनाई। जर्मनी में सिर्फ भारत में नहीं होता हर जगह होता है। जहांजहां पढ़ाई कम है वहां वहां डायन भूत प्रेत ज्यादा हैं। और डायन के मामले में ध्यान रखना है। दुनिया भर में केवल महिलाएं मारी गई हैं। इसमें सेक्सिज्म भी है। जेंडर वाला मामला भी है। जैसे बिल्ली के मामले में रेसिज्म भी है। काली बिल्ली। सफेद बिल्ली प्यारी है। उसको पालेंगे। काली बिल्ली से वो रेडिएशन होता है न्यूक्लियर टाइप का जो हमारा दिन खराब कर देती है। डायन में पुरुष कभी नहीं मरते। जैसे इस केस में पुरुष मरे भी है तो क्यों? क्योंकि उसके घर में एक महिला थी। उस पर डायन होने का आरोप था और उसको मारने के प्रोसेस में सबको ही मार दिया उन लोगों ने। लेकिन मरना आरोप मैंने जब तक सुना है डायन का महिलाओं पे ही आता है। एक मैलांचल नाम का उपन्यास है। 1950 में लिखा गया था। उसमें भी एक बड़ा मतलब क्या कहेंगे? प्रसंग है, महत्वपूर्ण प्रसंग है कि एक बूढ़ी महिला है। गणेश की नानी नाम से उसका जिक्र आता है और गांव के लोगों में बात फैल गई कि यही डायन है और एक दिन लाठी मार मार के उसको खत्म कर दिया। तो बिहार में झारखंड में भी यह घटनाएं ज्यादा सुनने को मिलती हैं क्योंकि वहां थोड़ा सा यह ट्रेंड ज्यादा है।

तो डायन का मतलब सिर्फ इतना होता है कि देखो सारा खेल क्या है कि मनुष्य दिमाग लगाता है कारण ढूंढने पे क्योंकि कॉजेशन को समझना हमारी फितरत है। हम कारण ढूंढते हैं हर चीज का। गांव के लोग हैं। पढ़े लिखे नहीं है। मान लीजिए कोई पुराना गांव है, पिछड़ा गांव है, पढ़ाई लिखाई किसी ने की नहीं है। एक आध ने की है तो पिट जाता है। बेचारा बोलता है तो कोई उसकी बात सुनता नहीं है। अब क्या हुआ? अचानक एक घर में एक बच्चा बीमार हुआ मर गया। कुछ हुआ मान लीजिए। डेंगू हुआ। समझ ही नहीं पाए। जब तक समझ से उसकी मौत हो गई। प्लेटलेट्स कम हो रही हैं। वह और दवाई कर रहे हैं। नीम पिला रहे हैं, हल्दी पिला रहे हैं कि उसको उनको पता नहीं प्लेटलेट्स क्या होती हैं। प्लेटलेट्स कम होती गई। बच्चा मर गया। मच्छर जिंदा है। फिर उस डेंगू के मच्छर ने सिर को काट लिया। पांच छह घरों में एक-एक व्यक्ति की बुखार हुआ। तीन-चार दिन तेज बुखार हुआ। शरीर टूटा मौत हो गई। अब यह लोग इतने पढ़े लिखे नहीं है कि उसकी वजह मच्छर में ढूंढ पाए। और यह भी समझ पाए कौन सा मच्छर है और उस मच्छर के काटने से एग्जैक्टली हुआ क्या? प्लेटलेट्स क्या होती हैं? ब्लड का कौन सा हिस्सा प्लेटलेट है? वो कैसे कम होता है? कैसे बढ़ेगा? प्लेटलेट्स कैसे हम ले सकते हैं किसी और से? उनको नहीं पता। वो मोटा-मोटा कारण ढूंढ रहे हैं भैया कि यह जो बच्चा मरा है, मरने से पहले कहां-कहां गया था? तो पता लगा कि उस वाले घर में जो बच्चा रहता है ना, एक दिन उसकी मम्मी ने अपने बच्चे को भी इसको भी कुछ खिलाया था। यह बच्चा खेलते वहां चला गया था। तो गांव के लोगों को शक हो गया कि जरूर वह महिला कुछ कर रही है। बाकी जो चार मरे हैं उनके घरों से पूछेंगे। हो सकता है वो बच्चे ना गए हो। पर सामाजिक माहौल में विरोध नहीं कर सकते आप। अगर चार लोग इस मूड से आए हैं कि साबित करना है। पूछेंगे वहां गए थे ना तो यह क्या बोलेगा? हां गया तो था। हो गया साबित। गवाही मिल गई। केप्लर की मम्मी के खिलाफ 24 गवाह थे। जबकि उसने कुछ नहीं किया था। 24 गवाह गांव में मिल गए थे। चार लोग गवाह बन गए। अब सब ने तय किया। सारे मूर्ख एक साथ बैठे हैं। पढ़ाई लिखाई किसी की नहीं है। इन सारे लठत मूर्खों के बीच में विचार चल रहा है कि इन बच्चों को बचाना है तो इस औरत को मारना वो यही डायन है। जादू टोना करती है। काला जादू करती है। काला जादू मतलब जो किसी के अनिष्ट के लिए किया जाता है जादू। और इससे बचने का एक ही उपाय है। उसको मार दो। अब गांव के 10 20 50 लोग इकट्ठे होंगे। उसको पकड़ेंगे उसे बाल खींचेंगे। पेड़ के पास बांधेंगे और मार देंगे। वह संभव नहीं तो घर में आग लगा देंगे। कहीं और जाकर मार देंगे। तो अपनी जिंदगी बचाने के लिए किसी को मार देना यह तो समाजों में सामान्य बात है।

अच्छा आप ही बताइए आपने कहा कि भय तो हमने लिया तर्क नहीं लिया। मान लीजिए कि आप अपने रूम में गए। एक रूम है आपके पास। रूम के अंदर घुसे कुंडी बंद की थोड़ा सा दूर आ गए और अचानक देखा दरवाजा एक ही दरवाजा है। उस दरवाजे के पास एक सांप बैठा हुआ है। ठीक। वो सांप काटता है या नहीं आपको नहीं पता। जहरीला है या नहीं आपको नहीं पता। पर वो है यूं। पूरे मूड में लग रहा है। कमरा छोटा सा है और उस कमरे में एक हथियार है। लाठी वाठी कुछ है आपके पास। आप इस समय उससे बातचीत करेंगे। समझने का प्रयास करेंगे तुम यहां क्यों आए हो? गलती से आ गए। दरवाजा खोलेंगे कि वह बाहर निकल जाए। या उसको मार देंगे। अभी आप कुछ भी बोल लीजिए। आप दरअसल उसको मारेंगे। क्योंकि आपको लग रहा है कि इसको नहीं मारा तो मैं मर जाऊंगा। यह ह्यूमन बीइंग की नहीं हर बीइंग की फितरत है। जहां लगता है कि मेरे बचने के लिए किसी को मारना जरूरी है। हम सब मार देते हैं। तो गांव के लोग डायन कह के मार रहे हैं। उनके दिमाग में भय तो वही है। एग्जिस्टेंशियल या सर्वाइवल थ्रेट है उनके सामने। उन मूर्खों को पता नहीं है कि एक मच्छर मार रहा है ना कि उस महिला के प्रयास से मर रहे हैं।

और रही बात यह कि तर्क क्यों नहीं पहुंचता है? डर क्यों पहुंचता है? क्योंकि डर सबसे पहले पहुंचने वाला इमोशन मैंने आपसे पहले ही कहा जो इमोशन हमें सबसे जल्दी प्रभावित करता है वह डर होता है। और इमोशंस की दुनिया का एक उसूल है। लिंबिक सिस्टम होता है दिमाग के अंदर जो इमोशंस को कंट्रोल करता है। एक सामान्य न्यूरो साइंस का थोड़ा बेसिक देखेंगे ना कि दिमाग कैसे काम करता है। इमोशंस जैसे ही एलिवेट होते हैं सबसे पहले हमारे दिमाग के वो वाले हिस्से जो लॉजिकल है काम करना बंद कर देते हैं। पैसिव हो जाती है। यह हमारे चाहने से नहीं होता। हमारे दिमाग का मैकेनिज्म काम ही ऐसे करता है। इसलिए आप देखेंगे जब आपको बहुत तेज गुस्सा आता है दिमाग काम नहीं करता। और आप उस गुस्से में कुछ ऐसा कर बैठते हैं कि बाद में पसाते हैं कि ये मैंने क्या कर दिया और उस समय दिमाग एकदम काम नहीं करता क्योंकि ये आपके चाहने की बात नहीं है भाई। दिमाग का मैकेनिज्म ऐसा है कि जब गुस्सा या डर बहुत ज्यादा होगा या मोहब्बत इतनी गहरी मोहब्बत हो गई कि आपने कोई ऐसा वायदा कर दिया पछता रहे हैं। क्या बोल के आ गया? क्योंकि इमोशंस के ओवरलोड की स्थिति में ओवरफ्लो होने की स्थिति में जो लॉजिकल पार्ट ऑफ माइंड है उतना एक्टिव नहीं होता है। इसलिए जब किसी गांव में भय होगा भय का असर ज्यादा होगा। तर्क लॉजिक रीजन रैशनलिटी का असर कम होगा। यह सामान्य बात है। कोई रेयर बात नहीं है। हर समाज ऐसे ही इवॉल्व हुआ है।

ठीक है सर मेरा सवाल एक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। हम लोग एक सीरियल देखते थे शक्तिमान और उसमें क्या होता था कि शक्तिमान पर लोगों का बड़ा अटूट विश्वास था। विशेष तौर पर जो बच्चे होते थे वो इतना भरोसा करते थे कि छलांग लगा देते थे कि शक्तिमान बचाने तो आ ही जाएगा। जैसे बातचीत के दौर में पता चला इन्होंने भी छलांग लगाई थी सर। अच्छा क्या बात है।

तो सर मेरा प्रश्न यह है कि क्या इस तरह की सीरियल्स या इस तरह की जो मूवीज़ होती हैं जिसमें कि जादू टोना या इस तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा मिलता है। क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है या इन पर अंकुश होना चाहिए या नहीं होना चाहिए?

मतलब इसमें दो पक्ष हैं। एक तो अभिव्यक्ति की स्वाधीनता है कि अगर कोई क्रिएटिव स्टोरी लिख रहा है, फिक्शन लिख रहा है तो उसकी जिम्मेदारी कहां तक जाती है? दूसरा यह कि अगर किसी चीज का इंपैक्ट ऐसा है कि बच्चे छत से छलांग लगा रहे हैं इस भरोसे में कि शक्तिमान आ ही जाएगा। तो अगर एक बच्चा भी उस चक्कर में चला गया उसकी मृत्यु हो गई तो जिम्मेदारी कौन लेगा उसकी? तो मेरी पर्सनल जो ओपीजी है वो तो यह है कि कंट्रोल होना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वाधीनता का मतलब मेरी राय में यह नहीं है कि अब कुछ भी दिखाएं। तो यदि कोई फिल्म भूत प्रेत पर है, जादू टोने पर है या ऐसी चमत्कारी शक्तियों पर है तो कंट्रोल होना चाहिए और सीबीएफसी जो हमारे देश में है सेंसर रोड जिसको हम बोलते हैं उसको यह अधिकार है कि वो इन चीजों को कंट्रोल कर सकता है। पर उस पर भी दबाव रहता है कि ज्यादा कंट्रोल करेगा तो लोग बोलेंगे फ्रीडम ऑफ स्पीच खत्म हो गई है। ये तो तानाशाही है। वो सब हो जाएगा। पर मुझे लगता है कि कोई भी इनसेंसिटिव टाइप की फिल्म अगर है किसी भी तरह की अगर उस समाज के किसी वंचित वर्ग को महिलाओं को दलित समाज को जो एलजीबीटी हो सकते हैं थर्ड जेंडर हो सकता है जो फिजिकली चैलेंज्ड लोग हैं वो हो सकते हैं जो उनका मजाक बना रही है या उनको टॉर्चर करना ठीक बता रही है तो हमें परमिट नहीं करना चाहिए उतना हिस्सा हटाना चाहिए ठीक ऐसे ही जैसे स्मोकिंग का सीन आता है वहां पर लिखते हैं साफ-साफ ठीक वहीं पर लिखते हैं स्मोकिंग इज इंजुरियस टू हेल्थ। भूत प्रेत वाली फिल्मों में कुछ नहीं लिखते हैं। तो या तो यह चीज बार-बार एक्सप्लसिटली बताई जाए कि यह सिर्फ कहानी है। ऐसा कुछ होता नहीं है। मतलब यह बात इतनी साफ तरीके से बताई जाए कि बच्चे भी समझ लें कि झूठ है। केवल कहानी है। नहीं तो फिर हां गलतफहमियां होंगी। और अगर दो चार बच्चे भी उस चक्कर में गलती कर बैठे तो उसकी कानूनी जिम्मेदारी आए ना आए नैतिक जिम्मेदारी तो उस फिल्म लेखक डायरेक्टर प्रोड्यूसर पे आएगी ही आएगी तो मेरे ख्याल से कंट्रोल होना चाहिए

सर जैसा कि आपने अभी बताया कि जहां तक भूत प्रेत को महसूस करने वाली वाला मसला है तो लोगों को साइकेटिस्ट के पास जाना चाहिए। लेकिन हम देखते हैं आज भी भारत में ऐसे बहुत स्थान हैं जहां अलग-अलग रिलीजन के हिंदूइज़्म में जैसे बालाजी हो गया या फिर बहुत सारी क्रिश्चियन मोनेस्ट्रीज हैं पंजाब में है और अलग-ग काम कर रही हैं। अब ये एक बाबा बलजिंदर बाबा भी पकड़े गए हैं जिनको पुलिस ने भी पकड़ा है। तो बहुत से लोग इसके असरदार होने का दावा भी करते हैं। तो यह पूरा मसला क्या है? और दूसरा इसी से संबंधित मेरा सवाल है कि कई बार लोग भूत प्रेत को बीमारी समझने के बजाय भूत प्रेतों से काम भी निकलवाना चाह रहे होते हैं। के जैसे तंत्र मंत्र हो गया, काला जादू हो गया।

अच्छा वो तो काला जादू के सेंस में ना

तो ये सारी चीज आज भी है और बार-बार हमें देखने को मिलती है। तो इस पे आप के क्या विचार?

दो-तीन बातें हैं। एक तो ये एक फिल्म मैंने देखी थी। क्या नाम था? भूतनाथ था। पता नहीं क्या नाम था?

अमिताभ बच्चन बनी। हां अमिताभ बच्चन जिसमें जिसमें बड़ा अच्छा भूत था तो भूत बुरे क्यों होते हैं? भूत अच्छे भी तो हो सकते हैं। एक तो भूतों का इमेज मेकओवर करने की जरूरत है। भूतों को लेकिन नेगेटिविटी बहुत ज्यादा है। वहां भूत का मतलब है कि दादा जी की मृत्यु हो गई है और दादा जी उसके बाद भी अपने पोते से मिलने के लिए आते हैं। एक आत्मा के रूप में आते हैं। तो भूत में विश्वास करें, अविश्वास करें बाद की बात है। कम से कम इमेज तो ठीक रखो। केवल खराब ही क्यों करना है? भूतों से काम निकलवाने की जहां तक बात है वह ब्लैक मैजिक तंत्रमंत्र में अक्सर होता है कि हम किसी को परेशान करने के लिए उसके ऊपर भूत प्रेत का साया डायन वो सब करते हैं। सोर्सरी ब्लैक मैजिक विच क्राफ्ट बोलते हैं जिसको दुनिया भर में ऐसा चलता है। स्पेशली ट्राइबल और विलेज वाले एरियाज में ऐसा दिखता है।

आपका जो मूल सवाल है कि किसी के ऊपर भूत प्रेत था वह किसी मंदिर में या किसी मस्जिद में या किसी क्रिश्चियन मिनिस्ट्री में गया पंजाब में या साउथ इंडिया में और ऐसे वीडियोस आपने देखे हैं कि वह ठीक भी हो गया है। बल्कि अगर आप किसी ऐसी जगह जाएंगे तो आप पाएंगे कि वहां बहुत सारे लोग अजीब सी हरकत कर रहे हैं। उसके बाद अचानक रिलीफ मिल गया उनको। ठीक होते हुए दिखते हैं। तो ऐसा क्यों होता है? इसके पीछे दो फैक्टर्स हैं। सबसे पहली बात यह नहीं कहना है कि सब झूठ है। ये एक्टिंग चल रही है। आज से 5 साल पहले तक मेरी राय यह थी कि सिर्फ एक्टिंग चलती है। ऐसा कुछ नहीं होता है। फिर जब इसको मैंने थोड़ा स्टडी करना शुरू किया। न्यूरो साइंस को थोड़ा पढ़ना शुरू किया तो मैंने देखा कि कुछ लोगों ने भारत में कुछ लोगों ने भारत के बाहर इस पर खूब रिसर्च की है। भारत के जो सबसे अच्छे साइकेट्रिस्ट हुए उनमें से एक हैं सुधीर कक्कड़। तो डॉक्टर सुधीर कक्कड़ ने एक पूरी किताब इसी पर लिखी है। उसका नाम है शमंस मिस्टिक्स एंड डॉक्टर्स इस नाम से किताब है उनकी। उन्होंने क्या किया कि जैसे बालाजी की बात आपने की उस पे भी स्टडी की। ऐसे ही एक दरगाह है जहां पर बहुत सारे मुस्लिम लोग जाते हैं ठीक होने के लिए। उसको भी स्टडी किया। ऐसे बहुत सारे प्लेसेस स्टडी किया कि उसका क्या इंपैक्ट होता है। जो उनके रिजल्ट्स हैं वह बहुत इंटरेस्टिंग है। ऐसे ही निमहान आपने सुना होगा बेंगलुरु में जो है वो भारत का सबसे अगण्य संस्थान है मेंटल हेल्थ पे स्टडी करने वाला उसने भी रिसर्च की है। वहां के एक डॉक्टर मेरे ख्याल से उनका नाम डॉक्टर देवा है। उनकी रिसर्च काफी पॉपुलर है जो इसी विषय पर उन्होंने की है। अगर आप इन सब को पढ़ेंगे तो सही रिजल्ट आपको मिलेगा।

जैसे कक्कड़ साहब ने यह कहा कि हम इन सबको अंधविश्वास नहीं मानेंगे। इन सबको हम कहेंगे कि जैसे ऑपरेशन थिएटर होता है वैसे एक साइकोलॉजिकल थिएटर है। उन्होंने शब्द दिया साइकोलॉजिकल थिएटर और यह कल्चरल मेडिसिन है। क्योंकि ध्यान रखना है आज तो हम बड़े शहरों में हैं। न्यूरोसाइंस है। साइकेट्री हमारे पास है। यह मुश्किल से पिछले 50 साल की बात भारत में है। दुनिया में 100 साल की बात है। दुनिया के बहुत सारे इलाकों में शहरों में भी और गांवों में तो हर जगह आज तक साइकेट्री नहीं है। न्यूरो साइंस नहीं है। लोग बीमार हमेशा से होते आए हैं। तो हर संस्कृति ने अपने-अपने तरीके से इलाज ढूंढे। इसलिए कक्कड़ साहब ने कहा कि ये कल्चरल मेडिसिन है। अगर आप ट्राइबल स्टडीज पढ़ेंगे तो वहां एक कांसेप्ट है ट्राइबल मेडिसिन। हर ट्राइब ने बीमारियों के लिए इलाज ढूंढे हुए हैं अपने-अपने। वो ट्राइबल मेडिसिन है। और शहरों पे अप्लाई नहीं हो रही है। पर ट्राइब के लोगों में अप्लाई हो रही है। किसी ना किसी मात्रा में। उसमें होता क्या है? उसमें होता यह है कि मान लीजिए एक आदमी को लगता है कि उसके ऊपर भूत का साया है। मैं फिर से कह रहा हूं कि उस व्यक्ति की मनोदशा सच में चिंताजनक है। वो परेशान है। वो मेंटली ठीक नहीं है और क्योंकि उसको भूत के बारे में बचपन से पता है। उसको यह महसूस हो रहा है कि उसके ऊपर भूत हावी हो गया है। वो झूठ नहीं बोल रहा है। एक्टिंग नहीं कर रहा है। वो वहां पर गया। उसको कई लोगों ने यह कह रखा है कि भैया कितना ही बड़ा भूत हो जैसे ही आप इस दरगाह में या इस मंदिर में या इस क्रिश्चियन मिनिस्ट्री में पहुंचेंगे वहां जो बाबा हैं ठीक कर ही देंगे उसको यह उसके मन में बार-बार बैठा हुआ है विश्वास है इस विश्वास को बोलते हैं प्लेसिबो और प्लेसिबो का मतलब है क्योंकि मुझे विश्वास था कि मैं इस दवाई से या इस डॉक्टर से ठीक हो जाऊंगा मैं उसके पास जाके सच मैं ठीक हो जाऊंगा। इसको मनोविज्ञान मतलब मेडिकल साइंस में प्लेसिबो कहते हैं। इसका उल्टा होता है नोसिबो। मुझे एकदम पता है कि ये बकवास है। तो वो ठीक भी होगा तो मैं उससे ठीक नहीं होऊंगा क्योंकि अविश्वास बहुत ज्यादा है। अगर आपको कोविड की वैक्सीन पर घोर अविश्वास है तो हो सकता है कि वैक्सीन लगाने के बाद भी आप ठीक ना हो। अगर आपको पूरा भरोसा है कोविड वैक्सीन से ठीक हो ही जाऊंगा तो हो सकता है कि वैक्सीन में पानी लगा देंगे आपको तो भी आप ठीक हो जाएंगे क्योंकि भरोसा था आपको बहुत ज्यादा। ये मेडिकल साइंस की हर रिसर्च में नियम होता है। आपको शायद पता है या नहीं पता है। कोई भी दवाई कोई भी वैक्सीन जब बनती है मान लीजिए 100 आपको टेस्ट केसेस कर रहे हैं। आप 100 पे टेस्ट करेंगे तो उन 100 में से 20 या 25 पे आप टेस्ट कैसे करते हैं? दवाई देंगे पर उसमें वह दवाई होगी नहीं जिसको टेस्ट कर रहे हैं आप केवल यह देखने के लिए कि जिनको सही में दवाई दी और जिनको दवाई कह के कुछ नहीं दिया दोनों बराबर तो ठीक नहीं हो रहे अगर बराबर हो रहे हैं तो दवाई किसी काम की नहीं है क्योंकि केवल भरोसे से ठीक हो रहे हैं तो मनोविज्ञान का खेल हुआ विज्ञान का खेल कहां हुआ तो जब प्लेसिबो वाले सैंपल की तुलना में नॉन प्लेसिबो रियल मेडिसिन के सैंपल में रिजल्ट्स बहुत ज्यादा अच्छे होते हैं। तब मानते हैं कि दवाई का असर है। अगर वह इक्वल ऑलमोस्ट इक्वल है तो असर नहीं बनते हैं।

तो कक्कड़ साहब ने जो किताब लिखी उसमें निष्कर्ष क्या निकाला बाकी लोगों ने भी कि यह व्यक्ति है उसको भरोसा है कि मेरे ऊपर भूत है। वो मेंटली इल है। और उतना ही गहरा भरोसा है कि इस मंदिर में या इस मस्जिद में या इस दरगाह में या इस मिनिस्ट्री में जाकर ठीक हो जाऊंगा। जैसे ही वह वहां गया अचानक चिल्लाने लगा जोर-जोर से हाथ पैर पटकने लगा। यह भी होता है। वो ठीक होता है। एक्टिंग नहीं चल रही। कुछ एक्टर्स हो सकते हैं हर जगह। सारे एक्टर्स नहीं होते हैं। कुछ जेन्युइन होते हैं लोग वहां। वो वहां जाते क्यों ऐसे करने लगता है? क्योंकि वहां जाते ही उसके कंट्रोल्स खत्म हो जाते हैं। उसको यह भरोसा है कि मैं ठीक होने वाला हूं। और विशेष रूप से बहुत सारी महिलाएं जो घरों के अंदर हैं जिनको एक्सप्रेशन का अधिकार नहीं है। कई लोग इसलिए परेशान है कि उनके मन में बहुत कुछ भरा हुआ है। कहीं बोल ही नहीं पाए जिंदगी में। इतना घुट गए कि बोल ही नहीं पा रहे हैं। उन्हें केवल कैथारसिस की जरूरत है। यानी अपनी भावनाएं निकालने की जरूरत है। लाइफ इन अ मेट्रो या मेट्रो इन दिनों में आपने देखा होगा एक सीन दोनों फिल्मों में है कि एक लड़की जो बहुत परेशान है। उसका बॉयफ्रेंड लेके जाता है कि चिल्लाओ उधर से। और चिल्लाने से रिलीफ मिल गया। इसको कथार्सिस कहते हैं कि मन फ्री हो गया। अब यह जैसे ही वहां गए अच्छा जिस महिला को घर के अंदर चिल्लाना अलाउड नहीं है। यहां अलाउड है क्योंकि यहां पर तो झाड़फू चल रही है। और ओझा की हाथ में झाड़ू है। अगर उसके सासससुर ने बोला कि चिल्ला क्यों रही है? उनको भी टांग देगा साथ में। तो वहां सब खौफ में है। ये लड़की वहां सामने है। बहू जनवरी। अब ये वहां चिल्ला के अपनी बात कर रही है। सामने वाले व्यक्ति पर भरोसा है। वो साथ में चिल्ला रहा है। वो उसको कह रहा है कि भूत निकल बाहर निकल बाहर। यह इतनी उसमें तल्लीन हो गई है कि जोर से चिल्ला रही है। पागलों की तरह हाथ पैर मार रही है। इसकी एक व्याख्या है प्लेसबो। एक व्याख्या है विरेचन या कैथारसिस कि जो भाव दबे हुए थे बाहर निकल गए। एक व्याख्या है ट्रांस। वहां बहुत सारे लोग हैं। सब एक ऐसी हरकत कर रहे हैं। एक खास किस्म का मंत्रो उच्चारण चल रहा है। बहुत तेज आवाज में। वह आवाज, वह फ्लो ऐसा है कि उसमें दिमाग डूबने लगता है। क्रिटिकल थिंकिंग खत्म होने लगती है। उस समय सामने वाला व्यक्ति जो कहता है हम पे असर बहुत गहरा पड़ता है। हम वैसा ही करते हैं जैसा कह रहे हैं। और थोड़ी देर में ऐसा रियलाइजेशन होता है कि हम ठीक हो गए हैं। एकदम सही बात है। लेकिन लगभग सभी केसेस में ये ठीक होने का एहसास टेंपरेरी होता है। आपको वहां लग रहा है ठीक हो गए। एक दबाव भी होता है कि यहां पूरी दुनिया ठीक हो गई। मैं क्यों नहीं ठीक हो रहा? जैसे मैंने कई बार देखा कि मैं डॉक्टर के पास जब भी जाता हूं डॉक्टर

उन्होंने कहा कि 10 दिन के बाद फिर से आ रहा हूं। मैं फिर से गया। और डॉक्टर ने 8-10 लोगों के सामने पूछा, फायदा हुआ ना? मैं बोलता हूं, हां, फायदा हुआ। जबकि उतना फायदा नहीं हुआ था। एक दबाव सा होता है कि आपके मुंह से निकलता है, हां, फायदा हुआ क्योंकि वह एक ऐसा माहौल है जहां आप थोड़ा सा सकारात्मक राय देंगे। यह आपके ऊपर एक मानसिक दबाव रहता है। उस माहौल में सब पर दबाव है।

फायदा हुआ भी है। चिल्लाने से, मन की बात निकल जाने से राहत बहुत गहरी मिली है। थकान सी दूर हो गई है। अभी व्यक्ति माता-पिता के साथ, परिवार के साथ घर जा रहा है। गहरी नींद में चला गया है। क्योंकि ट्रांस जैसी अवस्थाओं के बाद नींद बड़ी गहरी आती है। अभी व्यक्ति एक दिन बढ़िया से सोया। उसके बाद उठा। पहले की तुलना में काफी ठीक है। लेकिन 5 दिन, 10 दिन होते फिर से वह चीजें होनी शुरू होती हैं। उस स्तर पर आने में समय लगता है। पर एक समय के बाद वह स्तर भी आता है। फिर ले जाना पड़ता है। क्योंकि विश्वास है ही, वहां गए। फिर से वह सब हुआ। फिर थोड़ा सा राहत हुआ।

ऐसे मामले निमहंस को कक्कड़ साहब को भी बहुत कम या नहीं के बराबर मिले, जहां स्थायी राहत हुई हो। और अस्थायी राहत की वजह प्लेसिबो (placebo) ज्यादा है और विरेचन (catharsis) ज्यादा है। ट्रांस की अवस्था हिप्नोसिस (hypnosis) जिसको बोलते हैं। हिप्नोसिस का मतलब है कि दिमाग किसी के नियंत्रण में आपके है और उसने आपको कहा कि तुम ठीक हो गए। भूत निकाल दिया मैंने बाहर। जैसे ही उसने कहा कि तुम्हारा भूत यह निकाला, यह निकाला। बाहर हो गया। कुछ बाहर नहीं हुआ। पर इसको इतना भरोसा इस व्यक्ति पर है कि इसको लग गया कि बाहर हो गया भूत। निकला कुछ नहीं है। पर क्योंकि इस व्यक्ति को भरोसा था कि मुझ पर भूत है और यह व्यक्ति भूत निकाल सकता है और उसे निकाल दिया है, इसको लग रहा है कि अब मैं मुक्त हो गया। अब पांच दिन, 10 दिन एकदम ठीक रहेगा। धीरे-धीरे फिर हो सकता है कि परेशानी हो।

इसलिए यह ध्यान रखना है कि अब तो न्यूरोसाइंस (neuroscience) है, साइकेट्री (psychiatry) है हमारे पास। जब तक वह नहीं था तब तक इन्हीं लोगों ने गांवों के अंदर, आदिवासी आबादी में, धार्मिक आबादी में लोगों को राहत दी है। तो एक सिरे से खारिज कर देना ठीक नहीं है। लेकिन हां, आज के जमाने में जब हमें पता लग ही गया है कि क्या-क्या दिक्कत हो रही है। जब पता है कि दवाएं क्या हैं, अब तो दवाएं बन गई हैं। अब लगभग हर मानसिक विकार के लिए दवाएं हैं हमारे पास। राहत मिलती है। तो ज्यादा अच्छा है कि अब लोग जाएं डॉक्टर के पास और झाड़-फूंक में दिक्कत यह भी है कि कभी-कभी झाड़-फूंक करते-करते असली इलाज में देर हो जाती है। और जब आप पहुंचते हैं असली इलाज के लिए तब तक इलाज करना संभव नहीं बचता है। इसलिए उनका महत्व है सांस्कृतिक दवा के रूप में। लेकिन आप उस भरोसे रहें, यह ठीक नहीं है। अच्छा नहीं है।

>> सर, मेरा एक सवाल है। जैसे अभी हमने तंत्र-मंत्र पर बात की, वैसे टोने-टोटके भी होते हैं। और अक्सर यह देखा जाता है कि जो बड़े खिलाड़ी या सेलिब्रिटीज भी हैं, वो भी कुछ टोटकों को फॉलो करते हैं। जैसे राफेल नडाल के केस में हम देखते हैं कि वो मैच के लिए जाते हैं तो बोतलों को कुछ विशेष व्यवस्था में वो सेट करते हैं।

>> कहां सेट करते हैं बोतलों को?

>> सर, उसी अपने प्लेग्राउंड पे मतलब।

>> प्लेग्राउंड पे बोतलों को रखते हैं।

>> मतलब, हम वाटर बोतलों को कुछ व्यवस्था में, एक विशेष पैटर्न में सेट करते हैं।

>> अच्छा।

>> और जैसे सचिन तेंदुलकर के लिए भी यह कहा जाता है कि जब वो ग्राउंड पे खेलने के लिए जाते हैं तो उसमें वो पहले दाएं पैर में जूता डालते हैं, फिर बाएं पैर में डालते हैं।

>> अच्छा। और 10 नंबर की जर्सी भी। टी-शर्ट भी 10 नंबर की थी।

>> हां, 10 नंबर।

>> ऐसा एक्सपर्ट्स बोलते हैं सर। और घरों में भी हम आमतौर पर देखते हैं, जैसे अगर इंडिया का मैच आ रहा है और इंडिया अगर जीत रही है, तो जो इंसान जहां बैठा है, वो फिर वहीं बैठा रहेगा। हमारे घर में भी होता है।

>> हां, वो वो नहीं हिलेगा। और कुछ लोग ऐसे भी हैं कि अपने नाम में एक-आध अक्षर जोड़ देंगे कि उनकी किस्मत बदल जाए। न्यूमेरोलॉजी (numerology) हो जाए, यह वो। तो ये सारी चीजें आज भी हमें क्यों देखने को मिल रही हैं? मतलब, ऐसे टोटके आज भी क्यों मौजूद हैं?

>> लागत नहीं है और लाभ ज्यादा है। इसलिए चलता है। बहुत सरल सी बात यह है। जैसे सच बात यह है कि सचिन तेंदुलकर 10 नंबर की टी-शर्ट पहने या 99 पहने या कुछ भी पहन लें, इससे फर्क तो पड़ना नहीं है। कोई फर्क नहीं पड़ने वाला इस बात से। बेकार की बात है। पहले दाएं पैर में जूते पहने या बाएं में पहने, इससे क्या फर्क पड़ता है? पर होता क्या है कि मान लीजिए किसी ज्ञानी दिखने वाले व्यक्ति ने उनसे कह दिया कि वो तीन मैच में लगातार जल्दी आउट हो गए। परेशान है कि प्लेयर वही है, सब वही है, खेल क्यों नहीं पा रहा हूं। इसका उत्तर इतना है कि फॉर्म कभी होती है, कभी नहीं होती है। इतना ही मामला है। और गहराई में जाएं तो फॉर्म क्यों नहीं है भाई? और किसी ने कहा, अच्छा, अच्छा, अच्छा, तुमने बाएं पैर में जूते पहने थे पहले? हां, अरे यही कृपा अटक गई तुम्हारी। पहले दाएं पैर में जूते पहनो। अब इस समय क्योंकि तीन मैच में आउट हुए हैं जल्दी, टेंशन में है बहुत ज्यादा और ठीक फॉर्म ठीक करने की कीमत सिर्फ इतनी है कि जूता पहले यह वाला पहन लेना है। कोई बड़ी कीमत तो है ही नहीं इसमें। नुकसान तो हो ही नहीं रहा कुछ। देयर इज नो कॉस्ट अटैच्ड टू इट। पहन के देख लिया। अब खेलने गए तो मन में एक विश्वास है कि इस बार ठीक होगा क्योंकि जूता पहले वह पहना है और जर्सी भी 10 नंबर की है। इस विश्वास ने अपने ऊपर भरोसा बढ़ा दिया। उस भरोसे से अच्छा खेल गए। अच्छा खेलने की वजह भरोसा है। पर उनको लग रहा है कि अच्छा खेलने की वजह जूता और टी-शर्ट है।

ऐसे राफेल नडाल, कोई भी खिलाड़ी हो, एक-दो मैच खराब हुए। फिर एक बार गलती से बोतलें खास क्रम में थी। अच्छा खेल गए। किसने कहा कि इस वजह से हुआ है। इसको लॉजिकल फैलेसी (logical fallacy) की दुनिया में बोलते हैं, फॉल्स कोसेशन (false causation) - अवैध कारणता। कोरिलेशन (correlation) को कोजेशन (causation) मान लेना। यह लॉजिक की दुनिया की सबसे आम फैलेसी है। हम घर में बैठे हैं। मैच चल रहा है। इंडिया की टीम अच्छा खेल रही है। पर रिस्क है अभी भी। दो चौके लग गए हैं। अब किसी को वाशरूम जाना है। तो हर घर में एक-आध ऐसा बाबा होता है, बोले खबरदार जो उठा, वही तो। अब सब बैठे हैं बेचारे। इनको लग रहा है कि इनके बैठने से सचिन खेल रहा है। पूरी दुनिया चल रही है। ग्रह, नक्षत्र सब चल रहे हैं। पृथ्वी भी घूम रही है अपनी जगह। उस सब से कुछ नहीं हो रहा है। इनके उठने से आउट हो जाएगा। और खुद को ब्रह्मांड का केंद्र समझना कि मैं बैठा हूं इसलिए सचिन खेल रहा है। कितना मूर्खतापूर्ण है। मासूमियत है। ऐसी मासूमियत का सौंदर्य यह है कि इससे घर में एकता बनती है। सबको हंसी-मजाक आ रहा है थोड़ा सा। थोड़ा मजाक हो गया, ठहाके हो गए। पर एक समय के बाद लोग इसको गंभीरता से मान लेते हैं कि आज मैच है तो आज हम इस रंग के कपड़े पहनेंगे तो इंडिया जीतेगा।

तो यह जो टोटका है इसके पीछे मेरे ख्याल से केवल इतनी बात है कि जब हम कमजोर होते हैं, असुरक्षित होते हैं, हम राहत चाहते हैं। और कोई छोटा सा उपाय अगर हमें राहत देता हुआ लगता है, हमारा भरोसा खुद पर कायम हो जाता है, प्रदर्शन सुधर जाती है। अगर एक बार सुधर गई तो और जोखिम बढ़ जाता है। जैसे मान लीजिए कि मैं तीन मैच खेला, जीरो पर आउट हो गया। एक बाबा जी मुझे मिले बोले, 10 नंबर की टी-शर्ट पहनो और सेंचुरी लगाओगे। मैंने पहनी 10 नंबर की। अगली बार पहली बॉल पर आउट हो गया। अब कम से कम अंधविश्वास पैदा नहीं होगा मेरे अंदर। अगर मैंने उस दिन सेंचुरी मार दी। अब मैं इतना कमजोर हूं कि अब मेरे मन में कि 10 नंबर की टी-शर्ट से ही सेंचुरी लगी है। अब जिंदगी भर कोई मुझसे उतरवा नहीं पाएगा 10 नंबर की टी-शर्ट। क्योंकि दिमाग में कोरिलेशन बन गया, कोजेशन। कोरिलेशन मतलब दो चीजें खास क्रम में हो रही हैं। आपने मान लिया कि वही इसका कारण है।

कई बार गलत हो जाता है ना, जैसे रोज सुबह मुर्गा बांग देता है, फिर सूरज निकलता है। और आप कहें कि मुर्गे के बांग देने से सूरज निकल रहा है। यह कोरिलेशन है। मुर्गा बांग देता है, सूरज निकलता है। पर सूरज यह देख के नहीं निकलता कि मुर्गे ने बांग दे दी है। अगर मुर्गा बांग नहीं देगा तो क्या होगा? तब भी निकलेगा। लेकिन हम कोरिलेशन को कोजेशन मान लेते हैं और यह दुनिया में बहुत आम बात है। अधिकांश लोग ऐसा करते हैं। आप समझ पाइए, उत्तर क्या है?

सर, ऐसा भी देखने को मिलता है कि जैसे कोई धर्म को नहीं मान रहा है, लेकिन आध्यात्म को बहुत मानता है, बड़ा आध्यात्मिक है। कुछ धर्म को मानते हैं, साथ-साथ आध्यात्म को भी मानते हैं। तो विज्ञान आध्यात्म को कैसे मानता है? मानता भी है या कुछ नहीं मानता?

>> नहीं मानता है। विज्ञान को नहीं मानता है।

>> अध्यात्म को सरल भाषा में समझ लीजिए। भारतीय परंपरा में 'अधि' और 'आत्म' यानी आत्मा का अपने बड़े रूप अधिष्ठान या सुपर आत्मा या ईश्वर से एक होने का अनुभव, इसको अध्यात्म कहते हैं। पश्चिम में स्पिरिचुअलिटी (spirituality) है। ईसाईयत में ट्रिनिटी (Trinity) की धारणा है। ट्रिनिटी में एक ईश्वर है, एक ईश्वर का पुत्र जीसस हैं, और तीसरी जो है वो है स्पिरिट, द होली स्पिरिट (Holy Spirit)। उस होली स्पिरिट के साथ एक होने का प्रोसेस स्पिरिचुअलिटी है। ठीक? आमतौर पर दुनिया के धार्मिक लोग यह मानते हैं कि हम ईश्वर के साथ जुड़ सकते हैं। इस्लाम नहीं मानता है। यहूदी लोग नहीं मानते हैं। वो इसको पाप मानते हैं। क्योंकि इस्लाम की धारणा यह है कि खुदा बहुत पवित्र है और इंसान खुदा की तुलना में अपवित्र है। इसलिए अगर कोई बंदा यह कहे कि मैं खुदा हूं तो यह पाप है, अपराध है। पर सूफी मानते हैं। और सूफी क्या बोलते हैं? 'अन अल हक़' (Ana al-Haqq) - 'अन अल हक़' का मतलब है कि मैं अल हक़ हूं। अल हक़ का मतलब खुदा का जो सर्वोच्च रूप है, अल हक़ का सर्वोच्च रूप, मैं वही हूं। जैसे 'अहं ब्रह्मास्मि' (Aham Brahmasmi) भारत में बोलते हैं ना, 'अयमात्मा ब्रह्म' (Ayamatma Brahma), 'तत्त्वमसि' (Tat Tvam Asi), आत्मानं ब्रह्म (Atmanam Brahma) ऐसे जो शब्द आते हैं, वाक्य आते हैं उपनिषदों में, ये सब उसी का जिक्र करते हैं।

तो जनरली धार्मिक लोग ही स्पिरिचुअल होते हैं। जो ट्रेडिशनल इस्लाम में हैं, ट्रेडिशनल जूडाइज्म (Judaism) में हैं, वह ऐसी बात अक्सर नहीं करता है। क्रिश्चियनिटी (Christianity) में भी कुछ स्कूल नहीं करते हैं, कुछ करते हैं। भारत में हिंदू धर्म में सब करते हैं क्योंकि वेदांत (Vedanta) में साफ-साफ कहा है कि मैं ही ब्रह्म हूं। तो वेदांत में 'अहं ब्रह्मास्मि' बहुत कॉमन सोच है, प्रचलित है। जैन धर्म में ईश्वर नहीं है तो कोई यह नहीं कहेगा कि मैं ईश्वर हूं। बुद्धिज्म (Buddhism) में ईश्वर नहीं, कोई नहीं कहेगा कि मैं ईश्वर हूं। तो कुछ लोग जो ईश्वर को नहीं मानते, बुद्धिज्म वाले, जैनिज्म वाले, स्पिरिचुअलिटी को मानते हैं। वो बोलते हैं कि मैं निर्वाण (Nirvana) में चला गया, मैं कैवल्य (Kaivalya) में चला गया। तो इस तरह से मानते हैं।

बेसिक बात जो बॉटम लाइन है, स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस (spiritual experience) का मतलब यह होता है एक ऐसा खास अनुभव जिसमें आपको लगे कि आप इस पूरे ब्रह्मांड के साथ एक हो गए हैं या ब्रह्म के साथ एक हो गए हैं। एक ऑप्शन है कि आप ब्रह्म और ब्रह्मांड तीनों एक हो गए। एक ऑप्शन है कि ब्रह्मांड दिख ही नहीं रहा, आप और ब्रह्म एक हो गए। पहले को बोलते हैं एक्सट्रोवर्ट (extrovert) मस्टिसिज्म (mysticism)। दूसरे को बोलते हैं इंट्रोवर्ट (introvert) मस्टिसिज्म। यह अनुभव बहुत लोगों को होता रहा है। धर्म को मानने वालों को भी और भगवान को मानने वालों को भी, नहीं मानने वालों को भी। इस एक्सपीरियंस को लेकर कोई डाउट नहीं है। इस एक्सपीरियंस को विज्ञान मानता है। विलियम जेम्स (William James) का जिक्र मैंने किया। उन्होंने किताब लिखी 'वैरायटीज ऑफ रिलीजियस एक्सपीरियंसेस' (The Varieties of Religious Experience) 1908 में। 10 में उनकी मृत्यु, उसके दो साल पहले उन्होंने लिखी। और वो साइकोलॉजिस्ट (psychologist) थे। अमेरिकन साइकोलॉजी के फादर माने जाते हैं। उन्होंने इस पर लिखा है। सिगमंड फ्रायड (Sigmund Freud) तो वैज्ञानिक ही हैं। उन्होंने भी इस पर लिखा है। उसको ओशनिक फीलिंग (oceanic feeling) कह के उसको डिस्क्राइब किया है। कार्ल जंग (Carl Jung) मनोविज्ञान के बहुत बड़े विद्वान हुए। उन्होंने भी इसमें लिखा है। और जो बाकी लोग हैं जैसे अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow) का जिक्र आपने सुना होगा। उन्होंने भी इस पर लिखा है। तो बहुत वैज्ञानिकों ने इस पर लिखा है कि हां, यह अनुभव होता है। हेनरी बर्गसन (Henri Bergson) ने इस पर बहुत लिखा है। भारत में कबीर दास ने इस पर इतना लिखा है कि मतलब किताब कम पड़ जाएगी उनके दोहे लिखने के लिए जो इसी अनुभव पर लिखे हैं। रहीम ने लिखा है। गुरु नानक ने इसकी बात की है। शंकराचार्य (Shankaracharya) तो करते ही करते हैं इसकी बात। तो भारत में बहुत कॉमन एक्सपीरियंस है। पश्चिम में प्लोटिनस (Plotinus) एक नया मतलब नियोप्लेटोनिज्म (Neoplatonism) कहते हैं। उसने इसकी बात की है। तो दुनिया भर में इसकी बात है।

तो बेसिक बात स्पिरिचुअलिटी या स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस क्या है? एक ऐसा एहसास कि मैं और परम तत्व एक हैं। उस समय ना समय का एहसास रहता है, ना स्पेस का रहता है। टाइमलेसनेस (timelessness), स्पेसलेसनेस (spacelessness)। ऐसा एहसास कि उसका वर्णन हो ही नहीं सकता भाषा में। इनडिस्क्राइबेबिलिटी (indescribability) बोलते हैं। ऐसी ऐसा एहसास कि आप पूरी कोशिश करके भी खुद को हिला नहीं सकते। कभी-कभी आपने स्लीप पैरालिसिस (sleep paralysis) फील किया होगा कि आप नींद में हैं और पूरी कोशिश करके भी हाथ-पैर नहीं हिला पा रहे। कुछ-कुछ वैसा जागी अवस्था में भी होने लगता है। उसको बोलते हैं कि रहस्यात्मक अनुभव हो गया है आपको। और इतनी अच्छी फीलिंग है कि उसके बाद आपको लगता है कि आपका जीवन बदल गया है। यह दुनिया के सारे धर्मों में माना गया है कि ऐसा होता है।

साइंस क्या बोलती है? न्यूरोसाइंस ने क्या किया कि जो जो लोग ऐसा करते हैं, कई लोग तो ऐसा कुछ को तो अचानक हो जाता है। कुछ तो क्या करते हैं? ध्यान में बैठे और हो गया। हैबिचुअल (habitual) हैं वो तो उसके लिए अभ्यस्त हैं। तो न्यूरोसाइंस ने क्या किया कि जिन लोगों को यह एक्सपीरियंस बार-बार होता है उनके दिमाग पर लगा दिए इलेक्ट्रोड्स (electrodes), ईईजी (EEG) कर और उनका फंक्शनल एमआरआई (fMRI) कर लिया। उनके पास तो वही तरीका है कि उस समय दिमाग में क्या हो रहा है, स्टडी कर लें। और स्टडी किया तो जो निष्कर्ष निकला वह यह है कि हमारे दिमाग में एक हिस्सा है, पेरिएटल लोब (parietal lobe) कहते हैं। उसको मैंने जिक्र किया था पहले भी। अच्छा, इसको समझने के लिए एक वाक्य पीछे जाते हैं। जब आप जब बच्चा पैदा होता है, अगर आप ध्यान से देखेंगे, शुरू के कुछ महीने, जनरली मेरे ख्याल से चार से छह महीने तक का टाइम होता है, तब तक उसको यह नहीं पता होता कि वो कुछ है। सेल्फ (self) का कॉन्सेप्ट (concept) नहीं होता उसके अंदर। वह अपनी मां से और संसार से खुद को अलग समझता ही नहीं है। उसको सब पता है। उसको यह नहीं पता कि मैं भी हूं। और इसकी पहचान करने का एक सरल तरीका मैंने खुद टेस्ट करके देखा है। बहुत छोटे बच्चों को गोद में लेके, 2 महीने के बच्चे को गोद में रखिए, संभाल के, गिर न जाए। है ना? शीशे के सामने ले जाइए। आप कितनी भी कोशिश करेंगे, वह खुद को नहीं देखेगा। वह सिर्फ आपको देखेगा। उसको यह कॉन्सेप्ट है ही नहीं कि मैं भी हूं। जब तक ऐसा होगा, चार-छह महीने, जो भी टाइम होता है, तब तक उसमें सेल्फ की धारणा है ही नहीं। सेल्फ कॉन्सेप्ट बनने के बाद वो समझते हैं कि अच्छा, मैं अलग हूं, मेरी मां अलग है, संसार अलग है।

सिगमंड फ्रायड ने कहा कि आध्यात्मिक अनुभव उस समय की स्मृतियां हैं जब बच्चे में सेल्फ की धारणा थी ही नहीं। तो बच्चे के अनकॉन्शियस माइंड (unconscious mind) की वह मेमोरी उसे याद आ रही है और अनकॉन्शियस माइंड की मेमोरी जब याद आती है, इस रूप में याद नहीं आती है कि मेमोरी है। वह ड्रीम (dream) के रूप में आती है, फैंटेसी (fantasy) के रूप में आती है। तो है तो वही मेमोरी जब उसको यह पता ही नहीं था कि वह मां से अलग है। उसको लगता है सब एक ही है। वह मेमोरी ड्रीम में आ गई और हमें लग रहा है कि यह ईश्वर से मिल गए हैं।

उससे किसी ने पूछा कि जब यह फीलिंग होती है स्लीप पैरालिसिस की, हम हिल नहीं पा रहे, वह क्यों होता है? बोले, वो थोड़ा और पीछे चले जाओ। जब यही बच्चा गर्भ के अंदर था, वॉर्म (womb) में था। जब बच्चा गर्भ में होता है, गर्भ में लिक्विड (liquid) होता है, एमनियोटिक फ्लूइड (amniotic fluid) होता है, उसके अंदर वह तैरता रहता है। कभी-कभी फंस जाता है। ऐसा फंसता है कि ना उसका हाथ हिल रहा है, ना पैर हिल रहा है। दिमाग बन चुका है। उसकी मेमोरीज (memories) रिकॉर्ड हो रही हैं। बोल नहीं सकता, कुछ नहीं कर सकता है। बाद में पैदा हो गया, सब ठीक है। पर वो अनकॉन्शियस माइंड में मेमोरी गर्भावस्था के समय की है कि मैं ऐसा फंसा हूं कि हिल नहीं पा रहा हूं। और सिगमंड फ्रायड यह कह रहे हैं कि जब आपको यह एहसास हो स्लीप पैरालिसिस वाला, दरअसल भ्रूण की अवस्था, एम्ब्रियो (embryo) की अवस्था में जो आपका एक्सपीरियंस था उसकी मेमोरी जो अनकॉन्शियस माइंड में है, वह ड्रीम के रूप में बाहर रिफ्लेक्ट हो रही है आपके। लेकिन सिगमंड फ्रायड के समय ईईजी वगैरह प्रयोग नहीं हो रहे थे। सिगमंड फ्रायड तो लॉजिकली एक्सप्लेन (logically explain) करने का प्रयास कर रहे थे।

अब ईईजी से क्या साबित हुआ? हमारे दिमाग में एक लोब (lobe) है, जिस बहुत सारे लोब्स होते हैं, जैसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (prefrontal cortex) यहां होता है, तो एक लोब है उसका नाम है पेरिएटल लोब। यह लोब बचपन में जब सक्रिय होने लगता है तब बच्चा समझने लगता है कि मैं अपनी मां से अलग हूं, मैं संसार से अलग हूं। सेल्फ का कॉन्सेप्ट आता है। और जब-जब किसी को मिस्टिकल एक्सपीरियंस (mystical experience) हुआ, स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस हुआ, स्टडी की गई तो पाया गया कि उस समय उस एक्सपीरियंस के समय वह लोब पैसिव (passive) हो गया था। उस लोब के पैसिव होने से यह एहसास होने लगा कि मैं और संसार एक ही है। वह एक्सपीरियंस बहुत अच्छा होता है। वह एक्सपीरियंस जीवन बदलता है। बहुत पॉजिटिव एक्सपीरियंस होता है। अच्छा होता है। लेकिन उसके आधार पर यह कोशिश करना साबित करने की कि ब्रह्म है, ब्रह्मांड है, मैं उससे एक हो गया हूं, यह बहुत वास्तविक बात नहीं है क्योंकि मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस उससे बेहतर निष्कर्ष निकाल पाई है इस मामले में।

मतलब, अभी तक हमें तो लगता था कि यूं ही लिख दिया गया है। उसके पीछे एक अनुभव भी था।

>> नहीं, एक्सपीरियंस होता है। अगर आप कबीर दास को पढ़ेंगे या रहीम को पढ़ेंगे। कबीर दास ने तो इंट्रोवर्ट, एक्सट्रोवर्ट दोनों पर लिखा। इंट्रोवर्ट का मतलब है कि सिर्फ मैं और खुदा है या ब्रह्म है। संसार खत्म हो गया। 'मोह को कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में। ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे के रास में।' यह एक प्रसिद्ध उदाहरण है। कभी-कभी उनको फील हुआ कि ब्रह्मांड भी एक ही हो गया है। तो 'लाली मेरे लाल की, जिद देखूं तित लाल। लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गई लाल।' किसने उनसे पूछा कि आप और ईश्वर एक हैं या दो हैं? वो बड़े परेशान हैं। इसी पर कई छंद लिख के गए हैं। कह रहे हैं कि 'एक एक कहूं तो जग में लाजे, दो कहूं तो झूठा लौ।' अगर मैं कहता हूं कि एक ही हैं ईश्वर और मैं, तो यह सारा जगत बेकार हो गया, मीनिंगलेस (meaningless) हो गया। अगर कहूं दो हैं, तो मैं झूठा हो गया, यानी मैं ईश्वर से अलग हूं। 'बाहर भीतर सकल निरंतर, गुरु प्रताप दीठा लो।' कि मुझे एहसास होता है कि बाहर भीतर यह सब ब्रह्मांड एक ही है और गुरु की शिक्षा से मुझे एहसास होना शुरू हुआ है।

तो इन लोगों ने बहुत लिखा है। कबीर ने, रहीम ने, गुरु नानक ने, इन सबको यह एहसास हुआ है। आधुनिक काल में देखना हो तो जो दो सबसे बड़े अध्यात्मवादी लोग भारत में हुए, एक महर्षि रमण (Ramana Maharshi) हुए हैं, दक्षिण भारत में। एक रामकृष्ण परमहंस (Ramakrishna Paramahamsa) जो विवेकानंद जी के गुरु थे। महर्षि रमण की जीवनी की भूमिका कार्ल जंग ने लिखी है। वह कार्ल जंग जो सिगमंड फ्रायड के साथ टकरा गया था इसी मामले में कि ईश्वर है या नहीं। और उसने मनोवैज्ञानिक होकर यह साबित तो क्या किया? यह व्याख्या की कि ईश्वर एक्सटर्नल फैक्ट (external fact) हो ना हो, साइकोलॉजिकल फैक्ट (psychological fact) जरूर है। मतलब मन के अंदर एक फैक्ट है। मन के बाहर एग्जिस्ट (exist) करे या ना करे, मुझे मतलब नहीं है।

>> सर, मेरा सवाल आपसे यह है कि जैसे पूजा, नमाज, उपवास, मंत्रों का उच्चारण या रोजा, इन सब इन सभी तरीकों की जो चीजें होती हैं, यह सच में हैं या मतलब इनसे इनका विज्ञान से कुछ लेना-देना है या नहीं? अगर आप पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, नमाज करते हैं...

हैं तो आपका मन बहुत खुश रहता है। जैसे आपने प्रार्थना की कि हे भगवान मेरा प्रीलिम्स करवा देना तो भगवान प्रीलिम्स नहीं करवाएंगे आपका। ठीक? भगवान को बहुत फुर्सत नहीं है। क्योंकि भगवान न्यायप्रिय भी है ना। आपके प्रीलिम्स करवाने के चक्कर में किसी एक को बाहर निकालना पड़ेगा। इनजस्टिस हो जाएगा। तो भगवान बिल्कुल नहीं करने वाले ऐसा। क्योंकि वह दयालु होने के साथ न्यायप्रिय भी हैं। तो अगर आप भगवान से कुछ मांग रहे हैं और आपको लगता है कि मिल जाएगा तो मेरे ख्याल से वह तो नहीं मिलेगा। पर आपने भगवान से मांगा है और आपको भरोसा है कि मिल जाएगा। इस भरोसे में आपका कॉन्फिडेंस बढ़ गया। उस कॉन्फिडेंस से आपने प्रीलिम्स से चार प्रश्न एक्स्ट्रा ठीक कर दिए और प्रीलिम्स हो गया और आप जीवन भर मानते रहे कि भगवान जी ने करवाया था। यह हो सकता है। तो प्रार्थना करने से कॉन्फिडेंस बढ़ता है। सही बात है। सुकून आता है।

भजन वगैरह सुनने से बड़ी शांति मिलती है। मैं खुद रोज सुबह भजन सुनता हूं। कम से कम आधा घंटा। बड़ी शांति मिलती है। मेरा उस चीज में रुचि है ही नहीं कि मुझे मांगना है कुछ। मेरी रुचि इस चीज में है कि जब आप ईश्वर की प्रार्थना में बैठते हैं तो आपको अपना छोटा होने का एहसास मन में आता है। विनम्रता आती है। इंसान औकात में रहता है अपनी। और कोई हमसे बड़ा है, विराट है, यह भरोसा रहता है। और आवाज इतनी सुकून वाली होती है, भजन में, धुन इतनी धीमी होती है कि मन शांत हो जाता है। ये सब बेनिफिट्स हैं। साइकोलॉजिकल बेनिफिट तो है ही। फिर वही यह है कि जब लोग नमाज में बैठे, प्रार्थना में बैठे उनका भी ईईजी हो चुका है और उसमें साबित हुआ है कि जब वो उस अवस्था में बैठते हैं तो उनके ब्रेन में अच्छे हार्मोंस या न्यूरोट ट्रांसमिटर्स सेरोटोनिन ज्यादा रिलीज होता है। और सेरोटोनिन रिलीज होने का बेसिक मतलब है कि आप थोड़ा शांत रहते हैं या ऑक्साइटोसिन थोड़ा रिलीज हुआ कि ईश्वर आपसे प्रेम करते हैं तो प्रेम का एक एहसास भक्ति का एहसास आपके मन में आता है। यह साबित होता है कि पूजा करने से अगर आप आस्था वाले व्यक्ति हैं आप पूजा पाठ करेंगे तो आपका मन बहुत खुश रहेगा। यह साबित होता है।

आप अगर उपवास करते हैं, रोजा रखते हैं, व्रत करते हैं तो यह साबित हुआ है कि आपका पाचन तंत्र बेहतर होता है। इसलिए आजकल सारे डॉक्टर्स इंटरमिटेंट फास्टिंग, तीन दिन की फास्टिंग, जापान के एक वैज्ञानिक को 72 घंटे की फास्टिंग का कांसेप्ट देने पर नोबेल प्राइज मिला है। और भारत में नवरात्रि होते ही हैं। इस्लाम में रोज़ होते ही हैं। तो ये तो रिलीजियस प्रैक्टिस में पहले भी था। और इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई रोजे रखता है, कोई व्रत रखता है तो निश्चित रूप से उसको दहिक फायदा होगा। इसके लिए क्या शब्द उन्होंने दिया था जापान के वैज्ञानिक ने कि मैं शब्द भूल रहा हूं। 72 घंटे होते आपकी बॉडी खुद को री जनरेट करने लगती है। तो जब वो रीजनरेशन होना शुरू होता है। वो 72 घंटे की फास्टिंग से ही होता है। यह साइंटिफिकली साबित किया है। तो यदि आप पूजा पाठ करते हैं आपका मन ज्यादा खुश रहेगा। खुद पर भरोसा ज्यादा रहेगा। एकदम साइंटिफिकली प्रूवन बात है। यह उपवास करते हैं, व्रत करते हैं तो आप बेहतर स्वास्थ्य वाले होंगे। एकदम प्रूवन बात है। इसमें कोई झूठ नहीं है। लेकिन आपने उपवास किया इसलिए भगवान जी आपको कुछ विशेष देंगे। ऐसा नहीं होगा। आपको लगेगा कि स्वास्थ्य भगवान जी ने दिया है। पर वो आया है भूखा रहने से। आपने कुछ मांगा भगवान जी इनजस्टिस करके आपको देंगे नहीं। पर कॉन्फिडेंस बढ़ने से हो जाएगा और हो जाएगा तो आपका विश्वास और गहरा हो जाएगा। यह बात प्रूवन है।

सर अभी ईश्वर पे बात हो गई, अंधविश्वास पे, आस्था पे, पूजा पाठ पे बात हो गई। इसी से एक बेसिक सवाल यह भी बनता है कि एग्जैक्टली धर्म क्या है? क्या सभी धर्मों के लिए एक है या कोई एक परिभाषा इसकी हम रख सकते हैं? धर्म की 10,000 परिभाषाएं दी जा चुकी हैं। कोई भी एक फाइनल हो नहीं पाई है। लेकिन मोटे तौर पर धर्म का मतलब एक पैकेज है जिसमें तीन चार चीजें हो। एक कॉग्निटिव हिस्सा है। संज्ञानात्मक हिस्सा जिसमें धर्म बताता है कि दुनिया कैसे बनी, आत्मा है या नहीं, परमात्मा है या नहीं? मरने के बाद क्या होगा? यह सब चीजें जिसको हम मेटाफिजिक्स या ऑटोलॉजी भी कहते हैं। धर्म का एक हिस्सा है इमोशनल। जो भक्ति की भावना आप ना डरे सिक्योरिटी आपको मिले भगवान ध्यान रखेंगे चिंता मत करो पूजा पाठ किया लघुता का एहसास हुआ मेरे पीछे भगवान खड़े हैं ये एहसास हुआ ये इमोशंस वाला हिस्सा है बड़ा जरूरी हिस्सा होता है तीसरा हिस्सा है रिचुअल्स वाला कर्मकांड वाला कि पूजा करनी है तो पूजा में दाएं हाथ से ही अग्नि जलानी है कि बाएं से जलानी है कि पहले यह करना है या पहले वह करना है स्नान स्नान करके करना है या इसके बाद स्नान करना है। ये सब जो नियम बने हुए हैं कर्मकांड जिसको बोलते हैं हर धर्म में एक हिस्सा ये होता है। चौथा सोशल आस्पेक्ट है। हर धर्म कोशिश करता है कि उसको मानने वालों में सामाजिक संगति, सामाजिक मेल मिलाप होता रहे। इसलिए हर धर्म ऐसे कई क्या कहेंगे? फेस्टिवल्स वगैरह होते हैं जिसमें लोग मिलते रहे। आपस में कलेक्टिविटी बनी रहे। एक मोरल आस्पेक्ट है। हर धर्म अपने मानने वालों को बताता है क्या अनैतिक है, क्या अनैतिक है। तो जो व्यवस्था इन चार पांच चीजों को करती है एक समाज के लिए उसको धर्म कहते हैं। और विज्ञान या कोई भी चीज धर्म का स्थान नहीं ले पा रही है। उसकी वजह यह है कि वो इनमें से एक अर्थ को सॉल्व कर लेते हैं। पूरा पैकेज कोई नहीं दे पाता। जैसे विज्ञान आपको यह शायद ज्यादा अच्छा बता देगा कि अंतिम सत्य क्या है। पर इमोशन नहीं दे पाएगा। रिचुअल्स नहीं दे पाएगा। वो कलेक्टिविटी पैदा नहीं कर पाएगा। इसलिए विज्ञान धर्म को खत्म कर देगा। ये बहुत आसान बात नहीं है। मेरे ख्याल से अभी कम से कम 2 400 5000 साल तक भी ऐसा होता हुआ नजर नहीं आ रहा क्योंकि पूरा पैकेज को रिप्लेस तभी कर पाएंगे जब पूरा पैकेज उतना बड़ा आएगा और विज्ञान वैसा पैकेज है नहीं वो केवल उसके कॉग्निटिव एस्पेक्ट को चैलेंज करता है बाकी एस्पेक्ट को चैलेंज नहीं कर पाता।

>> सर इन सभी चर्चाओं के बीच मुझे एक बात की बहुत ज्यादा चिंता होती है।

>> अच्छा।

>> जी तो चिंता सर मेरी ये है।

>> ये तो नहीं कि देर हो गई है जाना है घर।

>> नहीं नहीं नहीं सर ऐसी चिंता नहीं है चिंता ये है कि सर हमने ना ऐसी मान्यताएं सुनी है कि हमारे देश में जहां कहीं पर भी कुंभ होता है वहां कभी ना कभी अमृत की बूंदे गिरी थी और इसी प्रकार से हमारा जो समय है वो चार भागों में बटा हुआ है कलयुग सतयुग करके तो इन।

>> अभी कौन सा चल रहा है आजकल।

>> अभी कलयुग चल रहा है सर।

>> तो कलयुग में आप पैदा हुए या आपके पैदा होने से कलयुग शुरू हुआ।

>> नहीं सर कलयुग में हम पैदा हुए हैं।

>> अच्छा मतलब पहले से चल रहा है ना।

>> हां पहले से चल रहा है तो सर इन सभी बातों को अंधविश्वास मान लेना क्या हमारे कल्चर के साथ इनजस्टिस नहीं होगा।

>> अंधविश्वास नहीं मानना चाहिए। इन देखो एक चीज होती है सामाजिक मान्यताएं। लोक विश्वास कई लोक विश्वास ऐसे हैं जिनको अंधविश्वास कहने या नहीं कहने की जरूरत नहीं है। इसको माइथोलॉजी भी कहते हैं। माइथोलॉजी शब्द को लेके भारत में कई लोग बहुत नाराज हैं। मिथक सुन के। उनको मिथक से लगता है कि मिथ्या बात हो रही है। मिथ्या नहीं। मिथक का मतलब है ऐसी मान्यताएं जिनको हम साबित नहीं कर सकते पर समाज विश्वास रखता है और जब तक उस विश्वास से कोई नुकसान नहीं हो रहा तो उसमें परेशानी क्या है मान लीजिए मैं आपको एग्जांपल देके समझाता हूं एक विचारधारा है अस्तित्ववाद एकिस्टेंशियलिज्म आमतौर पर ईश्वर को खारिज करते हैं पर कुछ अस्तित्ववादी ईश्वर को मानते भी हैं। उनमें से एक व्यक्ति थे पॉलटेलिक नाम के पॉल टेलच या पोल टेलिक या पॉलटेलिक टी आई डबल एल आई सी एच है सर ने उनका उन्होंने इसकी बड़ी अच्छी व्याख्या की थी उन्होंने कहा कि देखो जैसे पटना में गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ यह बात इतिहास से भी पुष्ट है और सिख धर्म के लोग मानते भी हैं। जहां जन्म हुआ वो स्थान पवित्र माना जाता है। वह लोग जाते हैं वहां और सम्मान करते हैं। उनको वहां जाके एक खास एहसास होता है पवित्रता का कि यह स्थान बहुत पवित्र है। क्योंकि हमारे आखिरी गुरु का जन्म यहां हुआ था। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। अब क्योंकि सिख धर्म के गुरु हाल की बात है। बहुत पुराना समय नहीं हुआ है। तो रिकॉर्डेड हिस्ट्री में वो चीजें मिलती हैं। थोड़ा पीछे जाएंगे तो रिकॉर्डेड हिस्ट्री में वो चीजें नहीं मिलेंगी। जैसे जीसस क्राइस्ट उस इलाके में थे जो आजकल जेरूसलम कहलाता है। उनका जन्म भी लगभग वहीं से थोड़ा दूर हुआ। बेथलहेम एक जगह है वहां। वहीं उनको क्रूसिफाई किया गया। सब लोग मानते हैं। टूटे फूटे एविडेंसेस भी मिल जाते हैं। पर उन लोगों को यह भरोसा है कि यहां ऐसा हुआ था। और भरोसा होने मात्र से वहां लाखों करोड़ों लोग हर साल जाते हैं। उन सबको पवित्रता का एहसास होता है। और यदि उनको पवित्रता का एहसास हो रहा है तो उसमें नुकसान क्या है? नुकसान वहां है जहां कोई दिक्कत हो रही हो। ऐसे ही भारत में है। हर धर्म में है। हर धर्म के लोगों ने कुछ घटनाओं की मान्यता रखी हुई है। तो अगर हिंदू धर्म के लोग मानते हैं कि अमृत की बूंदे गिरी थी। कुछ स्थानों पर वहां कुंभ मनाते हैं। इससे किसी को नुकसान नहीं हो रहा। इसी बहाने बहुत सारे लोग इकट्ठे हो रहे हैं। जुड़ रहे हैं। एक समाज के रूप में कनेक्ट हो रहे हैं। और यह ध्यान रखना है अगर आप हरारी साहब की किताब पढ़ें सेपियंस उसमें बड़ी गहरी बात है। ह्यूमन बीइंग्स को छोड़ के कोई भी स्पीशीज में 150 से ज्यादा का समूह आज तक नहीं बन पाया है। चिड़िया हो, बैल हो, कोई भी हो। कोई स्पीशीज देख लीजिए जंगल में हिरणों का झुंड है, हाथियों का झुंड है। 150 से बड़ा नहीं मिलेगा। किसी भी स्पीशीज की मेमोरी 150 के ऊपर नहीं जाती है। ह्यूमन बीइंग में राष्ट्र की धारणा भारत राष्ट्र में 150 करोड़ लोग रहते हैं। सब खुद को भारतीय कहते हैं। बाकी स्पीशीज 150 के ऊपर नहीं जा पा रही हैं। ह्यूमन बीइंग्स 150 करोड़ पे चले गए। क्यों चले गए हैं? इसकी अकेली वजह है कि मनुष्य को कहानियां बनाना और कहानियों में विश्वास करना आता है। इसलिए जो कहानियां मनुष्यों ने बनाई और जिनसे लोग कनेक्ट हुए हरारी साहब के हिसाब से धर्म एक कहानी है। एक कहानी जिसमें बहुत लोग विश्वास रखते हैं वो सब उस धर्म को मानते हैं। राष्ट्र भी एक कहानी है। उस कहानी में इतने लोग विश्वास रखते हैं वो एक राष्ट्र हो गए। यह सब कहानी है। सरकार भी एक कहानी है। मुद्रा भी एक कहानी है। इकॉनमी भी एक कहानी है। क्योंकि यह टेंजिबल चीजें नहीं है। हमें इन पर विश्वास करना पड़ता है। हमें विश्वास करना पड़ता है कि जो करेंसी है उसके बदले सामान मिलेगा। नहीं भी मिल सकता है। डीमोननेटाइज कर देंगे। नहीं मिलेगा उसके बाद से। हम विश्वास करते हैं कि मिलेगा। मिल रहा है। होमोसेपियंस इसलिए सेपियंस बन पाया क्योंकि वह कहानियां गढ़ पाता है। कहानियों में विश्वास कर पाता है। इसीलिए सभ्यता यहां तक पहुंची है। इसलिए मेरा ख्याल है कि उन सब लोक विश्वासों का सम्मान करना चाहिए जो हमें नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। और उतनी मात्रा में अमेंडमेंट्स करते रहना चाहिए जितनी मात्रा में वह नुकसान पहुंचाते हैं ह्यूमन सोसाइटी को।

सर मैं आपसे थोड़ी बात लक के ऊपर करना चाहती हूं क्योंकि कई बार हम ऐसा सुनते हैं कि अगर किसी इंसान ने अपनी लाइफ में कुछ बढ़िया अचीव कर लिया तो मतलब उसका लक अच्छा होगा और साथ-साथ अगर उसको डिजायर्ड रिजल्ट्स नहीं मिल पाए तो मतलब उसका लक खराब होगा। तो सब कुछ अगर लक पे ही डिपेंड करता है तो फिर क्या फायदा है इतनी मेहनत करने का या फिर पढ़ने का या समझदारी के पीछे भागने का? हम सब कुछ क्या लक पे ही नहीं छोड़ सकते? इसका उत्तर देने के दो पर्सपेक्टिव्स हो सकते हैं। मैं अपना स्टैंड अगर आपको बताऊं हमने शायद पिछले डिस्कशन में नियतिवाद का जिक्र किया था और फ्री विल का जिक्र किया था। एक लेवल पर यह सोचा जा सकता है कि हम सब वही करते हैं जो हमसे करवाया जा रहा है। वीडियो गेम यह है जिसमें हम हैं और कोई पीछे से खेल रहा है। हम वीडियो गेम के कैरेक्टर हैं। ऐसा सोचा जा सकता है और लॉजिकली आप इसको रिफ्यूट नहीं कर पाएंगे। कितने भी तर्क लगा लेंगे रिफ्यूट नहीं कर पाएंगे। कि एक लॉजिकल पॉसिबिलिटी इस बात की है। और मैं भी मानता हूं कि लॉजिकली यह पॉसिबल है कि हम सब वीडियो गेम के कररेक्टर से कठपुतलियां हैं। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं। लेकिन अगर यह वीडियो गेम है भी तो भी जिसने डिजाइन की है बड़ी अच्छी डिजाइन की है। हमें लगता यह है कि हम खुद काम कर रहे हैं। कम से कम फील तो होता है। अगर ये फील भी हो रहा है कंपैटिबिलिज्म इसको बोलते हैं कि बेशक कोई तारे हिला रहा हो लेकिन हमें फील हो रहा है कि हम ये कर रहे हैं। तो अगर आप दुनिया को ध्यान से देखेंगे तो यह बात ठीक है कि सब कुछ हमारे करने से नहीं होता। बहुत सारी चीजें हमारे जीवन में ऐसी होती हैं जो बाय चांस होती हैं। हमारे कंट्रोल में नहीं होती हैं। पर बहुत सारी ऐसी चीजें भी होती हैं जो हमारे कंट्रोल में होती हैं। तो जो कंट्रोल में नहीं है अगर पूरा फोकस उस पे करेंगे तो हम कहेंगे दुनिया ऑब्जर्व है। केवल लक है, केवल डेस्टिनी है, नियति है। पर जिन चीजों पर हमारा बस चलता है, उस पे फोकस करेंगे तो हम सोचेंगे कि हम जो चाहते हैं वही होता है। तो मेरा ख्याल है कि हम सबके जीवन का जो हिस्सा हमारे चाहने से मैनेज होता है उस पर ध्यान देना चाहिए। उस पर मेहनत करनी चाहिए। और यह क्लियरली विज़िबल है कि जिन लोगों ने उस हिस्से पर ध्यान दिया है और मेहनत की है उन्होंने अपने जीवन को बेहतर बनाया है। तो अगर लक है भी तो उसकी भूमिका सीमित है। एब्सोल्यूट नहीं है। कुछ ना कुछ हिस्सा ऐसा हम मान सकते हैं जो हमारे हाथ में है और हमें उस मेहनत करनी चाहिए।

ठीक है सर अभी इंडियन फिलॉसफी पर बात हो रही थी तो वहां पर मैं देखता हूं कि ज्यादातर बातें ऐसी दिखाई देती हैं कि मैं कौन हूं यह संसार क्या है या मोक्ष कैसे मिलेगा वहां पे क्या कोई साइंटिफिक टेंरामेंट दिखता है। देखो दर्शन में जो व्यक्ति है वो तार्किक तो है ही वरना दार्शनिक हो नहीं सकता ध्यान रखना है अंतिम सत्ता से जुड़ने के तीन तरीके माने जाते हैं या चार मान लीजिए एक आदमी कहता है कि मैं जान के रहूंगा कि तुम कौन हो और मैं उसके लिए एक्सपेरिमेंट्स करूंगा, रिसर्च करूंगा। यह वैज्ञानिक है। एक कहता है कि मैं जान के रहूंगा तुम कौन हो। मैं उसके लिए तर्क का इस्तेमाल करूंगा। लॉजिक का इस्तेमाल करूंगा। यह फिलॉसफर है। तीसरा कहता है कि मैं जानू मानू कुछ नहीं। मुझे बस मुझे आपके साथ रिलेशनशिप एस्टेब्लिश करनी है। यह भक्त आदमी है। धार्मिक व्यक्ति है। इसको बहुत क्यूरोसिटी नहीं है। एक मोटा-मोटा आंसर मिल जाए। इसको रिलेशनशिप में ज्यादा आनंद है। इसको जानने में उतना आनंद नहीं आता है। चौथा कह रहा है कि मैं तुम्हें कंट्रोल करना चाहता हूं। यह जादूगर है। जादूगर आदमी। जादू इस कोशिश में पैदा होता है कि मैं कंट्रोल कर लूं। धर्म इस इच्छा से पैदा होता है कि मैं उसको अपने पक्ष में कर लूं, मना लूं, प्रभावित कर लूं, पूजा करूं, प्रार्थना करूं ताकि वह मुझसे नाराज ना हो। वैज्ञानिक रिसर्च कर करके जानना चाहता है और दार्शनिक लॉजिक अप्लाई करके जानना चाहता है। तो दर्शन का व्यक्ति वैज्ञानिक के बहुत नजदीक है। जिज्ञासा है, जानना चाहता है। बस वो एक्सपेरिमेंटेशन के बजाय लॉजिकल कंसिस्टेंसी के माध्यम से जानने का प्रयास कर रहा है। तो हर दार्शनिक में साइंटिफिक टेंपरामेंट का एक हिस्सा तो होता ही है। कुछ में ज्यादा होता है। यह चार वाकों के बारे में कहते हैं कि उन्होंने कहा कि हम केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानेंगे बाकी कुछ नहीं मानेंगे। इसलिए बोले कि यह लोक के परे हम कुछ नहीं मानेंगे। ना भगवान ना आत्मा ना परमात्मा ना स्वर्ग ना नरक ना मोक्ष ना कुछ और लोगों ने कहा कि बहुत वैज्ञानिक है। पर वो भी एक लिमिट में ही वैज्ञानिक है क्योंकि वो चार महाभूत मानते थे। आज हम केमिस्ट्री में फिजिक्स में जानते हैं कि 120 एलिमेंट्स हैं। गलत साबित हुए। वो अनुमान को खारिज करते जबकि आज का विज्ञान जो परसेप्शनंस हैं उन पे भी अनुमान इनफेंस तो अप्लाई करना ही पड़ता है। तो पूरे वैज्ञानिक तो वो भी नहीं थे। लेकिन हां एक तरह की वैज्ञानिकता उनके अंदर थी। बुद्ध में है। बुद्ध ने साफ कहा कि इस पृथ्वी के बाहर के प्रश्नों को हम अव्याकृत मानते ही नहीं। यानी उसको हम व्याकरण की लैंग्वेज में नहीं डिस्कस करेंगे। प्रतीति समुत्पाध्य जिसका मतलब है कि इस दुनिया की हर चीज के कारण इस दुनिया में ही देखा जा सकता है। देखा इस दुनिया में उन्होंने कहा कि ना भगवान है ना आत्मा है खारिज कर दिया इसी दुनिया से व्याख्या कर दी हां निर्वाण में थोड़ा सा वो परेशान होते हैं क्योंकि निर्वाण जिसको मिलता है वो स्थाई है स्थाई है और पारलौकिक है तो कुछ तो मानना पड़ेगा आत्मा को आप मानते नहीं है पर पुनर्जन्म मानते हैं निर्वाण मानते हैं कंट्राडिकशंस आने लगती हैं तो व्याख्या की है उन्होंने लेकिन उस पे ऑब्जेक्शंस भी हैं। जैन फिलॉसफी में स्यादवाद अनेकांतवाद साइंस के नजदीक है। न्याय दर्शन ने परमाणुवाद का विचार दिया एटोमिज्म का। एक तरह से पहली बार इतिहास में ऐसा विचार आया कि दुनिया परमाणुओं से बनी है। हालांकि उन परमाणुओं में जो मूवमेंट है वो भगवान देता है। आजकल की व्याख्या थोड़ी सी अलग है। लेकिन हां परमाणु की बात तो कही। जैनों ने भी कही परमाणु की बात। तो कई दशकों में वेदांत में थोड़ी लॉजिकल मतलब उनका लेवल चरम स्तर का है। पर एेरिकल एविडेंसेस पर वो लोग उतना भरोसा नहीं करते हैं। तो भारतीय दर्शन बहुत समृद्ध है। सांख्य दर्शन ने सबसे पहले साइकोलॉजी का एक तरह से विचार दिया है। त्रिगुण व्याख्या है। सत्वगुण, रजस गुण, तमसगुण और हर ह्यूमन बीइंग को इन गुणों के माध्यम से इनके कॉम्बिनेशन के माध्यम से डिफाइन किया। काफी हद तक वह बात मतलब प्रामाणिक लगती है। आज भी लगती है। तो ऐसा नहीं है कि भारतीय दर्शन में विज्ञान या वैज्ञानिक मनोवृत्ति नहीं है। तार्किक मनोवृत्ति है और तार्किक मनोवृत्ति कई बिंदुओं पर विज्ञान को छूती है। टच करती है।

सर जैसे मैंने कई लोगों को चमत्कार में नमस्कार करते हुए देखा है। वहीं कुछ लोग इसे जादू या ट्रिक या विज्ञान का प्रयोग कह देते हैं। तो वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं सर जो टोपी में से कबूतर निकाल देते हैं या मोबाइल का पासवर्ड बता देते हैं। तो सर यह चमत्कार है या जादू? जादू है। बैठो बैठो बैठो। देखो जादू और चमत्कार में अंतर बहुत छोटा सा है। और एक चीज कॉमन दोनों में क्या है? जो चीज आपके सामने हो रही है और वह कोजेशन या कारण कार्य नियम से अलग है। वो जादू या चमत्कार है। आपने हैट के अंदर देखा कबूतर नहीं है। उसने हाथ डाला कबूतर निकाल दिया। आप परेशान है कि यार कारण नहीं था कार्य कैसे हो गया? आपके मोबाइल फोन का पासवर्ड आपको ही पता है। मेंटलिस्ट को या जादूगर को नहीं पता है। पर उसने क्रैक कर दिया और आप परेशान है कि यार जब मैंने बताया ही नहीं कैसे निकाल लिया? मैं तो नहीं पढ़ पाता किसी का दिमाग। इसने कैसे पढ़ लिया? ऐसे बहुत सारे जादू हैं। कोई पानी के ऊपर चलता हुआ दिख रहा है। कोई हवा में उड़ता हुआ दिख रहा है। कोई हवा में बैठा हुआ दिख रहा है। लेविटेड अवस्था में बैठा हुआ है। इन सबको हम जादू कहते हैं। जादू और चमत्कार में इतना अंतर है। अगर करने वाला कहे कि यह सिर्फ हाथ की सफाई है या मेरी कलाकारी है तो यह जादू है। अगर करने वाला कहे कि भगवान का हस्तक्षेप है तो चमत्कार है। चमत्कार और जादू में इतना ही अंतर है। अगर करने वाला कहे कि मैंने किया है, अभ्यास से किया है, हाथ की सफाई से किया है। कई साल मैंने इसकी प्रैक्टिस की है। आपको चकमा दे दिया है। आपको झांसा दे दिया है। और डरो मत। सुपर नेचुरल नहीं है। केवल हाथ की सफाई है तो जादू है। जैसे जादूगर अभी तो जादू फिर से बहुत फेमस भारत में हो गया। हमारे एक मित्र सुहानी शाह इस समय बहुत बड़े जादूगर हैं। उनको भी दुनिया का बेस्ट अवार्ड मिला इटली में कुछ दिन पहले जादू का। तो अभी हम पिछले हफ्ते भी वो आई थी मिलने। हम बात कर रहे थे इस बारे में। ईमानदार वो बहुत ईमानदार लड़की है तो वह बार-बार यह बात क्लेम करती है कि मेरे पास कोई सुपर नेचुरल पावर नहीं है। मैं केवल अभ्यास कर के सीख के ये सब करती हूं और ये सब केवल जादू की ट्रिक्स।

हैं। मैंने क्योंकि वो सब सीखा हुआ है, तो मुझे पता है कि वो सब ट्रिक्स हैं। और बहुत चैलेंज करेंगे, तो मैं कभी करके दिखा भी दूंगा। लेकिन मेरी रुचि उसमें है नहीं करने में। में मेरी रुचि केवल जानने में थी कि होता कैसे, वो मुझे पता है। मेरे सामने कोई जादू करता है, तो मैं 100 में से 99 मामलों में तुरंत समझ जाता हूं जादू कैसे हो रहा है। उसमें मुझे डाउट नहीं होता।

तो पहली बात आप यह समझ ले कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो कारणता नियम के खिलाफ जा सकता है। जो भी जादू कर रहा है, जो आपका पासवर्ड निकाल रहा है, वो आपको ऐसा फील करवा रहा है कि उसने पासवर्ड आपका निकाल दिया है। दरअसल मामला कुछ और है, जो मैं बताऊंगा नहीं क्योंकि बहुत लोगों की रोजीरोटी इस पर टिकी हुई है। मैं नहीं चाहता। जादू एक सुंदर कला है। मैं क्यों राज खोलूं उनका है ना? मैं राज नहीं खोलूंगा।

लेकिन हां, कोई सुपर नेचुरल पावर नहीं है किसी के पास। वो सब खेल है। एक ऐसा खेल है कि उसका हिस्सा आप भी हो और आप समझ नहीं पाते कि कैसे निकल जाता है। और आपको लगता है कि उन्होंने आपका दिमाग पढ़ लिया। दिमाग दुनिया में कोई किसी का आज तक ना पढ़ पाया है। शायद ना पढ़ पाएगा। टेलीपैथी के एक्सपेरिमेंट्स हुए न्यूरो साइंस में। वो भी साबित नहीं हो पाए अब तक। और मेंटलिज्म टेलीपैथी का ही एक फॉर्म कुछ लोग मानते हैं। उस पर अगर बात होगी, तो मैं एक्सपेरिमेंट्स का जिक्र करूंगा कि कैसे होता है।

चमत्कार का मतलब यह होता है कि भगवान ने किया है या भगवान ने किसी व्यक्ति विशेष को स्पेशल पावर दी है कि तुम करो। भगवान के चमत्कार क्या है? मेरे ख्याल से जब तक विज्ञान किसी चीज की व्याख्या नहीं कर पाता, हम चमत्कार मानते हैं। सूर्य ग्रहण एक समय चमत्कार था। चंद्र ग्रहण एक समय चमत्कार था। ठंडे प्रदेश में गर्म पानी का चश्मा एक समय चमत्कार ही था। इंद्रधनुष भी एक समय चमत्कार था। आपको पता है कि एक समय तक सपना आना भी चमत्कार था। सपने आते थे। इसीलिए लोगों ने माना कि आत्मा होती है। जो मर गया, वो भी दिख रहा है रात को सोने पे। यानी कि वो जिंदा है। आत्मा की धारणा सपनों से पैदा हुई। ऐसा कई लोग मानते हैं। इन लोगों ने पहली बार पानी के अंदर अपनी छवि देखी। उनको लंबा समय यह समझने में लगा कि यह हम हैं। एक समय तक लोग मानते रहे कि पानी के अंदर दूसरी सभ्यता रहती है। चमत्कार लगता था। पश्चिम में एक आदमी नरसिस नाम का पागल हो गया था। पानी के अंदर खुद को देख के वो इतना सुंदर था। पानी में छवि देखी। पागल हो गया कि यह कौन है। मुग्ध होकर देखता रहा। और उस नार्सिस नाम के व्यक्ति से ही कांसेप्ट आया। नार्सिसिज्म इसलिए आया।

अधिकांश चमत्कार खत्म हो गए क्योंकि विज्ञान ने व्याख्या कर दी उसकी। अब सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण में कोई अजगर निगलता नहीं है। अब पता है कि परछाई है। चमत्कार खत्म हो गए। कुछ लोग अभी भी चमत्कार का दावा करते हैं। धर्मों में चमत्कार है। यहूदी धर्म के जो प्रवर्तक हैं हजरत मूसा, उनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने समुद्र के दो हिस्से कर दिए थे और बीच से अपनी पूरी कौम को ले गए थे। हजरत मोहम्मद है, उनको ले गई कई चमत्कार माने जाते हैं कि वह एक उनका घोड़ा था भूरा जोड़ता था हवा में। उससे यात्रा करते थे। अलग सा मस्जिद गए थे। फिर उससे स्वर्ग भी गए थे यात्रा पे। हम हिंदू धर्म में देखते हैं कि हनुमान जी हैं। समुद्र पार किया उन्होंने। तो हर धर्म में ऐसी धारणाएं आती है चमत्कार की।

वर्तमान समय में भी कुछ लोग क्लेम करते हैं कि वह ईश्वर की शक्ति से युक्त है। चमत्कार करते हैं। जहां तक मेरी बात है, मुझे चमत्कार में विश्वास नहीं है। मेरा यह मानना है कि अगर कोई भी कुछ कर रहा है, तो उसके पीछे कुछ साइंटिफिक रीज़ंस हैं। और समझने वाले समझ जाते हैं। मैं आमतौर पर समझ जाता हूं। पर इस पे ज्यादा बात नहीं करेंगे। जमाना ठीक नहीं है इस समय। बात करना खतरनाक है। लेकिन हां, अगर आप मुझसे पूछेंगे, तो मैं किसी भी चमत्कार में आस्था नहीं रखता हूं। मैं यह मान के चलता हूं कि अगर कोई ऐसा फिनोमिना है जिसकी व्याख्या नहीं हो पाई है, तो कुछ समय में हो जाएगी। अधिकांश की व्याख्या हो चुकी है। जिनकी नहीं हुई है, हो जाएगी। विज्ञान अंतिम प्रश्न का उत्तर अंत में विज्ञान ही देगा। कोई और देगा नहीं।

ठीक। सर, मेरा सवाल टेलीपैथी को लेकर ही है। हम ऐसे बहुत सारे लोगों को देखते हैं जो दावा करते हैं कि वे अपने मन की बात बिना कहे दूसरों के दिमाग में पहुंचा देते हैं। क्या यह सच में पॉसिबल है या सिर्फ हवाबाजी है?

>> हवाबाजी तो मत कहो यार। थोड़ा सम्मान के साथ तो बात करनी चाहिए। हवाबाजी थोड़ा ज्यादा खराब शब्द हो गया। आपके साथ कभी ऐसा हुआ?

>> नहीं, अभी तो ऐसा नहीं। कभी किसी ने कहा हो कि मैं तुम्हारा मन जान सकती हूं या जान सकता हूं। मतलब कुछ भी ऐसा?

>> नहीं, क्या होता है कि एक लॉजिकल फैलेसी है जिसको बोलते हैं हिस्ट्री जनरलाइजेशन हिंदी में उसके लिए शब्द है अवैध सामान्यीकरण। मैं आपको समझाता हूं ऐसा क्यों होता है। कई लोग बहुत ईमानदारी से ऐसी बात कहते हैं कि होता है इंट्यूशन होती है। को कहते हैं टेलीपैथी का। टेली मतलब दूर से, पैथी मतलब जान लेना। जैसे टेलीफोन दूर से आवाज सुन लेना, टेलीविजन दूर से देख लेना है ना? तो टेलीपैथी का मतलब है कोई व्यक्ति बहुत दूर है और आपने उसके मन के विचार या भावना या मनस्थिति को जान लिया बिना डायरेक्ट कांटेक्ट में आए। इसको टेलीपैथी कहते हैं। कुछ लोग इसको एस्टल ट्रेवलिंग भी कहते हैं। कई शब्द इसके लिए चलते हैं। तो टेलीपैथी को ले कैसे होती है? इसके जवाब में कुछ लोग इंट्यूशन कहते हैं। इंट्यूशन वही है जिसको लोग सिक्स्थ सेंस कहते हैं। छठी इंद्री कह देते हैं। है ना? हवाबाजी तो नहीं है। कैसे होता है? पहले मैं आपको समझाता हूं कैसे होता है। हाइपर इमोशनल लोगों को ऐसा होता है। बहुत इमोशनल व्यक्ति को ऐसा होता है। जैसे मान लीजिए आपकी मम्मी आपसे बहुत प्यार करती हैं। मम्मी तो करती ही हैं। बच्चे ही नहीं करते उतना। मम्मीियां तो करती ही हैं जनरली। और फिर आप मम्मी से दूर होकर दिल्ली आ गए पढ़ने के लिए, नौकरी करने के लिए। और आपने बताया कि आज मैं दोस्तों से पार्टी करने जा रहा हूं और मैं बहुत खुश हूं। यह वो सब। अगले दिन रात को 3:00 बजे मम्मी ने फोन किया कि बेटा मुझे अजीब सी घबराहट हो रही है। तुम्हें बुखार तो नहीं है? और आपको सच में बुखार था उस समय पर और आप परेशान हैं कि ये कैसे हो गया? ऐसा होता है। निजा फाजली साहब ने एक शेर इसी पे लिखा। क्या था? "मैं रोया परदेश में भीगा मां का प्यार।" शेर नहीं है सॉरी, दोहा है। शेर अलग होता है, दोहा अलग होता है। ध्यान रखना है। "मैं रोया परदेश में भीगा मां का प्यार। दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार।" टेलीपैथी है ना कि मैं परदेश में रो रहा हूं और मां मेरी वहां परेशान हो गई है। उसे कैसे पता लग गया? उनको भी ऐसा लग रहा है कि ऐसा हो गया।

अब ये कैसे होता है? मतलब एक सामान्य तरीके की आप मान लें कि मेरी मां में अति प्राकृतिक शक्तियां हैं जो जान जाती हैं। फिर साइंटिफिक टपर नहीं हो ना। साइंटिफिक टपर तो ये है कि जब तक आप डाउट नहीं करेंगे, आप एक्सपेरिमेंट्स नहीं करेंगे, नहीं मानेंगे। मैं तो नहीं मानता। ऐसे तो मैं तो कोशिश करता हूं कि पहले फैक्ट्स जानो। मनोविज्ञान ने इसका उत्तर यह दिया कि दरअसल जब हम कहते हैं कि इंट्यूशन हुआ, वो भी रीजनिंग ही थी। पर वह रीजनिंग होती है अनकॉन्शियस लेवल पर। यह थोड़ी भाषा मुश्किल है। समझने का प्रयास कीजिए। एक रीजनिंग क्या होती है? कॉन्शियस रीजनिंग होती है। जैसे किसी ने आपसे कहा कि मान लो सारी कुर्सियां कुत्ते हैं। सारे कुत्ते खरगोश हैं। तो बताओ कितने खरगोश कुर्सियां हैं? ऐसे प्रश्न आते हैं ना यूपीएससी में, स्टेट पीसीएस में भी आते हैं। इसको बोलते हैं फॉर्मल लॉजिक। तर्कशास्त्र की दुनिया में इसको आकारिक तर्कशास्त्र कहते हैं। जिसका रियलिटी से कोई मतलब नहीं है। केवल रिलेशनशिप समझनी है आपको कि इफ x इज y एंड y इज z देन z हैज़ टू बी x। सिर्फ ये देखो, ये नहीं कि कुर्सी कुत्ता कैसे हो गई? दिमाग नहीं लगाना है। रियल लाइफ से मतलब नहीं है। केवल लॉजिक से मतलब है। फॉर्मल लॉजिक कहते हैं। यहां आपको पता है कि आप रीजनिंग कर रहे हैं। क्योंकि आपको पता है कि आप रीजनिंग कर रहे हैं, इसलिए कॉन्शियस रीजनिंग है।

कभी-कभी क्या होता है कि रीजनिंग इतनी फास्ट होती है और अनकॉन्शियस माइंड के लेवल पर होती है। हमें पता नहीं है कि हम रीजनिंग कर रहे हैं। पर कर हम रीजनिंग ही रहे हैं। जो मैंने एग्जांपल दिया उस पर लौट के आते हैं। आपकी मम्मी आपको बचपन से देख रही हैं। जब आप बहुत छोटे थे, एक बार आप किसी शादी में गए थे। ठूंस के आए थे, अगले दिन बीमार पड़ गए थे। मम्मी को ये बात याद नहीं है इस समय। पर ऐसा हुआ था एक बार। फिर उसके 5 सात साल बाद स्कूल का ट्रिप गया। पिकनिक पे आप गए। वहां भी ठूस के खाया आपने। फिर बीमार पड़ गए थे। यह घटनाएं मम्मी को याद नहीं है। पर उनके अनकॉन्शियस माइंड में स्टर्ड है। और आज आपने कहा कि मम्मी मेरे दोस्तों के साथ पार्टी है मेरी। मम्मी ने कहा बहुत बढ़िया। आपने कहा मम्मी पार्टी से बड़ा मजा आया। मम्मी ने कहा वेरी गुड। मम्मी सोई और नींद में अनकॉन्शियस माइंड एक्टिव हुआ और वो दो अनकॉन्शियस मेमोरीज एक्टिव हुई और अनकॉन्शियस रीजनिंग से मम्मी को लगा कि आप बीमार हैं और वो बेचैन हो गई। उन्होंने फोन किया। आप सच में बीमार थे। आपको लग रहा है कि छठी हिंदी काम कर रही है। मनोविज्ञान के हिसाब से अनकॉन्शियस लेवल पर रीजनिंग काम कर रही है। अर्थात अनकॉन्शियस माइंड के डेटा पर अनकॉन्शियस माइंड रीजनिंग के नियमों से निष्कर्ष निकाल रहा है। पर क्योंकि अनकॉन्शियस माइंड कर रहा है। मुझे कॉन्शियसली पता नहीं है कि मैं रीजनिंग अप्लाई कर रहा हूं। पर अप्लाई हो रही है।

अगर आप इसको टेस्ट करना चाहें, तो एक काम करो रोज सुबह मम्मी से पूछो, मम्मी फोन करके, मम्मी यह बताओ कि आज मैंने कौन से रंग की कमीज पहनी है? आप 100 बार पूछेंगे, कम से कम 90 बार गलत बताएंगे मम्मी। क्योंकि इंट्यूशन नहीं है। क्योंकि आप कौन सी कमीज पहनेंगे उसका लॉजिक उनके अनकॉन्शियस में स्टोर हुआ ही नहीं था। इसलिए अनकॉन्शियस रीजनिंग काम नहीं कर रही यहां पर। या आप उनसे यह पूछें, चार जोड़ी जूते खरीदो। उनको बताओ मत कौन से खरीदे हैं, रंग मत बताओ कि मम्मी बताओ आज मैंने कौन से जूते पहने हैं? नहीं बता पाएंगे। और बताएंगे तो सही होने की संभावना 1/4 है क्योंकि चार जोड़ी हैं। तो अगर 1/4 की संभावना के बराबर ठीक चल रहा है, तो तुक्का है। उससे बहुत ज्यादा सही हो रहा है, तो रियलिटी है।

तो इसका तरीका क्या है? न्यूरो साइंस में जानने का एक्सपेरिमेंट। तो जिन लोगों ने कहा कि टेलीपैथी होती है, मनोविज्ञान में एक ब्रांच बन गई पूरी की पूरी। उस ब्रांच का नाम है पैरासाइकोलॉजी। कभी आप स्टडी करें, इंटरेस्टिंग ब्रांच है पैरासाइकोलॉजी। पैरासाइकोलॉजी में एक सब्जेक्ट है जिसको बोलते हैं ईएसपी। एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शन। अती्द्रिय प्रत्यक्षण बोलते हैं। यानी इंद्रियों के बिना भी जो परसेप्शन हो जाता है। इसमें कई चीजें हैं, जिसमें एक वो बोलते हैं क्लियर वेंस, क्लियर ऑडियंस। क्लियर ऑडियंस का मतलब बहुत दूर से आवाज सुन ली। आप वहां रोए, मम्मी को यहां पता लग गया। आप अमेरिका में रहे। मम्मी को यहां आवाज सुनाई दे रही है आपकी। क्लेयर वन से दूर से देख लेना कि आप वहां क्या कर रहे हैं। मम्मी यहां देख पा रही हैं। और टेलीपैथी तो है ही तीसरा। यह उसकी ब्रांचेस है।

कुछ लोगों ने क्लेम किया कि भाई हम तो जान जाते हैं। तो न्यूरोसाइंटिस्ट ने कहा कि ठीक है, एक्सपेरिमेंट कर लेते हैं। जब भी कोई आपसे कहे कि मैं जादू करता हूं, चमत्कार करता हूं, बोलो कि आ जाओ, टेस्ट कर लेते हैं। टेस्ट अपनी कंडीशन में करना। दुनिया में कोई जादू नहीं कर पाएगा। मैं आपको साफ-साफ बता रहा हूं। जादू और चमत्कार करने की शर्त है कि जो करने वाला है, कंडीशंस उसके कंट्रोल में हो पूरी। आप कहोगे मेरे घर आकर करो और कंट्रोल मेरा रहेगा कंडीशंस पर, कोई आएगा ही नहीं करना छोड़िए, कोई आएगा ही नहीं। हां, आएंगे तो कौन जो हाथ की सफाई वाला काम करते हैं कि ताश के तीन पत्ते हैं, आपको दिखाएंगे ऐसे करते दो गायब हो जाएंगे। ये हाथ की सफाई है, ये कहीं भी कर देंगे। लेकिन अधिकांश लोग आने से मना कर देंगे क्योंकि वो कला है ना, उनको पता है कि वो कला करने के लिए कुछ एक स्थिति चाहिए होती है, वो स्थिति नहीं होगी तो कैसे होगा? तो इनको को भी कहा कि भाई अगर आपको इंट्यूशन बहुत ज्यादा है, तो आइए एक्सपेरिमेंट कर लेते हैं। तो कुछ लोग आए। x और y हैं, ये एक दूसरे के साथ कम्युनिकेट करते हैं। बिना बिन चिट्ठी बिन तार कम्युनिकेट करते हैं। बोले ठीक है। एक को इस कमरे में फिक्स कर दिया। एक को उस कमरे में फिक्स कर दिया। अब वैज्ञानिक क्या कह रहे हैं इनसे? कि यह है मैसेज। उनके दिमाग में पहुंचाना है। पहुंचाओ। यह कोशिश कर करके मर गए। नहीं पहुंचा। क्योंकि पड़ोसी कमरे में बैठा हुआ आदमी यह सोच के कि मैसेज थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड होगा, मैसेज आसान कर लिया। सिंपल मैसेज, केवल एक इमोशन कि कौन सा इमोशन आप कन्व करना चाह रहे हैं। बहुत मुश्किल यूपीएससी का सवाल नहीं, चार ऑप्शन वाला। बहुत सिंपल सा एक इमोशन और वो इमोशन जैसे ही आपने सोचा, आपके दिमाग का एक हिस्सा लिट हो गया। क्योंकि वो ईजी से पता लगेगा कि आपका दिमाग का यह हिस्सा एक्टिव है, आप इस बारे में सोच रहे हैं। दूसरे कमरे में उसका भी ईजी चल रहा है और एफएमआरआई चल रहा है। उसके दिमाग का वो हिस्सा लिट नहीं हो रहा। कहा था, कुछ बोलना नहीं है। आप कुछ सोचो और आप यह सोचो कि वो क्या सोच रहा है? तो दोनों के दिमाग के एक ही हिस्से में करंट आना चाहिए था या एक ही हिस्से में ऑक्सीजन की सप्लाई बढ़नी चाहिए थी। ऐसा नहीं हुआ। और जब जब हुआ भी, तो उतना ही हुआ जितना रैंडमली हो सकता है किसी का भी। एक आध केस में रैंडम से ज्यादा हुआ, तो सेकंड एक्सपेरिमेंट में रैंडम से कम हुआ। तो एक्सपेरिमेंट्स के बेस पर आज तक साबित नहीं हुआ कि कोई ऑब्जेक्टिवली रिपेटिवली टेलीपैथी कर सकता है।

हां, साइंस टेलीपैथी कर सकती है। करीब 10 साल पहले एक्सपेरिमेंट हुआ है। भारत और फ्रांस के बीच में कि भारत में एक पेशेंट लेटा हुआ है। पेशेंट मतलब एक व्यक्ति लेटा हुआ है। एक फ्रांस में लेटा हुआ है। दोनों को ईजी की मशीन लगा दी। एक कंप्यूटर से कनेक्टेड है। दोनों कंप्यूटर वाई-फाई से कनेक्टेड हैं। इससे कहा कि तुम एक चीज सोचो। सिर्फ बहुत सिंपल हां या ना में से सोचो और हां आने पर दिमाग का कहां कौन सा हिस्से में करंट आएगा, ना में कौन से हिस्से में करंट आएगा, यह मशीन को पता है। उस मशीन को पता है। इसने सोचा हां, करंट आया। इलेक्ट्रोड में गया। मशीन ने रीड किया। मशीन ने कंप्यूटर को इनपुट दिया। वाई-फाई से वो इनपुट पहुंच गया फ्रांस के मशीन में। फ्रांस के कंप्यूटर ने अपनी मशीन को इनपुट दिया। उस मशीन से इलेक्ट्रोड्स कनेक्टेड थे। उन इलेक्ट्रोड्स ने उसके दिमाग को इनपुट दिया और वहां भी हां वाला हिस्सा जलने लगा। इटली बेसिक एक्सपेरिमेंट हुआ है। पर ये विज्ञान ने किया है। 2014 की बात है। भारत और फ्रांस में हुआ। और न्यूरालिंक अगर आपने कंपनी सुनी हो, तो उसके बाद आज से 10 साल के बाद हम सब टेलीपैथी करेंगे। एक चिप आपके दिमाग में लगी है, एक मेरे दिमाग में लगी है। दोनों वाईफाई से कनेक्टेड है। वाईफाई नहीं है, तो लन से कनेक्टेड है। या उससे वो क्या ब्लूटूथ से कनेक्टेड है? आप यहां बैठे हैं। मैं यहां बैठा हूं। बात करनी है। कुछ करना ही नहीं है। मैंने मन में सोचा आपके बारे में कि भैया चाय पीने चले। आपके दिमाग में आके चाय पीने चले। आपने अंदर ही अंदर कहा हाथ चलो। मैंने कहा हाथ चलो। दोनों एक साथ उठे, अलग-अलग कुर्सी पे और चले गए। तब टेलीपैथी होगी। आज से 10 साल बाद धूमधाम से टेलीपैथी होगी। पर वो तब होगी जब दिमाग में चिप लगा होगा। ईलॉन मस्क जब लगाएगा चिप सबके अंदर या कोई और कंपनी, और भी कंपनियां हैं। तो हम तो नहीं मानते कि टेलीपथी कोई ऑब्जेक्टिव रियलिटी है। कुछ इंसान्स जैसे मैंने कहा कि किसी मम्मी के मन में ऐसा हो जाना, वो होते हैं पर वो ऐसा है कि मतलब अनकॉन्शियस लेवल की रीजनिंग से हुआ और हमें लगा कि इंट्यूशन हुआ है। ऐसा मामला ज्यादा है।

>> सर, आज जो चर्चा का टॉपिक है, उसमें बाबाओं पर सवाल ना हो ऐसा होना ठीक नहीं लग रहा था हमें। तो हमने एक सवाल उनके ऊपर भी रखा है कि जो बाबा हैं, क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती है कि अंधविश्वास को वह रोके या हमें उनसे सवाल ही नहीं करना चाहिए?

>> नहीं, तो वह रोकेंगे, तो फिर मुश्किल नहीं हो जाएगा? अरे देखो, जो बाबा लोग हैं, बाबा का मतलब क्या होता है? एक ऐसा व्यक्ति जो धर्म की व्याख्या करता है। धार्मिक जीवन जीता है। बहुत लोग उसका उसके अनुयाई होते हैं। उसमें आस्था रखते हैं, श्रद्धा रखते हैं। अब ऐसे व्यक्तियों की जिम्मेदारी तो बहुत बड़ी है। पर दिक्कत यह है कि जो अधिकांश बाबा हैं। एक दो बाबा हमारे समाज में बड़े कायदे के हैं। जिनके बारे में मैं कह सकता हूं। एक आध से मेरा मिलना भी हुआ है। मैं नाम नहीं बोलूंगा। मैं उनके बारे में यह कह सकता हूं कि बहुत ही प्रामाणिक व्यक्ति हैं। ज्ञान के मामले में नहीं। आचरण, पवित्रता, शालीनता इस मामले में। पर दिक्कत यह है कि विज्ञान की जो डेवलपमेंट्स पिछले 100 200 साल में, वह इतनी ज्यादा हैं। और लगभग सारे बाबा ऐसे हैं जिन्होंने विज्ञान की दुनिया में पैर रखा नहीं है। इसलिए वह खुद अंधविश्वासों से बचे। पहली शर्त यह है कि जब तक आप विज्ञान नहीं पढ़ेंगे, आप चंद्र ग्रहण को मान सकते हैं कि राहु ने डस लिया है। तो ना उनको फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी वगैरह पढ़ने का मौका मिला है। ना उनकी ट्रेनिंग ऐसी है कि वो सोशियोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी या साइकोलॉजी पढ़े हो। अगर साइकोलॉजी साइकेट्री पढ़ा हो, तो वह भूत प्रेत वाले लोगों को ज्यादा सही सलाह दे पाएंगे। सोशियोलॉजी पढ़ी होती, तो वो जेंडर और कास्ट को ज्यादा अच्छे समझते। वो जातिवादी और पुरुषवादी व्यवहार ना करते। तो ठीक है। उनकी लिमिटेशंस हैं। उनकी ऐसी ट्रेनिंग नहीं है। मेरा ख्याल है कि जिम्मेदारी बनती है। लेकिन उनके पास होना यह चाहिए कि जो धर्म के लोग हैं, उनकी भी ट्रेनिंग के अच्छे स्कूल्स होने चाहिए। हर धर्म के लोगों को कोशिश करनी चाहिए कि जो पुरोहित बनेंगे या धार्मिक साधु सन्यासी बनेंगे, उनको भी एक व्यवस्थित ट्रेनिंग मिले जो लेटेस्ट नॉलेज से सुसंगत हो। अच्छी बात यह है कि अब जब से सोशल मीडिया चला है, तो जब वह कोई ऐसी बात बोलते हैं जो अच्छी है, बहुत तारीफ मिलती है। जब कोई ऐसी बात बोलते हैं जो गलत है, तो फिर समाज से आलोचना भी आती है। तो पहली बार बाबाओं के मठ के अंदर की बातें और बाहर के समाज की बातों में इंटरेक्शन होनी शुरू हुई है। इस मंथन से थोड़ा जहर निकलेगा, थोड़ा अमृत निकलेगा। तो उम्मीद कीजिए कि अमृत ज्यादा निकलेगा।

अच्छा, रही बात उनसे प्रश्न पूछना चाहिए या नहीं? प्रश्न तो सबसे पूछना चाहिए भाई। सोशल मीडिया के दौर में, डेमोक्रेसी के दौर में प्रश्नों से कौन बचा है? प्रश्न पूछना चाहिए। लोकतंत्र का तकाजा है और प्रश्न गंभीर हो, तो जवाब भी देना चाहिए सबको। तो हम सबका अधिकार है कि हम भाई सरकार से सवाल पूछते हैं। सुप्रीम कोर्ट से पूछते हैं, तो उनसे ही पूछेंगे। आप मुझसे पूछ रहे हैं। तो हर किसी से सवाल पूछे जा सकते हैं। जो भी पोजीशन ऑफ अथॉरिटी में है, उसको सवाल का जवाब देना चाहिए।

जी >> सर, जैसे अभी बाबाओं के बारे में बात की, तो अगर हम इनकी ऑथेंटिसिटी के बारे में बात करें, तो जैसा आपने भी बोला कि कुछ बाबा को देख के तो सही में लगता है कि ये बड़े संत होंगे और कुछ को देख के लगता है कि बाबा बनना इनके लिए सिर्फ एक स्टार्टअप था, तो इसका कोई समाधान हो सकता है?

>> मैं कैसे कर सकता हूं समाधान? येता अभी सोशल मीडिया में ये भी है ना कि कुछ लोग रोचक बातें करते हैं, लोग उनके दीवाने हो जाते हैं, उनको मजा आता है। तो देखिए आर्टिकल 19 तो उन पे भी लागू होता है। 25 भी लागू होता है। तो अपने धर्म को मानने का प्रचार करने का अधिकार उनके पास भी है। 19 के तहत अपनी रुचि का व्यवसाय करने का अधिकार भी उनके पास है। तो अगर वो अपने आश्रम को या गुरुकुल को एक स्टार्टअप या एक उद्यम के रूप में देखना चाहें, तो ना आप मना कर सकतीं, ना मैं मना कर सकता हूं। कानून

के दायरे में तो कोई दिक्कत नहीं है। अगर वह ट्रस्ट बना के या सेक्शन ए कंपनी बनाकर या सोसाइटी बनाकर नो प्रॉफिट वेंचर के रूप में या प्रॉफिट वेंचर के रूप में कंपनी बनाकर ऐसा काम करते हैं। सरकार का टैक्स पे करते हैं। कानून का उल्लंघन नहीं करते हैं। तो कौन रोक सकता है?

और यह बात सही है कि जिन लोगों में वाकपटुता है, व्यक्तित्व कला है, मतलब ओरेटरी स्किल्स बहुत अच्छी है जिनकी जिनको धर्म दर्शन के बारे में मोटा-मोटा आईडिया है, धर्म की कहानियां ठीक से पढ़ी हुई हैं। रोचक तरीके से बात करनी आती है। तो उनके लिए सोशल मीडिया आने के बाद थोड़ा आसान तो है कि वह जल्दी ही एस्टेब्लिश हो सकते हैं। हम देख भी रहे हैं अपने आसपास।

सर हमने साइंटिफिक टेंपरामेंट पे बात की अभी तो एक साइंटिफिक टेंपरामेंट डेवलप करने के लिए साइंस पढ़ना जरूरी है क्या? क्या मैं कॉमर्स या हिंदी साहित्य पढ़ के साइंटिफिक टेंपरामेंट नहीं डेवलप कर सकती?

कर सकते हैं। दुनिया में ऐसे लोग हुए हैं जो अनपढ़ थे और साइंटिफिक टेंपर के मामले में कमाल के थे। जैसे कबीर दास हैं। मेरी नजर में पिछले हजार साल के इतिहास में उनसे बड़ा साइंटिफिक टेंपर वाला आदमी नहीं होगा। और वो अनपढ़ थे। साहित्यकार भी थे, लिखते थे। उन्होंने खुद ही कहा है कि मतलब मसी कागज छवो नहीं, कलम गए नहीं हाथ कि स्याही और कलम को छुआ नहीं है। मतलब कलम को हाथ में लिया नहीं है। और कागज और स्याही को मैंने छुआ नहीं है। मतलब आप मान लेते हैं कि वह सही कह रहे होंगे। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि नहीं वो केवल बड़प्पन या लघुता के भाव से कह रहे थे। दरअसल वो पढ़े लिखे थे। मुझे नहीं पता था।

लेकिन अगर साइंस पढ़ लेंगे तो साइंटिफिक टेंपर बनने की संभावना ज्यादा होती है। जैसे फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी पढ़ते-पढ़ते एक तो बहुत सारी गलतफहमियां है। बहुत सारे अंधविश्वास वैसे ही खत्म हो जाते हैं। दूसरा साइंस पढ़ते-पढ़ते साइंस का मेथड दिमाग में बैठ जाता है। जैसे आप ऑफिस में काम करते हैं तो ऑफिस में काम करने के लिए एसओपीस बनाते होंगे। स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर क्या होता है? जो एसओपी इस पर खूब काम करता है ना एक समय के बाद घर पर भी एसओपी बनाने लग जाता है कि सुबह उठना है इतने बजे फिर यह करना है फिर यह करना है पूरा एसओपी बना हुआ है तो एसओपी बनाते बनाते जीवन के हर हिस्से में एसओपी लगने लग गया इसका मतलब है कि एसओपी अब आपका टपर बन गया है टपरामेंट बन गया है तो विज्ञान पढ़ते-पढ़ते विज्ञान का मेथड आपके टपर का हिस्सा बन जाता है ऐसे ही अगर आपने सोशियोलॉजी पढ़ा, एंथ्रोपोलॉजी पढ़ा, साइकोलॉजी पढ़ा, ज्योग्राफी पढ़ा, हिस्ट्री पढ़ा क्योंकि क्योंकि ये भी साइंस के तरीके से ही पढ़ते हैं आजकल हम लोग इनको पढ़ने से भी और क्योंकि इनको पढ़ के गलतफहमीया बहुत दूर होती हैं।

अगर आपने हिस्ट्री ठीक से नहीं पढ़ा है तो कोई आपके सामने हिंदू मुस्लिम एकदम आराम से कर लेगा। अगर ठीक से इतिहास पढ़ा है तो नहीं कर पाएगा। अगर आपने एंथ्रोपोलॉजी ठीक से पढ़ी है तो कोई ट्राइबल सोसाइटी के बारे में कुछ गलतफहमी फैला देगा आपके सामने। एंथ्रोपोलॉजी पढ़ी है तो नहीं फैला पाएगा। सोशियोलॉजी पढ़ा है तो रेसिज्म और जेंडर के खिलाफ कोई कुछ भी बोल देगा। सोशियोलॉजी पढ़ लिया है तो आप जनरली जेंडर सेंसिटिव रेस सेंसिटिव हो जाएंगे। इसलिए मेरा ख्याल है कि साइंटिफिक टेंपर पैदा हो तो सकता है बिना ये सब पढ़े भी। अगर आपने बहुत अच्छी-अच्छी बातें सुनी है। जैसे कोई व्यक्ति नहीं पढ़ पाया पर रोज दिन में दो-ती घंटे YouTube पे अच्छे वीडियो देखता है। अच्छे लोगों के जो साइंटिफिक बातें करते हैं। हो जाएगा धीरे-धीरे। पर यदि उसने फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायो पढ़ लिया, स्कूल में फिर सोशियोलॉजी, एंथ्रो, साइकोलॉजी पढ़ लिया तो ज्यादा संभव है कि वो साइंटिफिक टपर वाला बनेगा।

हालांकि बहुत बड़े-बड़े वैज्ञानिक ऐसे हुए हैं जिनमें साइंटिफिक टेंपर नहीं था। अगर मेथड सिर्फ लैबोरेटरी में यूज़ हो रहा है, जीवन में नहीं हो रहा है तो साइंटिफिक मेथड तो आपको आता है पर टपर नहीं बन पाया है। ऐसे कई लोग हैं लैबोरेटरी में रिसर्च कर रहे हैं। बायोटेक में देख रहे हैं कोशिकाएं सबके समान हैं। लैबोरेटरी से बाहर निकलते जातिवादी हो जाते हैं। महिलाओं का अपमान करने लगते हैं। क्योंकि दिमाग के दो हिस्से हैं। लैबोरेटरी के अंदर साइंटिफिक मेथड लैबोरेटरी के बाहर निकलते ही एकदम आदिम भाव से निकलते हैं। प्रिमिटिव तरीके से निकलते हैं। तो साइंटिफिक टपर साइंटिस्ट का भी बन ही जाएगा ऐसा नहीं है। हिटलर के कुछ वैज्ञानिक थे मैगलेन वगैरह उन्होंने जो नॉन आर्यंस थे जिनको मारा गया। ओशथ्स आपने सुना होगा। ओशथ में एक साइंटिस्ट की टीम थी। छोटे-छोटे बच्चों पर रिसर्च करते थे। दर्दनाक रिसर्च करते थे। जबकि साइंटिस्ट थे। यह साबित करने के लिए कि जर्मन नस्ल या आर्यन नस्ल सबसे महान है। तो साइंटिस्ट इतना गधा भी हो सकता है कि जिसके अंदर साइंटिफिक टपर एकदम ना हो। नॉन साइंटिस्ट में साइंटिफिक टपर भी हो सकता है। लेकिन जनरली साइंटिफिक टेंपर बनाने के लिए साइंस की पढ़ाई और ह्यूमैनिटीज की पढ़ाई बेहतर रहती है।

ठीक है सर एक चीज यह भी देखने को मिलती है कि जो लोग धर्म को मानते भी हैं तो यह रहता है कि अगर यह धर्म को मान रहा है तो यह पाप और पुण्य को भी मान रहा होगा। तो अगर पुण्य को मान रहा है तो पाप को जब मान ही रहा है तो उससे डरेगा भी कि पाप ना करे। तो पाप नहीं करेगा तो ऐसे लोगों के लिए लोगों को लगता है चलो यह ठीक है लेकिन कोई नास्तिक है तो उनके मन में डर आता है कि यह फिर पाप कर सकता है। यह बात ठीक भी है। एक दार्शनिक थे जॉर्ज मेवरोड्स उन्होंने यह बात कही है कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता कि मैं हमेशा नैतिक क्यों रहूं। यह स्टेटमेंट है। प्रोसेस स्टेटमेंट है। यह बात सही है कि धार्मिक व्यक्ति के लिए नैतिक होना आसान है। क्योंकि उसके मन में बैठा हुआ है कि कहीं कोई नहीं देख रहा तो भगवान तो देख ही रहा है। अब यह भय अपने आप में बहुत बड़ा है। आप एकदम अकेले सुनसान वहां भी चोरी करना चाह रहे तो भगवान देख रहा है। डरे हुए हैं। आप पाप नहीं करना चाह रहे हैं। आपके मन में बैठ गया है कि अगर मैंने इसके बारे में गलत सोचा। जैसे बहन के बारे में हिंदू धर्म में चचेरी बहन मेरी बहन के बारे में गलत विचार मन में आए तो पाप हो गया। इस पाप के भय से अब जीवन भर ऐसी गलती करेंगे ही नहीं। यह पाप का भाव ना होता तो ऐसी गलती हो सकती थी। यह तो है ही। तो धर्म हमें बहुत सारे पापों से बचाता है। बहुत मामलों में सही काम करने के लिए मोटिवेट करता है। यह बात सही है। धर्मनिरपेक्ष या अधार्मिक व्यक्ति के लिए कोई ऐसी एक्सटर्नल फोर्स बहुत बड़ी है नहीं कि वो नैतिक ही काम करे। यह हो सकता है कि वह इतना सुलझा हुआ है कि उसके मन में बुरा भाव आता ही नहीं। हो सकता है। लेकिन ऐसे लोग मुट्ठी भर होंगे। अधिकांश तो नहीं होंगे।

इसका उल्टा पक्ष भी है। धर्म जब कुछ सिखाता है तो धर्म पैकेज के तौर पर बहुत चीजें सिखाता है। जैसे धर्म बच्चे को बचपन से ही जातिवादी बना देता है। बचपन से यह भी सिखा देता है कि पुरुष होना ज्यादा बड़ी बात है। तुम अगर लड़की हो तो पर्दा करना है या बुर्का पहनना है। लड़के हो तो नहीं करना है। जेंडर इनसेंसिविटी जेंडर डिस्क्रिमिनेशन सिखा दिया। तो धार्मिक नैतिकता मजबूत तो होती है पर बहुत मामलों में डिस्क्रिमिनेटरी भी होती है। रिजिड होती है, चेंज नहीं होती है। कई ऐसी परंपराएं जो किसी खास समय में शुरू हुई होंगी। मुझे लगता है कि बलि प्रथा जैसी परंपराएं क्यों शुरू हुई होंगी? क्योंकि पशुओं की जनसंख्या बढ़ जाती होगी। कैसे मैनेज करें? तो एक दिन तय किया उस दिन उन पशुओं की बलि दी जो अदरवाइज उपयोगी नहीं है। जैसे भैंस की नहीं भैंस की भैंस दूध देती है भैंसा नहीं देता है बकरी दूध देती है बकरा नहीं देता है तो जो पशु हमारे काम नहीं आ रहे पर उनको जिंदा रखने में बहुत संसाधन खर्च हो रहे हैं एक त्यौहार जैसा बनाया निपटा दिया उस दिन मेरे ख्याल से वजह ये रही होगी अब हुआ क्या कि धार्मिक नैतिकता है रूढ़ हो गई फिक्स हो हो गई। अब क्या जमाना है? क्योंकि त्यौहार आने वाला है इसलिए पशु पैदा किए जा रहे हैं मारने के लिए। और धार्मिक व्यक्ति को आप फ्लेक्सिबल होना सिखा नहीं सकते। आप यह समझा नहीं सकते कि भाई उस समय यह वजह थी। अब इसकी जरूरत नहीं है। तो धार्मिक नैतिकता में बड़ी दिक्कत है कि वो इतनी रिजिड है कि चेंज नहीं आ पाता। आप उस समय एक खास इलाके में रहते थे। वहां धूल मिट्टी थी, रेगिस्तान था तो आपने कहा कि चेहरा ढकना होगा। अब आपके समाज के कई लोग चले गए यूरोप में। वहां ना धूल है ना मिट्टी है। चेहरा वहां भी ढक रहे हैं। क्योंकि कोई समझ समझाने वाला ये इतनी हिम्मत करने वाला नहीं है कि भैया यह नैतिक नियम एक खास वजह से बने थे। नहीं समझ में आता है। धर्मनिरपेक्ष नैतिकता बहुत फ्लेक्सिबल होती है। सिचुएशन चेंज नियम बदल दिए। इसलिए हर किसी का अपना फायदा है। मेरे ख्याल से बहुत कम लोग हैं जो धर्मनिरपेक्ष होकर बहुत नैतिक हो सकते हैं। ज्यादातर लोग धार्मिक होकर ही नैतिक होते हैं। तो मेरी पर्सनल समझ यह है कि धर्म में सुधार ऐसे हो कि धर्म समय के साथ खुद को मॉडिफाई करता रहे और लोग अपने धर्म के हिसाब से नैतिकता मानते रहें और समाज के कुछ पढ़े लिखे साइंटिफिक टेंपरामेंट वाले लोग यह भी सिद्ध करते रहे कि बिना धार्मिक हुए भी नैतिक हुआ जा सकता है।

जैसे आज भी हमारे समाज में कुछ समस्याएं हैं। कास्टिज्म है, अनटचेबिलिटी है या पीरियड्स के टाइम पर हम महिलाओं को मंदिर नहीं जाने देते हैं। या बेटा नहीं पैदा हो पाता है तो हम महिलाओं को दोषी ठहरा देते हैं। तो ऐसी जो भी सारी चीजें हैं साइंस आज भी इन चीजों को एक हद से ज्यादा क्यों नहीं दूर कर पा रहा है? साइंस तो बता दिया कि अगर किसी के घर में बेटियां ही बेटियां हो रही है तो उसमें जिम्मेदारी बाप की ज्यादा है। मां की तो कम ही है। साइंस तो बता ही चुकी है। ये तो परंपरा से लोग मानते आ रहे हैं कि औरत ऐसी है। इसको बेटी ही होती है। बेटा होता ही नहीं। साइंस तो बता चुकी है कि एक्स और व क्रोमोसोम का क्या कनेक्शन है? कहां से आते हैं। इसी तरह से पीरियड्स के समय महिलाएं किचन में नहीं जाएंगी, मंदिर में नहीं जाएंगी। इसके पीछे एक प्रिमिटिव थॉट ये हो सकती है कि उस समय ऐसा ना हो कि भोग में कुछ ऐसा एलिमेंट चला जाए। बात समझ में आती है। लेकिन आज के समय में जब इतने उपाय हैं तब ये नॉनसेंसिकल बात है। तब इस क्यों महत्व देना चाहिए? तो साइंस तो अपना काम कर रही है। दिक्कत है कि साइंस लेबोरेटरी और किताबों में ही सीमित है। किताबों से वह जानकारी समाज के अंदर नहीं जा रही है। और समाज के अंदर अवेयरनेस के रूप में नहीं जा रही। जा रही है तो नॉलेज के रूप में जा रही है। फैक्ट के रूप में अवेयरनेस टपर के रूप में नहीं जा रही है। वो कैसे जाएगी? हर बच्चा स्कूल जाए। स्कूल में टीचर्स खुद साइंटिफिक टेंपर वाले हो। उनको यह एहसास हो कि बच्चों के अंदर वैज्ञानिक बुद्धि पैदा करनी है। तार्किक बनाना है। उनको अंधभक्त नहीं बनाना है बल्कि तार्किक व्यक्ति बनाना है। जिन समाजों में ऐसा हो गया जैसे स्कैंडविन कंट्रीज में चीजें बहुत बेहतर हैं। आपको यह आश्चर्य होगा कि भूत प्रेत का विश्वास वहां 5% से कम आबादी को है। और भारत जैसे देशों में 50 से 80% आबादी मानती है कि भूत होते हैं। यह रिसर्च डब्ल्यूho की है। पीई डब्ल्यूपी रिसर्च जिसको बोलते हैं उसकी रिसर्च 50 से 80% लोग भारत में भूत मानते हैं और वहां 5% मानते हैं क्योंकि वहां शिक्षा बढ़िया मिलती है। साइंटिफिक टेंपर है। कई साल से दो-तीन पीढ़ियां हो गई और ये चेंजेस एक पीढ़ी में नहीं आते। दो-तीन पीढ़ियां खर्च होती हैं। तब जाके चेंजेस आते हैं। तो अभी से करेंगे तो शायद 70 साल बाद चीजें बहुत बेहतर होंगी। टाइम लगेगा। लेकिन हो जाएगा साइंस को अब रोक तो नहीं पाएंगे ना भाई जो चीजें साबित हो रही है कहां तक रोकेंगे उनको और शिक्षा के बिना अब इस नॉलेज बेस्ड इकॉनमी की दुनिया में चल भी नहीं पाएंगे तो शिक्षा को बढ़ाना ही पड़ेगा तो मेरा ख्याल है कि अगली पीढ़ियां हमसे इस मामले में बेहतर होंगी कि उनका टेंपरामेंट ज्यादा साइंटिफिक होगा।

सर सवालों के अंतिम पड़ाव में हम पहुंच चुके हैं।

बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं भी थक गया हूं। मेरे ख्याल से 2 घंटे हो गए होंगे अब तक कम से कम। 2 घंटे हो गए। है ना?

सर अब इन सभी सवालों के बाद जो मेरा सवाल है वह उन बच्चों की तरफ से है जो अभी आपसे सवाल नहीं कर पा रहे हैं।

इन्हीं में से हैं वो।

नहीं सर अलग जैसे अलग बच्चे होते हैं।

अच्छा ये तो बड़े हैं वो बच्चे हैं। छोटे बच्चे हैं।

जी सर। सर बच्चों पर अंधविश्वास के नाम पे जो धारणाएं थोपी जाती हैं। तो उसको हम किस तरह देखें? संस्कार के तरीके से देखें या फिर ब्रेन वाश के तरीके से? और उस पर भी सर यह कैसे तय किया जाएगा कि बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत है?

देखो ब्रेन वाश तो उसमें होता है जिसमें ब्रेन हो। बहुत छोटे बच्चे का ब्रेन डेवलप्ड है ही नहीं। उसका ब्रेन वॉश तो हो नहीं सकता है। ब्रेन वाश एक कांसेप्ट है। ब्रेन वाश का मतलब है एक व्यक्ति जिसका दिमाग एक खास किस्म का बना हुआ था। आपने अपने पर्सुएशन से या कन्विंस करने की योग्यता से या मैनपुलेशन से या प्रोपगेंडा से उसका दिमाग 180 डिग्री पर घुमा दिया। एक घोर आस्तिक को घोर नास्तिक बना दिया। यह ब्रेन वाश है। घोर नास्तिक को घोर आस्तिक बना दिया। यह ब्रेन वाश है। एक पक्का हिंदू था मुसलमान बना दिया। पक्का मुसलमान था हिंदू बना दिया। यह ब्रेन वाश है। छोटे बच्चे का ब्रेन वाश नहीं होता है। क्योंकि छोटा बच्चा तो अभी सीख रहा है। तो कोरा कागज है बेचारा। चिकनी मिट्टी है। जैसा चाहेंगे बना देंगे उसको। तो छोटे बच्चे को हम जो कहते हैं उस प्रोसेस का नाम है सोशलाइजेशन। उसको हम विचार मूल्य सिखाते हैं। बच्चा थोड़ा बड़ा होना शुरू हुआ। घर में कोई आए तो बोलते हैं बेटा जय करो। नमस्ते करो। बच्चा सबको नमस्ते करता है। पैर छुओ पैर छुओ। सबके पैर छूता है। एक समय तक कहना पड़ता है। एक समय का बिना कहे छूने लग जाता है। जिस दिन बिना कहे छूने लगे समझो कि संस्कार हो गया पूरा। तभी प्रैक्टिस करवानी पड़ती है। वरना भूल जाएगा। प्रैक्टिस करवाते रहना पड़ता है। फिर कोई आए तो बच्चा पोएम सुनाओ। एकद साल तक रोता है नहीं सुनाना चाहता। फिर सुनाने लगता है। फिर एकदम बेशर्म हो जाता है। सड़क पर सुनाने लगता है पोयम। उसके बाद कोई मिल जाए तो। तो यह प्रैक्टिस करवा करवा के हैबिट्स डेवलप करते हैं। इनको संस्कार कहते हैं। इन संस्कारों में कुछ अंधविश्वास भी आ जाते हैं। जैसे उत्तर भारत में, हरियाणा में, पंजाब में, दिल्ली में बेटियां पेरेंट्स के पैर नहीं छूती। साससुर के छूती हैं। क्योंकि यहां एक धारणा है कि तुम्हारे असली पेरेंट्स वो होंगे। लेकिन अब यूपी उत्तर पूर्व उसमें जाएंगे पूर्वी उत्तर प्रदेश में, बिहार में वहां बेटियां पैर छूती हैं पेरेंट्स के। वहां इस मामले में जेंडर इक्वलिटी है। अब वहां के कल्चर के हिसाब से यह खराब है। यहां के हिसाब से वह खराब है। आप किसको सही माने ये आपकी चॉइस की बात है। तो होता क्या है कि जब आप अपने कल्चर सिखाते हैं, उस कल्चर की अच्छी बातें, बुरी बातें दोनों सिखा देते हैं। जैसे पेट्रियकल कल्चरर्स में आप बिना कहे यह सिखा देते हैं कि बेटा होना खास बात है। और बेटी को यह कि तुम्हें बहू बनके यह सब करना है। अभी से प्रैक्टिस कर लो। हमने शायद बात की थी कि उसके खिलौने भी कौन से होते हैं? गुड़िया। गुड़िया को नहलाना है, धुलाना है, उससे शादी करवानी है। पूरी ट्रेनिंग मिल रही है मां होने की। लेकिन लड़के को वो ट्रेनिंग नहीं मिल रही कि किचन सेट उसको दिया, एक गुड्डा दिया ना, उसको बैट बॉल मिलेगा, बंदूक मिलेगी। वो सबको बंदूक दिखा दिखा के मार रहा है। तो उसका वैल्यू सिस्टम अलग बन रहा है। खिलौने सोशलाइजेशन के बहुत बड़े सिंबल्स होते हैं, माध्यम होते हैं।

अब इसमें खेल क्या है कि या तो हम इजराइल में एक प्रयोग हुआ था। उसको बोलते हैं किबुट्स। आपने शायद कभी सुना हो किसी ने। किबुटज़िम या किबुट्स। किबुजन कासेप्ट का नाम है। किबुड्स एक सिस्टम का नाम होता है। इजराइल में जो लोग पहुंचे हैं यहूदी उनमें से बहुत सारे सोवियत संघ से आए थे जो यूएसएसआर से पहले वो सारे मार्क्स स्टेट से आए थे। कम्युनिस्ट स्टेट से आए थे। तो सोशलिज्म का असर था उनके ऊपर। इसलिए इजराइल आपने देखा होगा कि रशिया ने ईरान से युद्ध होने पर भी इजराइल पे हमला नहीं किया। और आर्गुममेंट कह दिया कि इजराइल की बहुत बड़ी आबादी रशिया से ही गई है। वो यही कहना चाह रहे थे क्योंकि वहीं से बहुत लोग गए थे और इजराइल की जो आबादी है उसमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो यूएसएसआर और उसका पार्ट रशिया सबसे बड़ा था वहां से गए थे। मार्क्सिज्म में कम्युनिज्म में कांसेप्ट है कि फैमिली उतना महत्वपूर्ण सिस्टम नहीं होता है। वह मानते हैं कि हर घर में एक महिला केवल एक बच्चे को पाल रही है और महिला की पूरी प्रोडक्टिविटी पूरी मेहनत पूरी योग्यता खत्म हो गई। क्या फायदा? कम्यून होना चाहिए। कम्यून का मतलब एक गांव समझ लीजिए। इमेजिन कीजिए कि एक गांव जैसा है। 100 लोग साथ में रहते हैं। 100 पुरुष 100 महिला उनके बच्चे। सभी पुरुष महिलाओं के पास एक ही कमरा है। एक कॉमन किचन है, कॉमन स्कूल है। सारे बच्चे कॉमन स्कूल में रहते हैं। हॉस्टल में रहते हैं। कॉमन किचन में खाते हैं। उन सबके पिता तो खेती और काम करते ही हैं। उनकी मम्मीियां भी फ्री हो गई। वह भी खेती और काम करते हैं। दिन में एक घंटे के लिए बच्चा मिलने आता है तो पेरेंट्स मिलते हैं। बाकी टाइम पर अपने स्कूल में रहते हैं। हॉस्टल में रहते हैं। शादी है यहां पर। हालांकि मार्क्सिज्म में शादी को भी खारिज करने का विचार कहीं-कहीं आता है। इस विचार को इजराइल में अप्लाई किया गया किबुट्स कह के। कि एक गांव जैसा है। सभी पति पत्नी को एक घर मिला हुआ है। जो सिंगल है सिंगल घर मिला हुआ है। कॉमन मिस कॉमन सब कुछ है। बच्चे कॉमन पल रहे हैं। हफ्ते में एक बार आते हैं पेरेंट्स से मिलने के लिए। सारी मम्मीियों की प्रोडक्टिविटी फ्री हो गई। अब वो भी खेती कर रही हैं। काम कर रही हैं। समाज की डेवलपमेंट तेजी से बढ़ गई। तो लोगों ने कहा कि इस बच्चों को मां का प्यार नहीं मिला। इनका क्या होगा? और बाद की स्टडीज ने बताया कि यह बच्चे बाकी समाजों के बच्चों से ज्यादा डेवलप्ड थे। बेहतर डेवलप हो गए थे। क्योंकि मां के साथ हमेशा होना अच्छी बात थोड़ी ना है। कई माताएं टॉक्सिक भी तो हो सकती हैं। रिलेशनशिप टॉक्सिक हो सकती है कभी-कभी। तो अगर किबुड्स वाले आईडिया पर हम जाए तब तो बात अलग है। नहीं तो अगर आप फैमिली सेटअप की बात कर रहे हैं न्यूक्लियर फैमिली वाले में। उसमें पेरेंट्स की जिम्मेदारी है कि बच्चे की परवरिश ठीक से करें। तो पेरेंट्स का हक भी है कि अपनी कल्चर उसको दें। 18 साल तक जब बच्चे को पालने की जिम्मेदारी उनके ऊपर है, समाज की ओर से, स्टेट की ओर से तो बच्चे को अपनी वैल्यूज दे सके। यह हक भी उनके पास है तो अपनी वैल्यूज देते हैं और उसी वैल्यू के ट्रांसफर के प्रोसेस में जो अंधविश्वास हैं, जो कुरीतियां हैं वो भी ट्रांसफर होती हैं। नफरतें भी ट्रांसफर होती हैं। अगर बाप को किसी धर्म से नफरत थी तो बच्चे को भी हो जाती है। तो बच्चे जनरली रिप्लिका बन के निकलते हैं कुछ सालों के बाद।

इसका समाधान क्या है? समाधान इतना ही है कि स्टेट इतना कर सकता है कि स्कूल में धार्मिक शिक्षा को सीमित करें। स्कूलों में एनश्योर करें कि जातिवाद, रेसिज्म, जेंडर इनसेंसिटिविटी बढ़ाने वाली चीजें बिल्कुल ना हो सके। यह सुनिश्चित करें कि धार्मिक शिक्षा या तो मिलेगी नहीं या सभी धर्मों की मिलेगी और एक करिकुलम सरकार तय करेगी वही मिलेगी। और स्कूल में टीचर्स ऐसे हो जो वैज्ञानिक स्वभाव पर इतना जोर दें कि बच्चा अपने घर में मिलने वाली गलत बातों पर टोक सके। हम तो आजकल देखते हैं जो छोटे बच्चे हैं स्कूल में ऐसीऐसी बातें सीख के आते हैं कि पेरेंट टोकते रहते हैं। रेसिज्म के नाम पे कि भ एनवायरमेंट के नाम पे टोकते हैं। पेरेंट्स ने पॉलिथीन उठाई। बच्चा कह रहा है क्या पापा? पॉलिथीन तो खराब होती है उसके लिए एनवायरमेंट के लिए। तो बाप को भी शर्म आती है उसके बाद। तो बच्चा स्कूल में इतनी अच्छी बातें सीख के आए कि पेरेंट्स को भी शर्माने का मौका विशेष मिलता रहे। तब जाके बच्चे आजाद ख्याल होंगे और साइंटिफिक लॉजिकल टेंपरामेंट से भरे होंगे।

सर जो मेरा सवाल है वो फ्यूचर को लेकर

है। क्योंकि अभी जिस जनरेशन में हम सब हैं, वहां पे डिजिटल टेक्नोलॉजी एंड एआई का जमाना है। तो इसमें पुराने अंधविश्वासों का अंत होगा या फिर नए अंधविश्वासों का जन्म होगा? आपको क्या लगता है?

कुछ का अंत होगा, कुछ नए पैदा हो जाएंगे। अंधविश्वास तो शौक है। समाज को बड़ा मजा आता है अंधविश्वास मानने में। वरना अमेरिका के लोग आज भी अंधविश्वासियों की क्या जरूरत है? तो अमेरिका हो, इंग्लैंड हो, न्यूजीलैंड हो, हर देश में अंधविश्वास पर्याप्त मात्रा में चलते हैं। उसमें कोई खास कमी तो है नहीं। क्योंकि वो कल्चर का हिस्सा है। और वो जीवन को बहुत प्रभावित भी नहीं करते। वो बस है एक पार्ट, छोटा सा पार्ट है। चल रहे हैं।

अंधविश्वास एक नए अर्थ में देखें तो तकनीक बढ़ने के साथ बढ़ सकते हैं। जैसे अभी मेंटलिज्म और जादू की बात चल रही थी। आप इमेजिन कीजिए कि आप सड़क पर जा रहे हैं, कोई रैंडम व्यक्ति आपको बुलाए। और कहे कि यार यह बताओ, तुम्हारा नाम अमित है। और आप कहें, हां, नाम तो अमित है। देखो, शक हो रहा है इसको, कैसे पता लग गया? लेकिन डर भी लग रहा है। फिर उसने कहा, अच्छा, तुम्हारी डेट ऑफ बर्थ यह है। वह भी सही बता दी। रैंडम सा है। कल्चर भी अलग है। अमेरिकन आदमी है। आप कहीं घूमने गए थे। कोई अमेरिकन या नॉर्वे का आदमी अचानक सामने आ गया। वो बात कर रहा है। फिर कह रहा है, अच्छा अच्छा, ये बताओ कि तुम्हारा जो सबसे छोटा भाई है रिंकू, वो कैसा है? अब तो आपकी नानी मर जाएगी कि भैया, कुछ तो गड़बड़ है। है ना? यह ट्रिक्स एआई के जमाने में कितनी आसान है। आपको अंदाजा है? यह हो रहा है आजकल। यह भविष्य की बात नहीं बता रहा हूं मैं, वर्तमान की बता रहा हूं।

आपने सुना होगा कि मेटा कंपनी ने रेबन के साथ मिलके ग्लासेस निकाले हैं। कुछ स्मार्ट ग्लासेस। स्मार्ट ग्लास क्या है कि आपने चश्मा लगा लिया। उसके अंदर सामने कैमरा है। पीछे स्पीकर्स हैं। आवाज कान में आ रही है। वह आवाज इस तरह से आती है कि आसपास किसी को नहीं पता लगता। आपके कान में ही जाती है। आपको हेडफोन लगाने की जरूरत भी नहीं है। प्रोसेसर्स भी लगे हुए हैं। उसी चश्मे के अंदर। एक आदमी ने कुछ दिन पहले एक प्रयोग किया। अपने उस चश्मे को कनेक्ट कर लिया वाई-फाई के साथ। और एक एपीआई इंटीग्रेट कर ली। क्या इंटीग्रेशन किया कि एक एआई का इंजन बनाया जो कैंप का क्या करता है कि जैसे ही आप किसी के सामने जाएंगे, आपने किसी को देखा, उसकी फोटो स्टोर हो गई। अपने आप हो जाएगी। ठीक है? आप बटन दबा भी सकते हैं। आप रैंडमली भी कर सकते हैं। फोटो स्टोर होते ही उस एआई इंजन ने सोशल मीडिया पर सर्च किया, फोटो मैच की। यह सारा काम दो-तीन सेकंड में हो रहा है। दो-तीन सेकंड में मैच हो गया। मैच होते ही आपके सोशल मीडिया प्रोफाइल जितने हैं, सब उसने खोले और एक सेकंड में एआई ने आपकी डिटेल्स एक फॉर्मेट में निकाल के सामने रख दी जो चश्मे में उसको दिख रहा है। चश्मा उसके लिए स्क्रीन की तरह भी है। स्क्रीन पर लिखा हुआ है, इसका नाम यह है। इसकी मम्मी का नाम यह है। पापा का नाम यह है। इतने भाई हैं। यहां रहता है। एड्रेस ये है। मोबाइल नंबर यह है। ईमेल आईडी ये है। इतना ही नहीं, और डाटा कुछ-कुछ।

अभी आपने सुना है कि कुछ लोग फोटो खींच रहे हैं एआई से। पूरी वहां की कमीज पहन के फोटो खींची और कहा कि चेंज करो उसे। वो चेंज की और यहां तिल बना दिया और तिल सच में है, क्योंकि वो एआई वाले आपकी कितनी फोटो इकट्ठी कर चुके आपको भी नहीं पता। उनमें से एक फोटो में तिल दिख रहा था और आपके नाम के साथ डेटाबेस में तिल लगा रखा है उससे पहले से। अब पूरी बाहर की कमीज पहन के फोटो खींच रहे हैं और कह रहे हैं कि इसको थोड़ा चेंज करके दिखाओ। वो खुद तिल बना रहा है, एग्जैक्टली वही जहां पर है। अब सोच के देखिए कि वो चश्मा आपके पास है और आप अपने गांव में गए, जहां किसी को दूर-दूर तक हवा तक नहीं कि ऐसा कुछ हो चुका है। आपने वो चश्मा पहना हुआ है और गांव में गए हैं। बड़े-बड़े झाड़फूंक करने वाले फेल हो जाएंगे आपके सामने। और आपने रैंडमली किसी से कहा कि मैं किसी के बारे में कुछ भी बता सकता हूं। ऊपर से कनेक्शन सीधा आ रहा है। सही में आ रहा है। वाईफाई का आ रहा है। और लोगों ने कहा, अच्छा तो ये बताओ, किसी दूसरे गांव का आदमी आया हुआ तो उसके लिए ऐसा बताओ कौन है? और आपने कहा, बस दो-तीन सेकंड दो। लेकिन दो-तीन सेकंड आप कहानी सुनाते रहेंगे ताकि शक ना हो जाए। आप कहेंगे, तुम्हें तो मैं जानता हूं। आप टाइम खींच रहे हैं ताकि अंदर से डाटा आ जाए। इतना ही खेल है।

अच्छा, जादूगर दरअसल अच्छा स्टोरी टेलर होता है और स्टोरी सुनाने के प्रोसेस में इंफॉर्मेशन गैदर कर रहा होता है। खेल इस बात का है और हम तीन-चार सेकंड कहानी सुनाई। अरे, तुम अरे, मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम तब तक आ गया नाम कि तुम्हारा नाम यार, मुझे लग रहा है कि ऐसे शुरू होता है। अभी हमने पूरा नहीं बताया था कि सस्पेंस क्रिएट हो। आपको पूरा नाम दिख रहा है अंदर, संजीव कुमार। आप मजे ले रहे हैं कि यार, एस से शुरू होता है ना, वो घबरा गया। आपने कहा, लेकिन पूरा मैं नहीं सोच पा रहा। एक काम करो, अपने मन में अपना नाम बोलो। वो अपने मन में अपना नाम बोल रहा है। कह रहा, बस बस बस बस, तुम संजीव कुमार हो। आपको पहले से पता है। आप एक्टिंग अच्छी कर रहे हैं। उसकी हवा खिसक गई। उसको लग रहा है कि ना।

अब आपने कहा, डेट ऑफ बर्थ निकालते तुम्हारे चलो। अब मान लीजिए डेट ऑफ बर्थ उसकी 5 अक्टूबर है। वो दिमाग के अंदर क्या बोलेगा? 12 नवंबर। 12 नवंबर। 12 नवंबर। आपको पहले से पता है। आप कहेंगे, अच्छा, तुम जानबूझकर कुछ और बोल रहे हो ना? घबरा जाएगा। अब तो कैसे बोल रहे थे? फिर आप बोलेंगे ना, वो नहीं है जो तुम बोल रहे हो। 5 अक्टूबर है, जो चश्मे के अंदर दिख रही है मुझे। उससे यह पता ही नहीं कि आपने चश्मा कौन सा पहना हुआ है और कहां-कहां से कनेक्टेड है। तो एक नई तकनीक आएगी। जब तक गांव का आदमी समझेगा, 50 बार भूत बन चुका होगा। हर नई तकनीक जादू चमत्कार बढ़ाएगी और जो तकनीक से वंचित हैं, उनको और गधा बनाएगी। और कोई चमत्कार करना चाहे इन तकनीकों से, तो कर ही सकता है। ऐसे बहुत सारे मैं रिवील नहीं करूंगा कोई भी। लेकिन सब होते हैं।

अब एक हुफाई नाम से तकनीक आ गई है। वाईफाई से भी नेक्स्ट लेवल है। बिना कैमरे के आप किसी को आइडेंटिफाई कर सकते हैं। वाई-फाई के सिग्नल से आपकी स्कैनिंग हो जाएगी। आप एग्जैक्टली किस समय कहां थे। आपकी बॉडी की इमेज के हिसाब से बता देगा कि यह व्यक्ति वहां घूम रहा है। वाई-फाई से। कैमरा ही नहीं चाहिए। अब आपके घर के अंदर वाईफाई लगा हुआ है। कोई सीसीटीवी नहीं है। और कोई आपके वाईफाई सिस्टम को हैक कर ले और कहे कि मैं टेलीपैथी से बता सकता हूं कि इस समय तुम अपने बेडरूम में या अपने स्टडी रूम में यह वाली किताब पढ़ रहे हो। केवल वाई-फाई के सिग्नल्स की इमेजिंग से वो बता सकता है। अब जब तक यह तकनीक हर व्यक्ति को नहीं पता होगी, तब तक टेलीपैथी भी चलेगी।

तो मेरा खैर कहने का भाव यह है कि जितने जादू दिखते हैं, उनमें से 99% केसेस में सफाई होती है। हाथ की या तकनीक की या कोई कलाकारी। और अच्छे जादूगर जैसे हमारे मित्र सुहानी शाह, ईमानदारी से बताते हैं कि कोई सुपर नेचुरल पावर्स नहीं है। हमने अभ्यास किया है। सीखा है और एक कला है। आर्ट है। आर्ट के रूप में उसका सम्मान हो। आर्ट के रूप में तो एंजॉय करना ही चाहिए उसको। कितना मजा आता है। कोई आपका पासपोर्ट निकाल दे। नानी मर जाती है उस समय। पर मैं आपसे कह रहा हूं, डरना मत। कोई आपका दिमाग पढ़ नहीं पा रहा है। वो केवल एक कला है। एक आर्ट है। सुंदर आर्ट है।

सर, लेकिन अभी भी एक सवाल मन में है कि जैसे अगर धर्म अभी चल रहा है, सबके पास है, बहुत लोगों के पास तो है ही। विज्ञान है। आस्था है। यहां तक कि आध्यात्म है। तो क्या यह सब एक साथ नहीं चल सकते? क्योंकि धर्म आस्था पर टिका है और हम देखें, आध्यात्म अनुभव पर टिका है और विज्ञान तर्क पर टिका है। एक साथ क्यों नहीं चल सकते हैं?

वैज्ञानिक लोग विज्ञान के क्षेत्र की ही बात करें। करते भी हैं। वैज्ञानिक लोग आमतौर पर अपने क्षेत्र से बाहर निकलने से बचते हैं। वैज्ञानिकों में यह बात बड़ी अच्छी है। वो अपनी हर बात को गलत मानने को तैयार बैठे हुए हैं। आप साबित कर दीजिए, तुरंत गलती मान लेंगे अपनी। उनकी प्रतिज्ञा ही ये है। जब वो थीसिस आता है, कोई वैज्ञानिक का, उसमें क्या लिखा होता है? जब तक गलत साबित ना हो जाए, तब तक के लिए थीसिस यह है। इतने ईमानदारी से काम करते हैं। तो वैज्ञानिक अपनी रिसर्च करते हैं, स्टडी करते हैं। ईमानदारी से करते हैं। गलत हो तो मान लेते हैं। विनम्र हैं। अपनी हद में रहते हैं। वो भगवान की बात भी नहीं करते। कहां कह रहे हैं कि हम भगवान को साबित कर देंगे। नहीं कर देंगे। आमतौर पर कोई वैज्ञानिक नहीं कहता है। कहता भी तो अपने विश्वास के रूप में कहता है।

धर्म को भी लिमिट कर लेना चाहिए अपने आप को धार्मिक क्षेत्र में। कुछ आस्था के प्रश्न हैं, कुछ रिचुअल्स हैं। कुछ भावनाओं का मसला है, नैतिकता का मसला है। वहां तक लिमिट कर लें अपने आपको। आध्यात्मिक लोग आध्यात्मिक अनुभव कैसे होता है, सबको सिखाएं। क्योंकि वह अनुभव है, बड़ा एनरचिंग। मैं जो कहना चाह रहा हूं, अगर आपको कभी वो अनुभव हो, तो वो बड़ा यूनिक अनुभव है। मुझे अब तक हुआ नहीं है। मैं उसके थोड़ा नजदीक जाने का प्रयास करता हूं। कभी-कभी एग्जैक्टली नहीं हुआ है। पर मैं जितने लोगों से सुना है, मैं यह जानता हूं कि वह बहुत ही यूनिक एक्सपीरियंस होता है, जिसको भी होता है। और जिसको होता है, उसकी जिंदगी काफी चेंज होती है। मतलब गलतफहमियां दूर हो जाती हैं। तो वो अनुभव होना बड़ी कमाल की बात है। जिंदगी बेहतर हो जाती है। लेकिन उस अनुभव के बेस पर यह दावा करना कि मैं ब्रह्मांड या ब्रह्म के बारे में कुछ ऐसा जानता हूं जो पहले नहीं जानता था, वो बहुत ऑथेंटिक नहीं है। तो आध्यात्मिक लोग अपने आध्यात्मिक अनुभव को शेयर करें। सब लोग उसको फॉलो करें। वैज्ञानिक लोगों से वैज्ञानिक ज्ञान लें। धर्म से आस्था के हिस्से तक सीमित रहें। और धर्म के लोग भी कोशिश करें कि जो उनकी धार्मिक मान्यताओं में साबित हो गई हैं कि गलत चीजें हैं, उनको हटाएं। धर्म के जैसे संविधान में संशोधन होता है। धर्म भी तो हो सकता है। हर धर्म के अंदर धर्म के सबसे जो कायदे के लोग हैं, उनका समूह हो तो धार्मिक पुस्तकों में संशोधन कर सकता है। हो और जैसे संविधान में होता है, 130वां संशोधन, 108वां संशोधन, धर्म की पुस्तकों में क्यों नहीं हो सकता? 21वां संशोधन और उसमें यह पंक्ति हटा दी गई है। अब से यह पंक्ति मानी जाएगी। धर्म के सामने चुनौती बढ़ती जाएगी। अगर वह विज्ञान के साथ नहीं चलेगा, तो तो धर्म को भी खुद को मॉडिफाई करने के तरीके निकालने होंगे और निकाल लेंगे, तो फिर को-एग्जिस्टेंस संभव भी है और वांछनीय है, डिजायरेबल भी है।

>> सर, समाप्त हो गया।

>> तमाम उन बिंदुओं पर बात हो चुकी है। तो यहीं पर सेशन समाप्त करते हैं और उम्मीद है किसी नए टॉपिक के साथ फिर आपसे हमारी मुलाकात जल्दी ही होगी।

>> हां हां, जरूर होगी। है ना? चलिए, धन्यवाद।

[संगीत]