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Cell : The Unit of Life - Complete Chapter in One Video || Concepts+PYQs || Class 11th NEET

Competition Wallah1:48:21

Transcription

हम एक बार अपने पिताजी का नाम भूल सकते हैं। एक बार अपने घर का पता भूल सकते हैं। एक बार अपने इलाके का पिन कोड भूल सकते हैं। पर यह नहीं भूल सकते कि सेल इज द स्ट्रक्चरल एंड फंक्शनल यूनिट ऑफ लाइफ। ये एनसीआरटी की एक लाइन है कि द स्ट्रक्चर ऑफ बैक्टीरिया इज वेरी सिंपल। एक-एक चीज को हम डेप्थ में कवर करेंगे। पिछले 5 साल के जो पी वाई क्यूज हैं उनको भी आप लोगों को इलब किया जाएगा। लेकिन बनेगी लिपिड और प्रोटीन की। यह बात शत प्रतिशत सत्य है। यह बात कोई भी झुठला नहीं सकता। और राइबोसोम खुद कहलाता है प्रोटीन फैक्ट्री। यानी बाकी सेल में जितने भी प्रोटींस हैं वो राइबोसोम खुद बनाएगा।

सो हेलो एवरीवन कैसे हैं आप सब लोग? आई होप ईच एंड एवरी वन ऑफ यू इज डूइंग एब्सलूट गुड। माय नेम इज डॉ विपन कुमार शर्मा और मैं आप सभी लोगों का तहे दिल से स्वागत करता हूं हमारे इस प्यारे से प्लेटफॉर्म फिजिक्स w के ऊपर। आज मैं आप सभी स्टूडेंट्स के लिए एक ऐसी सीरीज लेकर आया हूं जो आपके लिए बहुत ही ज्यादा बेनिफिशियल होने वाली है। इस सीरीज को हम लोग कह रहे हैं द रॉबस्ट रिवीजन सीरीज। और ये एक रिवीजन सीरीज नहीं है, ये एक फुल फ्लेज प्रिपरेशन सीरीज ही है। यहां पर हर चीज को मैं जीरो लेवल से शुरू करूंगा और 100 लेवल तक लेके जाऊंगा। यानी कि दिस सीरीज इज अ वॉइड बस सीरीज। आपको जरा सा भी यह महसूस नहीं होगा कि एक भी पॉइंट हमने छोड़ दिया है। बिकॉज़ हम कुछ भी नहीं छोड़ने वाले हैं। एक-एक चीज को हम डेप्थ में कवर करेंगे। पिछले पा साल के जो पी वाई क्यूज हैं उनको भी आप लोगों को इलब किया जाएगा। और जो एनोट नोट्स हैं, मेरे हाथ के बनाए हुए वो नोट्स आप लोगों को मिल रहे होंगे। यू कैन टेक डायरेक्ट प्रिंट आउटस। और बड़े से बड़ा चैप्टर मुश्किल से पांच-छह शीट्स में आपका कवर हो रहा होगा। यानी पूरे 11थ क्लास की बॉटनी मुश्किल से 35-40 पेजेस के अंदर आपकी मुट्ठी में आ जाएगी। आप उनको मल्टीपल टाइम्स रिवाइज कर सकते हैं। एंड आप एग्जामिनेशन में मैक्सिमम मार्क्स स्कोर कर सकते हैं। एग्जामिनेशन को फोड़ सकते हैं, चाहे वो आपका स्कूल का एग्जामिनेशन ही क्यों ना हो, चाहे वो आपका नीट एग्जामिनेशन ही क्यों ना हो। दिस सीरीज इज गोइंग टू बी अ मास्टर क्लास सीरीज फॉर ऑलमोस्ट एवरी स्टूडेंट जो कि बायोलॉजी को समझना चाहता है, जो बॉटनी को एकदम स्क्रैच से शुरू करना चाहता है।

जब आप नोट्स देखेंगे तो आप पागल हो जाएंगे। एफर्ट्स में बिल्कुल भी कंजूसी नहीं की है। क्योंकि मेरी जंग जो है खुद से है। आई ऑलवेज ट्राई कि मैं अपने पिछले साल के कंटेंट को बीट करूं विद सम न्यू इनोवेशंस। और मेरा कंटेंट और ज्यादा प्यारा लगे और ज्यादा उसके अंदर डेप्थ हो और स्टूडेंट्स को और ज्यादा पसंद आए। तो जब आप नोट्स देखेंगे आपको आईडिया लग जाएगा कि इन लेक्चर के ऊपर तोड़फोड़ मेहनत करी गई है। ये जो चैप्टर है, सेल द यूनिट ऑफ लाइफ, दिस इज द मोस्ट फंडामेंटल चैप्टर। ये अगर आपने समझ लिया, आप मान लीजिए कि आपने बायोलॉजी के हर चैप्टर की हर यूनिट की कुछ-कुछ बातें जान ली। बिकॉज़ ऐसा कोई चैप्टर नहीं है बायोलॉजी का, ऐसी कोई यूनिट नहीं है बायोलॉजी की जिसमें सेल का जिक्र ना होता हो। इसको एकदम स्क्रैच से शुरू करना हमारी पहली प्रायोरिटी होनी चाहिए। इसको समझ डाला तो लाइफ झिंगा लाला, आगे की सारी की सारी बायोलॉजी झिंगालाला हो जाती है। तो इसके लिए बहुत जरूरी है कि आज हम सेल को एकदम आराम से पढ़ें, प्यार से पढ़ें, एक-एक बात को सुनते जाएं। अगर आपने मेरी बताई हुई हर बात सुन ली, अगर मेरी लिखी हुई हर बात को आपने रिवाइज कर लिया, तो फिर आपके पूरे मार्क्स एकदम पक्के हैं, चाहे सब्जेक्टिव एग्जामिनेशन हो चाहे ऑब्जेक्टिव एग्जामिनेशन हो। मेरा कोर फोकस रहेगा समझाने पे। क्योंकि ये जो शीट्स हैं, ये वाइट कलर की शीट्स हैं जिसको आप आराम से प्रिंट निकाल सकते हैं। और 35 से 40 पेज में आप आराम से हर चैप्टर को, यू नो, पूरे के पूरे चैप्टर को 11थ क्लास के कवर कर रहे होंगे। सो मैं आपको नोट्स दिखा देता हूं। बिकॉज़ मैं भी बहुत एक्साइटेड हूं कि आपको नोट्स कैसे लगेंगे। देखिए, एक-एक शीट प्यार से तराश गई है, एक-एक चीज हाथ से लिखी गई है। एंड अल्टीमेटली जब आप आगे के नोट्स देखेंगे, आगे के डायग्राम्स देखेंगे, इतने प्यार से आपको चीजें समझ में आ रही होंगी। मैंने बिल्कुल जल्दबाजी नहीं करी है। आई लव माय कंटेंट बिकॉज़ आई गिव टाइम टू एवरीथिंग। जब भी मैं कोई चीज बनाता हूं, आई मेक श्योर कि उसमें चाहे टाइम ज्यादा लग जाए लेकिन लाखों करोड़ों बच्चों का टाइम जरूर बचे। तो आप अगर इनका प्रिंट आउट निकाल लेंगे, आपको कुछ और करने की जरूरत नहीं है। आप इन्हीं को मल्टीपल टाइम्स रिवाइज कीजिए। तो अगर आपके पास मेडीज है, मेडीज को खोल के सामने रखिए, एनसीआरटी है, एनसीआरटी को खोल के सामने रखिए या इन शीट्स का प्रिंट निकाल कर के सामने रखिए और सिर्फ मेरी बातों को सुनते चले जाइए। दिस सीरीज विल ब्लो योर माइंड अवे। एक-एक चीज जो है आपको बहुत डेप्थ में पता लग रही होगी। बहुत प्यार से सारी की सारी चीजें देखिए हाथ से बना कर के हम लोग कवर करने वाले हैं। और आगे और भी चीजें हैं, राइट बहुत ही ज्यादा प्यार से एक-एक स्लाइड को बनाया है। एक-एक स्लाइड को बनाने में 50 मिनट, 60 मिनट लगी हैं। सो वो चीजें आपको बहुत ज्यादा पसंद भी आएंगी। एंड अल्टीमेटली हम लोग एग्जामिनेशन को भी क्रैक कर रहे होंगे विद आवर हार्ड वर्क एंड विद आवर एफर्ट्स, राइट। तो चलिए फटाफट से शुरू कर देते हैं इस सेशन को जिससे कि आपका टाइम वेस्ट ना हो। दिस इज एन इंट्रोडक्टरी सेशन। तो आप मुझे बताइएगा कि आपको यह कैसा लगा इन द कमेंट सेक्शन बिलो, राइट।

तो कुछ चीजें ऐसी हैं जो बायोलॉजिस्ट की जिंदगी के साथ जुड़ी हुई होती हैं। हम एक बार अपने पिताजी का नाम भूल सकते हैं। एक बार अपने घर का पता भूल सकते हैं। एक बार अपने इलाके का पिन कोड भूल सकते हैं। पर यह नहीं भूल सकते कि सेल इज द स्ट्रक्चरल एंड फंक्शनल यूनिट ऑफ लाइफ। हम ये नहीं भूल सकते कि माइटोकांड्रिया इज द पावर हाउस ऑफ द सेल। हम ये नहीं भूल सकते कि एटीपी इज द एनर्जी करेंसी ऑफ सेल। हम ये नहीं भूल सकते कि ब्रायोफाइट्स आर द एंफीबियन ऑफ प्लांट किंगडम। ये सारी चीजें जो हैं हमारी लाइफ का हिस्सा बन चुकी हैं। इन्हें भूल जाना मुमकिन नहीं। और उसी चैप्टर को हम लोग आज डिस्कस करने वाले हैं जिसको भूल जाना अब आपके लिए मुमकिन नहीं होगा। एकदम जीरो लेवल से स्टार्ट करते हैं सेल की डिस्कशन। तो चैप्टर का नाम है सेल द यूनिट ऑफ लाइफ। नाम से ही समझ में आ रहा है यूनिट, यूनिट का मतलब इकाई। यानी एक चीज जो अपने आप को रिपीट कर कर के, कर कर के एक बहुत बड़ा ढांचा तैयार कर सकती है। आपका घर जो है उसको बनाने में हो सकता है हजारों ईंटें लगी हों, लेकिन आपके घर की इकाई क्या है? एक ईंट है ना। वैसे ही हजारों ईंट रिपीट करके आपने अपना पूरा का पूरा घर बना डाला। सिमिलरली आपकी बॉडी में बिलियंस एंड ट्रिलियंस ऑफ सेल्स हैं, लेकिन इकाई क्या है? सबसे छोटी यूनिट क्या है लाइफ की? आपका सेल। क्योंकि यही एक चीज है जिसको हम क्या बोल सकते हैं? लिविंग बोल सकते हैं, जिंदा बोल सकते हैं। दैट्ची पूरी बॉडी का स्ट्रक्चर भी ये सेल ही बनाता है। एंड फंक्शनल यूनिट, यानी आपकी बॉडी के जितने भी मेटाबॉलिक रिएक्शंस हैं, आपकी बॉडी में जितने भी कामकाज हो रहे हैं वो भी इसी सेल के अंदर होते हैं। तो यह स्ट्रक्चरल यूनिट भी है, फंक्शनल यूनिट भी है किसकी? लाइफ की। यानी ऐसा कोई भी ऑर्गेनिज्म जिसको कहलवान है कि हां भाई मैं जिंदा लोगों की कैटेगरी में आता हूं, उसमें सेल प्रेजेंट होना चाहिए। वायरस को क्यों नहीं हम लोग जिंदा घोषित कर देते? बिकॉज़ उसके पास खुद का सेल है ही नहीं। यानी सेल इज द मोस्ट बेसिक थिंग जो कि लिविंग ऑर्गेनिज्म में होनी ही होनी चाहिए। अगर कोई ऑर्गेनिज्म ऐसा है जिसमें सेल्स नहीं हैं तो उसको आप लिविंग ऑर्गेनिज्म बोल ही नहीं सकते। सो दैट्ची फीचर ऑफ लिविंग ऑर्गेनिज्मस। अगर लिविंग ऑर्गेनिज्म की डेफिनेशन कभी लिखनी आई तो सेल का जिक्र होगा ही होगा। इट इज द डिफाइनिंग फीचर। यह वो फीचर है जो सेपरेट करता है लिविंग ऑर्गेनिज्मस को और नॉन लिविंग चीजों को। अगर मुझ में जान है और इस माइक में जान नहीं है, अगर आप में जान है और मेरे पेन में जान नहीं है, देन अल्टीमेटली देयर इज अ कॉंक्रीट डिफरेंस। और उनमें से ही एक डिफरेंस है सेल। क्योंकि हमारे अंदर सेल्स प्रेजेंट हैं जो कि हमें लिविंग बनाते हैं और इस माइक में, इस पेन में सेल्स प्रेजेंट नहीं हैं तो ये नॉन लिविंग ऑब्जेक्ट्स आपके हो जाते हैं।

अब दुनिया में जितने भी ऑर्गेनिज्म हैं या तो इनमें सिर्फ एक सेल पाया जा सकता है, यानी दे कैन बी यूनिसेल्यूलर। या फिर इनकी बॉडी में मल्टीपल सेल्स भी पाए जा सकते हैं, यानी कि दे कैन बी मल्टीसेल्यूलर आल्सो। जैसे कि हमारी बॉडी में बिलियंस ऑफ सेल्स हैं तो हम मल्टीसेल्यूलर ऑर्गेनिज्मस हुए। लेकिन कुछ ऐसे ऑर्गेनिज्मस हैं जिनकी बॉडी में सिर्फ एक ही सेल पाया जाता है। जैसे बैक्टीरिया है तो उसकी पूरी बॉडी एक ही सेल की बनी होती है। जैसे आपके प्रोटेस्टेंट्स हैं तो उनकी बॉडी एक ही सेल की बनी हुई होती है। तो भाई जो हम सारे के सारे काम इतनी कॉम्प्लेक्टेड के अंदर कर रहा है, दैट्ची है उसका स्ट्रक्चर बहुत सिंपल है। आप आने वाले चैप्टर में ये लाइन देखेंगे, सुनेंगे। ये एनसीआरटी की एक लाइन है कि द स्ट्रक्चर ऑफ बैक्टीरिया इज वेरी सिंपल। क्योंकि वो एक प्रोकैरियोटिक सेल है, उसमें ना मेंब्रेन बाउंड ऑर्गेनल्स हैं, ना वेल डेवलप्ड न्यूक्लियस है। उस बिचारे के पास कुछ भी नहीं है। लेकिन फिर भी उसकी मेटाबॉलिक डाइवर्सिटी बहुत ज्यादा है। कॉम्प्लेक्शन बॉडी में कर रहे हैं इतने सारे सेल्स के साथ वो बैक्टीरिया एक ही सेल में काम कर ले रहा है। वह रीप्रोड्यूस भी कर ले रहा है उसी सेल में, वह आपका खाने-पीने को मेटाबोलाइज्ड वन सेल। तो उस एक सेल में कितना मसाला होगा यह आप सोच सकते हैं। उस एक सेल में क्षमता है कि वो इंडिपेंडेंटली एजिस्ट कर पाए। इसीलिए वह एक सेल जो है उसे भी हम लिविंग ऑर्गेनिज्म कह रहे हैं। वह एक अपने आप में ऑर्गेनिज्म है, इंडिपेंडेंट एंटिटी है। और दूसरा वो आपके सारे के सारे एसेंशियल फंक्शंस ऑफ लाइफ को भी परफॉर्म कर पाए। जितने भी काम हम करते हैं वह सारे काम एक बैक्टीरिया भी कर सकता है। रेस्पिरेशन भी कर सकता है, फूड को भी अंदर घुमा रहा है, फूड को एक्सक्रीट भी कर रहा है, जो आपका अनडाइजेस्टेड फूड है। देयर आर अ लॉट ऑफ थिंग्स व्हिच अ बैक्टीरिया इज डूइंग, व्हिच अ यूनिसेल्यूलर ऑर्गेनिज्म इज डूइंग। तो ये आपका इंडिपेंडेंटली भी एजिस्ट कर सकते हैं और आपका सारे के सारे एसेंशियल फंक्शंस ऑफ लाइफ को भी परफॉर्म कर सकते हैं। दैट्ची है, दैट्ची स्ट्रक्चरल एंड फंक्शनल यूनिट ऑफ लाइफ भी हमने कहा, राइट।

अब देखिए कुछ साइंटिस्ट के नाम दिए हुए हैं एनसीआरटी में। पहला साइंटिस्ट जिन्होंने एक सेल को डिस्कवर किया। इन्होंने लिविंग सेल को डिस्कवर नहीं किया, इन्होंने क्वेर्कस सब्रस यानी ओक प्लांट की छाल ले ली, यानी बार्क ले ली और उसके सेल्स को उन्होंने देखा। यानी कि वो डेड सेल्स थे तो उनमें सिर्फ सेल वॉल्स दिखाई दे रही थीं। तो आपके रॉबर्ट हुक साहब जो हैं इन्होंने 1665 में आपके डेड सेल को पहली बार देखा। जिंदा सेल को किन्होने देखा? अलग चीजें देखने का बहुत शौक था और यह खुद से ही अपने माइक्रोस्कोप बनाते थे। विद डिफरेंट कॉम्बिनेशन ऑफ लेंसेस। को भी देखा इन्होंने बैक्टीरिया को भी देखा, इन्होंने स्पर्म सेल्स को भी देखा। हर छोटी चीज को मैग्नीफाई करके देखने की इनकी आदत थी। उसके बाद रॉबर्ट ब्राउन। तो रॉबर्ट हुक साहब ने पहला डेड सेल देखा और रॉबर्ट ब्राउन साहब ने 1831 में न्यूक्लियस की डिस्कवरी करी। न्यूक्लियस जो कि सेल का मस्तिष्क कहा जा सकता है। जैसे हम हमारी बॉडी के सारे के सारे काम कौन कंट्रोल करता है? न्यूरल कंट्रोल कौन करता है? आपका ब्रेन। इसी प्रकार से एक सेल में जितने भी होने वाले काम हैं इनको कौन कंट्रोल कर रहा होगा? इनकी रेगुलेशन कौन कर रहा होगा? न्यूक्लियस। तो इस न्यूक्लियस की सन 1831 में किसने डिस्कवरी की? रॉबर्ट ब्राउन साहब ने। और एक पॉइंट जो बार-बार एनसीआरटी में घूम-घूम कर आपका पीछा नहीं छोड़ेगा, इस पॉइंट को यहीं पढ़ लेते हैं। इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप जो थी ये एडवांस हो गई थी। इसमें एडवांसमेंट्स होने लगी थीं 1950 में। यानी 1950 से 1960 के बीच में इन 10 सालों में इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप प्रचंड होती जा रही थी, डेवलप होती जा रही थी, एडवांस होती जा रही थी। तो जाहिर सी बात है जब आपकी इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप एडवांस होगी तो आप सेल की छोटी से छोटी डिटेल को भी अच्छे तरीके से देख पा रहे होंगे। तो सेल के बहुत छोटे-छोटे जो पार्टिकल्स हैं वो भी हमें दिखने लगे थे 1950 के बाद। जैसे सेल में पाए जाने वाला सबसे छोटा जो स्ट्रक्चर है, दैट इज राइबोसोम। 15 से 20 नैनोमीटर इसका साइज होता है। यह भी आपको इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के एडवांसमेंट के बाद दिखा था। तो राइबोसोम कब दिखा था? 1953 में। यानी सेम इसी टाइम के आसपास। सिमिलरली जो सेल मेंब्रेन थी उसका स्ट्रक्चर भी धीरे-धीरे, धीरे-धीरे हमको पता लगने लगा 1950 में ही। फिर लेकिन सेल मेंब्रेन के अलग-अलग मॉडल्स आते गए और फाइनल मॉडल जो आया, जो आज के दिन में हम पढ़ते हैं 1972 में आया। सिंगर एंड निकोलसन ने यह मॉडल दिया था जिसे फ्लूइड मोज़ेक मॉडल ऑफ प्लाज़्मा मेंब्रेन कहते हैं। तो बहुत सारी चीजें थीं जो 1950 के बाद हुईं। कोई पूछे कि क्यों? क्योंकि 1950 के बाद, 1950 में एडवांसमेंट्स हो रही थीं किसकी? इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की।

तो हमारा पहला जो टॉपिक है वो है सेल थ्योरी। यानी एक ऐसी थ्योरी जो दुनिया के हर ऑर्गेनिज्म के लिए करेक्ट है, वो सेल के लिए करेक्ट है। तो यहां पर दो साइंटिस्ट ने प्राइम योगदान अपना दिया। सबसे पहले 1838 में एक साइंटिस्ट थे जिनका नाम था स्क्लेडर, जो कि एक बॉटनिकल, बॉटनिकल से इनको कहा गया। अब जाहिर सी बात है अगर ये बॉटनिक्स पे रिसर्च करेंगे तो इन्होंने मेरे भाई प्लांट्स पे रिसर्च की। अलग-अलग प्लांट्स को देखा और इन्होंने कहा कि प्लांट्स जो हैं ना इनमें डिफरेंट टाइप के सेल्स होते हैं और ये मिलजुलकर डिफरेंट टाइप के टिशूज भी बनाते हैं। जैसे प्लांट में मेरिस्टेमैटिक टिश्यू होता है जो डिवाइड करता रहता है, परमानेंट टिश्यू होता है, जाइलम भी एक टिश्यू है, फ्लोएम भी एक टिश्यू है। तो ये जो सारे के सारे टिशूज हैं ये अलग-अलग सेल से मिलकर बने हुए हैं ना। तो ये बात आपके स्क्लेडर साहब ने कही सिर्फ प्लांट के लिए क्योंकि बॉटनिकल पे इन्होंने रिसर्च करी। लेकिन मेरे भाई जो आपके स्वान साहब हैं, अब स्वान सेल के बारे में आप पढ़ते हैं न्यूरल कंट्रोल एंड कोऑर्डिनेशन में है ना, स्वान सेल्स न्यूरोलॉजी से रिलेटेड हैं यानी एनिमल बायोलॉजी से रिलेटेड हैं या जूलॉजी से रिलेटेड हैं। तो स्वान साहब जो थे ये ब्रिटिश जूलॉजिस्ट थे। इंग्लैंड के जूलॉजिस्ट थे और इन्होंने लगभग सेम टाइम पे 1839 में अपनी रिसर्च को शुरू किया। लगभग 1838, 1839 सेम सेम सा ही टाइम था। अब ये जूलॉजिस्ट थे तो सबसे पहले इन्होंने एनिमल सेल्स को देखा और कहा कि भैया एनिमल सेल के ऊपर तो एक कवर होता है जिसको हम कहते हैं सेल मेंब्रेन या प्लाज़्मा मेंब्रेन। यानी सबसे पहले साइंटिस्ट जिन्होंने प्लाज़्मा मेंब्रेन की प्रेजेंस को रिपोर्ट किया कि ऐसा कुछ हो सकता है, ही वाज़ द स्वान साहब। और इन्होंने देखा फिर कि प्लांट सेल को भी चेक करके देखता हूं यार कि इनमें भी ये सेल मेंब्रेन होती है या नहीं। तो ये चौक गए क्योंकि इन्होंने प्लांट सेल में देखा कि सेल मेंब्रेन के ऊपर भी एक लेयर है व्हिच इज कॉल्ड एज़ सेल वॉल। तो इन्होंने हमें बताया कि एनिमल जो हैं इनकी आउटर मोस्ट लेयर को कहा जाता है सेल मेंब्रेन और जो प्लांट हैं इनके ऊपर एक और लेयर पाई जाती है। सेल मेंब्रेन तो है ही, एक और लेयर पाई जाती है व्हिच इज स्पेसिफिकली फाउंड इन प्लांट सेल्स जिसको हम लोगों ने कह दिया आज के दिन में सेल वॉल। तो इन्होंने एक हाइपोथेसिस दी। अब आपके स्वान साहब जो थे इन्होंने प्लांट और एनिमल सेल्स दोनों पे रिसर्च करी। तो इन्होंने एक हाइपोथेसिस दी। यानी अपनी रिसर्च के बेसिस पे इन्होंने एक बात कही और भी इस पे कंफर्मेशन की जरूरत है। हाइपोथेसिस मतलब यह अभी थ्योरी नहीं है। यह अभी पूरी दुनिया में नहीं बता सकते। हाइपोथेसिस मतलब इन्हें ऐसा लगता है कि दुनिया के जितने भी प्लांट्स और एनिमल्स हैं वो सेल्स के बने हुए हैं या सेल्स के प्रोडक्ट्स के बने हुए हैं। ऐसा इन्होंने हाइपोथेसिस दी। तो स्वान साहब ने क्या किया? स्लेडर साहब के साथ दोस्ती कर ली। इन्होंने कहा कि यार दोनों भाई मिलके इस चीज को कंफर्म करते हैं। हाइपोथेसिस तो आपने दे दी कि दुनिया के सारे ऑर्गेनिज्मस जो हैं आपके सेल और सेल के प्रोडक्ट के मिलके बने हुए हैं। आओ इस चीज को कंफर्म करते हैं। अलग-अलग प्लांट्स पे, अलग-अलग एनिमल्स पे, अलग-अलग ऑर्गेनिज्मस पे रिसर्च करते हैं कि ये बात सही है या नहीं। तो इन दोनों ने बहुत सारे ऑर्गेनिज्म को देखा और यह पाया कि ये बात सही थी। तो यह थ्योरी में कन्वर्ट हो गई। हाइपोथेसिस जो है फिर थ्योरी बन गई। तो आपके स्लेडर साहब ने और स्वान साहब ने सेल थ्योरी दी जिसका पहला पोश्चुलेट क्या था? कि ऑल ऑर्गेनिज्मस ऑन अर्थ, जितने भी लिविंग ऑर्गेनिज्मस हैं ये सेल और सेल के प्रोडक्ट से मिलकर बने हैं। यह आपकी जो हाइपोथेसिस थी स्वान साहब की करेक्ट हो गई। लेकिन ये जो दोनों भाई हैं ये मिलकर यह नहीं बता पाए कि नए सेल्स कैसे बनते हैं। तो यहां पर तीसरे साइंटिस्ट का योगदान आया दैट इज रूडोल्फ वर्चो 1855-58 और जो पीले कलर से मार्क कर रहा हूं ये इंपॉर्टेंट पॉइंट्स हैं। तो पहले से ही आपको नोट्स में पता लग जाएगा कौन सा पीवा क्यू है। तो इन्होंने कहा ओमनी सेल्यूलर्स में सेल डिवीजन होती है तो नए-नए सेल्स बनते हैं। तो इन्होंने फाइनल शेप दी आपके सेल थ्योरी को और ओवरऑल सेल थ्योरी जो है आपकी कंप्लीट हो गई।

तो दो पॉइंट्स याद रखिएगा। अगर मैं ह्यूमन बॉडी की आपको बात बताऊं तो सिर्फ हमारी बॉडी में 200 डिफरेंट टाइप के सेल्स हैं। सिर्फ हमारी बॉडी के अंदर। तो भाई अलग-अलग जो सेल्स हैं इनके शेप और साइजेस अलग-अलग होंगे ना। जैसे आरबीसी जो हैं आपके रेड ब्लड सेल ये बायकॉनकेव डिस्क शेप होते हैं और इनका डायमीटर जो है यह 7 माइक्रोमीटर होता है। डायमीटर है। यह आपको यह बात याद रखनी है कि कौन से डायमेंशन बताई गई है, ये डायमीटर है। आपके जो डब्ल्यूबीसी होते हैं वाइट ब्लड सेल ये अमीबॉयड होते हैं। इरेगुलर इनकी शेप होती है। कॉलमनार सेल्स पतले और लंबे, कॉलम लाइक यानी खंबे जैसे सेल्स होते हैं और इनका न्यूक्लियस नीचे की साइड पाया जाता है। यह बात आप स्ट्रक्चरल ऑर्गेनाइजेशन में टिश्यू वाले पार्ट में पढ़ेंगे कि आपके जो कॉलमनार सेल्स होते हैं एनिमल टिशूज में इनका न्यूक्लियस नीचे की साइड पाया जाता है। यानी इनमें बेसल न्यूक्लिया होता है, नीचे की साइड मिलता है। फिर आपका नर्व सेल जो है ये ब्रांच्ड और लॉन्ग है। नर्व सेल जो आपकी बॉडी में आपका नर्व स्टिमुलेशन, पतला लंबा तार जैसा होना जरूरी है। पतले लंबे तार जैसे होते हैं। तो दे आर वन ऑफ द लॉंगेस्ट सेल्स। लंबे, नॉट द लार्जेस्ट सेल। दे आर द लॉंगेस्ट सेल्स। मतलब लंबाई इनकी ज्यादा है, बहुत ज्यादा मोटे नहीं हैं। लार्जेस्ट सेल मतलब मोटा भी है और आपका लंबा भी है। तो ऑस्ट्रिच एग जो है वो आपका लार्जेस्ट सेल कहा जाता है। मिजोफिल सेल जो कि आपके प्लांट की पत्तियों में पाए जाते हैं इनमें कई सारे क्लोरोप्लास्ट भी होते हैं। एक मिजोफिल सेल में 20 से 40 क्लोरोप्लास्ट हो सकते हैं। तो यहां पर मेन फोटोसिंथेसिस होती है। ये आपके राउंड, गोल मटोल या ओवल हो सकते हैं, अंडाकार हो सकते हैं, राइट। टिपिकल यूकैरियोटिक सेल का साइज, टिपिकल यूकैरियोटिक मतलब जनरल। इससे बड़े भी हो सकते हैं, इससे छोटे भी। पर टिपिकल यूकैरियोटिक सेल का साइज 10 से 20 माइक्रोमीटर होता है और टिपिकल प्रोकैरियोटिक सेल का साइज एक से दो माइक्रोमीटर होता है। यानी अगर मैं यहां से एक एनालिसिस लगाऊं तो 10 जो है ये एक से 10 गुना बड़ा है और 20 जो है ये दो से 10 गुना बड़ा है। तो क्या मैं कह सकता हूं एक प्रोकैरियोटिक सेल जो है वो आपका 10 गुना छोटा होता है एक यूकैरियोटिक सेल से? या इसी बात को घुमा दूं, एक यूकैरियोटिक सेल 10 गुना बड़ा होता है एक प्रोकैरियोटिक सेल से? क्या ये बात निकाल सकता हूं यहां से? बिल्कुल निकाल सकते हैं सर। अब एनसीआरटी में लिखा हुआ है कि टिपिकल प्रोकैरियोटिक मीटर है। लेकिन जो बैक्टीरिया है इसका साइज तीन से पाँच माइक्रोमीटर है। अब आप सोचोगे कि सर बैक्टीरिया ही तो प्रोकैरियोटिक बताई गई है। बैक्टीरिया की लेंथ, लेंथ तो हमेशा लंबी होती है ना दोस्त। अगर मेरी आप लेंथ की बात करें, मेरी हाइट की बात करें तो वो 5 फुट 8 इंच है। पर क्या मेरा साइज भी 5 फुट 8 इंच है? क्या मैं चौड़ाई में भी उतना ही हूं? नहीं। अगर आप मेरा ओवरऑल साइज निकालेंगे तो इट विल बी लेसर देन माय लेंथ, है ना? क्योंकि लेंथ और ब्रेड्थ को एडजस्ट करके आपका एक ओवरऑल साइज निकलता है। तो लेंथ जो है हमेशा लंबी मिलेगी आपको और ओवरऑल साइज जो मिलेगा ये छोटा मिलेगा। जैसे एनसीआरटी में माइकोप्लाज्मा जो है इसका आपको लेंथ बता रखा है कितना? 0.3 माइक्रोमीटर। और पीपीएलओ जो है, प्लूरोनिक ऑर्गेनिज्म जो माइकोप्लाज्मा ही है उसका साइज बता रखा है 1 माइक्रोमीटर। तो बच्चे कंफ्यूज हो जाते हैं सर ये कैसे दोनों चीजें सेम ही तो हैं? पीपीएलओ एक टाइप का माइकोप्लाज्मा ही तो है। एकदम सही बात मेरे भाई। पर एनसीआरटी में बहुत प्यार से एक चीज जो है छोटा सा पॉइज़न जो है आप लोगों के लिए रिलीज कर दिया गया है। जो माइकोप्लाज्मा है उसमें लेंथ बता रखी है। तो लंबाई बढ़ी ना भाई 0.3 माइक्रोन। और पीपीएलओ का ओवरऑल साइज बता रखा है। तो ओवरऑल कम आया दैट इज 1 माइक्रोन के आसपास। तो ऐसी चीजें आपको देखनी होती हैं। एक-एक शब्द पर फोकस करना होता है तब जाकर एनसीआरटी आपको मजा दिलवा पाती है, राइट। जैसे यहां पर देखिए माइकोप्लाज्मा जो है इसकी लेंथ बता रखी है 0.3 माइक्रोमीटर और पीपीएलओ जो है इसका साइज है 1 माइक्रोमीटर। दोनों सेम ही चीजें हैं, पीपीएलओ यानी प्लूरोनिक ऑर्गेनिज्म इज आल्सो टाइप ऑफ माइकोप्लाज्मा। लेकिन मेरे भाई इसका साइज बता रखा है तो लेंथ से तो छोटा ही होगा ना। वायरस जो है ये और छोटा होता है 0.02 टू 0.2 माइक्रोमीटर। फिर भी दुनिया का सबसे स्मॉलेस्ट सेल माइकोप्लाज्मा को ही कहा क्यों? क्योंकि वायरस जो है वो लिविंग थोड़ी है। मैंने आपको अभी समझाया कि वायरस जो है इसके पास खुद का सेल नहीं है। इसको लिविंग ऑर्गेनिज्म नहीं कह सकते। तो दुनिया का सबसे छोटा लिविंग ऑर्गेनिज्म है माइकोप्लाज्मा या पीपीएलओ क्योंकि पीपीएलओ इज आल्सो टाइप ऑफ माइकोप्लाज्मा। तो हम एनसीआरटी में माइकोप्लाज्मा ही पढ़ते हैं। ऑस्ट्रिच एग जो है ये लार्जेस्ट सेल है। लॉंगेस्ट नहीं बोला मैंने, लॉंगेस्ट है नर्व सेल। पतला और लंबा, 1 मीटर लंबा भी हो सकता है ये। लेकिन आपका जो ऑस्ट्रिच एग है, अंडा, ये आपका लंबाई में भी ठीक-ठाक है और चौड़ाई में भी ठीक-ठाक है। तो ये बड़ा है, यह लंबा नहीं है, बड़ा है। तो इट इज द लार्जेस्ट सेल। ये आपको कुछ डायमेंशन देखने को मिली।

अब अगर आप एक सेल को देखें कि एक सेल में क्या-क्या होता है, देन दैट इज गोइंग टू बी वेरी इंटरेस्टिंग। तो आप कुछ सेल्स को कहते हैं टाइप सेल्स। टाइप सेल्स का मतलब अगर मुझे प्लांट पे रिसर्च करनी है तो सबसे इजी मुझे प्लांट का कौन सा सेल मिल जाएगा? सर अनियन का जो आपका पील का सेल है वो मुझे इजीली मिल जाएगा। कहीं पर भी प्याज मिल जाती है। अगर मुझे एनिमल सेल पर रिसर्च करनी है तो सबसे सिंपली मुझे क्या मिल जाएगा? ह्यूमन सेल पे अगर मुझे रिसर्च करनी है तो अपने गाल का सेल, ह्यूमन चीक सेल मुझे आसानी से मिल जाएगा। अगर मुझे फंगस पे रिसर्च करनी है तो सबसे कॉमनली मैं किसको यूज करूंगा? ईस्ट सेल को

मैं आपको पढ़ाऊँगा सेल साइकिल एंड सेल डिवीज़न। तो वहाँ पे इस चीज का ज़िक्र ज़रूर होगा। तो सेंट्रियोल और सेंट्रोसोम सिर्फ़ एनिमल सेल में पाए जाएँगे। तो प्लांट सेल में एब्सेंट। तो चार सी जो है, वो क्या है आपका सेल वॉल- प्लांट में प्रेजेंट, एनिमल में एब्सेंट। सेंट्रल वैक्यूल- प्लांट में प्रेजेंट, एनिमल में एब्सेंट। क्लोरोप्लास्ट- प्लांट में प्रेजेंट, एनिमल में एब्सेंट। सेंट्रियोल सेंट्रोसोम- एनिमल में प्रेजेंट, प्लांट में एब्सेंट। सीधा-सीधा चार सी से पूरा का पूरा खेल खत्म हो जाता है।

ये जो आपका वैक्यूल है, सेंट्रल वैक्यूल सेल के सेंटर पे पाया जाता है। तो न्यूक्लियस को धक्का मार के कोने में भेज देता है। और कई प्लांट सेल्स ऐसे होते हैं जिनमें वैक्यूल का साइज़ जो है, बहुत बड़ा होता है। एक सेल का 90% हिस्सा सिर्फ़ वैक्यूल ही कवर कर लेता है। इतना बड़ा भी हो सकता है आपका वैक्यूल। Now, this is a typical cell। एक सेल है जिसको हमने देखा। इसमें हमने सेल वॉल भी बना ली, ऊपर वाली काली लेयर और अंदर वाली लाल लेयर। हमने सेल मेंब्रेन भी बना ली, राइट? अब हमने इसमें बना लिया न्यूक्लियस, जो कि एक डेंस स्ट्रक्चर है। इस पे मेंब्रेन पाई जाती है, क्योंकि ये यूकैरियोटिक सेल है। अगर मैं प्रोकैरियोटिक सेल बनाता तो इसमें मैं न्यूक्लियर मेंब्रेन नहीं बनाता। प्रोकैरियोटिक- कैरिन का मतलब न्यूक्लियस। ऐसे सेल्स जिनमें न्यूक्लियस नहीं पाया जाता है, जिनमें वेल डिफाइंड न्यूक्लियस नहीं पाया जाता है, न्यूक्लियर मेंब्रेन नहीं पाई जाती है, इनको प्रोकैरियोटिक सेल कहते हैं और जिनमें पाया जाता है उन्हें यूकैरियोटिक सेल्स कहते हैं। यू का मतलब होता है ट्रू, कैरिन का मतलब न्यूक्लियस। तो ट्रू न्यूक्लियस यहां पर पाया जा रहा है, तो ये कैसा सेल है आपका? यूकैरियोटिक सेल है। अगर नहीं दिखने को मिलता, ऐसा स्ट्रक्चर यहां पे, नंगा-पुंगा आपका डीएनए पड़ा हुआ है, नेकेड डीएनए। इसके ऊपर न्यूक्लियर एनवेलप नहीं है, ये न्यूक्लियस में नहीं पाया जा रहा, तो ये कैसा सेल होगा? प्रोकैरियोटिक सेल होगा। आप मात्र देख के ही बता सकते हो कि कौन सा सेल प्रोकैरियोटिक है, कौन सा आपका यूकैरियोटिक है। तो यहां पर हम क्या कर लेते हैं, यूकैरियोटिक सेल की बात कर लेते हैं। तो यूकैरियोटिक सेल में सेल मेंब्रेन, सेल वॉल हमने बना दिया। बीच का जो हिस्सा दिख रहा है आपको सफ़ेद-सफ़ेद, इस हिस्से को हम लोग क्या कहते हैं? साइटोप्लाज़्म। साइटो का मतलब सेल, प्लाज़्म- प्लाज़्मा मतलब इसका मेन कंटेंट है वाटर। तो साइटोप्लाज़्म जो है, इसी वाटर में आपके मेन बॉडी के केमिकल रिएक्शंस होते हैं, मेटाबॉलिक रिएक्शन होते हैं और मेटाबॉलिज्म के बिना ज़िंदा रहना असंभव है। जैसे सेल इज़ द स्ट्रक्चरल एंड फंक्शनल यूनिट ऑफ़ लाइफ़। सेल के बिना ज़िंदा रहना मु-मुश्किल है, असंभव है। इसी प्रकार से अगर सेल के अंदर रिएक्शंस नहीं होंगे तो सेल का भी कोई वजूद नहीं रह जाएगा। तो यहां पर सेल के अंदर जो रिएक्शन होते हैं, साइटोप्लाज़्म में होते हैं। इसीलिए साइटोप्लाज़्म को कहा जाता है, इट इज़ द मेन एरीना ऑफ़ सेल्यूलर एक्टिविटीज़। यहां सारे के सारे आपके रिएक्शंस होंगे, राइट? तो इट इज़ सेमी-फ़्लूइड इन नेचर, क्योंकि इसमें पानी भी है और आपका यहां पर यूकैरियोटिक सेल है तो ऑर्गेनल्स भी भरी हुई हैं। तो इट इज़ सेमी-फ़्लूइड। अगर आप प्रोकैरियोटिक सेल की बात करें तो एनसीईआरटी में फिर से छुपाकर एक बात लिख दी है, फ़्लूइड लिख दिया है। कैसे? अगर समझ लीजिए मेरे पास एक बोतल है, ठीक है? ये बोतल जो है, ये है प्रोकैरियोटिक सेल। प्रोकैरियोटिक सेल में कोई मेंब्रेन बाउंड ऑर्गेनेल तो होती नहीं है, कोई मेंब्रेन बाउंड ऑर्गेनेल तो है नहीं। तो साइटोप्लाज़्म पूरा पानी-पानी है, बीच में छोटी-मोटी चीजें डली हुई हैं। तो मेन इसका कंटेंट क्या है? लिक्विड है यानी फ़्लूइड। लेकिन व्हेन इट कम्स टू अ यूकैरियोटिक सेल, तो इसके अंदर कई सारी चीजें डली हुई हैं- एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम, गोलजी कॉम्प्लेक्स, क्लोरोप्लास्ट। तो ये लिक्विड नहीं रहता, थोड़ा सा क्या हो जाता है? सॉलिडिफ़ाईज़ है, सेमी-फ़्लूइड हो जाता है। इसीलिए अगर आपको स्पेसिफ़िकली पूछा जाए कि साइटोप्लाज़्म सेमी-फ़्लूइड किसमें है और फ़्लूइड किसमें, तो आप आसानी से बता सकते हैं। देयर इज़ अ लॉजिकल रीज़न। और एनसीईआरटी में इतनी गहराई में कोई नहीं जाता। आप किसी का भी लेक्चर उठाकर के देखेंगे, दोनों जगह सेमी-फ़्लूइड ही लिखवाए टीचर आपको। लेकिन ये जो बहुत छोटी सी बात है, इस पर किसी ने अगर स्टेटमेंट बेस्ड क्वेश्चन बना दिया तो गड़बड़ हो जाएगी। ज़्यादातर बच्चे जो हैं, वहीं पर चकित रह जाएँगे उस क्वेश्चन को देख के। हम लेकिन फोड़ देंगे उस क्वेश्चन को, राइट? एनसीईआरटी में देखिएगा और कन्फ़र्म करिएगा मैं सही कह रहा हूँ या नहीं। ठीक है? तो दिस इज़ साइटोप्लाज़्म। ये ही जो है, वॉल्यूम ऑक्यूपाइड की, यानी सेल में ऑर्गेनल्स प्रेजेंट हैं, बची हुई जितनी जगह है वो आपका साइटोप्लाज़्म है। जैसे अगर मैं अपने कमरे की बात करूँ, कमरे में काफ़ी सारा सामान रखा हुआ है, बचे हुए सारे के सारे स्पेस में हवा है, बाय डिफ़ॉल्ट। ऐसे ही सेल में साइटोप्लाज़्म ही भरा रहता है, पानी ही भरा रहता है। तो इट इज़ द मेन एरीना ऑफ़ सेल्यूलर एक्टिविटीज़ और इन्हीं सेल्यूलर एक्टिविटीज़ की वजह से हमारा सेल लिविंग स्टेट में रहता है, ज़िंदा रहता है। और ऐसा कोई सेल नहीं दुनिया का जिसमें सेल मेंब्रेन ना हो और अंदर साइटोप्लाज़्म ना हो और राइबोसोम ना हो। ये तीन चीजें ऐसी हैं जो हर सेल में पाई जाएँगी। कोई मुझे कहे कि सर सेल ड्रॉ कर दो, एक गोला तो ड्रॉ करूँगा, दैट इज़ सेल मेंब्रेन। सब में होगी और एक जैसी होगी, लिपिड और प्रोटीन की बनी हुई। उसके अंदर क्या माल भरा रहेगा? आपका साइटोप्लाज़्म। ये भी सब में होगा, भाई हमारी बॉडी बनी ही 70% वाटर की है, वो सेल के अंदर का ही तो पानी है। और राइबोसोम- प्रोटीन फैक्ट्री। बिना प्रोटीन के काम नहीं हो सकता हमारी बॉडी के अंदर, हमारे सेल्स के अंदर, हर सेल में बिना किसी एक्सेप्शन के राइबोसोम पाए ही पाए जाते हैं। इसमें कोई भी दिक्क़त नहीं है। तो राइबोसोम जो है, ये आपके क्यों पाए जाते हैं हर सेल में? क्योंकि इन पे कोई मेंब्रेन नहीं होती। अगर इन पे मेंब्रेन होती तो क्या ये प्रोकैरियोटिक सेल में मिल पाते? नहीं सर, प्रोकैरियोटिक सेल में तो मेंब्रेन बाउंड ऑर्गेनेल्स होती ही नहीं है। तो ये राइबोसोम यूनिवर्सल क्यों है? क्योंकि इस पे कोई मेंब्रेन नहीं है, ये हर जगह पाया जा सकता है, राइट? और ये आपका इसीलिए यूनिवर्सल कहलाता है। ये आपका साइटोप्लाज़्म में भी पाया जा सकता है। यूकैरियोटिक सेल की अगर आप बात करें तो एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम के साथ ये बाइंडिंग कर लेता है और एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम पे गोल-गोल दाने जब बाइंडर जाते हैं तो उसे हम कहते हैं रफ एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम, खुरदुरा सा हो जाता है एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम। तो एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम पे भी मिल सकता है और आपके यूकैरियोटिक सेल में माइटोकांड्रिया और क्लोरोप्लास्ट के अंदर भी ये मिल सकता है। अगर आप प्रोकैरियोटिक सेल की बात करें तो प्रोकैरियोटिक सेल में जो राइबोसोम है, कहाँ मिलेंगे? प्लाज़्मा मेंब्रेन के साथ एसोसिएटेड। एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम तो है नहीं कोई। तो मेंब्रेन चाहिए बैठने के लिए, तो प्लाज़्मा मेंब्रेन के ऊपर, मेन जो सेल मेंब्रेन है, इसके ऊपर आपके राइबोसोम बैठ सकते हैं। यहां-यहां-यहां-यहां आपके राइबोसोम बैठ सकते हैं। तो प्रोकैरियोटिक सेल में प्लाज़्मा मेंब्रेन के साथ एसोसिएटेड मिलेंगे और आपका जो यूकैरियोटिक सेल है, इसमें आपके कहाँ देखने को मिलेंगे मेरे दोस्त? आपका एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम के ऊपर भी मिल जाएँगे, माइटोकांड्रिया और क्लोरोप्लास्ट के अंदर भी मिल जाएँगे। बहुत ज़रूरी बात है, राइट? इन्हें पैलेड पार्टिकल्स कहा जाता है, क्यों? क्योंकि राइबोसोम की डिस्कवरी करी थी सर जॉर्ज पैलेड ने 1953 में। कुछ याद आया? इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की एडवांसमेंट स्टार्ट हो चुकी थी 1950 में। छोटी-मोटी चीजें भी दिखने लगी थीं। 15 से 20 नैनोमीटर का साइज़ है, फिर भी दिखने लगी थी। तो 1953 में इसकी डिस्कवरी हुई। इसको प्रोटीन फैक्ट्री कहते हैं और ये स्मॉलेट ऑर्गेनेल है, फिर भी इसकी डिस्कवरी हो चुकी थी। 1950 में इसे प्रोटीन फैक्ट्री क्यों कहते हैं? क्योंकि प्रोटीन बनने का फार्मूला क्या है? सबसे पहले डीएनए से क्या बनता है? आरएनए बनता है और आरएनए से प्रोटीन बनता है। तो डीएनए से आरएनए बनता है विद द हेल्प ऑफ़ अ प्रोसेस कॉल्ड एज़ ट्रांसक्रिप्शन और आरएनए जो है, फिर प्रोटीन में कन्वर्ट होता है। तो आरएनए नाम का जो धागा है, लाल कलर का, इसके ऊपर कई सारे आपके राइबोसोम- ये जो पर्पल कलर के मैंने बनाए हैं- बाइंडर जाते हैं। बहुत सारे राइबोसोम बाइंडर चुके हैं सिंगल एमआरएनए के स्ट्रैंड पे। इसे हम कहते हैं पॉलीसोम या पॉलीराइबोसोम। बहुत सारे राइबोसोम सेम एमआरएनए के स्टैंड पे वाइंड कर गए, तो आपका पॉलीसोम या पॉलीराइबोसोम स्ट्रक्चर बनता है। पी वाई क्यू में पूछा जा चुका है, राइट? तो जो राइबोसोम है, यह किससे बना है? राइबोसोम बना है प्रोटींस का। यह प्रोटीन बनाता भी है लेकिन खुद भी उन्हीं प्रोटीन का बना होता है और इसमें एक स्पेशल चीज होती है, नाम है राइबोसोम। तो इसमें आरएनए भी होता है, स्पेशल टाइप ऑफ़ आरएनए कॉल्ड एज़ राइबोसोमल आरएनए। तो आरआरएनए इसको कहा जाता है। तो राइबोसोमल आरएनए या आरआरएनए कुछ प्रोटींस के साथ मिल जाता है और बना लेता है ओवरऑल स्ट्रक्चर ऑफ़ योर राइबोसोम। तो इसमें आरआरएनए भी है और प्रोटीन भी और यह जो राइबोसोम है, ये डिफरेंट टाइप के होते हैं इन प्रोकैरियोटिक सेल्स एंड इन यूकैरियोटिक सेल्स। प्रोकैरियोटिक सेल की अगर आप बात करें तो राइबोसोम 70S होगा। 70S मतलब यहां पर यह दो सब यूनिट्स का मिलकर बनेगा, बड़ी सब यूनिट, छोटी सब यूनिट। बड़ी सब यूनिट, छोटी सब यूनिट। तो सेवन इज़ एन ऑड नंबर। तो इसकी दोनों सब यूनिट कैसी होंगी? 50S और 30S। फाइव इज़ आल्सो एन ऑड नंबर, थ्री इज़ आल्सो एन ऑड नंबर। सिमिलरली आपका 80S राइबोसोम जो है, पाया जाता है यूकैरियोटिक रेटिकुलम के साथ, माइटोकांड्रिया और क्लोरोप्लास्ट में भी 70S राइबोसोम पाया जाता है। यानी जैसा प्रोकैरियोटिक में भी पाया जा सकता है। माइटोकांड्रिया और क्लोरोप्लास्ट के अंदर जो रफ एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम के साथ जुड़े हुए राइबोसोम होंगे, वो कैसे होंगे? 80S होंगे। एट इज़ एन इवन नंबर, तो उसकी सब यूनिट्स भी क्या होंगी? 60S और 40S। सिक्स एंड फोर आर आल्सो इवन नंबर्स। ऐसे आप याद कर सकते हैं, कन्फ़्यूज़न नहीं होगी। ये S क्या है सर? 70S, 30S, 50S, 60S, 40S क्या है? ये S? S इज़ अ यूनिट जिसे कहते हैं स्वेदबर्ग यूनिट, क्योंकि श्वेदबर्ग नाम के साइंटिस्ट ने इस यूनिट को दिया था या इसे कहते हैं सेडिमेंटेशन कोफ़िशिएंट, कि कितना कोई चीज सेडिमेंट हो पा रही है। भाई एक कांच का ग्लास लीजिए, उसमें पानी भरिए, उसमें थोड़ी सी मिट्टी मिलाइए और उस ग्लास को टेबल पर रख के छोड़ दीजिए। मिट्टी कुछ देर में सेडिमेंट हो जाएगी, नीचे की साइड बैठ जाएगी। उसका क्या सेडिमेंटेशन हो चुका है? यस। भारी मॉलिक्यूल नीचे आ जाते हैं, हल्के मॉलिक्यूल ऊपर रह जाते हैं। दिस इज़ द प्रोसेस ऑफ़ सेडिमेंटेशन। तो सिमिलरली यहां पर सर 50S + 30S = 80S होता है, 70S कैसे आया? 60S + 40S = 100S होता है, 80S कैसे आया? कैसे आया? क्योंकि ये जो है, ये जो S है, दिस इज़ अ मेज़र ऑफ़ डेंसिटी और साइज़, नॉट वेट। ऐसा नहीं है कि आपने 30S पे 50S मिला दिया और 80S आपका वेट हो गया। नहीं, ये साइज़ है। समझ लीजिए मैंने एक कंबल ओढ़ लिया, मुझे बहुत सर्दी लग रही है, है ना? मैंने कंबल ओढ़ लिया। क्या इस कंबल की डेंसिटी और मेरी डेंसिटी बराबर है? नहीं सर, कंबल तो बहुत हल्का है। तो ये जो मेरी डेंसिटी है और कंबल की डेंसिटी अगर मिक्स हो गई तो ओवरऑल डेंसिटी तो हमारी मीडियम लेवल पे आ गई ना, हमारी डेंसिटी मीडियम लेवल पे आ गई। मेरी बॉडी ज़्यादा डेंस है, कंबल तो आपका बहुत ही हल्का है, बहुत फुरफुरा सा है। तो अल्टीमेटली इसकी डेंसिटी उतनी नहीं है, राइट? तो यहां पर क्या हुआ मेरे दोस्त? देखा गया कि जब आपका 30S यूनिट और 50S यूनिट, इनको आप अलग-अलग जब डालते हो एक टेस्ट ट्यूब में जिसमें आप डेंसिटी नाप सकते हो चीजों की, तो 30S को जब डाला तो 30S के लेवल पे ही ये मिला। 50S को जब डाला तो 50S के लेवल पे ये मिला। लेकिन जब दोनों को जोड़ के डाला तो इनकी डेंसिटी अलग-अलग थी। तो हमें लगा कि इनका वेट जो है वो कंबाइन हो जाएगा, 30 + 50। लेकिन नहीं भैया, इनकी डेंसिटी जो है आपकी मीडियम लेवल पे आ गई। ये दोनों जो हैं 70 लेवल पे मिले हमें देखने के लिए। इसीलिए इसको बोला 70S और 40S को जब डाला तो 40S के लेवल पे टिका। 60S को डाला तो 60S के लेवल पे टिका। दोनों को जोड़ के जब डाला तो ये 100S पे नहीं, 80S पे मिला। इसीलिए इन दोनों के सम को क्या बोल डाला? 80S बोल डाला। तो इट इज़ नॉट अ डायरेक्ट सम ऑफ़ वेट, कि दोनों का वेट बढ़ा दिया, भाई 5 किलो + 5 किलो = 10 किलो। नहीं, यहां पर क्या है? आप डेंसिटी की बात कर रहे हो। एक चीज बहुत हल्की है, एक चीज बहुत भारी है। तो दोनों को जब आप जोड़ो तो आपकी डेंसिटी जो है, कहीं ना कहीं कम हो जाएगी ना। भारी वाला जो है, उस पर हल्का वाला सामान आपने ऐड कर दिया, तो ओवरऑल डेंसिटी कहीं बीच में आ जाएगी, थोड़ी सी हल्की हो जाएगी। That’s why यहां पर ये चीज हमको देखने को मिलती है। करेक्ट? सो, दीज़ आर द थिंग्स जो कि हम लोगों ने समझी। अब ये जो आपका यूकैरियोटिक सेल है, इसमें न्यूक्लियस पाया गया। न्यूक्लियस के अंदर होते हैं क्रोमोसोम और क्रोमोसोम के अंदर पैक्ड होता है हमारा जेनेटिक मटेरियल जिसको हम कहते हैं डीएनए। ये सारी चीजें हम लोग बहुत डिटेल में पढ़ेंगे। तो एक सेल के अंदर होता है न्यूक्लियस, सेल का दिमाग जिसको न्यूक्लियस कहा जाता है। उसके अंदर होते हैं कई क्रोमोसोम। जैसे हमारा कोई अगर डिप्लॉयड सेल है, मेरे हाथ का सेल है, मेरे गाल का सेल है, उसमें 46 क्रोमोसोम्स देखने को मिलेंगे और उसी में हमारा डीएनए जो है, पैक्ड होता है। तो दीज़ आर सम थिंग्स रिलेटेड टू द ओवरव्यू ऑफ़ सेल। जनरल-जनरल बातें हमने यहां पर कर डाली। अब देखिए, अब हम यहां पर बात करते हैं प्रोकैरियोटिक सेल की। राइट? Now, let’s talk about the prokaryotic cell। प्रोकैरियोटिक सेल- मतलब प्रो का मतलब प्रिमिटिव, कैरिन का मतलब न्यूक्लियस। यानी ये जो है, ऐसे सेल्स हैं जिनमें न्यूक्लियस जो है, वो बढ़िया तरीके से डेवलप्ड नहीं है। तो वेल डिफाइंड न्यूक्लियस यहां पर देखने को नहीं मिलता। कोई मेंब्रेन बाउंड स्ट्रक्चर यहां पर देखने को नहीं मिलता। नंगा-पुंगा यहां पर जेनेटिक मटेरियल पाया जाता है। तो यहां पे डबल स्टैंडर्ड सर्कुलर डीएनए है, गोल-मटोल जिसको हम लोगों ने क्या बोल डाला? जिसको हम लोगों ने बोल डाला न्यूक्लियोइड या फिर इसको हम कह सकते हैं जीनोफोर। तो इसको हम लोगों ने न्यूक्लियोइड कह दिया या बैक्टीरिया का सिंगल क्रोमोसोम कह दिया या जीनोफोर कह दिया। तीनों नाम इसी के हैं। तो ये जो डीएनए है, इस पे कुछ प्रोटींस भी आकर के बाइंडर हैं और ये प्रोटींस कैसे हैं? आपका डीएनए जो है, इट इज़ एसिडिक। डीएनए का फुल फॉर्म क्या है? डीऑक्सीराइबोज़ न्यूक्लिक एसिड। इट इज़ एसिडिक। तो एक एसिडिक चीज के साथ क्या बाइंडर आओगे? बेसिक चीज बाइंडर होगे ना, तब जाके बाइंडिंग अच्छी होगी। तो उसके साथ हम बेसिक प्रोटींस बाइंडर हैं। तो इन्हें कहते हैं पॉलीएमाइन प्रोटींस। पॉलीएमाइन यानी यहां पर आपके हिस्टोन प्रोटींस एब्सेंट होते हैं। वो यूकैरियोटिक ग्रुप में ज़्यादा होते हैं क्योंकि अमीनो ग्रुप जो है, इट इज़ बेसिक इन नेचर। तो डीएनए, व्हिच इज़ डीऑक्सीराइबोज़ न्यूक्लिक एसिड, इसके साथ बाइंडर जाता है आपका प्रोटीन और ये स्ट्रक्चर स्टेबलाइज़ हो जाता है। इस पूरे स्ट्रक्चर को मिलाकर हम लोग न्यूक्लियोइड कह देते हैं या जीनोफोर कह देते हैं। अब ये मेन डीएनए है आपका बैक्टीरिया का या फिर प्रोकैरियोटिक सेल का। इसके अलावा छोटे-छोटे डीएनए के सर्कुलर टुकड़े कई सारे बैक्टीरिया में पाए जा सकते हैं। इन छोटे-छोटे टुकड़ों को, व्हिच आर फाउंड एक्स्ट्रा क्रोमोसोमल। ये जो आपका सिंगल क्रोमोसोम हमने बोला है बैक्टीरिया का, इसके अलावा जो छोटा-छोटा डीएनए पाया जा रहा है, जो डबल स्टैंडर्ड सर्कुलर डीएनए पाया जा रहा है, यहां भी दो स्टैंड हैं आपके काले कलर के। ये जो डबल स्टैंडर्ड सर्कुलर डीएनए है, इसको हम लोगों ने क्या बोला? इसको हम लोगों ने प्लाज़्मिड बोला। तो ये मेन क्रोमोसोम से हट के पाया जा रहा है, तो इसको क्या बोला? एक्स्ट्रा क्रोमोसोमल। ये डबल स्टैंडर्ड है, दो रिंग्स मैंने बनाई हैं, तो डबल स्टैंडर्ड, गोल-मटोल है, तो सर्कुलर और ये कैसा है? डीएनए है। तो इट इज़ एक्स्ट्रा क्रोमोसोमल डबल स्टैंडर्ड सर्कुलर डीएनए और ये अपनी कॉपीज़ बना सकता है। ये अपने आप को डिवाइड कर सकता है। लेट्स से यहां पे एक प्लाज़्मिड था, तो इसने अपनी कॉपी बनाकर दो प्लाज़्मिड बनाए। फिर इसने अपनी कॉपी बनाकर तीन प्लाज़्मिड बनाए। तो एक बैक्टीरिया में प्लाज़्मिड्स का नंबर बढ़ सकता है। तो ये अपने आप को रेप्लिकेट कर सकता है, अपनी कॉपीज़ बना सकता है और इसे कॉपीज़ बनाने के लिए इस मेन क्रोमोसोम की इज़ाजत लेने की ज़रूरत नहीं है। तो आप कहते हो प्लाज़्मिड की पूरी डेफ़िनेशन क्या हुई? एक्स्ट्रा क्रोमोसोमल डबल स्टैंडर्ड सर्कुलर डीएनए व्हिच कैन रेप्लिकेट इंडिपेंडेंटली। और इन प्लाज़्मिड में कुछ स्पेसिफ़िक जीन्स पाए जाते हैं, कुछ स्पेसिफ़िक डीएनए के टुकड़े पाए जाते हैं जो कुछ खास प्रोटींस बनाते हैं। जैसे बैक्टीरिया जो है, कई बैक्टीरिया काफ़ी सारे एंटीबायोटिक से रेज़िस्टेंट होते हैं। जैसे कोई बैक्टीरिया है वो क्लोरैम्फ़ेनिकॉल रेज़िस्टेंट है। यानी कि इस बैक्टीरिया को अगर आप क्लोरैम्फ़ेनिकॉल दोगे, मरेगा नहीं। क्यों? बिकॉज़ इसके पास एक ऐसा डीएनए का टुकड़ा है, एक ऐसा जीन है जो एक ऐसा प्रोटीन बनाएगा जो क्लोरैम्फ़ेनिकॉल से इस बैक्टीरिया की रक्षा करेगा। तो इट इज़ रेज़िस्टेंट टू क्लोरैम्फ़ेनिकॉल। कुछ बैक्टीरिया हैं जो टेट्रासाइक्लिन से रेज़िस्टेंट होंगे। कुछ बैक्टीरिया हैं जो एम्पीसिलीन से रेज़िस्टेंट होंगे। कुछ बैक्टीरिया हैं जो पेनिसिलिन से रेज़िस्टेंट होंगे। तो अलग-अलग बैक्टीरिया में उनको रेज़िस्टेंस प्रोवाइड करने के लिए ये छोटे-छोटे जीन्स पाए जाते हैं जो कि किसमें पाए जाते हैं? आपके प्लाज़्मिड में पाए जाते हैं। तो ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस भी देता है। तो मेन हमने बात की सबसे पहले जेनेटिक मटेरियल की, दैट इज़ जीनोफोर या फिर इसको हम कह सकते हैं आपका न्यूक्लियोइड। और उसके बाद हमने प्लाज़्मिड्स की चर्चा की। अगर बैक्टीरिया की आप बात करें तो इसपे सेल वॉल मिलती है एंड सेल वॉल किसकी बनती है बैक्टीरिया में? यू बैक्टीरिया में पेप्टिडोग्लाइकन की सेल वॉल बनती है और अंदर सेल मेंब्रेन होगी जो दुनिया में सबके लिए ही सेम है, लिपिड और प्रोटीन की बनेगी। लिपिड की परसेंटेज और प्रोटीन की परसेंटेज वेरी कर सकती है, अलग-अलग हो सकती है लेकिन बनेगी लिपिड और प्रोटीन की। ये बात शत-प्रतिशत सत्य है। ये बात कोई भी झुठला नहीं सकता, राइट? तो यहां पर आपका इतनी-इतनी बात हो गई है। यहां पर भी फिर सेंटर पे आपका जो है, पूरा का पूरा जो मटेरियल भरा हुआ है, इसको क्या बोलेंगे? साइटोप्लाज़्म बोलेंगे। सेल के अंदर के मटेरियल को। यहीं सारा का सारा लिविंग रिएक्शंस होगा। यानी इट इज़ द मेन एरीना ऑफ़ सेल्यूलर एक्टिविटी। ये बात जो है, सबके लिए कांस्टेंट है, साइटोप्लाज़्म के लिए कांस्टेंट है। अब ये जो सेल वॉल होती है, ये यूज़ुअली सारे प्रोकैरियोटिक सेल्स में पाई जाएगी। तो प्रोकैरियोटिक सेल्स सारे लगभग-लगभग एक जैसे होते हैं। किसी में एक आधी चीज ज़्यादा है, किसी में एक आधी चीज कम है। तो फंडामेंटली दे आर सिमिलर लेकिन एक आधी चीज ऊपर-नीचे हो सकती है। जैसे एक प्रोकैरियोटिक प्लाज़्मा, अभी पढ़ा था इसके बारे में, कि ये स्मॉलेट लिविंग सेल है, इसमें सेल वॉल नहीं पाई जाती। इसीलिए इस माइकोप्लाज़्मा को कहा जाता है जोकर ऑफ़ प्लांट किंगडम। क्यों भैया जोकर क्यों कहा गया? क्योंकि मेरे भाई ये जो आपका माइकोप्लाज़्मा है, इस पे सेल वॉल नहीं है। सेल वॉल आपके सेल को शेप और स्ट्रक्चर प्रोवाइड करती है, क्योंकि ये रिजिड है, ये अंबुजा सीमेंट की बनी है। जब कोई सेल नया-नया बनता है ना, तो उसकी सेल वॉल फ़्लेक्सिबल होती है। लेकिन एक बार जब सेल ग्रो कर जाता है तो ये जो सेल वॉल है, ये अपनी प्रॉपर शेप एंड साइज़ अटेन कर लेती है और फिर ये सेल की शेप को चेंज नहीं होने देती। सेल की रक्षा करना इसका काम है। तो ये बहुत ज़्यादा फ़्लेक्सिबल नहीं होती, इट इज़ रिजिड, ये अंबुजा सीमेंट की बनती है। तो अब अगर माइकोप्लाज़्मा पे अंबुजा सीमेंट की वॉल नहीं है तो माइकोप्लाज़्मा तो अपनी शेप को बदल पाएगा ना, जैसे जोकर आपको अलग-अलग भेस बनाकर के हंसाता है, ऐसे ही माइकोप्लाज़्मा जो है, ये भी अपनी शेप को चेंज कर सकता है। इसीलिए इसको प्लियोमॉर्फिक कहा या जोकर कहा। प्लियोमॉर्फिक मतलब अपनी मॉर्फोलॉजी, अपनी शेप को ये चेंज कर सकता है। तो ये जो सेल वॉल है, रिजिड, सीमेंट की बनती है। अंदर जो सेल मेंब्रेन है, ये फ़्लेक्सिबल है। तो सेल वॉल तो फ़्लेक्सिबल नहीं है, तो ये आपकी खींच नहीं सकती। इस प्रकार से ये जो स्ट्रक्चर बना है, ये सेल वॉल नहीं बना सकता। तो सेल वॉल बाहर की साइड बनी हुई है, वाले कलर से। क्या मैंने इसको एक्सटेंड किया है या अंदर वाली लाल लेयर को एक्सटेंड किया है? सर आपने लाल लेयर को एक्सटेंड किया है। क्यों? क्योंकि बाहर वाली जो काली लेयर है, ये तो एक्सटेंड हो ही नहीं सकती। ये तो आपका एक्सटेंड नहीं हो सकती। दैट्स व्हाई फ़्लूइड होता है। ये आपकी ग्रो कर सकती है आराम से। दैट्स व्हाई साइड फ़ोल्डिंग कर दी सेल मेंब्रेन की। क्रोमेटोफोर बनाया है। ये जो अंदर की साइड ट्यूब जैसी फ़ोल्डिंग बना दी, गोल-मटोल वेसाइकल जैसी फ़ोल्डिंग बना दी, रेटिकुलर आपकी इरेगुलर सी फ़ोल्डिंग बना दी। ये जो आपकी फ़ोल्डिंग्स हैं, ये सारी की सारी सेल मेंब्रेन में हो रही है, सेल वॉल में नहीं। तो ये जितनी भी चीज हैं, चाहे अंदर की साइड फ़ोल्ड हो रही हो सेल मेंब्रेन, दैट इज़ इनवेजिनेशन। अंदर की साइड या बाहर की साइड फ़ोल्ड हो रही हो आपकी सेल मेंब्रेन, दैट इज़ इवेजिनेशन। ई का मतलब एग्ज़िट लेना, बाहर की साइड। ये सारा का सारा काम सेल मेंब्रेन में हो रहा है बिकॉज़ इट इज़ सुपर फ़्लेक्सिबल। सेल वॉल ये सब काम नहीं कर सकती। तो ज़िन्दगी में कोई भी सवाल पूछ ले कि भैया फ़्लैजेल्ला कैसे बनता है? सेल मेंब्रेन की एक्सटेंशन से। मीज़ोसोम कैसे बनता है? सेल मेंब्रेन के एक्सटेंशन से। क्रोमेटोफोर कैसे बनता है? सेल मेंब्रेन के एक्सटेंशन से। आपका सेल वॉल का उसमें कोई खास रोल नहीं है, राइट? तो यहां पर ये जो स्ट्रक्चर हमको देखने को मिला, ये जो स्ट्रक्चर है, ये आपका मोटिलिटी प्रोवाइड करता है बैक्टीरिया को। तो कई बैक्टीरिया मोटाइल होते हैं। अगर वो मोटाइल हैं तो उनमें फ़्लैजेल्ला मिलेगा और ये जो फ़्लैजेल्ला है, ये सेल मेंब्रेन से एक्सटेंड होगा। लेकिन किसको फाड़ के बाहर निकलेगा? सेल वॉल को। बाहर की लेयर है सेल वॉल, उसको फाड़ के बाहर निकलेगा ना? तो एनसीईआरटी में दो शब्द लिख रखे हैं, फ़्लैजेल्ला इज़ एक्सटेंशन ऑफ़ सेल मेंब्रेन। किसकी एक्सटेंशन है? सेल मेंब्रेन की।

तो फ्लेक्सिबल है तो एक ट्यूब की जगह दो ट्यूब बन गई और ये दोनों ट्यूब अलग-अलग अलग-अलग दूर-दूर जाती रहती है। एक सेल में तो डीएनए भी डिस्ट्रीब्यूटर, वॉल फॉर्मेशन, डीएनए रेप्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन। और अगर यह फ्लेक्सिबल है तो कोई मटेरियल सेल के अंदर भी ले सकती है, कोई मटेरियल सेल के बाहर भी भेज सकती है। यानी एंडोसाइटोसिस या फिर सेक्रेशन, किसी चीज को सिक्रेट कर सकती है, अंदर भी ले सकती है। सारे काम कौन करेगा? आपका मेसोसोम करेगा। तो सेल वॉल भी बना सकती है, डीएनए रेप्लिकेशन और डिस्ट्रीब्यूशन है, रेस्पिरेशन यानी माइटोकांड्रिया का काम भी कर सकती है और सेक्रेशन, चीजों को बाहर भी भेज सकती है। क्योंकि इसका सरफेस एरिया बहुत ज्यादा है तो ये खूब सारी एनर्जी बना सकती है। हमारा जो माइटोकांड्रिया है, आज ही मैं आपको पढ़ाऊंगा, उसकी जो इनर मेंब्रेन है वो भी इनफोल्डेड होती है, उसपे क्रिस्टे नाम के स्ट्रक्चर बन जाते हैं। क्योंकि उसे भी अपना सरफेस एरिया बढ़ाना है तो वहां भी जो है कुछ स्ट्रक्चर्स बनते हैं। ऑलराइट सो अंदर की साइड फोल्डिंग हो गई, यह बन गया मेसोसोम। काम क्या है? सेल वॉल फॉर्मेशन, डीएनए रेप्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन, सेक्रेशन और आपका रेस्पिरेशन। ठीक है? अंदर की साइड मेंब्रेन और फोल्ड हो सकते हैं और इस पर पाए जा सकते हैं अलग-अलग पिगमेंट्स। तो पिगमेंट्स किसमें पाए जाएंगे? ऐसे बैक्टीरिया में जो खाना बना सकते हैं, जो फोटोसिंथेसिस कर सकते हैं। तो इन्हें कहा जाता है क्रोमेटोफोर। इस डंडे जैसे स्ट्रक्चर को बोला जाता है क्रोमेटोफोर। क्रोमा का मतलब कलर, तो कलरफुल पिगमेंट यहां पर पाए जाते हैं। जैसे ब्लू ग्रीन एल्गी में क्योंकि खाना बना सकता है, साइनोबैक्टीरिया, तो उसमें क्रोमेटोफोर पाया जाएगा।

और कुछ स्पेशल स्ट्रक्चर्स पाए जाते हैं आपके प्रोकैरियोटिक सेल में, जिन्हें हमने क्या कह डाला? इंक्लूजन बॉडीज। अब प्रोकैरियोटिक सेल है तो मेंब्रेन बाउंड ऑर्गनेल तो होती नहीं है, राइट? तो इनमें नॉन-मेंब्रेन बाउंड स्ट्रक्चर है। एक जैसी जो चीजें हैं वो आकर एक जगह इकट्ठी हो गई। जैसे फॉस्फेट मॉलिक्यूल है, एक जगह आकर के इकट्ठे हो गए, बन गया फॉस्फेट ग्रेन्यूल। फ्रीली पाया जा रहा है, फॉस्फेट स्टोर कर रहा है, कोई मेंब्रेन नहीं है इसके ऊपर। है ना? कोई पिगमेंट है, उसके लिए पाया गया साइनोफाइसिन ग्रेन्यूल, पिगमेंट स्टोर कर लेगा। ग्लाइकोजन है तो ग्लाइकोजन स्टोर कर लेगा। तो दिस कैन बी ग्लाइकोजन ग्रेन्यूल। साइनोफाइसिन ग्रेन्यूल होते हैं क्योंकि मेंब्रेन बाउंड ऑर्गनेल यहां पे कोई है ही नहीं। नहीं तो दे आर मेंब्रेनलेस, स्टोरेज के लिए यूज़ होते हैं। एंड एक स्पेशल टाइप का इंक्लूजन है, कॉल्ड गैस वैक्यूल। इसमें गैस भरी जाती है तो ये आपका बैक्टीरिया को तैरने में हेल्प करता है, बायोयेंसी देने में हेल्प करता है। इट इज कॉल्ड गैस वैक्यूल, जो कहां पाया जाएगा? आपका ब्लू ग्रीन बैक्टीरिया में यानी ब्लू ग्रीन एल्गी में एज वेल एज आपका पर्पल ग्रीन फोटोसिंथेटिक बैक्टीरिया में। इनमें गैस वैक्यूल पाया जाएगा। तो पूछा जाए कि गैस वैक्यूल कहां पाया जाता है तो ये नॉर्मल हमारा यूकैरियोटिक वैक्यूल नहीं है, गैस वैक्यूल है, कोई मेंब्रेन नहीं है इसके ऊपर। एक बुलबुला सा है जिसके अंदर गैस भरी हुई है जो कि बैक्टीरिया को तैरने में हेल्प करती है, बायोयेंसी प्रोवाइड करती है। राइट?

अब देखिए जो आपके प्रोकैरियोटिक सेल है, इसमें इंक्लूड कौन-कौन होता है? भाई आपके जितने भी बैक्टीरिया हैं, आपका ब्लू ग्रीन एल्गी है जो कि बैक्टीरिया ही है एक प्रकार का, माइकोप्लाज्मा पीपीएलओ जो कि अगेन किंगडम मोनेरा के मेंबर हैं। ये भी आपके क्या हैं? प्रोकैरियोटिक सेल। पिछली स्लाइड में क्या बताया था? ये 10 गुना छोटे होते हैं आपके टिपिकल यूकैरियोटिक सेल से। तो ये ज्यादा जल्दी डिवाइड कर सकते हैं क्योंकि इनका सेल काफी सिंपल है। तो ये जल्दी-जल्दी आपका क्या करेंगे? डिवाइड कर देंगे। जैसे कि अगर आप ह्यूमन सेल की बात करें तो उसको डिवाइड करने में, टिपिकल ह्यूमन सेल को डिवाइड करने में एक सेल से दो सेल बनाने में कितना टाइम लगता है? सर लगभग 24 घंटे का, एनसीईआरटी का डाटा है, अगले चैप्टर में पढ़ाऊंगा। और एक बैक्टीरिया को, ई कोलाई को डिवाइड करने में कितना टाइम लगता है? एक सेल से दो सेल बनाने में सिर्फ 20 मिनट। क्योंकि स्ट्रक्चर इतना सिंपल है, कुछ करना ही नहीं है, झटपट ये डिवाइड कर जाते हैं बहुत आसानी से। दैट्स व्हाई, अलग-अलग शेप भी हो सकती है। अगर ये गोल-मटोल है तो इनको कोकस कहोगे, रॉड शेप है तो बेसिलस कहोगे, अगर स्प्रिंग शेप है, स्पाइरल शेप है तो स्पाइरल कहोगे और कॉमा शेप है तो विब्रियो कहोगे। चार इनकी सबसे ज्यादा फंडामेंटल शेप्स होती हैं।

नाउ कई सारे बैक्टीरिया में है ना, ज्यादातर प्रोकैरियोटिक सेल में, स्पेसिफिकली बैक्टीरिया में एक आउटर स्ट्रक्चर पाया जाता है जिसे कहते हैं सेल एन्वेलप। तो प्रोकैरियोटिक सेल में आपने देखा सेल मेंब्रेन तो है ही, उसके ऊपर सेल वॉल तो है ही, ज्यादातर प्रोकैरियोटिक में ग्लाइकोकैलिक्स भी पाया जाता है। ग्लाइकोकैलिक्स का मतलब होता है शुगर यानी कार्बोहाइड्रेट और कैलिक्स का मतलब क्या होता है? कवर। यानी यह कार्बोहाइड्रेट का कवर है जो आपको सेल वॉल के भी ऊपर देखने को मिलेगा जो बैक्टीरिया को क्या करता है? रेजिस्टेंस प्रोवाइड करता है। तो बैक्टीरिया के पास एक बहुत ही ज्यादा केमिकल कॉम्प्लिकेशन, मेंब्रेन नाम की लेयर भी है, सेल वॉल नाम की लेयर भी है। ग्लाइकोकॉन्जुगेट्स। सेल के अंदर आएगी कौन सी चीज? सेल के बाहर जाएगी कौन? डिसाइड करता है? गेट पास कौन देता है? सेल मेंब्रेन। दैट्स व्हाई एनसीईआरटी में लिखा हुआ है कि इट इंटरेक्ट विद द आउटसाइड वर्ल्ड। तो हमको ऐसा लगता है कि सर ये तो सबसे अंदर वाली लेयर है तो हाउ कैन इट इंटरेक्ट विद द आउटसाइड वर्ल्ड? आउटसाइड वर्ल्ड से इंटरेक्शन का क्या मतलब है? कि बाहर से कौन सी चीज सेल में आ रही है और सेल से कौन सी चीज बाहर जा रही है। तो ये इंटरेक्शन कौन करेगा? सेल मेंब्रेन करेगा। दूसरी जो आपकी लेयर है, दैट इज सेल वॉल। सेल वॉल बनती है अमूर्त सीमेंट की, रिजिड होती है। तो यह आपके सेल को शेप और स्ट्रक्चर देगी, बैक्टीरिया के सेल को बड़ा नहीं होने देगी, फटने नहीं देगी और उसको छोटा नहीं होने देगी, श्रिंक नहीं होने देगी। यानी इट प्रिवेंट्स द बैक्टीरियल सेल फ्रॉम बर्स्टिंग, फटने से और कोलैप्स होने से, श्रिंक होने से बचाती है। एक प्रॉपर शेप और साइज मेंटेन करके रखती है। जैसे आपका कमरा जो है अब ये छोटा या बड़ा नहीं हो सकता क्योंकि अब ये जो कमरा है आपने सोच समझ के एकदम बराबर डायमेंशन का बना लिया है। वो सेम काम आपका सेल वॉल का है। ग्लाइकोकैलिक्स क्या करती है? आउटर मोस्ट, क्लियर है और डिफेंसिव है। आपने अब एक कोट पहन लिया है, बैक्टीरिया ने कोट पहन लिया है। ग्लाइकोकैलिक्स, यानी कार्बोहाइड्रेट का बना हुआ कोट पहन लिया है तो अब इसको मारना थोड़ा सा मुश्किल है। राइट? तो जब ये कोट ढीला-ढीला होता है तो इसको कहते हैं स्लाइम लेयर, ढीला-ढीला है, है ना? गिलगिस्तान पानी जो है रिटेन हो जाता है। और अगर ये टफ है, मोटा सा लेयर है, कैप्सूल है तो ये आपका मेन प्रोटेक्शन में काम कर रहा होगा। तो दिस इज योर सेल एन्वेलप। और सेल एन्वेलप कैसा है, इस बेसिस पर बैक्टीरिया को दो ग्रुप में डिवाइड कर दिया, ग्राम पॉजिटिव और ग्राम नेगेटिव। सेल एन्वेलप के बेसिस पे, हमेशा याद रखिएगा तीनों लेयर्स जो हैं, इनके बेसिस पे आपने बैक्टीरिया को ग्राम पॉजिटिव और ग्राम नेगेटिव में डिवाइड कर दिया। ग्राम पॉजिटिव बैक्टीरिया पे अगर आप एक स्टेन डालोगे तो वो स्टेन को ले लेगा, उस कलर को रिटेन कर लेगा अपने अंदर तो वो ग्राम पॉजिटिव। ग्राम नेगेटिव की सेल वॉल काफी पतली है, उसका सेल एन्वेलप जो है, उसपे अगर आप स्टेन डालोगे तो वो स्टेन को ले लेगा, स्टेन को धो डालोगे तो स्टेन छोड़ भी देगा। फिर दूसरा स्टेन डालोगे वो ले लेगा, फिर उसको धो दोगे तो वो भी छोड़ देगा। यानी किसी का सगा नहीं है, ग्राम नेगेटिव है, स्टेन को रिटेन नहीं करता, अपने पास नहीं रखता। ग्राम पॉजिटिव वाला बहुत पॉजिटिव है, इस पे आपने एक स्टेन डाल दिया तो स्टेन को पकड़ के बैठ जाता है, ये स्टेन उसका हो जाता है। राइट? तो दैट्स व्हाई बैक्टीरिया को दो कैटेगरी में तोड़ा था, उनका नाम था सर क्रिश्चियन ग्राम, उनके नाम पर ये ग्राम टेक्निक जो है आपकी दी हुई है। राइट?

तो अगर आप देखें तो यहां पर यूकैरियोटिक सेल की बात कर लेते हैं। यूकैरियोटिक सेल जो है इनमें काफी सारे कंपार्टमेंट्स होंगे यानी एक्सटेंसिव कंपार्टमेंटलाइजेशन होगी। क्यों होंगे कंपार्टमेंट्स? क्योंकि मेंब्रेन बाउंड ऑर्गनेल की खुद की मेंब्रेन है, खुद की बाउंड्री है। तो हर ऑर्गनेल अपनी खुद की कंपार्टमेंट बनाकर के बैठा हुआ है। इनमें कॉम्प्लेक्स लोकोमोटरी स्ट्रक्चर पाए जाते हैं। भाई आपका बैक्टीरिया जो था इसमें भी लोकोमोशन के स्ट्रक्चर थे। तो हमारे अंदर कॉम्प्लिकेटेड है, वो किस प्रोटीन का बना है? फ्लेजेलिन प्रोटीन का। और हमारा जो फ्लेजिला है ये किसका बना है? ट्यूब्यूलिन प्रोटीन का। सो वी आर एडवांस्ड। ये जो प्रोटीन है ये एडवांस्ड है, दैट्स व्हाई। एंड साइटोस्केलेटल एलिमेंट्स, जैसे हमारी बॉडी का ढांचा है, जैसे हमारी हड्डियों का ढांचा है, जैसे हमारे कंकाल का ढांचा है। ये मैं आपको दिखा देता हूं। तो जैसे हमारी बॉडी को एक पूरा का पूरा ओवरऑल स्केलेटल सिस्टम मिला हुआ है, ये हमारी बॉडी को एक प्रॉपर शेप, प्रॉपर ओरिएंटेशन प्रोवाइड करता है। इसी प्रकार से सेल के अंदर भी कुछ प्रोटीन्स होते हैं, कुछ प्रोटीन के फाइबर्स होते हैं, फिलामेंट प्रोटीन्स होते हैं जो प्रोटीन को स्ट्रेंथ प्रोवाइड करते हैं। जैसे आपके घर की छत है, इसको बनाने से पहले सरिए डाले गए थे जिसपे कंक्रीट आराम से बाइंड हो जाए। सिमिलरली यूकैरियोटिक सेल का साइज बड़ा है, छोटी चीज बहुत मुश्किल से टूटती है। आप छोटा चौक लीजिए, उसको तोड़ने की कोशिश करिए बहुत मुश्किल से टूटेगा। बड़ा चौक है, गलती से भी आपने हाथ लगा दिया, टूट के हाथ में आ जाएगा। तो बड़े जो सेल्स हैं ना, इनको साइटोस्केलेटल की जरूरत है, प्रोकैरियोटिक सेल को जरूरत नहीं थी। तो यहां पर ये जो साइटोस्केलेटल एलिमेंट्स हैं, इसमें काफी सारे प्रोटीन्स होते हैं जो कि सेल को शेप देंगे, जस्ट लाइक हमारी हड्डियों का ढांचा, सपोर्ट देंगे और मोटिलिटी। मोटिलिटी कैसे देंगे सर? मोटिलिटी ऐसे देंगे कि ये जो आपके साइटोस्केलेटल एलिमेंट्स हैं, इसमें से एक एलिमेंट है माइक्रोट्यूब्यूल। उस माइक्रोट्यूब्यूल से क्या बनेगा? फ्लेजिला बनेगा, ट्यूब्यूलिन प्रोटीन से फ्लेजिला बनेगा। तो साइटोस्केलेटल जो है मोटिलिटी में भी हेल्प करता है। तो तीन प्रकार के आपके साइटोस्केलेटल प्रोटीन्स होते हैं: माइक्रोट्यूब्यूल, माइक्रोफिलामेंट या आपका एक्टिन फिलामेंट भी इसको कह सकते हैं और आपका इंटरमीडिएट फिलामेंट। तो नाम है इंटरमीडिएट फिलामेंट तो इंटरमीडिएट, बीच में इसका साइज होगा, ना ज्यादा बड़ा ना ज्यादा छोटा और माइक्रोट्यूब्यूल सबसे बड़ा और माइक्रोफिलामेंट जो है सबसे छोटा। ये सीक्वेंस आपको याद करना है एज इट इज, करेक्ट?

अब हम यूकैरियोटिक सेल के पहले स्ट्रक्चर के अंदर घुस जाते हैं, दैट फर्स्ट स्ट्रक्चर इज सेल मेंब्रेन। क्योंकि सब में पाया जाता है, यूनिवर्सल है। सेल वॉल तो आपके प्लांट सेल में पाई जाएगी, फंगस में पाई जाएगी, बैक्टीरिया में पाई जाएगी लेकिन सेल मेंब्रेन तो सब में पाई जाएगी। तो इसका स्ट्रक्चर हम लोग देख लेते हैं। तो चाहे प्रोकैरियोटिक सेल मेंब्रेन हो, चाहे किसी ऑर्गनेल की मेंब्रेन हो, चाहे किसी यूकैरियोटिक सेल की सेल मेंब्रेन हो, लगभग-लगभग इनका जो पढ़ने का तरीका है वो सेम रहेगा, इनकी प्रॉपर्टीज ऑलमोस्ट सेम रहेंगी। तो जो सेल मेंब्रेन है, इनकी स्टडीज आरबीसी पे करी गई थी यानी रेड ब्लड सेल पे करी गई थी। क्यों? क्योंकि रेड ब्लड सेल के पास न्यूक्लियस नहीं होता। हमारा जो मैच्योर आरबीसी है वो थोड़ा लालची है, वो चाहता है कि वो अपने अंदर ज्यादा से ज्यादा हीमोग्लोबिन मॉलिक्यूल को स्टोर करे तो वो सारी ऑर्गनेल्स को बाहर निकाल देता है, सिर्फ हीमोग्लोबिन को अपने अंदर स्टोर कर लेता है। तो उसके अंदर न्यूक्लियस और काफी सारी मेंब्रेन बाउंड ऑर्गनेल्स नहीं है तो उसपे एक ही मेन मेंब्रेन है, दैट इज सेल मेंब्रेन। आप किसी और सेल को लेते, लेट्स से आप लीवर सेल को ले लेते तो तो उसमें सेल मेंब्रेन भी है, एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम भी है, गोलजी भी है, माइटोकांड्रिया भी है, सब कुछ है तो कई सारी मेंब्रेन हो जाती ना? तो एक मेंब्रेन की प्रॉपर्टी को कैसे पढ़ पाते आप? एक मेंब्रेन की प्रॉपर्टी को तब पढ़ पाएंगे जब हो ही सिर्फ एक मेंब्रेन। तो हमने आरबीसी को लिया, एक ही मेंब्रेन है इसमें, कंटेमिनेशन नहीं है। तो आरबीसी को लिया और दुनिया की हर मेंब्रेन मेनली लिपिड और प्रोटीन की ही बनती है। राइट? लिपिड जो है ये दो लेयर्स में अपने आप को अरेंज करते हैं क्योंकि सेल जो है के अंदर भी पानी है, सेल के अंदर तो पानी रहता ही है और सेल के बाहर भी, सेल्स के बीच में भी पानी भरा हुआ होता है, जो बीच का स्पेस है, इंटरसेल्यूलर स्पेस, इसमें भी पानी भरा हुआ होता है। तो एक लिपिड जो है उसका स्ट्रक्चर कुछ ऐसा होता है, है ना? इसका एक हेड होता है जिसको कहा जाता है पोलर हेड। क्यों? क्योंकि ये जो लिपिड है दे आर बेसिकली फॉस्फोलिपिड्स, इनमें फॉस्फेट ग्रुप पाया जाता है। तो ये जो पोलर हेड है इसमें फॉस्फेट ग्रुप है और फॉस्फेट है तो चार्ज्ड हेड है तो ये पोलर हो गया। राइट? क्योंकि वाटर जो है ये भी आपका पोलर है। वाटर किससे बना हुआ है? ऑक्सीजन और हाइड्रोजन एटम से। ऑक्सीजन इज मोर इलेक्ट्रोनेगेटिव तो हाइड्रोजन से वो अपनी तरफ इलेक्ट्रॉन खींच लेता है तो इट बिकम्स पार्शियली नेगेटिव और हाइड्रोजन जो है इनके इलेक्ट्रॉन चले गए तो ये थोड़े से पॉजिटिव हो जाते हैं तो वहां भी पॉजिटिव नेगेटिव चार्ज डेवलप हो जाता है वाटर में भी, पानी में भी और यहां भी आपका PO43 नेगेटिव यानी फॉस्फेट ग्रुप पाया जा रहा है तो पानी से इंटरेक्ट कर सकता है आपका ये हेड। खोपड़ी जो है लिपिड की ये पानी से इंटरेक्ट कर सकती है तो ये पानी की तरफ पाई जाती है। सेल के बाहर भी पानी तो बाहर की साइड भी है और सेल के अंदर भी पानी तो अंदर की साइड भी है और आपके यहां पर हाइड्रोकार्बन टेल्स पाई जाती हैं। हाइड्रोजन और कार्बन से बनी हुई हाइड्रोकार्बन टेल्स। तो हाइड्रोजन और कार्बन में ज्यादा इलेक्ट्रोनेगेटिविटी डिफरेंस नहीं है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में बहुत डिफरेंस था, हाइड्रोजन और कार्बन में नहीं है तो यहां पर इलेक्ट्रोनेगेटिविटी डिफरेंस इतना ज्यादा है नहीं मेरे भाई। तो इलेक्ट्रॉन की खींचातानी है नहीं तो ये पोलर नहीं हो पाते, इन पे चार्ज नहीं आ पाता। तो ये जो हाइड्रोफोबिक टेल्स हैं ना ये आपकी क्या हो जाती हैं? नॉन-पोलर हो जाती हैं यानी वाटर के साथ इंटरेक्ट नहीं कर सकती। दैट्स व्हाई दे आर हाइड्रोफोबिक, पानी से डरती हैं और एक खोपड़ी जो है ये पोलर है, ये पानी से दोस्ती कर सकती है तो ये हाइड्रोफिलिक है। तो पानी की तरफ कौन पाया जाएगा? आपका हाइड्रोफिलिक हेड और पानी से दूर कौन पाया जाएगा? आपका नॉन-पोलर टेल यानी हाइड्रोफोबिक टेल। यहां पर देखिए, है ना? यहां पर देखिए आपके जो गोल-मटोल हेड है, आपका जो सेल है, है ना? इसकी मेंब्रेन है ये बहुत बड़ी मेंब्रेन है, गोल-मटोल होके पूरा का पूरा सेल तैयार कर रही है। तो इस सेल के अंदर की साइड भी पानी है, उस साइड भी आपके गोल-मटोल सिर है, लिपिड का हेड है और सेल के बाहर भी पानी है, उस साइड भी गोल-मटोल हेड है। ये जो आपकी टेल्स थीं काले कलर की ये पानी से डरती हैं तो ये आपके बीच में आ गईं जिस जगह पर पानी नहीं है। ये आपका पानी से एकदम ही बचना चाहती हैं। राइट? तो यहां पर आपको देखने को मिला लिपिड मॉलिक्यूल, ये आपका दो लेयर्स बनाता है तो इट फॉर्म्स अ बायलेयर। ठीक है? और आपके यहां पर पाए जाते हैं प्रोटीन। तो ये जो लिपिड नाम की लेयर्स हैं इनमें प्रोटीन्स पाए जाते हैं। या तो ये लिपिड में गड़े हुए हो सकते हैं यानी इंटीग्रल या इंट्रिन्सिक प्रोटीन हो सकते हैं जिनको निकालना मुश्किल है। या तो ये पूरे गड़े हुए होंगे दोनों लेयर्स में या ये आधे गड़े हुए होंगे यानी ये पार्शियल या टोटली बेडेड हो सकते हैं लिपिड लेयर में और या फिर ये बाहर की साइड पाए जा सकते हैं, पेरिफेरल। भाई या तो ये प्रोटीन पूरा गड़ा हुआ है, दो लिपिड की लेयर है इनमें पूरा गड़ा हुआ है या आधा गड़ा हुआ है लेकिन इसको निकालना मुश्किल है। अगर ये बाहर बैठा हुआ है, बाहर पड़ा हुआ है तो तो आराम से निकल जाएगा ना? तो डिपेंडिंग अपॉन देयर ईज़ ऑफ़ एक्सट्रैक्शन कि इनको एक्सट्रैक्ट करना कितना आसान है। अगर इनको निकालना आसान है, दो मिनट में बाहर निकाल के फेंक दोगे तो दे आर कॉल्ड एज़ एक्सट्रिन्सिक प्रोटीन या पेरिफेरल प्रोटीन। ये बाहर पड़े हुए होते हैं, बहुत थोड़ा सा इनका कांटेक्ट है लिपिड के साथ। लेकिन मेरे भाई ये इंट्रिन्सिक प्रोटीन अगर है तो आपके क्या हुए? एक सेकंड भैया। आ हा, ये क्या हो गए? ये आपके टोटली या पार्शियली बेडेड हो सकते हैं। ये आपके लिपिड में गड़े हुए पाए जाएंगे। या तो आधे गड़े हुए होंगे या पूरे गड़े हुए होंगे। ठीक है?

अब देखिए ये जो प्रोटीन और लिपिड का रेशियो है ये जो है वैरी कर सकता है। हर एक सेल में, हर एक सेल की मेंब्रेन प्रोटीन और लिपिड की बनेगी लेकिन इनकी परसेंटेज वैरी कर सकती है। आपको मेन परसेंटेज याद करनी है आरबीसी की। आरबीसी में प्रोटीन है 52 और लिपिड है 40। सर बचा हुआ 8% क्या है? कार्बोहाइड्रेट और कोलेस्ट्रॉल जो कि मैं आपको नेक्स्ट स्लाइड में अच्छे तरीके से दिखाऊंगा। तो 1972 में एक मॉडल आया जिसको कहते हैं फ्लूइड मोज़ेक मॉडल ऑफ़ प्लाज़्मा मेंब्रेन, जो कि आज तक का सबसे ज्यादा एक्सेप्टेड मॉडल है। इसका नाम फ्लूइड मोज़ेक क्यों पड़ा? फ्लूइड का मतलब है बहने वाला। तो ये जो आपकी सेल मेंब्रेन है इसमें एक बहने वाला कंपोनेंट होता है, दैट इज़ कॉल्ड एज़ लिपिड और मोज़ेक। जैसे आप हलवा बनाते हो तो उसमें काजू किशमिश डाल देते हो। इसी प्रकार से आपके कुछ प्रोटीन जो हैं फेंके हुए हैं इस लिपिड की बायलेयर में। तो लिपिड जो है ये फ्लूइड है यानी ये आपका सेल मेंब्रेन को ग्रो कर सकती है, सेल मेंब्रेन को डिवाइड करा सकती है एट द टाइम ऑफ़ सेल डिवीज़न। किसी चीज़ को सेल मेंब्रेन में पैक करके सेल के बाहर भेज सकती है, किसी चीज़ को सेल के अंदर ले सकती है। फ्लेक्सिबल है तो दो सेल्स के बीच में जंक्शन बना सकती है। सेल ऐसे है, ये फ्लेक्सिबल होके कुछ प्रोजेक्शन्स बना सकता है और इंटरेक्शन कर सकता है दूसरे सेल से। यानी कि या तो सेल बड़ा हो जाएगा या सेल डिवाइड हो जाएगा या सेल से कोई चीज़ बाहर चली जाएगी पैक होकर या अंदर आ जाएगी और जंक्शन बन जाएंगे। बिकॉज़ दिस सेल मेंब्रेन इज़ फ्लेक्सिबल बिकॉज़ ऑफ़ लिपिड और प्रोटीन जो है ये आपका मोज़ेक है, बीच में कहीं-कहीं छिड़का हुआ है आपका प्रोटीन। तो ये जो है आपकी लिपिड की एक लेयर, ये लिपिड की दो लेयर, बाहर की साइड आपका हेड होंगे जो पानी से इंटरेक्ट करेंगे और अंदर की साइड आपकी टेल्स होंगी जो पानी से डरती हैं तो पानी में नहीं जाएंगी। दिस इज़ लिपिड। प्रोटीन जो है या तो आपका एकदम बाहर पड़ा हुआ है, है ना? या ये थोड़ा आधा गड़ा हुआ है या ये पूरा गड़ा हुआ है आपका इस पर्टिकुलर लिपिड के अंदर। तो अगर ये बाहर पड़ा हुआ है, इट इज़ कॉल्ड एज़ पेरिफेरल प्रोटीन। या एक्स्ट्रिन्सिक प्रोटीन।

या बैठ गया क्या मेरे ऊपर? अच्छा वहां चला गया है। एक सेकंड, इसको झटकना पड़ेगा अदरवाइज़ दिक्कत हो जाएगी। एक सेकंड, दे दो भाई। ओके, टेबल के पीछे चला गया है। होपफुली ये वापस ना आए, है ना? क्योंकि आ भी गया तो हम क्या ही कर पाएंगे डरने के अलावा। लेकिन हां, ये ततैया काट लेता है तो दिक्कत हो जाती है। लेट्स होप कि ये ना आए। चलिए बाकी पढ़ाई पर फोकस करते हैं। तो ये आपकी दो लिपिड की लेयर है। इनमें अगर बाहर की साइड कोई प्रोटीन है, इट इज़ कॉल्ड एज़ पेरिफेरल प्रोटीन या एक्सट्रिन्सिक प्रोटीन और अंदर की साइड पार्शियली गड़ा हुआ है चाहे पूरा गड़ा हुआ है तो ये क्या हो गया? इंटीग्रल प्रोटीन या इंट्रिन्सिक प्रोटीन। ये जो प्रोटीन है इसको ट्रांसमेंब्रेन प्रोटीन भी कहते हैं। क्यों? क्योंकि चीज़ों का ट्रांसपोर्ट करा सकता है फ्रॉम आउटसाइड द सेल टू इनसाइड द सेल या इनसाइड द सेल टू आउटसाइड द सेल। कोई ऐसी चीज़ है जो डायरेक्टली मेंब्रेन को क्रॉस नहीं कर सकती, उसकी क्रॉसिंग के लिए, उसके ट्रांसपोर्ट के लिए ट्रांसमेंब्रेन प्रोटीन बहुत काम आता है क्योंकि लिपिड से तो इंटरेक्शन कर नहीं पा रहा मॉलिक्यूल तो क्या हो जाएगा? ये डायरेक्टली इस पर्टिकुलर प्रोटीन में बैठकर के आ सकते हैं। इसीलिए इसे ट्रांसमेंब्रेन या चैनल प्रोटीन कहा जा सकता है। ये एक चैनल बनाते हैं फॉर द ट्रांसपोर्ट ऑफ़ मॉलिक्यूल और बीच-बीच में ये आपका पाया जाएगा कोलेस्ट्रॉल। कोलेस्ट्रॉल यूज़ुअली आपका एनिमल सेल मेंब्रेन के अंदर पाया जाता है। तो ये जो लिपिड है, इट इज़ वेरी फ्लूइड। जैसे आपके घर पर कोई चेयर है तो उस चेयर का अगर एक पैर थोड़ा सा छोटा है तो उस चेयर पर चढ़ने से आप डरते हो, राइट? वो आपकी लड़खड़ा जाती है चेयर। तो आप क्या करते हो? एक कागज़ को फोल्ड करके उसके चौथे पैर के नीचे डाल देते हो तो अब वो बैलेंस हो जाती है। तो एक छोटी सी गिट्टी है जो स्टेबलाइज़ कर देती है आपके टूटी हुई चेयर को। सिमिलरली यहां पर जो छोटी-छोटी गिट्टियां हैं ये क्या हैं? ये आपके कोलेस्ट्रॉल मॉलिक्यूल्स हैं। ये आपके स्टेबलाइज़ कर देंगे किसको? आपके मेंब्रेन को। तो दे आर कॉल्ड एज़ मेंब्रेन स्टेबलाइज़र। तो कोलेस्ट्रॉल बुरा मॉलिक्यूल नहीं है अगर ये लिमिटेड अमाउंट में है तो हमारी हेल्प ही करता है लेकिन जब ज्यादा मेंब्रेन के अंदर कोलेस्ट्रॉल हो जाए या फिर ब्लड के अंदर कोलेस्ट्रॉल चला जाए तो ये क्लॉट कर देता है आपके पूरे के पूरे जो ब्लड वेसल है उसको क्लॉक करके बैठ जाएगा, आपका ब्लॉक कर देगा तो अल्टीमेटली हार्ट अटैक के चांसेस बढ़ जाते हैं। यहां पर अच्छे आदमी का, देव मानुष का काम कर रहा है ये आपका कौन? ये है आपका कोलेस्ट्रॉल। यहां पर फिर देखिए आपका ऊपर पाया जा रहा है कार्बोहाइड्रेट। तो कार्बोहाइड्रेट जो है इट मेक्स द मेंब्रेन एसिमीट्रिकल। ये जो मेंब्रेन है इसको एसिमीट्रिकल कर देता है, कौन? कार्बोहाइड्रेट। कैसे एसिमीट्री? ये इसलिए कर देता है क्योंकि सिर्फ बाहर की साइड पाया जाएगा। रिसेप्टर जो है बाहर की साइड पाए जाएंगे। भाई ताला जो है घर के बाहर लगाओगे ना सिक्योरिटी के लिए। घर के अंदर ताला मार के खुद ही बैठ जाओगे कि हां अब कोई नहीं आ पाएगा। अरे भाई तुम भी तो बाहर नहीं जा पाओगे। तो आप जब कहीं बाहर जाते हो तो कुंडी बाहर की साइड मार के जाते हो। तो यहां पर रिसेप्टर्स जो हैं बाहर की साइड पाए जाएंगे। अगर ये कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन के साथ इंटरेक्ट करते हैं तो दे मेक ग्लाइकोप्रोटीन। ग्लाइको मतलब कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन का मतलब प्रोटीन। और जब ये लिपिड के साथ इंटरेक्ट करते हैं देन दे मेक ग्लाइकोलिपिड। ग्लाइको का मतलब कार्बोहाइड्रेट एंड लिपिड का मतलब लिपिड। तो ग्लाइकोप्रोटीन और ग्लाइकोलिपिड सिर्फ बाहर की साइड पाए जाते हैं मेंब्रेन के, अंदर की साइड नहीं। तो कोई आपसे पूछ ले, स्टेटमेंट बेस्ड सवाल आ जाए कि क्या सेल मेंब्रेन एसिमीट्रिकल है? बिल्कुल है क्योंकि उसमें आपका जो कार्बोहाइड्रेट है सिर्फ बाहर की साइड पाया जा रहा है। बाकी सारी चीज़ें आपकी बाहर अंदर पाई जा सकती हैं। आपकी लिपिड की लेयर तो दो है, आपके प्रोटीन्स भी बाहर अंदर पाए जा सकते हैं, कोलेस्ट्रॉल भी दोनों लेयर में पाया जा सकता है। सिर्फ कार्बोहाइड्रेट है जो आपके आउटर लेयर पे देखने को मिलेगी। यहां पर देखिए अब ये मेंब्रेन है, ये एक लिपिड लेयर है, दूसरी लिपिड लेयर है। यहां पर बीच में मैंने प्रोटीन बना दिया जो कि आपका ट्रांसपोर्टर या कैरियर प्रोटीन है या ट्रांसमेंब्रेन प्रोटीन है। अगर न्यूट्रल मॉलिक्यूल है या पानी वगैरह है तो न्यूट्रल मॉलिक्यूल जो है ये आपका इस मेंब्रेन को आसानी से क्रॉस कर लेता है। राइट? तो हाई कंसंट्रेशन टू लो कंसंट्रेशन चीज़ें पास हो जाती हैं। इसको हम कहते हैं सिंपल डिफ्यूज़न। किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं प

शब्द मिल जाए, मतलब एटीपी यूज हो रही है, यानी कि यहां पर आपका एक्टिव ट्रांसपोर्ट हो रहा है। दिस इज अबाउट द ट्रांसपोर्टेशन इन द मेंब्रेन, ठीक है।

अब देखिए सेल वॉल। सेल वॉल जो है आपका रिजिड है, अमूजा सीमेंट की सेल वॉल होती है। यह यूजुअली आपकी रिजिडनेस प्रोवाइड करती है। यह आपको प्रोटेक्शन प्रोवाइड करती है। लेकिन जो सेल वॉल है मेरे दोस्त, जब सेल नया-नया होता है, तो फ्लेक्सिबल होती है। तो जब एक प्लांट सेल नया-नया है, तो उस पर जो सेल वॉल है, इट इज कॉल्ड एज प्राइमरी सेल वॉल। वह अभी आपकी ग्रो कर सकती है। लेकिन सेल एक बार अपनी अगर शेप ले ले, अपना फाइनल रूप ले ले, तो उस पर सेकेंडरी सेल वॉल आकर लग जाती है, जो कि आपकी फ्लेक्सिबल नहीं होती। तो प्राइमरी सेल वॉल जो है, उसके अंदर सेकेंडरी सेल वॉल बनती है और बाहर की प्राइमरी सेल वॉल फिर झड़ जाती है। अंदर की साइड जो लेयर आई, सेकेंडरी सेल वॉल, वो आपकी पक्की लेयर होती है। तो वो फिर ग्रो नहीं कर सकती। तो आपकी जो रिजिड सेल वॉल है, ये प्रोटेक्शन भी दे सकती है, एंड आपकी सबसे बाहर वाली लेयर है। तो दो सेल जब आपस में टकराएँगे, तो दोनों में इंटरेक्शन कैसे होगी? सबसे बाहर वाली लेयर ही पहले टकराएगी ना। अगर आप और मैं मिले और हमने हाथ मिलाया, तो हमारी स्किन टकराई। हम ये थोड़ी बोलेंगे कि हड्डी टकरा गई। स्किन टकराई है ना, उसके अंदर है बहुत हड्डी। तो कौन सा पार्ट कांटेक्ट में आया? आपके हाथ और मेरे हाथ का सेल वॉल। तो सेल वॉल जो है, आपका सेल-सेल इंटरेक्शन में हेल्प करता है। कोई बहुत बड़ा मॉलिक्यूल होगा, मैक्रो मॉलिक्यूल, तो उसको सेल में एंट्री लेने से रोक देगा। अदरवाइज़ ये काम सेल मेंब्रेन का है। छोटे-मोटे मॉलिक्यूल तक को भी वो चेक करता है। गेट पास सेल मेंब्रेन ही देता है। लेकिन कोई बहुत ही बड़ा मॉलिक्यूल आ जाएगा कि अंधे को भी दिख जाएगा कि ये आर सेल में जबरदस्ती घुसना चाह रहा है, तो उसको सेल वॉल भी रोक सकती है, अप टू अ लेवल। बाकी छोटे-मोटे मॉलिक्यूल जो हैं, उनको रोकने का जिम्मे-जिम्मेदारी जो है, उनको रोकने का जिम्मा जो है, वो सेल मेंब्रेन का है। तो ये प्रोटेक्शन भी देगी और शेप और साइज़ भी देगी।

अब आपका एल्गी में जो सेल वॉल बनती है, प्लांट में सब में सेल वॉल जो है, सेलुलोज की बनती है। लेकिन एल्गी में सेलुलोज के अलावा क्या है? गैलेक्टेंस, यानी गैलेक्टो शुगर, मैनंस, यानी मेनो शुगर और मिनरल्स भी हैं। इनऑर्गेनिक केमिकल्स भी हैं, जैसे कैल्शियम कार्बोनेट। और हायर प्लांट्स जो होते हैं, एल्गी को छोड़ के, उनमें क्या देखने को मिलता है? सेल्यूलोज। इसी का भाई है हेमीसेलुलोज, पैक्टोज यानी पेक्टिन और आपके कुछ प्रोटींस भी देखने को मिल सकते हैं। तो आपको एल्गी वाला सवाल जो है, ये आपको पी वाय क्यू में देखने को मिलता है। वेरी इम्पॉर्टेंट। तो प्राइमरी सेल वॉल जो है, ये आपकी ग्रो कर सकती है। लेकिन जब सेल मैच्योर हो जाता है, तो उसके अंदर प्राइमरी सेल वॉल के अंदर सेकेंडरी सेल वॉल आ जाती है आपकी अंदर की साइड, इनसाइड द प्राइमरी वॉल। तो सबसे अंदर आपकी सेल मेंब्रेन, उसके ऊपर आपकी सेकेंडरी सेल वॉल, बाहर प्राइमरी सेल वॉल, जो कि झड़ती हुई जाएगी विद द टाइम, राइट।

मिडल लैमेला क्या होती है? मिडिल लैमेला मतलब दो आपके प्लांट के सेल हैं, राइट। इनमें अपनी-अपनी सेल मेंब्रेन है, सेकेंडरी सेल वॉल है। उसके बाद इन सेल्स को जोड़ने के लिए बीच में एक और लेयर आ सकती है, जिसको कहेंगे मिडिल लैमेला। मिडिल का मतलब बीच में, लैमेला का मतलब लेयर। तो ये स्पेसिफिक केमिकल की बनती है, कॉल्ड एज कैल्शियम पैक्टेट। 99% प्लांट में कैल्शियम पैक्टेट, 1% में मैग्नीशियम पैक्टेट। ये आपका क्या करती है? दो प्लांट सेल को जोड़ती है और दो प्लांट सेल के साइटोप्लाज्म को अगर आप आपस में कनेक्ट कर दें कि प्लांट सेल आपस में मैटेरियल का भी आदान-प्रदान कर पाए, तो वो जो साइटोप्लाज्म कनेक्शन बना है, ये जो स्ट्रैंड बना है दो प्लांट सेल्स के बीच में, इसे प्लाज्मोडेस्मेटा कहा जा सकता है। तो ये आपकी सारी की सारी सेल वॉल की डिस्कशन हो गई। अब यूकैरियोटिक सेल की ऑर्गेनल्स पे आ जाते हैं। तो सबसे पहला जो सिस्टम है, ये है एंडोमेम्ब्रेन सिस्टम। एंडो का मतलब सेल के अंदर, मेंब्रेन सिस्टम मतलब ऐसा सिस्टम है जिसमें कई सारे मेंब्रेन बाउंड ऑर्गेनल्स हैं। तो एंडोमेम्ब्रेन सिस्टम बनते हैं चार ऑर्गेनल्स से, जिनके फंक्शंस आपस में कनेक्टेड होते हैं। सबसे पहले एंडोमेम्ब्रेन सिस्टम है, तो एंडो शब्द को ही उठा लो। सबसे पहला कौन आएगा? एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम। दूसरा गॉल्जी कॉम्प्लेक्स, वैक्यूल। ये चार ऑर्गेनल्स साथ मिलकर के एक जैसा काम करती हैं। तो आपका एंडोमेम्ब्रेन सिस्टम का ये पार्ट बनती है। क्या होता है एंडोमेम्ब्रेन सिस्टम में? न्यूक्लियस जो है, इट इज अ डबल मेंब्रेन बाउंड स्ट्रक्चर। तो न्यूक्लियस जो है, इस पर दो मेंब्रेन हैं। आउटर वाली जो मेंब्रेन है, आउटर वाला जो एनवेलप है, ये आपका डायरेक्टली कांटेक्ट में रहता है किसके? एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम के। तो एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम पे राइबोसोम भी बाइंडेड हो सकते हैं, रफ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम उसको कह रहे थे, या राइबोसोम एब्सेंट भी हो सकते हैं, स्मूथ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम इसको कहते हैं। तो रफ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम जिस पर राइबोसोम है, तो राइबोसोम इज द प्रोटीन फैक्ट्री। ये क्या करेगा? प्रोटीन बनाएगा और गॉल्जी की तरफ भेजेगा। और स्मूथ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम, एस फॉर स्मूथ, ये क्या बनाएगा? स्टेरॉइड्स और लिपिड बनाएगा, यानी लिपिड बनाएगा और गॉल्जी की तरफ भेजेगा। तो प्रोटीन और लिपिड आपके बन के गॉल्जी की तरफ चले गए। अब गॉल्जी क्या करेगा? गॉल्जी एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम के जस्ट बाद पाया जाता है। इसमें आपके डिस्क लाइक स्ट्रक्चर्स होते हैं, जो कि कंसेंट्रिकली अरेंज होते हैं। वाईफाई जैसा इनका स्ट्रक्चर होता है। जैसे वाईफाई का सिंबल होता है ना, ऐसा लगता है कि कोई सेंटर है और इस पर छोटे सर्कल, बड़े सर्कल, फिर और बड़े, फिर और बड़े सर्कल बना दिए हैं। ऐसा आपका एक कंसंट्रिक सा अरेंजमेंट देखने को मिलता है। तो एंडोप्लाज़्म रेटिकुलम से प्रोटीन, लिपिड बन के आ गए आपके कहां पर? गॉल्जी पे। और गॉल्जी क्या करता है? इन प्रोटीन्स और लिपिड्स को पैक करता है बढ़िया तरीके से और इन पर कार्बोहाइड्रेट लगाता है, यानी ग्लाइको लगाता है। तो लिपिड को बना देगा ग्लाइकोलिपिड और प्रोटीन को बना देगा ग्लाइकोप्रोटीन। क्या फायदा है इस चीज का? अलग-अलग शुगर ऐड करता है आपका गॉल्जी प्रोटीन और लिपिड पे। उन शुगर से पता लगता है कि कौन सी शुगर ऐड करी है। इससे पता लगता है कि इस प्रोटीन को कहां जाना है? क्या इसको गॉल्जी में ही रहना है? क्या इसको एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम में जाना है? क्या इसको न्यूक्लियस में जाना है? क्या इसको सेल के बाहर जाना है? क्या इसको मेंब्रेन बनाने जाना है? क्या इसको सेल वॉल बनाने जाना है? कौन सा प्रोटीन, कौन सा लिपिड कहां जाएगा, उसकी डेस्टिनेशन क्या है, वो एड्रेस का ठप्पा कौन लगाएगा? वो लगाएगा गॉल्जी। इसे कहते हैं ग्लाइकोसाइलेशन, यानी आपका कार्बोहाइड्रेट का ठप्पा लगा देना। एक्चुअल में वो एड्रेस का टैग है। फिर आपकी जो गॉल्जी है, यह आपका चीजों को ट्रांसपोर्ट करके भेजती है, पैकेज करके भेजती है। इसकी कोई पैकेजिंग, जिसमें स्पेसिफिक डाइजेस्टिव एंजाइम्स पाए जाते हों, उसको हम कहते हैं लाइसोसोम। तो लाइसोसोम किससे बनता है? गॉल्जी से ही बनता है। गॉल्जी से एक वेसिकल निकली, गोल-मटोल, और उसमें डाइजेस्टिव एंजाइम्स हैं, जो न्यूक्लिक एसिड को तोड़ दें, ऐसे न्यूक्लिएज़, जो प्रोटीन को तोड़ दें, ऐसे प्रोटीएज़, जो कार्बोहाइड्रेट को तोड़ दें, ऐसे एमाइलेज़, जो आपके लिपिड को तोड़ दें, ऐसे लाइपेज़। ये सारे एंजाइम पाए जाते हैं एक वेसिकल में। इसे लाइसोसोम कहा। और जो एक्स्ट्रा मैटेरियल है आपके सेल का, वो स्टोर हो जाता है एक स्टोर हाउस में, जिसको कह दिया वैक्यूल। इसमें हम सारा का सारा सामान, जैसे आयन्स वगैरह हैं, जैसे कि सैप हो गया, यानी आयन्स हैं, एक्स्ट्रा वाटर है, एक्स्ट्रा एक्सक्रीटरी वेस्ट है, एन्थोसायनिन नाम का है, सारे के सारे एक्स्ट्रा मैटेरियल वहां ठूंस दिए। स्टोर हाउस क्या है? वैक्यूल। तो इस तरीके से आपका ये काम चलता है।

तो यहां पर देखेंगे तो एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम क्या है? नेटवर्क ऑफ़ स्कैटर्ड ट्यूब्स। ऐसे कई सारी ट्यूब्स हैं जो आपस में कनेक्टेड हैं, है ना। तो ऐसे ट्यूब लाइक स्ट्रक्चर हैं जो देखने को मिलती हैं, न्यूक्लियस के आउटर एनवेलप से कनेक्टेड, राइट। तो इस एंडोप्लाज़्म रेटिकुलम के अंदर का जो आपका एरिया है, इसे कहते हैं आपका लुमिनल स्पेस, लुमेन ऑफ़ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम। इसके अंदर की कैविटी। और सेल में बचा हुआ जितना भी पार्ट है, उसे कहते हैं एक्स्ट्रालुमिनल स्पेस, यानी एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम का जो लुमेन है, दैट इज़ लुमिनल पार्ट। बाकी जितना दुनियादारी में सारी चीज बची एक सेल में, दैट इज़ एक्स्ट्रालुमिनल पार्ट, ठीक है। यहां पर आपका राइबोसोम्स लगे हुए हैं, गोल-मटोल। तो ये रफ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम है। तो ये प्रोटीन बनाएगा और आपका स्मूथ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम है, स्टेरॉइड और लिपिड बनाएगा। ज्यादा पास कौन रहता है न्यूक्लियस के? आपका रफ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम। तो ये जो है आपके प्रोटीन और लिपिड बनकर के कहां चले गए? जीसी में चले गए, गॉल्जी कॉम्प्लेक्स में। कैमिलो गॉल्जी ने इसको डिस्कवर किया था। इसमें आपके सिस्टर्नी पाए जाते हैं, आपके फ्लैट और डिस्क शेप। इनको सिस्टर्नी कहा, जिनका डायमीटर आधे से एक माइक्रोमीटर होता है। ये जो आपके सिस्टर्नी हैं, इनमें प्रोटीन और लिपिड बन के आएंगे। फर्स्ट पार्ट में इसको कहा, कॉन्वेक्स पार्ट, सिस पार्ट या फॉर्मिंग पार्ट। यहां पर फॉर्म होकर आ रहे हैं प्रोटीन और लिपिड। फिर आपका बीच का पार्ट, मिडियम पार्ट, इसे कहा जाता है मीडियन गॉल्जी। चीजें आपकी इस साइड जाने लग जाती हैं। फिर चीजें बाहर निकल जाती हैं, ट्रांस फेज़ या कॉनकेव फेज़ या मैच्योर होकर आगे की साइड जा रही हैं। तो पैकेजिंग और ग्लाइकोसाइलेशन लिपिड और प्रोटीन की कहां होती है? गॉल्जी में। जी फॉर गॉल्जी, जी फॉर ग्लाइकोसाइलेशन, ठीक है।

फिर आता है आपका लाइसोसोम। भाई ये आपका गॉल्जी से ही बना और इसमें सारे हाइड्रोलिटिक एंजाइम्स होते हैं। प्रोटीन को तोड़ने के लिए प्रोटीएज़, कार्बोहाइड्रेट को तोड़ने के लिए एमाइलेज़, लिपिड को तोड़ने के लिए लाइपेज़, न्यूक्लिक एसिड को तोड़ने के लिए न्यूक्लिएज़। सारे एंजाइम्स यहां पर होते हैं और ये एक्टिव होते हैं एट एसिडिक पीएच। तो पीएच अगर एसिडिक होगा, तो उस टाइम पर ये एक्टिवेट हो जाएंगे। तो इनको कम पीएच चाहिए, साढ़े चार से पाँच पीएच चाहिए। ये पीएच कैसे मेंटेन होगा सर? साइटोप्लाज़्म में खूब सारे प्रोटॉन होते हैं। एक प्रोटॉन पंप लगाओ। पंप लगाओ मतलब एक्टिव ट्रांसपोर्ट। तो लाइसोसोम में प्रोटॉन पंप लगा रहता है, जो साइटोप्लाज़्म से प्रोटॉन लाइसोसोम की तरफ भेजता रहता है। तो एसिडिक एनवायरमेंट मेंटेन रहता है। फिर आता है आपका वैक्यूल। एक्स्ट्रा पानी, एक्स्ट्रा सैप यानी आयन्स, एक्स्ट्रा एक्सक्रीटरी वेस्ट, सारा का सारा वैक्यूल में डाला जा सकता है। इसमें सिंगल मेंब्रेन होती है, जिसका स्पेशल नाम है टोनोप्लास्ट। जैसे लाइसोसोम में भी एक ही मेंब्रेन थी, एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम में भी। गॉल्जी कॉम्प्लेक्स का कोई खास नाम नहीं है। यहां मेंब्रेन को अलग से नाम दिया है, कॉल्ड टोनोप्लास्ट। और ये जो वैक्यूलर है, क्यों? क्योंकि वैक्यूल जो है, ये स्टोर हाउस है और स्टोर हाउस को पहले ही ठूंस के भरा हुआ है, यानी उसमें कंसंट्रेशन ज्यादा है चीजों की और साइटोप्लाज़्म ऑर्गेनाइज़्ड है, उसमें कंसंट्रेशन कम है। और स्टोर हाउस में हम और मैटेरियल डालते ही हैं, ठूंसते ही हैं, उससे कुछ निकालते नहीं हैं। इतिहास गवाह है, आज तक स्टोर हाउस से किसी ने कुछ नहीं निकाला। चीजें ठूंस ही गई हैं। तो स्टोर हाउस में ऑलरेडी काफी सारा माल है, फिर भी हम और माल ऐड करना चाह रहे हैं। तो अल्टीमेटली क्या हुआ मेरे भाई? यहां पर हम लो कंसंट्रेशन टू हाई कंसंट्रेशन चीजों को और ऐड करना चाह रहे हैं। लो कंसंट्रेशन टू हाई कंसंट्रेशन, कंसंट्रेशन ग्रेडिएंट से उल्टा। तो क्या एक्टिव ट्रांसपोर्ट हो जाएगा? बिल्कुल हो जाएगा सर। क्या यहां भी एक्टिव ट्रांसपोर्ट होगा? बिल्कुल होगा। तो कहां? यहां भी आप कह सकते हैं कि आपका एक्टिव ट्रांसपोर्ट देखने को मिलेगा। तो पंप चाहिए। अब कुछ स्पेशल आपके वैक्यूल पाए जाते हैं अलग-अलग ऑर्गेनिज़्म में, जैसे आपका कॉन्ट्रैक्टाइल वैक्यूल। जैसे सुबह-सुबह आप ब्रश करते हैं, तो टूथपेस्ट को जब आप दबाते हैं, फुचक करके, तो पेस्ट बाहर निकल जाती है। ऐसे ही अमीबा में कॉन्ट्रैक्टाइल वैक्यूल है। उसको कॉन्ट्रैक्ट करते ही एक्सक्रीटरी मैटेरियल बाहर निकल जाता है सेल के। तो एक्सक्रीटरी मैटेरियल बाहर निकालने के लिए, यानी एक्सक्रीशन के लिए या ऑस्मोरेगुलेशन के लिए यूज़ होता है कॉन्ट्रैक्टाइल वैक्यूल। और फूड वैक्यूल पाया जाता है कुछ सेल्स में, जैसे कि प्रोटिस्ट सेल्स में। तो प्रोटिस्ट जो होते हैं, उनकी बॉडी भी एक ही सेल की है। तो वो जो फूड खाते हैं, वो एक जगह पर जमा हो जाता है। उसी के ऊपर मेंब्रेन आकर लग जाती है। उसी को फूड वैक्यूल बोलने लग जाते हैं। तो इन्गल्फमेंट ऑफ़ फूड से यहां पर वैक्यूल बन जाता है, कॉल्ड एज़ फूड वैक्यूल, ठीक है।

फिर आया भैया माइक्रोबॉडीज़। माइक्रोबॉडीज़ मतलब छोटी-छोटी बॉडीज़। माइक्रोबॉडी मतलब बहुत छोटी ऑर्गेनेल, जिस पर एक ही मेंब्रेन है। तो ये प्लांट और एनिमल दोनों प्रकार के सेल्स में पाई जा सकती हैं। एक ही इनर मेंब्रेन होती है और कुछ स्पेसिफिक एंजाइम्स होते हैं, यानी कि ये एक-दो ही काम करते हैं। जैसे कि पेरॉक्सिसोम, इट इज़ एन एग्ज़ांपल ऑफ़ माइक्रोबॉडीज़। दोनों में पाया जाएगा और नाम है पेरॉक्सिसोम। तो ये पेरॉक्साइड का मेटाबॉलिज्म करता है। पेरॉक्साइड मेटाबॉलिज्म मतलब सर? पेरॉक्साइड मेटाबॉलिज्म मतलब मेरे भाई कि आपका हाइड्रोजन पेरॉक्साइड को, जो कि एक टॉक्सिक केमिकल है, उसको तोड़कर बना देगा वाटर और ऑक्सीजन। वाटर तो हमारी बॉडी में 70% से ज्यादा है ही और ऑक्सीजन तो हमारे लिए जरूरी है ही। तो ये सेफ केमिकल्स बना देता है हाइड्रोजन पेरॉक्साइड को तोड़ के। तो एंजाइम यहां पर लगता है कैटेलिज। तो यह आपका हो जाएगा माइक्रोबॉडीज़।

व्हेन इट कम्स टू माइटोकांड्रिया, तो यह है हमारा पावर हाउस। यह क्या करता है भैया? इट इज़ अ डबल मेंब्रेन बाउंड ऑर्गेनेल। तो इसमें ओएम, मतलब आउटर मेंब्रेन ऑफ़ माइटोकांड्रिया पाई जाएगी। अंदर की साइड है इनर मेंब्रेन ऑफ़ माइटोकांड्रिया। यह स्ट्रक्चर देखा हुआ है। यह स्ट्रक्चर कहीं सुनेला लगता है। बिल्कुल सुनेला लगता है सर। अभी-अभी प्रोकैरियोटिक सेल में पढ़ा था कि मेज़ोसोम बनता है, है ना। मेंब्रेन अंदर की साइड फोल्ड हो जाती है, सरफेस एरिया बढ़ता है। यहां भी अंदर की साइड मेंब्रेन फोल्ड हो जा रही है। इन इनफोल्डिंग्स को कहते हैं क्रिस्टा, जिससे सरफेस एरिया बढ़ जाता है इनर मेंब्रेन ऑफ़ माइटोकांड्रिया का, यानी इनर मेंब्रेन ऑफ़ माइटोकांड्रिया जो है, यहां पर एटीपी बनने का मेन प्रोसेस होता है, ठीक है। तो बाहर वाली, आउटर मेंब्रेन ऑफ़ माइटोकांड्रिया, अंदर वाली, इनर मेंब्रेन ऑफ़ माइटोकांड्रिया, बीच का ये जो पीला-पीला इलाका है, ये दो मेंब्रेन का स्पेस, यानी इंटरमेम्ब्रेन स्पेस, ठीक है। अंदर जो बचा हरे-भरे कलर का, जैसे सेल के अंदर साइटोप्लाज़्म, वैसे ही माइटोकांड्रिया में इसको बोल देते हैं मैट्रिक्स। होमोजीनस, एक जैसी दिखने वाली, है ना। आपका डेंस मैटेरियल इसमें भरा रहेगा। होमोजीनस मैटेरियल भरा रहेगा। इसको कहते हैं क्या? रेगुलर मैटेरियल भरा रहेगा, इसको कहते हैं हम मैट्रिक्स। तो माइटोकांड्रिया की जो मैट्रिक्स है, इसमें होगा डबल स्टैंडर्ड सर्कुलर डीएनए, सेम बैक्टीरिया जैसा। खुद का आरएनए भी बना सकते हैं, 70s राइबोसोम, बैक्टीरिया जैसे और खुद के प्रोटीन भी बना सकते हैं। यानी माना जाता है, एक थ्योरी है, कॉल्ड एज़ एंडोसिम्बायोटिक थ्योरी। उसमें माना जाता है कि माइटोकांड्रिया जो था, पहले बैक्टीरिया था, एरोबिक बैक्टीरिया। यह एनर्जी बना सकता था। तो इसको एक बड़े सेल ने खा लिया और फिर माइटोकांड्रिया उसी सेल के अंदर रखने, यू नो, रहने लगा। बोला मालिक-मालिक, मैं आपको एटीपी बना के दे दूंगा, मुझे मारो मत, मुझे अपने साथ रख लो, है ना। तो कहीं से आप खाना जुगाड़ करके लेके आओ, मैं आपको एटीपी बनाऊंगा। आपको एक एनर्जी फैक्ट्री अपने अंदर ही मिल जाएगी। तो माना जाता है कि पहले ये बैक्टीरिया थे, राइट। आउटर मेंब्रेन और इनर मेंब्रेन में हमेशा याद रखिए, आउटर मेंब्रेन ज्यादा परमेबल होगी। भाई आपके घर की फेंसिंग जो है, उसको कूदकर कोई भी अंदर आ सकता है, लेकिन आपकी तिजोरी में थोड़ी घुस जाएगा। तो अंदर ज्यादा सिक्योरिटी होती है, हमेशा बाहर के कंपैरिज़न में। तो जो क्लोरोप्लास्ट है, इसमें भी दो मेंब्रेन हैं। हमेशा याद रखिएगा, बाहर वाली ज्यादा परमेबल, अंदर वाली कम परमेबल, चीजों को रोक लेती है। अंदर वाली मेंब्रेन सेम यहां पर भी होगा, राइट। तो इसके पास भी खुद का डीएनए, आरएनए, राइबोसोम होता है। तो ये अपने आधे से ज्यादा प्रोटीन खुद बना लेता है। कुछ प्रोटीन के लिए इसको न्यूक्लियस की जरूरत पड़ेगी, पर ये अपने काफी सारे प्रोटीन खुद बना लेता है। इसलिए इसे सेमी ऑटोनोमस कहा जाता है। सेमी मतलब हाफ, आधा, ऑटोनोमस मतलब अपने काम करने वाला, इंडिपेंडेंट। तो ये आधे काम अपने खुद कर लेता है, राइट। आउटर मेंब्रेन के अलग काम हैं, इनर मेंब्रेन के एटीपी सिंथेसिस के काम हैं। तो इनके अलग-अलग एंजाइम्स भी होते हैं। माइटोकांड्रिया को पावर हाउस कहा जाता है, क्योंकि यह रेस्पिरेशन करता है। यह आपका क्या करेगा? एटीपी बनाएगा।

अब सेम है प्लास्टिड्स। एग्ज़ाम में क्लोरोप्लास्ट तो जो प्लास्टिड्स में मिलेगा और यूग्लीना में मिलेगा। सर यूग्लीनाइड्स क्या होते हैं? यूग्लीनाइड्स आर द कनेक्टिंग लिंक्स बिटवीन प्लांट्स एंड एनिमल्स। अगले से अगले चैप्टर की जब मैं आपको समरी बनाकर दिखाऊंगा, बायोलॉजिकल क्लासिफिकेशन की, तो आपको आईडिया लगेगा व्हाट आर यूग्लीनाइड्स। तो यूग्लीनाइड जो है, ये प्रोटिस्टा में आते हैं, किंगडम प्रोटिस्टा में। ये क्या करते हैं? जब सनलाइट अवेलेबल होती है, तो एक खाना बना लेते हैं, प्लांट की तरह। और जब सनलाइट अवेलेबल नहीं होती, तो ये एनिमल की तरह बिहेव करते हैं, अपने से छोटे इंडिविजुअल्स का शिकार करने लग जाते हैं, प्रिडेटरी हो जाते हैं। तो इसे कहा जाता है मिक्सोट्रॉफिक न्यूट्रिशन। मिक्स है न्यूट्रिशन, ऑटोट्रॉफिक भी, सनलाइट है तो खाना बनाएँगे, प्लांट की तरह बिहेव करेंगे और हेट्रोट्रॉफिक भी, सनलाइट नहीं है तो आपका किस तरह बिहेव करेंगे? एनिमल की तरह बिहेव करेंगे। सो दे कैन बिहेव लाइक प्लांट, दे कैन बिहेव लाइक एनिमल। दिस इज़ कॉल्ड एज़ मिक्सोट्रॉफिक न्यूट्रिशन, जो आपको यूग्लीनाइड्स में देखने को मिलता है। तो अगर ये प्लांट की तरह बिहेव करता है, तो प्लांट लाइक इसमें ऑर्गेनेल भी होनी चाहिए। तो ये प्लास्टिड्स आपके प्लांट में तो मिलेंगी ही, यूग्लीनाइड्स में भी मिलेंगी। साइज़ इनका बड़ा होता है माइटोकांड्रिया के कंपैरिज़न में। माइटोकांड्रिया का अगर आप साइज़ देखो, तो इसका जो साइज़ है, ये कम था। डायमीटर है इसका 0.2-1 माइक्रोन। एवरेज निकालो, आधा माइक्रोमीटर। और लेंथ थी इसकी 1-2.4 माइक्रोन। एवरेज निकालो, डेढ़ माइक्रोमीटर। तो इतना छोटा है कि इसको देखने के लिए पूरे सेल में इतनी सारी चीजें हैं, अलग से माइटोकांड्रिया पे कैसे ध्यान जाएगा? इसको देखने के लिए कलर डाई डाली जाती है, जिसे जेनर्स कहा जाता है। जब इसके ऊपर जेनर्स डालोगे, तब यह दिखाई देगा। अदरवाइज़ इतना छोटा है, दिखाई नहीं देता। लेकिन क्लोरोप्लास्ट बड़ा है। यहां देखो भैया, इसकी लेंथ 5 से 10 माइक्रोमीटर, यानी एवरेज 7.5 माइक्रोमीटर। यहां डेढ़ निकल रही थी, 7.5, तीन गुना बड़ा। और विड्थ देखो, 2 से 4 माइक्रोमीटर। एवरेज कितना निकला? 3 माइक्रोमीटर। यहां आधा था, इससे छह गुना ज्यादा विड्थ है। तो ओवरऑल माइटोकांड्रिया से चार-पाँच गुना बड़ा होता है आपका प्लास्टिड्स।

प्लास्टिड्स का नंबर अलग-अलग होता है डिफरेंट सेल्स में। किसी सेल को ज्यादा एनर्जी की जरूरत है, जैसे बर्ड के फ़्लाइट मसल्स हैं। सबसे ज्यादा उनमें एनर्जी की जरूरत है। फ़्लाइट में खूब सारी एनर्जी लगती है। आपके जो लिम्ब मसल्स हैं, इनमें बहुत ज्यादा एनर्जी की जरूरत लगती है। लेकिन कुछ सेल्स ऐसे हैं जो मोस्टली रेस्ट पे ही रहते हैं। वहां इतने ज्यादा माइटोकांड्रिया की आवश्यकता नहीं पड़ती। तो डिपेंडिंग अपॉन द कंडीशन कि किस सेल में कितनी एनर्जी की रिक्वायरमेंट है, नंबर आपका चेंज होता रहता है। सिमिलरली आप अगर क्लोरोप्लास्ट की बात करें, तो क्लैमाइडोमोनास है, इसमें सेल ही एक है। तो उसमें एक अगर आपका कप शेप्ड क्लोरोप्लास्ट होगा, उससे भी काम चल जाएगा। तो एक क्लोरोप्लास्ट है। और अगर आप आगे देखें, तो मेज़ोफ़िल जो है, जो प्लांट में आपका पत्ती में पाया जाता है, मेज़ोफ़िल, राउंड या ओवल। अभी इसकी शेप देखी थी पहली स्लाइड में ही। तो ये जो है, इसमें 20 से 40 आपके क्लोरोप्लास्ट पाए जाते हैं। खूब सारी फ़ोटोसिंथेसिस ये करता है। तो इनका नंबर वेरिएबल हो सकता है माइटोकांड्रिया का और क्लोरोप्लास्ट का, डिपेंडिंग अपॉन द सेल कि कितनी एनर्जी की जरूरत है, कितना खाना बनाने की जरूरत है। तो प्लास्टिड्स तीन टाइप के हैं। प्लास्टिड्स तो तीन टाइप के हैं: क्लोरोप्लास्ट, हरे-भरे। तो इनमें क्लोरोफिल या कैरोटिनॉइड्स पाए जाएंगे। क्लोरोफिल ज्यादा, कैरोटिनॉइड्स थोड़े कम। दूसरा क्रोमोप्लास्ट, यानी कलरफ़ुल। तो इनमें कैरोटिनॉइड्स ज्यादा पाए जाएंगे, कैरोटीन और ज़ैंथोफ़िल। जैसे आपके व्हाइट ब्लड सेल्स जो हैं, उनको ल्यूकोसाइट कहा जाता है। तो ल्यूकोप्लास्ट मतलब व्हाइट, यानी इनमें कोई पिगमेंट नहीं होगा। तो इनका काम क्या है सर? इनका काम है फ़ूड स्टोर करना, ना राइट। तो अगर एल्यूरोप्लास्ट है, ये तो एल्यूरो शब्द प्रोटीन से रिलेटेड है। तो ये प्रोटीन को स्टोर करेगा। एमाइलोप्लास्ट किसमें होते हैं? स्टार्च में होते हैं, कार्बोहाइड्रेट में होते हैं। तो स्टार्च को स्टोर करेगा। और इलैओप्लास्ट आए, ई आपका एल, ए, आई, ओ। यहां देखो तो ओ आ गया, आई आ गया और एल आ गया। तो ऑयल और फ़ैट। ये क्या करता है? स्टोर करता है। इलैओप्लास्ट ऑयल और फ़ैट स्टोर करता है। अगर क्लोरोप्लास्ट का स्ट्रक्चर देखें, तो आउटर मेंब्रेन ऑफ़ क्लोरोप्लास्ट, इनर मेंब्रेन ऑफ़ क्लोरोप्लास्ट, बीच में इंटरमेम्ब्रेन स्पेस। सेम कहानी आपके माइटोकांड्रिया वाली। आउटर मेंब्रेन ज्यादा परमेबल, चीजों को आने देती है। अंदर वाली मेंब्रेन फ़ाइनल मौके पे रोक लेती है। यहां आपके छोटे-छोटे सिक्कों जैसे स्ट्रक्चर हैं। ये जो तीन मैंने स्काई ब्लू कलर के बनाए हैं, तीन छोटे-छोटे सिक्के हैं। एक सिक्के को हम कहते हैं थायलाकॉइड और ये सिक्के एक के ऊपर एक के ऊपर एक के ऊपर एक लगे होते हैं। तो ये स्ट्रक्चर बना लेते हैं जिसको हम कहते हैं ग्रेना, ठीक है। तो एक जो सिक्का है, इसका नाम थायलाकॉइड्स। ग्रेना की शक्ल बैटरी जैसी है, है ना। घड़ी में जो सेल डलता है, हाथ की घड़ी में, गोल-मटोल मरकरी सेल, वैसे इसकी शक्ल है। और घड़ी में लाइट जलती है। तो इसमें क्या होते हैं? लाइट रिएक्शन होते हैं ग्रेना में। हमेशा याद रखिएगा। और दूसरी ट्रिक जो आप बनाना चाहते हो,

छोटी सी शीत होती है, काले कलर से मैंने ड्रॉ कर रखी है। इट इज कॉल्ड एज सेंट्रल शीत। सेंट्रल माइक्रो ट्यूबल्स के शीत है, जिसे सेंट्रल शीत कहा जाता है। अब ये जो सेंट्रल शीत है, ये कनेक्ट हो जाती है इन डबलेट से, विद द हेल्प ऑफ दंडे। है ना ये डंडे जो हैं, क्या हैं? रेडियल स्पोक। ऐसा लगता है कि एक सर्कल के सेंटर से मैं रेडियस बना रहा हूं, कई सारे। इसलिए इनको कहा जाता है रेडियल स्पोक। रेडियस की तरह बिहेव करते हैं। तो इन नौ के नौ आपके डबलेट्स को कनेक्ट करते हैं सेंट्रल शीट से। तो नौ डबलेट हैं, तो इनसे नौ डंडे निकल रहे हैं। तो रेडियल स्पोक्स भी कितने हो गए? नौ हो गए, करेक्ट? तो ये जो आपके डंडे हैं, ये हो गए स्पोक, टोटल नौ। दो हो गए सिंगलेट। इनके आसपास हो गई आपकी सेंट्रल शीत। फिर हो गए बाहर के नौ डबलेट, और उसके बाद आपकी हो गई सेल मेंब्रेन या प्लाज्मा मेंब्रेन। इंटर डबलेट ब्रिज जो नेगिन प्रोटीन की बनी होती है, इसलिए इसे नेगिन लिंक भी कहा जाता है।

तो जब भी किसी सिलिया और फ्लेज को मैं काटकर के देखता हूं, तो ये सेंटर का कोर मुझे दिखाई देता है। सिलिया फ्लेज के सेंटर पे जो पाया जा रहा है कोर, मुझे दिखाई देता है। इसे मैं क्या कहता हूं? एगोनिक कहता हूं। सो द कोर ऑफ सिलिया एंड फ्लेज इज कॉल्ड एज एजोनिक्स, राइट? एंड सेम सा स्ट्रक्चर होता है आपका किसका? सेंट्रियोल का, राइट? तो हमने दो चीजें ऐसी पढ़ी थीं, जो कि सिर्फ और सिर्फ एनिमल सेल में ही पाई जाती हैं: सेंट्रियोल एंड सेंट्रोसोम। तो सेंट्रोसोम क्या है? दो सेंट्रियोल जब आपस में 90° पे एडजस्ट हो जाएँ। दिस इज वन सेंट्रियोल, सिलेंडर कलर सेंट्रियोल। दिस इज सेकंड सिलेंडर सेंट्रियोल। ये दो सेंट्रियोल आपके 90° पे अरेंज हो गए, और इनके आसपास अमोरफिक सा, इरेगुलर सा, धुंधला सा, क्लाउडीटेक प्रोटींस जमा हो गए। तो आपके दो सेंट्रियोल, परपेंडिकुलर, और क्लाउडीटेक प्रोटीनेशस मटेरियल, इसको हमने क्या कह दिया? सेंट्रोसोम कह दिया। तो सेंट्रोसोम में क्या है? दो सेंट्रियोल हैं, परपेंडिकुलर, और क्लाउडीटेक पेरी सेंट्रियोल मटेरियल है। इसको हम सेंट्रोसोम कहते हैं।

अगर एक सेंट्रियोल की आप बात करें, तो कुछ ऐसा स्ट्रक्चर है। अगर सेंट्रियोल की आप बात करें, तो ऐसा स्ट्रक्चर है। ये अब आपका ट्रिपलेट दिखाई दे रहा है। तीन-तीन पाइप हैं, ट्रिपलेट ट्रिपलेट ट्रिपलेट ट्रिपलेट ट्रिपलेट ट्रिपलेट। सेंटर पे कुछ नहीं है। सेंटर पे प्रोटीन पाए जा रहे हैं। प्रोटीन का एक धब्बा है, जिसको हमने बोला है हब। सेंटर पे प्रोटीन का एक हब है, प्रोटीनेशस हब है, और उसके चारों ओर गोलाई में क्या पाए जा रहे हैं? आपके ट्रिपलेट माइक्रो ट्यूबल्स पाए जा रहे हैं, वो भी नौ। तो सेंटर पे कोई माइक्रो ट्यूबुल नहीं है, हब है, और बाहर आपके ट्रिपलेट हैं ना, पाए जा रहे हैं आपके नौ। तो 9+0 अरेंजमेंट। इसको हमने कहा है, और कार्ट व्हील जैसा ये स्ट्रक्चर है। तो हम बोलते हैं कि सेंट्रियोल का जो स्ट्रक्चर है, कार्ट व्हील लाइक स्ट्रक्चर आपका होता है, ठीक है? तो 9+0 अरेंजमेंट। सेंट्रियोल की 9+2 अरेंजमेंट आपके सिलिया और फ्लेज की। यहां पर इंटर डबलेट ब्रिज था, डबलेट्स के बीच। इंटर सिंगलेट ब्रिज था, सिंगलेट्स के बीच। यहां सिर्फ ट्रिपलेट है, तो इनके बीच में होगा इंटर ट्रिपलेट ब्रिज, और वही आपका हब से जोड़ने वाले रेडियल स्पोक। तो एक रथ के पहिए जैसा ही दिखता है, इसलिए इसे कार्ट व्हील लाइक अरेंजमेंट कहते हैं, ठीक है?

अब आती है आपकी लास्ट ऑर्गेनेल, न्यूक्लियस, और इसके अंदर पाए जाने वाला क्रोमेटिन। तो ये जो न्यूक्लियस है, मेरे भाई, इसे सेल का दिमाग कह सकते हैं, क्योंकि मेन कंट्रोल जो है पूरे सेल पे, वो कौन रखता है? न्यूक्लियस ही रखता है। तो इट इज ब्रेन ऑफ द सेल। और इसका नंबर वेरिएबल है। यूजुअली एक सेल में एक ही न्यूक्लियस होता है, पर कई सेल ऐसे हैं जिसमें न्यूक्लियस नहीं है, जैसे आपका जो मैच्योर मैमेलियन आरबीसी है, हमने पढ़ा, उसमें न्यूक्लियस नहीं है, राइट? सिमिलरली आपका जाइलम है, तो उसमें हम ट्रेकिड की बात करें, वेसल की बात करें, हम लोग फाइबर की बात करें, तो दे हैव नो न्यूक्लियस। कई ऐसे सेल हैं जिनमें मल्टी न्यूक्लियस है, जैसे पैरामीशियम है, तो उसमें दो न्यूक्लियस होते हैं, माइक्रो न्यूक्लियस और मैक्रो न्यूक्लियस। और सिमिलरली और भी ऑर्गेनिज्म। तो फंगस की एक पूरी की पूरी क्लास है, फाइकोमाइसिटी, जिसमें राइजोपस आता है, म्यूकर आता है, एल्बो आता है, इनमें आपके क्या हैं? मल्टीपल न्यूक्लियस पाए जाएँगे। ये सारी चीजें आप लोग पढ़ रहे होंगे इन चैप्टर, बायोलॉजिकल क्लासिफिकेशन, फंगस के बारे में। तो इनका नंबर भी क्या होता है? वेरिएबल होता है।

तो ये जो न्यूक्लियस है, इसके अंदर कुछ सामान पाया जाता है, इसे कहते हैं क्रोमेटिन। नाम है क्रोमेटिन। तो शब्द क्या आ रहा है? क्रोमा, यानी कलर। तो ये जो है, इसको डाई किया जा सकता है। न्यूक्लियस के अंदर कुछ मटेरियल है, जिसको कलर किया जा सकता है। That's why it is called as क्रोमेटिन, राइट? और कलर कैसे किया जा सकता है? बेसिक डाई से, क्योंकि जो क्रोमेटिन है, मेनली इसमें जो सामान है, वो एसिडिक है, ऑक्सीराइबोस न्यूक्लिक एसिड, राइबोस न्यूक्लिक एसिड। तो इनको बेसिक डाई लुभाती है। ये जो क्रोमेटिन है, इट इज न्यूक्लियोप्रोटीन। इसमें न्यूक्लिक एसिड भी होता है, डीएनए और आरएनए, सबसे ज्यादा डीएनए, फिर आरएनए, और उनको स्टेबलाइज करने के लिए प्रोटीन भी होते हैं, हिस्टोन प्रोटींस भी। और हायर लेवल ऑफ पैकेजिंग पे, जब एक क्रोमोजोम का खुला खुला मटेरियल… घर पर बैठा हुआ हूं, तो कच्छा पहन के बैठा हूं, भैया, निक्कर पहन के बैठा हूं। लेकिन जब पार्टी में जाऊंगा, तो सूट बूट आ जाएगा, क्यों? क्योंकि तब हमें तैयार होना है। सो जब सेल डिवाइड नहीं कर रहा होता, कोई काम नहीं है, उस टाइम पर डीएनए खुला खुला पड़ा है। लेकिन जब सेल डिवाइड करने वाला होता है, तो पैक हो जाता है, क्रोमोजोम बना लेता है, राइट? ऐसा स्ट्रक्चर देखिए, जब आपका डिवाइड नहीं कर रहा है, खुला खुला पड़ा है डीएनए और प्रोटीन, खुले खुले पड़े हैं। जब भैया डिवाइड करने पर आया, फटाफट पैक होकर के, दुल्हे राजा बन गया, क्रोमोजोम, सोना बाबू बन गया है, तैयार होकर के, राइट? तो क्रोमोजोम बना लेता है, बढ़िया पैकेजिंग कर लेता है। तो सेम यहां पर आपको चीज देखने को मिलेगी कि यहां पर डीएनए और आरएनए है, हिस्टोन प्रोटीन है, जो बेसिक लेवल की पैकेजिंग करता है। हायर लेवल ऑफ पैकेजिंग करनी है, तो नॉन-हिस्टोन क्रोमोसोमल प्रोटीन, यानी एनएचसी प्रोटीन की जरूरत पड़ती है।

तो ये आपका न्यूक्लियस है। न्यूक्लियस की आउटर मेंब्रेन, न्यूक्लियस के इनर मेंब्रेन, बीच-बीच में फ्यूज हो जाती हैं। मेंब्रेन आपस में ही, आउटर और इनर मेंब्रेन फ्यूज हो गईं, आउटर इनर मेंब्रेन फ्यूज हो गईं। तो बीच-बीच में आपके पोर बन जाते हैं। इनको क्या कहा जाता है? न्यूक्लियर मेंब्रेन के पोर्स, न्यूक्लियर मेंब्रेन के छेद, यानी न्यूक्लियर पोर्स, इनको कहा जाता है, ठीक है? अब डीएनए आपका पाया जाता है न्यूक्लियस के अंदर। तो डीएनए से आरएनए कहां बनेगा, सर? न्यूक्लियस के अंदर। प्रोटीन कहां बनता है? राइबोसोम। कहां पाए जाएँगे? न्यूक्लियस के अंदर, सर? कोई राइबोसोम नहीं होते, सर। बाहर आपका रफ एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम पाया जाता है, वहां होंगे। तो अगर मुझे आरएनए से प्रोटीन बनाना है, तो कहां भेजूंगा आरएनए को, सर? न्यूक्लियस के बाहर। अगर मुझे आरएनए को न्यूक्लियस के बाहर भेजना है, तो इसी पोर से तो भेजूंगा। और अगर प्रोटीन बन चुका है साइटोप्लाज्म में, राइबोसोम ने प्रोटीन बना दिया है, और कुछ प्रोटीन मुझे न्यूक्लियस में चाहिए, डीएनए रेप्लिकेशन के प्रोटीन हैं, ट्रांसक्रिप्शन के प्रोटीन हैं, एंजाइम्स हैं, ये अगर मुझे चाहिए, तो प्रोटीन को अंदर भी आना है। यानी चाहे एमआरएनए को बाहर भेजना हो या प्रोटीन को अंदर लाना हो, दोनों का दोनों आपका काम कौन कर सकता है? न्यूक्लियर पोर। तो बाय-डायरेक्शनल ट्रांसपोर्ट यहां पर होता है। तो आउटर मेंब्रेन और इनर मेंब्रेन के बीच का जो स्पेस है, इसे कहा जाता है इंटर मेंब्रेन स्पेस, या न्यूक्लियस के बाहर का स्पेस है ना ये, इसे बोल दिया जाता है पेरी न्यूक्लियर स्पेस। पेरीफेरी ऑफ न्यूक्लियस पर पाया जा रहा है, पेरी न्यूक्लियर स्पेस। डायमेंशन है 10 से 50 नैनोमीटर, है ना इतनी मोटाई है, 10 से 50 नैनोमीटर, इन दोनों मेंब्रेन के बीच, करेक्ट? यहां पर आपका क्या पाया जा रहा है? क्रोमेटिन पाया जा रहा है। क्रोमेटिन पाया जाएगा। तो यहां पर डीएनए है, हरा-भरा, पिंक कलर का, आरएनए बना रखा है, छोटा सा, पर्पल कलर का। लेट्स से आपका प्रोटीन है, हिस्टोन, और हायर लेवल पर चाहिए होंगे, ब्लू कलर के आपके नॉन-हिस्टोन क्रोमोसोमल प्रोटीन। इन चारों को मिलाकर के क्रोमेटिन कहते हैं। अब न्यूक्लियस के अंदर ये जो मटेरियल है, बाकी भरा हुआ, इसको क्या कहेंगे? न्यूक्लियोप्लाज्म। सेल का प्लाज्मा, साइटोप्लाज्म, माइटोकांड्रिया का प्लाज्मा, मैट्रिक्स, क्लोरोप्लास्ट का प्लाज्मा, आपका स्ट्रोमा, और न्यूक्लियस का प्लाज्मा, न्यूक्लियोप्लाज्म।

अब ये जो न्यूक्लियस है, इनमें कुछ डेंस स्ट्रक्चर पाए जाते हैं, गोल-मटोल, जिनके ऊपर कोई मेंब्रेन नहीं है। ये अलग से कोई ऑर्गेनेल नहीं है। न्यूक्लियस के अंदर ही कुछ स्ट्रक्चर्स पाए जाते हैं, गोल-मटोल, डेंस, जिनको कहते हैं न्यूक्लियोलस। न्यूक्लियोलस, न्यूक्लियोलस, जो है, यह आपका कहलाता है आरआरएनए फैक्ट्री, यानी यह बनाता है राइबोसोमल आरएनए। और राइबोसोमल आरएनए और प्रोटीन मिलकर क्या बना रहे थे? राइबोसोम। और राइबोसोम खुद कहलाता है प्रोटीन फैक्ट्री, यानी बाकी सेल में जितने भी प्रोटीन हैं, वो राइबोसोम खुद बनाएगा। यानी जिन भी सेल्स में प्रोटीन की रिक्वायरमेंट ज्यादा है, अगर प्रोटीन ज्यादा चाहिए, तो राइबोसोम ज्यादा होने चाहिए, यस? राइबोसोम ज्यादा चाहिए, तो आरआरएनए ज्यादा होना चाहिए, यस? और आरआरएनए बनाना है, तो आरआरएनए की फैक्ट्री, यानी न्यूक्लियोलस ज्यादा होने चाहिए। तो जिन सेल में ज्यादा प्रोटीन बनते हैं, उनमें ज्यादा नंबर में और ज्यादा बड़े न्यूक्लियोलस पाए जाते हैं। और जिन सेल्स में कम प्रोटीन आपके पाए जाते हैं, कम प्रोटीन अगर बनते हैं, तो छोटा न्यूक्लियोलस, और एक न्यूक्लियोलस आपका पाया जाता है। दिस इज करेक्ट? तो जब डीएनए आपका डिवाइड नहीं कर रहा होता, तो खुला खुला प्रेजेंट होता है, अदरवाइज वो पैक होकर के क्रोमोजोम बना लेता है। तो ये आपका क्रोमोजोम का ओवरऑल फुल्ली पैक्ड स्ट्रक्चर है, ठीक है? तो यहां पे सेंटर पे आपको क्या देखने को मिल रही है? प्राइमरी कंस्ट्रिक्शन। सीधा-सीधा सीधा-सीधा क्रोमोजोम चल रहा था, चला चला चला, गड्ढा आ गया, पहली कंस्ट्रिक्शन आ गई। सीधा-सीधा चल रहा था, पहला गड्ढा आया, पहली कंस्ट्रिक्शन। दिस इज प्राइमरी कंस्ट्रिक्शन, है ना? दिस इज प्राइमरी कंस्ट्रिक्शन, या सेंट्रोमीयर, है ना? इसके ऊपर भी दो आर्म्स पाई जाएंगी, नीचे भी दो आर्म्स पाई जाएंगी। तो एक साइड की जो दोनों आर्म्स हैं, दिस इज कॉल्ड एज क्रोमेटिड। एक साइड की दोनों आर्म, एक क्रोमेटिड, दूसरे साइड की दोनों आर्म, दूसरी क्रोमेटिड। ये दोनों की दोनों का पापा सेम है, तो इन्हें क्या कहा जाएगा? सिस्टर क्रोमेटिड्स कह दिया जाएगा, बिल्कुल कह दिया जाएगा, सर। तो दैट्स टू क्रोमेटिड्स। ये जो मैंने लाल कलर से मार्क कर रखे हैं, दीज आर सिस्टर क्रोमेटिड्स, क्योंकि दोनों का पापा सेम है, दोनों का सेंट्रोमीयर सेम है। ये जो सेंट्रोमीयर है, इसके चारों ओर प्रोटीन की डिस्क लगी रहती है, एक प्रोटीन का कवर लगा रहता है, जिसको कहते हैं काइनेटोकोर। तो समझ लीजिए, मुझे सेल को डिवाइड करना है, मुझे इस क्रोमोजोम के कंटेंट को आधा-आधा फाड़कर के दो सेल्स में भेजना है। तो खींचातानी का काम कौन करेगा? आपके स्पिंडल फाइबर्स। कई सारे फाइबर्स हैं, जो क्रोमोजोम को अलग करने का काम करते हैं। तो ये जो आपका खींचातानी का काम करेगा, ये कौन करेगा? स्पिंडल फाइबर करेगा, और स्पिंडल फाइबर कहां अटैच होता है? काइनेटोकोर पे, ना कि सेंट्रोमीयर पे। बच्चे गलत कर देते हैं। सेंट्रोमीयर पे अटैच नहीं होगा। यहां पर आपका प्रोटीन की डिस्क लगी रहती है, जिसको कहा जाता है काइनेटोकोर, उस पे स्पिंडल फाइबर अटैच होंगे, और वो सेपरेशन कर रहे होंगे, करेक्ट? बहुत कम ऐसे क्रोमोजोम्स होते हैं जिन पर आपकी सेकेंडरी कंस्ट्रिक्शन पाई जाएगी। क्रोमोजोम सीधा-सीधा सीधा-सीधा चला, गड्ढा आ गया, फुचक, प्राइमरी कंस्ट्रिक्शन। फिर सीधा-सीधा सीधा-सीधा चला, फुचक, गड्ढा आ गया। ये जो आपके डंडे बना रखे हैं, ऊपर एक गोला बना रखा है, नीचे एक डंडा बना रखा है। जो डंडा है, दैट इज सेकेंडरी कंस्ट्रिक्शन, और इसके ऊपर ये जो छोटा सा गोला बना रखा है, ये है आपका सैटेलाइट। सैटेलाइट मतलब इतना छोटा सा रीजन है कि इसको ठीक से स्टेन भी नहीं किया जा सकता। भाई एक छोटा सा आपको मिट्टी का कण दे दूं और कहूं उस पर कलर करो, भाई दिखेगा ही नहीं, तो कलर कहां से करोगे, कलर वो पकड़ेगा कैसे? उसकी साइज ही नहीं है उतनी। तो यहां पर इट इज अ नॉन-स्टेनिंग रीजन। सेकेंडरी कंस्ट्रिक्शन के ऊपर एक नॉन-स्टेनिंग रीजन है, बहुत छोटा सा, जिसको सैटेलाइट कहते हैं। और ऐसे क्रोमोजोम बहुत कम क्रोमोजोम जिन पर सैटेलाइट रीजन पाया जाता है, उन्हें सैट क्रोमोजोम कहते हैं, बिकॉज़ ऑफ़ द प्रेजेंस ऑफ़ सैटेलाइट। तो प्राइमरी कंस्ट्रिक्शन लगभग सारे क्रोमोजोम में होगी, सेंट्रोमीयर सब में होगा, लेकिन सेकेंडरी कंस्ट्रिक्शन बहुत चुनिंदा क्रोमोजोम्स में होती है, जिन्हें सैट क्रोमोजोम्स कहते हैं हम लोग, राइट? तो बहुत चुनिंदा ही क्रोमोजोम होंगे जिनको सैट क्रोमोजोम बोल पाएँगे। यहां जो डीएनए होता है सैट इलाके में, ये यूजुअली एडेनिन और थाइमिन रिच आपका डीएनए होता है। A और T नाइट्रोजेनस बेसेस यहां पर ज्यादा पाए जाते हैं। क्रोमोजोम्स अलग-अलग टाइप के होते हैं, डिपेंडिंग अपॉन कि उनके सेंट्रोमीयर की पोजीशन क्या है। अगर सेंट्रोमीयर सेंटर पे है, ऊपर की आर्म और नीचे की आर्म बराबर है, तो इसे कहेंगे मेटासेन्ट्रिक। दोनों की दोनों आर्म्स बराबर, मेटासेन्ट्रिक। अगर ऊपर की आर्म थोड़ी सी छोटी है, नीचे की आर्म थोड़ी सी बड़ी है, बहुत ज्यादा फर्क नहीं है, तो इट इज सबमेटासेन्ट्रिक। अगर ऊपर की आर्म बहुत छोटी है और नीचे की आर्म बहुत बड़ी हो गई, तो इट इज एक्रोसेन्ट्रिक। और ऊपर की आर्म ही गायब हो गई, तो आपका सेंट्रोमीयर टेल पे पहुँच गया, एकदम एंड पे, तो इट इज कॉल्ड एज टेलोसेन्ट्रिक। तो मेटासेन्ट्रिक, सबमेटासेन्ट्रिक, एक्रोसेन्ट्रिक, एंड टेलोसेन्ट्रिक, ये चार प्रकार के क्रोमोजोम्स पाए जाते हैं, राइट? ये आपको देखने को मिलेगा। तो जहां पर दोनों आर्म्स बराबर हैं, तो एक जैसी ही दिखती हैं, तो इनमें कोई फर्क नहीं है। जहां एक आर्म थोड़ी सी छोटी हुई और दूसरी थोड़ी सी बड़ी हो गई, छोटी वाली को बोलेंगे स्मॉल p, बड़ी वाली को बोलेंगे स्मॉल q। यहां एक बहुत छोटी है, दूसरी बहुत बड़ी है, तो भी हम छोटी वाली को बोलेंगे स्मॉल p, बड़ी वाली को बोलेंगे स्मॉल q। यहां पे स्मॉल p गायब भी हो गई, एंड में, तो यहां पे कोई स्मॉल p नहीं है, सिर्फ और सिर्फ स्मॉल q ही आपको दिखाई दे रही है।

ये आपकी पूरी की पूरी डिस्कशन है। अब यहां पर मैंने जितने भी पिछले पांच साल के इंपॉर्टेंट पी वाई क्यूज़ थे, वो डाले हैं। पीले कलर से मैंने हाईलाइट कर दिए हैं क्वेश्चन, और ग्रीन कलर से आंसर। तो ये आपकी पूरी कंप्लीट कंसोलिडेटेड शीट हो गई, जिसमें आपको कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। कुछ भी करने की जरूरत नहीं है, मतलब इतना प्यारा लेक्चर, जहां पर एवरीथिंग इज सुप्रीमली फाइन, समझने पे पूरा का पूरा फोकस। क्वेश्चंस आप देख लीजिएगा, सारे के सारे। जो हरे कलर के आंसर हैं, ये ऑलरेडी नोट्स में मैंने टिक कर दिए हैं, यानी आपको खुद से कुछ काम करने की जरूरत नहीं है। सारी बात जो है, जो पी वाई क्यू में आई हुई है, वो हरे कलर से पहले ही लिख दी है, राइट? हाथ से बनाए हुए, सुंदर-सुंदर, बढ़िया-बढ़िया नोट्स, शानदार नोट्स, जिनको जब आप प्रिंट निकालोगे, तो आपको पता लगेगा, क्योंकि मैंने प्रिंट निकाल के देख लिए हैं। बहुत टाइम के बाद मैं जो है आप तक यह लेक्चर लेकर के आ रहा हूं। अपने तरफ से आई हैव डन कंप्लीट आर एंड डी, जिससे स्टूडेंट्स को कोई प्रॉब्लम ना हो। ब्लैक एंड वाइट भी प्रिंट निकाल के देखें हैं, कलर भी प्रिंट निकाल के देखें हैं। ब्लैक एंड वाइट भी इक्विवेलेंट सुंदर लग रहे हैं। तो आप ब्लैक एंड वाइट भी प्रिंट निकालो, सस्ता पड़ता है, और कॉस्ट इफेक्टिवनेस इज वेरी इम्पॉर्टेन्ट। उसमें कोई शर्माने की बात नहीं है, क्योंकि बहुत सारे नोट्स आने वाले हैं। सो प्लीज मेक श्योर कि अगर आप कॉस्ट इफेक्टिव देखना चाहते हैं, तो स्टार्टिंग से ही ब्लैक एंड वाइट इनका प्रिंट निकाल लीजिए। और लिखना चाहते हो तो लिख सकते हो। मेडजी अगर आपके पास है तो शानदार बात है, उससे बढ़िया कुछ हो ही नहीं सकता। तो ये सारी चीजें आप रिवाइज कर लेंगे। मेडजी आपके पास है, सामने, उसमें बैठकर के टिक लगाते रहिए। बॉटनी मेड इजी इज सुप्रीम फॉर द कंटेंट, और वहां पे आपको रिफाइंड कंटेंट भी मिल रहा होगा। तो आई होप आपको ये एफर्ट्स पसंद आए होंगे। इफ यस, एक बार फटाफट बता दीजिएगा इन द कमेंट सेक्शन। और मैं मिलता हूं अगले सेशन में आपसे, विद अनदर ब्यूटीफुल चैप्टर, दैट इज सेल साइकिल एंड सेल डिवीजन। तो अब ये जो चैप्टर था, ये खत्म हो चुका है। तो अब सेल साइकिल एंड सेल डिवीजन के बारे में पूरी की पूरी चर्चा होगी। और सेल साइकिल, सेल डिवीजन का बेस हमारा यहीं पर तैयार हो चुका है, क्योंकि अब हम क्रोमोजोम जानते हैं, अब हम क्रोमेटिड जानते हैं, अब हम क्रोमेटिन जानते हैं, अब हम सेंट्रियोल, सेंट्रोसोम जानते हैं। तो अल्टीमेटली इट इज वेरी इम्पॉर्टेन्ट, राइट? तो अगर आप देखें, तो सिलिया और फ्लेज जो हैं, उनकी बेजल बॉडी कौन बनाता है? आपका सेंट्रियोल। बेजल बॉडी सेंट्रियोल बनाएगा, यानी सिलिया और फ्लेज के तीन पार्ट थे, बेजल बॉडी, हुक, और फिलामेंट। तो बेजल बॉडी सेंट्रियोल लाइक स्ट्रक्चर बनाएगा, उसके ऊपर आपका हुक और फिलामेंट लगे रहते हैं। इस प्रकार का स्ट्रक्चर आपको देखने को मिलता है, नीचे सेंट्रियोल, ऊपर आपका सिलिया फ्लेज। और ये जो सेंट्रियोल है, ये एनिमल सेल डिवीजन में कैसे हेल्प करता है? ये स्पिंडल फाइबर और स्पिंडल अपैरेटस बना रहा होता है। तो बहुत बढ़िया तरीके से हमने ये चीजें देखीं, और आने वाले टाइम में और भी मॉडल्स मैं आपके लिए लेकर के आ रहा हूं, मॉडल्स, मतलब ये जो दिखाए हैं, 3D मॉडल्स, राइट? खुश मत हो जाना कि अरे वाह सर, पढ़ाई के साथ-साथ और भी प्रबंध है। कुछ प्रबंध नहीं है, भाई। यहां पे सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई की बातें होंगी। आई होप मैंने आपके टाइम के साथ पूरी-पूरी जस्टिस करी है। एक मिनट भी यहां पर टाइम पास नहीं हुआ है, कोई इधर-उधर की बातें नहीं हुई हैं। और मेरी प्रायोरिटी हमेशा यही रहती है कि मैं स्टूडेंट के टाइम की इज्जत करूं, और आप भी साथ में बदले में मुझे पूरी-पूरी इज्जत दें, जो कि आप लोग देते ही हैं। आप लोग बहुत ज्यादा प्यार करते हैं, इसीलिए आपके लिए काम करने का और ज्यादा मन करता है। तो अगर आपको ये सेशन अच्छा लगा, वीपू सर ओपी इन द कमेंट सेक्शन, प्लीज। जर्विसेज़ आर्मी ओपी इन द कमेंट सेक्शन, प्लीज। मैं मिलता हूं आपसे अगले सेशन में, तब तक के लिए अपना ख्याल रखिए, और पढ़ाई करते रहिए। और सारे लेक्चर बढ़िया तरीके से अटेंड करते रहिए। आपको जब टाइम मिले तब अटेंड करिए, कोई बंदिश नहीं है। That's why दीज़ आर इन रिकॉर्डेड फॉर्मेट, क्योंकि लाइव में कहीं ना कहीं बातचीत होती है, तो टाइम थोड़ा सा खराब होता है। मैं चाहता हूं ये सीरीज़ ऐसी हो जिसको बच्चा बहुत सालों तक भी जब देखे तो बोले, दिस इज़ द मोस्ट क्रिस्प सीरीज़ फॉर द लास्ट टाइम रिवीजन। एक भी पॉइंट नहीं छूट रहा है, सारी चीजें समझ में आ रही हैं। नोट्स रेडी टू प्रिंट है। एग्जाम से एक दिन पहले प्रिंट निकालिए, आपका बैठकर के साथ-साथ लेक्चर के साथ देखते रहिए, या मेडजी है, उसको अपने सामने रखिए, और पूरा लेक्चर चार्ट डालिए। यही आपको करना है, और कुछ भी नहीं। ऑलराइट एवरीवन, थैंक यू सो मच, लॉट्स ऑफ़ लव, जय हिंद। मिलता हूं आपसे अगले सेशन में, तब तक के लिए ख्याल रखिए और पढ़ाई करते रहिए। थैंक यू, बाय।