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ईश्वर प्रणिधान से बाधाओं का नाश || स्वामी विवेकानंद जी परिव्राजक @AdhyatmYaatra-xt6kp

अध्यात्म यात्रा – Adhyatm Yaatra47:02

Transcription

[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]

नौ बाधक बताए इस सूत्र में व्याधि, न संशय, प्रमाद, आलस्य, अरती, भ्रांति, दर्शन, अलब, भूमिक, कत्व, अवस्थित, तत्वा, चित्त विक्षेपा, तराया। ठीक है तो पहला बाधक है व्याधि।

व्याधि का अर्थ है शारीरिक रोग। शारीरिक रोग सर्दी, जुकाम, बुखार, खांसी, इस तरह के जो रोग आते हैं शरीर में वात, पित्त, कफ की नाना अधिकता से असंतुलन से शरीर में रोग पैदा होते हैं। तो ईश्वर प्रधान करने से शरीर में रोग नहीं होंगे। आप कहेंगे कैसे नहीं होंगे? ईश्वर प्रधान में सारे काम ईश्वर से पूछ-पूछ के करने पड़ेंगे, ईश्वर के संविधान के अनुकूल करने पड़ेंगे। ईश्वर कहेगा रात को जल्दी सोओ तो आपको जल्दी सोना पड़ेगा। ईश्वर कहेगा सुबह जल्दी उठो चार पा बजे उठो, रात को 10 बजे सो जाओ तो 10 बजे सोना पड़ेगा। सुबह चार पा बजे उठो, चार पा बजे उठना पड़ेगा। फिर कहेगा चलो व्यायाम करो तो व्यायाम करना पड़ेगा। फिर कहेगा ईश्वर स्नान करो तो आपको स्नान करना पड़ेगा। फिर ईश्वर कहेगा ध्यान करो, फिर आपको ध्यान करना पड़ेगा। बताओ बीमारी कहां से आएगी? जल्दी सोएंगे, सुबह जल्दी उठेंगे, व्यायाम करेंगे, ध्यान करेंगे, हवन करेंगे, स्नान करेंगे तो बीमारी कहां से आएगी? सब कुछ ठीक ठाक रहेगा। इस तरह से व्याधि का नाश हो जाएगा ईश्वर प्रधान करने से। ऐसे नाश होगा। ठीक है, स्पष्ट हो गया तो पहला बाधक है व्याधि, शारीरिक रोग नहीं आएंगे, व्यक्ति स्वस्थ रहेगा।

दूसरा है स्न। स्न का अर्थ होता है उत्तम कर्मों से जी चुराना, अच्छे कर्मों से बचने की कोशिश करना। जी चुराना, जी चुराना एक मुहावरे की भाषा है। इसका अर्थ है बचने की कोशिश करना, मुझे अच्छा काम ना करना पड़े और कोई कर लेगा, मैं क्यों करूं? सारी दुनिया की सेवा का मैंने ले रखा है क्या? आदमी ऐसे बहाने मारता है और अपने काम से बचने की कोशिश करता है। मैं क्यों करूं और कोई कर लेगा? तो यह भी योगाभ्यास का बाधक है, शत्रु है। जब हम अच्छे काम नहीं करेंगे, अच्छे काम से बचने की कोशिश करेंगे तो फिर क्या करेंगे? बुरे काम करेंगे। बुरे काम करेंगे तो भगा देगा, भाग जा यहां से। वह हम स्वीकार नहीं करेगा। और यदि ईश्वर समर्पण करेंगे, सब काम ईश्वर से पूछ के करेंगे, उसकी सहमति सम्मति से करेंगे तो बुरे काम से छूट जाएंगे और अच्छे काम करेंगे और जो यह जो जी चुराने वाली बात है, यह खत्म हो जाएगी। इसका भी नाश हो जाएगा। यह था स्न।

तीसरा है संशय बाधक, तीसरा संशय। तो जब ईश्वर प्रधान करेंगे तो वेद आदि शास्त्र पढ़ने पड़ेंगे, हां या ना? अब शास्त्र पढ़ेंगे तो संशय सारे दूर हो जाएंगे, सब भ्रांति संशय दूर हो जाएगा। ठीक है ना? ईश्वर है या नहीं है, इसका नाम है संशय। जब मन में दो विचार हो, कम से कम दो-तीन-चार-पांच-दस-बीस भी हो सकते हैं, कम से कम दो विचार हो और निर्णय कुछ नहीं हो पा रहा, इसका नाम है संशय। तो मन में यह विचार आता है, पता नहीं ईश्वर है या नहीं है? पता नहीं वह देखता है या नहीं देखता है? कर्मों का हिसाब रखता है या नहीं रखता है? न्याय कारी है या अन्याय कारी है? अगला जन्म होगा या नहीं होगा? बंधन मुक्ति होता है या नहीं होता? यह सब कहने की बातें हैं। तो इस तरह के जो विचार हैं, उसका नाम है संशय। जब शास्त्र पढ़ेंगे, चिंतन मनन करेंगे, विचार करेंगे, ईश्वर का ध्यान करेंगे तो सारे संशय दूर हो जाएंगे। यह तीसरा बाधक भी गया।

बहुत लोगों को यह संशय रहता है, पता नहीं अगला जन्म होगा या नहीं होगा? मोक्ष तो बहुत दूर की बात है, अगला जन्म होगा इसी पर संशय, यही नहीं बैठता दिमाग में। हां जी, आपको बैठता है दिमाग में अगला जन्म होगा? बैठता है। यह शब्द है दिमाग में। किस-किस को बैठता है अगला जन्म होगा? अगर दिमाग में बैठ गया, फिर तो आप सुधर जाएंगे, फिर तो सुधर जाएंगे। पर अगर दिमाग में नहीं बैठता है, खाली शाब्दिक है तो फिर नहीं सुधरेंगे। आज बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके दिमाग में यह बात नहीं बैठती कि अगला जन्म होगा, संशय है। मैं कॉलेजों में जाता हूं, यूनिवर्सिटी में जाता हूं, वहां चार च स विद्यार्थी बैठे मेरे सामने और मैं पूछता हूं, हा भाई बताओ आप लोग अगला जन्म होगा क्या? इस बात को मानते हैं? तो जो जो जो जो नहीं मानते वह हाथ ऊंचा करेंगे तो वहां पर व आधे तो हाथ ऊंचा करते हैं, 200 विद्यार्थी हाथ ऊंचा करते हैं, 50 पर हम नहीं मानते। फिर मैं पूछता हूं जिनको डाउट है वह हाथ ऊंचा करें तो 40 पर हाथ ऊंचा करते हैं। अब कितने बचे? 10 पर मानते हैं कि हां हम मानते हैं अगला जन्म होता। वो भी शाब्दिक मानते हैं, समझ में तो उनके भी नहीं आया। शाब्दिक रूप से मानते हैं क्योंकि बचपन से सुनते आ रहे हैं माता-पिता से, घर परिवार से, इधर से उधर से सुनते आ रहे हैं कि हां भाई अगला जन्म भी होता है, कर्मों का फल मिलता है। ऐसे सुनी सुनाई बात। बाकी तो आधे तो बना ही करते हैं और 40 परट को डाउट है।

तो यदि यह समझ में आ गया कि ईश्वर है, वह न्याय कारी है, अगला जन्म भी होगा, हमारे अच्छे कर्मों का, बुरे कर्मों का सबका फल मिलेगा। अगर ये दिमाग में उतर गई बात तो व्यक्ति सुधर जाएगा। फिर वह बुरे काम नहीं करेगा क्योंकि उसको फिर यहां दिखने लगेगा कि अगर मैंने बुरे काम किए तो भगवान भेड़िया बनाएगा, शेर बनाएगा, चीता बनाएगा, कुत्ता बनाएगा, बकरी बनाएगा, सांप बनाएगा, बिच्छू बनाएगा, क्या-क्या बनाएगा? और बरगद का पेड़ बना दिया तो 200-500 साल की सजा, खड़े रहो एक ही जगह पर, चलना-फिरना भी बंद। तो जिसको यह समझ में आ जाएगा, वो फिर ठीक काम करेगा। बुरे काम [संगीत] करेगा। तो आपके मन में थोड़ा बहुत संशय हो अगर तो उसको दूर कर ले। संक्षेप से बता देता हूं कि हम अपने दिमाग में इस बात को कैसे बिठाएं कि अगला जन्म होगा? खुद भी समझ ले, अपने बच्चों को समझाए, मित्रों को समझाए, पड़ोसियों को समझाए, दूसरों को भी समझाए कि अगला जन्म होगा। चलिए, कैसे समझाएंगे? छोटे-छोटे दो-तीन प्रश्न पूछता हूं, बहुत बत सिंपल है, आप उत्तर दे सकते हैं।

पहला प्रश्न: आपको जो मनुष्य का शरीर मिला, यह मनुष्य का शरीर मुफ्त में मिला है या कोई कर्मों का फल है? कर्मों का फल। ठीक है, बिल्कुल सही उत्तर।

दूसरा प्रश्न: कर्म पहले किया जाए, फल बाद में दिया जाए, यह नियम ठीक है या फल पहले दिया जाए, कर्म बाद में किया जाए? कौन सा नियम ठीक है? धवल जी, कौन सा नियम ठीक है? कर्म पहले, फल बाद में। हां, सही है। आपका दूसरा उत्तर भी ठीक है। कर्म पहले करेंगे, फल बाद में मिलेगा, यह न्याय की बात है। तो दो बात स्पष्ट हो गई। यह शरीर आपको मुफ्त में नहीं मिला, यह कर्मों का फल है। कर्म पहले करेंगे, फल बाद में मिलेगा। पहले विद्यार्थी परीक्षा देता है, बाद में नंबर मिलते हैं या कभी ऐसा भी होता है, पहले नंबर दे दे, परीक्षा बाद में देना? पहले नंबर ले जाओ 85 पर, 80 पर? कोई नहीं देता। कोई स्कूल वाले लोग आज तक एक बार भी एडवांस में नंबर नहीं दिए किसी भी विद्यार्थी को कि परीक्षा बाद में दे देना, पहले नंबर ले जाओ। कोई भी नहीं देता। न्याय यही कहता है, पहले परीक्षा दो, बाद में नंबर मिलेंगे। तो पहले कर्म, बाद में फल। दो बात स्पष्ट हो गई।

अब तीसरा और आखरी सवाल: यदि यह शरीर कर्मों का फल है, यदि आप मानते हैं कर्म पहले करेंगे, फल बाद में मिलेगा, तो पैदा होते ही आपको फल मिल गया, शरीर तो मिल ही गया ना पैदा होते ही? तो जब आप कह रहे हैं कि फल बाद में मिलता है, कर्म पहले करते हैं, आपको पैदा होते ही फल मिल गया, तो जिन कर्मों का फल यह शरीर है, जिन कर्मों का फल यह शरीर है, वह कर्म आपने कब किए थे? अब आपने बोला मैंने कुछ नहीं बोला। मैंने कुछ नहीं बोला। आपने बोला कब किए थे कर्म? पिछले जन्म में। फल कब मिला? इस जन्म में। हो गए दो जन्म आ गए ना समझ में? तो ऐसे अपने साथियों को बता देना, उनको भी समझा देना कि भाई अगला जन्म, ध्यान कर लो, कभी डिस्कवरी चैनल पर ना पहुंच जाए। जो लोग बुरे काम करते हैं, घोटाले करते हैं, उनको ईश्वर पशु-पक्षी बना देगा, वृक्ष-वनस्पति बनाएगा या समुद्री जीव बनाएगा या कहीं साउथ पोल पर बना देगा, पोलर बियर, सफेद बर्फ के भालू। ऐसे बना देगा, फर वो डिस्कवरी चैनल पर दिखाई देंगे। तो इस प्रकार से हमें यह स्वीकार करना चाहिए और संशय नहीं रखना चाहिए कि अगला जन्म होगा या नहीं होगा। इस तरह सारे संशय दूर हो जाएंगे।

विश्वास टूटने पर ध्वनि नहीं होती, लेकिन उसकी गूंज जो है वह सारा जीवन तंग करती रहती है। इसलिए लापरवाही नहीं करनी चाहिए, सावधान रहना चाहिए। जो व्यक्ति ईश्वर समर्पण करेगा, सब काम अनुशासन में करेगा, ठीक टाइम टेबल से करेगा तो वह गलती कैसे करेगा? लापरवाही नहीं करेगा, सोच समझकर वचन देगा, जल्दबाजी में नहीं देगा, विचार किए बिना कोई वचन नहीं देगा। आगे-पीछे पूरा सोच-समझकर, चिंतन-विचार करके, नाप-तोल करके फिर कोई वचन देगा और जो देगा तो पूरा करेगा। उसमें व लापरवाही नहीं करेगा क्योंकि उसको पता है लापरवाही की तो नुकसान होगा। तो इस प्रकार से ईश्वर प्रधान करने से यह लापरवाही भी दूर हो जाती है और व्यक्ति सावधान रहता है।

लस्य अगला बाधक है आलस्य। आलस्य का मतलब है शरीर में थकान होने पर फिर ध्यान, उपासना आदि कार्यों में रुचि नहीं रहना। शरीर में भारीपन है, थकान है, नींद पूरी नहीं हुई, रात को लेट हो गए सोने में तो सुबह फिर थकान पूरी निकलेगी नहीं, शरीर में भारीपन रहेगा। उससे आलस्य होगा, काम करने को मन नहीं करेगा। शरीर भी साथ नहीं दे रहा, काम तो करना चाहते हैं, उठना चाहते हैं, दिनचर्या ठीक करना चाहते हैं, ध्यान भी करना चाहते हैं, इच्छा तो है पर शरीर साथ नहीं दे रहा। इसका नाम है आलस्य।

यह तीन बाधक आपस में थोड़े-थोड़े मिलते-जुलते हैं। एक तो स्न, दूसरा प्रमाद और तीसरा आलस्य। यह तीन बाधक ऐसे हैं जो आपस में काफी कुछ मिलते [संगीत] जुलते। तीनों में अंतर है, वह अंतर सुनिए। स्न में व्यक्ति को याद है कि ध्यान का समय हो चुका है। रोज शाम को 6 बजे बैठता है व्यक्ति ध्यान में। अब 6 बज चुके हैं, उसको पता है कि समय हो गया ध्यान का, फिर भी वह ध्यान करना नहीं चाहता। कोई बहाना बना करके उससे बचना चाहता है। कोई मेहमान आ गया य आने वाला है तो उसका बहाना बना लेगा कि चलो अभी तो अतिथि आने वाला है, थोड़ी उसकी तैयारी कर ले, ध्यान कल कर लेंगे, आज छोड़ देते हैं। ऐसे वह बचना चाहता है। याद है उसको, भूला नहीं है। इस स्थिति का नाम क्या है? स्न। जानबूझकर व्यक्ति काम से बचना चाहता है, करना नहीं चाहता। यह स्न है।

और प्रमाद में भूल जाता है, भूल ही गया। अरे आज तो मैं भूल ही गया ध्यान करना था। दूसरे काम में उहा, याद ही नहीं रहा। स्न में याद था पर काम करने की इच्छा नहीं थी। इसमें तो भूल ही गया। प्रमाद में लापरवाही में भूल जाता है, जिसको भकड़ कहते हैं। और तीसरा जो आलस्य है, उसमें वह भूलता नहीं है, याद है उसको, काम करने की इच्छा भी है, पर शरीर साथ नहीं दे रहा। यह समस्या है। यह थोड़ा-थोड़ा अंतर है तीनों में। वह चाहता है ध्यान करना, मैं बैठूं और बैठ भी जाता है और उसको नींद आती है, थकान के कारण उसको आलस्य, नींद आती है। तो चाहते हुए भी वह नहीं कर पा रहा, शरीर साथ नहीं दे रहा। इसको आलस्य कहते हैं। तो इस तरह से ये तीनों बाधक हैं, तीनों में थोड़ा-थोड़ा अंतर है।

तो जब व्यक्ति ईश्वर प्रधान करेगा तो टाइम टेबल से काम करना पड़ेगा। जब टाइम टेबल से काम करेगा तो रात को टाइम पर सोना पड़ेगा, सुबह टाइम से उठेगा तो आलस्य भी नहीं आएगा। यह भी दूर हो जाएगा, लापरवाही भी नहीं करेगा, आलस भी नहीं करेगा और काम से बचने की बात भी नहीं सोचेगा क्योंकि जब वह काम से बचने की बात सोचेगा तो ईश्वर उसको टाइट कर देगा, नहीं, यह गलत है, जो अच्छा काम है वह करो। समय हो गया, टाइम टेबल बनाओ अपना 24 घंटे का, इतने बजे सोना, इतने बजे उठना, इतने बजे व्यायाम करना, इतने बजे ध्यान करना, पूरा टाइम टेबल बनाओ और टाइम टेबल से चलो। जब ईश्वर समर्पण करेगा तो सारा काम करना पड़ेगा तो वह समस्या हल हो जाएगी कि वह काम से बचने की बात सोचे। यह समस्या भी उसकी हल हो जाएगी। ठीक है।

तो पांच बाधक हो गए: व्याधि, स्न, संशय, प्रमाद, आलस्य। छठा है अरती। छठा क्या है? अरती। इस शब्द में रति अंतिम टुकड़ा है। रति, रति का अर्थ है राग, संसार में आसक्ति, इंद्रियों के विषयों में आसक्ति, इसका नाम है रति। और इससे पहले वि उपसर्ग जोड़ देंगे, वि रति। वि का अर्थ है वैराग्य, राग का ना होना। रति माने राग, विर राग ना होना, वैराग्य। और इस रति से पहले फिर अ जोड़ देंगे तो अर्थ फिर उल्टा हो जाएगा, अरती। वैराग्य का ना होना। क्या बोला? वैराग्य का ना होना। यह भी बाधक है। लोग बैठते हैं ध्यान में, संध्या करते हैं, उपासना करते हैं, गायत्री मंत्र से जप करते हैं, फिर कहते हैं मन तो लगता नहीं। करते तो है, खानापूर्ति तो करनी पड़ती है, नहीं तो लोग नास्तिक कहेंगे। तो नास्तिक ना कहें इसलिए चलो बैठ तो जाते हैं, पर मन तो टिकता नहीं। क्यों नहीं टिकता? अरती। यह बाधक वैराग्य तो है नहीं, संसार में रुचि बहुत अधिक है, आकर्षण बहुत अधिक है, संसार के भोगों में आसक्ति बहुत अधिक है। तो वह आसक्ति उनको खींच ले जाती है वहीं पर, उन्हीं विचारों में खींच ले जाती है। वह आसक्ति तो वैराग्य ना होना, यह भी बाधक है।

तो ईश्वर प्रधान करने से यह बाधक भी दूर हो जाता है। धीरे-धीरे व्यक्ति शास्त्रों को पढ़ता है, चिंतन मनन करता है, श्रवण, मनन, नि ध्यास, साक्षात्कार, चार काम पूरे करता है, उसको वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। तो यह अविर भी दूर हो जाता है, आसक्ति भी धीरे-धीरे कम हो जाती है। जैसे कल परसों बताया था एक मनोविज्ञान का नियम है, जहां व्यक्ति को सुख दिखता है वहां उसका मन जाता है, हां या ना? और जहां दुख देखता है वहां से दूर भागता है, हां या ना? ठीक है ना? तो जब संसार की चीजों में व्यक्ति दुख का चिंतन करता है, एक सुख मिलेगा, चार दुख मिलेंगे, परिणाम दुख, बोलिए, ताप दुख, संस्कार दुख, गुण-वृत्ति-विरोध दुख, ये चार दुख बताए महर्षि पतंजलि जी ने योग दर्शन, दूसरा चैप्टर, 15वां सूत्र। इस सूत्र में बताए। वो कहते हैं यदि आप संसार की चीजों में सुख लेंगे तो आपको सुख तो मिलेगा, थोड़ी देर का सुख तो मिलेगा पर एक सुख के पीछे चार दुख और भोगने पड़ेंगे। यह चार दुख भोगने पड़ेंगे। तो जब व्यक्ति संसार के सुखों में इस दुख का विचार करेगा, चिंतन करेगा तो उसको रुचि खत्म हो जाएगी, आसक्ति खत्म हो जाएगी। यह जो अविर है, यह समस्या हल हो जाएगी और उसको वैराग्य हो जाएगा।

जब संसार से वैराग्य हो जाएगा तो फिर ईश्वर में मन टिकेगा। पहले बताया था मैंने कि वैराग्य का जो सिक्का है, उसकी दो साइड है। जैसे एक रुपए का सिक्का होता है, उसकी दो साइड होती है ना, हेड और टेल? ऐसे ही सिक्के की भी दो साइड है। वैराग्य के सिक्के की एक साइड है संसार से रुचि ना होना, संसार में रुचि ना होना, आसक्ति ना होना, संसार से छूटना। यह एक साइड है और इस सिक्के की दूसरी साइड है ईश्वर में रुचि होना। हां जी, बोलेंगे? पहली कौन सी बताई? ना होना और ईश्वर में? तो ये दो काम पूरे होंगे तो वैराग्य कंप्लीट होता है। तो इसके लिए क्या करना? संसार में दुख [संगीत] देखो, इंद्रियों के विषयों में दुख देखो तो वहां से रुचि कम हो जाएगी। आधा काम हो गया। फिर ईश्वर में सुख [संगीत] देखो, ईश्वर के गुणों का चिंतन करें, उसमें आपको लाभ दिखाई देगा, सुख दिखाई देगा, उधर रुचि बढ़ेगी। जब यह दो काम पूरे होंगे तब जाकर मन टिकेगा, इसके बिना नहीं। तो यह काम करने से अरती बाधक दूर हो जाता है। फिर व्यक्ति को वैराग्य हो जाता है, फिर व उसका मन ईश्वर में टिकता है। जैसे व्यापारी का मन पैसे कमाने में टिकता है, हां या ना? खूब टिकता है। वह शिकायत नहीं करता, साब मेरा मन नहीं लग रहा, माल बिक रहा है, फटाफट प्रॉफिट हो रहा है, लाभ हो रहा है तो कोई व्यापारी य नहीं कहता कि मेरा मन नहीं टिक रहा। क लालचंद जी, प्रॉफिट होता है तो टिकता है ना? खूब टिकता है, फिर खूब टिकता है मन। तो जब ईश्वर में लाभ दिखेगा तो वहां भी टिकेगा। धंधे में लाभ दिखता है, वहां टिकता है, टीवी में लाभ दिखता है, वहां टिकता है, 20 जगह लाभ दिखता है व्यक्ति को, उसका मन वहा टिक। बस एक जगह नहीं टिकता क्योंकि व लाभ नहीं दिख रहा, इसलिए नहीं टिक रहा। जब वहा लाभ दिखेगा तो वहा भी मन टिकेगा। तो ईश्वर प्रधान से यह लाभ हुआ।

यह छठा बाधक। सातवां देखिए, भ्रांति दर्शन। यह सातवां बाधक। तो दर्शन का अर्थ है जनम। भ्रांति दर्शन, भ्रांति जन होना, मिथ्या ज्ञान अर्थात अविद्या। मिथ्या ज्ञान, अविद्या भी तो बाधक है, बहुत बड़ा बाधक। संसार में सुख है या दुख है या दोनों? हां, दोनों। सुख अधिक है या दुख अधिक? दुख अधिक। और लोग मानते क्या है? सुख अधिक। इसका नाम है भ्रांति दर्शन। यह भ्रांति, मिथ्या ज्ञान। संसार में दुख अधिक है और मानते हैं सुख अधिक है, यही भ्रांति दर्शन। तो जब संसार में सुख अधिक दिख रहा है तो फिर व्यक्ति संसार में जाएगा, ईश्वर की तरफ क्यों जाएगा? जहां सुख दिखता है, व्यक्ति वही भागेगा और अपने मन को वही भेज, मन को वही ले जाएगा जहां उसको सुख दिखता है। संसार में सुख दिखता है, है य भ्रांति। इसलिए संसार में जाता है, ईश्वर में टिकता नहीं। तो यह चीज ईश्वर के ध्यान, उपासना में बाधक बनती है। परंतु ईश्वर प्रधान करने से, ईश्वर समर्पण करने से, शास्त्रों के अध्ययन करने से, चिंतन मनन करने से, उसकी य भ्रांति दूर हो जाती है। धीरे-धीरे समझ में आ जाता है कि संसार में दुख अधिक है। एक तो शास्त्रों को पढ़ने से आता है, दूसरा बार-बार चिंतन मनन करने से आता है, विचार करने से आता है। जो लोग प्रवचन सुन लेते हैं, फिर विचार नहीं करते, इधर से सुना, इधर से निकाल दिया तो उनको 50 साल में भी कोई लाभ नहीं होता। सुनते रहो, 50 साल तक सुनते रहो, कुछ नहीं आएगा, कोई रिजल्ट नहीं आएगा। बस सुनते समय अच्छा लगता है। प्रवचन सुन लेंगे, बड़े खुश हो जाएंगे, कहेंगे साहब, बहुत अच्छा प्रवचन, मजा आ गया। घर जाकर पूछेगी पत्नी, क्या सुना? बो, ये पता नहीं क्या सुना, प्रवचन बहुत अच्छा था। फिर क्या सुना आपने? घर जाते-जाते आधे घंटे में भूल जाता है आदमी, कुछ याद नहीं करता, दोहराता नहीं, बताता नहीं, चिंतन नहीं करता तो फिर उससे क्या लाभ? कोई विशेष लाभ नहीं है, बस एक शौक पूरा कर लेते हैं लोग। कोई जुआ खेलने जाता है, कोई ताश खेलने जाता है, कोई चेस खेलता है, कोई कैरम बोर्ड खेलता है, कोई क्रिकेट खेलता है, कोई प्रवचन सुन लेता है, बस अपना-अपना शौक है। जिसको जैसा शौक है, वह अपना शौक पूरा कर रहा है और लाभ तो कुछ खास है नहीं। तो पूरा लाभ लेना चाहिए। जो भी आप पढ़ते हैं, सुनते हैं, उस पर विचार करें, मनन करें, चिंतन करें, बार-बार करें तो जो मिथ्या ज्ञान अंदर बैठा है, वह छूट जाएगा, वह दूर हो जाएगा। यह भ्रांति भी हट जाएगी और यह बाधक भ्रांति दर्शन, यह दूर हो जाएगा।

इसलिए बार-बार सुने, पढ़े, मनन करें। यह जो संसार में सुख अधिक है, ऐसा लगता है 20-25 साल की उम्र में, जवानी में तो ऐसा ही लगता है, संसार में सुख बहुत अधिक। तो वो जो सुख अधिक लगता है, यह है भ्रांति दर्शन। पर उस समय तो ठीक ही लगता है, मैं जो सोच रहा हूं, वो ठीक है। फिर 20-22 साल गृहस्थ में रहने के बाद समझ में आता है कि मैं तो भ्रांति में था, सच्चाई तो अब समझ आई, 50-55 में अब समझ आई। तो ये भ्रांति कैसे दूर हुई? मार खाने से, गृहस्थ में मार खाई ना? त कला अर्थात प्रत्यक्ष प्रयोग करने से। पहले तो लगता था बहुत सुख है, फिर जब प्रैक्टिकल किया, शादी कर ली, बच्चे हो गए, फिर उनको पालन करना पड़ा, रो स्कूल लेकर जाओ, छोड़ के जाओ, वापस लेने जाओ, फिर उसकी स्कूल की ड्रेस लाओ, फिर यह लाओ, फिर वो लाओ, फिर बीमार हो गया, उसकी चिकित्सा कराओ, फिर यह टेंशन, फिर वो टेंशन, धंधे की टेंशन, कंपटीशन की टेंशन, 20 तरह की टेंशन। फिर प्रैक्टिकल करने से समझ में आया कि यहां सुख कम और दुख अधिक। तो इस प्रकार से भी भ्रांति दूर हो जाती है। तो संसार में जो सुख दिखता है, विषयों में जो सुख दिखता है, उसमें थोड़ा-थोड़ा प्रत्यक्ष अनुभव भी करना चाहिए। एक-दो चीजों का प्रत्यक्ष कर लेना चाहिए, बाकीयों का अनुमान कर लेना चाहिए। हर चीज का प्रत्यक्ष करना आवश्यक नहीं है। हर वस्तु का स्वयं प्रत्यक्ष करना आवश्यक नहीं है। कुछ चीजें दो-चार चीजें प्रत्यक्ष कर लो और बाकी चीजों का अनुमान कर लो। दुनिया इतनी लंबी है, कहां तक प्रत्यक्ष करेंगे? इतना समय भी नहीं है।

यह जो कई प्रकार के प्रमाण बताए ऋषियों ने वेदों के आधार पर जो कई प्रकार के प्रमाण बताए, वह इसीलिए बताए कि हर चीज का प्रत्यक्ष करना आवश्यक नहीं है और संभव भी नहीं। आपने मिठाई खा ली, एक बार खाई, दो बार खाई, 20 बार खाई, प्रत्यक्ष कर लिया। अब उसका परिणाम देखें। परिणाम क्या हुआ? जिस इच्छा से मिठाई खाई थी, क्या वह इच्छा पूरी हो गई? क्या वह इच्छा शांत हो गई? हां जी, क्या परिणाम निकला? इच्छा शांत हो गई? नहीं। ई ना। तो यह जो परिणाम आया, इस पर ध्यान देना है। इस पर, इसको पकड़ना है, पकड़ के रखना है इसको कि पिछली बार मिठाई खाई थी, जम के खाई, पूरा पेट भर के खाई, ज्यादा खाई, तो भी इच्छा पूरी नहीं हुई। तो ये जो प्रयोग किया, एक्सपेरिमेंट किया, उसका जो रिजल्ट आया, उसको पकड़ो। फिर थोड़े दिनों में आप उस बात को फिर भूल जाएंगे। जिस दिन मिठाई खाई, उस दिन तो रिजल्ट आया कि खूब खाई, जम के, फिर भी तृप्ति नहीं हुई। 15 दिन में भूल जाएंगे। फिर फिर इच्छा होगी मिठाई खाने की। चलो भाई, दोबारा एक्सपेरिमेंट करो। फिर खाओ, फिर जम के खाओ, फिर रिजल्ट देखो। क्या हुआ? क्या इच्छा शांत हो गई? नहीं हुई। तो अब यह फिर याद आ गया कि हां, पिछली बार भी ऐसा ही हुआ था। इच्छा तो शांत हुई नहीं थी। अब दोबारा फिर हमने प्रयोग कर लिया, फिर भी शांत नहीं हुई। तो फिर इस बात को पक्का करें कि भोगों को भोगने से इच्छा शांत नहीं होती है, बल्कि और बढ़ती है। तृष्णा बढ़ती जाती है, इच्छा बढ़ती जाती है, कम नहीं होती, खत्म नहीं होती, शांत नहीं होती। दो दो प्रत्यक्ष परीक्षण हो गया, दो बार। फिर 15 दिन में फिर भूल जाएंगे। फिर तीसरी बार करो, चौथी बार करो, 10 बार करो। तो 10 बार मिठाई खाकर देखो, खूब जम के खाकर देखो और रिजल्ट निकालो। क्या तृप्ति नहीं हुई? तो बस, यह प्रत्यक्ष को पकड़ लो। इससे आपका भ्रांति दर्शन दूर हो जाएगा।

और रसना इंद्रिय के विषय का रस का परीक्षण कर लिया, खा पी के देख लिया। फिर दूसरी इंद्रिय में इच्छा उठेगी। थोड़ा सूंघ कर भी देख ले। चलो बढ़िया बढ़िया परफ्यूम लगाएंगे, बढ़िया बढ़िया अगरबत्ती जलाएंगे, बढ़िया बढ़िया फूलों की खुशबू लेंगे, खूब लेंगे, खूब लो। पूरा दिन गुलाब के फूलों का गुलदस्ता रख लीजिए सामने और सुबह से रात तक पूरा दिन संगते रहिए, पूरा दिन उसकी खुशबू लेते रहिए और फिर रिजल्ट देखिए। क्या इच्छा शांत हो गई? जी नहीं। ई। एक सप्ताह के बाद फिर प्रयोग करो, फिर गुलदस्ता रखो और फिर पूरा दिन सो, पूरा खीच के सूंघ। फिर देखो रिजल्ट क्या आया? क्या तृप्ति हुई? जी नहीं हुई। तो दो चीजों का परीक्षण हो गया। बाकी का अनुमान कर लो। जब दो इंद्रियों में तृप्ति नहीं हुई, तो बाकियों में भी नहीं होगी। दो का प्रत्यक्ष हो गया, भ्रांति दूर हो गई कि इसमें पूरा सुख नहीं है, पूरी तृप्ति नहीं है। इंद्रियों के सुख कितने भी भोग, हजार बार, लाख करोड़ बार भोगे, तब भी शांति नहीं है, तृप्ति नहीं है। तो इस तरह से एक दो विषयों का प्रत्यक्ष परीक्षण कर ले और बाकी तीन इंद्रियों का अनुमान कर ले। जब यहां शांति नहीं मिली, तो वहां भी नहीं मिलेगी। क्यों नहीं मिलेगी? क्योंकि पांचों विषय भौतिक हैं। क्या बोला? पांचों रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श। पांचों विषय भौतिक हैं, प्राकृतिक हैं। जो मिठाई खाई, यह भी भौतिक है। जो सुगंध संगी, यह भी भौतिक है। जब इन दो में भौतिक चीजों में शांति नहीं मिली, तो बाकी तीन भी तो भौतिक हैं, उसी प्रकृति से बनी हैं। तो जब दो में नहीं मिली, तो बाकी तीन का अनुमान कर लो। हर चीज का प्रत्यक्ष करना जरूरी नहीं है।

एक फैक्ट्री में कुछ कारीगर काम कर रहे थे, तो मशीन चल रही थी। एक कारीगर का ध्यान थोड़ा इधर चला गया, उसका हाथ फस गया मशीन में और हाथ कट गया उसका। बेचारा चिल्लाने लगा। 35 मजदूर थे, एक का हाथ कट गया। 34 ने देखा, अरे इसका हाथ कट गया, चिल्ला रहा है बहुत जोर से। तो बाकी लोग भी हाथ कटवा के सीखेंगे? हाथ कटवा के देखें कितना मजा आता है? या उसको देख के सीख लेंगे? अपना हाथ कटवा के सीखना अच्छा है या दूसरे को देख के सीख लेना अच्छा है? इसको अनुमान प्रमाण कहते हैं, ठीक है ना? अब इसका तो प्रत्यक्ष करने की आवश्यकता नहीं। जब उसका हाथ कट गया मशीन में और वह चिल्ला रहा है, रो रहा है, दुखी हो रहा है, तो मैं हाथ कटूंगा तो मेरा भी यही हाल होगा जो उसका हो रहा है। अनुमान नहीं कर सकते क्या? कर सकते। इसलिए हर चीज का प्रत्यक्ष करने की आवश्यकता नहीं है। जब दूसरे लोग दुखी परेशान हैं, भोगों के पीछे भाग रहे हैं, वह सारे दुखी हैं, तो मैं भी भागू तो मेरा भी यही हाल होगा। ऐसे समझ सकते हैं ना? तो व्यक्ति उधर से ब्रेक लगा सकता है। वह भोगों के पीछे नहीं भागेगा। पर वह ब्रेक वही लगाएगा जिसके पिछले संस्कार हों। क्या बोला? जिसके पिछले संस्कार होंगे, वही ब्रेक लगा पाएगा। बाकी लोग नहीं लगा पाएंगे। वह कहेंगे, सारी दुनिया पागल थोड़ी है? करोड़ों व्यक्ति शादी कर रहे हैं, सारे तो मूर्ख नहीं होंगे ना? वह ऐसे ऐसे कुतर्क ढूंढ लेता है। सारे शादी कर रहे हैं, सारे थोड़ी पागल होंगे? इतने बुद्धिमान लोग हैं, पढ़े लिखे लोग हैं, बड़े-बड़े अफसर हैं, ये शादी कर रहे हैं, तो कुछ तो शादी में सुख होता ही होगा। अभी तो कर रहे हैं ये लोग, मैं भी कर लेता हूं। तो ऐसे ऐसे कुतर्क ढूंढ के फिर व्यक्ति शादी कर लेता है। अब बाद में उसको समझ में आ जाती है, कुछ दिनों के बाद। तो इस प्रकार से अनुमान कर लेना चाहिए और बहुत सी आपत्तियों से दुखों से व्यक्ति बच सकता है, अगर इस प्रकार से चिंतन विचार करे तो। ऐसे प्रमाणों का प्रयोग करे तो। इस तरह उसकी भ्रांति दर्शन दूर हो जाएगा।

आठवां बाधक सूत्र में लिखा है, लब्ध भूम कत्व। भूमि का अर्थ है अवस्था। कौन सी अवस्था? समाधि अवस्था। कौन सी अवस्था? समाधि अवस्था। लब्ध माने प्राप्त कर लेना। जैसे आप कहते हैं, उपलब्ध हो गया, प्राप्त हो गया। तो लब्ध भूम कत्व, समाधि प्राप्त हो जाना। और फिर शुरू में 'अ' लगा देंगे, तो अर्थ उलट जाएगा। समाधि अवस्था का प्राप्त ना होना। एक व्यक्ति 20 साल से लगा हुआ है, घर भी छोड़ दिया, शास्त्र भी पढ़ लिए, जंगल में रहता है, परिवार छोड़ दिया, संपत्ति छोड़ दी, सब कुछ छोड़ दिया। 20 साल से तपस्या कर रहा है, फिर भी समाधि नहीं मिली। बिचारा उदास हो जाएगा, निराश हो जाएगा, घबरा जाएगा और वह सोचेगा, यह क्या है? यह सब फालतू बातें, सिर्फ कहने बोलने की बातें। समाधि कहां होती है? कुछ तो हुआ नहीं। मैं 20 साल से लगाऊं, अब तक तो मिले नहीं। तो उसका विश्वास उठ जाएगा, हिल जाएगा। वह सोचेगा, यह सब फालतू बातें, कहने कहने की बात, कुछ होता होता कुछ नहीं। तो ऐसा सोचने पर उसकी प्रगति में ब्लॉक, रुक जाएगी। यह बाधक है। अगर समाधि प्राप्त नहीं हुई, अथवा कुछ भी प्रोग्रेस नहीं हुई। चलो, समाधि तो ऊंची बात है। किसी को समाधि का लक्ष्य था, उसने मेहनत की और समाधि प्राप्त नहीं हुई, तो भी वह बेचारा उदास, निराश हो जाएगा। और एक व्यक्ति की योग्यता कम थी, उसने समाधि का लक्ष्य नहीं बनाया, पर सोचा, चलो कुछ तो प्रगति करेंगे। तो जितना सोचा, उतनी भी नहीं हुई। तो जितना सोचा था, उतनी जब उपलब्धि नहीं होती, तो व्यक्ति उदास हो जाता है, निराश हो जाता है, घबरा जाता है और वह सोचता है, यह क्या है? सब खाली बोलने की बातें हैं, कुछ होता होता कुछ है नहीं, छोड़ो। वह छोड़ के भाग जाता है, वह अपना रास्ता बदल लेता है। तो वह बाधक हो गया उसके लिए। तो ऐसा भी बाधक दूर हो जाता है, जब ईश्वर प्रधान करेंगे, ईश्वर के नियम से चलेंगे, सब काम अनुशासन में करेंगे, टाइम टेबल के हिसाब से करेंगे, तो यह बाधक नहीं आएगा। अगर व्यक्ति मेहनत करेगा, तो उन्नति निश्चित रूप से होगी। जितनी मेहनत करेगा, जितना नियमों का पालन करेगा, उतनी प्रगति होगी, गारंटी। जब और लोगों की हो रही है, तो उसकी भी होगी। क्या भूतकाल में ऋषियों ने योग समाधि प्राप्त नहीं की? की। जब उनकी हो सकती है, तो आपकी भी हो सकती है। शर्त इतनी है कि उन्होंने जो मेहनत की, वह आपको करनी पड़ेगी। अब मेहनत से व्यक्ति घबराता है, मेहनत करना नहीं चाहता, काम से बचना चाहता है। स्नम तो फिर प्रगति नहीं होगी। तो इस प्रकार से यह जो लब्ध भूम कत्व है, यह भी एक बाधक है, पर यदि ईश्वर प्रधान किया जाए, तो यह बाधक दूर हो जाएगा और व्यक्ति धीरे-धीरे उन्नति करता जाएगा। जितनी उन्नति हो, उतने में संतोष का पालन करना चाहिए। कई बार लोग यहां गलती करते हैं, वो कहते हैं, साहब, कोई प्रगति हो ही नहीं रही। जबकि हो रही है। प्रगति हो रही है, उसको पता नहीं चल रहा, वह समझ नहीं पा रहा कि मेरी प्रगति हो रही है। उसको लगता है, मैं वही का वही बैठा हूं, 10 साल हो गए, मैं वही का वही बैठा हूं, कोई प्रोग्रेस हो ही नहीं रही। ध्यान में मन टिकता नहीं, मन के ऊपर कंट्रोल होता नहीं, इंद्रियों पर संयम कर नहीं पाता। मेरी कोई प्रगति नहीं हो रही। तो ऐसा नहीं सोचना चाहिए। यह वही बाधक, भ्रांति दर्शन। प्रगति हो रही है और वह स्वीकार नहीं कर रहा, समझ नहीं पा रहा। तो ये सारे बाधक हैं। कहीं कोई बाधक, कहीं कोई बाधक। इन सब बाधकों को पहचानना है और इनको दूर करना है। जो व्यक्ति ईमानदारी से, बुद्धिमत्ता से पुरुषार्थ करता है, उसकी प्रगति निश्चित रूप से होती है। और अगर ऐसा लगता हो कि मेरी 5 साल हो गए, 10 साल हो गए, कोई खास प्रगति हुई नहीं, या ई नहीं, ऐसा मानने लग जाए, तो उसको इस तरह से परीक्षण करना चाहिए। 10 वर्ष पहले जो मेरा स्तर था, उसको याद करें। 10 वर्ष पहले मेरा क्या स्तर था और आज मेरा क्या स्तर है? 10 साल पहले की स्थिति से और आज की स्थिति की तुलना करें। आपको समझ में आएगा कि हां, प्रगति हुई है। आ जाएगा ना समझ में? हां। आप अब अपना अपना अपना हिसाब देख लो। 10 साल पहले आप कहां खड़े थे और आज कहां खड़े हैं? दोनों में अंतर समझ में आ जाएगा। अगर अंतर दिखता है, तो मतलब प्रगति हुई है। तो इस तरह से सोचना चाहिए। भ्रांति से बचना चाहिए। यह था आठवां बाधक, अलब भूमिवथुक्कल।

[संगीत]

और अन लगाने से अर्थ उलट जाएगा। जो चीज हाथ में आई थी, वो छूट गई। अब दोबारा हाथ में नहीं आ रही। अनवत त्व। वह छूट गई स्थिति। इसका नाम है अनवत त्व। यह भी बाधा है। कई बार लोग कहते हैं, जी 10 साल पहले मेरा ध्यान बहुत अच्छा लगा। एक दिन तो बहुत मजा आया। इतना मजा आया कि मैं दो घंटे तक बैठा ही रहा, बस ऐसे ही आंख बंद करके बैठा रहा। कब दो घंटा बीत गया, पता ही नहीं चला। इतना अच्छा लगा, इतना आनंद आया। 10 साल हो गए, फिर तब से लेकर आज तक वो स्थिति दोबारा नहीं आई। ऐसा बहुत से लोग बोलते हैं, बोलते हैं ना? बहुत सारे लोगों को ऐसा होता है। तो यह वह बाधक है। स्थिति हाथ में आई और छूट गई। अब छूट गई, तो फिर व्यक्ति का उत्साह टूट गया। अब क्या करूं मैं? बहुत कोशिश करता हूं, फिर भी वो स्थिति हाथ में नहीं आ रही। ऐसे व्यक्ति सोच सोच के फिर ढीला पड़ जाता है। तो ढीले नहीं पड़ना। फिर से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना करें। जिस रास्ते से आप गए थे, उस रास्ते को याद करें। आप वापस दोबारा पहुंच जाएंगे वहीं पर, जहां तक पहुंचे थे। जिस रास्ते से गए थे, जैसे जैसे गए थे, उसको याद करें और दोबारा वैसे वैसे वैसे चले, तो आप दोबारा पहुंच जाएंगे वहां। कैसे गए थे? तब आपने संसार में दुख देखा था, क्या देखा था? दुख देखा था। फिर उससे आपको वैराग्य हुआ था। उस वैराग्य से फिर आपने ईश्वर का चिंतन किया। ईश्वर में आपको सुख दिखाई दिया, तो ईश्वर में रुचि बनी थी। फिर आपने उधर मेहनत की, ध्यान में मन लगाया। संसार से मन हटाया, ध्यान में मन लगाया, ईश्वर में मन लगाया, तो आपकी प्रगति हो गई। फिर क्या हुआ? फिर क्या हुआ? वह ईश्वर का ध्यान छूट गया। अगले दिन फिर कुछ गड़बड़ हो गई। किसी से झगड़ा हो गया, वह सारा स्तर डाउन हो गया। फिर वही राग द्वेष उभर गया, फिर मारपीट और द्वेष और लड़ाई झगड़ा और बदला लेने की भावना जाग गई। उसके कारण वापस नीचे आ गए। अब जो वापस नीचे आए, तो गलती की, उसको फिर ठीक करो। उसको फिर छोड़ो। द्वेष को छोड़ो, लड़ाई झगड़े को छोड़ो, राग द्वेष को हटाओ। फिर संसार में दुख देखो। तो जिस रास्ते से पहले गए थे, वही रास्ता फिर से अपनाओ और वापस वापस वहीं पहुंच जाएंगे। तो यह जो बाधक बीच में आ गए, राग द्वेष, लड़ाई झगड़ा, अभिमान आदि, इनको छोड़ दो और फिर ईश्वर का चिंतन करो। फिर ईश्वर में रुचि बढ़ेगी और धीरे-धीरे आप प्रगति करके वापस वहां पहुंच जाएंगे। तो ईश्वर के आदेश का पालन करने से, ईश्वर प्रधान करने से यह सारे बाधक दूर हो जाते हैं। यह नौ बाधक हैं, जो इस सूत्र में बताए गए। सूत्र के अगले शब्द हैं, ते अंतराया। ये अंतराय हैं। अंतराय मतलब शत्रु। योगाभ्यास के शत्रु। व्यक्ति के अंदर यही बाधक हैं। वह अपने ही बाधकों से रुका हुआ है। अपनी प्रगति को उसने स्वयं रोक रखा है। अभिमान नहीं छोड़ता, द्वेष नहीं छोड़ता, लड़ाई झगड़ा नहीं छोड़ता, संसार में आसक्ति नहीं छोड़ता, ईश्वर के आदेश का पालन ठीक से नहीं करता, ईश्वर समर्पण ठीक से नहीं करता। इसी सारी गड़बड़ तो उसकी खुद की है। इसी वजह से उसकी प्रगति रुकी हुई है। फिर कभी बुद्धिमान लोगों के पास जाता है, वो कोई सलाह देते हैं, तो वह सलाह नहीं मानता। विद्वानों की सलाह नहीं मानता। वह अपनी मनमानी करता है। ईश्वर की भी नहीं सुनता, विद्वानों की भी नहीं सुनता। फिर उसका क्या होगा? कुछ नहीं। बैठे रहो, दुखी होते रहो। तो यह सारे बाधक दूर हो सकते हैं, यदि ईश्वर प्रधान किया जाए, अनुशासन में चला जाए, बुद्धिमानों की सलाह ली जाए। जो लोग आपसे कम बुद्धिमान हैं, जो लोग आपसे कम बुद्धि वाले हैं, उनके लिए आप क्या सोचते हैं? इनको हमारी बात माननी चाहिए या नहीं माननी? जी, माननी चाहिए। तो कम बुद्धि वाले के लिए तो आप यह सोचते हैं, इनको मेरी बात माननी चाहिए। और आप जो ऊंची बुद्धि वाले के सामने, आप भी तो कम बुद्धि वाले। वहां नहीं सोचते कि मुझे इसकी बात मान लेनी चाहिए? इसको मेरी बात माननी चाहिए? यह तो समझ में आता है, यह समझ नहीं आता कि मुझे भी तो इस बड़े बुद्धिमान की बात माननी चाहिए? उसकी मानते नहीं और उससे उम्मीद रखते हैं कि इसको मेरी बात माननी चाहिए। यह तो न्याय नहीं। ऐसे तो बात नहीं बनेगी, ऐसे गाड़ी नहीं चलेगी। अगर आप अपने से कम योग्यता वालों से यह आशा रखते हैं कि इनको मेरी बात माननी चाहिए, तो अपने से अधिक योग्यता वालों से भी ऐसा व्यवहार रखना चाहिए कि आप भी उनकी बात मानो। तब तो ठीक है। तब आपकी भी प्रगति होगी और दूसरे की भी, सबकी होगी। नहीं तो कुछ नहीं होगा। तो ये अंतराय हैं, बाधक हैं, योगाभ्यास के शत्रु हैं।

चित्त विक्षेपा। सूत्र में आगे शब्द हैं, ते अंतराया चित्त विक्षेपा। ये चित्त के विक्षेप हैं। चित्त की स्थिति को बिगाड़ने वाले हैं। मन की एकाग्रता को भंग करते हैं, उसको स्थिति को खराब कर देते हैं। और फिर व्यक्ति का मन ईश्वर में नहीं टिकता। एक एक समस्या का समाधान आपको ढूंढना पड़ेगा। रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श। यह पांच विषय हैं, जो संसार में व्यक्ति को आकर्षित करते हैं। आपको इनका सबका ऑपरेशन करना पड़ेगा। एक एक प्रश्न उठेगा, उसका जवाब ढूंढना पड़ेगा। तर्क पूर्ण होना चाहिए, प्रामाणिक होना चाहिए, संतुष्टि कारक होना चाहिए। ऐसा उत्तर ढूंढना पड़ेगा। जब आप इन सारे प्रश्नों के उत्तर ढूंढ लेंगे, तब कोई चीज आपको आकर्षित नहीं कर पाएगी। जैसे पहले उदाहरण दिया था, जहरीली मिठाई आपको आकर्षित करती है। हां जी, क्यों? उसमें समझ में आ गया ना, मार देगी। यह मार देगी, खतरनाक चीज है, इससे दूर रहो। तो जैसे जहरीली मिठाई समझ में आ गई, उससे आप दूर रहते हैं, वह आकर्षित नहीं करती। ऐसे ही संसार के पांचों विषय, यह सब जहरीली मिठाई। उसी एंगल से देखो। यह सब जहरीली मिठाई है, जिसको हाथ लगाया, वह मार देगी। जिसको भी पकड़ेंगे, वह मार देगी हमको। ऐसे जब दिखेगा, तो आप कहीं भी नहीं फंसने वाले। वहां से आपका वैराग्य हो जाएगा। और फिर ईश्वर में चिंतन करें। ईश्वर के गुणों का चिंतन करें। तब ईश्वर में मन टिकेगा, बढ़िया टिकेगा, खूब ठीक।

[संगीत]

[प्रशंसा]

[संगीत]