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Qabil Ne Habil Ko Q Qatal Kiya? | قابیل نے ہابیل کو کیوں قتل کیا؟ ۔ | Story Of Habeel Vs Qabeel

Dastaan-e-Qandeel13:59

Transcription

दुनिया का पहला कत्ल एक औरत की वजह से होता है और एक सगा भाई अपने ही भाई को पत्थर मारकर कत्ल कर देता है। यह कहानी इतनी हैरानक है कि इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अशरफुल मखलूकात कहलाने वाला इंसान इतनी जल्दी हैवानियत और दरिंदगी की इंतहा तक कैसे पहुंच गया। यह कोई अफसाना या तमसील नहीं बल्कि इंसान की अपनी तारीख का पहला खूनी बाब है। वो लम्हा जब जमीन ने पहली बार इंसानी खून को अपने अंदर जजब किया और आसमान ने एक ऐसा गुनाह देखा जो उससे पहले कभी नहीं देखा गया था।

अल्लाह ताला ने इंसान को मिट्टी से पैदा किया और उसमें अपनी रूह फूंकी और उसे अक्ल, इख्तियार, शूर और जज्बात अता किए। फरिश्तों ने अर्ज किया कि क्या तू ऐसी मखलूक पैदा करेगा जो जमीन में फसाद करेगी और खून बहाएगी? मगर अल्लाह ने फरमाया मैं वह जानता हूं जो तुम नहीं जानते।

हजरत आदम अल सलाम पहले इंसान भी थे और पहले नबी भी और हजरत हव्वा इंसानियत की पहली मां थी। जन्नत में एक मुद्दत गुजारने के बाद इंसान जमीन पर उतारा गया। जहां उसे अपने इख्तियार और फैसलों का हिसाब खुद देना था। हजरत आदम और हजरत हव्वा के यहां औलाद हुई। और यूं दुनिया का पहला इंसानी खानदान वजूद में आया। हर हमल में एक लड़का और एक लड़की पैदा होते थे। और उस वक्त अल्लाह का हुकुम यह था कि एक हमल के लड़के का निकाह दूसरे हमल की लड़की से होगा ताकि नस्ले इंसानी आगे बढ़ सके।

इन्हीं औलाद में दो बेटे नुमाया हुए। जिनमें एक का नाम काबिल था और दूसरे का नाम हाबील था। दोनों एक ही घर में पल्ले बड़े। एक ही बाप की गोद में खेले और एक ही मां की शफकत पाई। मगर दोनों के दिल और नियत एक जैसी नहीं थी। काबिल खेतीबाड़ी करता था और अपनी मेहनत, अपनी पैदावार और अपनी ताकत पर गुरूर करता था। जबकि हाबील जानवर पालता था। सादा दिल था। खामोश तबाह था और उसके अंदर आजजी, शुक्र और अल्लाह का खौफ था। वक्त के साथ-साथ यह फर्क वाज़ होता चला गया। काबील बात पर नाराज होता, खुद को बेहतर समझता और दूसरों को कमतर जानता। जबकि हाबील कम बोलता, ज्यादा सोचता और हर मामले में अल्लाह की रजा को सामने रखता।

जब निकाह का वक्त आया तो काबील के दिल में छुपा हुआ जहर बाहर आ गया। और उसने अल्लाह के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया। क्योंकि वह अपनी ही बहन से निकाह करना चाहता था जो उसे ज्यादा खूबसूरत लगती थी। यहां औरत असल मसला नहीं थी बल्कि औरत काबील के नफ्स की ख्वाहिश का बहाना बनी। असल मसला उसकी अना, उसकी जिद और उसकी नाफरमानी थी। हजरत आदम अली सलाम ने उसे बहुत समझाया। बार-बार नसीहत की। अल्लाह के हुक्म की हिकमत समझाई और अंजाम से डराया। मगर काबिल का दिल सख्त हो चुका था। आखिरकार मामला अल्लाह पर छोड़ दिया गया। और दोनों भाइयों को कुर्बानी पेश करने का हुक्म दिया गया। यह कुर्बानी सिर्फ जानवर या फसल की नहीं बल्कि दिल, नियत, इलास और तकवा का इम्तिहान थी।

हाबील ने अपनी सबसे अच्छी कुर्बानी पेश की। वो जानता था कि अल्लाह को मिकदार नहीं बल्कि नियत चाहिए। जबकि काबिल ने अपनी फसल में से नाकिस सूखी और बेदिली से चीज निकाल कर रख दी क्योंकि उसका दिल पहले ही अल्लाह के हुक्म से बगावत कर चुका था। अल्लाह ताला ने हाबल की कुर्बानी कबूल फरमा ली और काबील की कुर्बानी रद्द हो गई। यही वो लम्हा था जब हसद ने काबिल के दिल में आग लगा दी। एक ऐसी आग जो अकल को जला देती है और इंसान को अंधा कर देती है। उसने कहा कि मैं तुम्हें कत्ल कर दूंगा। यह इंसान की तारीख में कत्ल का पहला इरादा था।

हाबील ने निहायत सुकून और वकार से जवाब दिया कि अगर तुम मुझे कत्ल करने के लिए हाथ बढ़ाओगे तो मैं तुम पर हाथ नहीं उठाऊंगा। क्योंकि मैं अल्लाह रब्बुल आलमीन से डरता हूं। यह अल्फाज सिर्फ एक भाई का जवाब नहीं थे बल्कि कयामत तक के इंसान के लिए अखलाकी ऐलान थे। यह दो रास्ते थे। एक सब्र, तकवा और इतात का रास्ता और दूसरा नफ्स, जिद, हसद और गुनाह का रास्ता। काबिल ने नफ्स का रास्ता चुन लिया। हसद ने उसकी अकल पर पर्दा डाल दिया। उसकी आंखों में खून उतर आया और उसके दिल में रहम मर गया। उसने एक पत्थर उठाया। अपने ही सगे भाई के सर पर दे मारा और यूं हाबील जमीन पर गिर पड़ा। दुनिया का पहला बेगुनाह इंसान कत्ल हो गया। यह सिर्फ एक शख्स का कत्ल नहीं था बल्कि भाईचारे, एतमाद, मोहब्बत और इंसानियत के पहले उसूल का कत्ल था।

काबिल घबरा गया। उसके हाथ कांप रहे थे। लाश उसके सामने थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें। वो कातिल बन चुका था। मगर उसे कत्ल के बाद की दुनिया का कोई इल्म नहीं था। अल्लाह ताला ने उसकी आंखें खोलने के लिए एक कावा भेजा। जो जमीन खोदकर दूसरे मुर्दा कौवे को दफन करने लगा। काबिल ने यह मंजर देखा और उसके दिल पर एक और चोट पड़ी। उसने कहा, अफसोस मुझ पर। मैं इस कौवे जैसा भी ना हो सका कि अपने भाई की लाश को दफन कर सकूं। यह निदामत थी। मगर वो निदामत नहीं थी जो इंसान को वापस ले आए।

हजरत आदम अल सलाम पर इस साने का गहरा सदमा पड़ा। एक बेटा कत्ल हो चुका था और दूसरा कातिल था। यह गम इंसानियत का पहला इज्तिमाई गम था। वक्त गुजरा, जख्म ताजा रहे। और फिर अल्लाह ताला ने हजरत आदम और हजरत हव्वा को एक और बेटा अता फरमाया। जिसका नाम शीत रखा गया। शीत का मतलब अतिया था। क्योंकि वो हाबील का नेमुल बदल थे। हजरत शीत अल सलाम को नबूवत अता की गई। उन्हें अल्लाह ने इल्म, हिकमत और हिदायत दी। हजरत आदम अल सलाम ने अपनी जिंदगी में ही उन्हें जिम्मेदारियां सौंप दी। शीत अल सलाम ने इंसानियत को दोबारा अल्लाह की तरफ जोड़ने का काम शुरू किया। उन्होंने इबादत, अखलाक और अदल को जिंदा रखा। उनकी नस्ल में नेक लोग पैदा हुए। जिन्होंने अल्लाह की याद को कायम रखा।

दूसरी तरफ काबील की नस्ल दुनिया में फैलती गई। उन्होंने बस्तियां बसाई। पेशे इजाद किए। मगर उनके दिल अल्लाह से दूर होते गए। यूं पहली बार तारीख में नेकी और बदी की दो वाज़ लकीरें खींच गई। एक तरफ शीत की औलाद थी जो अल्लाह को याद करती थी और दूसरी तरफ काबिल की नस्ल थी जो दुनिया ताकत और ख्वाहिश में डूबती जा रही थी। यही तकसीम आगे चलकर अंबिया के आने कौमों के बनने और तारीख के धारों की बुनियाद बनी।

अल्लाह ताला ने इस वाक्य को कुरान में महफूज कर दिया ताकि कयामत तक आने वाला हर इंसान यह समझे कि एक गुनाह कैसे पूरी इंसानियत पर असर अंदाज होता है। अल्लाह ने फरमाया जिसने एक बेगुनाह इंसान को कत्ल किया गोया उसने पूरी इंसानियत को कत्ल किया।

इंसान की तारीख में एक दिन ऐसा आया जब जमीन ने पहली बार किसी इंसान के जिस्म को अपने अंदर कुबूल किया। उस दिन से पहले जमीन पर इंसान जिंदा चलता फिरता था। मगर कभी मुर्दा इंसान को जमीन के हवाले नहीं किया गया था। यह वो लम्हा था जब जिंदगी और मौत का फर्क इंसान पर पहली बार पूरी शिद्दत से वाज़ हुआ। यह वो दिन था जब एक लाश खामोशी से जमीन पर पड़ी थी और एक जिंदा इंसान हैरत, खौफ और नदामत के आलम में उस लाश को देख रहा था। यह इंसान काबिल था और यह लाश उसके सगे भाई हाबील की थी। वो भाई जिसे उसने हसद और गुस्से में कत्ल कर दिया था।

मगर कत्ल के बाद सब कुछ खत्म नहीं हुआ था। बल्कि असल इम्तिहान अब शुरू हुआ था। काबिल ने कत्ल तो कर दिया था मगर वह नहीं जानता था कि मरने वाले के साथ क्या किया जाता है। उसने उससे पहले कभी किसी इंसान को मरते नहीं देखा था। ना किसी जनाजे का तसवुर उसके ज़हन में था। ना दफन करने का कोई तरीका। हाबील की लाश उसके सामने पड़ी थी। ना वह उठती थी, ना बोलती थी, ना जवाब देती थी। वक्त गुजरता जा रहा था और लाश में तब्दीली आ रही थी। बदबू फैलने लगी थी। जिस्म सख्त हो रहा था और यह सब देखकर काबील के दिल में खौफ पैदा हो रहा था। यह खौफ सिर्फ लाश का नहीं था बल्कि अपने किए का था। यह वो लम्हा था जब काबिल पहली बार यह समझने लगा कि कत्ल सिर्फ एक लम्हे का अमल नहीं बल्कि एक तवील जिम्मेदारी है। एक ऐसा बोझ है जो कातिल के साथ हमेशा रहता है। मगर उस वक्त तक काबिल के पास ना कोई इल्म था, ना कोई रहनुमाई, ना कोई रस्म, ना कोई रवायत। वो बस एक लाश के साथ खड़ा था और नहीं जानता था कि आगे क्या करना है।

अल्लाह ताला ने इंसान को अकेला नहीं छोड़ा। इसी लम्हे अल्लाह ने एक ऐसा मंजर दिखाया जो इंसान की तारीख का पहला जनाजा बन गया। अल्लाह ने एक कौवा भेजा। यह कौवा जमीन पर आया। उसने अपने जैसे एक मुर्दा कौवे को देखा। फिर उसने अपनी चोंच और पंजों से जमीन खोदनी शुरू की। मिट्टी हटाई, गड़ा बनाया और मुर्दा कौवे को उसमें डालकर मिट्टी से ढाप दिया। यह मंजर खामोश था। मगर उसकी जुबान पूरी इंसानियत से बात कर रही थी। आबील यह मंजर देख रहा था। वो हैरान था। वो सीख रहा था। वो समझ रहा था। यह पहला मौका था जब इंसान ने तदफीन का अमल देखा। यह पहला जनाजा था जिसमें ना कोई दुआ थी, ना कोई जमा, ना कोई रस्म। मगर उसमें अल्लाह की हिकमत पूरी शिद्दत से मूव थी।

आबील के दिल से एक आह निकली और उसने कहा अफसोस मुझ पर। मैं उस कौवे जैसा भी ना हो सका कि अपने भाई की लाश को छुपा सकूं। यह अल्फाज सिर्फ अफसोस नहीं थे बल्कि इंसानी शूर की पहली चीख थे। यह वो लम्हा था जब इंसान ने यह सीखा कि मुर्दा जिस्म को खुले में नहीं छोड़ा जाता। यह वो लम्हा था जब कब्र का तसवुर वजूद में आया। यह वो लम्हा था जब एहतराम इंसान का पहला अमली सबक दिया गया।

हाबील का जनाजा किसी इमाम ने नहीं पढ़ाया। किसी ने हाथ नहीं बांधे। कोई कलमा बुलंद आवाज में नहीं पढ़ा गया। मगर उसके बावजूद यह जनाजा इंसानियत का सबसे बड़ा जनाजा था। आबील ने कौवे से सीख कर जमीन खोदी। यह पहला इंसानी हाथ था जो कब्र खोद रहा था। यह पहला गढ़ा था जो इंसान के लिए बनाया गया। यह पहला जिस्म था जो जमीन के सुपुर्द किया गया। जब काबिल ने अपने भाई की लाश को जमीन में रखा तो जमीन ने पहली बार इंसान को अपनी आगोश में लिया। यह लम्हा जमीन के लिए भी नया था और इंसान के लिए भी। उस लम्हे से कब्र इंसान की मुस्तकिल हकीकत बन गई। यहां से इंसान ने मौत को समरे देखना नहीं बल्कि समझना शुरू किया। इंसान ने जाना कि जिंदगी आरजी है। इंसान ने जाना कि जिस्म मिट्टी से आया है और मिट्टी में वापस जाना है। यही वो लम्हा था जिसने बाद में जनाजे, कफ़न, कब्र, दुआ और आखिरत के पूरे तसवुर की बुनियाद रखी। यह सब एक कौवे के जरिए सिखाया।