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खलीफा हारून अल रशीद के दिल में एक अजीब सा गम बैठा हुआ था। ऐसी उदासी जो ना किसी वजह से थी, ना किसी इलाज से जाती थी। खलीफा अपने अज़म दरबार में खामोश बैठे सोच में गुम थे। मरमर के फर्श पर सिर्फ दूरदराज नौकरों की सरगोशियां गूंज रही थीं और सोने के जेवरात रोशनी को सोखने के बजाय उसे रोक रहे लगते थे।
वज़ीर जाफर फिक्रमंद होकर आहिस्ता कदमों से करीब आए। उनकी पेशानी पर फिक्र की लकीरें पड़ गई थीं। "मुझे," जाफर ने एहतराम से कहा, उनकी आवाज महल की भारी खामोशी को काटते हुए। "यह खामोशी तो आपके दरबार पर बोझ बन रही है। लोग हैरान हैं। आप इतना गमगीन क्यों हैं?"
"शायद बगदाद की गलियों में छुपे रस्ते बनकर घूमने से आपका दिल हल्का हो जाए।" हारून अल रशीद ने सोच समझकर यह तजवीज सुनी। उनकी उंगलियां तख्त की पेचीदा नक्शो नगरों पर फिर रही थीं। "कभी-कभी रूह को नए मंजरों की जरूरत होती है।" उन्होंने आह भरकर माना जैसे सल्तनतों का बोझ उनकी आह में छुपा हो। "चलो हम लोग अपने लोगों के बीच चलकर देखें और देखें कि शहर कौन सी हकीकतें जाहिर करता है। जब वह अपने हुक्मरान को पहचानता नहीं।"
वे दोनों आम ताजिरों की तरह मलबूस होकर गलियों में निकले। हवा में जाफरान और गुलाब के पानी की महक फैली हुई थी। महल के दरवाजों के करीब एक अंधा फकीर उनकी नजर में आया। उसकी आंखों में अंधेरा था मगर चेहरे पर नूर था। वह सदका मांग रहा था। उसकी आवाज में बेबसी और वकार दोनों थे। जैसे उसकी हर बात उसकी गरीब हैसियत से बाहर की हिकमत हो।
"खुदा के नाम पर कुछ दे दीजिए, ऐ शरीफ इंसान," फकीर ने इल्तजा की। उसकी खाली आंखें ऐसा लग रहा था जैसे वह देखने वालों से ज्यादा देख रहा हो। खलीफा अपने अंदर से निकलने वाली रहमदली से मुतासिर होकर एक सोने का सिक्का उसकी हथेली में रख दिया जो उसकी खुरदरी हथेली पर चमक उठा।
मगर शुक्रिए की बजाय फकीर ने खलीफा की जुबा मजबूती से पकड़ ली। "ऐ नेक इंसान," उसने फरी सरगोशी में कहा, "आपने मुझे खुदा के नाम पर खैरात दी है। अब मैं आपसे दरख्वास्त करता हूं कि मेरे चेहरे पर अपना हाथ रखकर थप्पड़ मारे। उसी खुदा की नियत से।"
हारून अल रशीद हैरत से पीछे हटे। जाफर से हाय नजरें मिलाई। "यह तो बहुत अजीब दरख्वास्त है," उन्होंने सरगोशी की। अल्फाज उनकी जुबान पर अजनबी लग रहे थे। "कोई इंसान एहसास के बदले सजा क्यों मांगता है?"
फकीर ने अपनी बात पर डटे रहने का अजीब अज्म दिखाया। उसकी अंधी आंखें उनकी मबाशरत को छेद रही थीं। "अगर आप मुझे ना मारे तो अपनी अशरफी वापस ले लें। क्योंकि मैं ऐसी खैरात कबूल नहीं कर सकता जिसके साथ यह अमल ना हो।"
हैरत और इस आदमी की रूह को छू लेने वाली अदावत से मजबूर होकर खलीफा का हाथ थोड़ा कांपा जब उन्होंने हल्का सा फकीर के चेहरे को छुआ। यह लमसा ऐसा लगा जैसे कि कसमत से एक अहद निभाया जा रहा हो।
जैसे ही वे तंग गलियों में आगे बढ़े। हारून अल रशीद गहराई से सोचने लगे। फकीर की अजीब दरख्वास्त उनके दिमाग में एक भूली हुई दुआ की तरह गूंज रही थी। "जाफर," उन्होंने आखिरकार कहा, उनकी आवाज में वही का बोझ था। "इसमें कोई राज छुपा है। इस आदमी की अजीब दरख्वास्त किसी बड़ी हकीकत की निशानी है। कल उसे दरबार में तलब करो। मुझे इस अजीब रवय के पीछे छपी कहानी समझनी होगी।"
फजीर ने शाही हुक्म संजीदगी से पहुंचाया और फकीर ने ऐसे सर हिलाया जैसे वह इसी बुलावे का इंतजार कर रहा हो जब से अंधेरे ने उसकी बिनाई छीन ली थी। खलीफा और उनके वज़ीर हजूम भरी बाजार की तरफ बढ़े। उनके दिमाग इस पहले परासरार मिलाकात से परेशान थे जो इंसानी फितरत की बुनियादों को हिला गई थी। मगरबी मसालों की महक और दूर संतूर की आवाज पसमंजर में धुंधली पड़ गई। जब वे इस अंधे आदमी की अजीब मांग पर गौर कर रहे थे। बगदाद की जिंदा दिल गलियों में हर कदम अब बेजवाब सवालों का बोझ उठाए हुए था और खलीफा की कीरी में वह सोने का सिक्का उनके शाही खजानों के किसी खजाने से भी भारी लग रहा था।
उनकी राह में मजीद आ गए जहां चमड़े और घोड़ों की महक ताजा रोटी की खुशबू से मिल रही थी। उन्होंने एक परेशान खून मंजर देखा जो उनकी रगों में खून जमा गया। एक नौजवान अपनी घोड़ी को बेरहमी से पीट रहा था। जानवर की दर्दनाक हंसियां तंग गली में एक सताए हुए रूह की चीखें की तरह गूंज रही थीं। हर कोड़े की जरब हवा को फाड़ रही थी। घोड़ी की आंखों में दर्द था। दर्द और बेवफाई का एहसास।
हारून अल रशीद का चेहरा फरी गुस्से से काला पड़ गया। उनकी मुट्ठियां और ताजिर की जुबा तले बंद हो गई। घोड़ी की आंखें खौफ और अलज्जन से फैली हुई। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने बेरहम मालिक से रहम की इल्तजा कर रही हो जो कभी ना आया।
"ऐसी बेरहमी बर्दाश्त नहीं की जा सकती," खलीफा ने ऐलान किया। उनकी आवाज में अथॉरिटी थी जो उनकी सादी मवाशरत छुपा ना सकी। "कोई भी जात इंसान हो या हैवान ऐसी बेदर्द सुलक की हकदार नहीं। हर जात को इज्जत से जीने का हक है।"
जाफर ने फरी मेदा खलत की। नौजवान सवार के पास एहतियात से जाते हुए अल्फाज में आने वाली इंसाफ की भारीपन की। "हुकूमत को आपके अमल की खबर हो चुकी है।" वज़ीर ने बताया, उनकी आंखें नौजवान की रूह में उतर रही थीं। "आपको कल दरबार में हाजिर होकर इस बेरहमी की वजाहत करनी होगी।"
नौजवान, जिसका नाम लुकमान था, ने बुलावे कबूल किया खामोश शर्मिंदगीगी से। उसका सर झुका हुआ जैसे वह इसी लम्हे का इंतजार कर रहा हो। उसके चेहरे पर शर्म नहीं बल्कि एक अजीब किस्म की रजामाई थी। उसने अपने अमल का दीफा करने की कोई कोशिश ना की जो खलीफा को खासतौर पर अजीब लगा। ज्यादातर लोग सामना करने पर कोई जोश देंगे। मगर यह नौजवान अपनी जुर्म को खुलेआम उठाए फिर रहा था। जैसे एक भारी चादर जो उसने बहुत अरसे से पहन रखी हो।
जैसे ही वे शहर की हुदूद की तरफ बढ़े जहां अजीम घर सादा रिहाइशों में तब्दील हो गए। हारून अल रशीद ने इंसानी फितरत की पेचीदा तस्वीर पर गौर किया जो उनके सामने खुल रही थी। "इंसाफ पूरी कहानी को समझने का मतलब है," उन्होंने सोचा। उनकी निगाहें दूर उफ पर टकी जहां सूरज गुरूब की तरफ बढ़ रहा था। "कौन सी छुपी हुई हालातें आदमी को अपने ही सवार जानवर के खिलाफ ऐसी तशद्दुद पर मजबूर कर सकती हैं? इंसानी रवयों के और भी गहरे परत होते हैं जो आंखों को दिखाई नहीं देते।"
खलीफा की सोचे फैसला और रहम के नाजुक तवाजुन की तरफ म गई जो सच्ची कयादत की तारुफ करती थी। "कभी-कभी सख्त तरीन अमल गहरे जख्मों से पैदा होते हैं। हमें फैसला सुनाने से पहले सुनना चाहिए।" यह दूसरी मुलाकात उनकी सफर में एक और परासरार तहा शामिल कर गई। जो इलाही इंसाफ, इंसानी सजा और नाजवा रूहों में छपी नजात की अबदी सवाल उठा रही थी। हर कदम पर नए राज, हर मोड़ पर नई हैरत। हुकुमरानी का बोझ उस वक्त मुतनानहा लगता था जब अपने रैया के बीच मशरत से चल रहे हो। हर मुलाकात इंसानी तजुर्बे की एक और तह उतारते हुए जो महल की दीवारों ने हमेशा आरामदेह फासले पर रखा था।
वे बगदाद के गरीब मोहल्लात की तरफ बढ़ते रहे। जहां दौलत और गुर्बत का फर्क और वाजे हो गया। खलीफा ने अपने शहर को ताजा आंखों से देखा। ना सिर्फ अपनी सल्तनत की शान बल्कि आम लोगों की जद्दोजहद भी। हर गली का कोना एक और सबक एक और कहानी लिए खड़ा लगता था जो खुलने का इंतजार कर रही थी। हुकुमरानी का बोझ उस वक्त मुतनाहा लगता था जब अपने रैया के बीच मवाशरत से चल रहे हो। हारून अल रशीद को एहसास हुआ कि सच्ची हिकमत महल की दीवारों से नहीं बल्कि नीचे की गलियों में खुलने वाले इंसानी तजुर्बात को समझने से आती है। यह दो परासरार मुलाकातें पहले ही उनकी नजर को बदल रही थी जो आगे आने वाली वहियों के लिए तैयार कर रही थी। उन्हें मालूम ना था कि यह तीन तलबशुदा लोग, अंधा फकीर, बेरहम सवार और एक और जो अभी मिलना था, मिलाकर ऐसे सबक देंगे जो सदियों तक गूंजेंगे। उनकी कहानियां एक हो जाएंगी ताकि लालच, इंसाफ और किस्मत के बारे में गहरे सच जाहिर करें जो आज भी मुतलिक हैं। खलीफा की उदासी हल्की होने लगी। उसकी जगह एक बढ़ती हुई हदफ की एहसास ले ली। यह इत्तेफाकी मुलाकातें ना थी बल्कि एक ऐसी हिकमत से तयशदा जो उनसे बड़ी थी। हर कदम आगे उन्हें ना सिर्फ इन लोगों की कहानियों को समझने बल्कि उनकी नुमाइंदगी करने वाले गहरे रूहानी सचों को समझने के करीब ला रहा था।
शाम ढलते ही हारून अल रशीद और जाफर महल वापस लौटने की तैयारी कर रहे थे। उनके दिमाग सवालों से भरे और दिलों इन परासरार मुलाकातों के वादा किए सबों के लिए खुले हुए। सच्ची सफर अभी शुरू हो रही थी। शहर की हुदूद की तरफ बढ़ते हुए खलीफा की नजर एक शानदार महल पर पड़ी जो एक सादा मोहल्ले में फख्र से खड़ा था। उसकी शान उसके अर्धगर्द के सादा घरों के बीच बेजोड़ लग रही थी। हारून अल रशीद रुक गए। इस गैर मुतवक्के मंजर से उनकी तजसुस जाग उठी।
"जाफर," खलीफा ने नोट किया। "यह महल इस मोहल्ले के लिए बहुत शानदार लगता है। उसकी फने तामीर दौलत की निशानानदेही करती है। मगर यह सादा घरों के बीच खड़ा है। पता लगाओ कि यह किसका है और यहां कौन रहता है।"
फजीर करीबी रिहाइशियों के पास गए। एक तजुर्बाकार सफीर की आसानी से बात की। जल्द वापस आकर उन्होंने रिपोर्ट दी। "मुझे यह महल हसन हयाल का है। हाल ही तक वह एक सादा रस्सी बनाने वाला था जो अपने खानदान को खिलाने में जद्दोजहद करता था। फिर अचानक उसे बहुत दौलत मिल गई।"
हारून अल रशीद का दिलचस्पी बढ़ गई। "एक रस्सी बनाने वाला दौलतमंद बन गया। यह तब्दीली की तफ्तीश का मतलूब करती है। पड़ोसी उसके किरदार के बारे में क्या कहते हैं?"
"वे उसकी बहुत तारीफ करते हैं," जाफर ने जवाब दिया। "वह अपने पड़ोसियों से मेहरबानी और सखावत से पेश आता है। नई दौलत के बावजूद वह आज रहता है और अपना रस्सी का कारोबार जारी रखता है। अब बड़े पैमाने पर कई वर्कशॉपों के साथ।"
खलीफा ने इस बात पर गौर किया। "अचानक दौलत अक्सर आदमी के असली किरदार को जाहिर कर देती है। कि वह अपना काम जारी रखता है और दूसरे से अच्छा सुलूक करता है तो फजीलत की निशानानदेही करता है। मगर हमें समझना होगा कि ऐसी ड्रामाई तब्दीली कैसे हुई।"
हारून अल रशीद ने फैसला किया। "इस हसन हयाल को कल दरबार में तलब करो। मैं उसकी कहानी बराहरास्त सुनना चाहता हूं। यहां किस्मत और इंसानी मेहनत के बारे में सबकन हो सकते हैं जो हमें समझने चाहिए।"
शाम बगदाद पर छा गई जब खलीफा और उनका वज़ीर एक खफिया दरवाजे से महल वापस लौटे। उनके दिमाग दिन की परासरारियतों से भरे हुए। अब तीन लोग दरबार में बुलाए जाने का इंतजार कर रहे थे। हर एक की कहानी इंसानी फितरत और इलाही डिजाइन के बारे में गहरे सच जाहिर करने का वादा कर रही थी। महल की दीवारें खामोशी से खड़ी थी। जब हारून अल रशीद अगले दिन की कारवाई की तैयारी कर रहे थे। उनकी पहले की उदासी अब मकसूद की तवकको में तब्दील हो गई थी। यह इत्तेफाकी मुलाकातें ना थी बल्कि हिकमत की तरफ से तयशदा जो उन्हें हुक्मरान और रूहानी तलाश करने वाले इंसान दोनों की हैसियत से दरकार थी।
अगले दोपहर शाही दरबार गैर मामूली तवकको से जमा हुआ। तीन तलबशुदा लोग खलीफा के तख्त के सामने खड़े थे। अंधा फकीर अब्दुल्लाह, नौजवान सवार लुकमान और नए दौलतमंद हसन हयाल। दरबारी एक दूसरे से सरगोशियां कर रहे थे इन आम शहरियों के बारे में जो अपने हुक्मरान से समाह पा रहे थे। हारून अल रशीद तख्त पर हुकुमरानी की शान से बैठे थे। उनकी निगाहें एक-एक करके तीन आदमियों पर ठहरे। माहौल में तनाव की चिंगारी थी जब यह तीन परासरार शख्सियात अपने हाकिम की पूछ गुफ्त का इंतजार कर रही थी। वे एहतराम से खामोश खड़े थे। ना जानते कि उन्हें क्यों बुलाया गया है या कि खलीफा खुद उनसे मुबाशत में मिला था।
अंधा फकीर अब्दुल्लाह अपनी गुरबत की जाहरी शक्ल से बाहर एक खामोश वकार के साथ खड़ा था। लुकमान सवार ने आंखें झुकी रखी थी। उसकी पोजीशन में शर्म और रजा दोनों थी। हसन हयाल पर सुकून मगर मुतजसुस लग रहा था। उसकी बारीक कपड़ों के बावजूद उसकी आजान जड़े वाजह थी।
खलीफा ने सबसे सादा मगर सबसे अजीब कई से पूछ गुफ्त शुरू की। "हम इस आदमी से शुरू करेंगे जिसने खैरात की बजाय सजा मांगी।" हारून अल रशीद ने ऐलान किया। उनकी आवाज खामोश हॉल में गूंज गई। सबकी नजरें अब्दुल्लाह की तरफ मड़ गई। जब खलीफा के इशारे पर वह आगे बढ़ा। दरबार सांस रोक कर सुन रहा था। सोच रहा था कि ऐसी अजीब सुलूक की कहानी क्या हो सकती है?
फकीर की शाही दरबार में मौजूदगी बेजोड़ लग रही थी। मगर उसकी अंधी आंखों में हिकमत थी जो उसकी गरीब हैसियत से बाहर की गहराई की निशानदेही कर रही थी। हारून अल रशीद ने अब्दुल्लाह से बरास्त मुखातिब हुए। "कल आपने एक अजनबी से गैर मामूली चीज मांगी। अब इस मंफिल के सामने अपनी कहानी सुनिए ताकि हम आपकी अजीब दरख्वास्त के मनी समझ सके।" दूसरे दो तलबशुदा लोग गौर से सुन रहे थे। उनकी अपनी परेशानियां आरदी तौर पर भूल गई थी। जब वे इस खुलने वाले ड्रामे के गवाह बन गए। हर मौजूद आदमी इंसानी तजुर्बे का मुतनाहा पहलू था। गुरबत और दौलत, बेरहमी और नजात, मेहनत और किस्मत। खलीफा की जज की हैसियत उन्हें ना सिर्फ हकायक बल्कि इन कहानियों में छुपे गहरे सच सुनने का मतलूब कर रही थी। उन्हें एहसास हुआ कि यह दिन ना सिर्फ इन मलूत लोगों के लिए बल्कि दरबार में मौजूद हर एक के लिए बशमुल खुद के सबक लाएगा।
जैसे ही अब्दुल्लाह बोलने को तैयार हुआ दरबार खामोश तवकको में डूब गया। फकीर की कहानी इस दिन की रवानी का तन करेगी जो इंसानी फितरत इलाही इंसाफ और तमाम जिंदगियों पर हुकुम रानी करने वाली किस्मत के परासरार कामों के बारे में गहरे इंकशाफात का वादा कर रही थी। इस पेचीदा नक्श का पहला धागा जाहिर होने वाला था और उसके साथ तीनों परासरार शख्सियात को ऐसे तरीके से जोड़ने वाली समझ का आगाज जो अभी कोई ना सोच सकता था।
अब्दुल्लाह ने एहतराम से झुक कर सलाम किया। उसकी अंधी आंखें तख्त की बजाय अंदर की तरफ देख रही थी। "मुझे," उसने शुरू किया। उसकी आवाज मेहनत से हासिल हिकमत का बोझ उठा रही थी। "मेरी कहानी एक खबरदार है उस जहर के बारे में जो किसी हथियार से ज्यादा रूहों को तबाह करता है। नाकाबिल ए तशन्नगी लालच का जर।"
"मैं हमेशा से अंधा फकीर नहीं था," अब्दुल्लाह ने जारी रखा। "मेरे वालिद से मुझे बहुत दौलत विरासत में मिली। मगर जवानी और बेवकूफी ने उसे सब जाया कर दिया। जब गुरबत आई तो मेरी बीवी ने हिकमत से मशवरा दिया कि दो ऊंट खरीद लो और काफिला का कारोबार शुरू करो। अल्लाह ने इस सादा काम को बरकत दी और आहिस्ता-आहिस्ता मेरी हालात बेहतर हुई। यहां तक कि मेरे पास 80 ऊंट हो गए और मैं आराम से रहता था।"
दरबार गौर से सुन रहा था। जब अब्दुल्लाह ने इस किस्मत बदलने वाले दिन की तफसील दी। "बसरी से वापसी पर एक पहाड़ी रास्ते के करीब आराम कर रहा था। एक दरिवश मेरे साथ शामिल हुआ और खाना बांटने के बाद उसने एक हैरानकून राज बताया। करीबी पहाड़ों में छुपी एक खजाना जो मुझे बादशाहों से अमीर बना सकता था। मगर एक शर्त थी।" अब्दुल्लाह ने वजाहत की। "दरिवश ने खजाने की जगह बताने के बदले मेरे 40 ऊंट मांगे। मेरे पास 80 ऊंट थे। मगर लालच ने फरी तौर पर मेरा फैसला धुंधला दिया। मैंने हिसाब लगाया कि 40 देने के बाद भी खजाना मुझे तसवुर से आगे अमीर बना देगा।"
अंधे आदमी की आवाज अफसोस से भारी हो गई। जब उसने जादुई गुफा की तफसील दी जो जवाहरात और सोने के सिक्कों से भरी थी। "जब पहाड़ हमारे सामने खुला तो मैंने ऐसी दौलत देखी जो आंखें चखा मचका दे। मैंने अपने 40 ऊंटों पर खजाना लाद लिया। जबकि दरिवश खामोशी से एक चांदी की संदूक से एक कोहल की डिबिया ले लिया।"
"जब हम निकले तो मैंने दरीवश के 40 ऊंटों की तरफ देखा और लालच दोबारा जाग उठा। मैंने उसे इतना क्यों दिया?" मैंने सोचा। "मैंने 10 वापस मांगे। फिर 20 फिर आखिर में सब 40 ऊंट बहस से वापस ले लिए। मगर मेरी भूख मुमतन ना हुई। कवल की डिबिया मेरी नजर में आई। दरिवश इस छोटी चीज को 40 ऊंटों भरी खजाने से क्यों तरजीह दे रहा था।"
"जब मैंने उसे मांगा तो उसने खबरदार किया कि यह जादुई कोहल है जो दाएं आंख में लगाने से छुपे खजाने दिखाता है। मगर बाएं आंख में लगाने से अंधा कर देता है।" अब्दुल्लाह की आवाज कांप उठी। "मैंने उसे झूठा कहा कि वह इस बड़े खजाने को खुद रखने के लिए ऐसा कह रहा है। उसकी खबरदार के बावजूद मैंने इसरार किया कि वह दोनों आंखों में लगाए। दाएं आंख ने जमीन के छुपे उजायबात दिखाए। मगर जब बाई आंख में कौहल लगा तो अंधेरा हमेशा के लिए नाजिल हो गया।"
"दरी वश के आखिरी अल्फाज अब भी मुझे परेशान करते हैं। 'तुम्हारा लालच इस कौहल से ज्यादा तुम्हें अंधा कर चुका है।' वह सारी दौलत और ऊंट लेकर चला गया। मुझे तन्हा लामतना ही अंधेरे में छोड़ दिया। मैंने नाकाबिल तसदीक दौलत लामतना ही गुर्बत से बदल दी थी।"
"है इस दिन से," अब्दुल्लाह ने इख्तताम किया। "मैं फकीर की तरह घूमता हूं। और जो मुझ पर मेहरबानी करते हैं उनसे कहता हूं कि मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारें ताकि यह जिस्मानी दर्द मेरी रूह को मेरी महलकट कमी की याद दिलाता रहे। जिस्मानी दर्द मेरी रूहानी अंधेरे की याद दिलाता है जो मुझे इस हाल में ला खड़ा किया।"
दरबार खामोश रहा। इस गहरे सबक को जजब करते हुए जो लालच की तबाह कुन फितरत के बारे में था। अब्दुल्लाह की कहानी दिखाती थी कि खवाहिश जब अकल से आजाद हो जाए तो वह जो हासिल करना चाहती है उसे तबाह कर देती है। उसकी जिस्मानी अंधाई रूहानी अंधेरे की ताकतवर इस्तियारा थी जो हर उस शख्स को मुतासिर करती है जो मादी दौलत को रूहानी हिकमत पर तरजीह देता है।
हारून अल रशीद ने अंधे आदमी को गहरी रहमदली से देखा। अब्दुल्लाह की कहानी अबदी सच से गूंज रही थी। वही लालच जो इस आदमी को तबाह कर चुका था। दरबार में हर रूह को खतरा था। उनकी हैसियत की परवाह किए बगैर। खलीफा ने तस्लीम किया कि अब्दुल्लाह की सजा शदीद थी मगर खुद से दी गई। बार-बार खबरदार को नजरअंदाज करने का नतीजा। सबक की जाती अखलाक से आगे हुक्मरानी तक फैला। एक हुक्मरान भी ताकत या इलाके के लालच में अंधा हो सकता है। इंसाफ और रहम की नजर खो देता है। अब्दुल्लाह की कहानी एक आईना थी जिसमें हर सुनने वाला अपनी मुमकिन तबाही देख सकता था। अगर वह अपनी ख्वाहिशात पर काबू ना पाए।
अब्दुल्लाह की गवाही के बाद की खामोश गौर फिक्र में हर मौजूद शख्स ने मादी चीजें और रूहानी कदरों के अपने रिश्ते पर सोचा। अंधा फकीर जिसने लालच से सब खो दिया था। अब कमरे में सबसे अमीर था मेहनत से हासिल हिकमत में। उसकी तकलीफ ने उसकी समझ को पाक कर दिया। उसे अपनी ख्वाहिशात का शिकार से गहरे सच का उस्ताद बना दिया।
हारून अल रशीद अब्दुल्लाह की गवाही खत्म होने के बाद गहरी खामोशी में बैठे रहे। आदमी की कहानी का बोझ दरबार में भारी लटका हुआ था। एक खबरदारी की कहानी जो हर रूह से गूंज रही थी। खलीफा की निगाहें हिकमत और रहम से भरी इस अंधे फकीर पर टिक गई जो इतना बर्दाश्त कर चुका था अपनी रूहानी बेदारी के लिए।
"तुम्हारी तकलीफ तुम्हारी उस्ताद रही है," खलीफा ने आखिरकार ऐलान किया। उनकी आवाज अदालती हिकमत का बोझ उठा रही थी। "दरिवर से तुम्हें मिली सज्जा इस अदालत की किसी सज्जा से कहां ज्यादा थी। तुमने जिस्मानी और रूहानी अंधेरे में घूमा और ऐसी समझ हासिल की जो कम लोग जिंदगी भर में हासिल करते हैं।"
दरबार बिल्कुल साखत रहा जब हारून अल रशीद ने अपना फैसला सुनाया। "इसीलिए हम हुक्म देते हैं कि तुम्हारी सजा का द्वार खत्म हो गया है। आज से तुम्हें शाही खजाने से मुस्तखिल तनख्वाह मिलेगी। तुम्हारी जरूरीरियात के लिए काफी मगर तुम्हारी शिफा याब रूह को लालच की तरफ ना लौटने के लिए मुंसिफ।"
यह फैसला खलीफा की इंसाफ की गहरी समझ को जाहिर करता था। सच्ची हिकमत पहचानती है कि जब सजा का मकसूद पूरा हो जाए।
और तब्दीली हो जाए। एक तब्दीलशुदा रूह को मजीद सजा देना ना इंसाफ है। [संगीत] ना रहम।
अब्दुल्लाह तुमने तकलीफ से अपना कर्ज चका दिया और नुकसान से हिकमत [संगीत] हासिल की। अब तुम्हें इस मेहनत की हिकमत से जीना है। दरबार ने इस रहमदली वाले इंसाफ की तारीफ [संगीत] में सरसराहट की। हारून अल रशीद ने दिखाया कि सच्ची कगद जिम्मेदारी और रहम का तवाजन रखती है। [संगीत] सजा का मकसूद इस्लाह है ना महज इंतकाम।
अब्दुल्लाह ने गहरा झुका दिया। उसकी बेनशी आंखों से आंसू बह रहे थे। खुद बेचारी के आंसू ना बल्कि इस रूहानी [संगीत] सफर की तस्लीम की शुक्रगुजारी के। खलीफा ने फिर दूसरी परासरार शख्सियत की तरफ तवज्जो की। नौजवान सवार जिसने अपनी घोड़ी पर ऐसी बेरहमी दिखाई थी।
अब हमें इस तशद्दुद [संगीत] की कहानी समझनी है जो हमने देखा। हारून अल रशीद ने एक्लान किया आगे बढ़ो और बताओ कि क्या चीज आदमी को एक बेबस मखलूक पर ऐसी वाशत पर मजबूर कर सकती है।
लुकमान हचकचाते कदमों [संगीत] से तख्त के करीब आया। उसका सर अब शर्म में ना बल्कि एहतराम में झुका हुआ था। मुझे उसने सरगोशी [संगीत] में शुरू किया जो खामोश दरबार में सुनाई दी। मेरी कहानी तन्हाई से शुरू होती है और इंसानी [संगीत] समझ से बाहर एक दहशत से खत्म होती है।
मेरे वालिदैन से मुझे आराम और इज्जत विरासत में मिली। लुकमान ने वजाहत की। मगर जब वे चल बसे तो तन्हाई ने मुझे खा लिया। मैंने एक खूबसूरत औरत यासमीन [संगीत] से शादी की। उम्मीद करते हुए कि वह मेरे दिल की खाली जगह भर देगी।
हमारे पहले खाने [संगीत] से ही मुझे उसका अजीब सुलूक नजर आया। वह मजेदार खानों को मुश्किल से छूती जैसे खाना उसे दर्द दे [संगीत] रहा हो। मुश्तबाह बढ़ता गया जैसे दिन गुजरे। एक रात मैंने नींद का ड्रामा [संगीत] किया और देखा कि वह खामोशी से उठी। स्याह कपड़े पहने और रात में निकल गई। मैं उसके पीछे खाली गलियों में चला। शहर के कब्रिस्तान तक जहां मेरी दहशत सच्ची शुरू हुई।
दरबार मशहूर [संगीत] होकर सुन रहा था। जब लुकमान ने नाकाबिल यकीन मंजर की तफसील दी। चांद की रोशनी में मैंने देखा या जमीन [संगीत] एक दहशतनाक शख्सियत से मिली। एक आदमी जिसके चेहरे की खुसूसियात गैर फतरी थी जो उसका इंतजार कर रहा था। वे पुराने साथियों की तरह गले मिले। फिर एक ताजा लाश खोदी और वाहशी भूख से उस पर खाना शुरू कर दिया। [संगीत]
लुकमान की आवाज याद की शिद्दत से कांप रही थी। मैंने देखा दहशत से मुंह फलज जब [संगीत] मेरी बीवी इस वाहशी वजूद के साथ इंसानी गोश्त खा रही थी। जब वे खत्म हुए तो हड्डियां दोबारा दफन की और अलग हो गए। मैं उससे पहले घर भाग आया। मेरा दिमाग [संगीत] देखे हुए की दहशत से घूम रहा था।
अगली शाम लुकमान ने अपनी बीवी का सामना किया। मैंने एहतियात से कहा कि वह अपनी पसंद का खाना तैयार [संगीत] करें। मगर वह फरी समझ गई कि मुझे राज मालूम है। मैं कुछ और कह सकता। उससे पहले उसने [संगीत] मुझ पर पानी फेंका और लानत दी। अपनी मेदा खलत के लिए कत्ता [संगीत] बन जाओ।
इस लम्हे मेरा इंसानी रूप गायब हो गया। कत्ते का रूप ले लिया। उसने मुझे बेरहमी से पीटा और सड़कों पर निकाल दिया। जहां [संगीत] दूसरे कत्ते इस अजनबी पर हमला करते रहे। मैं एक कसाई की दखान तले पनाह लिया। सिर्फ उसकी कभी कभार रहम से जिंदा रहा।
लुकमान ने अपनी तब्दीली [संगीत] की दिलकश तफसील दी। एक नानबाई ने मुझे घर ले लिया और मुझे एक गैर मुतवक्के सलाहियत [संगीत] मिली। मैं सोने के असली सिक्कों और जालियों को सूंघ कर पहचान सकता था। उसने मुझे कईमती [संगीत] बना दिया और उसने मुझे इंसान की हैसियत से कभी ना मिली मेहरबानी से पेश [संगीत] आया।
एक दिन एक औरत ने जाली सिक्का देने की कोशिश की। मैंने उसकी जुब्बाह पकड़ ली। जब तक नानबाई ने धोखा पकड़ [संगीत] ना लिया। मेरी शोहरत फैल गई। एक कत्ता जो जाली करेंसी पकड़ लेता है। मगर सच्ची तब्दीली तब आई जब वही औरत मुझे [संगीत] एक लड़की के पास ले गई जिसने मेरी असलियत पहचान ली। लड़की जो मिस्टिकल फनून में माहिर थी [संगीत] ने मशहूर पानी से मुझे इंसानी रूप वापस दिया। उसने मुझे यासमीन [संगीत] को घोड़ी बनाने का पानी भी दिया। वही घोड़ी जिसे आपने मुझे पीटते देखा। मेरी जरबों में बेरहमी ना थी [संगीत] बल्कि उसकी हौलनाक जुर्मों और मेरी खोई हुई इंसानियत की जरूरी सजा थी।
दरबार हैरतजदा खामोश रहा। इस गैर मामूली कहानी को समझने की कोशिश करते हुए जो सुपर नेचुरल धोखे और तब्दीली की थी। लुकमान की कहानी इंसानी कानून से आगे [संगीत] इंसाफ की तरह जाहिर करती थी। एक कायनाती तवाजन जहां तारीख जादू [संगीत] को मिस्टिकल रद्द अमल की जरूरत थी। उसकी जाहरी बेरहमी एक गहरे इंसाफ [संगीत] को छुपा रही थी जो बगैर मुकम्मल सखो सबक समझे आम आंखों को नजर ना आता।
हारून अल रशीद ने यह नाकाबिल यकीन दास्तान [संगीत] जजब की। तस्लीम करते हुए कि कुछ सच इंसानी समझ से आगे होते हैं। उनके सामने खड़ा नौजवान ना सिर्फ धोखा बल्कि अपनी पूरी इंसानियत खो [संगीत] चुका था। सिर्फ मिस्टिकल मेदा खलत और अपनी झाती नेकी की मदद से बहाल हुआ जो कत्ते की हैसियत में [संगीत] नानबाई की रहम खींच लाई थी।
खलीफा अब एक मजीद पेचीदा फैसला का सामना कर रहा था जो महज जानवरों [संगीत] पर जुल्म की मजम्मत से आगे था। उसे इंसानी इंसाफ को सुपर नेचुरल इंसाफ से तोलना था। दुनियावी सजा को कायनाती तवाजन से। लुकमान की कहानी रिवायती अखलाका की बुनियादों को चैलेंज कर [संगीत] रही थी। एक ऐसी सूरते हाल पेश करते हुए जहां जाहरी बेरहमी [संगीत] एक गोला मकसूद की खिदमत कर रही थी।
जैसे ही हारून अल रशीद फैसला सुनाने को तैयार हुए उन्हें एहसास हुआ कि कुछ परासरारियत [संगीत] इंसानी अदालतों से आगे काम करती है जो ना सिर्फ कानूनी हिकमत बल्कि रूहानी बसीरत का मतलूब करती है। सवार की कहानी ने अदालत की इंसाफ की समझ को वसत दी। जाहिर गलती को बेवक़ एक गहरे मजीद पेचीदा [संगीत] अखलाकी निजाम का काम जाहिर करते हुए जो इंसानी आंखें समझने में जद्दोजहद करती हैं।
हारून अल रशीद ने लुकमान की गैर मामूली कहानी पर गहरे गौर के साथ [संगीत] सोचा जो उसका मतलूब कर रही थी। सुपर नेचुरल ओनासिर रिवायती फैसले को चैलेंज कर रहे थे। हिकमत की जरूरत थी जो सतही जाहिर से आगे [संगीत] देखे और गहरे रूहानी सच समझे।
तुम्हारी कहानी जाहिर करती है कि इंसाफ कई सतहों पर काम करता है। खलीफा ने शुरू [संगीत] किया। उनकी आवाज सोच समझकर और गौरत तलब। जो जाहिर बेरहमी लगता है वह बेवक़ कायनाती निजाम में जरूरी तवाजन [संगीत] हो सकता है जो हम मुकम्मल समझ ना सके। तुम्हारी तब्दीलशुदा बीवी की जारी सजा महज [संगीत] इंतकाम से आगे मकसूद रखती है। वह तवाजन बरकरार रखती है। जहां तारीख जादू ने फदरी निजाम को भरपा [संगीत] कर दिया है।
दरबार गौर से सुन रहा था जब खलीफा ने यह गहरी समझ बयान की। कुछ तब्दीलियां वापस ना की जा सके बगैर बड़े नुकसान के [संगीत] खतरे के। तुम्हारी बीवी की सजा ना सिर्फ उसके जुर्मों के लिए है बल्कि फत्री कानून [संगीत] की खिलाफ वर्जी के लिए। उसे इंसानी रूप वापस देना दूसरे पर वही तारीकी छोड़ सकता है।
हारून अल रशीद ने लुकमान [संगीत] की सूरते हाल की पेचीदगी को तस्लीम किया। तुमने बहुत तकलीफ सही। अपनी इंसानियत खो दी। जिल्लत बर्दाश्त की और इस मुश्किल इंसाफ की जिम्मेदारी [संगीत] उठाई। अदालत तुम्हारे दर्द और ऐसी जिम्मेदारियों को बर्दाश्त करने की ताकत को तस्लीम करती है।
खलीफा की हिकमत इस [संगीत] मुतवाजन नजर में चमकी। रहम को हिकमत से मिलाना चाहिए। जबकि हम रहम की तारीफ करते हैं। हमें यह भी मानना चाहिए कि कुछ नताज [संगीत] सबकी हिफाजत के लिए अपना द्वार पूरा करें। तुम्हारी बीवी का घोड़े का रूप सजा और बंदी दोनों है जो उसे दूसरे [संगीत] को नुकसान पहुंचाने से रोकता है। जबकि उसकी जात को पाक करने देता है।
यह फैसला खलीफा [संगीत] की इंसानी कानून और सुपर नेचुरल इंसाफ के बीच नेविगेशन की सलाहियत दिखाता था। उन्होंने तस्लीम किया कि कुछ सूरत हाल इंसानी कंट्रोल से आगे क्वतों [संगीत] को मानने की जरूरत रखती है। जहां हुक्मरान का किरदार कायनाती तवाजन को उलटना ना बल्कि अपने दुनियावी [संगीत] दायरे में उसे समझना और कायम रखना है।
खलीफा ने फिर तीसरी और आखिरी परासरार शख्सियत की तरफ रजुए किया। हसन हयाल [संगीत] रस्सी बनाने वाला जिसकी अचानक दौलत ने इतना तजसुस पैदा किया था। अब हम गैर मुतवक्के किस्मत [संगीत] की परासरारियत की तरफ आते हैं। हारून अल रशीद ने ऐलान किया हमें बताओ कि [संगीत] किस्मत ने तुम्हारी हालात को कैसे ड्रामाई तौर पर तब्दील किया।
दील हसन अपनी मौजूदा खुशहाली [संगीत] के बावजूद अपनी जड़ों को याद करने वाले आज वकार के साथ आगे बढ़ा। मुझे उसने शुरू किया। मेरी कहानी [संगीत] फलासिफों को सदियों से परेशान करने वाला अबदी सवाल खोजती है। इंसानी मेहनत [संगीत] का किरदार क्या होता है? जब पहले से तयशुदा किस्मत का सामना हो।
मैं एक सादा रस्सी बनाने वाला था। हसन ने वजाहत की जो तलुए से गुरूब तक काम [संगीत] करता मगर खानदान को खिलाने में जद्दोजहद करता था। गुरबत के बावजूद मैंने ईमानदारी और पाकीजगी [संगीत] बरकरार रखी। यह यकीन करते हुए कि बेईमानी भूख से बदतर है। इस फजीलत ने दो दोस्तों [संगीत] की तवज्जो खींची जो मेरी तब्दीली के मरकज बने।
दरबार आगे झुका। [संगीत] इन परासरार नेफा पहुंचाने वालों के बारे में तजसुस करते हुए। उनके नाम शादी और सादिक थे। [संगीत] एक दौलतमंद, एक गरीब मगर गहरी दोस्ती से जड़े। वे हमेशा बहस करते [संगीत] कि इंसानी मेहनत या इलाही किस्मत दौलत का तन करती है। अपनी बहस हल करने के लिए उन्होंने एक ईमानदार गरीब आदमी को दौलत [संगीत] देकर तजुर्बा करने का फैसला किया और नताइ देखने का।
हसन ने बताया कि शादी जो इंसानी मेहनत [संगीत] पर यकीन रखता था ने उसे 200 सोने के सिक्के दिए। वह तवकको करता था कि मैं उनसे सल्तनत कायम करूंगा। मगर कस्मत [संगीत] के दूसरे मंसूबे थे। एक परिंदा सिक्कों वाली थैला छीन लिया। जब शादी वापस आया और सुना तो गुस्सा करने की बजाय उस और सादिक ने मजीद 400 सिक्के दिए तजुर्बा जारी रखने के लिए।
रस्सी बनाने वाले की कहानी एक और अजीब मोड़ ले ली। मैंने उन सिक्कों को मिट्टी के गुलदान में [संगीत] छुपाया जो घास की टोकरी में दफन था। मगर मेरी बीवी बेखबर ने वह टोकरी सब्जी [संगीत] फरोश को बेच दी। किस्मत ने दोबारा मेदा गलत की और मेहनत के [संगीत] बावजूद दौलत छीन ली।
दरबार इन बार-बार नास्तों पर हैरत से सरसराहा। हसन ने जारी रखा। जब दोस्त वापस आए और दूसरी कोई खबर सुनी तो सादिक जो किस्मत पर यकीन [संगीत] रखता था ने मुझे एक सिक्का दिया पैशनगोई करते हुए कि यह पिछली तमाम सिक्कों से ज्यादा [संगीत] खुशहाली लाएगा। अगली बात ने किस्मत की ताकत को सबसे ज्यादा साबित किया।
हसन ने बयान [संगीत] किया, "मेरी बीवी ने वह एक सिक्का रात के खाने के लिए मछली खरीदने में खर्च किया। मछली साफ करते हुए [संगीत] उसे पेट में एक शानदार हीरा मिला। एक ज्वाहिर इतना कीमती [संगीत] कि उसने हमारी तब्दील कर दी। कहानी एक और मोइजाती मोड़ ले ली। मगर किस्मत के [संगीत] मजीद सबूत थे।
दोस्त मेरे नए महल में आए अब भी बहस करते हुए। जैसे ही हम [संगीत] बाग में चल रहे थे। मजदूरों ने उखाप के घोंसले की सफाई करते हुए वहीं सिक्कों [संगीत] की थैला मिली जो परिंदा बरसों पहले छीन ले गया था। फिर इस्तबल के लिए घास [संगीत] खरीदते हुए मजदूरों ने मिट्टी का गुलदान 400 सिक्कों समेत पाया जो मेरी बीवी ने गलती से [संगीत] बेच दिया था।
हसन ने गहरी आजी से इख्तताम किया। मुझे यह इत्तेफाकियात ना थी बल्कि तयशदा वाक्यात। हीरा वापस मिले सिक्के सब बिल्कुल उस वक्त जाहिर हुए जब [संगीत] किस्मत ने चाहा यह साबित करते हुए कि मेहनत अहम है। मगर आखिर में जो लिखा है वह इंसानी जद्दोजहद [संगीत] से ना मिट सकता।
दरबार खामोशी से हैरत में बैठा। किस्मत के नाकाबिले रोकने डिजाइन [संगीत] पर गौर करते हुए हसन की कहानी जाहिर करती थी कि दौलत और गुरबत इंसानी कंट्रोल से आगे पैटर्न [संगीत] पर चलती है। मगर यह भी दिखाती थी कि सख्ती में फजीलत बरकरार रखना बरकत को अपनी तयशुदा वक्त [संगीत] पर खींच लाती है।
हारून अल रशीद ने यह आखरी गवाही जजब की। तस्लीम करते हुए [संगीत] कि तीनों कहानियां एक रूहानी सबक की तकमील करती थी। अब्दुल्लाह की [संगीत] कहानी लालच से खबरदार करती थी। लुकमान की कहानी सुपर नेचुरल इंसाफ जाहिर करती थी और हसन की [संगीत] नरेटिव किस्मत की ताकत दिखाती थी। मिलकर वे इंसानी फितरत इलाही इंसाफ और कायनाती [संगीत] निजाम के बारे में हिकमत की एक तस्वीर बनाती थी जो उनकी हुकुमरानी को बरसों तक रहनुमाई करेंगी।
खलीफा अब ऐसे आखरी फैसले सुनाने की समझ रखता था जो इंसानी [संगीत] इंसाफ को रूहानी हिकमत से मिला दें। दुनियावी अथॉरिटी को अबदी सचों से। यह तीन आम आदमी अपने गैर मामूली तजुर्बात [संगीत] से सदियों तक चलने वाली फजीलतों के उस्ताद बन गए थे।
हारून अल रशीद खड़े हुए। उनकी मौजूदगी [संगीत] हॉल को संजीदा अथॉरिटी से भर दी। यह तीन कहानियां एक ही सच की तस्वीर बनाती हैं। अब्दुल्लाह [संगीत] से हम सीखते हैं कि लालच जो हासिल करना चाहता है, उसे तबाह कर देता है। लुकमान से हम समझते हैं कि कुछ इंसाफ इंसानी नजर से आगे [संगीत] काम करता है। वह तराजू तवाजन करता है जो हम देख ना सके और हसन से हम [संगीत] देखते हैं किस्मत हमारा रास्ता डिजाइन करती है मगर हमारा किरदार तय करता है कि हम कैसे चले।
खलीफा ने तीनों पर [संगीत] इज्जत अता किया तस्लीम करते हुए कि उनकी तकलीफ ने नस्लों के लिए हिकमत दी थी तुम सब इलाही तदीस [संगीत] के आले बने हो इन सबको आगे ले जाओ यह कदीम कहानियां हमारे जदीद दलों से बरास्त बातें [संगीत] करती है लालच के खिलाफ लड़ाई सच्चे इंसाफ की तलाश और इलाही वक की कबूलियत [संगीत] यह फजीलतें मनीखी जिंदगी की बुनियाद है। इन कहानियों पर अपने सफर में गौर करो। अगर यह हिकमत [संगीत] ने तुम्हें छुआ तो बताओ कि यह सबज तुम्हारी जिंदगी में कैसे गूंजते हैं।