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Har Dukh Ka Elaj SABR ❤️ | Peer Ajml Raza Qadri New Bayan 2025

Rahe Madina production 24:43

Transcription

कमजोर बातें करनी छोड़ दें। मायूसी के जुमले अपनी जिंदगी से निकाल दें। हम मुसलमान हैं।

आप बीमार हो गए हैं तो यह भी खुदा का फजलल है। गुनाह माफ होंगे। अगर अल्लाह ताला ने फकीर बना दिया, गरीबी आ गई है तो यह भी फजलल है। अमीरों से पहले जन्नत में जाएंगे।

अगर अल्लाह तबारक व ताला ने किसी जगह आपको मकान नहीं दिया और दूसरे को दे दिया है तो आप वो लोग हैं जो अजीम सुन्नत अदा कर रहे हैं सैयदना बिलाल हबशी की। अगर किसी जगह कोई कमजोरी आ गई है कोई पीछे रह गए हैं तो ये खुदा का फजलल है। अल्लाह ताला ने चाहा हमारे लिए जो फैसला तो हम उस पर राजी हैं।

लेकिन अपनी जिंदगी में और शिकवे इतने बढ़ा लिए हमने इतने बढ़ा लिए कि लोगों से शिकवे करते करते रब रसूल से भी शुरू कर दिए। गुलाम भी कभी शिकवा करता है। आका का भी शिकवा होता है। बंदा भी कभी शिकवा करता है। रब का भी शिकवा होता है। यह भी कभी होता है।

आप ना माने पर यह शिकवा है कि मैं बड़े डॉक्टरों के पास गया हूं। आराम नहीं आया। ना माने पर यह शिकवा है। मैंने कभी किसी को सताया तो नहीं पर मेरे हालात नहीं ठीक होते। आप ना माने पर यह शिकवा है कि फलाने के पास दौलत ज्यादा है। उसने पता नहीं वो आगे निकल गया और मैं पीछे रह गया हूं। ना माने पर ये शिकवा है किससे कर रहे हो रब रसूल से। ओ हस बोले तोदी मेहरबानी अस ते लाड ही लड़वने ने किससे शिकवा कर रहे हो खुदा के बंदो।

गुलाम गुलामी करते हैं शिकवे करते हैं। कोई एक सहाबी थे हजरत आसम बिन साबित रदी अल्लाह ताला जंग ओद में ना हुजूर के हाथ पे मौत की बैत की। जंग ओहद में बैत की सोने तेरे नाम पर मरता डट के लड़े। सलाफा बिन साद के दो बेटे बदर में कत्ल किया इन्होंने। उसने कसम खाई कि माज अल्लाह मैं इनका सर मंगा के तो इनकी खोपड़ी में शराब पंगी। सलाफा बिन साद ने ये कसम खाई कि मेरे दो बेटे कत्ल किए हैं। मैं इनकी खोपड़ी में शराब पऊंगी।

माज़ एक कबीला हज़ल था। उन्होंने ओहद के बाद हुजूर से कहा कुछ कारी हमें दे दे। हमने कुरान सीखना है। तो नबी पाक ने कुछ बंदे भेजे तो आसिम बिन साबत को भी भेजा। लेकिन उन्होंने धोखा किया। वहां जाकर इनको गिरफ्तार कर लिया। जब गिरफ्तार करके मक्के वालों के हाथ बेचने लगे तो हजरत आसिम बिन साबित ने तलवार निकाल ली। फरमाने लगे मैं काफिर का कैदी होके जीने से बेहतर है शहादत की मौत मर जाऊं। काफिरों का कैदी लड़े और फरमाने लगे मेरे कमान में तीर बाकी है। मैं लडूंगा और इतना लडूंगा कि तुम्हें पता चलेगा मुझे लड़ना आता है। और फरमाया मैं सबर करूंगा और सबर करके दिखाऊंगा। मैं डटूंगा और तुम्हें डट के अकेला बंदा मैदान में डट गया अकेला।

जब तीर खत्म हो गए तो फिर नेजा निकाल लिया। ये बात आपको इसलिए समझा रहा हूं कि कुछ लोग कहते हैं जी मैं अकेला क्या करूं? तो यह आखिर में याद रखें कि सब्र आपने करना है चाहे अकेले भी रह जाए हौसला करना है चाहे अकेले भी रह जाए अकेले लड़े तीर खत्म हो गए तो नेजा निकाल लिया खूब लड़े। अब उसने कसम खाई थी कि मैंने इनकी खोपड़ी पे माज अल्लाह खोपड़ी मंगानी है सर मंगाना है और ये जो ले जा रहे थे धोखे के साथ ये भी बेचने ले जा रहे थे तो जब थक गए ना और चारों जानब से जिस्म में तीर पे वस्त हो गए तो दुआ मांगी अकेला बंदा और सब्र का मकाम दुआ मांगी कहा ऐ अल्लाह मैंने आखरी दम तक तेरे दीन की हिफाजत की है। अब तू मेरे जिस्म की हिफाजत करना। इनके ह्थे ना चढ़ जाए मेरा जिस्म।

हजरत आसन बिन साबित रदी अल्लाह ताला शहीद हो गए। काफिर करीब गए जिस्म पकड़ने के लिए, गिरफ्तार करने के लिए, सर काटने के लिए तो शहद की मक्खियां आ गई। पूरे जिस्म पे कब्जा कर लिया। करीब जाते तो मक्खियां लड़ती। कहने लगे पीछे हट जाओ। शाम होगी ना तो उड़ जाएंगी। फिर हम सर काट लेंगे। शाम तक चारों जाने बैठे रहे। ना कोई हवा आई, ना कोई बादल बरसा, ना कोई तूफान आया, शाम को इन्होंने उठाना था। एक रेला आया पानी का और जनाबे आसिम बिन साबत की लाश मुबारक को बहा के ले गया। मेरे रब ने उस मैदान में भी यह बतलाया कि जो सबर करे ना रब उसके जिस्म की भी हिफाजत फरमाया करता है। कि जिस्मों तक की आखरी दम तक अल्लाह की मदद उनके सामने हाल रहते।

रबना अफरी अलना सबम व सब अकदामना फस सुरना अल कौमिल काफरीन।

हजरत उे सलमा रदी्लाहु ताला अन शौहर का नाम है अबू सलमा बेटे का नाम है सलमा कहती है मैं मेरा शौहर मेरा बेटा तीनों छोटा बेटा मेरा हम निकले मक्का मुकर्रमा से मदीना तबा जाने के लिए। एक की बेटा है। खानदान जमा है। शौहर की गोद में बेटा ऊंट के पीछे मैं। फरमाती है मदीने की सरहद आ गई। तो मेरे मेके वाले आ गए। कहने लगे अबू सलमान नहीं ले जाने देंगे मदीने अपनी बेटी को। मैंने कहा मैं मुसलमान हूं। मैं तो अपने शौहर के साथ मदीने जाऊंगी। उन्होंने कहा नहीं जा सकती। तूने जाना है तो जा। हमारी बेटी नहीं जाएगी। जबरदस्ती मुझसे उन्होंने मुझे मेरे शौहर से अलग किया। कहती है फिर मेरे शौहर के कबीले वाले आ गए। वो कहने लगे अगर तुम अपनी बेटी को नहीं ना जाने देते तो यह जो हमारा पोता है ये हमारी नस्ल है। तुम्हारा नहीं इसे हम नहीं जाने देंगे। वो बच्चा अपनी तरफ खींचते थे। मैं अपनी तरफ खींचती थी मदीने की सरहद पे। ये झगड़ा जमीन के लिए नहीं हो रहा। मकान के लिए नहीं हो रहा। हुजूर के मदीने जाने के लिए हो रहा। हुजूर के मदीने जाने के लिए हो रहा। मदीने जाने के लिए हो रहा। लंग कई महीने ते बरस गए तेरी दीद दी तरस गए। उन्होंने बच्चा खींचा मैंने अपनी तरफ खींचा मेरे बच्चे का बाजू उतर गया।

फरमाती है मेरे शौहर मदीने चले गए बेटा मेरा मेरे ससुराल वाले ले गए मुझे मेके वाले ले गए। आज भी कुछ सायाने बंदे कहते हैं इसको निकाल दो और बच्चे छीन लो उनका भी ख्याल था कि बेटा ले जाएंगे ना तो अबू सलमा भी मदीने से वापस आ जाएगा। यह भी वापस आ जाएगा। ओ यार इतना बड़ा भी जालिम कोई नहीं होगा जो मां-बाप से बच्चे जुदा करे। फरमाती हैं कि वो ले गए छीन के। मैं मेके चली गई। लोग रोटी खाते थे। मेरे हलक से नहीं गुजरती थी। जमाना सोया करता था। मैं सो नहीं पाती थी। बेटा कहां, शौहर कहां, मैं कहां?

उम्मे सलमा कितनी देर तकलीफ काटी? जनाबे उे सलमा कहने लगी लोगों एक दो दिन नहीं पूरा साल बीत गया पूरा साल पर जे सोना ही मेरे दुख विच राज जे सोना ही मारो मारो मेनु मार मुकाओ मैं कोई उज ना पेश ले आवा ओ जे सोना ही मेरे दुख विच राज फिर सुख न चुवा। फरमाया साल बीत गया। लोग सुबह उठ के कामकाज पर लग जाते कपड़े बदलते ड्यूटियां करते और मैं सवेरे उठ के उस जगह आ जाती जहां मेरा शौहर और मेरा बेटा बिछड़ा था। मैं सारा दिन रोती आ गुजारी करती। हुजूर के मदीने की तरफ मुंह करके मैं तड़पती। साल बीत गया। साल एक हफ्ता नहीं निकलता बच्चों के बगैर। बड़े-बड़े सायाने लोग परदेस जाते हैं तो बच्चों की फोटो देखदेख के रोते हैं। लेकिन कहती है मां थी। बेटा बिछड़ा और फिर बेटा बीमार हो और मां से जुदा हो। कितनी तकलीफ का मंजर है।

आप फरमाती हैं कि एक साल बीत गया और मैंने किसी की मिन्नत नहीं की। मैंने कोई शिकवा नहीं किया। इसलिए कि जिस हाल में रबो रसूल रखे। ये हौसला ये सब्र ये तवानाई एक साल के बाद मेरे चाचा का बेटा मेरे पास से गुजरा। तड़पते देखकर कहने लगा मेरी बहन तू सारा दिन रोती रहती है। तो मैंने कहा भाई तुम्हें क्या बताऊं। इसका शौहर चला जाए बेटा जुदा हो जाए। वो क्या करेगी? फरमाते उसने जाकर मेरे बाप से, अपने वालिद से, मेरे खानदान वालों से कहा इसकी सजा कब खत्म होगी? इस गरीबनी का कसूर यह है कि ये मदीने वाले का कलमा पढ़ती है। इसकी गलती यह है कि ये मुसलमान हो गई है। दीन हक कबूल कर लिया। क्यों नहीं तुम ख्याल करते? कहते उनके दिल नरम हुए। वो रजामंद हुए मुझे मदीने जाने। फिर उसने कोशिश की मेरे ससुराल पैगाम भेजे। कहा बस करो। और बच्चा तो चिड़िया का जुदा हो जाए तो वह तड़पा करती है। और तुमने एक जीती जागती मां का बेटा जुदा किया है। वो भी नरम हुए।

रब ने असबाब बनाए। मेरा बेटा मुझे मिला। कहने लगे तू रह जा। मैंने कहा नहीं तुम मुसलमान नहीं हो। तुम्हें पता नहीं ना। मैं यहां नहीं रह सकती। मुझे मदीने ही जाना है। अकेली इतना सफर जंगलों का रास्ता पहाड़ी रास्ता तय कर लोगी। मैंने कहा मैं कर लूंगी। जिनु देख के ठर अखियां ने जिन देख के ठरदा सीना है रब्बा तेरी सारी खुदाई एक ही शहर मदीना है। कहती मैं ऊंट पे बैठी बेटा मैंने गोद में बिठा लिया मैं सफर करने लगी पर दिल में खटका था कि इतना लंबा सफर बेटा छोटा है कैसे करूंगी। कहते मुझे उस्मान बिन तला मिल गए कहने लगे कहां जा रही हो बहन मैंने कहा मदीने का अकेले जाओगी मैंने कहा जाना तो है ना कोई साथ चल चले ना चले पर शहर रसूल तो जाना है ना। आप फरमाती है मैंने उस्मान बिन तल्हा से नेक बंदा कोई नहीं देखा। मेरे ऊंट की लगाम थाम ली। जब मुझे ऊंट पे बिठाते थे ना ऊंट बिठा के चले जाते थे। मैं बैठ जाती थी तो आके लगाम थामते थे। जब कहीं मुझे उतारते थे तो ऊंट बिठा के चले जाती थी। मैं उतर जाती। वो ऊंट को बांधते थे। सोना होता था तो ऊंट बिठा देते। मैं उतर जाती। वो दूर जाकर लेट जाते।

फरमाती थी फिर मेरे लिए मेरे रब ने असबाब पैदा किए और मैं मदीना पहुंची। मैं शौहर से मिली और लोगों मेरे नसीब देखो मैं रहने कहां लगी? हुजूर के मदीने में। शहर रसूल में शहर रह पाए नजर होश में आ। ये कुए नबी है। मैं हुजूर के हरम की जमीन और कदम रख के चलना। अरे सर का मौका है ओ जाने वाले मदीने के ख्ते खुदा तुझको रखे गरीबों फकीरों के ठहराने वाले। कहती है मैं वहां बसने लगी।

आप फरमाती हैं मुसलमानों शायद मुझसे ज्यादा तकलीफ किसी ने ना सही हो पर देखो एक साल पूरा मैं तकलीफ में रही और जब मेरा सब्र साल को पहुंचा सब्र की उम्र एक साल हुई तो फिर रब ने बंदोबस्त फिर मेरे घर वाले भी नरम हो गए। ससुराल वाले भी नरम हो गए। रब ने मेरे आने जाने के लिए एक बंदे का बंदोबस्त भी फरमा दिया। फिर मेरा शौहर तक भी मैं पहुंच गई। मुझे मदीनातु रसूल भी नसीब हुआ। एक साल मैंने सबर किया था। रब ने मुझे मुस्तकिल मदीने का ठिकाना अता फरमा दिया।

लेकिन जो बंदा सबर ही ना कर पाए। जो सब्र ही ना जो कहे जी बड़ी दूर से आया हूं। बड़ी देर हो गई। बड़ा टाइम हो गया। कब जाकर मसला हल होगा? वह जो आपने बताया था वो तावीज कब असर करेगा? वह दुआ कब कबूल होगी? वह फलाना मामला कब? भाई यह डेट तो आपको रब रसूल ही दे सकते हैं। बंदा तो कोई इत्तला ही देगा, पैगाम ही देगा, दुआ ही करेगा। अगर जिंदगी में हौसला ही नहीं होगा। अगर आपको यह करार ही नहीं आएगा, ठहरना ही नहीं आएगा किसी मैदान में।

देखें कुछ ऐसी अज़यतें होती हैं जो अज़यतनाक होती है। लेकिन अगर गुलामी में आ जाए ना आप तो वह अज़ियतनाक नहीं होती। उस चुभन में मजा आने लगता है। कई दर्द भी मजेदार होते हैं। कई दर्द भी कभी जख्म ठीक होने पे आ जाए ना तो उसे छेड़ो तो मजा आता है। इसलिए कि कुछ दर्द भी मजेदार होते हैं। आतिश से किसी ने कहा तू रोता बड़ा है। उसने कहा महबूब की याद में तड़पता हूं। अभी तो एक दिल है। मेरे तो ख्वाहिश थी कभी दो होते ना तो सही करके तड़पता। रब ने दिल एक बनाया। कहता मजा दिया है तड़प ने कि मेरी आरजू है या रब मेरे दोनों पहलुओं में दिल बेकरार होता। दर्द में भी मजा है पर शर्त यह है कि लोग दर्द में भी जीना सीखें। हम ना आराम में जीना चाहते हैं। पंखे के नीचे जीना चाहते हैं। काश कि हमें सेहरा में भी नींद का मजा लेने का तरीका आए। फिर जिंदगी के सारे रास्ते आसान है। फिर एक राह भी मुश्किल नहीं। लेकिन क्योंकि हौसला नहीं, सब्र नहीं, वो वाला करार नहीं जो एक मुसलमान से रब रसूल का मुतालबा है।

हुदैबिया के मौके पे ना नबी पाक सल्ला वसल्लम ने जो शर्तें काफिरों के साथ तय की थी ना हुजूर ने नूर बसीरत से की थी ना। तो इन्हीं शर्तों ने फिर फतह के बाप खोल दिए। इन फतना फत मुबीना। एक शर्त यह थी कि अगर कोई मुसलमान मदीने से मक्के आएगा तो मक्के वाले वापस नहीं करेंगे। रख लेंगे। फिर गौर करें कोई मुसलमान अगर मदीने से मक्के आएगा तो मक्के वाले वापस नहीं करेंगे। और अगर कोई बंदा मुसलमान अपने आका की मर्जी के बगैर मुसलमान हो जाए और वहां से वह मदीने आएगा तो हुजूर पनाह नहीं देंगे। तो मेरे भाई महबूब की तरफ से आने वाला ना सिर्फ सुख ही नहीं कबूल करना चाहिए। दुख भी कबूल करना चाहिए। दुख भी कबूल करना चाहिए। हमारा यह मसला है कि हम ना मीठी मीठी के कायल हैं। कड़वी कड़वी के कायल नहीं। अगर वह कभी दुख दे ना तो महबूब का दुख भी सुख समझ के कबूल करो। हां हां उसकी तरफ से कांटा आए कभी तो उसे फूल समझ के कबूल करो। वो चुबेगा नहीं इंशा्लाह मजा ही देगा। वो कबूल तो करो ना।

तो अब हजरत अबू बसीर रदी अल्लाह ताला एक सहाबी थे। एक तो हजरत अबू जंदल रदी अल्लाह ताला अन थे ना तो वो तो हुदैबिया में आ गए हुजूर मुझे ले जाए तो नबी पाक ने फरमाया मैंने वादा कर लिया है उनको भी हुजूर ने वापस भेज दिया और ये बेचारे ना अपने आका की जेल तोड़ के मक्के से भाग के मदीने आए या रसूल अल्लाह मुझे कबूल कर ले मैं भाग आया हूं वो बड़ा जुल्म करते हैं मारते हैं तकलीफ देते हैं वो आए तो उधर से ना उसके मालिक ने एक दो बंदे भी भेज दिए रुका देके कि या रसूल अल्लाह आपका तो वादा था कि आप बंदा रखेंगे नहीं। यह आए और रुका भी आ गया। अब जरा मंजर को समझे। हमारा तो यह मसला है कि कहते हैं कि मेरी 99 बातें मानी है। एक नहीं मानी। लिहाजा मेरा ताल्लुक ही कोई नहीं। लेकिन यहां क्या कैफियत है? बंदा रो रहा है। तड़प रहा है। हुजूर मैं मार से बचता हुआ आया हूं। जेल दौड़ के आया हूं। मुझे कबूल कर ले। उधर रुका आ गया कि आपका वादा था रखेंगे नहीं। अब यह कितना मुश्किल मसला है। लेकिन रसूल पाक अल सलातो सलाम ने फरमाया अबू बसीर मैंने वादा किया यार तुझे वापस जाना पड़ेगा। ओए होए होए लोग तो कहते हैं ना कि वो पीर साहब ने कहा था तो मेरा काम नहीं हुआ। लिहाजा मेरी बैत ही गई। छुट्टी हो गई। माहौल ही बड़ा अजीब है। हुजूर ने फरमाया वापस जा।

लेकिन जे कर यार दे नाम दा मिले मेना फिर उन चोली पा मेजे सु ना जेकर यार दे नाम दा सामने वाले ने ताना समझ के दिया था पर यार के नाम का था ना उसने कहा ला सही सोने के नाम का है ना ताना हुआ तो क्या हुआ जेकर यार दे नाम दा मिले मे उनु चोली पा ल पुजे सु ना जेकर यार दे नाम दी मिले सूली फिर झूठा झूठ ल पीछा हटिए ना झूठा झूठ लखने वाले का भी अपना अंदाज है ना कहता है ये भी मेरे लिए झूला ही है ये भी आराम की जगह ही है झूठा झूठ तो पीछा हटिए ना।

हजरत अबू बसीर रदी अल्लाह ताला से हुजूर ने फरमाया वापस जाना है कहा सोने ठीक है कोई शिकवा नहीं कोई गिला नहीं ये भी मेरे महबूब का हुक्म ही है और क्या बात है मेरे नबी वादों के पक्के हैं क्या बात है हुजूर ने जो कहा करके दिखाया कहते हैं मैं वापस जा रहा था। एक दो बंदे साथ थे। जब मदीने की हद गुजर गई ना हुजूर ने तो कहा था ना मदीने में पनाह नहीं देनी। तो मैंने उससे कहा यार तलवार बड़ी सोनी है। जरा दिखाना उसने दिखाई तो एक की मैंने गर्दन काट दी। दूसरा वैसे ही भाग गया। और भाग के हुजूर के पास आया। जी उसने तो मार दिया। तो सरकार फरमाने लगे मैंने तो वादा पूरा किया था ना। तुमसे नहीं संभाला गया तो मामला तुम्हारा है।

अब हजरत अबू बसीर रदी अल्लाह ताला वापस आए। अर्ज की हुजूर अब मेरे लिए क्या हुक्म है? हुजूर ने फरमाया मियां हुक्म वही है। मदीने में हम नहीं रख सकते तो मदीने में सहाबा थे ना हुजूर की बातों से खुशबू लेते थे मदीने में नहीं रख सकते हजरत अबू बसीर कहते हैं मैं मदीने की सरहद से निकल गया उस जगह चला गया जो ना मक्के की रियासत में था ना मदीने की एक मकाम ईस था जहां मीठे पानी के कुएं थे वहां रहने लगा। हजरत अबू जंदल को पता चला कि एक नया ठिकाना बन गया वो भी जेल तोड़ के आ गए 70 बंदे आ गए वहां से काफिले गुजरते थे काफिरों की यह भी मुसलमानों को तंग करते थे। अगर मक्के से कोई काफिला गुजरता था तो हमने भी इनको पकड़ा। काफिर का माल माल गनीमत असबाब बन गया। और वो जब काफिला लेके आते थे तो डरे होते थे और इनको तो सताया था ना। कहते हमें सताया बड़ा था। हम तो इंकलाबी बन गए थे। हम तो रख लेते ना बड़ी मिन्नत करते। बड़ी जान मुश्किल से छुड़ाते। 70 बंदे हो गए। फिर 300 हो गए।

तबू बशीर कहते हैं दुनिया मदीने जाती थी लेकिन हम तड़पते थे हम तड़पते थे रोत लंग गई है फिर बाहर आ चिट्ठियां मदीने होया नहीं हम तड़पते थे कि यार कोई मौका मिले रोज रात को रोते तड़पते 300 इंकलाबियों का जत्था सब्र से बैठा है मदीने की सरहद पे अंदर आने की इजाजत नहीं पर गुलामी में रोज इजाफा हो रहा सब्र देखो गुला गुलामी में रोज इजाफा होता है। तंग आ गए काफिर। पहले बड़ी डींगे मारते थे कि देखो हमने कैसी शर्त मनवाई है। कैसी शर्त मनवाई है कि उनका बंदा आएगा तो हम वापस नहीं करेंगे। हमारा जाएगा तो उन्हें करना पड़ेगा। फिर इतने तंग आए कि खुद आके कहने लगे हुजूर मेहरबानी करें। ये शर्त तो खत्म करें। और इन 300 को तो मदीने बुलाए। मेहरबानी फरमाएं।

हुजूर बड़े खुश हुए। आज गुलामों के नाम पैगाम लिखा। गुलामों के नाम पैगाम लिखा। चिट्ठी लिखी हुजूर ने। चिट्ठी किस चीज की लिखी? आ जाओ यार मदीने आ जाओ। चिट्ठी आई मदीने आने के लिए। हजरत अबू बसीर के नाम चिट्ठी गई। आजा यार मदीने। आजा तेरे नाम पैगाम। सब लाई है सरकार नबी से। और आया है बुलावा मुझे दरबार नबी से। पैगाम आया। हजरत अबू बसीर इतने बीमार थे कि नजा का आलम था लेकिन उस आलम में भी इंतजार था उस आखरी वेले अखियां मेरी राह तकना है तेरा तेरा तो सजना कुछ भी नहीं जाना ये पा जावे एक फेरा ते सिर मेरे ते आन खोवे ते फिर पर्दा रह ज मेरा सोखा निकले साहब जहूरी ये देख लवे मुख तेरा।

हजरत अबू बसीर को ना वो रुका गया। हुजूर की चिट्ठी गई तो यूं चिट्ठी पड़ी। हुजूर ने फरमाया आजा ना रास्ता खुल गया है। तू आजा खुल गया रास्ता। दुआ फरमाओ मदीने के रास्ते खुल जाए। करो ना यार दुआ मदीने के रास्ते खुल जाए। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने सारे दुख सुनाने ही मदीने जाके होते। कुछ लोग ऐसे हैं जिनके दिल और कलेजे फटने को आते हैं। दुआ करो रास्ते खुल जाए। हुजूर ने फरमाया आजा तेरा राह खुल गया। हजरत अबू जंदल कहते मैं सराने खड़ा था। हजरत अबू बसीर के खात पढ़ा मुस्कुराए इशारे से कहने लगे देख मेरे नबी का खाता है। हुजूर की चिट्ठी मेरे नाम आई है। पढ़ ना तो मैंने भी पढ़ी। पहले रोए फिर कलमा पढ़ा। फिर मेरा हाथ थामा। रूह ही परवाज कर गई। हमेशा के लिए हमेशा के लिए वो जाहरी जिस्म के साथ तो मदीने ना पहुंचे। पर कब्र में गए तो मदीने वाले की जियारत नसीब हो गई। कब्र में हुजूर की जियारत नसीब हो गई। कब्र में हजरत अबू जल कहता है मैंने जनाजा पढ़ा और उसी मकाम पे जहां उन्होंने इंतजार किया था ना वो मकाम में इंतजार उनका मजार बना। मजार के साथ मस्जिद बनी। मस्जिद का नाम मस्जिद अबू बसीर रखा गया। उन्होंने उस इंतजार में जान दे दी। पर सब्र किया। शिकवा शिकवा नहीं किया यारों। इतनी शिकायतें, इतनी शिकायत, इतने शिकवे।

एक बात मेरा और करने को दिल कर रहा है। आप जरा थोड़ा सा अपने इर्दगिर्द माहौल का जायजा लीजिएगा। आपको महसूस होगा। कुछ लोग बहुत तेज हैं। बहुत फुर्तीले हैं। सोसाइटी के अंदर जितने चलन है उन सब से वह आगाह हैं। जमाने की पेचताब को पूरे तौर पर जानते हैं। किस वक्त कौन सा माल खरीदना है, कौन सा बेचना है। हर चीज से उन्हें पूरी शनासाई है। किस महफिल में जाके कौन सा रंग इख्तियार करना है उन्हें सब पता होता है। यहां अगर मैं चलूंगा और मैं चढ़ाई कर दूंगा तो सामने वाला लचक दिखा देगा। उन्हें खबर होती है। लेकिन ऐसे लोग जिंदगी की दौड़ में अक्सर आपको पीछे रहते हुए दिखाई देंगे। बहुत तेज हैं, बहुत स्मार्ट हैं। सब जानते हैं। दीन का भी पता है, दुनिया का भी पता है, सियासत का भी पता है, मुख्तलिफ तहजीबों से भी आगाह हैं। लेकिन पीछे रह गए।

कुछ लोग आपको ऐसे मिलेंगे बजाहिर भोलेभाले हैं। सीधे साधे हैं। पर मिट्टी में हाथ रखते हैं। अल्लाह सोना बना देता है। वो जो लोगों के पास बहुत सारी दुनियावी मामलात है वो बजाहिर उनके पास मौजूद नहीं है। उनको बहुत सारे लोग कहते हैं यार ये कभी मुझे यह वाला हुनर आता होता या जिस तरह इस शख्स के पास सरमाया है। मेरे पास होता तो मैं 10 के 20 और 20 के 40 मिनटों में करके दिखाता। याद रखना कई दफा इंसान पर ऐसा वक्त आता है कि उसके लिए एक रुकावट भी रास्ते में बाकी नहीं रहती। वो जिधर जिधर जाता जाता है दरवाजे खुलते जाते हैं। जिन रास्तों पर वो सफर करता है वो रास्ते उसके लिए आसान होते जाते। बड़ी लंबी चौड़ी दुश्वार गुजार घाटियां होती हैं। लेकिन यह कदम रखता है तो रास्ते सिमटते चले जाते हैं। खुद उसे एहसास होता है कि यार मैं पलट कर देखता हूं तो मैं तो वो कर ही नहीं सकता था जो मुझसे हो गया। ये मेरे लिए मुमकिन ये मैंने कर लिया। ये मुझसे हो गया। दरवाजे खुल जाते हैं। तो अल्लाह का कुरान कहता है कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिए अल्लाह जमीनों आसमान की बरकतों के दरवाजे खोल देता है। सुभान अल्लाह। जमीन भी दरवाजे खोलती है और आसमान भी तो शर्तें कितनी है? अब तो हर आदमी चाहता है मेरे लिए जमीन और आसमान के दरवाजे खुल जाए। शर्तें कितनी? सिर्फ दो। क्या अमल करना है? सिर्फ दो काम। सिर्फ दो शराय।

ये कुरान मजीद है। सूर आराफ है। फरमाया अगर ये बस्तियों वाले ईमान ले आते और तकवा इ्तियार करते। ईमान लाते और मुत्तकी हो जाते। अल्लाह से डर के वक्त गुजारते। तो क्या मालिक तू सिर्फ इन्हें आखिरत में ही अजर देगा? सिर्फ सुबह कयामत ही ईमान और तकवे पर जजा मुरतब होगी। तो फरमाया अगर बस्तियों वाले ईमान लाते और तकवा इ्तियार करते लतना अल बरकात समा हम उन पर जमीनो आसमान की बरकतों के दरवाजे खोल देते। सुभान अल्लाह अगर यह ईमान ले आते लफतना अल बरकात समा तो दरवाजे खोल देते जमीन और आसमान की बरकतों में हम इन पर दरवाजे खोल देते शर्त सिर्फ दो ईमान लाए और तकवा इ्तियार करें जो भी काम करें अल्लाह से डर के करें।

आखिर दावा या अल्हम्दुलिल्लाह रब्बुल आलमीन।