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5) Tafseer - Surah Al Fatihah (Ayah 2 - 3 ) Class 5 - Level 1 || Eng. Ebrahim Shabbir

Dr. Mehboob Abu Asim26:31

Transcription

जितना हो सके अल्हम्दुलिल्लाह का क्या मतलब हमने पढ़ा था? तमाम तारीफें सिर्फ अल्लाह के लिए। माशाल्लाह यह सिर्फ कहाँ से आया? नहीं, नहीं कि आवाज कहाँ से है। सिर्फ माना कहाँ से है? आवाज तो यहीं से आई है। अल नहीं, लिला में जो लाम है उससे आया। सिर्फ अच्छा चले, आपने बोला अल से आया जो अल्हम्दुलिल्लाह में अलिफ ला, वो क्या माना दे रहा है? हाँ, तमाम तारीफें हैं, ठीक है। हर किस्म की तारीफ।

एक सवाल आया था पिछली क्लास में इसी हवाले से कि क्या हम यह कह सकते हैं कि तमाम वो खास तारीफें जो मुझे पसंद हैं, जो मुझे अच्छी लगती हैं, अल्लाह ताला की हैं? ये कह सकते हैं? इसके माने में क्या कहते हैं आप? एक स्टूडेंट का सवाल ये आया था कि इसका माना हम यह कर सकते हैं कि तमाम वो खास तारीफें जो मेरे दिल को पसंद आए, वो अल्लाह ताला के लिए हैं? ये कर सकते हैं या नहीं? हाँ, ये नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि बहुत सी ऐसी चीजें जिनका हमें तसव्वुर भी नहीं है, शायद हमें न पसंद हों, लेकिन अल्लाह ताला के लिए वो ठीक हों। और हम कभी भी अल्लाह ताला को अपनी सोच या अपने तसव्वुर पर कंपेयर या कयास कर सकते हैं? नहीं कर सकते।

उसकी छोटी सी एक मिसाल आपको देता हूँ। एक इंसान अगर चार पाँच दिन तक ना सो रहा हो, क्या आप कहेंगे वो ठीक है या बीमार है? बीमार है। अल्लाह ताला सोता है? ला, अल्लाह ताला को नींद तक भी नहीं आती। हम कभी कंपेयर कर ही नहीं सकते कि जो चीज बंदे के लिए ठीक है, अब जो बंदा चार पाँच दिनों से उठा हुआ सो नहीं रहा, आप बोलेंगे तुम इलाज कराओ, कुछ इशू है, कुछ मसला है, स्ट्रेस होगा, डिप्रेशन होगा, कुछ बीमारी होगी। अल्लाह ताला के लिए तो यह चीज है ही नहीं। अल्लाह ताला को नींद तक भी नहीं आती, सोना तो दूर की बात है। तो इसलिए हम इसका ये करेंगे कि तमाम तारीफें सिर्फ अल्लाह ताला। अब वो तारीफें किस तरह की भी हों, जिस चीज का अल्लाह मुस्तक है वो सब तारीफ है, ठीक है।

अच्छा, उसके रब्बुल आलमीन, रब में चार चीजें कौन-कौन सी आती हैं? खालिक, मालिक, राजिक और मुदब्बिर हैं। मखलूक को मालिक भी है, उनका अल्लाह ओन करते हैं, उनको मालिक है उनका। तीसरा क्या है? रोजी देने का भी इंतजाम की जिम्मेदारी अल्लाह ताला पर है। और मुदब्बिर, सारी तदबीर, हर चीज जो है, जो प्लानिंग है वो किसके हाथ में है? अल्लाह ताला के हाथ में। और उसके बाद हमने आलमीन के हवाले से जल्दी कर लेते हैं क्योंकि थोड़ा सा तफसील आलमीन में हमने पढ़ा था। दो तरह के आलम हैं, दो तबकात से, कौन-कौन से हैं? एक टाइम के लिहाज से जमाना और दूसरा दूसरा स्पेस, कौन कह रहा था? मखलूक। मखलूक के लिहाज से टाइम या जमाना या वक्त हो गया और दूसरा मखलूक या क्रिएशन के लिहाज से। टाइम के लिहाज से, वक्त के, जमाने के लिहाज से हमने थोड़ी डिटेल बताई थी, कितनी उसमें आती हैं लेवल्स? माशाल्लाह, चार लेवल्स आते हैं, कौन-कौन से हैं? आलम अरवाह, फिर उसके बाद आप दुनिया में आए, फिर आप बरज़ख में और फिर आखिरत में, ठीक है। अच्छा, मखलूक के लिहाज से कितने हैं? इंफिनिटी, उसकी कोई लिमिट ही नहीं है, उसकी कोई तादाद ही नहीं है, वो अनलिमिटेड है। वो अल्लाह ताला ने, अल्लाह बेहतर जानते हैं कि कितनी मखलूक है। अल्लाह की तो इन सब का रब कौन है? अल्लाह ताला।

अच्छा, एक हदीस है इसी हवाले से, ये आपके सामने ना स्क्रीन पे, हाँ, दिखा रहे हैं, लाइव भी इंशाल्लाह नज़र आ जाएगी। बहुत ही प्यारी हदीस है। यह हदीस पिछली जो आयत थी ना उसकी शरह में एक हदीस ऐड करनी है हमने। हदीस कुदसी है ये। हदीस कुदसी का मतलब आप जानते हैं? वैसे हदीस अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कही है, लेकिन हदीस कुदसी का मतलब यह है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब हदीस सुना रहे होते हैं तो क्या कहते हैं? अल्लाह ताला फरमा रहा है, और वह कुरान का हिस्सा नहीं होता, वह हदीस में होता है। तो इसे हदीस कुदसी कहते हैं कि जिसमें हदीस सुनाते हुए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बोलते हैं कि अल्लाह ताला ये बात कह रहा है और वो कुरान का हिस्सा नहीं है, वो हदीस है, तो उसको हदीस कुदसी कहते हैं। अल्लाह ताला कहता है, हदीस कुदसी में, के इसको मैं हाईलाइट भी कर देता हूँ। ये, या आपको सिर्फ थोड़ा सा तसव्वुर देना चाहते हैं कि अल्लाह ताला रब्बुल आलमीन किस तरह, अल्लाह कहता है, तुम्हारा सबसे पहला बंदा, पहली मखलूक, बल्कि ख, सबसे आखिरी मखलूक, जो भी मखलूक हो, इंसानों में हो, जानवरों में हो, फ़रिश्तों में हो, जिन्नात में हो, दरख्तों में हो, किसी भी लिहाज से पहली मखलूक और आखिरी मखलूक, अल क़दर रक़ व क़दर जिन क़, तुम्हारे इंसान भी और तुम्हारे जिन्नात भी, सब फस व एक मैदान में खड़े हो जाएँ और फिर हर कोई अल्लाह ताला से जो जी चाहे माँगना शुरू कर दे कि अल्लाह मुझे यह भी चाहिए, यह भी चाहिए, यह भी चाहिए। हर कोई माँगे, इंसान भी, जिन भी, पहले से लेकर आखिर तक सारे माँगना शुरू कर दें, तो अल्लाह ताला हर किसी को जब दे देगा ना जो वो माँगेंगे। आप कितना मांग लेंगे अल्लाह से? अल्लाह अगर आपको एक बार मौका दे दे कि माँगो मुझसे, मैक्सिमम दो घंटे मांग के थक जाएँगे आप। दो घंटे के बाद आपका दिमाग ही रुक जाएगा। दो घंटे शायद मैं ज़्यादा कह रहा हूँ, एक घंटे के अंदर-अंदर आप थक जाएँगे, आपकी सोच रुक जाएगी कि और मैं क्या माँगूँ। दस पंद्रह मिनट के बाद आपको लगेगा मैंने जो माँगना था माँग लिया है, अब उन्हीं चीजों को वापस माँग सकता हूँ और कुछ नहीं कर सकता। लेकिन अल्लाह यह कहता है कि खुले टाइम तक, हस में तो अल्फ़ाज़ नहीं हैं, लेकिन यह कि अपनी जी जो दिल कर रहा है माँगते रहो। अब हदीस में क्या आता है कि अल्लाह बताना ये चाहता है कि जब मैं सबको दे दूँगा तो अल्लाह के ख़ज़ानों में कितनी कमी होगी? कि जिस तरह आप एक सुई ले, एक पिन, समुंदर में डूबो और उसको समुंदर से निकाल दो। अब यह सुई ने जो समुंदर का एक थोड़ा सा ड्रॉप का हिस्सा लिया होता है ना उसने समुंदर को कितना कम किया? कुछ भी नहीं किया ना। अल्लाह कहता है इतनी भी कमी नहीं हुई मेरे ख़ज़ाने में सबको देने के बाद भी। तो यह जब आप पढ़ रहे होते हैं, अल्हम्दुलिल्लाह रब्बुल आलमीन, यह वो रब है कि जिसके ख़ज़ाने ख़त्म नहीं होने वाले। आप उससे बड़ी से बड़ी चीज़ भी माँग सकते हैं और एक जूते का तस्मा भी माँग सकते हैं। अल्लाह से माँगते हुए शर्माना नहीं चाहिए। तो यह है अल्हम्दुलिल्लाह रब्बुल आलमीन। जिसके जवाब में अल्लाह क्या कहता है? लास्ट टाइम बताया था, आप जब यह पढ़ते हैं, अल्लाह जवाब में क्या कहता है? हमनी अबद अल्लाह कहते हैं, मेरे बंदे ने मेरी हमद बयान की है, मेरी तारीफ़ बयान की है।

उसके बाद जो दूसरी आयत है वह है अर्रहमानुर्रहीम। अर्रहमान और अर्रहीम यह अल्लाह ताला की दोनों क्या हैं? सिफ़ात हैं, और ये किससे निकले हैं? दोनों रहम से, रहमत से। और ये दोनों ना सिफ़ात मुबा है। रहमत का, जिसे कहते हैं कि अपनी मर्सी को जो अल्लाह ताला एज़रेट करता है वह है रहमान और रहीम। अच्छा, दोनों में क्या फ़र्क है? कोई फ़र्क है या एक ही जैसा है? क्या फ़र्क है? चले, एक जवाब आ गया रहमान के हवाले से। और भी कोई जवाब? जी, क्या फ़र्क है इसमें? किसमें ज़्यादा है? मुबलिग़, रहमान में ज़्यादा है और रहीम में मुबलिग़ कम है। हाँ, बिल्कुल माशाल्लाह। देखिए, रहमान और रहीम जो है ना सबसे पहले कौन सा है? अर्रहमान। अर्रहमान में अल्लाह ताला की वो रहमत है जो अल्लाह ने कायनात में हर किसी के लिए कर दिया। उसमें अल्लाह ने कोई ख़ास केस नहीं रखा कि अगर काफ़िर है तो मैं उसको नहीं दूँगा, नहीं। वो रहमत ऐसी है कि वह काफ़िर को भी मिल रही है, वो जानवरों को भी मिल रही है, इंसानों को भी मिल रही है, जिन्नात को भी मिल रही है। हर किस्म की मखलूक को वो रहमत मिल रही है। और अल्लाह ताला की रहमत कितनी बड़ी है? कितने हिस्से अल्लाह ने किए रहमत के? एक हदीस में आता है कि अल्लाह की रहमत इतनी बड़ी है कि अल्लाह ने रहमत के सौ हिस्से किए। उस सौ हिस्सों में से एक हिस्सा जो है अल्लाह ने इस दुनिया में नाज़िल कर दिया। इस वक़्त आपको जो रहमत नज़र आ रही है ना आपके दिल में किसी के लिए मोहब्बत हो, प्यार आ जाता है। जानवर एक दूसरे पर कभी तरस खा जाता है, माँ अपने बच्चे से प्यार करती है, दोस्त दोस्त पर थोड़ी रहमत या शफ़क़त खा लेता है। बीमारी को देखकर जो आपको एक तरस आता है, उस पर, किसी ग़रीब को देखकर जो आपको थोड़ा सा एक होता है ना कि ये बेचारा ग़रीब है, एक रहमत आती है ना आपके अंदर, ये वो अल्लाह की रहमत का एक हिस्सा है। सौ हिस्से जो अल्लाह ने तक़सीम किए, उसमें से एक है जो इस दुनिया में अल्लाह ने नाज़िल किया हुआ, और बाक़ी निन्यानवे किधर हैं? वो अल्लाह ने अपने पास संभाल के रखे। जब क़यामत का दिन आएगा, हम सबका हिसाब किताब शुरू होगा, अल्लाह वो निन्यानवे रहमत साथ ले आएगा आपके सामने और ये रहमत का हिस्सा भी वापस जाएगा और फिर उस रहमत को अल्लाह इस्तेमाल करके अपने बंदों को माफ़ करेगा, जन्नत में दाख़िल करेगा। इतनी रहमत है अल्लाह ताला की कि एक हिस्सा दुनिया में और फिर भी देखते हैं दुनिया में सारी मोहब्बत है, जो मोहब्बत होती है किस तरह की होती है? अल्लाह ताला ने बाक़ी सारी संभाली है हम सबको माफ़ करने के लिए कि जब हिसाब किताब होगा हर बंदे को, हर मखलूक को किसी ना किसी बहाने से मैं माफ़ करके जन्नत में दाख़िल कर दूँ। और उसके बाद भी अगर कोई जहन्नुम में जा रहा हो तो कितना बड़ा नुक़सान है, कितना बड़ा ख़रा और लॉस है कि अल्लाह सारी रहमत ला रहा है, बहाने ढूँढ रहा है हमें जन्नत में दाख़िल करने के लिए, लेकिन फिर भी बंदा जो है वो जहन्नुम की तरफ़ जा रहा है। तो यह अल्लाह ताला की रहमान व रहमत जो अल्लाह ताला ने हर किसी के लिए रखी है, इसी रहमत का नतीजा है कि आप देखते हैं काफ़िर भी कमा रहा है दुनिया में, ख़ुश है, बल्कि बाज़ औक़ात मुसलमान से ज़्यादा कमा रहा होता है या मुसलमान से ज़्यादा कहले सुकून में है, बड़ी कुर्सी है। ये अल्लाह ताला की उसी रहमत का जो है नतीजा और असर है। ये अल्लाह ताला ने हर किसी के लिए रखी है। लेकिन जो रहीम है यह वह रहमत है जो ख़ास अल्लाह ताला ने किसके लिए रखी है? किसके लिए रखी है? मोमिनों के लिए, ईमान वालों के लिए। और इसकी दलील कुरआने मजीद की एक आयत है। अल्लाह फ़रमाता है, व बिलनी रहीमा, रहीम का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया कि अल्लाह कहता है मैं मोमिनों पर जो हूँ रहीम वाली रहमत है मुझ पर। तो इसी, इसी से पता चलता है कि दोनों जो हैं कितनी अज़ीम चीज़। अच्छा, अब ये दोनों चीज़ें आपको समझ आ गईं, रहमान क्या है, रहीम क्या है? इससे पिछली आयत कौन सी थी? कौन सी थी? अल्हम्दुलिल्लाह रब्बुल आलमीन। ये आयत कौन सी है? अर्रहमानुर्रहीम। अब आप इन दोनों आयतों का कनेक्शन देखें कि जो आयत पहली थी अल्हम्दुलिल्लाह रब्बुल आलमीन, उसके बाद अल्लाह ने क्या कनेक्शन रखा कि दूसरी आयत में, इसकी अगली आयत में अर्रहमानुर्रहीम है। कि जब आप पहली आयत पढ़ रहे थे ना अल्हम्दुलिल्लाह रब्बुल आलमीन, तो आपके ज़हन में क्या तसव्वुर आया? अल्लाह ताला क्या है? अल्लाह अकबर, अल्लाह बहुत बड़ा है, सबसे बड़ा है, वो ख़ालिक भी है, मालिक भी है। तो आपके ज़हन में तसव्वुर क्या है कि अल्लाह एक बहुत बड़ी जात है। ऐसे ही है ना? इसके फ़ौरन बाद अल्लाह ताला ने अर्रहमानुर्रहीम जब कहा तो आमतौर पर होता क्या है कि दुनिया में जो जितनी बड़ी हस्ती होती है, जितनी बड़ी पर्सनालिटी होती है ना वो उतना गुस्से वाला होता है, उतना सख़्त होता है, वो उतना वह अपना जोर आपके ऊपर चला रहा होता है और अपनी ज़बरदस्ती चलाता है और कोई एहसान भी कर ले तो एहसान जताता है आपके ऊपर, बल्कि कभी-कभी धमकाता भी है वो कि तुम्हें पता है मैं कौन हूँ? एक बादशाह जितना बड़ा होगा आप देखेंगे उतना उसके अंदर एक वो होगा कि ये मेरी मलकीयत है, मेरा ऑर्डर चलता है यहाँ पर। लेकिन अल्लाह ताला इतना बड़ा तसव्वुर देने के बाद क्या कहता है? मैं फिर भी अर्रहमानुर्रहीम हूँ। इतनी ज़्यादा रहमत है अल्लाह ताला की कि अज़ीम ज़रूर है, अल्लाह अकबर ज़रूर है, लेकिन अल्लाह के अंदर रहमान और रहमत का जो सिफ़त है वो भी बहुत ज़्यादा है। इतनी ज़्यादा है कि अल्लाह ताला को दो नाम बड़े पसंद हैं, कौन-कौन से हैं? अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान। रहमान इतनी अल्लाह ताला को पसंद है, सिफ़त रहमत वाली। तो इससे आपको दोनों आयतों का कनेक्शन पता चल गया। तो यह था अर्रहमानुर्रहीम।

इसके बाद अगली आयत में ये आप देख रहे हैं स्क्रीन पर क्या है? मालिकु यौमिद्दीन। इसका क्या तर्जुमा है? बादशाह है, मालिक है किस चीज़ का? यौमिद्दीन। यौम किसको कहते हैं? किसको? दिन को। और दीन किसको कहते हैं? यौम में दीन का क्या तर्जुमा बनेगा? अच्छा, एक जवाब आ रहा है आख़िरत का दिन। एक जवाब आ रहा है बदले का। और भी कोई है? दीन इस्लाम को नहीं कहते, तो यह नहीं कह सकते इस्लाम के दिन का बादशाह। यौमिद्दीन का तर्जुमा ऐसा क्यों आता है? आप अक्सर पढ़ते होंगे कि आख़िरत के दिन का, क्योंकि दीन का जो लुग़वी माना ना वो क्या है? बदला। दीन का जो अरबी में लिटरल मीनिंग है, जो लुग़वी माना वह है बदला। आप जो करेंगे उसका बदला आपको मिलेगा। इसी से अरबी में कभी किसी से कर्ज़ ले तो वर्ड क्या इस्तेमाल होता है? लज दीन, कर्ज़ दिया। अब कर्ज़ आपने वापस लेना है, ठीक है। तो दीन कहते हैं असल में लुग़वी माना बदले का दिन और असल बदला अल्लाह किस दिन देता है? दुनिया में देता है? आख़िरत में। असल जो बदला मिलेगा वो आख़िरत में मिलेगा। हाँ, ठीक है। ये आपको छोटा-मोटा कभी उसका एक असर नज़र आ जाएगा, कोई अच्छा काम किया आपको एक चीज़ नज़र आ जाएगी, लेकिन वो बदला नहीं है। कोई आपने जुल्म किया, आपको उसके बदले नज़र आए, मेरा नुक़सान हो गया, क्या यह बदला है? नहीं। असल जो बदला है वह कब मिलेगा? वो आख़िरत के दिन मिलेगा। इसलिए अल्लाह ने मालिकु यौमिद्दीन जो है दीन का माना कि बदले का दिन, उस दिन असल बदला मिलेगा।

अच्छा, इस, इस आयत में एक सवाल है मेरा, देखता हूँ कौन जवाब इंशाल्लाह दे सकता है। अल्लाह ताला क्या सिर्फ़ क़यामत के दिन का बादशाह है? आज बादशाह नहीं है? पहले नहीं था? तो फिर क्यों सूरह फ़ातिहा में आया मालिकु यौमिद्दीन? आख़िरत, क़यामत के दिन का बादशाह है। चलिए, एक जवाब आ गया रमज़ान भाई की तरफ़ से। जी, दूसरा जवाब वहाँ से भी आ गया। और भी कोई जवाब है? अल्लाह आज भी बादशाह है ना, मालिक आज भी है, लेकिन क्यों इसमें आ रहा है? चले, एक जवाब आ गया कि उस दिन और कोई बादशाह नहीं होगा। नहीं, तो आज अगर और कोई बादशाह है तो अल्लाह ताला बादशाह नहीं है। जी, ख़ास उस दिन क्यों? ये क्यों नहीं कहा कि शुरू से लेकर आख़िर तक बादशाह? ख़ाली क़यामत के दिन को क्यों उस पर महदूद किया? तो आज अगर किसी की चल रही है तो अल्लाह ताला आज भी बादशाह नहीं है? जी, जवाब ठीक है। आपके जवाब ठीक हैं, लेकिन थोड़ा सा कन्फ़्यूज़ कर रहे हो आप। आयत को सही से समझें। असल में यह है कि अल्लाह ताला आज भी बादशाह है, लेकिन क़यामत के दिन अल्लाह ताला ऐलान करवाएगा और पूछेगा, मालिकुल मुल्क कौन है जो आज कहता है कि मेरी मलकीयत है, मेरी हुकूमत है, मेरा ऑर्डर चलेगा? तो कोई जवाब नहीं देगा। फिर अल्लाह ताला ख़ुद जवाब देगा, कहेगा, लिल्लाहिल मालिक, सिर्फ़ अल्लाह ताला के लिए है बादशाहत। और इसी तरह कुरआने मजीद में एक और आयत में आता है के ये आयत आप देखें, अल्लाह फ़रमाता है क़यामत के दिन के बारे में, ये, वो दिन क़यामत का दिन ख़ास है जिसमें एक नफ़्स दूसरे नफ़्स को कोई फ़ायदा नहीं दे सकता। सारा ऑर्डर कहाँ से आएगा? अल्लाह। जो ऑर्डर आएगा, जो हुक्म आएगा वो सिर्फ़ अल्लाह ताला की तरफ़ से। तो आज अगर कोई इमेजिनेशन में, ख़्याल में कहले ना कि मैं किसी मुल्क का बादशाह हूँ, इस ज़मीन का मालिक हूँ, वो एक लिमिटेड टाइम तक और उसके अंदर भी उसकी बड़ी हद होती है, बड़ी जो है पाबंदियाँ होती हैं, जिसके अंदर अपनी हुकूमत चलाता है, अपना ऑर्डर चलाता है। असल जो बादशाहत है वह क़यामत के दिन की। अल्लाह ताला ने इसलिए कहा क्योंकि असल बदला उस दिन मिलने वाला है। आज दुनिया में कोई कह भी दे ना बादशाह के मैं बदला दे दूँगा, वो आपको बदला नहीं दे सकता। एक इंसान, मिसाल देता हूँ, उसने सौ क़त्ल किए। इसका क्या बदला उसको दे सकते हैं? क्या सज़ा दे सकते हैं? जी, ठीक। उसको क़त्ल करेंगे? कितनी बार क़त्ल करेंगे उसको? एक बार ना। तो आपने एक जान के बदले उसको सज़ा शायद दे दी, बाक़ी निन्यानवे का क्या हुआ? तो अल्लाह ताला असल जो बदला देगा वो क़यामत के दिन देगा। इसीलिए अल्लाह ताला ने अपनी सिफ़त में क्या रखा? मालिकु यौमिद्दीन, कि वह क़यामत के दिन का बादशाह है, जिस दिन असल बदला मिलने वाला है और उस दिन तो अल्लाह ताला ख़ुलेआम पूछेगा कि आज कोई कहता है अपने आप को मैं बादशाह हूँ? कोई नहीं कह सकेगा।

अच्छा, इसी आयत में एक और चीज़ है जो आप जान लें। कभी आपने किसी मस्जिद में नमाज़ पढ़ी हो और आपने सुना हो कि इमाम साहब ने एक अलग तरीके से आयत पढ़ी है? सुनी है कभी आपने? क्या सुनी? आपने माशाल्लाह एक आता है मालिकु यौमिद्दीन और दूसरा मालिकु यमन। दोनों में क्या फ़र्क है? मैंने लिख दिया आपको दिखा दिया, ग़लती से। लेकिन, चले, क्या फ़र्क है? वैसे दो माने, दोनों के नहीं, अलग-अलग माना। मालिक जो है जिस तरह आप क्या देख रहे हैं कि वो मालिक है उस चीज़ का, ठीक है? ओन करता है, ये उसकी मलकीयत में है। हम किसकी मलकीयत हैं? अल्लाह ताला की। अल्लाह ताला हमें ओन करता है, अल्लाह हमारा मालिक है, ठीक है। मालिक का मतलब क्या है? जी, मालिक का मतलब के जो जिसके पास सारे तियार हैं, सारी फ़्री चॉइस है उसके पास, वह जो ऑर्डर देना चाहे वह कर सकता है। इधर क्या लिखा हुआ है? बादशाह या फिर उसके पास हर तरह के ऑप्शन हैं, सारे ख़रात उसके हाथ में हैं। तो ये दोनों किसके पास हैं? अल्लाह ताला के पास। अच्छा, आपको एक मिसाल देता हूँ, थोड़ा सा ग़ौर करना मेरे साथ। दोनों में ना फ़र्क है। इंसान के पास कभी-कभी एक चीज़ आ जाती है लेकिन दूसरी चीज़ कभी नहीं आएगी। एक कंपनी में एक मैनेजर है, उसके पास क्या कह सकते हैं कि हाँ उसके पास खुली छूट ज़रूर है ऑर्डर देने की, लेकिन क्या वह कंपनी का ओन करता है? वो मैनेजर वो काम कर रहा है कंपनी में, ठीक है। अच्छा, दूसरी मिसाल देते हैं, एक मुल्क का बादशाह है। मुल्क का बादशाह है वो जिस तरह भी ऑर्डर देना चाहे ऑर्डर दे सकता है, लेकिन क्या वो सारी ज़मीन उसकी है? कल वो चला जाएगा, कोई दूसरा आ जाएगा, वो ऑर्डर देगा, लेकिन ज़मीन उसकी नहीं है। बल्कि बाज़ औक़ात तो बादशाह भी कभी ऑर्डर दे रहा हो उसके पास भी बहुत सारी हद आ जाती है, बाउंड्री आ जाती है, उसको भी कानून को देखना पड़ता है, लीगल चीज़ों को देखना पड़ता है कि मैं अगर कोई ऑर्डर जारी भी कर दूँ वो इस मुल्क की जो कानून है उसके ख़िलाफ़ ना चला जाए। ऐसे ही होता है ना? तो ऑर्डर दे रहा है वो लेकिन उसकी भी एक हद है। तो अल्लाह ताला के पास किसी चीज़ की हद नहीं है, वो मालिकु यौमिद्दीन है और मालिकु यौमिद्दीन भी है, बादशाह भी है और इख़्तियार भी उसी के पास है। हर चीज़ का ऑर्डर जो है वो अल्लाह ताला देने वाला है। अरबी में कहा जाता है, जिस तरह दिखा रहे हैं आपको, क़मा तन तु दीन, क्या मतलब है इसका? इसी से मिलता-जुलता ना असल में उर्दू में एक जुमला है, नीचे लिखा मुहावरा क्या है? जैसा करोगे वैसा भरोगे। इंग्लिश में कोई बता सकता है ये क्या मतलब है? टट फ़ॉर टट। का बोल तो दिया आपने, देख क्या मतलब है? कौन एक्सप्लेन कर सकता है? जी, शबाब एक्सप्लेन करी, बड़े बुज़ुर्ग एक्सप्लेन कर रहे हैं। हाँ, जो आप करोगे आपको बदला भी उसी तरह मिलने वाला है। आपने बुरा किया तो जो रिवेंज आएगा वो भी बुरा ही होना है आपके साथ। यह ना उम्मीद करो कि मैं दूसरे की टांग तोड़ दूँ तो मेरे पास तीसरी टांग आ जाएगी। आपकी भी टांग टूटने वाली है। ठीक है, एक्शन होगा तो उसके बदले आपको रिएक्शन मिलने वाला है। तो दीन का जो लुग़वी माना ना, बदला, वो असल में ये है। अरबी में कहते हैं जैसा करोगे वैसा भरोगे। तो क़यामत के दिन जो आपने आज किया होगा उसका बदला क़यामत के दिन उसी हिसाब से आपको मिलेगा।

अच्छा, क़यामत के दिन के बारे में अल्लाह ताला ने जो आयत रखी ना यहाँ पर इसकी बड़ी ख़ास हिकमत है। पहले कहा अल्हम्दुलिल्लाह रब्बुल आलमीन, एक बड़े होने का तसव्वुर अल्लाह ने आपके सामने रख दिया। फिर क्या कहा? अर्रहमानुर्रहीम, अपनी रहमत का तसव्वुर रख दिया। अब होता क्या है कि जब आप देखें ना मेरे सामने जो सुपरवाइज़र है, जो भी मुझसे बड़ा है, बहुत नरम है तो आप क्या करते हैं? फ़ायदा उठाते हैं उसका। फिर, फिर आप कहते हैं, चलो मैं इसको ना थोड़ी डंडी मारने की कोशिश करता हूँ। ये नरम दिल का है, मीठा-मीठा है तो इसको मैं पकड़ लूँगा, किसी तरह घुमा लूँगा। ये मुझे क्या सज़ा देगा? मैं कुछ ग़लत काम कर भी लूँगा, बाद में मैं भी थोड़ा उसके सामने बेचारा बन जाऊँगा तो वो मेरे साथ जो है वो शफ़क़त, रहमत खा के मुझे माफ़ कर देगा। लेकिन अल्लाह ताला अज़ज़ा व जल्ला के हवाले से आप कभी भी मखलूक की सिफ़ात अल्लाह पर नहीं डाल सकते। अल्लाह ने उसके बाद आपको एक तसव्वुर क्या दिया कि वह रहमान भी है, रहीम भी है, लेकिन वो क़यामत के दिन का बादशाह भी है। उस दिन सारे इख़्तियार भी उसी के पास होंगे। तो आज अगर अल्लाह की रहमत को कोई ग़लत तरीके से इस्तेमाल भी कर ले क्या होगा? क़यामत के दिन अल्लाह उसका बदला ज़रूर देगा। हमारे यहाँ बाज़ औक़ात लोग कहते हैं जी अल्लाह ताला बड़ा ग़फ़ूर है, बड़ा रहीम है, करते रहो जो कर रहे हो, अल्लाह माफ़ कर देगा। अल्लाह ताला ग़फ़ूर रहीम ज़रूर है, लेकिन अल्लाह कुरान में क्या कहता है कि मेरे बंदों को बता दो, मैं ग़फ़ूर रहीम हूँ, मैं लीम, मेरा अज़ाब भी सबसे ज़्यादा दर्दनाक अज़ाब है। तो अल्लाह ताला ग़फ़ूर रहीम भी है, लेकिन साथ अगर बदला देने पर आएगा तो अल्लाह ताला सख़्त तारीन अज़ाब भी बंदे को दे सकते हैं। तो अल्लाह इसीलिए बंदे को याद दिलाता है, दिन में कितनी बार? पाँच बार। आपको बार-बार हर नमाज़ में आप बार-बार पढ़ते हैं। अल्लाह याद दिलाता है कि क़यामत का दिन आने वाला है, किसी भी वक़्त आ सकता है, लेकिन वह आने वाला है। आज जो भी करोगे उसका बदला उस दिन मिलेगा। तो इसीलिए सलफ़ कहा करते थे कि क़यामत के दिन की तैयारी ना आख़िरत के लिए मत रखो, अपनी ज़िंदगी की आख़िरी उम्र के लिए नहीं, कब रखो? अभी, अभी यह टाइम है क़यामत की तैयारी करने का और ख़ास तौर पर उमर रज़ियल्लाहु अन्हु क्या कहते थे? ये आपके सामने लिखा है। अभी तुम अपना ख़ुद ही हिसाब कर लो इससे पहले कि तुम्हारा हिसाब किया जाए, क्योंकि जिसने अपना ख़ुद यहाँ हिसाब कर लिया उस हिसाब में वो कामयाब हो जाएगा। आपको पता चल जाएगा मैं कहाँ हूँ, कहाँ खड़ा हूँ। लेकिन जिसने यहाँ अपना हिसाब ना किया और ढीला रहा, उस दिन जब हिसाब होगा तो बहुत सारी चीज़ें उसके सामने खुल के उसी की आएंगी। तो इसलिए क़यामत के दिन के हवाले से अल्लाह ताला ने यहीं पर बता दिया कि इंसान जो है वो तैयारी करे।

आख़िरी चीज़ आयत में कि क़यामत के दिन सारे ख़रात किसके पास होंगे? अल्लाह ताला के पास। मखलूक में किसके पास? अल्लाह तियार देगा, किसी के पास नहीं होगा। किसी के पास भी, जिसको सिर्फ़ अल्लाह चाहे दे सकेगा। असल तियार सिर्फ़ अल्लाह ताला के पास होंगे। क्या किसी आलिम, दीन के पास ख़रात होंगे? ख़ुद के नहीं होंगे। किसी अल्लाह के नेक वली के पास होंगे? नहीं होंगे। जब तक अल्लाह ताला इज़्न ना दे दे या उसको हुक्म ना दे दे कि तुम अगर किसी की शफ़ात कर लो तो फिर वो जात, वो हस्ती कर सकेगी। यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, अल्लाह के नबी जितने भी हैं, ख़ास तौर पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कितनी अज़ीम जात है, लेकिन फिर भी क़यामत के दिन कोई इख़्तियार ख़ुद से नहीं होगा उनके पास। और यह ख़ुद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा। यह हदीस आपके सामने स्क्रीन पर दिखा रहे हैं। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक दिन बैठ के अपने ख़ानदान में अहम-अहम रिश्तों का ना नाम लेते हैं और कहते हैं कि तुमने जो अमल करना है कर लो, क़यामत के दिन मैं नहीं काम आऊँगा

जो आपकी मदद कर पाएगा और हमारे यहां देखें किस तरह के तसर पाए जाते हैं। कि भाई यह वली है, यह बुजुर्ग है, जो कयामत के दिन तुम्हें तुम्हारी शिफा करा देंगे। एक जगह आप सुनेंगे कहते हैं कि भाई ये जो अल्लाह के नेक बंदे हैं, कयामत के दिन अल्लाह को बातों में मैं बिजी कर दूंगा, तुम मेरे पीछे पीछे से छुप के जन्नत में चले जाना। इस तरह की बातें, इस तरह की कहानियां। फिर इस तरह की बातें कही जाती हैं कि जिसे पकड़े खुदा उसे छुड़ा ले मोहम्मद, और जिसे पकड़े मोहम्मद उसे कोई ना छुड़ा सके। कितनी देखें गुस्ताखी है इसमें। अल्लाह ताला कह रहा है, मालिक यदन, अल्लाह के रसूल सलम कह रहे हैं कि कयामत के दिन मैं किसी के काम नहीं आऊंगा। और हम कहते हैं नहीं नहीं, जिसे अल्लाह ताला पकड़ ले, ना अल्लाह सजा दे, उसे नबी सलम छुड़ा सकते हैं। लेकिन जिसे नबी सलम पकड़ ले, अल्लाह ताला भी नहीं छुड़ा सकता। ला अल्लाह की जात में कितनी बड़ी गुस्ताखी है। तो अल्लाह ताला हमें इसमें कयामत के दिन का सबक दे रहा है, और यह भी कि अपने आमाल जो हैं, वह खुद करने हैं। तो यह है मालिक यदन। तो आज यह दो आयत आपके सामने रखी हैं। अल्लाह ताला से दुआ करते हैं कि अल्लाह हमें इस पर अमल भी करने की तौफीक दे, और समझने की भी तौफीक दे। बकला फला खर। अभी हम अपने आखरी क्लास की तरफ चलते हैं, डॉक्टर न आ चुके हैं। ला बाकी जो टाइम है वो आखरी क्लास के लिए होगा। बकला