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Bhagavad Gita in Simple Hindi Chapter 2

Svayam Sharma24:08

Transcription

दूसरा अध्याय

दूसरे अध्याय में हताश बैठे अर्जुन को केशव प्रोत्साहित करते हैं। उसे संकोच और विषाद छोड़ अपना क्षत्रिय धर्म निभाने का आहवान करते हैं। अर्जुन फिर अपना संदेह व्यक्त करता है और युद्ध लड़ने से इंकार करता है। वास्तव में इसके बाद ही, अर्थात दूसरे अध्याय के गवे श्लोक से ही, श्री भवान और गीता का असली उपदेश आरंभ होता है। श्री भगवान अर्जुन को आत्मा की अमरता के बारे में बताते हैं। आत्मा और शरीर का भेद बताते हैं। आत्मा जो अनश्वर है, उसके लिए हमें शोक नहीं करना चाहिए और शरीर जो नश्वर है, उसके लिए भी हमें शोक नहीं करना चाहिए।

केशव अर्जुन में कर्तव्य भावना जगाने का प्रयास करते हैं। योग के बारे में बताते हैं और समझाते हैं कि परिणाम की इच्छा या परिणाम की चिंता किए बिना ही हमें अपने कर्म करते रहना चाहिए। वे स्थिर बुद्धि वाले श्रेष्ठ स्थित प्रग व्यक्ति की क्या विशेषताएं हैं, उनका वर्णन भी करते हैं।

अध्याय अर्जुन दुखी मन से अपने रथ में बैठा है। उसकी आंखों में आंसू है। वह करुणा और संकोच से ग्रस्त है। तब उससे केशव कहते हैं, "पार्थ, यह तुम्हें क्या हुआ है? इस गंभीर संकट और परीक्षा की घड़ी में यह अज्ञान, यह संकोच क्यों? यह कहां से आए हैं? यह ज्ञान और यह संकोच ऐसे नाजुक मौके पर तुम जैसे श्रेष्ठ मन वाले वीर क्षत्रिय के लिए बिल्कुल उचित नहीं है। ऐसा चरण ना तो तुम्हें स्वर्ग देगा और ना ही पृथ्वी पर यश, बल्कि यह तुम्हारे जीवन को कलंकित कर देगा और यश की जगह तुम्हें अपयश देगा, तुम्हें बदनामी देगा। ऐसे दुर्बल और कायर मत बनो, क्योंकि यह तुम्हें शुभा नहीं देता। इस मन की तुच्छ दुर्बलता को त्यागो और उठो, युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।"

अर्जुन का विषाद फिर भी बना रहता है और वह केशव से कहता है, "हे केशव, भीष्म और द्रोण दोनों मेरे लिए पूजनीय हैं। इन दोनों पर मैं कैसे वार पाऊंगा? इन दोनों पर मैं कैसे बाण चला पाऊंगा? इन पूजनीय गुरुजनों को मारने से तो अच्छा होगा कि मैं संसार में भिक्षा मांगकर जिऊं। चाहे वे केवल अपने ही फायदे का सोच रहे हों, फिर भी वे मेरे गुरु हैं और इन गुरुजनों को मारकर मैं उन सांसारिक सुखों का आनंद कैसे ले पाऊंगा जो इन दोनों के खून से रंगे होंगे? और हम तो यह भी नहीं जानते कि हमारी भलाई किसमें है, हमारी जीत में या फिर उनकी जीत में। धृतराष्ट्र के जिन पुत्रों को मारने के बाद हम शायद जीना भी ना चाहें, वेही हमारे सामने युद्ध के लिए तैयार खड़े हैं। भावुकता और संकोच ने मेरे वीर स्वभाव को दुर्बल बना दिया है और मुझे पूरी तरह से जकड़ रखा है। मेरा कर्तव्य क्या है, मुझे क्या करना चाहिए, मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इसलिए मैं तुमसे विनती करता हूं, मुझे सही सही और निश्चित तौर से बताओ कि मेरी भलाई क्या करने में है। मैं तुम्हारा शिष्य हूं, तुम्हारी शरण में आया हूं। मुझे अपनी शरण में लो और मुझे शिक्षा दो। चाहे मैं धन दौलत से भरी इस पृथ्वी का राजा क्यों ना बन जाऊं, जहां ना तो कोई मेरा शत्रु हो और ना ही कोई मेरे बराबर हो, चाहे मैं स्वर्ग के देवताओं का भी राजा क्यों ना बन जाऊं, तो भी मुझे कुछ ऐसा दिखाई नहीं देता जो मेरी इंद्रियों और मेरे मन को दुख पहुंचाने वाले और इन्हें कमजोर करने वाले इस शोक को दूर कर सके।" यह कहकर अर्जुन ने केशव से कहा, "मैं युद्ध नहीं लडूंगा," और चुप हो गया।

तब दोनों सेनाओं के बीच उस उदास, कमजोर, विषाद ग्रस्त बैठे अर्जुन से केशव ने मुस्कुराते हुए कहा, "पार्थ, तू उनके लिए शोक कर रहा है जिनके लिए तुझे शोक नहीं करना चाहिए और साथ ही तू ज्ञान की भी बातें करता है। लेकिन जिन्हें सच्चा ज्ञान है, वे तो किसी के लिए शोक नहीं किया करते, ना तो उनके लिए जो जीवित है और ना ही उनके लिए जो मर चुके हैं। कोई भी ऐसा समय नहीं था जब तू नहीं था या मैं नहीं था या य सब राजा नहीं थे, और ना ही आगे कभी कोई ऐसा समय आएगा जब हम सब इसके बाद नहीं रहेंगे। जैसे आत्मा इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे के दौर में से गुजरती है, वैसे ही शरीर के मरने के बाद आत्मा का दूसरा शरीर धारण कर लेना भी उसी दौर का एक हिस्सा ही तो है। ज्ञानी और धीर व्यक्ति ना तो इससे घबराता है और ना ही इससे वह विचलित होता है।

सुन पार्थ, अपने जीवन काल में हम जो सर्दी, गर्मी, सुख, दुख का अनुभव करते हैं, वे इंद्रियों का उनके विषयों के संपर्क के कारण ही हैं। वे स्थाई होते हैं, वे आते जाते हैं, उनका आरंभ और अंत होता है, वे सदा के लिए नहीं रहते। इसलिए इन सबको तू धीरज से सहन करना सीख, इन सबको तू बर्दाश्त करना सीख। वह धीर और शांत मनुष्य जिस पर इन सबका कोई असर नहीं होता, जिन्हें यह दुखी और विचलित नहीं करते, जो दुख और सुख दोनों में समान रहता है, वह अपने आप को अमर जीवन पाने के लिए योग्य बनाता है। सत्य के ज्ञान को जानने वालों ने यह समझ लिया है कि सत तो वह है जो सनातन और अमर है, जो कभी नष्ट नहीं हो सकता और असत वह है जिसे नष्ट होना ही है, जो कभी रह नहीं सकता। जिस आत्मा से यह सारा विश्व, यह सारी सृष्टि व्याप्त है, उस आत्मा का नाश, उसका अंत कभी हो नहीं सकता। इस अविनाशी आत्मा का विनाश कोई कर नहीं सकता। कहते हैं कि शरीर धारी आत्मा के निवास स्थान, शरीर तो सब के सब नाशवान हैं और उन सबका अंत होता है। आत्मा स्वयं तो सनातन, अमर, अनश्वर और समझ के भी बाहर है, समझ के भी परे है। इसलिए पार्थ, तू युद्ध कर। जो यह सोचता है कि वह मारता है और जो यह सोचता है कि वह मारा जाने वाला है, वे दोनों ही सत्य को नहीं जानते, क्योंकि आत्मा ना तो किसी को मारती है और ना ही किसी से यह मारी जा सकती है। जान ले पार्थ, ना तो तुम किसी को मारोगे और ना ही कोई तुमसे मारा जाएगा। आत्मा का जन्म नहीं होता और ना ही आत्मा कभी मरती है। यह हमेशा थी और हमेशा रहेगी, अजन्मी, अमर, ना बदलने वाली और प्राचीन। शरीर के मारे जाने पर भी आत्मा नहीं मरती, यह नष्ट नहीं होती, इसका अंत नहीं होता। जो व्यक्ति यह जान लेता है कि आत्मा अनश्वर, सनातन, अमर, अजन्मी और अपार, असीम है, ऐसा व्यक्ति कैसे किसी को मार सकता है या मरवा सकता है? जैसे कोई व्यक्ति अपने फटे पुराने कपड़े उतार करर दूसरे नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही यह शरीर धारण करने वाली आत्मा अपना पुराना शरीर छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण कर लेती है। शस्त्र आत्मा को छेद, काट नहीं सकते, आग इसे जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती। आत्मा को छेदा, काटा नहीं जा सकता, इसे जलाया नहीं जा सकता, इसे गीला नहीं किया जा सकता और ना ही इसे सुखाया जा सकता है। आत्मा अमर है, सबके अंदर मौजूद है, यह स्थिर, अचल और सनातन है। आत्मा अव्यक्त है, यह दिखाई नहीं देती और उसका शब्दों या अन्य साधनों द्वारा वर्णन भी नहीं किया जा सकता। आत्मा ना बदलने वाली है और यह इंद्रियों की शक्तियों और कल्पना के भी परे है। इसलिए आत्मा को ऐसा जानते हुए, आत्मा को ऐसा समझते हुए तुझे शोक नहीं करना चाहिए। और यदि तू यह भी समझे कि आत्मा सदा जन्म लेती है और सदा मरती भी है, तो भी तुझे शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिसका जन्म होता है, उसका मरना तय है और जो मर चुका है, उसका जन्म लेना भी तय है। इसलिए, जो होना ही है, जो अनिवार्य है और जिससे बचा ही नहीं जा सकता, उसके लिए तुझे शोक नहीं करना चाहिए। वैसे जन्म से पहले और मरने के बाद सभी प्राणी अपक होते हैं और दिखाई नहीं देते। वे तो केवल बीच में ही, जन्म के बाद से मरने तक, जब तक वे शरीर धारण किए होते हैं, तब तक ही वे दिखते हैं। ना वे जन्म से पहले दिखते हैं और ना ही वे मरने के बाद दिखते हैं। इसमें शोक करने की क्या बात है? कोई इस आत्मा को एक अद्भुत वस्तु के रूप में देखता है, कोई एक अद्भुत वस्तु के रूप में इसका वर्णन करता है, तो कोई एक अद्भुत वस्तु के रूप में आत्मा का श्रवण करता है। लेकिन फिर भी आत्मा को कोई जान नहीं पाता, इसे जान पाना बहुत कठिन है। सबके शरीर में रहने वाली आत्मा अमर है और इसे कभी भी मारा नहीं जा सकता। इसलिए पार्थ, तुझे किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए और अपने कर्तव्य और अपने क्षत्रिय धर्म को देखते हुए भी तुझे ना तो घबराना चाहिए और ना ही तुझे विचलित होना चाहिए, क्योंकि एक क्षत्रिय के लिए धर्म युद्ध लड़ने से बड़ा और कोई कर्तव्य नहीं है। क्षत्रिय भाग्यवान हैं, जिन्ह संयोग से ऐसा युद्ध लड़ने का अवसर मिलता है। तेरा सौभाग्य है कि तुझे ऐसा धर्म युद्ध लड़ने का मौका मिल रहा है, जो युद्ध तेरे लिए स्वर्ग के द्वार खोल रहा है। ऐसा मौका तू मत खो और यदि तू यह मौका गवा देगा और यह धर्म युद्ध नहीं लड़ेगा, तो तू अपने ने कर्तव्य और यश दोनों से तो गिरेगा ही, साथ-साथ तू पाप का भागी भी बनेगा और लोग हमेशा हमेशा के लिए तेरे इस अपयश की बातें कहा करेंगे और तेरे जैसे सदा सम्मानित रहे और स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए अपयश तो मौत से भी कहीं बढ़कर बुरा है। यह सामने खड़े बड़े-बड़े योद्धा यह समझेंगे कि तू ऐन मौके पर डर के कारण युद्ध से हट गया और जो लोग तेरा बहुत आदर करते थे, वेही तुझे बहुत छोटा समझने लगेंगे। तेरे शत्रु तेरे बल की निंदा करते हुए बहुत सी ना कहने वाली बातें कहेंगे। इससे बढ़कर दुख की और क्या बात हो सकती है? यदि तू युद्ध में मारा गया तो तुझे स्वर्ग मिलेगा, यदि तू जीत गया तो तू इस पृथ्वी का आनंद भोगे। इसलिए पार्थ, तू लड़ने का निश्चय कर ले और खड़ा हो जा। सुख, दुख, लाभ, हानि, जीत, हार इन सबको समान समझ और युद्ध के लिए तैयार हो जा। ऐसा सोचने से और ऐसा करने से तुझे पाप नहीं लगेगा।

पार्थ, यह मैंने तुझे सांख्य अर्थात ज्ञान योग के मार्ग का ज्ञान बताया है। अब मैं तुम्हें निष्काम कर्म योग के मार्ग का ज्ञान और अर्थ समझाता हूं, जिसे जानकर तू कर्म करता हुआ भी कर्मों के सभी बंधनों से छूट जाएगा। इस निष्काम कर्म योग के मार्ग में किए गए किसी भी कर्म का कभी नाश नहीं होता, ना ही इससे कभी कोई बाधा होती है और ना ही इससे कभी कोई अहित होता है। इस कर्म योग रूपी धर्म का थोड़ा सा आचरण, इस मार्ग पर चला हुआ छोटे से छोटा कदम भी मनुष्य की बड़े से बड़े भय से भी रक्षा करता है। इस कर्म योग के मार्ग पर चलने वाले पक्के इरादे वाले, दृढ़ संकल्प वाले लोगों की बुद्धि तो एक ही होती है, अर्थात वह एक ही दिशा में केंद्रित भी होती है, जबकि अनिश्चित और चंचल मन वाले लोगों की बुद्धि एक ना होकर अनेक शाखाओं में बटी होती है और उनके विचार भी बिखरे हुए और अनंत होते हैं। अज्ञानी लोग जो फूलों जैसी सुंदर वाणी बोलते हैं और जो शास्त्रों के शब्दों में ही आनंद लेते हैं, वे लोग शास्त्रों के वाद विवाद में और शास्त्रों की कर्मकांड की क्रियाओं में ही उलझे रहते हैं, जिसके कारण वे समझते हैं कि इसके सिवाय और कुछ नहीं है। उनके मन उनकी स्वार्थी कामनाओं से भरे रहते हैं, वे भोग और ऐश्वर्य को ही स्वर्ग मानते हैं। ऐसे लोग सभी कर्म आनंद शक्ति पाने के उद्देश्य से ही करते हैं। उनके इन कर्मों के फल के रूप में उनका बार-बार पुनर्जन्म होता है। जिन लोगों के मन आनंद शक्ति पाने में लगे रहते हैं, जिनके मन भोग और ऐश्वर्य द्वारा हर लिए गए हैं, जो भोग और ऐश्वर्य में ही उलझे रहते हैं, ऐसे लोगों की बुद्धि आत्मा में अच्छी तरह एकाग्र नहीं हो पाती, आत्मा में अच्छी तरह टिक नहीं पाती।

पार्थ, वेदों का विषय तो तीन गुणों की क्रियाओं से है, तो तीनों गुणों से भी ऊपर उठ जा। सुख, दुख, लाभ, हानि, जीत, हार जैसी सभी दुविधाओं से भी मुक्त होकर सदा अपनी सच्ची आत्मा में स्थित हो जा। वस्तुओं को जोड़ने और इकट्ठा करने की और फिर उन्हें सुरक्षित रखने की चिंता को भी छोड़ दे और केवल आत्मा को प्राप्त कर। आत्मा का ज्ञान पा लेने पर, ब्रह्म ज्ञान हो जाने पर, ऐसे ज्ञान प्राप्त व्यक्ति को सभी वेदों के ज्ञान का उतना ही उपयोग रह जाता है, जितना उपयोग चारों तरफ पानी की बाढ आ जाने पर एक कुए का रह जाता है। आत्म ज्ञान में तो वेदों का ज्ञान भी समाया हुआ है। समझ ले पार्थ, कि तेरा अधिकार केवल कर्म करने का ही है, तेरा अधिकार केवल कर्म करने पर ही है। उस कर्म के फल पर तेरा अधिकार बिल्कुल नहीं है। तेरा उद्देश्य कर्मों का फल कभी ना हो और ना ही कर्मों को त्यागने की इच्छा कभी भी तेरे मन में आए। मन की समता ही योग कहलाती है। इसलिए पार्थ, त सभी प्रकार की आसक्ति हों, सभी प्रकार के लाग लपेट को त्याग कर अपने मन को सफलता और विफलता इन दोनों में समान रखते हुए ऐसे योग में स्थित होकर अपना कर्म करता जा। निष्काम कर्म को बुद्धि योग भी कहते हैं। सकाम कर्म से बुद्धि योग अर्थात निष्काम कर्म अधिक श्रेष्ठ है। इसलिए पार्थ, तू बुद्धि योग में ही शरण ले। जो लोग अपने कर्मों के फल की इच्छा रखते हैं, वे लोग तो दैनी होते हैं, वे निचले दर्जे के लोग होते हैं। जिस व्यक्ति ने अपनी बुद्धि को ब्रह्म से जोड़ दिया है, वे अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्मों से मुक्त हो जाता है। इसलिए तू योग में जुट जा। लोग तो सभी कर्मों को कुशलता से करने का ही नाम है। जिन लोगों ने अपनी बुद्धि को ब्रह्म से जोड़ दिया है, जिन्होंने अपनी बुद्धि को ब्रह्म से मिलाकर एक कर लिया है और जिन्होंने कर्मों से मिलने वाले सभी फलों को भी त्याग दिया है, वे लोग जन्म के बंधन से छूटकर उस परम पद को पा लेते हैं, जहां उनके सभी कष्टों का अंत हो जाता है।

जब तेरी बुद्धि मोह के घने जंगल, मोह के दलदल को पार कर जाएगी, तब तू उस सबके प्रति उदासीन हो जाएगा जो कुछ तूने सुना है या जो कुछ तेरे लिए सुनने को अभी बाकी है। जब तेरी बुद्धि वेद शास्त्रों के शाब्दिक ज्ञान से ऊपर उठ जाएगी और आत्मा में स्थिर हो जाएगी, आत्मा में टिक जाएगी, तब तुझे योग प्राप्त हो जाएगा, तब तुझे आत्मा का दर्शन हो जाएगा।

केशव के वचन सुनने से अर्जुन की बेचैनी कम हुई। वह कुछ शांत हुआ। उसमें और अधिक जानने की जिज्ञासा उठी और उसने केशव से पूछा, "हे केशव, जिस व्यक्ति की बुद्धि स्थिर हो गई है और जिसने परमात्मा को पा लिया है, वह कैसा होता है? ऐसे स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति का उठना, बैठना, बोलचाल, उसका चरण कैसा होना चाहिए?"

श्री भगवान उत्तर देते हैं, "सुन पार, जब मनुष्य अपने मन में उठने वाली सभी कामनाओं को त्याग देता है और जब उसकी आत्मा अपने अंदर ही संतुष्ट रहने लगती है, जब वह अपने आप में ही संतुष्ट रहने लगता है, तभी वह ठहरी हुई बुद्धि वाला या स्थिर बुद्धि वाला स्थित प्रज्ञ कहलाता है। जिस व्यक्ति का मन दुखों में बेचैन नहीं होता और जिसे सुखों में बहुत अधिक लालसा नहीं रहती, जो आसक्ति, भय और क्रोध इन सब से मुक्त हो गया है, ऐसा व्यक्ति श्रेष्ठ है और वही स्थिर बुद्धि वाला स्थित प्रज्ञ कहलाता है। जिसे किसी भी वस्तु के प्रति लगाव या आसक्ति नहीं है, जो अच्छे को पाकर खुश नहीं होता और जो बुरे को पाकर दुख नहीं मानता, उसी की बुद्धि पक्की तरह स्थित होती है। जो व्यक्ति इंद्रियों के विषयों से अपनी इंद्रियों को वैसे ही खींच लेता है, जैसे कछुआ अपने सारे अंगों को अपने खोल के अंदर खींच लेता है, उसी की बुद्धि ज्ञान में दृढ़ता से स्थिर होती है, उसी की बुद्धि ज्ञान में ठहर जाती है। शरीर धारी जीव भले ही विषय भोग को त्याग दे, भले ही वह विषय भोग से निवृत्त हो जाए, लेकिन उन विषयों को भोगने की लालसा उसके मन में कहीं ना कहीं बनी ही रहती है। वह लालसा उसके मन में कहीं ना कहीं दबी रहती है। भगवान के दर्शन हो जाने पर वह लालसा भी उसके मन से मिट जाती है।

पार्थ, मनुष्य भले ही विवेकशील हो और वह पूर्णता पाने के लिए, परम गति पाने के लिए लगातार कोशिश करता रहे, फिर भी उसकी बलवान इंद्रियां उसके मन को जबरदस्ती विचलित कर ही देती हैं। इसलिए उन सब इंद्रियों को वश में करके, मेरे परायण होकर, मेरे साथ जुड़कर, मुझ में ध्यान लगाकर योग में स्थिर रहना चाहिए, क्योंकि जिस व्यक्ति की इंद्रियां उसके वश में है, उसी की बुद्धि दृढ़ता पूर्वक मजबूती से स्थित रहती है, मजबूती से टिकी रहती है। जब कोई मनुष्य अपने मन में इंद्रियों के विषयों का ध्यान करने लगता है, जब व उनके बारे में सोचने लगता है, तब उसके मन में उन विषयों से लगाव हो जाता है, लगाव से इच्छा उत्पन्न होती है और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूर्ता उत्पन्न होती है, मूर्ता मनुष्य की स्मृति को नष्ट कर देती है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से तो व्यक्ति ही नष्ट हो जाता है। परंतु अनुशासित मन वाला मनुष्य, जिसने अपनी इंद्रियों को अपने वश में किया हुआ है, वह लगाव और द्वेष इन दोनों से मुक्त होकर इंद्रियों के विषयों में विचरण करता है, उन्हें भोगता है। ऐसा मनुष्य आत्मा की पवित्रता, आत्मा की शुद्धता को प्राप्त कर लेता है और आत्मा की उस पवित्रता, उस शुद्धता से उसके सभी दुखों का अंत हो जाता है। ऐसे विशुद्ध आत्मा वाले व्यक्ति बुद्धि बहुत जल्दी आत्मा की शांति में स्थित हो जाती है, आत्मा की शांति में टिक जाती है। असंयुक्त में बुद्धि को एकाग्र करने की शक्ति भी नहीं होती, जिसमें एकाग्रता नहीं है, उसे शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं है, उसे सुख भी नहीं मिल सकता, ऐसे व्यक्ति को सुख मिलना असंभव है। जब मन भटकती इंद्रियों के पीछे भागता है, तब वही इंद्रियां मनुष्य के मन को और उसकी समझ को वैसे ही हर लेती हैं, जैसे जल में चलने वाली नौका को तेज हवा उसके सही रास्ते से भटका कर उसे बहा ले जाती है। लेकिन जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को उनके विषयों से सभी ओर से और सब प्रकार से दूर खींच लेता है, तभी उसकी बुद्धि दृढ़ता से स्थिर होती है।

सभी प्राणियों के लिए जब रात होती है, उसमें संयमी जागता रहता है और सभी प्राणियों के लिए जो जागने का समय है, वह ऐसे संयम के लिए रात होती है। जैसे नदियों के पानी से चारों ओर से सदा भरते रहने पर भी समुद्र हमेशा अचल और शांत ही रहता है, वैसे ही जिस मनुष्य की सभी कामनाएं, सभी इच्छाएं उसके अंदर बिना उसे विचलित किए और बिना उसमें कोई विकार उत्पन्न किए उसमें समाती रहें और वह समुद्र की तरह हमेशा स्थिर और शांत ही रहे, उसे सच्ची शांति मिलती है। पर जो इच्छाओं के पीछे भागता रहता है, उसे शांति कभी नहीं मिलती। शांति मनुष्य को तभी मिलती है, जब वह सभी इच्छाओं को त्याग देता है, जब वह लालसा को मिटाकर कर्म करता है, जब उसे किसी भी वस्तु से लगाव या आसक्ति नहीं रहती और जब उसमें अहंकार की भावना भी नहीं रहती।

पार्थ, यह दिव्य दशा है, ब्रह्म को प्राप्त कर लेने की स्थिति है। जो इसे एक बार प्राप्त कर लेता है, वह फिर कभी मोह में नहीं पड़ता, वह फिर कभी मोह के बंधन में नहीं बनता। इसमें स्थित रहकर मनुष्य मृत्यु के समय परमात्मा के परम आनंद, ब्रह्म निर्वाण को प्राप्त कर लेता है।

दूसरा अध्याय समाप्त।

ओम शांति शांति शांति ओम।