📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

Pre-Islamic Arabia Book Review | Valentina A. Grasso | Societies, Politics & Cults Explained

DEEP EXPERT REVIEWS1:11:40

Transcription

डीप एक्सपर्ट रिव्युज़ में खुशामदीद।

आज हम तारीख का एक ऐसा मोहम्मा हल करने की कोशिश करेंगे जिसके बारे में हम सबको लगता है कि हम जवाब जानते हैं। सवाल यह है इस्लाम के जुहूर से पहले अरब कौन थे? यह नाम, यह शिनाख्त जिसे आज करोड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं। आखिर इसकी जड़े कहां है?

हम में से अक्सर के ज़हन में एक तस्वीर है। सेहरा, कबीले और एक दौर जिसे जाहिलियत कहा जाता है। लेकिन क्या हकीकत वाकई यही थी? हकीकत इससे कहीं ज्यादा पेचीदा और दिलचस्प है। और इस मोमें को हल करने के लिए हमारे पास कुछ बहुत अहम सुराग हैं।

यह सुराग वैलेंटीना एक ग्रासो की किताब प्री इस्लामिक अरेबिया। सोसाइटीज, पॉलिटिक्स, कल्ट्स एंड आइडेंटिटीज ड्यूरिंग लेट एंटीक्विटी में जमा किए गए हैं। यह किताब सिर्फ पुरानी कहानियों पर नहीं बल्कि पत्थरों पर लिखे कुतबों, आसारे कदीमा और उस दौर की सल्तनतों के अपने रिकॉर्ड्स की बुनियाद पर एक बिल्कुल नई तस्वीर दिखाती है।

अच्छा। वैसे गुफ्तगू शुरू करने से पहले एक छोटी सी विजाहत करना चाहूंगी। यह ऑडियो मसनई से तैयार की गई हैं। तो हो सकता है कि कुछ अल्फाज़ का तलफुज़ या मुजकर और मुन्नस में कहीं गलती हो जाए। हमारा मकसद सिर्फ तालीमी है ताकि यह इल्म ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके। और हमारा आज का मिशन भी यही है कि इन सुराहों को जोड़ कर देखें कि इस्लाम से पहले की अरब दुनिया की असल तस्वीर क्या बनती है। यह समझना कि जिन लोगों को आज हम अरब कहते हैं क्या वह खुद को इस नाम से पुकारते भी थे या नहीं। तो आइए इस तारीख तहकीक की गहराई में उतरते हैं।

अच्छा तो किसी भी जगह के लोगों को समझने से पहले उस जगह को समझना जरूरी है। पहला सवाल तो यही है कि अरब का नक्शा कैसा था? मतलब उसकी सरहद कहां से शुरू होती थी, कहां खत्म। यह कोई एक मुल्क तो था नहीं। बिल्कुल। और मुसन्निफा अपनी बात यहीं से शुरू करती हैं कि ये सबसे बड़ा चैलेंज है। आमतौर पर दो पैमाने इस्तेमाल किए जाते हैं और मतलब दोनों में ही मसाइल हैं।

पहला पैमाना है बारिश। कहा जाता है कि जहां सालाना 200 मि.मी. से कम बारिश हो वो अरब है। यानी शहराई इलाका। ठीक है। लेकिन यह तारीफ बहुत ही सादा है। यह इस बात को बिल्कुल नजरअंदाज कर देती है कि सेहरा में रहने वाले खानाबदोश और शहरों में रहने वाले आबाद लोग अलग-थलग नहीं थे। उनके आपस में गहरे मुआशी और समाजी ताल्लुकात थे। यानी खानाबदोशों को अपनी जरूरत की चीजों के लिए जैसे अनाज या औजारों के लिए शहरों की जरूरत थी और शहरों वालों को तिजारत और रास्तों की हिफाजत के लिए उन खानाबदोशों की तो उन्हें एक लकीर से अलग करना तो हकीकत के खिलाफ होगा। जी बिल्कुल।

और दूसरा पैमाना है जुबान का जो उससे भी ज्यादा पेचीदा है। आज हम अरबी को एक मुत्तहद जुबान समझते हैं। लेकिन इस दौर में जजीरा नमा में कई जुबाने और रस्मुलखत थे। कदीम शुमाली अरबी, जुनूबी अरबी, नबती अरबी यह सब आपस में काफी मुख्तलिफ थे। अच्छा। दरअसल कुरान पाक वो पहला बड़ा और जामे दस्तावेज है जो पार्चमेंट पर एक मेरी अरबी में लिखा गया है। इससे पहले जुबान की बुनियाद पर कोई वाज़ सरहद बनाना तकरीबन नामुमकिन था।

अच्छा अगर बारिश और जुबान दोनों ही काबिले एतमाद पैमाने नहीं है तो फिर तो नक्शा बनाना ही नामुमकिन लगता है। मुसन्निफा इस मसले से कैसे निपटती हैं? मुसनिफा ने एक बीच का रास्ता निकाला है। वह जुबान और उस दौर की सियासत दोनों को मिलाकर एक नक्शा बनाती हैं। शुमाल में वो सरहद शाम के इलाके जुबद को मानती हैं। क्योंकि वहां से कदीम अरबी का सबसे शुमाली कुतबा मिला है। ठीक है। यह एक लिसानी हद हो गई। जी। और मशरिक और मगरिब की सरहदें उस वक्त की दो सुपर पावर्स रोम और ईरान के ज़रे असर जो अरब रियासतें थी उनसे बनती हैं। मगरिब में रोम के इत्तहादी जाफनी थे और मशरिक में ईरान के इत्तहादी नासरद। इस तरह एक ऐसा खाका बनता है जो इस दौर की सियासी हकीकत के ज्यादा करीब है। ठीक है।

तो हमारे पास एक काम चलाओ नक्शा आ गया है। अब आते हैं असल और ज्यादा मुश्किल सवाल पर। इस नक्शे के अंदर रहने वाले लोग कौन थे? क्या वह सब खुद को अरब समझते थे? यही इस तहकीक का मरकजी नुक्ता है। जब हम तारीख रिकॉर्ड देखते हैं तो अरब का लफ्ज सबसे पहले हमें नौ आशूरी सल्तनत की दस्तावेजात में मिलता है। तकरीबन नवीं सदी कब मसीह में। वो उन्हें अरेबी या अरबा कहते थे। अरेबी। जी। यह लोग सेहरा में रहते थे। लेकिन यह लफ्ज सिर्फ खानाबदोशों के लिए नहीं था। इसमें कबाइल भी थे और छोटी-मोटी बादशाहतें भी जैसे एक जगह अरेबी की मलका शमसी का जिक्र मिलता है। तो अरेबी एक तरह से जग्राफियाई इस्तलाह थी। जैसे कोई कहे शिमाल के लोग। इसका मतलब यह नहीं था कि उन सबकी सकाफत या नस्ल एक ही थी। आपने बिल्कुल सही समझा है। यह बस इस सिमत में रहने वाले लोगों के लिए एक नाम था।

फिर जब हम अहदनामा कदीम यानी ओल्ड टेस्टमेंट देखते हैं तो वहां भी अरब का जिक्र शुमाली अरब के कुछ इलाकों के साथ आता है। लेकिन कोई मुतहदा कौमी शिनाख्त का तसवुल वहां भी नहीं है। हम असल दिलचस्प बात तब शुरू होती है जब हम यूनानियों और रूमों की तहरीरों को देखते हैं। उन्होंने अरब को तीन हिस्सों में तकसीम किया था। एक खुशहाल अरब यानी अरेबिया फैलेिक्स जो आज का यमन है। दूसरा पथरीला अरब, अरेबिया पेट्रिया जो उर्दुन का इलाका था और तीसरा सेहराई अरब अरेबिया डिसर्टा। और मुझे याद है कि वो उन लोगों के लिए अलग-अलग नाम भी इस्तेमाल करते थे। अरब के अलावा नबती या बाद में सारासीन जैसे नाम भी मिलते हैं। तो रूमों ने उन्हें अरब क्यों नहीं कहा? यह सारासीन लफ्ज कहां से आया? यह बहुत अहम सवाल है। यह सारे नाम चाहे वह नबती हो या सारासीन। यह बाहर वालों के दिए हुए लेबल थे। जो सल्तनतें अपने पड़ोसियों को पहचानने के लिए इस्तेमाल करती थी। सारासीन की इस्तलाह खासतौर पर रोमियो ने उन अरब कबाइल के लिए इस्तेमाल की जो उनकी सरहदों पर रहते थे और अक्सर हमले करते थे। यह शायद किसी एक बड़े कबीले के नाम से निकला हो जिसे उन्होंने सब पर लागू कर दिया। अच्छा। अहम बात यह है कि इससे हमें यह बिल्कुल नहीं पता चलता कि वो लोग खुद को क्या कहते थे। तो अब तक हमने जो भी सुना वो दूसरों की आवाज है। यह ऐसा ही है जैसे किसी खानदान के बारे में जानने के लिए हम उनके पड़ोसियों से बात कर रहे हो। हमें उनकी अपनी आवाज सुनने की जरूरत है। वो सुराख कहां मिलेंगे? इसके लिए हमें पत्थरों का रुख करना पड़ेगा। इस दौर के कुतबे ही उन लोगों की अपनी छोड़ी हुई आवाज है।

उनमें सबसे मशहूर और शायद सबसे अहम सबूत निमारा का कुतबा है जो 328 ईसवी का है। यह अमरूल उल कैस नामी एक बादशाह की कब्र पर लगा है और इस पर लिखा है कि वो तमाम अरबों का बादशाह यानी मलकुल अरब था। एक मिनट। तमाम अरबों का बादशाह यह तो एक धमाका बात है। यह तो मुसनिफा के इस दावे के बिल्कुल खिलाफ जाती है कि कोई मुत्तहदा अरब शनाखती ही नहीं। यह तो बहुत वाज़ सबूत लगता है कि वह खुद को एक कौम समझते थे। इसमें क्या कोई पेचीददी है? यही तो इस मुआ का सबसे दिलचस्प हिस्सा है और इसीलिए यह कुतबा इतना मुतनाजे है। मुसन्निफा का कहना है कि यह एक हकीकत से ज्यादा एक सियासी दावा या शायद एक ख्वाहिश हो सकती है। एक बयान जो अपनी ताकत को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने के लिए था। और इसकी एक और तह भी है जो उस दौर की सियासत को बेनकाब करती है। अमरुल कैस बजाहिर ईरान का इत्तहादी था। लेकिन इसी कुतबे के मुताबिक रोमियो ने उसे एक सरदार या फाइलार्क का ओहदा भी दे रखा था। फाइलार्क यानी रूमों की नजर में एक किस्म का मकामी कबायली लीडर या गवर्नर जिसे वो तस्लीम करते थे तो वो एक ही वक्त में ईरान और रूम दोनों के साथ खेल रहा था। यह तो आज की जिओपॉलिटिक्स जैसी सुरते हाल लग रही है। बिल्कुल यह अपनी सरहदों पर इत्तहादी बनाने का रूमी तरीका था। इससे जाहिर होता है कि इस दौर में वफादारियां कितनी सयाल थी। तो हो सकता है कि तमाम अरबों का बादशाह का लकब भी इसी सियासी खेल का हिस्सा हो ताकि वो दोनों बड़ी ताकतों से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सके।

लेकिन इससे भी ज्यादा ठोस सबूत हमें जुनूब से यानी यमन की हिमायरी सल्तनत के कुतुबों से मिलते हैं। अच्छा वहां क्या फर्क नजर आता है? वहां हमें दो अलग-अलग इस्तिलाहात मिलती हैं और उनका फर्क बहुत वाज़ है। एक है एराब और दूसरा है अरब या अरबान। हमीरी बादशाह अपने शाही अलकाबात में फक्र से लिखवाते थे कि वो बादशाह हैं और अपने एराब के। यह एराब वो खानाबदोश ग्रोह थे जो हमीरी सल्तनत के इत्तहादी और फौजी मददगार थे। वह उनके मातेहत थे। और अरब की इस्तलाह वो इस्तलाह उन गिरोहों के लिए इस्तेमाल होती थी जो आजाद थे। सल्तनत के कंट्रोल से बाहर थे और जिन्हें अक्सर दुश्मन या बागी समझा जाता था। एक कुतबे में तो अरब का मुआवाजना हजर यानी शहर के बाशिंदों से किया गया है। जिससे साफ जाहिर होता है कि अरब का मतलब खानाबदोश या गैर महजब समझा जाता था। यह तो ज़हन घुमा देने वाली बात है। यानी जूबी अरब की ताकतवर शहरी और तरक्की याफ्ता सल्तनत खुद को अरब नहीं समझती थी। वो यह लफ्ज दूसरों के लिए इस्तेमाल करते थे जिनमें कुछ उनके दोस्त यानी एराब थे और कुछ दुश्मन यानी अरब। लेकिन वह खुद इस शनाख्त का हिस्सा नहीं थे। आपने बिल्कुल दुरुस्त नतीजा निकाला। हिमरियों के लिए उनकी शनाख्त हिमरी या सबाई थी। अरब तो वो दूसरे लोग थे जो शुमाल में रहते थे। इससे यह साबित होता है कि जजीरा नुमा के अंदर भी अरब की कोई एक मुतफका तारीफ मौजूद नहीं थी। ठीक है।

आइए इन तमाम सुरागों को एक साथ जोड़ते हैं। हमने देखा कि अरब का जग्राफी नक्शा वाजे नहीं है। बाहर की सल्तनतें उन्हें मुख्तलिफ नामों से पुकारती थी। और जजीरा नुमा के अंदर भी सबसे ताकतवर सल्तनत खुद को अरब नहीं कहती थी। तो फिर ग्रासो का खत्म नतीजा क्या है? यह अरब शनाख्त आखिर आई कहां से? मुसनिफा का मरकजी और सबसे बड़ा दावा यह है कि एक मुतहिदा अरब कौमियत इस्लाम से पहले मौजूद नहीं थी। अरब एक लचकदार लेबल था जिसे कभी जग्राफिया के लिए कभी सियासत के लिए और कभी तज़ जिंदगी यानी खानाबदोशी के लिए इस्तेमाल किया गया। लेकिन यह किसी गहरी मुश्तका सकाफती शनाख्त का नाम नहीं था। उनका कहना है कि अरब शनाख्त एक समाजी तशकील के तौर पर इस्लाम के ज़हूर के बाद उभरी।

तो यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे बहुत सी यूरोपी कौमों की जदीद शनाख्त पिछली चंद सदियों में जुबान और मुश्तिका तारीख की बुनियाद पर बनी। इससे पहले वो सिर्फ सैक्सन, फ्रैंक या गाथ थे। तो क्या इस्लाम और अरबी जुबान ने वही काम किया जो शायद प्रिंटिंग प्रेस और कौमी तहरीकों ने यूरोप में किया। यह एक बेहतरीन मिसाल है। मुसन्निफा के मुताबिक कुरान और मयारी अरबी जुबान वो सकाफती औजार थे। जिन्होंने इन बिखरे हुए कबाइल को एक मुश्तका शनाख्त की बुनियाद फराहम की। जब एक मुकद्दस किताब, एक जुबान और एक मुश्तका मकसद यानी फुतूहात मिला तो उसने अरब होने के एहसास को जन्म दिया और उसे बेपनाह तकवियत बख्शी। और जैसे-जैसे यह सल्तनत जजीरा नुमा से बाहर फैली, इस शनाख्त को मजीद पुख्ता होने का मौका मिला होगा। जब उनका सामना ईरानियों, रूमियो और मिस्रियों से हुआ, तो उनका अरब होने का एहसास और गहरा हो गया होगा। बिल्कुल।

लेकिन इसमें एक और दिलचस्प मोड़ भी है। मुसन्निफा कहती हैं कि शुरू में शायद मुसलमान की शिनाख्त अरब की शिनाख्त से ज्यादा अहम थी। लेकिन जब सल्तनत में बड़ी तादाद में गैर अरब लोग मुसलमान होने लगे, तब अरब और मुसलमान की शिनाख्ते अलग होना शुरू हुई। एक शख्स अब अरब हुए बगैर भी मुसलमान हो सकता था। और यहीं से इस शिनाख्त के इर्तका का एक नया बाब शुरू हुआ। तो आज की गुफ्तगू का जो सबसे बड़ा और हैरानक नुक्ता मेरे लिए है वो यह कि अरब शिनाख्त इस्लाम की वजह से पैदा हुई ना कि इस्लाम अरब शिनाख्त की वजह से उभरा। जो कहानी हम अपने जेहन में रखते हैं, हकीकत शायद उसके बिल्कुल बरक्स से है। यह दौर जिसे जाहिलियत कहा जाता है, वह कोई खाली स्लेट नहीं था बल्कि बदलती हुई वफादारियों, ताकतवर बादशाहतों और उभरती हुई शिनाख्तों की एक इंतहाई मुतहरिक दुनिया थी।

और आखिर में सामईन के लिए एक सोचने की बात छोड़ जाती हूं। मुसनिफा का इस्तदलाल है कि अगर हम कुरान की आफाकी अपील को समझना चाहते हैं तो हमें पहले उस बिखरी हुई कसीरो सकाफती और मजहबी तौर पर मुतनव्वा अरब दुनिया को समझना होगा जहां से यह उभरा कुरान किसी खला में नाजिल नहीं हुआ बल्कि यह कदीम दौर के इस वसीतर समाजी सियासी और मजहबी मंजरनामे की पैदावार था जिसने उसे वो शक्ल दी जिसे आज हम जानते हैं।

इस किताब में और भी बहुत कुछ है। अगले हिस्से में हम उसके अगले बाप का जायजा लेंगे और देखेंगे कि इस्लाम के जुहूर से ऐन पहले चौथी और पांचवी सदी में शुमाली अरब की सियासी और मजहबी सूरत हाल कैसी थी। हमारे साथ रहने का शुक्रिया। खुशामदीद।

पिछली बार हमने अरब की तारीख में तीसरी सदी से पहले के दौर पर एक नजर डाली थी। आज हम वहीं से बात आगे बढ़ाएंगे और तीसरी सदी के आखिर से लेकर पांचवी सदी तक के जमाने का जायजा लेंगे और आज की गुफ्तगू का असल महवर यह है कि कैसे उस वक्त की दो सुपर पावर्स रोम और सासानी ईरान के टकराव ने न सिर्फ शुमाली अरब का सियासी नक्शा बदल दिया बल्कि वहां के लोगों के अकीदे और मजहब को भी एक नई शक्ल दी। यह एक ऐसा दौर था जब अरब कबाइल सिर्फ आप कह लें तमाशाई नहीं रहे बल्कि तारीख के इस अजीम खेल में अहम खिलाड़ी बनकर उभरे। बिल्कुल।

आज हम जिन जराय का जायजा ले रहे हैं वो हमें आसारे कदीमा और पुरानी तहरीरों की रोशनी में बताते हैं कि यह तब्दीली कैसे आई। हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि अरब कबाइल जो पहले हाशिए पर थे वो कैसे ताकत के इस खेल में मरकजी किरदार बन गए और कैसे एक नया मजहब यानी ईसाइयत सिफारतगारी और ताकत का एक अहम हथियार बन गया। तो आइए कहानी शुरू करते हैं।

224 ईसवी के आसपास ईरान में एक नया खानदान सासानी इख्तेदार में आता है और उनके आते ही रोम के लिए एक बहुत बड़ा चैलेंज खड़ा हो जाता है। जी। यह कोई छोटी-मोटी सरहदी झड़पें ही थी। है ना? मतलब यह ताकत के तवाजन में एक बहुत बड़ी तब्दीली थी। बहुत बड़ी। और इसका असर बहुत गहरा पड़ा। देखें पहले दोनों सल्तनतों के दरमियान प्लमाइरा और हतरा जैसी छोटी-छोटी रियासतें थी। अच्छा जो एक बफर जोन का काम करती थी। बिल्कुल। जब सासानियों ने उन रियासतों को खत्म कर दिया तो अचानक एक खला पैदा हो गया। अब रोम और ईरान की सरहद बराहेरा उन अरब कबाइल से जा मिली जो उन इलाकों में रहते थे। तो दोनों बड़ी ताकतों को अब उनसे बराहेरास्त निमटना था। तो रोमियो ने इस सुरते हाल से कैसे निपटा? हमारे माखज में एक बड़ी दिलचस्प मिसाल दी गई है जो कदीम चीन से ली गई है। वैशियों को दूसरे वैशियों के जरिए काबू करो। यह तो बड़ी तिल हिकमते अमली लगती है। क्या वाकई ऐसा ही था? बिल्कुल यही किया। उन्होंने मुकामी अरब इत्तहादियों को इस्तेमाल करना शुरू किया। जैसे तनूख कबीला उन्हें पैसे, हथियार और खिताबात दिए गए ताकि वो रूमी सरहदों की हिफाजत करें। लेकिन यह इत्तहाद बहुत नाजुक थे। ऐसा ही है। बहुत नाजुक। यह कोई आज की तरह की पक्की सरहद नहीं थी जिन पर लकीर खींच दी जाए। यह तो अस्रो रुसूख के इलाके थे जो बदलते रहते थे। अच्छा। तो मतलब यह हुआ कि वफादारियां भी बदलती होंगी। बहुत ज्यादा। माखज में इमरुल कैस जैसे रहनुमा का जिक्र है जो कभी रूम के साथ होता था तो कभी ईरान के साथ। तो यह सिर्फ दफा की जंग नहीं थी। नहीं बिल्कुल नहीं। असल लड़ाई तो इन तजारती रास्तों पर कंट्रोल की थी। जहां से कीमती सामान वाले काफिले गुजरते थे। यह एक बहुत बड़ा इख्तादी खेल था। इसीलिए दोनों सल्तनतों ने बड़े पैमाने पर किलाबंदी की। रूम ने स्ट्रेटा डाईक्लिशियाना के नाम से किलों और सड़कों का एक तवील सिलसिला बनाया और ईरान ने भी एक बहुत बड़ी दीवार तामीर की जिसे बाद में अरबों की दीवार कहा जाने लगा। सही। यह सब कुछ इन बेचैन सरहदों को काबू में रखने की कोशिश थी। ठीक है।

तो एक तरफ सियासी और फौजी मिहाज पर यह सब कुछ चल रहा था। लेकिन फिर कहानी में एक बहुत बड़ा मोड़ आता है जो मजहब से जुड़ा है। चौथी सदी के शुरू में रोमी शहंशाह कस्तनतीन ने ईसाइयत कबूल कर ली। मुझे तो हमेशा यही लगता था कि उसने एक दिन आसमान पर सलीब देखी और बस फौरन ईसाई हो गया। लेकिन हमारे जराय कुछ और ही कहानी बता रहे हैं ना। यह सूरज देवता वाली बात क्या है? यह बहुत ही दिलचस्प नुक्ता है। कस्ततीन की तब्दीली कोई एक दिन का वाकया नहीं थी। ईसाइयत कबूल करने से पहले वो सोल इनोवेट्स यानी नाकाबिले तस्कीर सूरज का पुजारी था। अच्छा जी। उस दौर के सिक्कों और यादगारों पर आपको सूरज की तस्वीरें और अलामतें वाज़ तौर पर नजर आएंगी। यह एक तरह की शमसी तौहीद थी। यानी एक बड़े देवता के तौर पर सूरज की इबादत। यह तसवुर शर्क और ईसाइयत के दरमियान एक पुल जैसा था। यह तो कमाल की बात है। यानी किस्ततीन का मजहब बदलना कोई अचानक स्विच ऑन या ऑफ करने जैसा नहीं था। बल्कि ये एक बतदरीज अमल था जो पहले से मौजूद रुझानात से जुड़ा हुआ था। बिल्कुल। और इसीलिए सल्तनत में यह तब्दीली शायद इतनी मुश्किल नहीं रही होगी। और अरब कबाइल के लिए भी यह इतना अजनबी नहीं होगा। यकीनन वो पहले ही एक बड़े वाहिद खुदा के तस्सवुर से किसी न किसी शक्ल में वाकिफ हो रहे थे। मिसाल के तौर परमायरा जैसे शहरों में हमें ऐसे खुदबे मिलते हैं जिन पर लिखा है उस हस्ती के लिए जिसका नाम हमेशा मुबारक है। यानी वो किसी एक देवता का नाम नहीं लेते नहीं बल्कि एक बढ़ हस्ती का जिक्र करते हैं। तो जब ईसाइयत आई तो इसके लिए एक तरह से जहन पहले से तैयार हो रहा था।

क्रिस्तम के इस फैसले ने सियासत को कैसे मुतासिर किया? उसने एक ईसाई दौलत मुश्तका या क्रिश्चियन कॉमनव्थ का नजरिया पैदा किया। अब रोम सिर्फ एक सल्तनत नहीं थी बल्कि एक ऐसा सकाफती और सियासी इत्तेहाद था जिसकी बुनियाद मुश्तका अकीदे पर थी। इस इत्तेहाद में रोम, आर्मेनिया, आइबेरिया और यहां तक कि अरब और अफ्रीका के ओसुमी भी शामिल थे। तो अचानक रूमी शहंशाह के साथ एक ही मजहब का होना एक बहुत बड़ा सियासी फायदा बन गया। वफादारी का सबसे बड़ा सबूत। बिल्कुल। तो रोम के पास अब एक नया सफारती हथियार था। मजहब लेकिन हथियार तभी करामद होता है जब उसे इस्तेमाल किया जाए। तो यह नया अकीदा अरब की सरजमीन पर फैला कैसे? क्या यह सिर्फ बादशाहों और सरदारों का खेल था या आम लोगों ने भी इसे अपनाया। शवाहिद बताते हैं कि चौथी सदी में इसकी रफ्तार सुस्त थी। लेकिन पांचवी सदी में जैसे एक धमाका हुआ और इसके हमारे पास ठोस सबूत हैं। अच्छा जैसे के आसारे कदीमा की खुदाइयों से पता चलता है कि इस दौर में गिरजा घरों की तामीर में बहुत तेजी आई। खासतौर पर उर्दन में उम्मुल जमाल नामी जगह पर 15 गिरजा घरों के खंडरात मिले हैं। 15 गिरजा घर एक ही जगह पर यह तो बहुत ज्यादा हैं। जी। और इसके मुकाबले में अगर आप खलीज फार्स के इलाके देखें जो ईरान के इत्तहादी थे तो वहां इस दौर के ईसाई आसार ना होने के बराबर है। तो इससे साफ जाहिर होता है कि ईसाइयत का फैलाव बराहेरा रूमी असरो रसूख से जुड़ा हुआ था। बिल्कुल जहां रूम का असर था वहां गिरजा घर थे। अच्छा तो सरदारों के लिए यह एक सियासी चाल थी। यह तो समझ में आता है। मलिका माविया की कहानी तो किसी फिल्म की तरह लगती है। एक अरब मलका रूमों को शिकस्त देती है और फिर जब वह अमन के लिए आते हैं तो वह पैसे या जमीन नहीं मांगती बल्कि एक मखसूस राहिब का मुतालबा करती हैं। जी। यह एक बेहतरीन मिसाल है कि मजहब को सियासी ताकत के लिए कैसे इस्तेमाल किया गया। माविया ने रूमों को दिखा दिया कि वह अपनी शरायत पर अमन कायम करेगी। इसने मुतालबा किया कि मूसा नामी एक सेहराई राहिब को उसके कबीले का बिशप मुकर्रर किया जाए। इस तरह उसने ना सिर्फ रूमों से अपनी बात मनवाई बल्कि अपने कबीले को रूमी निजाम में एक बाकायदा और बाइज्जत मुकाम भी दिला दिया। लेकिन क्या हम इस बात का खतरा मोल नहीं ले रहे कि हम हर चीज को सिर्फ सियासी फायदे के नुक्ता नजर से देख रहे हैं? क्या इसमें हकीकी रूहानियत या अकीदे का कोई उनसुर शामिल नहीं हो सकता? आपका सवाल बहुत अहम है। यकीनन रूहानी पहलू भी मौजूद था। लेकिन सरदारों के लिए सियासी फायदा सबसे नुमाया था। एक और सरदार अस्पीडस की मिसाल देखें। वो पहले ईरान का इत्तहादी था। फिर वो भागकर रूमी इलाके में आ गया। ईसाइयत कबूल की। अपना नाम बदलकर पीटर रखा और बिशप बन गया। यानी उसने मजहब को एक सीढ़ी के तौर पर इस्तेमाल किया। एक तरह से जी अपने खानदान का रुतबा बुलंद करने और

रोम जैसी सुपर पावर के साथ ताल्लुकात कायम करने के लिए। ठीक है। अशराफिया की बात तो समझ आ गई लेकिन कोई भी तहरीक सिर्फ एलिटा के बल पर कामयाब नहीं होती। आम लोगों को इसमें क्या नजर आया? आम लोगों के लिए उसकी कशिश की वजूहात बिल्कुल मुख्तलिफ थी। माखिज में घूमने फिरने वाले राहबों यानी मंग्स का बहुत अहम किरदार बताया गया है। अच्छा। उन्हें मुकद्दस हस्तियां समझा जाता था जिनके पास बीमारों को शिफा देने और बदरूहों को भगाने की ताकत होती थी। सेरा की साख्त और गैर यकीनी जिंदगी में यह तो एक बहुत बड़ी कशिश होगी। बहुत बड़ी। लोग उनमें एक माफूक उल फितरत ताकत देखते थे जो उनकी मदद कर सकती थी। यह सिर्फ अकीदे की बात नहीं थी बल्कि रोजमर्राह की जिंदगी में अमली मदद की उम्मीद भी थी।

और खानकाहो का क्या किरदार था? खानकाहें यानी मोनेस्ट्रीज सिर्फ इबादत की जगह नहीं थी। वो अहम समाजी और इ्तसादी मराकिज बन गई। वो मुसाफिरों को पनाह देती, गरीबों की मदद करती और मुकामी आबादी को तहफुज फराहम करती थी। एक गैर मुस्तहकम दुनिया में इस्तहकाम के जजीरे की तरह बिल्कुल यही।

माखुज़ में एक और पहलू का भी जिक्र है। चर्च काउंसिल्स यानी वो बड़ी मजहबी मीटिंग्स। उनका अरब में क्या असर हुआ? यह एक और दिलचस्प परत है। जब बसरा और फिलादेफिया जैसे इलाकों के अरब बिशप्स ने नीकिया और खलकीदोन जैसी बड़ी काउंसिलों में शिरकत करना शुरू की तो वह सल्तनत के मरकज में होने वाली बड़ी मजहबी बहसों को अपने साथ वापस लाए।

और यह बहसें किस बारे में थी? यह बुनियादी तौर पर हजरत ईसा की फितरत पर एक गहरी मजहबी बहस थी कि वह इंसानी थे, खुदाई या दोनों का इम्तजाज। अच्छा। इस बहस से दो बड़े ग्रोह पैदा हुए। खलकी दोनी जो रूमी सल्तनत के सरकारी अकीदे की नुमाइंदगी करते थे और मियां फिजाइट जो इससे इख्तलाफ रखते थे। लेकिन यह बहस जल्द ही मजहबी हदों से निकलकर सियासी वफादारी का रंग इख्तियार कर गई। खल्की धोनी होना मतलब रोम का वफादार होना था। जबकि मियां फिजाइट अकीदा रखना एक तरह की इलाकाई खुद मुख्तारी की अलामत बन गई।

तो इस मुकाबलेबाजी का नतीजा क्या निकला? नतीजा यह निकला कि शायद इसी वजह से गिरजा घरों की तामीर में मजीद तेजी आई। हर ग्रोह अपने असर और रुसूक को बढ़ाने और अपनी शनाख्त कायम करने के लिए ज्यादा से ज्यादा गिरजा घर बना रहा था। यह सिर्फ मजहबी जोश नहीं था बल्कि एक तरह की समाजी और सियासी मुसाबकत भी थी।

तो अगर हम इस सारी गुफ्तगू का खुलासा करें तो इसका क्या मतलब निकलता है? तीसरी सदी के आखिर से पांचवी सदी तक का यह दौर शुमाली अरब के लिए एक फैसलाकुन मोड़ था। बिल्कुल। इस दौर ने शुमाली अरब को हमेशा के लिए बदल दिया। रोम और ईरान की दुश्मनी ने अरब कबाइल को जो पहले नजरअंदाज किए जाते थे, एक गैर मामूली अहमियत दे दी। और ईसाइयत इस नए खेल में एक बहुत ताकतवर आला बन गई। यह सिफारतकारी की जुबान थी, वफादारी की अलामत थी और ताकत और रुतबा हासिल करने का एक जरिया था। और इसका मुस्तकबिल पर क्या असर पड़ा? इस दौर ने छठी सदी की बड़ी और ताकतवर अरब रियासतों जैसे गसस्सीना और लखमी के लिए बुनियाद रखी। जिनके बारे में हम शायद बाद में बात करेंगे। और मजहबी तौर पर? मजहबी तौर पर मंजरनामा मुकम्मल तौर पर बदल गया। जो इलाका पहले बहुत से देवताओं की पूजा करता था, वह अब ज्यादातर ईसाई और कुछ यहूदी तौहीद परस्त बन चुका था। और एक बहुत बड़ी सकाफती तब्दीली यह आई कि पुरानी शुमाली अरबी तहरीरें आहिस्ता-आहिस्ता खत्म हो गई और इस अरबी जुबान का उरूज शुरू हुआ जिसे आज हम जानते हैं। यह सूरत हाल हमारी अगली गुफ्तगू के लिए बेहतरीन स्टेज तैयार करती है। हमने देखा कि शुमाली अरब किस तरह एक अहम खिलाड़ी बना और ईसाइयत कैसे फैली। अगले बाप में हम अपना रुख जूब की तरफ मोड़ेंगे और देखेंगे कि इसी दौर में जुनूबी अरब में क्या हो रहा था। वो एक बिल्कुल मुख्तलिफ कहानी है जिसकी अपनी अलग सियासी और मजहबी हरकियात हैं।

और आखिर में एक सवाल जो सोचने पर मजबूर करता है। माखुज़ हमें बताता है कि जहां ईसाइयत रोम के इत्तेहादियों के लिए एक मुतहिद करने वाला हथियार बनी वहीं ईरान का सरकारी मजहब जरतुश्ती ज्यादातर लसनी या कौमी रहा। उसे सिफारती तौर पर इस्तेमाल नहीं किया गया। जरा सोचिए तारीख कितनी मुख्तलिफ हो सकती थी अगर सासानी सल्तनत ने भी अपने अरब इत्तहादियों के साथ रोम जैसी कोई आलमगीर मजहबी पॉलिसी अपनाई होती।

पिछली बार जब हम कदीम दौर के अवाखिर पर बात कर रहे थे तो एक सवाल पर आकर रुके थे कि बड़ी सल्तनतों के बीच छोटी रियासतें अपनी बका की जंग कैसे लड़ती हैं? जी। आज की हमारी गुफ्तगू का मरकज एक ऐसी ही सल्तनत है जिसने आप कह लें बका के लिए मजहब को एक ढाल बनाया। बिल्कुल। हम बात कर रहे हैं जूबी अरब की ममलकत हिमेर की। हमारे पास इस मौजू पर कुतबे हैं, तारीखी तहरीरें हैं और आसार कदीमा से मिलने वाली बहुत ही दिलचस्प चीजें हैं। जी बिल्कुल।

आज हम हिमेर की कहानी के एक बहुत अहम मोड़ का जायजा लेंगे। यह चौथी सदी ईवी का जमाना है जब सल्तनत ने एक बहुत बड़ा फैसला किया और वो फैसला क्या था? अपने पुराने कसीर देवताओं वाले मजहब को छोड़कर एक खुदा पर ईमान लाने का। तो आज हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि यह तब्दीली क्यों हुई? इसके पीछे क्या सियासी मोहरकात थे और इसमें मकामी यहूदी बिरादरी का क्या किरदार था। यानी यह सिर्फ एक मजहबी कहानी नहीं है। नहीं बिल्कुल नहीं। यह इस पूरे दौर के सियासी और मजहबी रुझानात की अकासी करती है। नहीं बिल्कुल भी नहीं।

तकरीबन 275 ईसवी से पहले जुनूबी अरब कई छोटी-छोटी खुद मुख्तार सल्तनतों का एक मजमआ था। अच्छा आप समझ लें कि हर वादी की अपनी हुकूमत थी। इनमें हजरमूत और सबा सबसे ज्यादा ताकतवर और मशहूर थी। और इनमें सिर्फ सियासी लड़ाईयां ही नहीं थी। इनकी सकाफत, इनका रहन-सहन सब कुछ एक दूसरे से बहुत अलग था। यानी यह सिर्फ सरहदों की तकसीम नहीं थी बल्कि लोगों की शिनाख्त भी आपस में बंटी हुई थी। जी हां। और यह तकसीम जबान और मजहब में सबसे ज्यादा वाज़ थी। आप सोचें इस छोटे से इलाके में चार मुख्तलिफ ज़बाने बोली जाती थी। चार ज़बाने? जी। और हर सल्तनत के अपने देवता थे। जैसे हजरमूद के लोग चांद देवता सीन को सबसे बड़ा मानते थे। कुतबान वाले उम को पूजते थे और सबा की शानो शौकत उनके देवता अल मका से जुड़ी थी। मतलब हर एक की अपनी अलग दुनिया थी।

फिर हिमियर ने आकर इस बिखरे हुए मंजरनामे को बदल दिया। जब उन्होंने सबको एक झंडे तले जमा कर लिया। तो इतने मुख्तलिफ लोगों को एक कौम बनाने का चैलेंज तो बहुत बड़ा होगा। बहुत बड़ा चैलेंज था। हिमियर ने पहले तो सबा की जबान को सरकारी हैसियत दी क्योंकि वह एक कदीम और मौतबर जबान समझी जाती थी। ठीक है? लेकिन असल और आप कह सकते हैं कि इंकलाबी कदम वो तकरीबन 380 ईसवी में उठाया गया। जब बादशाह मुल्की कर्ब योहामिन और उसके बेटों ने एक बहुत बड़ा ऐलान किया। और वो क्या था? उन्होंने तौहीद परस्ती यानी एक खुदा पर ईमान लाने का फैसला कर लिया। यह सिर्फ एक मजहबी फैसला नहीं था। यह एक कौम को जोड़ने की सबसे बड़ी कोशिश थी।

यहां आकर कहानी में एक बहुत दिलचस्प मोड़ आता है। हमारे पास एक ईसाई मुरख हैं फिलोस्टोजियस जो थियोफिलियस द इंडियन नामी एक मुबल्क के बारे में बताते हैं। जी। उनके मुताबिक तो हिमेर में ईसाइयत का बोलबाला हो गया था। जी। थियोफिलस्ट टोर्जियस एक बहुत बहुत रंगीन तस्वीर पेश करता है। इसका दावा है कि थियोफिलिस ने ना सिर्फ बादशाह को ईसाई बना लिया बल्कि वहां तीन बड़े गिरजा घर भी तामीर करवाए। अच्छा। वो यह भी लिखता है कि उस इलाके में एक बहुत बड़ी यहूदी आबादी भी थी। और कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्हें वो खतनाशुदा काफिर कहता है।

लेकिन तारीख सिर्फ एक शख्स की कहानी पर तो यकीन नहीं कर सकती। क्या आसार कदीमा या दूसरे जराय भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि बादशाह वाकई ईसाई हो गया था? नहीं। और यही वो नुक्ता है जहां से असल पहेली शुरू होती है। हां। आसारे कदीमा से यह तो साबित है कि उस दौर में तौहीद परस्ती को अपनाया गया। कुतबों से पुराने देवताओं के नाम गायब हो गए। यह भी सच है कि ईसाई ताजरों के लिए गिरजा घर बने होंगे। लेकिन बादशाह के ईसाई होने का कोई ठोस सबूत किसी और जरिए से नहीं मिलता। बल्कि उसके बरक्स शवाहिद मिलते हैं। बिल्कुल। शहादत असकीर जैसी तहरीरें बताती हैं कि शाही दरबार में यहूदी मुशीर बहुत बासर थे और उन्हीं के मशवरे पर एक ईसाई पादरी को सजाए मौत दी गई थी।

तो फिर बादशाह ने जो तौहीद अपनाई वो दरअसल थी क्या? यही तो असल सवाल है। क्या वो ईसाइयत थी, यहूदियत थी या कुछ बिल्कुल ही नया था? इस पर उलमा में बहुत बहस है। कुछ इसे रहमानिज्म का नाम देते हैं। यानी एक ऐसा तौहीदी अकीदा जो रहमान नामी एक खुदा पर मबनी था और यहूदियत से मुतासिर था मगर मुकम्मल यहूदी नहीं था। अच्छा। एक और बहुत बड़े आलिम हैं क्रिश्चियन रॉबिन। वो इसे यहूदी तौहीद परस्ती कहते हैं और उनके ख्याल में यह एक मुकम्मल तब्दीली थी।

लेकिन जिन जराय का हम जायजा ले रहे हैं उनका मरकजी इस्तदलाल यह है कि यहां दो अलग ग्रोह थे। दो ग्रोह जी एक तो मकामी यहूदी आबादी जो नस्लों से वहां रह रही थी और दूसरे हीमियर के हुक्मरान तबके के लोग ये लोग यहूदियों से हमदर्दी तो रखते थे लेकिन उन्होंने जानबूझकर एक बहुत ही मोहतात किस्म की तौहीद परस्ती अपनाई। एक मिनट मोहतात तौहीद परस्ती ये क्या होती है? मतलब आप खुदा पर ईमान तो रखते हैं लेकिन एहतियात के साथ यह तो बहुत अजीब बात लग रही है। यहां मोहतात का मतलब रूहानी नहीं बल्कि सियासी है। अच्छा सियासी। जी। यह एक ऐसी हिकमत अमली थी जिसके जरिए बादशाह अपनी रया के मुख्तलिफ गिरोहों को भी खुश रखना चाहता था और उस वक्त की दो सुपर पावर्स बाजंतीनी रोम और सासानी ईरान के झगड़े से भी दूर रहना चाहता था। तो यह एक तरह की न्यूट्रल पोजीशन थी। बिल्कुल। एक ऐसा रास्ता जिससे वह खुद को तौहीद परस्त तो कह सकते थे लेकिन उन्हें खुद को वाज़ तौर पर ईसाई या यहूदी के तौर पर शिनाख्त करवाने की जरूरत नहीं थी। अच्छा तो यह एक सियासी शतरंज की चाल थी कि हम तौहीद परस्त भी कहलाएंगे ताकि जदीद दुनिया के साथ चल सकें। लेकिन किसी एक खमे में नहीं जाएंगे। ना ईसाई रोम के ना जुश्ती ईरान के। वाह ये तो कमाल की डिप्लोमेसी है। जी हां।

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आवाम ने भी फौरन पुराने देवताओं को छोड़ दिया था? नहीं, ऐसा लगता है कि आवामी सतह पर तो तब्दीली आ गई। लेकिन निजी जिंदगी में पुरानी रसुमात शायद बाकी रहे। हमें खजूर के पत्तों और लकड़ी की छड़ियों पर लिखी गई कुछ ऐसी तहरीरें मिली हैं जिनमें पुराने देवताओं से मदद मांगी गई है। दिलचस्प, यानी सरकारी मजहब तौहीद था। लेकिन आम लोगों के दिलों से पुराने अकीदे शायद इतनी जल्दी नहीं मिटे। ऐसा ही लगता है। यह वाकई बहुत दिलचस्प है।

तो, हम यह कैसे जान सकते हैं कि यह मोहताज तौहीद अमली तौर पर कैसी नजर आती थी? क्या उनके कुतबों में जो खुदा के नाम इस्तेमाल हुए हैं, उनसे हमें कोई सुराग मिलता है? जी बिल्कुल। नामों में ही तो सारी कहानी छुपी है। इस दौर के कुतबों में हमें खुदा के लिए बुनियादी तौर पर तीन मुख्तलिफ अलकाब मिलते हैं। अच्छा। पहला बहुत सादा है। इल्लन यानी खुदा। यह एक आम लफ्ज है। दूसरा है बाल या मरसमीन जिसका मतलब है आसमान का रब या आसमानों का मालिक। आसमान का रब। जी। यह एक पुराना लकब था जो इस ख्ते में पहले भी इस्तेमाल होता था। और तीसरा नाम? तीसरा नाम सबसे अहम है। और वो है रहमानन यानी मेहरबान। रहमान। यह नाम तकरीबन 432 ईसवी के बाद की खुतूतों में जाहिर होना शुरू हुआ। और यह एक बहुत बड़ी तब्दीली की तरफ इशारा करता है। यह नाम रहमान तो बहुत शनासा लग रहा है। क्या इसका ताल्लुक सिर्फ हिमियर से था या यह इस ख्ते में पहले से मौजूद था? यही तो सबसे दिलचस्प बात है। यह नाम हमें शुमाली अरब के खुतूतों में भी मिलता है। और हैरतंगेज तौर पर यहूदी मजहबी किताबों मिशना और तलमूद में भी। अच्छा। इससे यह साबित होता है कि यह सब अलग थलग जजीरे नहीं थे। ख्यालात, अकायद और यहां तक कि खुदा के नाम भी सरहदों के आर-पार सफर कर रहे थे। और वो जो आसमान का रब वाला लकब था वो भी सिर्फ हिमेयर तक महदूद नहीं था। पड़ोसी सल्तनत अकसूम के बादशाह आइजाना ने भी ईसाइयत कबूल करने के बाद यही लकब इस्तेमाल किया। तो इसका मतलब है कि यह तमाम सल्तनतें एक दूसरे के मजहबी रुझानात से वाकिफ थी और शायद एक दूसरे से मुतासिर भी हो रही थी। बिल्कुल। यह एक दूसरे से जुड़ी हुई ही दुनिया थी। ख्यालात का तबादला मुसलसल हो रहा था।

आपने बार-बार यहूदी अस्रो रुसूख का जिक्र किया है। क्या हमारे पास इसके कोई ठोस नाकाबिले तरदीद सबूत है? यह सिर्फ अंदाजे तो नहीं? नहीं यह सिर्फ अंदाजे नहीं है। हमारे पास बहुत वाज़ सबूत हैं। हमें ऐसे कुतबे मिले हैं जिनमें बनी इसराइल या यहूद जैसे अल्फाज़ वाज़ तौर पर लिखे हुए हैं। यानी बाकायदा यहूद का लव लिख रखा है। जी। एक कुतबे में तो यह जुमला भी दर्ज है। आसमान के मालिक इसराइल का खुदा इससे ज्यादा वाज़ सबूत और क्या हो सकता है? वाह! इसराइल का खुदा यह तो बराहेरा ताल्लुक का ऐलान है। कोई और ऐसी दरियाफ्त जो इस ताल्लुक को मजीद मजबूत करती हो। जी हां, कई दरियाफ्तें जूबी अरब से दो इब्रानी जबान के कुतबे मिले हैं। इब्रानी जबान के जी। जो इस बात का सबूत है कि वहां इब्रानी जानने और बोलने वाले लोग मौजूद थे। इसके अलावा एक शाही हुकुमनामा मिला है जिसमें एक यहूदी कब्रिस्तान के कयाम का जिक्र है। कुछ मोहरों पर सात शाखों वाले शमादान यानी मेनोरा की तस्वीर बनी हुई है जो यहूदیت की एक बहुत अहम अलामत है। और जुबान के बारे में क्या हिमेरी जबान में भी कोई असर नजर आता है? बिल्कुल। उनके कुतुबों में आरामी और इब्रानी जबान के अल्फाज़ जैसे आमीन और शलोम यानी सलाम का इस्तेमाल आम मिलता है। अच्छा। यह ऐसा ही है जैसे आज हम अपनी गुफ्तगू में अंग्रेजी के अल्फाज़ इस्तेमाल करते हैं। और यह ताल्लुक सिर्फ हिमेर की सरजमीन तक महदूद नहीं था। हमें फिलिस्तीन और उर्दन में भी हिमेरी यहूदियों की कब्रें मिली हैं। तो ये लोग सफर भी करते थे और उनका अपनी असल सरजमीन से ताल्लुक भी कायम था। जी बिल्कुल।

तो इन तमाम सबूतों की रोशनी में क्या हम यह कह सकते हैं कि हिमेर का यह तजुर्बा अपने दौर में बिल्कुल मुनफरिद था या ऐसी चीजें कहीं और भी हो रही थी? यह एक वसीतर रुझान का हिस्सा था। यह कोई अनोखी बात नहीं थी। इस दौर में पूरी यूनानी रूमी दुनिया में सबसे आला खुदा यानी दियोस हाइफिस्टोस का तसवुर बहुत मकबूल हो रहा था। अच्छा। इस तसवुर को मानने वालों को अक्सर खुदा से डरने वाले यानी गॉड फियरर्स कहा जाता था। तो यह खुदा से डरने वाले कौन थे? यह वो गैर यहूदी लोग थे जो यहूदیت के तौहीदी अकीदे और अखलाकیاत से बहुत मुतासिर थे। वो यहूदियों के इबादतखानों में जाते थे। उनकी तालीमात सुनते थे लेकिन मुकम्मल तौर पर मजहब तब्दील करके यहूदी नहीं बनते थे। यानी वह एक तरह से यहूदیت के मुदाहत थे। बिल्कुल सही कहा आपने। वो अकीदे को पसंद करते थे। उसकी महफिलों में भी जाते थे। लेकिन बाकायदा यहूदी रुसुमात जैसे खतना वगैरह नहीं अपनाते थे। हिमियर के हुक्मरान तबके का रवैया बिल्कुल ऐसा ही लगता है। अच्छा तो वह एक तरह से यहूदیت से मुतासिर तो थे लेकिन अपनी एक अलग शनाख्त भी कायम रखना चाहते हैं।

इसका मुवाजना अगर पड़ोसी सल्तनत ओसूम से करें तो क्या तस्वीर बनती है? ओसूम का मामला तो इससे भी ज्यादा वाज़ और दिलचस्प है। वहां के बादशाह आइजाना ने एक बहुत ही होशियार आप कह लें दोगली हिकमते अमلی अपनाई। वो कैसे? जब वो रूमों के लिए यूनानी जबान में कुतबे लिखवाता तो खुद को एक पक्का ईसाई जाहिर करता। एक कुतबे में तो उसने साफ-साफ लिखा है कि मैं आपके बेटे यीशु मसीह पर ईमान लाता हूं जिसने मुझे बचाया। ताकि रूमी खुश रहें और तजारती ताल्लुकात मजबूत हो। बिल्कुल। लेकिन जब वही बादशाह अपनी मकामी रया के लिए उनकी अपनी गए जुबान में कुतबे लिखवाता तो उनमें तस्लीस या यीशु मसीह का कोई जिक्र नहीं होता। अच्छा। वहां वो सिर्फ एक मुबहम से आसमान के रब का जिक्र करता है। यह खालिसतन सियासी खेल था।

तो खुलासा यह है कि दोनों सल्तनतें तौहीद को अपना ही थी। लेकिन उनके मकासिद और हिकमते अमली बिल्कुल मुख्तलिफ थी। आपने बिल्कुल सही समझा। अकसूम का मकसद रूम जैसी सुपर पावर के साथ अपने ताल्लुकात को मजबूत बनाना था। इसलिए उन्होंने ईसाइयत का लिबा ओढ़ लिया। सही। जबकि हिमियर का मकसद अंदरूनी तौर पर अपनी बिखरी हुई कौम को एक शनाख्त देना और बेरूनी तौर पर रोम और ईरान की बड़ी जंग में गैर जानिबदार रहना था। उनके लिए यहूदیت से मुतासिर लेकिन मुबहम और मोहताजद तौहीद परस्ती बेहतरीन रास्ता थी।

तो आज की गुफ्तगू से यह बात बिल्कुल वाज़ हो गई कि सल्तनत हिमियर की तौहीद परस्ती कोई अचानक होने वाली रूहानी बेदारी नहीं थी। बल्कि यह चौथी सदी की आलमी सियासत के शतरंज पर खेली गई एक बहुत ही सोची समझी चाल थी। जी। एक ऐसी हिकमते अमली जिस पर मकामी यहूदी बिरादरी के गहरे असरात थे और जिसका मकसद सल्तनत को मुतहिद और खुद मुख्तार रखना था। और एक आखिरी बात जो सोचने पर मजबूर करती है। जूबी अरब में तौहीद परस्ती का यह मोहतात मिलाजुला रंग जिसमें यहूदी असरात भी थे और पुरानी रिवायत की झलक भी इसने एक ऐसा मजहबी माहौल तैयार किया जो आगे चलकर बहुत बड़ी तब्दीलियों का पेशखमा बना। हां। यही रहमान का लकब जो हिमेरी कुतबों में खुदा के लिए इस्तेमाल हुआ। हमें दो सदियां बाद कुरान में मरकजी हैसियत से नजर आता है। यह उस दौल की पेचीदा मजहबी मिराज की तरफ एक बहुत बड़ा इशारा है। गूंज आने वाली सदियों तक सुनाई देती है।

लेकिन इस मोहताजद तौहीद ने छठी सदी में यहूदियों और ईसाइयों के आपसी ताल्लुकात पर क्या असर डाला? क्या यह अमन कायम रख सकी? यह एक बहुत अहम सवाल है। मुझे लगता है कि यही हमारे अगले बाप का मौजू है। अगली निशस्त में हम बाप चहारम पर बात करेंगे।

पिछली बार जब हमने बात की थी तो हमारी गुफ्तगू का मरकज था जूबी अरब यानी हिमियर और अकसूम। जी। हमने देखा था कि किस तरह छठी सदी में वो इलाका आलमी ताकतों रोम और ईरान के लिए एक बड़ी कशमकश का मैदान बन गया था। बिल्कुल। तो आज हम शुमाल का रुख कर रहे हैं। यहां दो और बड़ी अरब ताकतें थी। जाफानी जिन्हें गसानी भी कहते हैं जो रूमों के इत्तहादी थे और नासरी यानी लख्मी जो ईरानियों के साथ थे। बिल्कुल और आज का जो हमारा मकसद है ना वो इस आम ख्याल को थोड़ा चैलेंज करना है कि ये अरब सल्तनतें सिर्फ बड़ी ताकतों की कठपुतलियां थी। अच्छा। हम यह खोज लगाएंगे कि ये ग्रोह दरअसल अपनी कहानी के मरकजी किरदार थे। जो बड़ी होशियारी से अपनी बका और तरक्की के लिए इत्तेहाद बनाते और तोड़ते थे। सही। इस्लाम के ज़हूर से ठीक पहले के इस पेचीदा सियासी मंजरनामे को समझना वो जो है ना बहुत जरूरी है क्योंकि इसके बगैर आगे की तारीख समझना मुश्किल हो जाता है। तो चल इस पूरे मामले को समझने की कोशिश करते हैं।

छठी सदी का मतलब है रोम और ईरान के दरमियान ना खत्म होने वाली जंगे। जी हां। उनका असल मैदान-जंग तो मेसोपोटामिया और शाम था। लेकिन इसमें अरब की सरहदों की इतनी क्या अहमियत थी कि उन्हें यहां इत्तेहादी बनाने पड़े। देखें यह सरहदें महज रेत के टीले नहीं थी। यह इंतहाई स्ट्रेटेजिक थी। हम दोनों सल्तनतों के लिए इन लंबे चौड़े सेहराई इलाकों पर बुराहेरा कब्जा करना और फौज रखना मतलब बहुत महंगा सौदा था। सही। इसलिए उन्होंने मुकामी अरब सरदारों के साथ इत्तेहाद करना ज्यादा बेहतर समझा। लेकिन यह कोई सादा मामला नहीं था। यह एक आप कह लें तसादुम पर मबनी ताल्लुक था। तसादुम पर मबनी ताल्लुक इसका क्या मतलब हुआ? यानी एक ऐसा रिश्ता जिसमें तावुन भी था और कशिदगी भी। जाफानी और नासरी अपने आकाओं से वसाइल तो लेते थे लेकिन फैसले अपने मफाद में करते थे। अच्छा तो यह सिर्फ हायर्ड गंस या किराए के फौजी नहीं थे। आप कह रहे हैं कि उनकी आपसी दुश्मनी सिर्फ रोम और ईरान की दुश्मनी का अक्स नहीं थी। बिल्कुल यही नुक्ता है।

लेकिन क्या वाकई ऐसा था? आखिर उनकी ताकत का सर चश्मा तो यही बड़ी सल्तनतें थी। तो क्या वो वाकई अपने आकाओं की मर्जी के खिलाफ जा सकते थे? आपका सवाल बहुत अहम है। बजाहिर तो ऐसा ही लगता है। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा पेचीदा है। इसकी बेहतरीन मिसाल है नासरी या लखमी? जी। उनका दारुल हुकूमत अल हीरा था और उनका रहनुमा अल मुंजरे सालिस। वो वो जो है ना उसकी एक ऐसी खौफनाक शोहरत थी कि लोग उसका नाम सुनकर कांप उठते थे। अच्छा। वो सिर्फ ईरानी सरहदों की हिफाजत नहीं करता था बल्कि रूमी इलाकों में गहराई तक जाकर हमले करता। राहबों को कत्ल करता और एक बार तो उसने एक राहबा को देवी उजी के लिए कुर्बान भी कर दिया था। वो एक आजाद ताकत था जिसे ईरानियों ने ढील दी हुई थी। तो

अगर नासरी इतने ताकतवर और बेरहम थे तो फिर रोमियो ने उनका मुकाबला कैसे किया? यहां जाफानी या गसानी कैसे मंजरेआम पर आए? यहीं पर रूमी शहंशाह जस्टिनियन की शातिराना चाल नजर आती है। उसने देखा कि अलमुंजरे सालस को रोकने के लिए रूमी फौज भेजना बेसूद है। हम तो इसने एक अरब ताकत को दूसरी के खिलाफ खड़ा करने का फैसला किया। उसने जाफानी कबीले के रहनुमा अल हारिस को गैर मामूली खिताबात और इख्तियारात दिए। यह तो बिल्कुल वैसा ही हुआ जैसे आजकल बड़ी कंपनियां करती हैं। जी बिल्कुल जैसे एक बड़ी कंपनी मार्केट में अपने हरीफ को कमजोर करने के लिए एक छोटे वेंडर को बड़ा कॉन्ट्रैक्ट देकर मजबूत कर दे। सही। इस तरह रोम ने बहुत कम खर्च पर ना सिर्फ अपनी सरहद महफूज़ कर ली बल्कि अरब के अंदरूनी मामलात में भी अपना अस्रो रुसूख बढ़ा लिया। ठीक है। तो अलहारिस को रूमों की हिमायत मिल गई। अब मंतिकी तौर पर तो उसे अपनी वफादारी साबित करने के लिए रूमों का सरकारी मजहब अपना लेना चाहिए था। यानी ईसाइयत। लेकिन यहां कहानी में एक बहुत दिलचस्प मोड़ आया। जी। और यही उनकी सियासी जहानत का सबसे बड़ा सबूत है। अलहारिस ने ईसाइयत तो कबूल की लेकिन रूमी सल्तनत का सरकारी फरका यानी चेल्स डोनियन ईसाइयत नहीं बल्कि एक इख्तलाफी फिरका मियाफिजत मुंतखब किया। एक मिनट। यह तो यह तो बहुत अजीब बात है। आप रोमियो के इल्तहादी हैं। उनसे पैसे और हथियार ले रहे हैं। लेकिन उनका सरकारी मजहब नहीं अपना रहे। जी हां। बल्कि एक ऐसा फिरका चुन रहे हैं जिसे वो खुद शक की निगाह से देखते हैं और जिसके मानने वालों पर अक्सर जुल्म भी करते हैं। यह तो अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा नहीं। देखने में ऐसा ही लगता है। लेकिन असल में यही उनकी सबसे बड़ी चाल थी। इस तरह उन्होंने रूमों को यह पैगाम दिया कि हम आपके साथ हैं। मगर बराबर की सतह पर हम आपके मातहत नहीं हैं। अच्छा। देखें रोमी सल्तनत में शाम और मिस्र जैसे इलाकों में मियाफिजाइट अकीदे के मानने वाले बहुत थे। लेकिन उन्हें कुस्ततीनिया से हिमायत हासिल नहीं थी। जी। तो मियाफिजाइट अकीदे की सरपरस्ती करके जिफानियों ने खुद को उन तमाम अरब और शामी ईसाइयों के मुहाफिज के तौर पर पेश किया। उन्होंने रोमी दायरा असर में रहते हुए अपनी एक अलग और आजाद ताकत की बुनियाद रखी। यह तो वाकई एक शानदार सियासी चाल है। क्या हमारे पास इसका कोई ठोस सबूत भी है कि उन्होंने वाकई मियाफिजिट चर्च की सरपरस्ती की? बिल्कुल है। तारीखी जराय बताते हैं कि यह जाफानी रहनुमा अलहारिस ही था। जिसने शहंशाह जस्टिनियन की बीवी थियोडोरा से दरख्वास्त की कि वो मियां फजिद अकीदे के लिए बिशप मुकर्रर करें। अच्छा। इसी दरखास्त पर मशहूर बिशप जैकब बरडोविय का तकर्रुर हुआ जिसने पूरे शुमाली अरब और शाम में एक मुनजम मियोफज चर्च की बुनियाद रखी। तो इस एक कदम से उन्हें पढ़े लिखे तबके की हिमायत मिल गई होगी। जी पादरियों मुकामी अशराफिया और पढ़े लिखे तबके की हिमायत जो पहले किसी के पास नहीं थी। और उसके मुकाबले में नासरियों की मजहबी पॉलिसी कैसी थी? क्या वो भी इसी तरह मजहब को एक सियासी आले के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे? उनकी सूरत हाल थोड़ी मिलीजुली थी। कुछ नासरी हुक्मरानों ने मशरिकी शामी ईसाइयत इख्तियार की जिसे उनके ईरानी सासानी आका निस्बतन ज्यादा बर्दाश्त करते थे। क्योंकि वो रोमियो के सरकारी मजहब से मुख्तलिफ थी। सही। लेकिन अल मुंजर सालिस जैसे हुक्मरान की मिसाल बहुत दिलचस्प है। उसकी बीवी ईसाई थी। लेकिन वो खुद देवी उजी के लिए इंसानी कुर्बानियां भी पेश कर रहा था। कमाल है। इससे जाहिर होता है कि वो अपनी शनाख्त को मौके की मुनासबत से बदलने की सलाहियत रखते थे। उनके लिए वफादारी मजहब से ज्यादा ताकत और कबीले से थी। यह कमाल की बात है कि हमें छठी सदी की उन अरब सल्तनतों के बारे में इतनी बारीक तफसीलात का इल्म है। मेरा मतलब है यह बातें हम तक पहुंची कैसे? क्या उन्होंने अपनी कोई तारीख लिखी थी? बदकिस्मती से उनकी अपनी लिखी हुई कोई अदबी या तारीख तहरीरें हम तक नहीं पहुंची। जो कुछ हम जानते हैं उसका बड़ा हिस्सा आसारे कदीमा खासतौर पर कुतबों से आता है। कुतबे यानी इं्रिप्शंस। जी। जाफानियों के ज्यादातर कुतबे जो हमें मिले हैं, वो यूनानी जुबान में हैं। उनमें वो फखिया तौर पर अपने रूमी खिताबात जैसे पेट्रिशियस और फाइलार्कोस का जिक्र करते हैं। अच्छा तो यह फाइलार्कोस का खिताब यह क्या होता था? क्या यह बादशाह के बराबर था? नहीं बिल्कुल नहीं। फाइलार्कोस का मतलब था कबीले का सरदार। यह रोमियो की तरफ से दिया गया एक खिताब था जो यह जाहिर करता था कि आप उनके इत्तेहादी हैं लेकिन उनके मातेहत हैं। तो एक तरह से सरहदी गवर्नर का ओहदा बिल्कुल बादशाह यानी मलिक एक खुद मुख्तार हुक्मरान होता है। और यहीं पर यहीं पर एक बहुत ही हैरानक दरियाफ्त ने सारी कहानी बदल दी। आप जबल सेस के कुतबे की बात कर रहे हैं। जी बिल्कुल। जबल सैस जो आजकल जूबी शाम में है वहां से कुतबा मिला है जो ना सिर्फ अरबी रस्मुल खत के कदीम तरीन नमूनों में से एक है बल्कि उसमें जापानी रहनुमा अल हारिस के लिए फाइलारकोस का लफ्ज इस्तेमाल नहीं हुआ है। तो फिर क्या लिखा है? इसके बजाय इसे अलहारिस अल मलक यानी बादशाह अल हारिस कहा गया है। एक मिनट तो आप यह कह रहे हैं कि एक ही हुक्मरान रोमियों के सामने खुद को यूनानी जुबान में एक मातहत फाइलार्कोस के तौर पर पेश कर रहा था। जी लेकिन अपने लोगों के सामने अरबी जुबान में खुद को एक खुद मुख्तार मलिक यानी बादशाह कहलवा रहा था। बिल्कुल यही नुक्ता है। यह तो दोहरी शनाख्त और प्रोपगेंडे का एक कमाल का इस्तेमाल है। बिल्कुल यह शिनाख्त की सियासत का एक शानदार नमूना है। वो बेवक़ दो मुख्तलिफ हल्कों से मुखातिब थे। रोमियो के लिए वो एक वफादार इत्तहादी थे। लेकिन अपने अरब आवाम और हरीफों के लिए वो एक ताकतवर और आजाद बादशाह थे। है ना? जी। वो एक ही वक्त में रूमी दुनिया का हिस्सा भी थे और उससे अपनी अलग शनाख्त भी कायम रखे हुए थे। बिल्कुल। यह हिकमते अमली तो बहुत कामयाब लग रही है। उन्होंने ताकत, मजहब और शनाख्त तीनों को बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया। तो फिर यह निजाम इतना जल्दी खत्म क्यों हो गया? यह इत्तेहाद इतने नापायदार क्यों साबित हुए? क्योंकि यह ताल्लुकात बहामी इनहसार के साथ-साथ वो जो है ना गहरे सुकुक और शुभात पर भी मुबदी थे। छठी सदी के आखिर तक जाफानियों की बढ़ती हुई ताकत रूमों के लिए ही खतरा बनने लगी। अच्छा। उन्हें शक हुआ कि कहीं यह हमारे खिलाफ ही ना हो जाए। इसका नतीजा यह निकला कि अलहारिस के बेटे अल मुंजर को धोखे से गिरफ्तार करके कुस्तुनतिनिया जलावतन कर दिया गया। यानी जिनको उन्होंने खुद बनाया उसी को खुद ही खत्म कर दिया। बिल्कुल। और इसके नताइज बहुत दूरस्त थे। एक शामी मुरख इस वाक्य पर त्सरा करते हुए लिखता है कि रोमियो के गद्दारी की वजह से ईसाई ताई कबीले यानी जाफानियों का खात्मा हो गया। इस एक कदम ने तो सारा एतमाद खत्म कर दिया होगा। जी हमेशा के लिए और दूसरी तरफ नासिरियों का क्या बना? क्या वो अपने ईरानी आकाओं के साथ ज्यादा कामयाब रहे? उनका अंजाम। देखें उनका अंजाम भी कुछ वैसा ही हुआ। 602 ईसवी के आसपास ईरानी बादशाह खुसरो परवेज को अपने नासिरी इत्तहादियों पर शक हुआ और उसने उनके आखिरी बादशाह को कत्ल करवा के अलहीरा पर बराहेरास्त ईरानी गवर्नर मुकर्रर कर दिया। कमाल है। मतलब दोनों बड़ी ताकतों ने तकरीबन एक ही वक्त में अपने सबसे अहम अरब इत्तहादियों को मंजर से हटा दिया। जी, यही तो हैरतंगीज़ बात है। उन्होंने सोचा कि वो अब बराहेरा सरहदों को कंट्रोल कर सकते हैं। तो जब आप ख्ते से दो सबसे बड़े सिक्योरिटी गार्ड्स को एक साथ हटा दें, तो इसका नतीजा क्या निकलता है? नतीजा एक बहुत बड़ा सियासी खला होता है। हम इन ताकतवर मुकामी खानदानों के खात्मे से जजीरा नुमा अरब के शुमाली हिस्से में ताकत का एक ऐसा खला पैदा हो गया जो पहले कभी नहीं था। जुनूब में हिमिर की सल्तनत पहले ही ज़वाल का शिकार थी और अब शुमाल में जाफानी और नासीरी भी खत्म हो गए। तो अब पूरे जजीरे नुमा अरब में कोई बड़ी मुनज्जम मकामी ताकत बाकी नहीं रही थी। कोई नहीं। एक नई ताकत के उभरने के लिए मैदान बिल्कुल साफ था। तो आज की इस गुफ्तगू का खुलासा यह है कि इस्लाम से पहले के अरब खासतौर पर छठी सदी के शुमाली खानदान महस कठपुतलियां नहीं थी। वो इंतहाई होशियार सियासी खिलाड़ी थे जिन्होंने मजहब, जबान और ताकत की अलामतों को अपने असर रुसूख के लिए महारत से इस्तेमाल किया। जी। लेकिन आखिर में बड़ी सल्तनतों के साथ उनके नाजुक इत्तहाद का खात्मा जजीरा नुमा अरब में एक ऐसे ताकत के खला का बायस बना जिसने आने वाले वक्त में तारीख का धारा ही बदल दिया। जी। और यही खला इस बात को समझने के लिए किदी हैसियत रखता है कि आगे क्या होने वाला था। जब कोई बैरूनी सरपरस्त ना रहा और पुराने शाही खानदान भी खत्म हो गए तो स्टेज एक ऐसी नई मुत्तहद तहरीक के लिए तैयार था जो किसी बैरूनी सल्तनत की मरहून मिन्नत ना हो बल्कि खुद अरब की सरजमीन से उभरे बिल्कुल और यहां हम अपने सामीन के लिए एक आखिरी सोच छोड़कर जाते हैं। हमने देखा कि जापानियों ने रूमी अलकाबात भी इस्तेमाल किए और मलिक यानी बादशाह होने का दावा भी किया। जी। लेकिन कुछ ही दहाइयों बाद मोहम्मद सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने वाज़ तौर पर खुद को मलिक के तौर पर पेश करने से गुरेज किया और फिर एक सदी बाद उम्मीवी खलीफा पर इसी शाहाना तज़ जिंदगी और बादशाहत अपनाने की वजह से शदीद तनकीद की गई। हम यह उस अहम सवाल की तरफ इशारा करता है कि तारीख के इस फैसलाकुन मोड़ पर अरब मुआशरे में किस किस्म की कयादत और ताकत को जायज समझा जाता था। सही है? बहुत अहम सवाल है। ताकत का यही खला और कयादत का यही सवाल हमारी अगली गुफ्तगू का मौजू होगा। जब हम छठे बाप की तरफ बढ़ेंगे और हिजाज में मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तहरीक के आगाज का जायजा लेंगे। खुशामदीद। हम अपने इस गहरे जायजे के आखिरी हिस्से में हैं। हमने कदीम अरब की दुनिया का एक तवील सफर तय किया है। पिछली गुफ्तगू में हमने शुमाल और जुब की अजीम सल्तनतों को देखा। हिमियार, गस्सासना, लख्मी और कैसे रूमी और ईरानी सल्तनतों के साए इस पूरे ख्ते पर फैले हुए थे। जी। और यह सफर हमें एक ऐसी दुनिया में ले गया जो अपनी शनाख्त और आप कह सकती हैं अपना रास्ता तलाश कर रही थी। वो एक जबरदस्त तब्दीली का दौर था और आज हम इस तब्दीली के बिल्कुल मरकज में यानी उस तूफान की आंख में बात करेंगे। बिल्कुल आज हम इस कहानी के दिल में जा रहे हैं। हिजाज वो ख्ता जहां से इस्लाम का ज़हूर हुआ। हम देखेंगे कि पैगंबर इस्लाम की आमद से ठीक पहले वहां का मजहबी और समाजी माहौल कैसा था। कुछ आम तसवुरात को भी चैलेंज करेंगे और आखिर में मुसन्निफ के हत्मी नतीजे का जायजा लेंगे कि यह तमाम कड़ियां आपस में मिलती कैसे हैं। यह इस पूरी बहस का कह लें निचोड़ है। और यह समझना बहुत जरूरी है कि किस तरह एक ख्ता जो बजाहिर तारीख के हाशिए पर था वो अचानक आलमी तारीख का महवर बन गया। तो आइए फिर यहीं से शुरू करते हैं। जब हम छठी और सातवीं सदी के हिजाज के बारे में सोचते हैं तो यह कैसी जगह थी? देखें जग्राफियाई तौर पर तो हिजाज हमेशा से अहम था। यह जुनूब से शुमाल यानी यमन से श्याम की तरफ जाने वाले तिजारती काफिलों के कदीम रास्ते पर था। लेकिन हैरत की बात यह है कि कदीम तारीख के आखिरी दौर में इस इलाके के बारे में आसारे कदीमा के शवाहिद बहुत-ब कम मिलते हैं। अच्छा जी। मक्का और मदीना जैसे शहर यकीनन मौजूद थे। लेकिन उनकी तारीख को दोबारा जोड़ने के लिए हमें ज्यादातर बाद की मुस्लिम रिवायत पर इनहसार करना पड़ता है। इस दौर के कुतबे या आसार तकरीबन ना होने के बराबर हैं। और जब हम इस दौर के बारे में सोचते हैं तो एक लफ्ज फौरन ज़हन में आता है जाहिलियत। यानी एक ऐसा दौर जहां हर तरफ बुतपरस्ती थी। लोग काबा में रखे सैकड़ों बुतों की पूजा करते थे। लेकिन क्या माखज़ इस तस्वीर की मुकम्मल ताईद करता है? यह एक बहुत ही अहम सवाल है और मुसन्निफ का कहना है कि हकीकत हकीकत इस आम तस्वीर से कहीं ज्यादा पेचीदा है और यहां एक बहुत ही हैरानक बात सामने आती है वो क्या कि चौथी सदी ईवी के बाद पूरे जजीरा नुमा अरब में बशुमून हिजाज शर्क और बुत परस्ती के आवामी रिवाज के आसारे कदीमा के शवाहिद तकरीबन गायब हो जाते हैं। एक मिनट यह तो बहुत बड़ी बात है। आप कह रही हैं कि आसारे कदीमा के मुताबिक बुतपरस्ती खत्म हो रही थी। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि कुतबों में देवताओं जैसे लात, मनात और उज्जा उनके नामों का जिक्र खत्म हो जाता है। बुतों की नई मूर्तियां मिलना बंद हो जाती हैं और जो पुराने मंदिर थे वो भी वीरान नजर आते हैं। तो फिर तो इससे यह बहुत बड़ा सवाल पैदा होता है कि अगर बुत परस्ती का आवामी रिवाज इस तरह जवाल पजीर था तो कुरान जिन मुशरिकन से मुखातिब है वो दरअसल कौन थे? ठीक है। यह वाकई कुलन है। अगर वो सिर्फ लकड़ी और पत्थर के बुतों की पूजा करने वाले नहीं थे तो फिर उनका अकीदा क्या था? बिल्कुल। मुसनिफ का नजरिया यह है कि ये लोग हीनोथिस्ट थे। हीनोथिस्ट ये एक तकनीकी इस्तिला है। इसका सादा मतलब क्या हुआ? जी। इसका सादा मतलब यह है कि वो एक आला तरीन खालिक खुदा पर यकीन रखते थे। अच्छा अल्लाह पर। जी। जिसे वो अल्लाह कहते थे। लेकिन उनका मसला यह था कि वो इस आला खुदा के साथ छोटे माबूदों या आप कह लें सिफारिशियों को भी शरीक करते थे जिन्हें कुरान शुरका कहता है। यानी वो अल्लाह के वजूद से इंकारी नहीं थे बल्कि उनका मानना था कि अल्लाह तक पहुंचने के लिए कुछ वास्तों की जरूरत है। बिल्कुल यही बात है। जैसे फरिश्ते, जन्नात या कोई और अस्थियां। जी वो इन शुरका को अल्लाह और अपने दरमियान सिफारिशी समझते थे। और इस नजरिए के लिए हमारे पास सिर्फ आसान कदीमा की खामोशी ही नहीं बल्कि ठोस सबूत भी हैं। मसलन यह हिनोथिज्म वाला नजरिया तो बहुत दिलचस्प है क्योंकि यह रिवायती तस्वीर से बिल्कुल अलग है। इसको साबित करने के लिए क्या सबूत हैं? सबसे वाज़ सबूतों में से एक तो कब्लज़ इस्लाम के तलबियात हैं। यानी हज के दौरान पढ़े जाने वाले कलमात। इब्नुल कलबी जैसी क्लासिकी रिवायत में एक मशहूर तलबिया नकल किया गया है जो मुशरिकन पढ़ा करते थे। क्या था वो? मैं हाजिर हूं। ऐ अल्लाह मैं हाजिर हूं। तेरा कोई शरीक नहीं सिवाय उस शरीक के जो तेरा ही है। तू उसका भी मालिक है और उस चीज का भी जिसका वो मालिक है। वाह ये तो बहुत वाज़ है। तेरा कोई शरीक नहीं सिवाय उस शरीक के जो तेरा ही है। ये तो सीधी-सीधी बात है। ये तो बिल्कुल हिनोथिज्म की तारीफ पर पूरा उतरता है। जी। क्या कुरान में भी ऐसी ही कोई बात मिलती है जो इसकी ताईद करे? जी। कुरान में भी ऐसी कई आयात हैं जो इसी तरफ इशारा करती हैं। एक बहुत मशहूर मिसाल सूरतुल अनकुबूत की है। उसमें जिक्र है कि जब यही मुशरिकीन कश्ती में सवार होते हैं और समंदर में तूफान आ जाता है तो वो अपने तमाम छोटे माबूदों को भूलकर खालिसतन एक अल्लाह को पुकारते हैं। अच्छा। लेकिन जैसे ही अल्लाह उन्हें बचाकर खुश्की पर ले आता है, वो फौरन वापस शर्क करने लगते हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि उनके दिल की गहराइयों में वो जानते थे कि असल और हतमी ताकत सिर्फ अल्लाह के पास है। बिल्कुल। उनका शर्क एक आला खुदा के वजूद से इंकार नहीं था बल्कि उसकी हाकमियत में दूसरों को शरीक ठहराना था। खुदा के तसवुर की बात हो रही है तो एक और दिलचस्प नुक्ता। आपके जराय में अल्लाह और रहमान के नामों का है। मुझे यह हमेशा एक ही खुदा के दो नाम लगते थे। लेकिन मुसनिफ का कहना है कि इसके पीछे एक गहरी तारीख है। यह क्या मामला था? जी। और यह नुक्ता उस दौर की मजहबी पैचीदगी को और भी वाज़ करता है। ऐसा लगता है कि यह एक ही आला खुदा के तसवुर के दो मुख्तलिफ इलाकाई नाम थे। इलाकाई नाम जी। अल्लाह का लफज़ अल इलाह यानी द गॉड से निकला है। और यह पूरे जजीरा नमा में एक अदीम और आम तसवुर था। लेकिन रहमान का नाम खासतौर पर जुबी अरब में यानी यमन की हिमेरिया सल्तनत के आखिरी तौहीदी दौर में बहुत मकबूल हुआ। वहां से मिलने वाले कुतबों में खुदा के लिए रहमान का लफज़ कसरत से इस्तेमाल हुआ है। अच्छा तो यह एक तरह से इलाकाई शनाख्त का मामला भी था। जैसे शुमाल में अल्लाह का तसवुर ज्यादा आम था और जुनूब में रहमान का कुछ ऐसा ही लगता है और यह सिर्फ जुनूब तक महदूद नहीं था। पैगंबर इस्लाम के एक हमसर नबी मुसैलमा जो वस्ती अरब के इलाके यमामा में थे वो भी खुदा के लिए रहमान का नाम ही इस्तेमाल करते थे। तारीख में उन्हें रहमान अल यमामा भी कहा जाता है। हम कुरान में हमें उन दोनों तसवुरात को एक दूसरे के साथ जोड़ने की कोशिश वाजे तौर पर नजर आती है। जैसे सूरतुल इसरा की एक आयत में कहा गया है। कहो अल्लाह कहकर पुकारो या रहमान कहकर पुकारो जिस नाम से भी पुकारो सब अच्छे नाम उसी के हैं। यानी इस्लाम ने उन मुख्तलिफ धारों को जो अलग-अलग इलाकों में बह रही थी, एक बड़ी आलमगीर शनाख्त में जम कर दिया। यह तो मजहबी फिक्र के इरतका को जाहिर करता है। बिल्कुल बलाखिर अल्लाह का नाम ही बुनियादी और आलमगीर बन जाता है। जबकि रहमान उसकी एक अहम सिफत के तौर पर कुरान में कसरत से इस्तेमाल होता है। तो इससे पता चलता है कि इस्लाम अचानक कहीं से नहीं आ गया था। जो ख्यालात और तसवुरात पहले से मौजूद थे, इस्लाम ने उन्हें लेकर एक नए मुनजम और यूनिवर्सल सिस्टम में ढाल दिया। ठीक है। तो हमने हिजाज के मजहबी माहौल को समझ लिया जो पहले से कहीं ज्यादा पेचीदा और तौहीद की तरफ मायल था। लेकिन कोई भी बड़ी तब्दीली सिर्फ नजरियात से नहीं आती। उसके लिए हालात का साजगार होना भी जरूरी है। उस वक्त दुनिया में क्या हो रहा था? मुसनिफ एक बोहरानजदा दुनिया की तस्वीर कशी करता है। बिल्कुल और यह पसमंजर समझे बगैर हम इस्लाम के जुहूर को पूरी तरह नहीं समझ सकते। छठी सदी कई आलमी बोहरानों का दौर था। हम पहला और सबसे बड़ा बोहरान सियासी खला का था। जजीरा नुमा अरब के इर्द-गिर्द जो बड़ी ताकतें थी वो सब खत्म हो चुकी थी। खत्म हो चुकी थी। जी। जुनूब में अजीम हिमरी सल्तनत का खात्मा हो चुका था। हम्म। शुमाल में रोम और ईरान की जो इत्तहादी रियासतें थी यानी गसासुना और लख्मी वो भी या तो तबाह हो चुकी थी या बहुत कमजोर पड़ गई थी। यानी कोई बड़ा मकामी लीडर या ताकत नहीं थी जो पूरे ख्ते को जोड़कर रख सके। एक तरह का पावर वैक्यूम बन गया था। बिल्कुल दुरुस्त। एक सियासी खला पैदा हो चुका था और इस सियासी बोहरान के साथ-साथ एक कुदरती आफत भी आई जिसने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। 536 ईसवी के आसपास गालिबन किसी बड़े आतिश के फटने की वजह से दुनिया में एक छोटा बरफानी दौर शुरू हुआ। छोटा बरफानी दौर लिटिल आइस एज यह तो बहुत संगीन लग रहा है। यह बहुत संगीन था। इस दौर के मौरिक प्रोकोपियस ने लिखा है कि सूरज की रोशनी एक साल तक चांद की तरह मध्यम रही। दर्जा हरारत गिर गया। फसलें तबाह हो गई और शदीद कहत फैला। अल्लाहू अकबर। और जैसे इतना काफी ना हो इसी दौरान जस्टीनियन ताऊून की वबा फूट पड़ी जिसने बहरा रूम और मशरिक वस्ता की एक तिहाई से आधी आबादी को खत्म कर दिया। यह तो किसी एपोक्लिप्टिक फिल्म का सीन लग रहा है। कहत, वबा और सूरज की रोशनी भी मध्यम। इसने लोगों की नफसियात पर, उनके अकायत पर कितना गहरा असर डाला होगा। यकीनन लोग सोच रहे थे कि दुनिया खत्म होने वाली है। और उन सबके ऊपर एक तीसरा बोहरान भी था। दो सुपर पावर्स के दरमियान एक ना खत्म होने वाली जंग रोम और ईरान की जी 62 से 628 तक वो अपनी तारीख की आखिरी और सबसे ज्यादा तबाहकुन जंग लड़ रहे थे। इस जंग ने दोनों सल्तनतों को माशी और फौजी तौर पर बिल्कुल खोखला करके रख दिया था। तो यह तो एक परफेक्ट स्टॉम था। सियासी खला, माहूलियाती तबाही और दो सुपर पावर्स जो आपस में लड़-लड़ कर थक चुकी थी। ऐसे में तो किसी नई ताकत के उभरने के लिए जो लोगों को उम्मीद और एक नया निजाम दे सके बेहतरीन माहौल बन जाता है। जी हां। और यह माहौल सिर्फ पैगंबर इस्लाम के लिए ही साजगार नहीं था। मुसनिफ के मुताबिक इसने कई और पैगंबराना शख्सियात को भी जन्म दिया। मुसैलमा की हम बात कर चुके हैं। लेकिन उनके अलावा सुजा और अस्वद एनसी जैसे नाम भी तारीख में मिलते हैं। अच्छा। यह सब लोग अपने-अपने तरीके से इस बोहरान का जवाब देने और एक नया रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहे थे। तो फिर पैगंबर इस्लाम के पैगाम में ऐसी क्या खास बात थी जिसने उसे दूसरों से मुमताज किया और उसे आलमगीर कामयाबी दिलाई। सबसे बड़ा फर्क यह था कि बाकी लोगों के पैगामात ज्यादातर इलाकाई या कबाबली थे। वो एक मखसूस कबीले या इलाके के लिए थे। लेकिन पैगंबर इस्लाम का पैगाम शुरू से ही आलमगीर था। उसने तमाम पुरानी तकसीमों कबीला नस्ल इलाका को खत्म करके एक आफाकी उम्मत की बात की जो सिर्फ एक अकीदे की बुनियाद पर मुत्तहद हो। यह सब कुछ बहुत मायने खज है। हमारे पास एक मजहबी तौर पर तैयार खद्दा है जो एक आलमी बुहरान की लपेट में है। तो मुसनिफ इन सब धागों को आखिर में जोड़ता कैसे है? इस किताब का सबसे बड़ा हत्मी नतीजा क्या है? मुसनिफ चंद बहुत अहम और फिक्रंगेज नुकात पेश करती है। पहला और सबसे बुनियादी नुक्ता यह है कि अरब की एक मुतहिदा सियासी और नस्ली शनाख्त जिसे हम आज जानते हैं इस्लाम की पैदावार थी। इससे पहले यह मौजूद नहीं थी। एक मिनट यह दावा तो बहुत बड़ा है। कब्लज़ इस्लाम अरब एक बेअरब सर जमीन थी। कुछ लोग यह एतराज कर सकते हैं कि अरबी जबान और शायरी तो इस्लाम से पहले भी मौजूद थी और यह एक तरह की मुश्तका सकाफत की अलामत थी। मुसनिफ इसका क्या जवाब देता है? बहुत अच्छा सवाल है। मुसन्निफ यह नहीं कहती कि जुबान या सकाफती ममासिलत नहीं थी। लेकिन उसका इस्तद्लाल यह है कि एक मुत्तहदा कौमी या सियासी शनाख्त नहीं थी। अच्छा। लोग खुद को अरब नहीं कहते थे। बल्कि वो खुद को हेमेरी, नबती या अपने कबीले जैसे कुरैश या किंदा से पहचानते थे। अरब का लफज़ शायद एक जिग्राफियाई या लिसानी इस्तिला थी। लेकिन यह एक मुतहिदा कौम का नाम नहीं था। तो इस्लाम ने पहली बार इन तमाम मुख्तलिफ गुरूहों को एक उम्मत की लड़ी में परोया और उन्हें एक मुश्तका शनाख्त दी। जी। अच्छा। तो यह शनाख्त की सतह पर एक इंकलाब था। दूसरा अहम नुक्ता क्या है? दूसरा अहम नुक्ता हिजाज की निस्बतन तनहाई है। मुसनिफ का कहना है कि हिजाज की यही तन्हाई इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी। क्योंकि यह रोम और ईरान के बरास कंट्रोल और उनकी फौजी छावनियों से बहुत दूर था। इसलिए यहां एक मकामी खुद मुख्तार तहरीक को पनपने का मौका मिला। यानी रोम और ईरान की नजरों से दूर होने की वजह से इस नई तहरीक को जड़ पकड़ने का मौका मिल गया। जिसे शायद सल्तनत की सरहदों के करीब फौरन कुचल दिया जाता। बिल्कुल। और इस तहरीक ने वो खला पुर किया जिसकी हमने पहले बात की। सियासी तौर पर इसने हमीरी और गसानी लख्मी रियासतों के खात्मे से पैदा होने वाले खला को पुर किया और खिलाफत की शक्ल में एक नया सियासी ढांचा फराहम किया। और मजहबी तौर पर? मजहबी तौर पर इसने एक वाज़ और दो टोक तौहीदी मौकफ दिया जिसने ईसाइयत के अंदर हजरत ईसा की फितरत पर होने वाली सदियों पुरानी पेंचीदा बहसों को एक तरफ रख दिया। इस्लाम ने कहा कि ईसा खुदा नहीं बल्कि उसके रसूल हैं। और इस तरह इसने इस झगड़े को एक सादा और वाजे हल दे दिया। और समाजी सतह पर समाजी तौर पर इसने हम और वो की एक बिल्कुल नई तारीफ मुतारिफ कराई। अब बुनियादी तसादम कबीला ब मुकाबला कबीला का नहीं रहा या हमीरी ब मुकाबला रूमी का नहीं रहा। अब बुनियादी तकसीम मोमिन ब मुकाबला काफिर की थी। हम्म। इस नजरिए ने एक ऐसी आलमगीर उम्मत की तशकील की राह हमार की जो कबाइली और इलाकाई वफादारियों से बालातर थी और नजरियाती तौर पर पूरी दुनिया को शामिल कर सकती थी। तो यह ऐसा ही है जैसे जैसे दो बड़ी सल्तनतें शतरंज की बिसात कर एक दूसरे से लड़ने में इतनी मशरूफ थी कि उन्होंने यह नहीं देखा कि कोई तीसरा खिलाड़ी कमरे के कोने में एक बिल्कुल नई और मुख्तलिफ बिसात बिछा रहा है। जिसके उसूल ही अलग थे। यह एक बेहतरीन तजबीह है। जब तक रोम और ईरान ने एक दूसरे को लड़कर कमजोर किया। हिजाज से उठने वाली इस नई ताकत ने ना सिर्फ उस खला को पुर किया बल्कि शतरंज की बिसात ही बदल दी। तो इस सब का क्या मतलब है? हमने यह जायजा हिजाज के इर्द-गिर्द की दुनिया को देखकर शुरू किया था। और अब हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि किस तरह इस ख्ते की तन्हाई और मरकज से दूरी ही इसके तारीख उूज की किलीद बन गई। यह एक गैर मुतवक्का नतीजा है। हत्मी तौर पर इस्लाम का जुहूर सिर्फ एक मजहबी वाकया नहीं था बल्कि यह कदीम तारीख के आखिरी दौर में सदियों पर मुहीद सियासी, माशी और समाजी तब्दीलियों का नतीजा था। तो यह तारीख का एक गैर मुतवक्के मोड़ जरूर था, लेकिन यह खला में पैदा नहीं हुआ। जी। यह माज़ी से अचानक अलैदगी नहीं थी। बल्कि उस दौर के बोहरानों, जंगों और मजहबी बहसों का एक गैर मुतवक्का लेकिन मंतकी हल था। और मुसनिफ का यह हत्मी इस्तदलाल कि कब्लज़ इस्लाम अरब एक बेअ अरब सर जमीन थी। सुनने वालों के लिए एक बहुत गहना सवाल छोड़ जाता है। बिल्कुल। और वो सवाल यह है अगर इस्लाम इस नई मुताहिदा शनाख्त को बनाने के लिए जाहिर ना होता, तो जजीरा नुमा अरब में कौन सी दूसरी शनाख्तें जड़ पकड़ सकती थीं? हां क्या हमरी शनाख्त यमन से निकल कर दोबारा उभरती? क्या मुख्तलिफ कबाइल अपनी-अपनी छोटी रियासतें बना लेते या शायद यह पूरा खित्ता रूमी और ईरानी असुर और रुसूख में मजीद तकसीम हो जाता। और अगर ऐसा होता, तो वो दुनिया आज कैसी नजर आती। यह एक ऐसा सवाल है जिसका कोई हत्मी जवाब नहीं। लेकिन यह हमें तारीख के अहम मोड़ों और उनके दूर रस असरात पर सोचने पर मजबूर करता।