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डीप एक्सपर्ट रिव्यूज में खुशामदीद।
आज हम एक ऐसे शहर की गहराइयों में उतर रहे हैं जिसका नाम ही तारीख, अकीदत और तनाजे का मुतरादिफ है। यरूशलम और इस सफर में हमारी रहनुमा हैं कैरन आर्मस्ट्रांग और उनकी शानदार किताब यरूशलम की तारीख एक शहर तीन मज़ाहिब।
आगे बढ़ने से पहले हम यह वाज़ करना चाहते हैं कि यह ऑडियो मसनुई जहानत के जरिए तैयार की गई हैं। इसलिए तलफुज या जिनंस के ताइन में गलती हो सकती है। हमारा मकसद सिर्फ तालीमी मावात फराहम करना है।
तो आर्मस्ट्रांग का पसमंजर खुद बहुत दिलचस्प है। वो एक साबिक रोमन कैथोलिक राहिबा हैं। जिन्होंने अपनी जिंदगी दुनिया के बड़े मज़ाहिब को समझने के लिए वफ कर दी है। जी बिल्कुल। और आज हमारा मकसद सिर्फ वाक्यात की एक फहरिस्त दोहराना नहीं है। बल्कि हम यह समझने की कोशिश करेंगे इन जराय की रोशनी में कि आखिर इस एक शहर में इतनी कशिश क्यों है। तीन अजीम मज़ाहिब इसे अपना मरकज क्यों मानते हैं?
बिल्कुल। और इस सवाल का जवाब देने के लिए आर्मस्ट्रांग हमें बताती हैं कि हमें महज तारीख से आगे देखना होगा। हमें तीन बुनियादी तस्सवुरात को समझना होगा जो इस शहर की रूह में बसे हुए हैं। और वो क्या है? पहला मुकद्दस होने का असल मतलब क्या है? दूसरा असातीर या मिथ की ताकत क्या है? और तीसरा एक अलामत या सिंबल कैसे महज एक निशान से बढ़कर हकीकत बन जाती है।
हम तो यह सिर्फ तारीख नहीं बल्कि एक तरह से नफसियात और रूहानियत का भी तजिया है। जी। किताब का असल नुक्ता ही यह है कि यरूशलम की कहानी सिर्फ ईंट और पत्थर की नहीं है। यह इंसानी नफसियात, उसकी उम्मीदों और रूहानी तलाश की कहानी है।
मुसन्निफा खुद भी एक बहुत दिलचस्प बात कहती हैं कि जब वो पहली बार यरूशलम गई तो उन्हें शदीद मायूसी हुई। अच्छा, मायूसी? जी। जो शहर उनके तस्सवुर में था एक आसमानी रूहानी जगह वो हकीकत में एक शोरशराबे वाला आम सा मशरकी बस्ती का शहर लगा हम लेकिन फिर उन्हें एहसास हुआ कि इस शहर की असल हकीकत इसकी जाहरी शक्ल में नहीं बल्कि उन तह दर तह मानों में है जो सदियों से इंसानों ने उसे दिए हैं।
बिल्कुल। तो चल आज उन्हीं तहों को एक-एक करके खोलने की कोशिश करते हैं। जरूर। आइए सबसे पहले तसवुर मुकद्दस से शुरू करते हैं। ठीक है।
आर्मस्ट्रांग वाज़ करती हैं कि मुकद्दस का मतलब सिर्फ कोई माफूक उल फितरत हस्ती या खुदा नहीं है। यह ऐसे गहरे पुरसरार एहसास का नाम है जो हमें अपनी जात की हुदूद से बाहर ले जाता है। अच्छा इसकी कोई मिसाल? जी। जैसे शायद किसी अजीम फन पारे को देखकर या कोई बहुत खूबसूरत मौसी सुनकर या फितरत की किसी दिलकश मंजर में खोकर जो एक एहसास होता है ना जी जी एक लम्हे के लिए हम अपनी छोटी सी जात को भूलकर किसी बड़ी हकीकत का हिस्सा बन जाते हैं। यही मुकद्दस का तजुर्बा है।
यह बहुत दिलचस्प वजाहत है। यानी यह कोई बाहर से आने वाली चीज नहीं यह एक अंदरूनी इंसानी तजुर्बा है। बिल्कुल। लेकिन फिर असातीर यानी दीपमालाई कहानियों का क्या किरदार है? आमतौर पर तो हम इस लफ्ज को झूठी या मनगढ़ंत कहानियों के लिए इस्तेमाल करते हैं। और यही वो सबसे बड़ी गलतफहमी है जिसे आर्मस्ट्रांग दूर करना चाहती हैं। उनके मुताबिक कदीम दुनिया में उसूर का मकसद साइंसी या तारीख हकीकत बयान करना था ही नहीं। यह नफसियात की एक कदीम शक्ल थी।
नफसियात की कदीम शक्ल। जी। असातीर इंसानी रूह की अंदरूनी दुनिया, उसके खौफ, उसकी ख्वाहिशात और कायनात में उसके मकाम के बारे में गहरी सच्चाइयां बयान करती हैं। मिसाल के तौर पर मिस्र से बनी इसराइल के खुरू की कहानी मौरिकन उसकी हर तफसील पर बहस कर सकते हैं। कि वह तारीख तौर पर कितनी दुरुस्त है। जी। लेकिन इस कहानी ने पूरी कौम को अपनी शनाख्त दी। उन्हें आजादी का मतलब समझाया। यह उसकी असातीरी सच्चाई है जो तारीखी सच्चाई से कहीं ज्यादा ताकतवर साबित हुई।
वाह! तो यह एक किस्म की नफसियाती हकीकत है और तीसरा सुतून अलामत वो कैसे जुड़ता है सबसे? कदीम ज़हन के लिए देखें अलामत उस चीज से अलग नहीं थी जिसकी वो नुमाइंदगी करती थी। वो इस हकीकत में शरीक होती थी। मतलब मतलब मिसाल के तौर पर एक मुकद्दस पहाड़ सिर्फ खुदा के घर की निशानी नहीं था बल्कि वह एक ऐसी जगह थी जहां आसमान और जमीन मिलते थे जहां इंसान खुद इस मुकद्दस हकीकत तक रसाई हासिल कर सकता था।
अच्छा और यरूशलम वो यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों के लिए एक ऐसी ही अलामत बन गया। यह सिर्फ एक शहर नहीं रहा बल्कि यह कायनात का मरकज, खुदा से राबते का जरिया और आसमानी हकीकत का जमीनी अक्स बन गया। समझ गया? तो इन तीनों तसवुरात, मुकद्दस, उसस्तूर और अलामत की ऐनक से ही हम यरूशलम की पेचीदा तारीख को समझ सकते हैं।
बिल्कुल। ठीक है। तो, यह फ्रेमवर्क ज़हन में रखते हुए आइए तारीख के औराक पलटते हैं। यरूशलम का आगाज कहां से हुआ? क्या यह हमेशा से इतना अहम था? बिल्कुल नहीं। आसारे कदीमा हमें बताते हैं कि यहां 3200 कब मसीह के करीब एक छोटी सी बस्ती मौजूद थी। लेकिन यह कोई बड़ा शहर नहीं था। और तजारती रास्तों पर भी नहीं था शायद। जी। यह कदीम किनान के अहम तजारती रास्तों से भी हटकर पहाड़ों में वाक्य था। इसका पहला तारीखी जिक्र हमें तकरीबन 1800 कब्ल मसीह में मिस्र की तहरीरों में मिलता है। जहां इसे रोशानीम कहा गया है।
रोशानीम यह नाम ही बहुत कुछ बताता है। इसका क्या मतलब है? इसका सबसे ज्यादा मुमकिना मतलब है शालीम ने बुनियाद रखी। शालीम जी। शालीम शाम के गुरूबे आफताब और जरखेजी के देवता का नाम था। अच्छा। इससे यह जाहिर होता है कि इस शहर की बुनियाद ही एक मजहबी और इलहामी तसवुर पर थी। कदीम दुनिया में देखिए शहर बसाना एक मुकद्दस काम समझा जाता था। यह कायनात की तखलीक की नकल करने जैसा था। हम शहर हमेशा किसी मुकद्दस मकाम, किसी चश्मे, पहाड़ या मंदिर के गिर्द बसाए जाते थे। क्योंकि यही वो महवर समझा जाता था जो इंसान को कायनात के मरकज और आसमानी ताकतों से जोड़ता था।
यानी यरूशलम का मुकद्दस होना बनी इसराइल की आमद से भी बहुत पहले शुरू हो चुका था। एक कनानी देवता के नाम पर। यह तो बहुत हैरानक बात है। जी हां, इसकी बुनियाद में ही तकद्दुस का यह तसवुर मौजूद था। फिर 14वीं सदी कब मसीह तक यह कनान की कई छोटी-छोटी शहरी रियासतों में से एक बन चुका था। और उस वक्त इसका हाकिम अबदी हपा नामी शख्स था। अबदी हपा। जी। हमें मिस्र से मिट्टी की कुछ तख्तियां मिली हैं जिन्हें इमारना के खुतूत कहा जाता है। हां, मैंने उनके बारे में पढ़ा है। उनमें अबदी हपा के खुतूत भी हैं जो उसने फिरौन को लिखे थे। उन खुतूत में वह गिड़गिड़ाकर फिरौन से अपने दुश्मनों के खिलाफ मदद मांग रहा है। जिससे अंदाजा होता है कि यरूशलेम उस वक्त एक बहुत कमजोर और गैर महफूज़ शहर था।
और उस दौर में वहां के लोगों के मजहबी अकायद क्या थे। किताब में बाल देवता का जिक्र भी आता है। बिल्कुल। इस इलाके में शुमाल से हूरी कौम की आमद के साथ तूफान के देवता बाल का तसवुर भी आया। बाल की कहानियां बहुत ड्रामाई हैं। यह कायनात की अफरातफरी, मौत और बंजरपन की कुतों के खिलाफ इसकी जंग की दास्ताने हैं। सही। जब बैल इन शैतानी कुतों को शिकस्त दे देता है तो उसकी फतह के बाद उसका महल कोहे सफून नामी एक असातीरी पहाड़ पर बनाया जाता है। यह पहाड़ कायनात का मरकज अमन और खुशहाली की जगह समझा जाता था। और लोग जमीन पर उसकी नकल करते थे। बेआईना लोग जमीन पर उस आसमानी महल की नकल में मंदिर बनाते थे ताकि वह भी उस कायनाती अमन और खुशहाली में शरीक हो सके।
अच्छा और यही तसवुर एक मुकद्दस पहाड़ जो दुनिया का मरकज है और खुदा का घर है। बाद में यरूशलम में कोहेजन की रूहानियत की बुनियाद बना। तो आप कह रही हैं कि कनानी और शामी अकायद ने वो सांचा तैयार किया जिसमें बाद में बनी इसराइल ने अपने अकायद को ढाला। जी बिल्कुल। और फिर इस पूरी तस्वीर में बनी इसराइल कब और कैसे दाखिल हुए। जो कहानी हम आमतौर पर सुनते हैं वो तो एक अजीम फतह की कहानी है। जी और यहां आर्मस्ट्रांग दो बिल्कुल मुख्तलिफ तस्वीरें पेश करती हैं। एक है बाइबल की रिवायती दास्तान खासतौर पर योशुआ की किताब में जी जो बताती है कि बनी इसराइल ने बाहर से आकर एक जबरदस्त फौजी मुहिम के जरिए कनान को फतह किया। शहरों को जला दिया गया और मकामी आबादी को खत्म कर दिया गया।
लेकिन और यह बहुत अहम नुक्ता है। जदीद आसारे कदीमा इस कहानी की ताईद नहीं करते। एक मिनट यह तो बहुत बड़ी बात है। यानी आसारे कदीमा को इस अजीम फतह के कोई सबूत नहीं मिलते। वसी पैमाने पर नहीं उस दौर में कनान के शहरों में इस तरह की तबाही के आसार नहीं मिलते जैसा कि बाइबल बयान करती है। तो फिर आसार कदीमा क्या कहते हैं? आसारे कदीमा एक दूसरी ही कहानी सुनाते हैं कि इसराइल का जुहूर कनान के अंदर से ही हुआ। यह कोई बैरूनी हमला नहीं था बल्कि एक तरह की अंदरूनी बगावत थी।
अंदरूनी बगावत इसका क्या मतलब है? नजरिया यह है कि उस वक्त कनान की शहरी रियासतों का निजाम बहुत जाना और ज़वाल पजीर हो चुका था। गरीब किसानों और गुलामों पर भारी टैक्स थे। हम तो बहुत से लोग इस जबर से तऊ आकर शहरों को छोड़कर गैर आबाद पहाड़ी इलाकों में जाकर बसने लगे। उन्होंने वहां एक नई ज्यादा मसावात पर मबनी सोसाइटी कायम की जो शहरी रियासतों के देवताओं और बादशाहों को मुस्तरद करती थी। यही लोग बाद में इसराइल कहलाए।
वाह, यह तो कहानी को बिल्कुल ही बदल देता है। एक बैरूनी फाते कौम के बजाय यह समाजी इंसाफ के लिए जिद्दोजहद करने वाले मकामी लोगों की कहानी बन जाती है। यकीनन यह एक बिल्कुल मुख्तलिफ जाविया फराहम करता है। इससे तो कौमे मुंतखब के तसवुर पर भी गहरा असर पड़ता है। बिल्कुल। और दिलचस्प बात यह है कि बाइबल के अंदर भी इसकी झलकियां मिलती हैं। बाइबल के जो कदीम तरीन मोहरन हैं जिन्हें ओलमा जे और ई माखस कहते हैं वो एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जहां तसादुम से ज्यादा इम्तजाज नजर आता है। यानी यानी इन रिवायतों के मुताबिक हजरत इब्राहिम, इसहाक और याकूब जैसे पैगंबर किनान के मकामी मजहबी मकामात को तबाह नहीं करते बल्कि उनका एहतराम करते हैं और उन्हें अपने अकीदे का हिस्सा बना लेते हैं। जैसे हजरत याकूब का बैतल में मुकद्दस पत्थर नसब करना।
बिल्कुल। बैतल एक पुराना कनानी मुकद्दस मकाम था। इसी तरह इन पैगंबरों ने मकामी बुलंद पाया देवता एल की इबादत की। एल जी जो कनानी देवताओं का सरदार था। बाद में एल के बहुत से औसाफ बनी इसराइल के अपने खुदा यहोवा के साथ यज्जा कर दिए गए। अच्छा। तो यह एक मुकम्मल रद्द के बजाय एक किस्म का मजहबी इम्तजाज था। जी। जहां बनी इसराइल ने कहा कि जिस अजीम देवता की तुम इबादत करते हो वो दरअसल हमारा ही खुदा यहोवा है।
लेकिन फिर बनी इसराइल की मुनफिदा शनाख्त कैसे बनी? अगर वो मकामी सकाफत में इतना घुलमिल रहे थे तो वो एक अलग कौम कैसे बने? उनकी असल और मुनफिद शनाख्त मिस्र से खुरू के वाक्य से जुड़ी है। यही इनकी तखलीकी उसस्तूर बन गई। यानी गुलामी से आजादी का तजुर्बा। जी गुलामी से आजादी का तजुर्बा सेहरा में 40 साल का सफर और कोहे सीना पर खुदा के साथ एक अहद बांधना यह वो वाक्यात थे जिन्होंने इन्हें एक कौम के तौर पर मुतहिद किया और इन्हें उनके पड़ोसियों से मुमताज किया और उनका खुदा यहवा वो भी मुख्तलिफ था। बिल्कुल वो कोई मकामी देवता नहीं था जो किसी पहा या चश्मे से मुसलिक हो बल्कि वह तारीख में अमल करने वाला एक मुतहरिक खुदा था जिसने उन्हें गुलामी से निजात दिलाई थी और इस सारी इब्तदाई तारीख में यरूशलम का कोई किरदार नहीं था वो अब तक कहानी से बाहर है बिल्कुल बाहर है इस वक्त तक नहीं 11वीं सदी कब मसीह में जब साऊल यानी तालुत के कयादत में इसराइल की बादशाहत कायम हुई तो उसका मरकज भी शमाल में था सही साऊल की मौत के बाद दाऊद जो जुनूब के कबीले यहूदा से थे पहले सिर्फ गूब में हेब्रोन में बादशाह बने। फिर उन्होंने एक तवील जद्दोजहद के बाद शुमाल और जूब को मुतहिद करके एक मुत्तहदा सल्तनत की बुनियाद रखी। और अब उन्हें एक दारुल हुकूमत की जरूरत थी। एक ऐसे दारुल हुकूमत की जो गैर जानिबदार हो जो ना शमाली कबाइल का हो और ना जूबी। जी। और उनकी सल्तनत के ऐन बीच में दोनों इलाकों की सरहद पर एक छोटा सा शहर था। जो अब तक किसी इसराइली कबीले ने फतह नहीं किया था। यबूसियों का शहर यरूशलम और दाऊद ने उसकी तजबीराती अहमियत को फौरन भांप लिया।
बिल्कुल यह एक बेहतरीन इंतखाब था और उनका अगला हदफ इसी शहर को फतह करके अपनी सल्तनत का सियासी और रूहानी दिल बनाना था। तो आज हमने देखा कि यरूशलम की कहानी बनी इसराइल से बहुत पहले शुरू होती है। इसकी बुनियाद कनानी और शामी देवताओं के तसवुरात पर रखी गई। जी और इसकी मुकद्दस शनाख्त की जड़े बहुत गहरी हैं। यह शहर शुरू से ही मुख्तलिफ अकायद और तहजीबों का संगम रहा है। बिल्कुल। और यही बात इस शहर की अजमत भी है और शायद उसका अलमिया भी। जी कैरन आर्मस्ट्रांग की तारीख हमें दिखाती है कि यरूशलम की तकदीस तह दर तह है। यह किसी एक गुरु की मिल्कियत नहीं रही। और यहीं से वो बुनियादी सवाल पैदा होता है जो आज भी हमारे सामने है। बिल्कुल। अगर किसी जगह का तकद्दुस उन कहानियों, अलामतों और तजुर्बात पर मबनी है जो किसी एक गिरोह के लिए गहरे मायने रखते हैं तो उस वक्त क्या होता है जब कई गिरोह अपनी-अपनी मुख्तलिफ और बाजकात एक दूसरे से मुतसादिम कहानियों के साथ एक ही जगह को अपनी दुनिया का अटल मरकज समझने लगे। यह मुख्तलिफ तकदीसात एक साथ कैसे रह सकती हैं? यही वो सवाल है जिस पर गौर करना आज भी इतना ही जरूरी है जितना 3000 साल पहले था।
बहुत खूब। आज की गुफ्तगू यहीं रोकते हैं। यह वाकई एक गहरी और फिक्रंगेज शुरुआत थी। जी अभी तो कहानी शुरू हुई है। बिल्कुल। अगली किस्त में हम इस सफर को आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि दाऊद के यरूशलम फतह करने के बाद इस शहर की तारीख क्या रुख इख्तियार करती है। हमारे साथ रहिएगा।
पिछली बार जब हमने बात की थी तो हम कदीम केनान के एक एक पेचीदा मंजरनामे को देख रहे थे। शहर थे, कबीले थे और हर कोई अपनी बका की जंग में मशरूफ था। आज हम कहानी के एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां एक छोटा सा नाकाबिले तस्खीर समझा जाने वाला पहाड़ी किला वह तारीख के मरकज में आ जाता है। हम बात कर रहे हैं यरूशलम की और तकरीबन 1000 कब मसीह में दाऊद अली सलाम के हाथों उसकी फतह की। जी और यह सिर्फ एक फौजी कारवाई नहीं थी। यह एक ऐसे शहर की पैदाइश थी जिसकी तकदीर में दुनिया के तीन बड़े मज़ाहिब का मुकद्दस मरकज बनना लिखा था। आज हम अपने जरा की मदद से यही देखेंगे कि यह एक येबूसी किला एक अजीम सल्तनत का दारुल हुकूमत कैसे बना और फिर इतनी शानो शौकत के बाद राख का ढेर कैसे हो गया। यह उरूजो ज़वाल की एक नाकाबिल यकीन दास्तान है। आइए इस सफर का आगाज करते हैं।
कहानी शुरू होती है यबूसियों के नाकाबिल यकीन एतमाद से। मखज बताता है कि जब दाऊद अली सलाम की फौजें शहर के करीब पहुंची तो उन्होंने मजाक उड़ाया। कहा कि यहां तो अंधे और लंगड़े भी तुम्हें रोक लेंगे। उन्हें इतना गुरूर किस बात पर था? क्या यह शहर वाकई इतना महफूज़ था? ज्योग्राफियाई तौर पर बिल्कुल देखिए उस वक्त का यरूशलम आज के पुराने शहर से थोड़ा जुनूब की तरफ था। एक तंग पहाड़ी पर उसके तीनों तरफ गहरी वादियां थी जो उसे कुदरती तौर पर नाकाबिले तस्खीर बनाती थी। अच्छा हमला सिर्फ शुमाल की तरफ से हो सकता था जो सबसे ज्यादा महफूज़ हिस्सा था। तो उन्हें पूरा यकीन था कि कोई इन दीवारों को उबूर नहीं कर सकता।
लेकिन दाऊद अल सलाम ने यह कर दिखाया और यहां मेरे ज़हन में पहला सवाल यह आता है कि उन्होंने इसी शहर का इंतखाब क्यों किया? उस वक्त तो हेब्रॉन जैसे बड़े शहर भी थे। यरूशलम ही क्यों? ये एक सियासी जिहानत का शाहकार था। दाऊद अल सलाम पहले सिर्फ जूबी कबीले यानी यहूदा के बादशाह थे। बाद में शुमाली कबीलों ने भी उन्हें अपना बादशाह मान लिया। अब उन्हें एक ऐसे दारुल हुकूमत की जरूरत थी जो जो गैर जानबदार हो। बिल्कुल जो तकनीकी तौर पर ना यहूदा का हो ना शुमाली इसराइल का। अच्छा तो यह कुछ वैसा ही था जैसे अमेरिका में वाशिंगटन डीसी को दारुल हुकूमत बनाया गया जो किसी भी रियासत का हिस्सा नहीं है। बिल्कुल यही बात है। यह एक ब्रिलियंट कदम था। फतह के बाद यह शहर किसी कबीले की मिल्कियत नहीं बना बल्कि दाऊद अल सलाम की जाती जागीर बन गया। इसीलिए इसे इरेऊद यानी दाऊद का शहर कहा जाने लगा।
माखीज में एक और दिलचस्प नुक्ता यह भी है कि यह फतह कितनी खूनी थी। क्योंकि आमतौर पर जब कोई शहर फतह होता है तो तो कत्लेआम होता है, तबाही होती है। यहां क्या हुआ? हैरतंगेज तौर पर बाइबल में किसी बड़े कत्लेआम का जिक्र नहीं है ना ही शहर को जलाने का। बल्कि बाद में यह लिखा गया है कि यबूसी और बनी इसराइल के लोग शहर में एक साथ रहते थे। ऐसा लगता है कि यह एक मोहल्लाती बगावत थी। मतलब सिर्फ कयादत को तब्दील किया आबादी को नहीं।
लेकिन क्या यह तस्वीर थोड़ी ज्यादा ही मिसाली नहीं लगती? एक तरफ तो सखा मिलाप की बात हो रही है। लेकिन दूसरी तरफ हमें उरिया अलहित का वाकया भी मिलता है जो एक यबूसी अफसर था और जिसे दाऊद अल सलाम ने अपनी बीवी बछबा को हासिल करने के लिए मरवा दिया था। यह एक बेहतरीन नुक्ता है। देखें तारीफ कभी भी स्याह और सफेद नहीं होती। दाऊद अली सलाम ने यकीनन यबूसी इंतजामी ढांचे को बरकरार रखा। उनके पास शहर चलाने का तजुर्बा था जो इसराइलियों के पास नहीं था। लेकिन साथ ही वो एक मुतलकुल अनान बादशाह भी थे। वो अपने मकसद के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। तो हां दोनों हकीकतें एक साथ मौजूद थी। यानी यह हम बा मुकाबला वो वाली सूरत हाल नहीं थी।
लेकिन इस सबके बावजूद यरूशलम अब भी सिर्फ एक सियासी दारुल हुकूमत था। उसे रूहानी मरकज बनाने का सफर वो यहां से शुरू होता है और इसका ताल्लुक है ताबूत सकीना से। जी हां, आर्क ऑफ द कॉवनेंट। यह बनी इसराइल का मुकद्दस तरीन असासा था। जिसमें रिवायत के मुताबिक वो 10 अहकाम वाली पत्थर की लोहे थी। यह खुदा की मौजूदगी की सबसे बड़ी अलामत थी। दाऊद अल सलाम ने उसे यरूशलम लाने का फैसला किया जो कि एक और बहुत दानिशमंदाना कदम था। इससे उनकी बादशाहत को मजहबी जवाज मिल गया और यरूशलेम फौरन इसराइल का रूहानी दिल बन गया।
लेकिन पहली कोशिश तो बुरी तरह नाकाम हुई थी। वो वाकया बहुत अजीब है जहां उज्जा नामी एक शख्स ताबूत को गिरने से बचाने के लिए हाथ लगाता है और फौरन हलाक हो जाता है। जी माखिस इसे एक गहरे मजहबी सबक के तौर पर पेश करता है। पैगाम यह था कि तकद्दुस कोई ऐसी चीज नहीं जिसे इंसान कंट्रोल कर सके। यहोवा कोई बुत नहीं था जिसे आप अपनी मर्जी से एक जगह से दूसरी जगह उठाकर ले जाएं। वह एक जिंदा और ताकतवर कुत थी। इस वाक्य ने दाऊद अल सलाम को खौफजदा कर दिया। तीन महीने बाद जब दूसरी कोशिश कामयाब हुई तो दाऊद अल सलाम ने खुदा के लिए एक मुस्तकिल घर यानी एक माबद तामीर करने का इरादा किया। लेकिन उन्हें जो जवाब मिला वो भी बड़ा गैर मुतवक्का था। बिल्कुल। नातन नबी के जरिए उन्हें पैगाम मिला कि तुम मेरे लिए घर नहीं बनाओगे बल्कि मैं तुम्हारे लिए एक घर बनाऊंगा। यहां वहां घर से मुराद एक शाही खानदान था। एक ऐसी नस्ल जो हमेशा कायम रहे। अच्छा यानी दाऊदी अहद। जी। इस एक लम्हे में यरूशलम का तकद्दुस सिर्फ ताबूत से नहीं बल्कि दाऊद अल सलाम के खानदान से हमेशा के लिए जुड़ गया। कोहे सयून अब खुदा के मुंतखिब करदा बादशाह का घर बन गया।
तो दाऊद अल सलाम ने शहर की बुनियाद रख दी। लेकिन उसे एक आलमी मयार के दारे हुकूमत में बदलने का काम उनके बेटे सुलेमान अल सलाम के हिस्से में आया। जी सुलेमान अल सलाम का दौर जो तकरीबन 970 कबले मसीह में शुरू हुआ। यरूशलम का सुनहरी दौर था। उन्होंने बड़े पैमाने पर तामीराती काम किए। शहर को फैलाया। नई दीवारें बनाई। एक शाही महल तामीर किया। तिजारत मिस्र से मेसोपोटेमिया तक फैल गई और यरूशलम एक इलाकाई सुपर पावर का मरकज बन गया। और इन तमाम तामीरात में सबसे अहम थी हैकले सुलेमानी की तामीर। तारीख की सबसे मशहूर इमारतों में से एक। इसके बारे में हमें क्या मालूम है? दिलचस्प बात यह है कि इसका डिजाइन और कारीगर सुर यानी जदीद लुबनान से आए थे। यह खालिस्तान शामी फनीकी तर तज़ तामीर का नमूना था। इसमें तीन हिस्से थे। एक बैरूनी बरामदा, एक मरकजी हॉल और अंदरूनी तरीन हिस्सा कुदजुल अदास जहां ताबूत सकीना रखा गया था। यह बात मुझे हमेशा हैरान करती है। एक तौहीद परस्त मजहब के सबसे मुकद्दस माबद में बैलों के मुजस्सिमे माखस के मुताबिक वहां पीतल का एक बहुत बड़ा हौस था जिसे यम यानी समंदर कहते थे और उसे पीतल के 12 बैलों ने उठाया हुआ था। यह यह आज के दौर से देखने पर बहुत अजीब लगता है ना?
बिल्कुल अजीब लगता है। लेकिन उस वक्त के लोगों के लिए उसका मतलब कुछ और था। वो इन अलामात को अपने अकीदे के मुताबिक एक नया मतलब दे चुके थे।
कनानी देववाला में तूफान का देवता बाल अफरातफरी के देवता यम यानी समंदर को शिकस्त देता है। हेकल में मौजूद यह पीतल का समंदर उसी शिकस्त खुर्दा अफरातफरी की अलामत था। यह इस बात की याद दिहानी थी कि खुदा की तखलीक हमेशा अफरातफरी पर फतह पाने के बाद ही मुमकिन होती है।
और हैकल को जन्नत अदन का अक्स भी समझा जाता था। जी हां। इसकी दीवारों पर खजूर के दरख्तों, फूलों और फरिश्तों की नक्काशी थी। जब कोई इबादत गुजार उसमें दाखिल होता, तो वह गोया खोई हुई जन्नत में वापस आ जाता था। एक ऐसी जगह जहां खुदा और इंसान में कोई दूरी नहीं थी। इस सब ने मिलकर एक बहुत ताकतवर नजरिया तखलीक किया होगा।
बिल्कुल हैकल की तामीर ने तीन अहम तस्सवुरात को जन्म दिया जिन्होंने यरूशलम की शनाख्त को बदल दिया। मिशपात, सिद और शालूम। एक मिनट इनको थोड़ा खोलते हैं।
शालूम का मतलब तो हम आमतौर पर अमन समझते हैं। लेकिन क्या यह इससे ज्यादा गहरा तसवुर है? बहुत ज्यादा गहरा। शालूम का मतलब सिर्फ जंग की अदम मौजूदगी नहीं बल्कि कामिलियत हमाहंगी। जब हर चीज अपनी सही जगह पर हो। मिप्पात का मतलब है इंसाफ। खासतौर पर कमजोरों के लिए और सिद का मतलब है रास्तबाजी। यानी उस इंसाफ पर मबनी निजाम को कायम रखना। नजरिया यह था कि बादशाह जमीन पर खुदा का नुमाइंदा है। और उसकी जिम्मेदारी है कि वह यह सब कायम करे जिसके नतीजे में शालूम हासिल होगा।
एक बेहतरीन मिसाली निजाम तो फिर सब कुछ गलत कहां हुआ? सुलेमान अली सलाम के दौर के आखिर में ही सल्तनत ज़वाल पज़र क्यों होने लगी? हम बाद के मुसन्नफिन ने तो उसकी वजह उनकी गैर मुल्की बीवियों और उनके देवताओं को करार दिया। लेकिन जराय से यह भी इशारा मिलता है कि असल वजूहात माशी और सियासी थी।
सुलेमान अली सलाम के अजीम मंसूबों ने रियासती खजाने पर बेतहाशा बोझ डाला। उस बोझ को पूरा करने के लिए उन्होंने शुमाली सल्तनत इसराइल पर भारी टैक्स और जबरी मशक्कत आयद की। जबकि अपने इलाका यहूदा को छूट दी। तो मिशपात यानी इंसाफ की वही कमी जिसको रोकना बादशाह की जिम्मेदारी थी। खुद बादशाह के हाथों हो रही थी। यही बगावत की वजह बनी।
बिल्कुल। जब सुलेमान अली सलाम का इंतकाल हुआ तो शुमाली कबीले उनके बेटे रहे अबबाम के पास गए और टैक्स कम करने को कहा। अबबाम का जवाब तारीख के सबसे तबाहकुन सियासी फैसलों में से एक था। उसने कहा मेरे वालिद ने तुम्हें कोड़ों से मारा। मैं तुम्हें बिच्छुओं से भरे कोड़ों से मारूंगा। और बस वहीं मुताहिद्दा सल्तनत हमेशा के लिए टूट गई। जी। 10 शुली कबीले अलग हो गए और यरूशलम सिर्फ जुनूबी सल्तनत यहूदा का दारुल हुकूमत रह गया।
इस तकसीम के बाद यरूशलम की अहमियत तो कम हो गई होगी। हां, लेकिन इसी दौर में सायून के नजरिए ने मजीद जड़ पकड़ी। यह अकीदा कि क्योंकि खुदा ने इस शहर को चुना है, इसलिए वह हर हाल में इसकी हिफाजत करेगा। और इस नजरिए को एक निहायत गैर मामूली वाक्य से जबरदस्त तकवियत मिली। 701 कबिले मसीह में असूर की सुपर पावर फौज ने यरूशलम का मुहासरा कर लिया। और शहर का बचना नामुमकिन नजर आ रहा था। बिल्कुल नामुमकिन।
लेकिन यसाया नबी ने पेशगोई की कि खुदा अपने शहर को बचाएगा। और फिर एक मौजजा हुआ। माखस के मुताबिक एक ही रात में असूरी फौज में वबा फैली और वह मुहासरा उठाकर वापस चले गए। इस वाक्य ने तो सयून के नजरिए पर मोहर लगा दी होगी।
लेकिन माखस कहता है कि इसका एक मोहलिक असर भी हुआ। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह था कि बाद की नस्लें यह समझने लगी कि उन्हें कुछ करने की जरूरत नहीं। चाहे वह कितने ही नाइंसाफ क्यों ना हो जाए खुदा आखिर में आकर उन्हें मौजाती तौर पर बचा लेगा। वो अब वो अपनी जिम्मेदारियों से गाफिल हो गए।
और इसी दौरान बादशाह योसियाह के दौर में एक बड़ी मजहबी इस्लाह की तहरीक भी चली। जी। तकरीबन 622 कब मसीह में हैकल की मरम्मत के दौरान एक पुराना तोमार मिला। उसने बादशाह यूसिया को हिला के रख दिया। उसने एक इंकलाबी इस्लाह शुरू की। यरूसलम के अलावा यहोवा की इबादत की तमाम जगहों को तबाह कर दिया गया। तो यह तारीख में पहली बार था कि एक मरकजी अथॉरिटी यह कह रही थी कि खुदा की इबादत सिर्फ एक ही जगह और एक ही तरीके से हो सकती है। जी। यह एक बहुत बड़ी और बुनियाद परस्त तब्दीली थी।
इस इस्लाह में पहली बार शदीद अदम रवादारी भी नजर आई। दूसरे अकायद की तमाम अलामतों को ना सिर्फ तोड़ा गया बल्कि उनकी बेहुरमती की गई। लेकिन यह मजहबी पाकीजगी भी शहर को बचा ना सकी। नहीं बचा सकी। क्योंकि यरमिया नबी जैसे लोग खबरदार कर रहे थे कि असल मसला बैरूनी बुत नहीं बल्कि दिलों में मौजूद नाइंसाफी है। लोग हैकल को एक जादुई ढाल समझ रहे थे। वो नारे लगाते थे। यह यहोवा का हैकल है। यह सोचकर कि यह इमारत ही उनकी हिफाजत की जमानत है। जबकि यरमिया ने कहा कि खुदा की हिफाजत का इनसार ईंट और पत्थर पर नहीं बल्कि इंसाफ और रहम पर है।
और आखिरकार तबाही आ ही गई। यहूदा के आखिरी बादशाहों ने बाबेल की नई सुपर पावर के खिलाफ बगावत की। यह सोचकर कि खुदा उन्हें फिर बचा लेगा। लेकिन इस बार कोई मोजजा नहीं हुआ। 586 कब मसीह में तवील मुहासरे के बाद बख्त नसर की फौजे शहर में दाखिल हो गई। यानी सदियों की तारीख सकाफत अकीदत सब कुछ खत्म हो गया। उसका नफसियाती असर तो नाकाबिल तसवुर होगा।
नाकाबिले तसवुर हैकले सुलेमानी जो 400 साल से शहर की शान था उसे जलाकर राख कर दिया गया। शाही महल तबाह कर दिया गया। शहर की दीवारें गिरा दी गई और सबसे बढ़कर ताबूत सकीना वह हमेशा के लिए गायब हो गया। तो यह सफर जो एक यबूसी किले से शुरू हुआ था एक अजीम सल्तनत के मुकद्दस मरकज से होता हुआ आखिरकार राख और वीरानी पर खत्म हुआ। यह फतह सकाफती मिलाप, अजीम तामीर, एक ताकतवर नजरिए और बिल आखिर मुकम्मल तबाही की कहानी है।
मंतकी तौर पर यह यरूशलम की कहानी का खात्मा होना चाहिए था। हेकल की तबाही का मतलब यह हुआ कि शिकस्त थी। ऐसा लगता था कि अफरातफरी जीत गई और सयन का वादा एक फरेब था। सब कुछ खत्म हो गया था। या कमस कम उस वक्त सबको यही लगा। लेकिन जैसा कि हम अपनी अगली गुफ्तगू में देखेंगे यरूशलेम की कहानी खत्म होने से बहुत दूर थी। शहर की यह तबाही एक खात्मा नहीं बल्कि एक नई शुरुआत थी। एक ऐसी तब्दीली जिसने इस शहर के मायने को हमेशा के लिए बदल दिया। इस जलावतनी के दौर ने कैसे नए नजरियात को जन्म दिया यह हमारी अगली गुफ्तगू का मौजू होगा।
अच्छा तो पिछली बार जब हम बात कर रहे थे तो हम यरूशलम की शानो शौकत और उसके पहले माबत की अजमत में जैसे खो गए थे। जी वो जगह जिसे कायनात का मरकज माना जाता था। बिल्कुल। आज हम उसी कहानी का अगला और शायद सबसे तारीख बाप देखने जा रहे हैं। आज हम उस दौर की बात करेंगे जब वह अजीम शहर मलबे का ढेर बन गया। उसके लोगों को जबरदस्ती बाबिल ले जाया गया और फिर उनकी वापसी और तामीर नौ की एक बहुत ही पेचीदा कहानी शुरू हुई। और यही आज की गुफ्तगू का मरकज है।
जी सवाल यह है कि जब किसी कौम का सब कुछ उनका मुकद्दस मरकज तक छीन जाए तो वो खुद को कैसे जिंदा रखती है? और उस राख से कौन से नए ख्यालात जन्म लेते हैं? आज की हमारी गुफ्तगू का मेहवर सीक्रेट स्पेस एंड स्पिरिचुअल एग्जाइल इन एंशिएंट जेरूसलम का पांचवा बाप एग्जाइल एंड रिटर्न है। और यह वाकई कहानी का एक अहम मोड़ है। जी यह सिर्फ तारीख का एक वाक्या नहीं है कि एक शहर तबाह हुआ और फिर बन गया। यह वो लम्हा था जहां यहूदियत ने अपनी बका के लिए खुद को आप कह सकती हैं कि नए सिरे से इजाद किया। पी के एहसास में मुंतकिल हुआ। यह एक ऐसी तब्दीली थी जिसके असरात आज तक मौजूद हैं।
तो चल उस तबाही के मंजर से ही शुरू करते हैं। जो तस्वीर हमें जराय से मिलती है वो सिर्फ एक शहर की शिकस्त नहीं लगती। नहीं बिल्कुल नहीं। ऐसा लगता है जैसे पूरी कायनात ही उलटपलट गई हो। बिल्कुल। जिंदा बच जाने वालों के लिए यह दुनिया का खात्मा था। यह सिर्फ इमारतों का गिरना नहीं था। यह उनकी पूरी हकीकत का खात्मा था। जो दर्द शायराना तहरीरों में बयान हुआ है वो रोंगटे खड़े कर देता है। आप तसवुर करें बाबली फौजी माबद में घुस रहे हैं और उनकी कुल्हाड़ियों की आवाजें देवेदार के खूबसूरत तख्तों पर पड़ रही हैं। यह आवाजें उनके दिलों पर लग रही थी और इसके बाद जो नफरत और इंतकाम का जज्बा पैदा हुआ वो भी इतना ही शदीद था कि वो दुआएं मांगते थे कि काश वो बाबिली बच्चों के सर पत्थरों पर पटक सकें। यह तो एक नाकाबिले तसवुर नफ्सियाती चोट है।
तो जो लोग इस तबाही से बच गए उनकी क्या हालत थी? उनकी हालत यूं समझे कि मुर्दों से बदतर थी। वो जिंदा तो थे लेकिन उनकी रूह मर चुकी थी। वो खुद से नफरत करने लगे थे। जरा यह बताते हैं कि जो अमीर लोग कभी रेशम और मखमल में रहते थे, वह अब कचरे के ढेरों से खाना चुन रहे थे। और सबसे होलनाक तस्वीर जो पेंट की गई है जी कि माएं भूख की शिद्दत से अपने बच्चों को उबालकर खाने पर मजबूर हो गई। जेरूशलम जो कभी पाकीजगी की अलामत था अब शर्मिंदगीगी और जिल्लत का एक निशान बन चुका था।
और इसका मजहब पर क्या असर पड़ा होगा? मतलब अगर किसी का अकीदा यह है कि खुदा उसके मुकद्दस शहर में रहता है और वह शहर तबाह हो जाए। तो फिर खुदा कहां है? बिल्कुल। यही तो सबसे बड़ा बोहरान था। यह एक डिक्रिएशन थी। यानी तखलीक का अमल उलट गया था। जैसे नूह के जमाने में तूफान ने खुदा की बनाई हुई दुनिया को खत्म कर दिया था। वैसे ही इस तबाही ने उनकी दुनिया को खत्म कर दिया। और कदीम सोच के मुताबिक माबद के बगैर खुदा से राब्ता तो मुमकिन ही नहीं था। जी।
लेकिन यहां एक बहुत ही हैरानक नुक्ता सामने आता है। बाइबल के मुसन्नफिन इस तबाहीता इल्जाम बाबलियों पर नहीं डालते। एक मिनट वह हमलावरों को जिम्मेदार नहीं ठहराते तो फिर किसे? वह खुद अपने खुदा यहोवा को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका नजरिया यह था कि यह सजा खुद यहोवा ने उनके गुनाहों के वजह से दी थी। यह बाबलियों की ताकत नहीं थी बल्कि यह उनके खुदा का गुस्सा था जिसने उनके शहर को तबाह किया। इस एक सोच ने उनके अकीदे को मुकम्मल तौर पर टूटने से बचा लिया। बिल्कुल। उनका खुदा हारा नहीं था बल्कि वो इंसाफ कर रहा था।
तो इस मुकम्मल तबाही और मायूसी के बाद बच जाने वालों को जबरदस्ती बाबल ले जाया गया। जब हम जलावतनी का सोचते हैं तो ज़हन में गुलामी और जंजीरों का तसवुर आता है। क्या वहां उनकी जिंदगी ऐसी ही थी? दरअसल नहीं। और यह इस कहानी का एक और दिलचस्प मोड़ है। यर्मिया नबी ने उन्हें नसीहत की थी कि बाबल जाकर घर बनाओ, बाग लगाओ, शादियां करो और उस शहर की भलाई के लिए दुआ करो। और उन्होंने ऐसा ही किया। जी उन्होंने ऐसा ही किया। वो बाबली मुआशरे में बहुत अच्छी तरह घुलमिल गए। उन्हें जमीन खरीदने, अपना कारोबार चलाने और यहां तक कि शाही दरबार में आला ओहदे हासिल करने की भी इजाजत थी। वाकई तो यह कोई कैदखाना नहीं था।
बिल्कुल नहीं। बल्कि एक दिलचस्प हकीकत यह है कि वह जिस इलाके में आबाद हुए उसका नाम उन्होंने तलबीब रखा जो एक मकामी बाबली नाम का इब्रानी तर्जुमा था। तो जाहिरी तौर पर वो काफी खुशहाल थे। जी। लेकिन इस जाहिरी खुशहाली के पीछे एक बहुत गहरा रूहानी और सकाफती चैलेंज छुपा हुआ था। और वो चैलेंज क्या था? वो चैलेंज था बाबिल शहर खुद। बाबिल उस वक्त दुनिया का सबसे शानदार शहर था। फलक बोस इमारतें, मोहल्ले बागात और सबसे बढ़कर 55 अजीमो शान मंदिर। 55 मंदिर जी जो उनके देवता मर्दूक और दीगर देवताओं के लिए बने थे। अब एक जला वतन के नुक्त नजर से सोचें। आप एक तबाहशुदा शहर से आए हैं। आपका मबद मलबे का ढेर है। और यहां आप एक ऐसा शहर देख रहे हैं जो ताकत और दौलत से चमक रहा है। ज़हन में तो यही सवाल आएगा कि क्या हमारा खुदा हार गया है? क्या मरदूक यहोवा से ज्यादा ताकतवर है? यह तो ईमान को जड़ से हिला देने वाली बात है।
बिल्कुल। और बहुत से लोगों का ईमान डगमगा भी गया। कुछ ने मकामी देवताओं को अपनाना शुरू कर दिया। लेकिन एक ग्रोह था जिसे हम डटेरोनॉमिस कहते हैं। उन्होंने बका का एक नया रास्ता निकाला। और वो क्या था? उनका कहना था कि अगर हमने बाबुल के सखा मेल्टिंग पॉट में अपनी शनाख्त बचानी है तो इसका एक ही तरीका है मूसा के कानून पर पहले से भी ज्यादा सख्ती से अमल करना। अच्छा। यानी खुद को दूसरों से अलग करके अपनी शनाख्त को मजबूत करना। जी हां। इसी दौर में कुछ रिवायत पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाने लगा जो उन्हें दूसरों से मुमताज करती थी। जैसे खतना, सब यानी हफ्ते के दिन मुकम्मल आराम करना और खानेपीने के मखसूस कवानीन। तो यह चीजें अब सिर्फ मजहबी अहकामात नहीं रही। नहीं। यह उनकी कौमी शनाख्त और बका की अलामत बन गई। वो इन कवानीन पर अमल करके खुद को एक मुकद्दस और अलग कौम के तौर पर कायम रख रहे थे। चाहे वो एक गैर मुल्क में ही क्यों ना रह रहे हो।
तो एक तरफ वो मुआशरे में घुलमिल रहे थे और दूसरी तरफ अपनी मजहबी शनाख्त को और भी पक्का कर रहे थे। लेकिन माबद के बगैर इबादत कैसे मुमकिन थी? क्या कानून पर अमल करना ही काफी था? यही वो सवाल था जिसका जवाब एक और हैरानक वाक्य से मिला। हिज की ऐ नामी एक काहिन जो खुद भी जलावतन था को बाबिल में एक ऐसा नजारा हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया। अच्छा उसने खुदा को देखा लेकिन यरूशलम में नहीं बाबिल की सर जमीन पर और खुदा किसी इमारत में कैद नहीं था बल्कि एक बहुत बड़े आसमानी रथ पर सवार था जिसे करूबी फरिश्ते खींच रहे थे एक रथ रथ का काम तो हरकत करना होता है तो क्या क्या इसका मतलब यह था कि खुदा अब यरूशलम में कैद नहीं था जी बिल्कुल वो अपने लोगों के साथ सफर कर सकता था यहां तक के बाबेल की अजनबी सर जमीन पर भी यह उस वक्त के लिए एक धमाका ख्याल था। एक इंकलाबी ख्याल जी। उसने जलावतनी के तसवुर को सजा से बदलकर एक नए रूहानी मरकज में तब्दील कर दिया। हुजिकियल ने बाद में यह भी कहा कि खुदा की शान या जलाल यरूशलम को वहां के लोगों के गुनाहों की वजह से छोड़कर जला वतनों के पास आ गया है। यानी असल मुकद्दस लोग वो थे जो जलावतनी में थे। सही वो नहीं जो यहूदा में रह गए थे बल्कि वो जो जलावतनी में खुदा के साथ थे। इस एक नजारे ने उनकी पूरी दुनिया को एक नया मतलब दे दिया। यह तो बहुत गहरी बात है।
तो क्या मुकद्दस होने का तसवुर एक जगह से निकलकर लोगों के साथ जुड़ गया? जी। और इसी सोच को कहानों की तहरीरों जिन्हें पी राइटिंग्स कहा जाता है में मजीद आगे बढ़ाया गया। इन तहरीरों में भी खुदा को एक मुतहरिक हस्ती के तौर पर दिखाया गया जो सेरा में अपने लोगों के साथ खमे में सफर करता था और उन्होंने रोजमर्रा की जिंदगी को मुकद्दस बना दिया। बिल्कुल मिसाल के तौर पर खाने में दूध और गोश्त को अलग रखने जैसे अहकामात को खुदा के तखलीकी अमल की नकल करार दिया गया है। यानी खाना पकाना भी एक किस्म की इबादत बन गया। एक तरह से हां जैसे खुदा ने कायनात बनाते वक्त अफरातफरी में तरतीब पैदा की थी चीजों को एक दूसरे से अलग किया था वैसे ही इंसान अपनी रोजमर जिंदगी में चीजों को अलग और तरतीब में रखकर खुदा के तखलीकी काम में हिस्सा ले सकता है। तो इस तरह जलावतन लोग बगैर माबद के भी अपने घरों में एक मुकद्दस जगह बना सकते थे। जी यरूशलम अब सिर्फ एक शहर नहीं रहा वो एक अंदरूनी कैफियत एक इंटरनलाइज्ड वैल्यू बन गया और निजात का तसवुर भी बदल गया। अब सिर्फ एक नया शहर और माबद बनाना काफी नहीं था। नहीं बल्कि एक रूहानी तब्दीली की जरूरत थी। यर्मिया और हिजकियल दोनों ने पेशगोई की कि खुदा लोगों को पत्थर के दिल की जगह गोश्त का दिल देगा। एक नया दिल और एक नई रूह अता करेगा। निजात अब बाहर से नहीं अंदर से आनी थी।
और फिर अचानक तारीख ने करवट ली। फारस के बादशाह साइरस का ज़हूर हुआ। जी साइरस ने बाबुल को फतह कर लिया और जलावतनों के लिए यह एक मौजजे से कम नहीं था। दूसरे यशाया नामी एक नबी ने तो साइरस को मसीहा यानी खुदा का मुंतखिब करदा करार दे दिया। अच्छा। याकूत और कीमती पत्थरों से बनेंगी। उसके दरवाजे चमकेंगे और दुनिया की तमाम कौमे जंजीरों में जकड़ी हुई वहां लाई जाएंगी। वाह एक जबरदस्त और शानदार वापसी का ख्वाब देखा जा रहा था। जी।
तो जब सायरिस ने 538 कब्ल मसीह में उन्हें वापस जाने की इजाजत दी तो हकीकत कैसी थी? क्या यरूशलम वाकई हैरों से चमक रहा था? हकीकत। हकीकत गर्द और मलबे पर मुश्तमिल थी। वो एक वीरान, उजाड़ और गरीब सूबा था। वो शानदार सरजमी नहीं थी जिसकी कहानियां उन्होंने अपने वालदैन से बाबिल में सुनी थी। यह एक बहुत बड़ी मायूसी थी और यह मायूसी उस वक्त और बढ़ गई होगी जब दूसरे मोहब्बत की बुनियादें रखी गई। बिल्कुल वो एक बहुत अजीब मंजर था। जो नौजवान नस्ल थी जो जलावतनी में पैदा हुई थी। वो खुशी से नारे लगा रही थी कि चलो हमारा माब दोबारा बन रहा है। लेकिन जो बूढ़े लोग थे जो बूढ़े लोग थे जिन्होंने अपनी आंखों से सुलेमान का अजीम शान मोहब्बत देखा था। वो बुलंद आवाज से रो रहे थे। रो रहे थे। जी। वो इसलिए रो रहे थे कि यह नया माबद इस पुराने माबद के सामने एक मामूली सी झोपड़ी जैसा था। जराय बताते हैं कि खुशी के नारों और गम के रोने की आवाज में फर्क करना मुश्किल था। यह उम्मीदों और हकीकत के टकराव का एक दिलखराश लम्हा था।
इस मायूसी के साथ-साथ क्या आपस में भी कोई झगड़े शुरू हुए? जी और यह इस कहानी का एक और अलमिया है। जुबाबुल जो वापस आने वालों का रहनुमा था उसने एक ऐसा फैसला किया जिसने मुस्तकबिल पर गहरे असरात छोड़े। जब मकामी लोग यानी वो यहूदी जो जलावतनी में नहीं गए थे। जिन्हें अम्हाहा अरस यानी जमीन के लोग कहा जाता था। बिल्कुल। जब उन्होंने माबद की तामीर में मदद की पेशकश की। यह तो अच्छी बात थी। मिलकर काम करते। लेकिन जरूरबाबल ने उनकी पेशकश को सख्ती से ठुकरा दिया। उसने कहा कि सच्चा इसराइल सिर्फ वो लोग हैं जो बाबुल की जलावतनी की आजमाइश से गुजर कर आए हैं। उसने मुकामी बाशिंदों को जो इन्हीं के भाई बंद थे दुश्मन करार दे दिया। लेकिन इसके नुक्ता नजर से क्या यह एक जरूरी कदम नहीं था? वो शायद इस खालिस शिनाख्त को बचाने की कोशिश कर रहा था जो उन्होंने इतनी मुश्किल से जलावतनी में कायम की थी। आपकी बात बिल्कुल दुरुस्त है। इसका जवाज यही था। उसे यह डर था कि यह मुकामी लोग जिन्होंने शायद दूसरी कौमों में शादियां कर ली थी उनकी शनाख्त को कमजोर कर देंगे। तो इसने इत्तहाद पर पाकीजगी को तरजीह दी। जी। और इसका नतीजा यह निकला कि मुल्क में अमन कायम होने के बजाय एक नया और गहरा समाजी झगड़ा शुरू हो गया। यरूशलम जो इत्तेहाद की अलामत बन सकता था। अब तफरीके और तकसीम की वजह बन गया।
इस इब्तदाई तामीरे नौ के तकरीबन 70 साल बाद कहानी में दो नए और बहुत ताकतवर किरदार दाखिल होते हैं। नेहमिया और एजरा। जी हां, नेहमिया फारसी बादशाह का साखी था। एक बहुत बा असर ओहदा। जब उसे खबर मिली कि इतने साल गुजरने के बाद भी यरूशलम की दीवारें टूटी हुई हैं, तो वह कई दिन तक रोता रहा। और उसने बादशाह से इजाजत लेकर यरूशलम की दीवारें तामीर करवाई। मैंने पढ़ा है कि यह काम हैरतंगेज तौर पर बहुत जल्दी मुकम्मल हो गया था। सिर्फ 52 दिनों में यह एक नाकाबिले यकीन कामयाबी थी। लेकिन इस दौरान खतरे का यह आलम था कि हर मजदूर एक हाथ में औजार रखता था और दूसरे हाथ में तलवार। हर वक्त हमले का खतरा रहता था। जी। लेकिन नेमिया ने सिर्फ पत्थर की दीवारें नहीं बनाई। उसने समाजी दीवारें भी खड़ी की। समाजी दीवारें इससे आपकी क्या मुराद है? उसने मखलू शादियों के खिलाफ इंतहाई सख्त कवानीन नाफिज किए। उसने हुकुम दिया कि मुकद्दस नस्ल को गैर कौमों यानी गोयम से बिल्कुल अलग रखा जाए। यह वही जलावतनी वाला मुकद्दस जग्राफिया का तसवुर था जिसे अब समाजी सतह पर नाफिज किया जा रहा था।
और उसके बाद एजरा आया। जी। उजरा जो एक आलिम और कानून का माहिर था। उसने यरूशलम आकर तरात यानी मूसा के कानून को इस सरजमी का सरकारी कानून करार दे दिया। और लोगों का रद्दे अमल कैसा था? एक बहुत बड़े इज्तमा में उजरा ने सुबह से दोपहर तक लोगों को कानून पढ़कर सुनाया। लोग इससे इतने मुतासिर हुए कि वो रो पड़े। उन्हें एहसास हुआ कि वो खुदा के कानून से कितना दूर हो गए थे। लेकिन इस कानून पर अमल दरामद का
एक बहुत सख्त नतीजा भी निकला। जी बहुत तकलीफ दे। उज़रा के हुक्म पर उन तमाम मर्दों को जिन्होंने गैर मुल्की औरतों से शादियां की थीं, मजबूर किया गया कि वो अपनी बीवियों और उनसे पैदा होने वाले बच्चों को अपनी बिरादरी से निकाल दें। इसने तो बहुत से खानदानों का तोड़ दिया होगा। बिल्कुल।
तो इस दौर के आखिर में एक नया इसराइल वजूद में आ चुका था। एक ऐसा इसराइल जिसकी रुकनियत अब पैदाइश पर नहीं बल्कि नजरिए पर मबनी थी। अब इसराइल का हिस्सा सिर्फ वो लोग थे जो या तो बाबिल से जलावतन होकर आए थे या फिर वह जो तरात के कानून को मुकम्मल तौर पर मानने के लिए तैयार थे। जी और उसने यरूशलम की तारीख में दूसरों को खारिज करने का एक नया रुझान पैदा किया जो इसराइल की कुछ पुरानी और वसी रिवायत के खिलाफ था।
तो अगर हम आज की गुफ्तगू का खुलासा करें तो यरूशलम की तबाही जो एक नाकाबिल तसवुर अलमिया था। दरअसल एक गहरी रूहानी तब्दीली का बायस बनी। जी। मुकद्दस जगह का तसवुर एक इमारत से निकलकर कवानीन, रोजमर्रा की रुसुमात और एक अलग थलग कम्युनिटी के एहसास में ढल गया। इस पूरे अमल ने यहूदियत को वो शक्ल दी जिसे हम आज जानते हैं। एक ऐसी शक्ल जो यहूदा की सरजमीन पर नहीं बल्कि बाबल की जलावतनी की भट्टी में तैयार हुई। बिल्कुल। लेकिन जैसा कि हमने देखा खुद को बचाने की इस कोशिश में उन्होंने दूसरों के लिए दरवाजे बंद कर लिए और यही चीज आगे चलकर बहुत से नए तनाजात की बुनियाद बनी। बिल्कुल और यह नई मजबूत और कदरे अलग-थलग शनाख्त अब एक नए और बहुत ताकतवर चैलेंज का सामना करने वाली थी। अगली बार जब हम मिलेंगे तो हम बाबे शशम का जायजा लेंगे और देखेंगे कि सिकंदर आजम की फतूहात के बाद जब इस नई यहूदी शनाख्त का तसादुम यूनानी सकाफत यानी हेलेनिज्म की पुरकशिश और ताकतवर लहर से होता है तो क्या होता है?
पिछली बार हमने अपनी बात वहां खत्म की थी जहां रोमन जनरल पमपे यरूशलम के दरवाजे पर खड़ा था और इसके कब्जे के साथ ही हसम्मोनी सल्तनत का सूरज इम हमेशा के लिए गुरूब हो गया। आज हम वहीं से इसी धूल और अफरातफरी से अपनी कहानी को आगे बढ़ाएंगे। जी बिल्कुल। हम देखेंगे कि किस तरह पमपे की फतह ने एक ऐसे सिलसिले को जन्म दिया जिसमें हेरोजियस जैसा तामीराती जुनूनी बादशाह उभरा फिर शहर का मुकद्दस तरीन मकाम यानी हैकल तबाह हो गया और आखिरकार यरूशलम को मिटाकर इसकी राख पर एक नया रोमी शहर एलिया कापुतलीना तामीर कर दिया गया और यह सिर्फ शहर की नहीं बल्कि अकीदे की बका की कहानी भी है।
यह दौर इसलिए भी गैर मामूली तौर पर अहम है क्योंकि इसने सिर्फ शहर की ईंटों और पत्थरों को नहीं बदला। सही। बल्कि उसने यहूदियत और उस वक्त उभरती हुई ईसाइयत दोनों को अपनी रूहानी शनाख्त की बुनियादों पर आप कहें कि नजर सानी करने पर मजबूर कर दिया। मतलब जब इबादत का मरकज ही ना रहे, तो इबादत कैसे की जाए? बिल्कुल। खुदा से रिश्ता कैसे जोड़ा जाए? इन सवालों के जवाब इसी दौर में तलाश किए गए। तो आइए इस दौर की गहराई में उतरते हैं।
इसका आगाज एक फाते जनरल के उस हुक्म से हुआ कि यरूशलम की दीवारें गिरा दी जाए। जी। पम्पी ने शहर की सियासी हैसियत तो खत्म कर दी। लेकिन उसने एक ऐसा खला भी पैदा कर दिया जिसे भरने के लिए कई ताकतें बेचैन थी। और उसी खला में से एक खानदान ने सर उठाया। एंटीपैटर और उसके बेटे। जी यह लोग सियासी शतरंज के माहिर थे और जानते थे कि रूम की ताकत के साथ कैसे चलना है। अपनी इसी वफादारी और चालाकी की वजह से वो इ्तेदार की सीढ़ियां चढ़ते गए। और उसी खानदान से हेरोदिस निकला। एक ऐसा किरदार जिस पर तारीख आज भी हैरान है।
रोमन सेनेट ने उसे 39 कब मसीह में यहूदियों का बादशाह तो बना दिया लेकिन उसे अपना शहर फतह करने के लिए खूनी जंग लड़नी पड़ी। जी। 37 कब मसीह में एक खौफनाक कत्लेआम के बाद उसने यरूशलम पर कब्जा किया। उसकी शख्सियत में बहुत तजाद था। अच्छा वो एक काबिले मुंतजम था। लेकिन साथ ही इंतहाई शकी और बेरहम भी उसने अपनी कानूनी हैसियत कायम करने के लिए आखिरी हासमोनी शहजादी मरियम से शादी की। यानी अपनी लेजिटिमसी के लिए जो उसे पैदाइशी तौर पर हासिल नहीं थी। बिल्कुल।
लेकिन साथ ही उसने एक ऐसा कदम उठाया जो पहले कभी नहीं उठाया गया था। उसने अपनी मर्जी से आला कायनों को मुकर्रर और मौजूल करना शुरू कर दिया। जिससे उसने मुकद्दस तरीन मंसब को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया। तो एक तरफ तो वह इतना जालिम हुक्मरान है। लोगों को कत्ल करवा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ तारीख के सबसे शानदार तामीराती मंसूबे भी शुरू कर रहा है। यह क्या सिर्फ शानो शौकत का दिखावा था या उसके पीछे कोई गहरी सियासी चाल थी? यह बहुत बेहतरीन नुक्ता है।
उसके तामीराती मंसूबे सिर्फ इमारतें नहीं थे। वो सियासी बयानात थे। अच्छा। उसने यरूशलम को मशरिक के अजीम शहरों की कतार में ला खड़ा किया। एंटोनिया का किला, मगरबी पहाड़ी पर उसका अपना महल, थिएटर, हिपोड्रोम यह सब रोमन तर्ज के शाहकार थे। लेकिन उसने एक चालाकी यह की कि यरूशलम शहर के अंदर कभी कोई काफिराना मंदिर नहीं बनने दिया। हम ताकि यहूदी आबादी नाराज ना हो। अलबत्ता फस्तीन के दूसरे इलाकों में उसने रोमी देवताओं और शहंशाह ऑगस्टस के एजाज में मंदिर तामीर करवाए ताकि रोम भी खुश रहे। वो बेवक़ दो कश्तियों का सवार था और उसका सबसे बड़ा शाहकार था हैकल की अजरे नौ तामीर।
यह तो एक बहुत ही हसास मामला रहा होगा है ना। बहुत ज्यादा। लोग कैसे राजी हुए कि एक ऐसा शख्स जिसे वो गासब समझते थे उनके मुकद्दस तरीन मकाम को हाथ लगाए। यही तो उसकी जहानत का सबूत है। लोगों को खतशा था कि कहीं वह पुराना हैकल गिरा दे और नया तामीर ही ना करे। हम हिरोलस ने इस खौफ को दूर करने के लिए पहले तामीराती सामान इकट्ठा किया और फिर 1000 कानों को मेमार और बढ़ाई की तरबियत दी ताकि वह मुकद्दस इलाकों में खुद काम कर सके। अच्छा। उसका नतीजा यह निकला कि हैकल में रोजाना की इबादत एक दिन के लिए भी नहीं रुकी। तो तसलसुल बरकरार रहा। जी। इसी तसलसुल की वजह से इसकी इमारत को दूसरा हैकल ही कहा जाता रहा। हालांकि तकनीकी तौर पर यह तीसरा था।
जराय में जोजिफस ने इस हैकल की जो तफसील लिखी है वह तो हैरानक है। वह कहता है कि यह दूर से बर्फ से ढके पहाड़ जैसा लगता था। यह कैसी तस्वीर कशी है? जुजीफस की तफसीलात में शायद थोड़ा मुबालगा हो। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि यह इस दौर की अज़म तरीन इमारतों में से एक थी। इसकी बैरूनी दीवारें सफेद संगमरमर की थी और मुकद्दस मकाम पर इतना सोना लगा था कि जब सूरज की रोशनी उस पर पड़ती तो आंखें चौंधी आ जाती।
लेकिन आपने कहा कि इसकी जाहिरी खूबसूरती से ज्यादा इसकी अलामती अहमियत थी। जी बिल्कुल। हैकल को कायनात का एक छोटा नमूना एक माइक्रोकोजम समझा जाता था। यह माइक्रोकोजम का तस्सवुर बहुत दिलचस्प है। इसका क्या मतलब था? इसका मतलब यह था कि हैकल का पूरा डिजाइन कायनात और खुदा से इंसान के रिश्ते की अकासी करता था। इसके सहन बदतरीज पाकीजगी की तरफ ले जाते थे। कैसे? सबसे बाहर गैर यहूदियों का सहन था जहां कोई भी आ सकता था। उसके बाद बनी इसराइल के मर्दों का सहन। फिर औरतों का और आखिर में काहनों का सहन जहां कुर्बानी की कुर्बानगाह थी। तो हर कदम आपको खुदा के करीब ले जा रहा था। जी बिलकुल। और इन सब के मरकज में था कुदुसुल अकतास।
जराय बताते हैं कि यह एक भारी पर्दे के पीछे छुपा हुआ था, और अंदर से बिल्कुल खाली था। इस खाली जगह का क्या मकसद था? वह खाली जगह ही सबसे बड़ा पैगाम थी। वह उस नाकाबिल बयान हकीकत की अलामत थी, जिसे ना तो देखा जा सकता है, ना ही किसी शक्ल में कैद किया जा सकता है। अच्छा। यह उस बात की याद दिहानी थी कि खुदा की असल हकीकत हमारी समझ और तसवुर से बहुत बालातर है।
तो इसका मतलब यह है कि यह हेकल सिर्फ एक इबादतगाह नहीं था। यह तो पूरी यहूदी कौम की जिंदगी का मरकज था। बिल्कुल। ईद फसा और सकूत जैसे बड़े त्यौहारों पर जराय के मुताबिक लाखों ज़ायरीन यरूशलम आते थे। अब तसवुर करें शहर की आबादी कई गुना बढ़ जाती होगी। यह तो बहुत बड़े समाजी इज्तात भी होते होंगे। जी बिल्कुल। यह सिर्फ मजहबी रसुमात नहीं थी बल्कि सल्तनत के कोने-कोने से आए हुए लोग मिलते खुशियां मनाते और एक कौम होने के एहसास को मजबूत करते थे।
लेकिन क्या सब लोग इस बात पर मुत्तफिक थे कि खुदा तक पहुंचने का वाहिद रास्ता यही हैकल है या कोई मुतबादिल नजरियात भी मौजूद थे? जी। यह एक बहुत अहम सवाल है। हैकल मरकजी हैसियत तो रखता था। लेकिन कुछ गिरोह खुदा से ताल्लुक के दूसरे रास्ते भी तलाश कर रहे थे। मसलन मिसाल के तौर पर फरीशियों का गिरोह अपने घरों को हैकल की तरह मुकद्दस समझता था। वो अपने खाने की मेज को कुर्बानगाह का दर्जा देते थे। और बहीरा मुरदार के करीब कुमरान की कम्युनिटी तो खुद को ही एक नया रूहानी हैकल मानती थी। जिसकी बुनियाद इंसान थे पत्थर नहीं।
तो इसका मतलब है कि रूहानियत के नए तसवुरात जन्म ले रहे थे। लेकिन इसी दौरान रूम के खिलाफ सियासी मुजाहमत भी तो बढ़ रही होगी यकीनन और इस मुजाहमत का मरकज भी अक्सर हैकल ही बन जाता था। हिरोदियस की मौत से कुछ अरसा कब एक वाकया हुआ। कौन सा वाकया? उसने अपनी ताकत के इजहार के लिए हैकल के मरकजी दरवाजे पर रोम का शाही उकाब नसब करवा दिया। ओ यह तो यहूदियों के लिए नाकाबिल बर्दाश्त होगा। बिल्कुल। उनके मुकद्दस तरीन मकाम पर एक काफराना और सियासी अलामत। दो असातजा और उनके शागिर्दों ने रात के वक्त कुल्हाड़ियों से उस औकाब को काट डाला।
फिर क्या हुआ? हिरोदिस ने मरने से पहले उन सबको जिंदा जला देने का हुकुम दिया। यह वाकया जाहिर करता है कि हैकल की हुरमत कितनी हसास थी। हेरोदिस की शख्सियत इतनी बड़ी थी कि उसके बाद तो एक खला पैदा हुआ होगा। उसकी मौत के बाद क्या हुआ? बदकिस्मती से बिल्कुल वही हुआ। उसके बेटे आर्कलाउस में ना तो वह सलाहियत थी और ना ही वह सिफारती चालाकी। उसने क्या किया? उसने आते ही ईद फसा के मौके पर हैकल के सहन में 3000 लोगों का कत्लेआम करवा दिया। 3000 जी। जिससे रोम को बराहेरास्त मुदाखलत का बहाना मिल गया और यहूदिया सीधा रोमी गवर्नरों यानी प्रेफेक्ट्स के कंट्रोल में चला गया। यरूशलम की सुबाई दारुल हुकूमत की हैसियत भी खत्म हो गई। और उसी दौर में पोंटियस पिलातस गवर्नर बनकर आया जिसका नाम तारीख में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। जी और उसने भी आते ही लोगों के जज्बात को भड़काया। उसने कैसर की तस्वीर वाले फौजी झंडे रात के अंधेरे में यरूशलम भिजवा दिए। यह तो जानबूझकर इश्तियाल अंगेजी है। थी है ना? बिल्कुल। क्योंकि यहूदी शरीयत में इंसानी तस्वीर बनाना मना है।
लेकिन इस बार यहूदियों ने तशद्दुद नहीं किया बल्कि हजारों की तादाद में पुर अमन तरीके से कैसरिया तक मार्च किया। और वहां जाकर क्या किया? पिलातस के महल के सामने पांच दिन तक धरना दिया। जब पिलातस ने उन्हें फौज से डराया तो उन्होंने अपनी गर्दनें आगे कर दी और कहा कि वह मरने को तैयार हैं। लेकिन अपने कानून की बेहुरमती बर्दाश्त नहीं करेंगे। कमाल है। उनके इस अज्म के आगे पिलातस को पीछे हटना पड़ा। और इसी सियासी और मजहबी तौर पर आप कहें कि चार्ज माहौल में तकरीबन 30 ईसवी में युसु यरूशलम में दाखिल हुए।
उनका हैकल में सर्राफों और कबूतरफरोशों की चौकियां उलट देना एक बहुत मशहूर वाक्या है। क्या यह सिर्फ वहां होने वाली तिजारत के खिलाफ एक एतेजाज था? जराय के मुताबिक यह इससे कहीं ज्यादा गहरी बात थी। देखें हेकल में करेंसी तब्दील करना और कुर्बानी के जानवर बेचना निजाम का एक जरूरी हिस्सा था। क्यों? क्योंकि बाहर से आने वाले सिक्कों को रूमी तस्वीरों की वजह से नापाक समझा जाता था। यसु का अमल दरअसल एक अलामती पेशगोई थी। किस चीज की पेशगोई? वो यह कह रहे थे कि यह इंसानी हाथों से बना हेकल यानी हेदिस का हेकल जल्द ही तबाह हो जाएगा और उसकी जगह एक ऐसा माबद लेगा जो इंसानी हाथों से नहीं बना होगा यानी एक रूहानी हेकल ईद फिजा के मौके पर जब लाखों का मजमा हो ऐसा अलामती अमल तो बहुत खतरनाक समझा गया होगा बिल्कुल हुकाम को खौफ था कि ऐसी इश्तियाल अंगेजी से फसादात फूट पड़ेंगे और रोम मुदाखलत करेगा इसीलिए यसु को गिरफ्तार करके पिलातिस के हवाले कर दिया गया और उन्हें शहर के बाहर गोलगोथा की पहाड़ी पर मसलूब कर दिया गया।
उनके बाद उनके पैरोकारों का क्या बना? क्या उन्होंने खुद को यहूदियत से अलग कर लिया? शुरू में बिल्कुल नहीं। उनके इब्तदाई पैरोकार जिन्हें जराय में गरीब या एयनम कहा जाता है। वो मुकम्मल तौर पर यहूदी रिवायत पर अमल पैरा थे। अच्छा। वो रोजाना हैकल में इबादत करते थे और खुद को यहूदियत के अंदर ही एक इस्लाही तहरीक के तौर पर देखते थे। उनके लिए युसु एक नया मजहब लाने वाले नहीं थे। यह नुक्ता बहुत अहम है क्योंकि इसके फौरन बाद पॉलिस की आमद होती है जो इस पूरी सोच को 180 डिग्री पर बदल देते हैं। जी पॉलिस का नजरिया इंकलाबी था। उसका मानना था कि यीशु की कुर्बानी ने तरात की जगह ले ली है और अब निजात के लिए यहूदी कवानीन पर अमल करना जरूरी नहीं। यानी खतना या खानेपीने की पाबंदियां वगैरह। जी। उसके नजदीक मानने वालों की जमात ही नया रूहानी हैकल थी। यह एक ऐसी सोच थी जिसने यरूशलम के जुग्राफियाई और मजहबी मरकज के तसवुर को ही चैलेंज कर दिया। जाहिर है इससे यरूशलम में मौजूद युसू के असल पैरोकारों और पॉलिस के दरमियान शदीद इख्तलाफात पैदा हुए होंगे। जी और यह इख्तलाफात बढ़ते गए।
लेकिन इन अंदरूनी मजहबी बहसों के साथ-साथ रोम के खिलाफ नफरत भी उरूज पर पहुंच रही थी। आखिरकार 66 ईसवी में जब रोमी गवर्नर फ्लोरस ने हेकल के खजाने से जबरदस्ती रकम जब्त की तो वह आखिरी चिंगारी साबित हुई। बिल्कुल। वो चिंगारी जिसने पूरे यहूदिया को आग लगा दी। एक अजीम बगावत फूट पड़ी। और इस बगावत का अंजाम बहुत बहुत तबाकुन हुआ। बहुत ज्यादा। 4 साल तक एक वैशाना जंग जारी रही। आखिरकार 70 ईसवी में रोमी जनरल टाइटस जो बाद में शहंशाह बना उसने यरूशलम का मुहासरा कर लिया।
जोजिफस जो खुद इस जंग का चश्मदीद गवाह था वो क्या लिखता है? है। वो लिखता है कि शहर में कैद और खाना जंगी से हालात नाकाबिले बयान हद तक खराब थे। और फिर वो दिन आया जब रोमी फौजी हेकल में दाखिल हुए। जी 28 अगस्त को रोमी फौजी हेकल के अंदरूनी सहनों में दाखिल हुए और इसे आग लगा दी। हम जोजिफस लिखता है कि जब हेकल को आग लगी तो एक ऐसी चीख बुलंद हुई जो पूरे शहर में सुनी गई। लोग जानबूझकर खुद को आग में या रोमियो की तलवारों पर गिरा रहे थे। यह तसवुर करना भी मुश्किल है। एक पूरी तहजीब का मरकज उनकी आंखों के सामने जल रहा था। यह सिर्फ एक इमारत की तबाही नहीं थी। यह उनकी दुनिया का खात्मा था।
जब एक मजहब का मुतलक मरकज ही तबाह हो जाए तो वह कैसे जिंदा रहता है। यह तो एक नाकाबिले तसवुर सदमा होगा। यही वह लम्हा था जहां से एक नई यहूदियत ने जन्म लिया। रबी योहानन बिन जकाय नामी एक आलिम ने बड़ी दूरंदेशी से काम लेते हुए यावना शहर में एकेडमी कायम की और वहां क्या हुआ? वहां यह नजरिया पेश किया गया कि हैकल की कुर्बानियों का मुतबादल अब तुरात का मुताला और मोहब्बत भरे आमाल हैं। मिशना यानी जुबानी कवानीन और रिवायत का मजमुआ एक तरह से एक अलामती नया यरूशलम बन गया। काबिल हमल यरूशलम जी अगर आप शहर में नहीं रह सकते तो आप शहर के कवानीन के मुताबिक जी कर उसकी रूह को जिंदा रख सकते हैं। खुदा अब पत्थर की इमारत में नहीं बल्कि इन अल्फाज में बसता था।
तो यहूदियों ने अपने मजहब को बचाने का एक नया रास्ता तलाश कर लिया। लेकिन शहर का क्या बना? क्या वो खंडर ही रहा? तकरीबन 60 साल तक। लेकिन फिर 130 ईसवी में शहंशाह हेड्रीन ने एक ऐसा फैसला किया जिसने पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया। उसने क्या किया? उसने यरूशलम के खंडरात पर एक नया शानदार रोमी शहर तामीर करने का मंसूबा बनाया और उसका नाम अपने खानदानी नाम पर एलिया कपिटुलीना रखा। यह तो तामीर नौ का एक मुस्बत कदम लगता है। इस पर यहूदियों ने मुजाहमत क्यों की? क्योंकि यह सिर्फ तामीर नौ नहीं थी। यह सकाफती तौर पर मिटाने की कोशिश थी। हेड्रियन ने मंसूबा बनाया कि जहां हैकल खड़ा था, वहां रोमी देवताओं के सरदार मुश्तरी का मंदिर तामीर किया जाए। ओ इसके साथ ही उसने यहूदियों पर खतना करवाने और तोरात की तालीम देने जैसी बुनियादी मजहबी रुसुमात पर भी पाबंदियां आयद कर दी। यह उनकी शनाख्त पर बराहेरास्त हमला था।
उसका नतीजा तो एक और बगावत की सूरत में निकला होगा। जी जिसे बारकूक बा बगावत कहा जाता है। यह जंग तीन साल तक जारी रही और पहले से भी ज्यादा तबाहकुन साबित हुई। और उसके बाद इसे बेरहमी से कुचल दिया गया। इस बगावत के बाद रोमियो का रद्दे अमल खत्मी था। यहूदियों का यरूशलम में दाखिला मुकम्मल तौर पर ममनू करार दे दिया गया।
तो इलिया कैपिटलीना कैसा शहर था? क्या इसमें पुराने यरूशलम की कोई झलक बाकी थी? बिल्कुल नहीं। हेड्रियन ने शहर को एक मयारी रोमी नोआबादियाती शहर के नक्शे पर बनाया। एक नया ग्रिड सिस्टम, फोरम, थिएटर और हर तरफ काफिराना मंदिर। उसने माजी की हर निशानी को मिटाने की कोशिश की। जी। यहां तक कि जिस जगह गुलगोथा पर यसु को मसलूब किया गया था, वहां उसने मोहब्बत की देवी एफ्रोडीटी का मंदिर तामीर करवा दिया। यरूशलम का यहूदी माजी मुकम्मल तौर पर दफन कर दिया गया था।
और ईसाइयों का इस पर क्या रद्दे अमल था? दिलचस्प बात यह है कि ईसाइयों के लिए भी जमीनी यरूशलम की अहमियत कम हो गई थी। उनके लिए यह अब मुजरिम शहर था। जिसने मसीह को मुस्तरद कर दिया था। तो उनकी दिलचस्पी अब आसमानी यरूशलम में थी। बिल्कुल उनके लिए शहर की तबाही यसु की पेशगोई की तकमील थी और इसने उनके अकीदे को मजीद मजबूत किया।
तो हमने देखा कि किस तरह सिर्फ एक सदी से कुछ ज्यादा अरसे में यरूशलम हेरोदिस के शानदार यहूदी मरकज से तबाही के बाद एलिया का पेट्रोलना नामी एक आम रूमी शहर में तब्दील हो गया। जी। और हैकल का नुकसान यहूदियत और ईसाइयत दोनों के लिए एक फैसलाकुन मोड़ था। जिसने उन्हें अपनी रूहानियत की नई तारीफ करने पर मजबूर कर दिया। और यह हमें एक बहुत गहरे सवाल पर छोड़ जाता है। कौन सा सवाल? कि जब एक शहर को उसकी बुनियादों से मिटाकर दोबारा तामीर कर दिया जाए, उसका नाम बदल दिया जाए, और उसके असल बाशिंदों का दाखला ही ममनू कर दिया जाए, तो उसकी मुकद्दस हैसियत का क्या मतलब रह जाता है? क्या तकद्दुस पत्थरों और इमारतों में है या लोगों की याददाश्त, उनकी किताबों और उनके अकीदे में? बिल्कुल।
और यही सवाल आने वाले वक्त के लिए स्टेज तैयार करता है क्योंकि एलिया कापेटुलीना की कहानी यहां खत्म नहीं होती। जी। 313 ईसवी में एक ऐसा वाक्य रोनुमा हुआ जो एक बार फिर इस शहर की शनाख्त को यक्सर बदल देगा। रोमन सल्तनत को एक ईसाई शहंशाह कुस्तुनतीन मिल गया। अगली बार हम देखेंगे कि किस तरह एलिया कैपिटलीना ने दोबारा यरूशलम बनने का सफर शुरू किया। लेकिन इस बार एक ईसाई यरूशलम के तौर पर।
पिछली बार जब हमने यरूशलम की कहानी छोड़ी थी तो वह रूमी सल्तनत के तहत एलिया कैपिटोलीना नामी एक शहर था जिसे उसकी यहूदी तारीख से तकरीबन काट दिया गया था। जी बिल्कुल। आज हम उस कहानी में वहां से आगे बढ़ रहे हैं जहां तारीख ने एक ऐसा ड्रामा ही मोड़ लिया जिसने सब कुछ बदल दिया। हम हम चौथी सदी की बात कर रहे हैं जब एक शहंशाह के एक फैसले ने ना सिर्फ एक सल्तनत का रुख मोड़ा बल्कि उस शहर की रूह को हमेशा के लिए तब्दील कर दिया। तो आइए देखते हैं कि यह सब कुछ कैसे और क्यों हुआ।
बिल्कुल हम शहंशाह कुस्तनंतीन के दौर की बात कर रहे हैं। उसने खानाजंगी खत्म करके रोमी सल्तनत को दोबारा मुताहिद किया और एक बहुत बड़ा कदम उठाया। ईसाइयत को कानूनी हैसियत दे दी। यह तो एक जलजलाखेज तब्दीली थी। बहुत बड़ी। लेकिन इसका फलस्तीन के उस शहर एलिया कैपिटुलिना पर क्या असर पड़ना था? कुस्ततीन एक नई ईसाई सल्तनत का ख्वाब देख रहा था। मसला यह था कि उसकी नई राजधानी कुस्तनतुनिया एक नया शहर था। अच्छा। इसकी कोई कदीम मुकद्दस तारीख नहीं थी। इसे अपनी सल्तनत को एक ताकतवर माजी से जोड़ने के लिए अलामात की जरूरत थी और यहीं से यरूशलम की कहानी में एक नया बाप खिलता है। अच्छा तो उसे अपनी नई सल्तनत के लिए एक ब्रांड स्टोरी की जरूरत थी। मतलब एक ऐसी कहानी जो लोगों को जोड़ सके। उसने एक बहुत बड़ा तामीराती प्रोग्राम शुरू किया लेकिन रोम में तो पहले ही पुराने पैगन देवताओं के मंदिर भरे पड़े थे। जी वो वहां अपनी नई ईसाई शिनाख्त कैसे बनाता और यहीं पर एक बहुत ही दिलचस्प किरदार सामने आता है। यूसीबियस जो केसारिया का बिशप था। जी यूसीबियस कुस्तदेन का सवाने निगार और एक बड़ा हामी था। लेकिन मजहब के बारे में इसका नजरिया बहुत मुख्तलिफ था। यूसीबियस इस तसवुर के सख्त खिलाफ था जिसे हम मुकद्दस ज्योग्राफिया कहते हैं। एक मिनट मुकद्दस ज्योग्राफिया से
आपकी क्या मुराद है? क्या इसका मतलब यह है कि कुछ जगह वाकई दूसरी जगहों से ज्यादा मुकद्दस होती हैं? जैसे कोई खास पहाड़ या कोई खास इमारत? बिल्कुल यही तसवुर यूसीबियस का मानना था कि खुदा हर जगह है। उसे किसी खास गार, पहाड़ या इमारत में कैद नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह पागनिज्म जैसी बात थी कि खुदा को बेजान चीजों और अंधेरे गारों में तलाश किया जाए। सही। इसके नजदीक ईमान एक खालिस रूहानी और फिक्री मामला था। वो दलील देती थी कि हजरत ईसा ने तो हजरत इब्राहिम के खालिस तौहीदी मजहब को बहाल किया था। जिसका इहसार किसी मंदिर या इमारत पर नहीं था।
तो यहीं से कहानी में कशमकश पैदा होती है। एक तरफ शहंशाह है जिसे अपनी सल्तनत के लिए ठोस नजर आने वाली अलामतें चाहिए और दूसरी तरफ उसका एक अहम मजहबी मुशीर है जो कहता है कि ईमान इन चीजों से बालातर है। और यह कशमकश दो शख्सियात के दरमियान तसादम की शक्ल इख्तियार कर लेती है। कसरिया का बिशप यूसीबियस और एलिया यानी यरूशलम का बिशप मकारस। यह सिर्फ दो बिशप्स की जाती लड़ाई नहीं थी बल्कि यह ईसाइयत की रूह पर कब्जे की जंग थी। हम एक तरफ वो लोग थे जो मजहब को रूहानी और जाती समझते थे और दूसरी तरफ वो जो इसे जमीन, पत्थर और इमारतों से जोड़ना चाहते थे।
और मुझे याद है कि जराय में इस बात का जिक्र है कि यह झगड़ा उस वक्त की एक बहुत बड़ी मजहबी बहस से भी जुड़ा हुआ था जिसे आर्यन तनाज़ा कहते हैं। जी, यह उस वक्त का सबसे बड़ा मज़हबी सवाल था। हजरत ईसा अल सलाम की असल फितरत क्या है? योसेबियस आर्यन नजरियात की तरफ मायल थे। जिसके मुताबिक हजरत ईसा खुदा की सबसे अजीम मखलूक तो थे लेकिन वो अजल से खुदा के साथ नहीं थे। अच्छा। जबकि मकारियोस एथेनेशियस के नजरिए का हामी था। कि हजरत ईसा मुकम्मल तौर पर इलाही थे और हमेशा से खुदा की जात का हिस्सा थे। और इसी कशमकश ने यरूशलम की तकदीर लिख दी क्योंकि जो फरीक जीता उसी का नजरिया शहर की पहचान बन गया।
और फिर 325 ईसवी में नीसिया की मशहूर काउंसिल होती है। यहां से तो मामला वाकई एक फिल्मी कहानी जैसा हो जाता है। जी। मकारियोस जो इस नजरियाती बहस में जीत रहा था ने शहंशाह कॉन्स्टेंट के सामने एक ऐसी तजवीज रखी जो सुनने में बिल्कुल नाकाबिल यकीन लगती है। हजरत ईसा की कब्र दफन है। वाओ यह तो एक बहुत बड़ा जुआ था। यानी शहर के बीच में एक बड़े मंदिर को गिराने की इजाजत मांगना। मकारियोस में इतनी हिम्मत कहां से आई? अगर मंदिर के नीचे कुछ ना मिलता तो क्या होता? उसका तो मजाक बन जाता और शहंशाह की भी शदीद सुबकी होती। उसका सियासी मुस्तकबिल दांव पर लग सकता था। यह एक बहुत बड़ा खतरा था। शहर की अक्सरियत अब भी बेगान थी और एक बड़े मंदिर को मुस्मार करना इश्तियाल अंगेजी थी। अगर उन्हें कुछ ना मिलता तो यह किलिसा और शहंशाह दोनों के लिए एक भयानक नाकामी होती।
लेकिन कॉन्स्टेंट को अलामात की ताकत का अंदाजा था। उसे अपनी नई ईसाई सल्तनत के लिए एक मरकज एक ऐसी जगह चाहिए थी जो रोम और यरूशलम दोनों के पेगान और यहूदी माजी पर सबकत ले जाए। वो इस जुए के लिए तैयार हो गया। खुदाई शुरू हुई। जराय बताते हैं कि यह अमल खुद एक अलामती काम बन गया था। यह सिर्फ आसारे कदीमा की तलाश नहीं थी बल्कि इसे पगनिज्म की गलाजत को साफ करके ईसाइयत की हकीकी जड़ों को दोबारा दरियाफ्त करने की कोशिश के तौर पर पेश किया गया। जी दो साल तक काम जारी रहा। मैं तसवुर कर सकता हूं कि वहां कैसा तनाव का माहौल होगा। बिल्कुल। और फिर तमाम तवकात के बरक्स जब वो मंदिर का मलबा हटा चुके और नीचे खुदाई की तो उन्हें चट्टान में तराशी हुई एक कब्र मिली। इस दरियाफ्त ने पूरी ईसाई दुनिया में एक तूफान बरपा कर दिया।
लेकिन क्या इस बात का कोई इमकान है कि यह दरियाफ्त इतनी हकीकी ना हो? तारीख में अक्सर ऐसी चीजें सियासी मकासद के लिए दरियाफ्त कर ली जाती हैं। क्या इस वक्त किसी ने इस पर शक नहीं किया? यह एक बहुत अहम सवाल है। लेकिन इस दरियाफ्त का नफसियाती और अलामती असर इतना गहरा था कि किसी ने इस पर सवाल उठाने की जुर्रत नहीं की। यहां तक कि यूसीदियस जो मुकद्दस मकामात के खिलाफ थी उसने भी इसे कबूल कर लिया। अच्छा। इसके लिए यह एक मोजजा था। उसने लिखा कि जिस तरह हजरत ईसा अपनी कब्र से जी उठे थे। अब खुद वो कब्र भी जमीन के नीचे से निकल आई थी। जो इस बात की अलामत थी कि किलिसा भी जुल्मो सितम के दौर से निकल कर उभर रहा है। वाह! यह एक इतनी ताकतवर कहानी थी कि इसकी सच्चाई पर सवाल उठाना तकरीबन नामुमकिन हो गया था।
तो इस दरियाफ्त ने सब कुछ बदल दिया। इसके बाद क्या हुआ? जाहिर है वो इस जगह को ऐसे ही तो नहीं छोड़ सकते थे। उन्होंने वहां एक बहुत बड़ा कॉम्प्लेक्स तामीर किया जिसे चर्च ऑफ होली स्पिलकर कहा जाता है। यह सिर्फ एक इमारत नहीं थी। इसमें तीन अहम हिस्से थे। खुद मकबरा जिसे एक शानदार रुटिंडा के नीचे रखा गया जिसे अनास्तासिस यानी जी उठना कहा गया। ठीक है? इसके साथ ही गोलगोथा की चट्टान जहां हजरत ईसा को सुलीब दी गई थी और एक बहुत बड़ी बैसिलिका जिसे मार्टीरियम यानी शहादतगाह कहते थे। यह तो एक नया यरूशलम बनाने जैसा था। एक ऐसा मुकद्दस मरकज जो पुराने यहूदी शहर के तबाहशुदा टेंपल माउंट के मुकाबले में खड़ा था और उस पर गालिब नजर आता था। बिल्कुल। और इसने ईसाई सोच को जड़ से बदल दिया। खुद यूसेबियस जो पहले मुकद्दस मकामात से नफरत करती थी। इस दरियाफ से इतनी मुतासिर हुई कि उसने अपनी पुरानी दलील छोड़ दी। कमाल है। उसे इसकी अहमियत बयान करने के लिए शायरी और दमालाई जुबान का सहारा लेना पड़ा। उसने इसे रोशनी की तारीकी पर फतह करार दिया। उसने लिखा कि मकबरे के नजारे ने तमाम अल्फाज से बुलंद आवाज में बात की। इस एक दरियाफ्त ने पूरी मजहबी बहस का रुख मोड़ दिया।
और जाहिर है जब ऐसी कोई बड़ी दरियाफ्त होती है तो शाही खानदान भी पीछे नहीं रहता। क्या कुस्तनंतीन की वालिदा हेलीना का यरूशलम आना इसी सिलसिले की एक कड़ी थी? जी। शहंशाह की बूढ़ी वालदा हेलीना ने यरूशलम का सफर किया और इस नए तस्सवुर को मजीद तकवियत दी। उसने बैतलहम में हजरत ईसा की जाए पैदाइश पर और कोहे जैतून पर जहां से वह आसमान पर उठाए गए नए गिरजा घर बनवाए। अच्छा। इन तामीरात ने ईसाइयत के दावे को फस्तीन की सरजन पर ठोस शक्ल दे दी। और यहीं से असल सलीब की दरियाफ्त का मशहूर अफसाना भी शुरू हुआ। जो वक्त के साथ-साथ मकबरे की दरियाफ्त से भी ज्यादा मशहूर हो गया।
तो इस सब का आम लोगों पर क्या असर पड़ा? क्या इससे पहले ईसाई यरूशलम को मुकद्दस नहीं मानते थे? मानते थे लेकिन एक मुख्तलिफ अंदाज में वो इसे एक तारीखी शहर समझते थे। लेकिन वहां जियारत के लिए जाने का कोई रिवाज नहीं था। लेकिन अब सल्तनत के कोने-कोने से जायरीन के काफिले यरूशलम आने लगे। अच्छा। हमें 333 ईसवी के एक गुमनाम जायर का सफरनामा मिलता है जिसे बोडो का जायर कहा जाता है और इसकी तहरीर से पता चलता है कि अब शहर को सिर्फ और सिर्फ बाइबल में मशकूर मकामात के हवाले से देखा जा रहा था। यानी शहर की पूरी शनाख्त बदल गई। इसने तो इबादत के तरीकों को भी बदल दिया होगा। बहुत गहराई तक बदल दिया। यरूशलम के बिशप साइरल जैसे लोगों ने इस मुकद्दस शहर के तसवुर को पूरी तरह अपना लिया। उन्होंने नई रुसुमात शुरू की जैसे शहर की गलियों में जुलूस निकालना और बाइबल के वाक्यात को ऐन उसी जगह पर यानी इन इ्सो को दोबारा अदा करना। हम इससे लोगों का अपने ईमान के साथ एक नया बहुत जिस्मानी और जज्बाती ताल्लुक पैदा हुआ। अब ईमान सिर्फ एक अकीदा नहीं था बल्कि एक तजुर्बा बन गया था। यह बहुत दिलचस्प है। तो इसका मतलब है कि ईसाइयत एक तजरीदी अकीदे से एक ऐसी चीज बन गई जिसे आप हकीकत में छू सकते थे और महसूस कर सकते थे। बिल्कुल। यह नई रूहानियत देखने और छूने पर बहुत जोर देती थी। जराय बताते हैं कि जायरीन मुकद्दस मकामात को छूना चाहते थे। उनसे बरकत हासिल करना चाहते थे। जी। एक जायर पोला नामी अमीर रूमी खातून के बारे में लिखा है कि उसने अकीदत में मकबरे के पत्थर को चाटा। यह तो अकीदत की इंतहा है। आज भी हमें दुनिया भर में ऐसी मिसालें मिलती हैं। इससे पता चलता है कि इंसानों के लिए किसी चीज को छूकर महसूस करना कितना अहम है। और यह एक बहुत बड़ी नजरियाती तब्दीली थी। पहले यूसेबियस जैसे लोग कहते थे कि हजरत ईसा की इंसानियत के बजाय उनकी इलाही फितरत पर तवज्जो देनी चाहिए। लेकिन अब यरूशलम की इबादत ने लोगों को उनकी इंसानियत से जोड़ दिया था। सही। उनके दुख, उनके कदमों के निशानात, यह सब हकीकी और काबिले लम्स हो गए।
लेकिन शहर में तो यहूदी भी रहते थे। ईसाइयत के इस ड्रामाई उरूज का उन पर क्या असर हो रहा था? वो यकीनन यह सब कुछ खामोशी से तो नहीं देख रहे होंगे। यह उनके लिए एक बहुत तकलीफदा और परेशानक दौर था। उनका मुकद्दस शहर उनकी आंखों के सामने एक ईसाई शहर में तब्दील हो रहा था। और फिर अचानक 361 ईसवी में तारीख ने एक और हैरानक मोड़ लिया। अच्छा। एक नया शहंशाह जूलियन इख्तेदार में आया। इसे ईसाई तारीख में मुर्तद कहा जाता है क्योंकि वह ईसाइयत से शदीद नफरत करता था और पुराने रोमी पागनिज्म को बहाल करना चाहता था। और यरूशलम के लिए उसका क्या मंसूबा था? वो यकीनन इसने ईसाई मरकज को खत्म करना चाहता होगा। इसका मंसूबा इससे भी ज्यादा इंकलाबी था। उसने यहूदियों से राब्ता किया और कहा कि वो उनका माबद यानी टेंपल दोबारा तामीर करने में उनकी मदद करेगा। ओ यह ईसाई बयानिए के दिल पर बराहेरा हमला था। ईसाई यह दलील देते थे कि टेंपल की तबाही इस बात का सबूत है कि खुदा ने यहूदियों को मुस्तरद करके उन्हें चुन लिया है। अगर टेंपल दोबारा बन जाता तो उनकी पूरी दलील जमीन बोस हो जाती। मैं तसवुर कर सकता हूं कि इस ऐलान से कैसा माहौल बना होगा। यहूदी खुशी से झूम उठे होंगे और ईसाइयों पर खौफ तारी हो गया होगा कि उनकी पूरी दुनिया उलटने वाली है। बिल्कुल यही हुआ। यहूदियों ने सल्तनत भर से चंदा जमा करना शुरू किया और तामीर की तैयारियां शुरू हो गई। काम शुरू भी हो गया। लेकिन फिर एक आफत आ गई। क्या हुआ? जराय बताते हैं कि एक जलजिला आया और जमीन से आग के गोले निकले जिससे काम करने वाले मजदूर भाग गए और काम रुक गया। कुछ ही अरसे बाद शहंशाह जूलियन फारसियों के खिलाफ एक जंग में मारा गया। ईसाइयों ने इसे क्या समझा? उन्होंने उसे खुदा की तरफ से एक मौजजा और अपनी सच्चाई का नाकाबिले तरदीद सबूत करार दिया। इस वाक्य का नतीजा यह निकला कि यरूशलम पर ईसाइयों की गिरफ्त पहले से भी कहीं ज्यादा मजबूत और पुरज्म हो गई। अच्छा। अब वह अपने मुकद्दस शहर को खोने का तसवुर भी नहीं कर सकते थे। शहर की आबादियाती साख्त भी बदल गई। यह राहबों, राहबाओं और मगरिब से आने वाले अमीर आबादकारों से भरकर एक ईसाई अक्सरियत का शहर बन गया। हम इसके बाद तो शहर की शक्ल सूरत भी शाही सरपरस्ती में मजीद बदली हो गई। जी। हम मलिका यूडोशिया जैसी शख्सियात के दौर में तामीरात की एक नई लहर देखते हैं। उसने नए गिरजा घर, हस्पताल और खानकाहें बनवाई। यहां तक कि शहर की एक नई दीवार तामीर करवाई जिसमें कोहे सयन को भी शामिल कर लिया गया जो ईसाइयों के लिए एक अहम मकाम था। तो यरूशलम अब रोमी सल्तनत का एक बड़ा और फलता फूलता ईसाई मरकज बन चुका था। बिल्कुल। और शहर में मौजूद यह मुकद्दस मकामात खुद हजरत ईसा अल सलाम की इंसानियत का एक जीता जागता नाकाबिल तरदीद सबूत बन गए हम वहां रहते हुए इन जगहों को छूते हुए ईसाइयों के लिए उनके इंसानी वजूद की हकीकत को झुठलाना नामुमकिन हो गया। इस नई हकीकत की सबसे बेहतरीन विजुअल नुमाइंदगी हमें छठी सदी के एक मुजैक नक्शे में मिलती है जिसे मदाबा का नक्शा कहते हैं। अच्छा। इस नक्शे में यूरूशलेम को दुनिया के मरकज में दिखाया गया है। और इस पर वाज़ तौर पर लिखा है मुकद्दस शहर। और इस नक्शे में नया मुकद्दस मरकज चर्च ऑफ होली स्पलकर है। जबकि पुराना मरकज यानी टेंपल माउंट एक खाली जगह के तौर पर दिखाया गया है जिसे हाशिय पर धकेल दिया गया है। तो खुलासा यह है कि सिर्फ चंद सदियों में एक नजरअंदाज किया गया रोमी सुभाई शहर एक आलमी ईसाई मुकद्दस शहर जियारत का सबसे बड़ा मरकज और बेपनाह अलामती ताकत की जगह बन गया। जी। उसका पूरा जग्राफिया एक नए मजहबी नजरिए और एक नई सियासी हकीकत की अकासी के लिए दोबारा लिखा गया।
लेकिन यह ताकत और शानो शौकत नाजुक थी। बाजतीनी सल्तनत अंदरूनी और बैरूनी खतरात की वजह से कमजोर हो रही थी और फिर 614 ईसवी में एक बहुत बड़ी तबाही आई। पारसियों ने हमला किया और जराय के मुताबिक शहर के यहूदियों ने उनका साथ दिया जो शायद बाजतीनी जुल्म का बदला लेना चाहते थे। शहर को फतह करने के बाद शदीद तबाही मचाई गई। गिरजा घरों को जला दिया गया। हजारों ईसाइयों को कत्ल किया गया और असल सलीब को जंगी माल के तौर पर फारस ले जाया गया। यह तो ईसाइयों के लिए एक बहुत बड़ा सदमा होगा। एक तरह से उनकी तारीख दोहराई गई जैसे कभी यहूदियों के साथ हुआ था। बिल्कुल। यह उनकी अपनी जलावतनी थी। उन्होंने सयन के लिए उसी तरह मातम किया जैसे कभी यहूदी करते थे। लेकिन फिर शहंशाह हेरक्कलेज़ ने एक जबरदस्त जवाबी हमला किया। पारसियों को शिकस्त दी और 630 ईसवी में फाते बनकर यरूशलम में दाखिल हुआ। सही। और असल सलीब को उसकी जगह पर वापस रख दिया। ऐसा लगा कि ईसाई दुनिया बहाल हो गई है। ईसाई खुश थे यह सोचकर कि अब वो इस शहर को कभी नहीं खोएंगे। लेकिन जाहिर है कहानी यहां खत्म नहीं होती। बिल्कुल नहीं। जिस किताब से हम यह तफसीलात ले रहे हैं, वह हमें यहां एक सनसनीखेज मोड़ पर छोड़ देती है। जिस वक्त हिराक्कलियस यरूशलम में अपनी फतेह का जश्न मना रहा था, उससे सिर्फ 2 साल पहले 632 ईसवी में जनूब में अरब के सेहरा में एक पैगंबर का इंतकाल हुआ था। हम्म। 5 साल बाद 637 ईसवी में उनके पैरोकारों की एक फौज यरूशलम के दरवाजों पर खड़ी थी। और यहीं से इस शहर की तारीख का एक बिल्कुल नया बाप शुरू होता है। जिस पर हम अपनी अगली गुफ्तगू में बात करेंगे।
पिछली गुफ्तगू में हमने देखा था कि यरूशलम कैसे बाजंतीनी और फारसी सल्तनतों के बीच एक खूनी मैदान जंग बना हुआ था। जी। एक सदी की तबाही, कब्जे और फिर दोबारा कब्जे के बाद शहर बिल्कुल थक चुका था। लेकिन जब यह दो पुरानी सल्तनतें एक दूसरे से लड़कर कमजोर हो रही थी तो जुनूब में जजीरेनुमा अरब से एक ऐसी नई ताकत उभर रही थी जो ना सिर्फ यरूशलम बल्कि पूरी दुनिया की तारीख का रुख बदलने वाली थी। और आज हम इसी पर बात करेंगे। बिल्कुल। आज हम इस्लाम के आगाज को देखेंगे। यरूशलम से उसके गहरे रूहानी ताल्लुक को समझेंगे और मुस्लिम हुक्मरानी के इब्तदाई दौर का जायजा लेंगे। और यह समझना बहुत जरूरी है कि यह सिर्फ एक और फौज के शहर पर कब्जा करने की कहानी नहीं है। अच्छा। जी। यह दरअसल एक नए मजहबी और तहजीबी विज़न की दास्तान है। जिसने शहर के मुकद्दस होने के तसवुर को ही एक नई शक्ल दे दी। हम देखेंगे कि मुसलमानों ने अहले किताब यानी यहूदियों और ईसाइयों के साथ ताल्लुकात कैसे उस्तवार किए और शहर के मुकद्दस मकामात को एक नई पहचान दी।
तो आइए 610 ईसवी के मक्का से शुरू करते हैं। शहर तिजारत की वजह से बहुत अमीर हो चुका है। लेकिन इस दौलत ने वहां की पुरानी कबायली कदरों को खत्म कर दिया है। जी अब लोग कमजोरों और गरीबों का ख्याल रखने के बजाय सिर्फ अपनी दौलत बढ़ाने की दौड़ में लगे हैं। और इसी माहौल में मोहम्मद इबने अब्दुल्लाह जो अपनी ईमानदारी की वजह से मशहूर है को पहली वही मिलती है। यह पैगाम था क्या? देखिए, यह पैगाम अपनी रूह में बहुत सादा और इंकलाबी था। इसका मरकजी ख्याल था इस्लाम। यानी अपनी मर्जी को खुदा की मर्जी के आगे झुका देना। मतलब खुद को खुदा के सुपुर्द कर देना। बिल्कुल। और कुरान के मुताबिक यह कोई नया मजहब नहीं था। बल्कि यह हजरत इब्राहिम के उसी पुराने खालिस तौहीदी दीन की बहाली थी। इसका जोर समाजी इंसाफ पर था। समाजी इंसाफ पर जी। गरीबों, यतीमों, बेवाओं का ख्याल रखना एक मुसलमान की बुनियादी जिम्मेदारी थी। कुरान बार-बार जाती दौलत जमा करने के खिलाफ खबरदार करता है।
तो फिर मक्का के अमीर और ताकतवर तबके को इससे इतना शदीद इख्तिला क्यों हुआ? यह तो अच्छी बातें थी। इसलिए कि यह पैगाम उनके पूरे समाजी और माशी ढांचे के लिए एक चैलेंज था। उनकी ताकत काबा में रखे बुतों और उससे जुड़े मजहबी कारोबार पर कायम थी। अच्छा। तो जब हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा कि खुदा एक है और यह बुद्ध बेकार हैं तो यह उनके लिए सिर्फ मजहब ही नहीं बल्कि एक माशी हमला भी था। इसीलिए उन्होंने मुसलमानों पर जुल्मो सितम शुरू कर दिया। और इसी जुल्म का नतीजा था 622 ईसवी की वो मशहूर हिजरत जब मुसलमानों को मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा। जी और इस हिजरत की अहमियत को जितना भी समझा जाए कम है। यह सिर्फ एक शहर से दूसरे शहर जाना नहीं था। तो फिर यह क्या था? यह तारीख में पहली बार एक ऐसी कम्युनिटी यानी उम्मत का कयाम था जिसकी बुनियाद खून या कबीले पर नहीं बल्कि एक मुश्तका नजरिए और अकीदे पर थी। कबायली वफादारी की जगह नजरियाती वाबस्तगी ने ले ली। इस एक कदम ने अरब की तारीख का धारा बदल दिया।
तो मदीना में यह नई उम्मत बन रही है। लेकिन उनके रूहानी तस्सवुर में एक पुराना शहर अब भी मरकजी हैसियत रखता है। है ना? यरूशलम बहुत ज्यादा। इस्लाम के बिल्कुल इब्तदाई सालों में मुसलमान नमाज के लिए यरूशलम की तरफ ही रुख करते थे। वो उनका पहला क़िबला था। यानी ये अहले किताब के साथ एक रूहानी जुड़त का इज़हार था। बिल्कुल। यह इस बात की अलामत थी कि मुसलमान खुद को हजरत मूसा और हजरत ईसा की लाई हुई तौहीदी रिवायत का ही तसलसुल समझते हैं। लेकिन फिर जनवरी 624 में क़िबला तब्दील करने का हुक्म आ गया। यह एक बहुत बड़ा कदम लगता है। एक तरफ आप तसलसुल की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ आप उनके क़बले से मुंह मोड़ रहे हैं। आपका सवाल बहुत अहम है। बजाहिर यह एक तजाद लगता है। लेकिन इसके पीछे एक गहरा मतलब था। क़िबला की तब्दीली का हुक्म दरअसल मुसलमानों को यह बता रहा था कि वो अब बराए हिरासत हजरत इब्राहिम के असल और खालिस दीन की तरफ लौट रहे हैं। जो यहूदियत और ईसाइयत से भी पहले था। जी। यह ऐलान था कि इस्लाम किसी दूसरे मजहब की शाख नहीं बल्कि असल जड़ की तरफ वापसी है। इसने मुसलमानों को एक अलग खुद मुख्तार शनाख्त अता की।
और फिर वो वाक्या आता है जो मेरे ख्याल में यरूशलम के इस्लामी तस्सवुर की बुनियाद है। इसरा वो मिराज बिल्कुल। कुरान की सूरह बनी इसराइल में इसका जिक्र है कि खुदा अपने बंदे को रात में मस्जिद उल हराम से मस्जिद-ए-असा तक ले गया। और रिवायत इसकी तशरी कैसे करती हैं? रिवायत बताती हैं कि यह हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम का बुराक नामी एक आसमानी सवारी पर मक्का से यरूशलम के टेंपल माउंट तक का मौजजाती सफर था। वहां उन्होंने तमाम पिछले अंबिया की इमामत की और फिर सात आसमानों के सफर पर रवाना हुए। इस वाक्य ने तो यरूशलम को हमेशा के लिए इस्लामी अकीदे का एक अटूट अंग बना दिया। जी। इसकी अलामती अहमियत बहुत गहरी है। अंबिया की इमामत करना इस बात की अलामत थी कि इस्लाम पिछली तमाम आसमानी तालीमात का वारिस है। उसने मक्का और यरूशलेम के दरमियान एक ऐसा रूहानी महवर कायम कर दिया जो आज तक कायम है।
ठीक है। तो अब हम 638 ईसवी में पहुंच गए हैं। इस्लामी फौजे यरूशलम का मुहासरा किए हुए हैं। शहर के पैट्रियाक सफोनियस शहर को हवाले करने पर तैयार हैं। लेकिन उनकी एक शर्त है। जी, शर्त यह थी कि वह शहर की चाबियां सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों के खलीफा हजरत उमर रजि अल्लाह अनहो को अपने हाथ से देंगे। कांग की शान और शौकत के बरक्ख्त खलीफा एक सफेद ऊंट पर सवार थे और उनके कपड़ों पर कई पैबंद लगे हुए थे। यह मंजर उस नई ताकत की सादगी और आजजी का सुबूत था। और इस फतेह की सबसे गैर मामूली बात यह थी कि यह शहर की तारीख की शायद सबसे पुर अमान फतूहात में से एक थी। जी। यहां किसी एक शख्स को कत्ल नहीं किया गया। किसी की जायदाद को नुकसान नहीं पहुंचाया गया और किसी को भी जबरदस्ती मुसलमान करने की कोशिश नहीं की गई। ऐसा कैसे मुमकिन हुआ? यह उस मुआयदे की वजह से मुमकिन हुआ जो मीसाक उमर के नाम से मशहूर है। उसमें हजरत उमर रदी अल्लाह ताला ने शहर के बाशिंदों को जान माल और गिरजों की हिफाजत की मुकम्मल जमानत दी। और फिर वो मशहूर वाकया पेश आया जब वो कलीसा कयामत चर्च ऑफ द होली सपुल कर गए। जो ईसाइयत का मुकद्दस तरीन मकाम है। जी पेट्रियोक सुफ्रोनियस उन्हें वहां ले गए और उसी वक्त नमाज का वक्त हो गया। और सुफ्रोनियस ने
उन्हें वहीं गिरजे के अंदर ही नमाज पढ़ने की दावत दी। जी, लेकिन हजरत उमर रदी अल्लाह ताला ने बड़ी शाहिस्तगी से इंकार कर दिया। क्यों? उन्होंने वजाहत की कि अगर मैंने यहां नमाज पढ़ ली तो मेरे बाद आने वाले मुसलमान इसे एक मिसाल समझकर इस गिरजे को मस्जिद में तब्दील करने का दावा कर सकते हैं। यह तो नाकाबिले यकीन कहानी है। यह सिर्फ रवादारी नहीं, यह तो मुस्तकबिल बिनी की इंतहा है। बिल्कुल। उन्होंने एक ऐसे तनाजे को शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया जो अभी पैदा भी नहीं हुआ था।
उन्होंने गिरजे के बाहर सीढ़ियों पर नमाज अदा की और फरी तौर पर एक तहरीरी हुकुम जारी किया कि इस जगह पर मस्जिद ना बनाई जाए। उसके बाद हजरत उमर रदी अल्लाहहु ताला ने टेंपल माउंट या हरमल शरीफ को देखने का मुतालबा किया जो उस वक्त शहर का कूड़ा फेंकने की जगह बना हुआ था। जी, बाज्तितीनियों के लिए यह एक मजहबी सबूत था कि खुदा ने यहूदियों की मुकद्दस जगह को रद्द कर दिया है। तो, जब हजरत उमर वहां पहुंचे और गंदगी के ढेर देखकर खुद अपने हाथों से अपनी चादर में मलबा उठाकर साफ करना शुरू किया तो यह एक इंकलाबी अमल था। वो सिर्फ जमीन साफ नहीं कर रहे थे। वो तारीख को साफ कर रहे थे। बिल्कुल। वो एक मुश्तिका इब्राहिमी तारीख को दोबारा जिंदा कर रहे थे। जिसे जानबूझकर बेहुरमत किया गया था। जब यह जगह साफ हो गई तो वहां पहली मस्जिद तामीर की गई। जी, हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनो ने हरम के जुनूबी हिस्से में मस्जिद बनाने का हुक्म दिया। जहां आज मस्जिद अक्सा है। इसकी कोई खास वजह? वजह यह थी कि यहां से नमाज पढ़ते हुए मुसलमानों का रुख सिर्फ मक्का की तरफ हो सकता था और दरमियान में मुकद्दस चट्टान नहीं आती थी। यह इब्तदाई इस्लाम की खालिस तौहीद की आकासी थी। और यह मस्जिद लकड़ी की एक बहुत ही सादा सी इमारत थी। तो इब्तदाई दौर सादगी और रवादारी का था।
लेकिन फिर उमवी दौर आया। दारुल हुकूमत दमिश्क मुंतकिल हुआ और यरूशलम अचानक सल्तनत के मरकज के बहुत करीब आ गया। बिल्कुल। और अब उम्मियों को शहर में अपनी ताकत और इस्लाम की अजमत का इज़हार करना था। यरूशलम में उस वक्त ईसाइयों के शानदार गिरजे मौजूद थे। खलीफा अब्दुल मलिक ने फैसला किया कि वो हरम शरीफ पर ऐसी इमारत तामीर करवाएंगे जो उन सब पर सबकत ले जाए। और इसी तरह 688 में कुब्बत सखरा यानी डोम ऑफ द रॉक की तामीर का हुकुम दिया गया। जी। और यह कोई आम मस्जिद नहीं थी। यह एक मजार है जो उस मुकद्दस चट्टान के गिर्द बनाया गया है जहां से पैगंबर इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेराज पर तशरीफ ले गए थे। इसके डिजाइन का क्या पैगाम था? उसका आठ कोनों वाला डिजाइन और बुलंद सुनहरी गुंबद आसमान की तरफ सफर की अलामत है। लेकिन इसका सबसे ताकतवर पैगाम इसके अंदर लिखी हुई कुरानी आयात में है। और वो आयात बराहेरा शहर में मौजूद दूसरे मजहब से बात कर रही थी। जी हां, यह दुनिया में पहली बार था कि कुरान को एक आवामी इमारत की जीनत बनाया गया था। और यह आयात बराहेरास्त ईसाई अकीदे खासतौर पर हजरत ईसा के खुदा का बेटा होने के तस्सवुर को चैलेंज करती हैं और खालिस तौहीद का पैगाम देती हैं। मतलब यह पत्थर और सोने में लिखा हुआ एक ऐलान था कि इस्लाम ही हजरत इब्राहिम की मिराज का असल वारिस है। बिल्कुल और यहूदियों के लिए भी एक पैगाम था कि अब इस मुकद्दस मकाम पर औलाद इस्माइल का हक कायम हो चुका है। जरा एक लम्हे के लिए सोचें। 1400 साल बाद भी अब्दुल मलिक का वह दावा शहर के मंजर पर हावी है। जी इसने यरूशलम के खुदोखाल को हमेशा के लिए बदल दिया।
लेकिन उमवी दौर के बाद जब अब्बासियों ने दारुल हुकूमत बगदाद मुंतकिल कर दिया तो यरूशलम एक बार फिर सल्तनत के मरकज से दूर हो गया और शहर में आहिस्ता-आहिस्ता कशीदगी बढ़ने लगी। किस किस्म की कशीदगी? कई चीजें थी। एक तरफ तो ईसाइयों की मुकद्दस आग की सालाना तकरीब थी जो मुसलमानों को एक किस्म का जादू लगती थी। लेकिन सबसे हौलनाक वाकया 109 में पेश आया। क्या हुआ था 109 में? मिस्र के फातिमी खलीफा अल हाकिम ने जो ज़हनी तौर पर गैर मुतावाजन समझा जाता है। किलिसा कयामत को मुकम्मल तौर पर मुस्मार करने का हुकुम दे दिया। यह तो नाकाबिले तसवुर है। हजरत उमर रज़ अल्लाह के दिए गए तहफुज़ के बिल्कुल उलट। जी यह इस्लामी तारीख में एक इंतहाई गैर मामूली और अनोखा वाकया था। खुद मुस्लिम मौरिकन ने इसे अल हाकम के जुनून का नतीजा करार दिया। लेकिन इस वाक्य ने शहर के अंदर बेतमादी की खलीज गहरी कर दी। और इसका नतीजा यह निकला कि शहर के अंदर ही कम्युनिटीज ने अपने आप को अलग करना शुरू कर दिया। जी। कम्युनिटी अपनेपने हिसार में सिमटने लगी। ईसाइयों ने अपना अलग पेट्रि्की क्वार्टर कायम कर लिया। आर्मेनिया एक कम्युनिटी ने अपना मरकज बना लिया और इसी दौर में यहूदियों का एक नया फिरका कराइ शहर में आबाद हुआ। वो खुद को सयून के सोगवार कहते थे। तो शहर एक खूबसूरत मोजेक की बजाय अलग-अलग टुकड़ों में बटने लगा। कुछ ऐसा ही हुआ।
तो आज की गुफ्तगू का खुलासा यह है कि इस्लाम यरूशलम में एक पुरमन फातेह के तौर पर दाखिल हुआ। जिसने एक कसीरुल मजहब मुआशरे की बुनियाद रखी। फिर उमवियों ने कुब्बत सखरा जैसे शाहकार तामीर किए। लेकिन वक्त के साथ सियासी तब्दीलियों और कुछ हुक्मरानों के जुनून की वजह से यह हमंगी मुतासिर हुई और तनाव ने जन्म लिया। बिल्कुल। और एक हत्मी नुक्ता यह है कि 11वीं सदी के आखिर तक इन तमाम मुश्किलात के बावजूद यरूशलम एक बैनुल अकवामी शहर बन चुका था। यहां दुनिया भर से मुसलमान, ईसाई और यहूदी जायरीन आते थे। शहर में इल्मी और सकाफती जिंदगी भी बहाल हो चुकी थी। लेकिन जब शहर इन अंदरूनी तब्दीलियों से गुजर रहा था, मगरिब में यूरोप में एक नई ताकतवर और जुनूनी तहरीक जन्म ले रही थी। और वो तहरीक इस शहर की तरफ बढ़ रही थी। बिल्कुल। हमारी अगली गुफ्तगू इसी मोड़ से शुरू होगी कि जब 1099 में यूरोप से आने वाले सलीबी जंगजुओं ने यरूशलम की पहाड़ियों से इस शहर को देखा तो क्या हुआ और उनकी आमद ने इस मुकद्दस सरजमीन की तकदीर को कैसे एक नया और इंतहाई खूनी मोड़ दिया। जातेजाते सोचने के लिए एक सवाल छोड़े जाते हैं। एक शहर बेवक़ मुख्तलिफ अकायद के पुरमन बकाए बाहमी की सबसे बड़ी अलामत और उनके दरमियान शदीद तरीन तसादुम का मरकज कैसे हो सकता है?
पिछली बार हमने बात की थी कि कैसे यरूशलम पर वक्त के साथ-साथ अलग-अलग सल्तनतों की हुकूमत रही। जी रोमी बजतीनी और फिर इब्तदाई मुस्लिम खुलफा और हर एक ने शहर पर अपनी छाप छोड़ी लेकिन आज हम एक ऐसे दौर का जायजा लेने जा रहे हैं जिसने ना सिर्फ शहर बल्कि शायद पूरी दुनिया की तारीख का रुख मोड़ दिया। बिल्कुल सलीबी जंगे हम सलीबी जंगों की बात कर रहे हैं और हमारी गुफ्तगू का महवर सेक्रेड स्ट्रगल नामी किताब है। जी और देखें इस कहानी का जो नुक्ता आगाज है वो अक्सर लोगों के लिए हैरानक होता है। अच्छा ये यरूशलेम में शुरू नहीं होती हैं। ये शुरू होती है 1071 में अनाथोलिया में यानी मौजूदा तुर्की में। जंगे मेंज़कर जंगे मेंज़कर बिल्कुल। यहां सलजुकी तुर्कों ने बाजंतीनी सल्तनत को एक जबरदस्त शिकस्त दी थी और इससे बाजंतीनी सल्तनत का बड़ा हिस्सा उनके हाथ से निकल गया। तो एकदम से इस्लाम आप कह सकती हैं कि यूरोप के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। बिल्कुल। और इसी घबराहट में बाजंतीनी शहंशाह एलेक्सियस कुमनस अव्वल ने मगरिब की तरफ देखा। खासतौर पर पोप अर्बन दोम की तरफ मदद के लिए। जी। कुछ फौजी मदद के लिए। उनका ख्याल था कि शायद कुछ 100 या हजार नॉर्मन फौजी भेज दिए जाएंगे। लेकिन पोप अर्बन दोम के ज़हन में कुछ कुछ बहुत ही बड़ा चल रहा था। बहुत बड़ा। उन्होंने इस दरखास्त को एक तारीखी मौके के तौर पर देखा। और 1095 में फ्रांस के शहर क्लेरंट में एक काउंसिल हुई। वहां उन्होंने एक ऐसी तकरीर की जिसने समझे कि पूरे यूरोप में आग लगा दी। जी। उन्होंने वहां मौजूद उमरा, नाइट्स, आम लोगों से कहा कि अपनी आपस की लड़ाईयां खत्म करो और मशरिक में अपने मसीही भाइयों की मदद को जाओ। और सबसे बढ़कर यरूशलेम जाकर हजरत ईसा की कब्र को काफिरों से आजाद करवाओ। और उस अपील का जो जवाब आया वो तारीख में गूंजता है देयूस हॉकवुल्फ। खुदा यही चाहता है। इस नारे की ताकत का अंदाजा लगाना वाकई मुश्किल है। यह सिर्फ एक फौजी मुहिम की कॉल नहीं थी। यह एक एक मजहबी तहरीक बन गई। बिल्कुल। 1096 के मौसम में बहार तक यूरोप से तकरीबन 60 हजार लोगों की पांच बड़ी फौजें यरूशलम की तरफ चल पड़ी। और यह सिर्फ नाइट्स नहीं थे। इनमें किसान, औरतें, बच्चे, बूढ़े मतलब हर तबके के लोग शामिल थे। बाजंतीनी शहजादी एनाकोमिनिया ने अपनी तारीख में लिखा है कि ऐसा लगता था जैसे पूरा मगरिब एशिया पर टूट पड़ा है। यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि यह सब लोग एक ही मकसद के लिए नहीं जा रहे थे। है ना? जी नहीं। देखिए यह कोई एक तहरीक नहीं थी बल्कि कई मुतवाजी तहरीकें थी जो एक ही सिमत में जा रही थी। हर एक का अपना मुहर्रिक था। जैसे पोप के लिए यह अपनी ताकत को बढ़ाने का एक मौका था। बिल्कुल। और मशरिक और मगरबी कलीसा को दोबारा मुतहिद करने का भी नाइट्स के लिए यह एक मजहबी फर्ज था। वह खुद को हजरत ईसा का वफादार समझते थे और उनकी जागीर को वापस लेना अपना फर्ज समझते थे। और आम लोग और फिर आम लोग थे जिनके लिए यह सफर गुनाहों का कफ्फारारा अदा करने और एक नए आसमानी यरूशलम की तलाश का जरिया था। जहां गुर्बत और मुसीबत ना हो। और यह कोई आसान सफर नहीं था। बिल्कुल नहीं। यह इंतहाई मुश्किल, महंगा और जानलेवा सफर था। जार पर लोग जानते थे कि वह शायद कभी वापस नहीं आएंगे। लेकिन इस मजहबी जोश का एक बहुत ही बहुत ही तारीख और खौफनाक पहलू भी था जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जी यरूशलेम तो हजारों मील दूर था। लेकिन यूरोप में ही एक कम्युनिटी थी जिसे सदियों से हजरत ईसा का दुश्मन समझा जाता था। यहूदी बिल्कुल 1096 के मौसम बहार में जब सलीबी फौजे जर्मनी से गुजर रही थी तो उनके एक गुरोह ने राइन दरिया के किनारे स्पियर वर्म्स और मेंस शहरों में यहूदी बस्तियों पर हमला कर दिया। इनकी मंतिक क्या थी? उनकी सोच बहुत खौफनाक थी। उनका कहना था कि हम उन मुसलमानों से लड़ने क्यों जा रहे हैं जिन्हें हम जानते तक नहीं। जबकि वो लोग जिन्होंने हमारे अकीदे के मुताबिक हमारे खुदा को कत्ल किया वो तो यहीं हमारे दरमियान रहते हैं। यह यूरोप की तारीख में यहूदियों के पहले बड़े पैमाने पर कत्लेआम थे। यानी पोग्रोम। हजारों लोग मारे गए। जी। हजारों यहूदियों को या तो कत्ल कर दिया गया या उन्होंने जबरदस्ती मजहब तब्दील करवाने के बजाय खुदकुशी को तरजीह दी। इस वाक्य ने दिखाया कि यरूशलम को आजाद कराने के मुकद्दस जज्बे ने यूरोप के अंदर यहूद दुश्मनी की जड़े कितनी गहरी कर दी थी। यह बात हजम करना बहुत मुश्किल है। एक ही लम्हे में ऐसी बर्बरियत और अगले ही लम्हे गहरी मजहबी इबादत का दावा यह नफसियात। खैर हम 3 साल की नाकाबिले तसवुर मुश्किलात भूख बीमारी लड़ाईयों के बाद जून 1099 में सलीबी फौज बिल आखिर यरूशलम की दीवारों तक पहुंच गई जी लेकिन यहां पहुंचकर इन्हें एक नई मुश्किल का सामना करना पड़ा सामान नहीं था बिल्कुल उनके पास मशरिक के इन पथरीले शहरों का मुहासरा करने का कोई तजुर्बा या सामान था ही नहीं वो तकरीबन नाकाम हो चुके थे लेकिन फिर खिस्मत ने उनका साथ दिया किस्मत ने साथ दिया। जिनवा से एक बहरी बेड़ा याफा की बंदरगाह पर पहुंचा जिसमें लकड़ी और मुहासरे का सामान था। और उस सामान से उन्होंने वह मशहूर पहियों वाले टावर बनाए। जी दो बहुत बड़े पहियों वाले मुहासरा टावर और 15 जुलाई 1099 को इनमें से एक टावर शहर की दीवार तक पहुंचने में कामयाब हो गया। और एक नाइट दीवार फलांग गया। बस यही एक लम्हा था जिसकी जरूरत थी। उसके बाद सलीबी फौज शहर के मुसलमान और यहूदी मुहाफिजों पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़ी। और उसके बाद जो हुआ वो तारीख के सियाह तरीन अबवाब में से एक है। यह सिर्फ जंग नहीं थी। नहीं यह जंग नहीं थी। यह तीन दिन तक जारी रहने वाला एक मुनज्जम कत्लेआम था। शहर की तकरीबन पूरी मुस्लिम और यहूदी आबादी को खत्म कर दिया गया। एक सलीबी तारीखदान तो फखरी अंदाज में लिखता है। हमारे लोगों ने हर तुर्क और हर अरब को कत्ल कर दिया। चाहे वह मर्द हो या औरत। 10,000 मुसलमानों ने हरम शरीफ यानी मस्जिद-ए-असा की छत पर पनाह ली। उन्हें भी नहीं बख्शा गया। यहूदियों को उनके मरकजी इबादत खाने में इकट्ठा करके जिंदा जला दिया गया। इस कत्लेआम की हौलनाकी एक चश्मदीद गवाह रेमंड ऑफ ऑगिलस के अल्फाज से वाज़ होती है। वह दिखता है कि सुलेमान के माबद यानी डोम ऑफ द रॉक के सहन में हमारे लोग घुटनों और घोड़ों की लगामों तक खून में लथपथ थे। और इस सब के बाद जब शहर लाशों से भर गया तो सुलेबी नाइट्स चर्च ऑफ होलीस पल कर गए। और वहां उन्होंने खुशी के आंसुओं के साथ खुदा की हम्दो सना की। तशद्दुद और इबादत का यह इम्तजाज आज भी नाकाबिल यकीन लगता है। वाकई।
तो इस सब के बाद क्या एक शहर पर कब्जा तो हो गया लेकिन अब उसका क्या करें? आपने एक ऐसा शहर फतह किया है जिसे आपने खुद ही खाली कर दिया है। बिल्कुल। किताब के मुताबिक यरूशलम एक बदबूदार मजबाखाना बन चुका था। महीनों तक गलियों में लाशों के ढेर पड़े थे। और मुसलमानों और यहूदियों का दाखिला शहर में ममनू करार दे दिया गया। यहां तक कि मकामी मशरकी मसीहियों को भी निकाल दिया गया क्योंकि सलूबियों को शक था कि वह मुसलमानों के हमदर्द हैं। तो यह तो एक बहुत बड़ा मसला था। शहर को दोबारा कैसे आबाद किया? नए हुक्मरान बाल्डविन ओवल ने उर्दन के इलाके से श्यामी मसीहियों को यरूशलम में आकर बसने की दावत दी। लेकिन असल तब्दीली शहर की शनाख्त को बदलने की थी। मतलब शहर के इस्लामी किरदार को मिटाने की कोशिश की गई। जी। डोम ऑफ द रॉक जो मुसलमानों के लिए इतना मुकद्दस था उसे टेंपल ऑफ द लॉर्ड नामी चर्च में तब्दील कर दिया गया और मस्जिद अक्सा मस्जिद-ए-असा पहले शाही महल बनी और फिर एक नई तंजीम का हेड क्वार्टर बन गई जिसे हम नाइट्स टेंपलर के नाम से जानते हैं। अच्छा यह नाइट्स टेंपलर और एक और नाम आता है नाइट्स हॉस्पिटलर। यह कौन थे? इनके नाम तो फिलाही तंजीमो जैसे लगते हैं। और शुरू में वो थे भी। नाइट्स टेंपलर का असल नाम था जीसस क्राइस्ट के गरीब साथी सिपाही। और इनका काम क्या था? उनका काम यूरोप से आने वाले जायरीन की डाकुओं से हिफाजत करना था। इसी तरह नाइट्स हॉस्पिटलर बीमार और जख्मी जायरीन के लिए हस्पताल चलाते थे। लेकिन फिर यह फौजी तंजीमे कैसे बन गई? यही तो दिलचस्प बात है। यह दोनों फलाही तंजीमे वक्त के साथ-साथ यूरोप की सबसे ताकतवर अमीर और खौफनाक फौजी तंजीमों में तब्दील हो गई। उन्होंने जंग और इबादत को आपस में मिला दिया। बिल्कुल। उनका खैराती काम आहिस्ता-आहिस्ता फौजी जारेहात में बदल गया। यानी हरमो शरीफ एक ऐसी जगह जहां इस्लाम में हर किस्म के तशद्दुद की मुमानित है। अब वो एक फौजी छावनी बन चुकी थी। जी। वो अब एक फौजी अड्डा था, असलाहाखाना था, घोड़ों का स्तबल था। यह शहर की रूह को बदलने के मुतरादिफ था।
लेकिन वक्त के साथ-साथ खुद सलूबियों के अंदर भी एक तकसीम पैदा होने लगी थी। जी। जो सलूबी खानदान फिलिस्तीन में ही पैदा हुए और पले बड़े जिन्हें पॉलियन कहा जाता था। वो मुकामी मुस्लिम और मसीही आबादी के साथ मिलजुलकर रहना सीख रहे थे। वो बकाए बाहमी पर यकीन रखते थे। बिल्कुल। लेकिन यूरोप से जो नए जोशीले सलूबी आते थे वो किसी किस्म की रवादारी के कायल नहीं थे। इसकी कोई मिसाल है? एक बहुत मशहूर मिसाल शामी अमीर ओसामा इबने मनकिद की है। वो लिखते हैं कि वो मस्जिद-ए-असा जिसे टेंपलर्स इस्तेमाल करते थे कि एक कोने में नमाज पढ़ रहे थे। टेंपलर्स उन्हें जानते थे और कभी तंग नहीं करते थे। जी। लेकिन एक दिन यूरोप से आया हुआ एक नया नाइट वहां आया। उसने ओसामा को जबरदस्ती पकड़ा। उनका रुख मशरिक की तरफ मोड़ा और गुस्से से कहा नमाज इस तरह पढ़ते हैं। और फिर क्या हुआ? पुराने कैंपलर्स ने फौरन आकर उससे माफी मांगी। लेकिन यह वाकया जाहिर करता है कि इन दो दुनियाओं में कितना फर्क था। तो जब सलीबी आपस में ही बटे हुए थे। मुस्लिम दुनिया में क्या हो रहा था? क्या वह इस कब्जे पर खामोश थे? शुरू में तो मुस्लिम दुनिया बिखरी हुई थी। लेकिन सलीबियों की मुसलसल जारियत ने उन्हें मुतहिद होने पर मजबूर कर दिया। और उस इत्तेहाद की अलामत बने नूरुद्दीन जंगी। बिल्कुल। उन्होंने जिहाद के तसवुर को दोबारा जिंदा किया। और यह सिर्फ फौजी जिहाद नहीं था। यह एक नजरियाती जिहाद भी था। नजरियाती जिहाद से क्या मुराद है? उन्होंने यरूशलम की फजीलत पर लिखी गई किताबें जिन्हें फज़ाइल उल कुस कहा जाता है। पूरे आलम इस्लाम में तकसीम करवाई। तो यह एक तरह का प्रोपेगेंडा था। समझे कैसे? यह सिर्फ किताबें नहीं थी। इनमें अहादीस और रिवायत के जरिए बताया जाता था कि अलस में एक नमाज का सवाब कितना ज्यादा है और उसे आजाद करवाना कितना बड़ा जिहाद है। उसने मुस्लिम दुनिया में एक जवाबी बयानिया तैयार किया। और इसी बयानिए से सलाहाउद्दीन अयूबी का ज़हूर हुआ। बिल्कुल। सलाहाउद्दीन जो नूरुद्दीन जंगी के ही एक कमांडर थे ने पहले मिस्र और फिर शाम को मुतहिद किया। उन्होंने बिखरी हुई मुस्लिम रियासतों को एक परचम तले जमा किया और फिर सलीबियों का सामना किया। 1187 हतीन की जंग। जी। हत्त्तीन के मकाम पर उन्होंने सलीबियों की मुत्तहदा फौज को एक ऐसी फैसला कुन शिकस्त दी जिसे वह फिर कभी संभल ना सके। मसीही रियासत यरूशलम का अमली तौर पर खात्मा हो गया। अब सिर्फ एक ही हदफ बाकी था। खुद यरूशलम शहर तो अब तारीख खुद को दोहराने के दहाने पर खड़ी थी। सलाहाउद्दीन की फौज ने यरूशलम का मुहासरा कर लिया। जी और शहर के अंदर मौजूद मसीही रहनुमा बैलन ऑफ ओबलीन जानते थे कि वो शहर का दफा नहीं कर सकते। उन्होंने सुलाहाउद्दीन से मुजाकरात की। जी। लेकिन सुलाुद्दीन ने पहले तो साफ इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वो शहर को तलवार के जोर पर ही फतह करेंगे। बिल्कुल वैसे ही जैसे सलीबियों ने 88 साल पहले किया था। वो 1199 का बदला लेना चाहते थे। यह तो एक बहुत नाजुक लम्हा था। बहुत नाजुक। लेकिन बैलन ने एक जबरदस्त धमकी दी। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें अमान ना दी गई तो वह शहर में मौजूद हर मुसलमान कैदी को कत्ल कर देंगे। अपनी बीवियों और बच्चों को खुद कत्ल करेंगे। और फिर शहर की मुकद्दस तरीन जगहों बेशुमूल डोम ऑफ द रॉक और मस्जिद अक्सा को जलाकर राख कर देंगे। और फिर आखिरी सांस तक लड़ेंगे। यह तो एक नाकाबिले तसवुर धमकी थी। इसका क्या असर हुआ? सुलाउद्दीन एक गहरी सोच में पड़ गए। उन्होंने अपने उलमा और मुशीरों से मशवरा किया और आखिरकार वो शहर को पुरामन तरीके से लेने पर राजी हो गए। भीम मसीही को कत्ल नहीं किया गया। अमीरों से फदिया लिया गया। जी। अमीर बाशिंदों को फदिया देकर जाने की इजाजत दी गई और सलाहाउद्दीन ने हजारों गरीब कैदियों को अपने भाई की दरखास्त पर बगैर किसी फिदिए के खुद अपनी जेब से रकम अदा करके आजाद कर दिया। यह रवैया इतना गैर मामूली था कि उसने मगरबी दुनिया को भी हैरान कर दिया। यूरोप में सलाहाउद्दीन की रहमदिली के किस्से मशहूर हो गए। जी। कुछ कहानियां तो यहां तक फैल गई कि वो खुफिया तौर पर मसीह हो गए थे या वो एक मिसाली नाइट थे। लेकिन क्या यह सिर्फ रहम दिली थी या उसमें गहरी सियासी हिकमते अमली भी थी? मतलब 1099 के कत्लेआम ने सलीबियों को एक मकसद दिया था। क्या सलाहाउद्दीन इसके बरक्स एक पैगाम देकर यूरोप में फूट डालना चाहते थे? यह एक बेहतरीन सवाल है। यकीनन इसमें सियासी हिकमत भी थी। सलाहाउद्दीन शहर को तबाही से बचाकर उसके माशी वसाइल पर कब्जा करना चाहते थे। वो यूरोप को यह पैगाम भी देना चाहते थे कि इस्लाम एक मुहज्जब और रहम दिल मजहब है। लेकिन उनके अमल की इखलाकी बरतरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिल्कुल नहीं। और फतह के बाद उन्होंने एक नए तामीराती जिहाद का आगाज किया। यह शहर की इस्लामी शनाख को बहाल करने का मंसूबा था। उन्होंने हरम शरीफ को अरके गुलाब से धुलवाया। जी मस्जिद-ए-असा से टेंपलर्स का सारा सामान निकलवाया और वहां नूरुद्दीन जंगी का बनाया हुआ खूबसूरत मेंबर नस् किया। तो यह सिर्फ सफाई नहीं थी। यह शहर की रूह को दोबारा हासिल करने की कोशिश थी। बिल्कुल। उन्होंने सलीबियों की बनाई हुई इमारतों को सूफी खानकाहों, मदारस और अस्पतालों में तब्दील किया। उन्होंने वक्त के निजाम को फरोख दिया ताकि इन इदारों के अखराजात पूरे हो और गरीबों की मदद की जा सके। और सबसे अहम बात उन्होंने यहूदियों को शहर में वापस आकर बसने की दावत दी। जी। जिस पर यहूदी तारीख दानों ने उन्हें एक नया साइरस करार दिया। वो शहर को दोबारा एक कसीरुल मजहब जगह बना रहे थे। लेकिन मुस्लिम हुक्मरानी के तहत तो सलीबियों का तकरीबन एक सदी पर मुहीद दौर खत्म हुआ और यरूशलम एक बार फिर अलकस बन गया। लेकिन जैसा कि हमने इस शहर की तारीख में बार-बार देखा है यह कहानी का इख्तताम नहीं था। बिल्कुल नहीं। सराहाद्दीन
के जानशीनों, अयूबियों और उनके बाद आने वाले ममलूकों को अपने नए चैलेंजेस का सामना करना था। और सलीबी जंगों ने एक ऐसी गहरी और देरपा खलीज पैदा कर दी थी जो आज तक महसूस की जाती है। जी, मुसलमानों के ज़हन में अलकत्स के लिए एक दफाई जज्बा पैदा हो गया। क्योंकि 1099 के तशद्दुद की याद उनकी इज्तमाई याददाश्त का हिस्सा बन गई। यह ख्याल कि यह मुकद्दस शहर हमेशा खतरे में है, गहरा हो गया। और यही पसमंजर अगली अजीम सल्तनत की आमद के लिए स्टेज तैयार करता है।
अपनी अगली नशिस्त में हम देखेंगे कि जब एक नई आलमी ताकत सल्तनत उस्मानिया और उसके सुल्तान सलीम अव्वल यरूशलम के दरवाजों पर दस्तक देते हैं तो शहर की तकदीर क्या रुख इख्तियार करती है। यह सोचना वाकई हैरानगुन है कि एक ही जगह, एक ही शहर बेवख़्त खुदा से गहरे ताल्लुक की अलामत और इंसानों के दरमियान शदीद तरीन तशद्दुद और तकसीम का सबब कैसे बन सकता है? यह जंग सिर्फ पत्थरों और इमारतों के लिए नहीं थी। नहीं, यह उस शहर की दास्तान पर उसके बयानिए पर कब्जे के लिए भी थी। और यह जंग आज भी किसी ना किसी शक्ल में जारी है।
यरूशलम की कहानी में एक ऐसा वक्त था जब ममलूक सल्तनत का चिराग बुझ रहा था और उफुक पर एक नई आलमी ताकत सल्तनत उस्मानिया तुलू हो रही थी। तो आज हम यरूशलम की कहानी के इसी लंबे और दिलचस्प बाप को देखेंगे। हमारे पास जो जराय हैं, वह बताते हैं कि यह शहर कैसे मुकम्मल तौर पर बदल गया। आज का हमारा बड़ा सवाल यह है कि चार सदियों की उस्मानी हुकूमत ने यरूशलम को एक नजरअंदाज शुदा सुबाई शहर से जदीद दौर के एक ऐसे मरकज में कैसे तब्दील किया जिस पर आज पूरी दुनिया की नजरें हैं और इस कहानी का आगाज एक ख्वाब से होता है। कहा जाता है कि सुल्तान सुलेमान आलीशान, जिनकी तामीर करदा फसीलें आज भी शहर की पहचान हैं, उन्हें यह हुक्म ख्वाब में पैगंबर इस्लाम ने दिया था।
और जब उस्मानी पहुंचे तो मकामी लोगों ने उनका इस्तकबाल किया। देखिए, हमें उस वक्त का माहौल समझना होगा। ममलूक सल्तनत के आखिरी दौर में यरूशलम बुरी तरह नजरअंदाज हो चुका था। मशत तबाह थी। वफ के इदारे खत्म हो चुके थे और बद्दू कबाइल के हमलों की वजह से तो तजारती रास्ते तक गैर महफूज़ थे। ऐसे में उस्मानी एक मुनज्जम मरकजी हुकूमत और कानून की हुक्मरानी का वादा लेकर आए। वो अपने साथ इस्तेहकाम लाए। और सुल्तान सुलेमान के दौर में तो जैसे यरूशलम की किस्मत ही बदल गई।
सबसे बड़ी तब्दीली तो शहर की फसीलों की तामीरे नौ थी। यह सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं था। है ना? यह एक बहुत बड़ा अलामती कदम था। बिल्कुल। यह दुनिया को यह बताने का एक तरीका था कि यरूशलम, जो एक जमाने से एक भूला बिसरा सुबाई कस्बा था, अब दुनिया की सबसे बड़ी सुपर पावर के तहफुज में है। लेकिन इसका एक अमली पहलू भी था। यह फसीलें सिर्फ किसी यूरोपी सलीबी हमले के खिलाफ नहीं बल्कि मकामी बद्दू कबाइल के हमलों से बचाव के लिए भी जरूरी थी। सुलेमान ने सिर्फ फसलें ही नहीं बनवाई बल्कि पानी के पूरे निजाम को बहाल किया जो शहर की जिंदगी के लिए शहरक की हैसियत रखता था।
अच्छा, तो इन सब इदामात का असर क्या हुआ? क्या शहर की जिंदगी पर कोई फौरी फर्क पड़ा? फरी और ड्रामाई फर्क पड़ा। 16वीं सदी के वस तक, मतलब सिर्फ चंद दहाइयों में, शहर की आबादी तकरीबन तीन गुना बढ़ गई। मुआशी जिंदगी में एक नई रूह फूंकी गई। शहर में तकरीबन 40 अलग-अलग पेशों के गिल्ट्स यानी ताइफे कायम हुए। 40? जी, 40, जो इस बात की निशानी है कि मशत कितनी मुतनव हो चुकी थी। यहां तक कि गुलूकारों और रक्कासों का भी अपना एक ताइफा था। यह एक खुशहाल और मुनज्जम शहर की तस्वीर थी।
इसी दौर में एक ऐसा फैसला भी किया गया जिसके असरात शायद उस वक्त किसी ने ना सोचे हों। लेकिन आज वो दुनिया के सबसे हस्सास मामलात में से एक है। यानी दीवार गिरिया या मगरबी दीवार को बाजाप्ता तौर पर यहूदियों की इबादत का तस्लीम कर लिया गया। यह एक बहुत अहम नुक्ता है। सुलेमान के लिए शायद यह एक मामूली इंतजामी फैसला हो। एक छोटी सी रियायत। इससे पहले यहूदी जैतून के पहाड़ पर इबादत किया करते थे। सुलेमान के फरमान ने हैकल की मगरबी दीवार के साथ इस तंग गली को उनके लिए मुख्तस कर दिया। लेकिन उसने गैर इरादी तौर पर यहूदी शनाख्त के लिए एक ऐसा मादी मरकज कायम कर दिया जो आगे चलकर दुनिया की सबसे ताकतवर अलामतों में से एक बन गया। वो सिर्फ एक इबादतगाह मुख्तस नहीं कर रहे थे, बल्कि मुस्तकबिल के एक कौमी मजहबी तनाजे का संग बुनियाद रख रहे थे।
यानी एक तरफ यह नया इस्तेकाम था। लेकिन इसके साथ कुछ नए खतशात भी जुड़े होंगे। यकीनन। इसी दौर में एक दिलचस्प वाक्या पेश आया। 1523 में डेविड रूबिनी नामी एक शख्स यरूशलम पहुंचा जिसका दावा था कि वो मसीहा है और उसका मंसूबा एक यहूदी फौज बनाकर इस सरजमीन को फतह करना है। अच्छा, जरा तसवुर करें कि यहूदी कम्युनिटी के रहनुमाओं की क्या हालत हुई होगी। उन्हें अभी-अभी नए हुकूक और इस्तेकाम मिला था और यह करिशमाती शख्स आकर उनके मुस्तकबिल को खतरे में डाल रहा था। उन्होंने फौरन इससे लाताकी का ऐलान कर दिया। लेकिन यह वाकया उस दौर की बेचैनी और मसीहा के इंतजार की शिद्दत को जाहिर करता है।
तो सुलेमान का दौर एक सुनहरी दौर था। तामीर, खुशहाली और इस्तेकाम का। लेकिन सल्तनतें हमेशा एक जैसी नहीं रहती। जब सुलेमान का साया उठ गया तो क्या यह सुनहरी दौर कायम रहा? नहीं। यह कायम ही रह सका। जैसे ही सुलेमान का दौर खत्म हुआ, सल्तनत की बड़ी मशीनरी में दरारें पड़ना शुरू हो गई। मरकज की गिरफ्त कमजोर हुई और उसका असर यरूशलम जैसे दूरदराज सूदे पर बहुत गहरा पड़ा। मकामी पाशा अक्सर जालिम और लालची होते और बदुओं के हमलों की वजह से रास्ते एक बार फिर गैर महफूज़ हो गए। वो खुशहाली धीरे-धीरे खत्म होने लगी।
तो शहर के अंदर का माहौल भी बिगड़ गया होगा। जब बाहर अदम तहफुज हो तो अंदर भी तनाव बढ़ जाता है। बिल्कुल। और यह तनाव सिर्फ मुसलमानों और गैर मुसलमानों के दरमियान नहीं था बल्कि मसीही फिरकों के अंदर भी शदीद लड़ाईयां शुरू हो गई। खासतौर पर कलीसा कयामत यानी चर्च ऑफ द होली सेपलकर पर कंट्रोल के लिए। यह सुरते हाल तो नाकाबिल यकीन हद तक बिगड़ गई थी। इंतज़ार करें। आप कह रहे हैं कि मसीहत के मुकद्दस तरीन मकाम पर कंट्रोल की लड़ाई उस्मानी अफसरों के लिए एक नीलामी जैसा कारोबार बन गई थी। यह तो हैरानक बात है। यह एक शर्मनाक जद्दोजहद थी। यूनानी ऑर्थोडॉक्स और फ्रांसिस्कन, जो कैथोलिक चर्च की नुमाइंदगी करते थे, मुकद्दस मकामात पर कब्जे के लिए एक दूसरे से लड़ रहे थे। और अक्सर फैसला इस बुनियाद पर होता था कि कौन सा फिरका इस्तनमूल में बैठे हुकाम को ज्यादा रिश्वत दे सकता है।
इसी दौरान एक और अहम चीज हुई जिसे कैपचुलेशंस कहा जाता है। कैपिटुलेशंस? यह तजारती मुयदों की तरह लगते हैं। लेकिन क्या यह सिर्फ तजारत तक महदूद थे? यह तो एक तरह का सफारती पिछला दरवाजा लगता है। आपने बिल्कुल सही समझा। यह शुरू तो तजारती मोयदों के तौर पर हुए थे। लेकिन जल्द ही सियासी असरो रसूख के हथियार बन गए। इन मुहायदों के तहत यरूशलम में रहने वाले एक फ्रांसीसी शहरी पर उस्मानी अदालत में नहीं बल्कि फ्रांसीसी काउंसिल की अदालत में मुकदमा चलता था। इसने शहर के अंदर छोटी-छोटी खुद मुख्तार रियासतें यानी मिनी सोवरन बबल्स बना दिए जिन्हें यूरोपी ताकतों ने अपना अस्रो रसूख बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया। हम, उन्होंने अपने झंडों तले हस्पताल, स्कूल और गिरजाघर बनाना शुरू कर दिए।
यानी एक तरफ सियासी जवाल और अंदरूनी लड़ाईयां थी और दूसरी तरफ शहर की रूहानी जिंदगी में एक नई गहराई आ रही थी। यह एक अजीब तजाद है। जी। और यही यरूशलम की तारीख की खूबसूरती है। इसी दौर में फ्रांसिस्कंस ने सलीब के मराहिल यानी स्टेशंस ऑफ द क्रॉस की रस्म को बाकायदा शक्ल दी जो आज भी विया डोलरोसा पर लाखों जायरीन अदा करते हैं। और दूसरी तरफ सफत शहर में यहूदी सूफिया ने लोरियानिक कबाला के नाम से एक ताकतवर रूहानी तहरीक शुरू की। लोरियानिक कबाला? यह एक पेचीदा तस्सवुर लगता है। क्या इसे आसान अल्फाज में समझाया जा सकता है? हम तसवुर करें कि कायनात की तखलीक एक बेहतरीन रोशनी के बर्तन के तौर पर हुई। लेकिन तखलीक के लम्हे ही वो बर्तन टूट गया। लोरिया ने कबाला सिखाता है कि इस बर्तन की मुकद्दस चिंगारियां अब हमारी मादी दुनिया में कैद हैं। पत्थरों में, पौधों में, यहां तक कि हमारे आमाल में और इंसानी जिंदगी का मकसद अच्छे काम करके उन चिंगारियों को आजाद करवाना और कायनात को उसकी असल मुकम्मल हालत में बहाल करना है। सही। यह एक गहरी पुरम्मीद सूझ थी जो यहूदियों की शदीद तकालीफ के दौर में पैदा हुई। उसने उनकी जलावतनी और मसायब को एक बेमायना आलमिय से एक मुकद्दस मिशन में बदल दिया।
और फिर 19वीं सदी में एक जलजला आया जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। मोहम्मद अली का मिस्री हमला। यह सिर्फ एक हुक्मरान की तब्दीली नहीं थी। है ना? यह सिर्फ हुक्मरान की तब्दीली नहीं थी। यह एक नजरियाती सैलाब था। मोहम्मद अली और उसका बेटा इब्राहिम पाशा अपने साथ जदीद, सेकुलर और मगरबी ख्यालात लेकर आए। उन्होंने ऐसी इस्लाहात की जो इससे पहले नाकाबिले तसवुर थी। उन्होंने जिमियों यानी गैर मुस्लिमों को मुसलमानों के बराबर कानूनी हैसियत दी। सेकुलर अदालतें कायम की और सबसे बढ़कर पहली बार यूरोपी मुालिक को यरूशलेम में बाकायदा काउंसिल खाने खोलने की इजाजत दी। यह एक इंकलाबी कदम था जिसने यरूशलेम को हमेशा के लिए बदल दिया और उसके नताइज भी यकीनन इंकलाबी होंगे। जब आप शहर के दरवाजे बैरूनी दुनिया के लिए पूरी तरह खोल देते हैं तो बैरूनी दुनिया अंदर आ जाती है।
शहर की आबादी में धमाका खेज इजाफा हुआ। 1850 की दहाई तक यहूदी एक बार फिर शहर में अक्सरियत में आ चुके थे और यूरोपी ताकतों ने उन कंसुल खानों के जरिए एक पुर अमन सलीबी जंग शुरू कर दी। पुर अमन सलीबी जंग? यह क्या थी? यह अस्रो रुसूख की जंग थी। हर यूरोपी मुल्क शहर पर अपनी छाप छोड़ना चाहता था। रूसियों ने एक बहुत बड़ा कंपाउंड बनाया। जर्मनों ने अपनी कॉलोनी कायम की। फ्रांसीसी खुद को कैथोलिक के मुहाफिज के तौर पर पेश कर रहे थे। प्रोटेस्टेंट मिशनरियों ने यहूदियों को ईसाई बनाने के लिए हस्पताल और स्कूल खोले। इसके जवाब में सर मोजज़ मॉनटिफ्यूरी और रूचशील्ड जैसे यहूदी मुयर हजरात ने अपनी फलाही खिदमात शुरू की ताकि यहूदियों को अपनी ही बिरादरी के अंदर मदद मिल सके। यरूशलम अचानक एक आलमी शतरंज की बिसात बन गया और इस मुकाबले ने शहर की शक्ल बदल दी और यह तब्दीली सिर्फ इदारों तक महदूद नहीं रही। शहर खुद भी जिस्मानी तौर पर बदल रहा था। लोग सदियों पुरानी फसीलों से बाहर निकल रहे थे। जी। और यह एक बहुत बड़ी नफसियाती तब्दीली थी। जरा सोचें, सदियों से लोग रात को शहर की दीवारों के बाहर रहने से डरते थे, अदम तहफुज की वजह से। लेकिन अब आबादी इतनी बढ़ गई थी कि शहर के अंदर जगह ही नहीं थी। मियां शारियम जैसी पहली यहूदी बस्तियां दीवारों के बाहर कायम हुईं। इसी तरह नए अरब मोहल्ले भी वजूद में आए। यरूशलम अपनी कदीम हुदूद से बाहर निकलकर एक जदीद शहर बन रहा था।
तो हमारे पास आबादी में इजाफा है। शदीद यूरोपी मुदाखलत है और शहर का फैलाव है। ऐसा लगता है कि यह तमाम तब्दीलियां एक नए किस्म के तूफान के लिए हालात साजगार कर रही थी। बिल्कुल। आपने एक ही वक्त में दो जदीद नजरियात, सयनियत और अरब कौम परस्ती को दुनिया के सबसे कदीम कब्ल जदीद शहरों में से एक में लाकर रख दिया है। यह एक धमाकाखेज मुरक्कब था। यह दोनों तहरीकें 19वीं सदी की तब्दीलियों की पैदावार थी। और सनत के बानी थियोडोर हटजल जब यरूशलम आए तो उनका तजुर्बा बहुत अजीब था। उन्हें पुराने शहर से मोहब्बत नहीं बल्कि नफरत महसूस हुई। जी। उन्होंने इसे 2000 साल की गैर इंसानियत, अदम बर्दाश्त और गिलाजत का मजमुआ करार दिया। उनका ख्वाब दीवारों के बाहर एक साफ सुथरा जदीद यूरोपी तर्स का सेकुलर शहर तामीर करने का था। वह इस गहरे जज्बाती और रूहानी लगाव को समझ ही नहीं पाए जो आम यहूदियों को दीवार गिरिया जैसी जगहों से था। उनके लिए यरूशलम एक ख्याल था। एक मुस्तकबिल का मंसूबा, ना कि एक जीता जागता पेचीदा शहर।
और इसी वक्त दूसरी तरफ अरबों में भी एक नया सियासी शूर पैदा हो रहा था। बिल्कुल। उनमें तुर्क हुक्मरानी के खिलाफ नफरत बढ़ रही थी और वह सूनी आबादकारी को अपने मुस्तकबिल के लिए एक वजूदी खतरे के तौर पर देख रहे थे। यह कोई बाद की सोच नहीं थी। यरूशलम के एक साबिक मेयर यूसुफ अल खालिदी ने 1899 में हर्तज़िल को एक खत लिखा था। अच्छा। जिसमें उन्होंने वाज़ तौर पर कहा था कि खुदा के नाम पर फस्तीन को अकेला छोड़ दो। उन्होंने खबरदार किया था कि यह जमीन पहले से आबाद है। बाद में डेविड बिन गोरयन, जो इसराइल के पहले वजीर आजम बने, लिखा कि जब उन्हें अरब कौम परस्ती की गहराई का एहसास हुआ तो यह उन पर बम धमाके की तरह गिरा। हम, उन्हें अंदाजा हुआ कि वह किसी खाली जमीन पर नहीं आए।
और फिर पहली जंग अज़ीम ने इस पूरे खित्ते की तकदीर पर मुहर लगा दी। सल्तनत उस्मानिया ने जर्मनी का साथ दिया और यह उनका आखिरी फैसला साबित हुआ। जी, जंग ने सब कुछ बदल दिया। 1917 तक बिरतानवी फौजे जनरल एलन बी की कयादत में यरूशलम के दरवाजों तक पहुंच चुकी थीं। उस्मानी फौज ने शहर को तबाही से बचाने के लिए बगैर लड़े ही उसे खाली कर दिया। और फिर वो तारीकी लम्हा आया, 11 दिसंबर 1917, जनरल एलएनबी का शहर में दाखिला। यह एक बहुत ही सोचा समझा अलामती लम्हा था। बहुत ज्यादा। एलएनबी ने शहर की मुकद्दस हैसियत के एतराम में घोड़े या गाड़ी पर सवार होने के बजाय पैदल जाफा गेट से शहर में दाखिल होने का फैसला किया। यह आजजी का एक मुजाहरा था जो जर्मन कैसर के शाहाना दाखिले के बिल्कुल बरख्स था। उन्होंने किले की सीढ़ियों पर खड़े होकर ऐलान किया कि तमाम मुकद्दस मकामात का तहफुज़ किया जाएगा और तमाम मज़ाहिब को मुकम्मल आजादी होगी। इस एक लम्हे ने यरूशलम में 400 साला उस्मानी दौर का खात्मा कर दिया।
तो आज हमने यरूशलम के 400 साला सफर को देखा। एक नजरअंदाजशुदा सूबाई कस्बे से सुलेमान आलीशान के शानदार तामीरशुदा शहर तक, फिर एक ज़वाल पज़र लेकिन रूहानी तौर पर जिंदा शहर और आखिर में आलमी ताकतों की कशमकश का मरकज बनते हुए एक जदीद शहर के तौर पर उभरते हुए। यह सुस्त रफ्तार तब्दीलियों, अचानक झटकों और गहरे तजादात से भरी कहानी है। और अगर हम इसे बड़ी तस्वीर से जोड़ें तो उस्मानी दौर का खात्मा कहानी का इख्तताम नहीं था बल्कि एक नए कहीं ज्यादा शदीद बाप का आगाज था। एलएनबी की आमद और उसके किए गए वादों ने बर्तानवी मैंडेट की बुनियाद रखी, जहां वह मुतसादम कौम परस्तियां जिनका हमने अभी जिक्र किया, बराएरास्त टकराने वाली थीं। कंट्रोल, शिनाख्त और तकद्दुस के जो सवालात उस्मानी दौर में पैदा हुए थे, वही सवालात 20वीं सदी में यरूशलम की तारीफ की तारीफ करेंगे और आज तक हमारे साथ हैं। अगले हिस्से में हम इसी कहानी को आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि बर्तानवी राज के तहत यरूशलम की तकदीर क्या रुख इख्तियार करती है।
खुशामदीद। हम यरूशलम की तारीख पर अपनी इस गहरी गुफ्तगू के बिल्कुल आखिरी और शायद सबसे अहम हिस्से में दाखिल हो रहे हैं। जी। पिछली डिस्कशंस में हमने हजारों साल का सफर तय किया है। कदीम बुनियादों से लेकर तीनों इब्राहिमी मज़ाहिब का मरकज बनने तक। और फिर सल्तनतों का उरूज ज़वाल भी देखा। बिल्कुल। आज हम 20वीं सदी की दहलीज पर हैं। जहां यह सारी तारीख, कुतें, अकीदे, सल्तनतें, सब कुछ जदीद कौम परस्ती के एक तूफान से टकराता है। और यह वो लम्हा है जिसकी गूंज आज तक सुनाई देती है। यह सिर्फ तारीख का एक और बाप नहीं, इसने पिछली तमाम तारीख का रुख मोड़ दिया। तो हम सल्तनत उस्मानिया के खात्मे से शुरू करते हैं। यरूशलम एक बड़ी तब्दीली के दहाने पर है। और हमारा बड़ा सवाल यह है, यह शहर आखिर इतना गहरा तकसीम कैसे हुआ? और क्या इसकी जदीद तारीख हमें उसके मुस्तकबिल के बारे में कुछ बता सकती है?
तो आइए पहली जंग अज़ीम के फौरन बाद चलते हैं। उस्मानी सल्तनत खत्म हो चुकी है। बर्तानवी फौजे शहर में हैं। उस वक्त क्या वादे किए जा रहे थे? फिजा कैसी थी? देखिए, ये एक बहुत ही पेचीदा सुरते हाल थी। आलमी ताकतें एक शतरंज की बिसात बिछाए हुए थीं और उस पर तीन बड़े और एक दूसरे से बिल्कुल मुतजाद वादे किए जा रहे थे। तीन? अच्छा, जी। पहला था 1915 का हुसैन मैकमोहान खतो किताबत, उसमें अरबों से कहा गया कि अगर आप तुर्कों के खिलाफ बगावत करें तो आपको एक बड़ी अरब रियासत मिलेगी। ठीक है। फिर एक साल बाद 1916 में बर्तनानिया और फ्रांस ने खुफिया तौर पर सक्स पीको मुहायदा कर लिया। अच्छा, ये तो खुफिया था। बिल्कुल। उसमें उन्होंने आपस में ही मशरिक वस्ता को बांट लिया। और फिर तीसरा 1917 की बेलफोर ऐलामिया, जिसमें फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक कौमी घर का वादा किया गया। यानी एक ही जमीन के लिए तीन अलग-अलग वादे? यह तो कोई गलत ही नहीं लगती। क्या बर्तानियों को खुद अंदाजा था कि वो क्या कर रहे हैं? अंदाजा, उन्हें सब कुछ मालूम था। और इसका सबसे बड़ा सबूत खुद लॉर्ड बेलफोर के एक मेमोरेंडम में मिलता है जो उन्होंने 1919 में लिखा। उन्होंने खुद माना। किया कि हम इस सरजमी में बसने वाले 7 लाख अरबों की ख्वाहिशात को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं। तो यह तकसीम करो और हुकूमत करो की पॉलिसी थी। बिल्कुल, यह कोई गलतफहमी नहीं थी बल्कि एक सोची समझी साम्राजी हिकमत अमली थी।
अच्छा, तो इस सियासी बिसात पर जमीन पर मौजूद लोग, यानी अरब और यहूदी, वो कैसे अपने कदम बढ़ा रहे थे? आबादी के लिहाज से तो अरबों की अक्सरियत थी। यहां दोनों की हिकमते-ए-अमलियों में जमीन आसमान का फर्क था। सेहोनी कयादत जो थी, वह यूं समझे कि एक लंबी शतरंज की बाजी खेल रही थी। मतलब? मतलब वो आलमी ताकतों की जबान समझते थे। वह सिफारतकारी जानते थे। वह मरहलावार कामयाबियों को कुबूल करते थे, चाहे वह उनकी मंजिल ना भी हो और अपने अंदरूनी इख्तलाफात के बावजूद एक मुत्तहदा महाज बनाते थे। किताब कहती है, आखिर में उन्हें सब कुछ मिल गया। क्या यह सिर्फ ना तजुर्बाकारी थी या उसके पीछे कोई सोच थी? यह एक बहुत अहम सवाल है। देखिए, अरद कयादत कई मसाइल से दोचार थी। एक तो वो सल्तनत उस्मानिया के खात्मे के सदमे में थे। उनका सदियों पुराना सियासी ढांचा टूट चुका था। सही। दूसरा, उनकी कयादत बटी हुई थी और वो मगरबी सिफारतकारी के दाव पेच से वाकिफ नहीं थे। उनकी हिकमते अमली सब कुछ या कुछ नहीं वाली थी। अच्छा। उनका ख्याल था कि कोई भी समझौता उनके मुकम्मल आजादी के हक को कमजोर कर देगा। वो एक ही चाल में शाहमात करना चाहते थे। लेकिन उस इंतजार में वो बाजी ही हार गए। हम, और किताब इस पूरे अमल के नतीजे को एक बहुत ही तल्ख और ताकतवर जुमले में बयान करती है। जी, के बेघर भटकते हुए यहूदी की जगह बेघर और बेदखल फस्तीनी ने ले ली। तो एक अलमिया दूसरे अलमियाए में बदल गया। और इसी अलमियाए ने अगली दहाइयों की बुनियाद रखी जो हमें 1948 की जंग और यरूशलम की तकसीम तक ले आई।
तो 1948 की जंग के बाद शहर तकसीम हो गया। यह कैसा यरूशलम था? मतलब रोजमर्रा की जिंदगी कैसी थी वहां? यह सिर्फ नक्शे पर एक लकीर नहीं थी। यह शहर के दिल पर एक जख्म था। खारदार तारें, दीवारें, बारूदी सुरंगे और एक नो मैनस लैंड। नो मैनस लैंड? जी, एक ममनुआ इलाका जो शहर को दो हिस्सों में काटता था। खानदान बिछड़ गए। मोहल्ले तकसीम हो गए। शहर की रूह जैसे दो टुकड़ों में बंट गई। और इन दो अलग-अलग दुनियाओं में जिंदगी चल कैसे रही थी? दोनों हिस्सों ने अपनी अलग राहें इख्तियार कर ली। मगरबी यरूशलम इसराइल का नया दारुल हुकूमत तो बन गया लेकिन उसे एक बंद गली जैसा महसूस किया जाता था। एक जख्मी शहर जो अपने दिल, यानी पुराने शहर से कट चुका था। अच्छा। इसराइली मुसन्निफ अमूज ओज का एक मशहूर नवेल है, माय माइकल, वो इसी दौर के मगरबी यरूशलम की घुटन और तन्हाई को बहुत अच्छी तरह से दिखाता है। और मशरकी यरूशलम? मशरकी यरूशलम, जो ऑर्डन के कंट्रोल में था, वहां 1948 के मुहाजरीन का बोझ था। उसकी मशत सियाहत पर चलती थी। लेकिन वह तरक्की में बहुत पीछे रह गया था। यह दो अलग-अलग शहर थे जो एक दूसरे से मुंह मोड़ कर जी रहे थे।
तो ऐसा लगता है कि यह तकसीम बहुत ठोस हो चुकी थी। शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि सिर्फ 20 साल में नक्शा फिर बदल जाएगा। जी। और फिर 1967 में छह रोजा जंग हुई और वो एक जलजले की तरह थी। उसने सिर्फ सरहद नहीं बदली। उसने नफसियात बदल दी। पुराने शहर पर कब्जा? यह सिर्फ एक फौजी फतह नहीं थी। है ना? बिल्कुल नहीं। इसराइली फौजियों के लिए यह एक बहुत ही गहरा, आप कह लें कि एक रूहानी तजुर्बा था। जराय बताते हैं कि सेकुलर फौजी भी, जिन्होंने शायद कभी इबादत ना की हो, वो मगरबी दीवार से लिपट कर रो पड़े। हम, यह सदियों की दुआओं और कहानियों की अमली ताबीरर थी। यह एक किस्म की घर वापसी का एहसास था। और यह शदीद जज्बाती तजुर्बा कितनी तेजी से सियासी हकीकत में बदला? बिजली किसी तेजी से वजीर दफा मोश दयान ने दीवार के सामने खड़े होकर ऐलान किया, हम वापस आ गए हैं और हम इसे कभी नहीं छोड़ेंगे। और इस पर फौरन अमल भी हुआ। बिल्कुल, मगरबी दीवार के सामने एक बड़ा प्लाजा बनाने के लिए सदियों पुराने मराकिशी मोहल्ले को बुलडोजरों से गिरा दिया गया। यानी एक तारीखी मोहल्ले को? जी, सैकड़ों लोगों को सिर्फ 3 घंटे का नोटिस देकर उनके घरों से निकाल दिया गया। दुनिया ने इसे गैरकानूनी कब्जा कहा। अकवामे मुत्तहदा ने करारदादें पास की। लेकिन बहुत से इसराइलियों के लिए यह जज्बा बैनुल अकवामी कानून से बालातर था।
तो शहर सरकारी तौर पर तो मुत्तहद हो गया। लेकिन इस इत्तेहाद ने अमन कायम नहीं किया बल्कि उसने तो नए और शायद ज्यादा गहरे तजादात पैदा कर दिए। जी हां, बिल्कुल। कई नई दरारें पड़ गई। पहली तो जमीन पर नजर आई। बस्तियों की शक्ल में? जी। मशरिक यरूशलम के इर्दगिर्द अरबों की जमीन पर यहूदी बस्तियों का एक जाल बिछा दिया गया जिसे कहा गया कि हम जमीन पर हकायक कायम कर रहे हैं। मकसद आबादी का तनासुब बदलना था। और दूसरी दरार? दूसरी दरार फस्तीनी रद्दे अमल की सूरत में सामने आई। सियासी मुजाहमत, शहरी नाफरमानी और फिर मुसल्ला कारवाइयां। और एक तीसरी दरार भी थी जो खुद इसराइली माशरे के अंदर पड़ी। जी। और यह शायद सबसे गैर मुतवक्का थी। मगरबी दीवार के प्लाजा पर मजहबी और सेकुलर यहूदियों में झगड़े शुरू हो गए कि यह इबादतगाह है या कौमी यादगार। अच्छा। और इसी दौरान टेंपल माउंट फेथफुल जैसे इंतहा पसंद ग्रुप भी सामने आए जो हरमो शरीफ से मुसलमानों की मौजूदगी को खत्म करना चाहते। तो इत्तेहाद के नारे के बावजूद 1987 की इत्तफादा ने यह दिखा दिया कि शहर दरअसल खौफ और बेतमादी की उन अनदेखी दीवारों से पहले से ज्यादा तकसीम हो चुका था। बिल्कुल, इत्तेहाद का मतलब एक कौम का दूसरी पर गलबा बन गया था और इससे अमन नहीं बल्कि एक मुस्तकिल कशीदगी पैदा हो रही थी।
तो यरूशलम की इस तवील और अक्सर तकलीफ देह तारीख पर अपनी इस गुफ्तगू को समेटते हुए इस किताब का हत्मी निचोड़ क्या है? क्या सबक मिलता है? मुसन्निफ का ख्याल है कि तारीख का सबसे बड़ा सबक यह है कि कुछ भी मुस्तकिल नहीं। यरूशलम में वही सल्तनतें ज्यादा देर तक कायम रहीं जिन्होंने किसी ना किसी शक्ल में बकाए बाहमी और रवादारी को अपनाया। हम, वह कहते हैं कि किसी भी फातेह का असल इम्तिहान यह होता है कि वह अपने से पहले वालों के साथ कैसा सुलूक करता है। इस मयार पर वह कहते हैं कि खलीफा उमर और सलाहाउद्दीन का रिकॉर्ड बेहतर था जिन्होंने शहर में यहूदियों और ईसाइयों को रहने की इजाजत दी। और यह सबक आज के लिए क्या मायने रखता है? किताब का इख्तताम एक बहुत चुकते हुए सवाल पर होता है। जी। वो पूछती है कि क्या आज के इसराइली और फिलिस्तीनी यरूशलम में अमन चाहते हैं या मुकम्मल फतह? बिल्कुल, क्योंकि दोनों एक साथ मुमकिन नहीं। मुसनिफ बाइबल के यसाया नबी के इस तसवुर का हवाला देता है जहां भेड़िया और भेड़ का बच्चा एक साथ रहेंगे। यह बकाए बाहमी का एक इस्तियारा है। तो सवाल यह है कि क्या आज के लोग इस तसवुर को हकीकत बनाने की हिम्मत रखते हैं? जी। या ख्वाहिश भी कि क्या यरूशलम में अमन मुमकिन है? बल्कि यह है कि अगर इतने मुकद्दस शहर में अमन नहीं हो सकता तो यह बहसियत मजमुई इंसानियत के बारे में क्या कहता है? हम, यरूशलम की जुदोजहद एक तरह से एक आईना है जिसमें हमें अमन के लिए अपनी सलाहियत और मुकम्मल फतह की अपनी ख्वाहिश के दरमियान एक लामुतनाई कशमकश नजर आती है और यह वह सवाल है जिस पर शायद हम सबको गौर करने की जरूरत है।