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ओम प्रतिष्ठ ओम प्रतिष्ठा। संसार में सबसे बड़ी शक्ति परमपिता परमात्मा है और दूसरी सबसे बड़ी शक्ति आत्मा है और सबसे बड़ी संसार की भौतिक शक्ति मन है। और इन तीनों का ही ठीक प्रयोग और संयोग ईश्वर का आनंद और मुक्ति है। पूरा योग दर्शन इस पर खड़ा है। अथ योग अनुशासनम। योगाित वृत्त निरोध। सदा दृष्ट स्थानम। बाकी तो सब प्रपंच है। सब सूत्र बाकी उसकी व्याख्या है। ध्यान रखना मूल इतनी बात ही है बस।
कल मैंने आपको बताया था अगर जीवन का ठीक आनंद लेना है तो प्रभु की शरण में आ जाए और प्रभु के शरण में आने में आने की एक ही कसौटी है के प्रभु की आज्ञा का पालन करें। जब तक प्रभु की आज्ञा से हम नित्य प्रति योगाभ्यास, संध्या यज्ञ, शरीर को ठीक रखने के लिए व्यायाम, शाकाहारी सात्विक भोजन, लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते तब तक परमात्मा नहीं मिलता।
संसार एक विद्यालय है। इस विद्यालय के गुरु परमपिता परमात्मा है। से पूर्व श्याम अभी गुरु कारण अच्छे दांत ध्यान रखो इस बात को। और इस विद्यालय का पाठ्य पुस्तक वेद है। जो वेद को छोड़कर इधर-उधर जाएंगे, तथा कथित भ्रांति पैदा करने वाले पाखंड फैलाने वाले ग्रंथों के पीछे वो वो फेल हो जाएंगे। उत्तीर्ण नहीं होंगे। यही तो नियम है पाठशाला का। अपनी सिलेबस की पाठ्यक्रम की पुस्तक छोड़ दी और नवेल पढ़ रहा है। तो परीक्षा में क्या लिखेगा? शून्य आएगा और फेल हो जाएगा।
यही अपनी बात सोच लो। अभी आप परीक्षा में बैठे हैं। कोई आपको टोकेगा नहीं, गलत हो, ठीक हो, कोई मारेगा, पीटेगा नहीं। आपने किसी ना किसी ने परीक्षा भवन में बैठकर परीक्षा अवश्य दी होगी। दी होगी ना? जब हाथ में पर्चा आ जाता है तो कोई कहता है यह गलत है। ये ठीक कर ले। ऐसा कर ले, वैसा कर ले। कोई नहीं बोलता। बस इतना ही कहता है समय का ध्यान रख। इतना संकेत कर देता है वहां पर परीक्षा करवाने वाला कि सावधान बच्चों अभी समय है दोबारा देख लो। वो देख लेता है पर्चा गलत लिख रहा है लेकिन फिर भी उसको नहीं कहता तू ठीक कर ले सबके लिए कह देता है। इसलिए भगवान भी सबके लिए कह देता है। अंदर आवाज आती है कि कभी-कभी जब आपके भीतर आवाज आती है ना गलत काम करने पर आपको रोकती है तो यह आत्मा की आवाज नहीं है। महर्षि दया सरस्वती भी यही बात लिख रहे हैं। यह आवाज परमपिता परमात्मा की है। अगर आत्मा की आवाज होती तो आत्मा गलत करवाती क्यों? अज्ञान के वशीभूत होकर वो परमात्मा की आवाज को हम दबाते हैं और फिर हम दुखों में फंस जाते हैं।
तो संसार एक विद्यालय और परीक्षा में हम और आप आप सब बैठे हैं। भगवान कुछ नहीं कहेगा। लेकिन जब पर्चा उसमें हाथ आ जाएगा जीवन का जो जो कर्म हमने किए हैं तो उस समय आपकी पेश नहीं चलेगी। वो किसी की नहीं सुनेगा। न किलवेत्र नो अस्त नित समति। प्रभु कहता है मेरे पास कोई रिश्वत नहीं चढ़ती, कोई चढ़ावा नहीं चढ़ता है, कोई सिफारिश नहीं लगती है और मेरे पास कोई ऐसा बस्सा नहीं है कि ठंडे बस्ते में डाल दो कुछ पता नहीं है फल मिलेगा कि नहीं जैसे सरकारी रखते हैं। तो एक ही उपाय है जीवन में आनंद पाने का और इस मानव जीवन को सफल करने का कि प्रभु प्रभु के पाठ्यक्रम के अनुसार चलो। जिस पाठ्यक्रम को पढ़कर योगेश्वर कृष्ण, रेदा पुरुषोत्तम श्री राम और महान सम्राट योगी और वैज्ञानिक शिव और महान विश्व कल्याणकारी विष्णु और वेद का प्रचार करके लोगों को ठीक मार्ग दिखाने वाले महर्षि ब्रह्मा जिस पाठ्य पुस्तक को पढ़कर अपने जीवन का कल्याण कर गए और भारत को ज्ञान और विज्ञान में विश्व गुरु बना गए। भारत को शक्ति में विश्व सम्राट चक्रवर्ती सम्राट रहा यह देश और धन दौलत में सोने की चिड़िया बना गए। आइए उसी पाठ्यक्रम की ओर चलकर उसी वेद को पढ़कर वेद की शिक्षा के अनुसार चलकर हम भी अपने जीवन को इस प्रकार से धन धन्य करें और कोई उपाय नहीं है।
और यदि भगवान को पाना है तो भाई भगवान की बात मानना पड़ेगा। भगवान से मैत्री कर लो। मैत्री जब होती है तो क्या होता है कि एक मित्र दूसरे मित्र के ठीक मार्ग को अपनाना चाहता है। अगर मित्र ठीक है तो मार्ग ठीक हो गया और गंदा मित्र चुना तो फिर वो बदमाशी की ओर जरूर ले जाएगा। दोनों भाग है हमारे पास। अगर आपने भगवान को मित्र बना लिया तो आपका बेड़ा पार। और अगर दुनिया के किसी धूर्त आदमी को, धूर्त गुरु को, धूर्त उल्टे सीधे व्यक्ति को जो पाखंड फैला रहा है उसको मित्र बना लिया तो नैया डूबनी डूबनी है कोई बचा नहीं सकता। जब मित्र गंदा होता है तो वो क्या सिखाता है? सिगरेट पीना, स्कूल कॉलेज से भागना, बदमाशी करना, कुकर्म करना, उल्टे सीधे गंदे पिक्चरों को देखना, चोरी, बदमाशी सब काम वो सीखता है। शराब पिलाना सिखा देता है थोड़ी-थोड़ी पियो कोई बात नहीं है। हजम होती रहेगी। अच्छे मित्र के संग में क्या होता है? अच्छी बात सीखता है। वो कहता है आप कब उठते हो? बोले मैं उठता हूं। व्यायाम करता हूं। मेरा शरीर बहुत सुंदर है। तो वो बच्चा सुबह उठता लगता है। बोले आप क्लास में फर्स्ट आते हो। बोले मैं ध्यान से सुनता हूं। गुरु जी की बात घर जाकर पढ़ता हूं। अगला पाठ पढ़ के आता हूं। तो इसलिए मेरी फर्स्ट डिवीजन आती है। तो वो भी पढ़ना शुरू करता है। तो क्या खाते हो आप? बोले मेरी माता ने ये बना के दिए। कितनी अच्छी सब्जी है, रोटी है। बोले मैं भी ये लाया करूंगा। तो दोनों साथ रहते हैं। दो मित्र बन जाते हैं कक्षा के अंदर तो साथ खाते हैं बैठकर। साथ मिलते हैं। एक विचार वाले अच्छे मित्र हो जाते हैं और घर भी जाना है तो कोशिश करते हैं कि बहुत सारा रास्ता इकट्ठे जाए।
क्या ऐसा भाव हमारा है जीवन में? क्या हम चाहते हैं कि ईश्वर के मित्र बन जाए? ओम शो मित्र शो वर्ण शो भवत। यह पहला मंत्र है सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में दिया गया उसका पूरा अर्थ देख लेना। शो मित्र वो कल्याणकारी संसार का शम कल्याण। कल्याण ना माने हमारा मित्र अगर हमारे कल्याण का साधन हमारे कल्याण करने वाला कोई उपाय संसार में कोई व्यक्ति है तो केवल परमपिता परमात्मा है। अगर आप उसके मित्र बन जाएंगे तो दुनिया में किसी चीज की कमी नहीं रहेगी। उस भगवान का अद्भुत शक्तिशाली आशीर्वाद मिलेगा। आनंदमय आशीर्वाद मिलेगा। किसी पदार्थ की कमी नहीं रहेगी कभी। यह उसके मित्र बनने का लक्षण है। देखिए इसलिए मैंने कल बताया था जितना भगवान के समीप आओगे उतने उसके मित्र बनोगे। जितनी भगवान की प्रकृति के समीप आओगे उसके मित्र बनोगे।
गृहस्थ आश्रम भी आज आवश्यक है लोगों के लिए। वो भी शरीर की मांग है। होना चाहिए। लेकिन उसको छोड़ना भी जरूरी है। ध्यान रखो। आज वोटों की कमी हो रही है। श्रेष्ठ व्यक्तियों की दुष्टों की बढ़ रही है। यह भी बहुत बड़ा जो है इससे विधर्म फैल जाएगा। ध्यान रखो। ग्रीष आश्रम के बाद लेकिन प्रभु ने कहा आधा जीवन तेरा आधा मेरा। तेरा तो जीवन है ही नहीं तुझे आधा जीवन दे दिया भोग के लिए। याद रखो एक सूत्र आता है अभी दिमाग से उतर गया योग दर्शन का कि प्रकृति बनाई किसी के लिए है कि कुछ तू उपभोग कर और कुछ इसके द्वारा अगला रास्ता तय कर। इसलिए भोग अपवर्ग्थम इदम शरीरम। भोग अपवर्ग्थम इदम संसार याद रखना। तो भगवान ने ये दिया ही संसार इसलिए कि इसमें दोनों भाग करने हैं सेवा भी साधना भी त्याग भी और त्याग के साथसाथ तप भी दोनों चीज चलेगी। तो जो लोग अपना गृहस्थ भोग कर बच्चों के सिर पर अपने हाथ से पगड़ी रखकर जंगल में चले आते हैं उनकी आयु लंबी होती है। अगर वह नियम से रहते हैं तो। अगर वह वास्तव में पाखंड से निकल चुके हैं। रहना जंगल में और ध्यान शहर में है तो उसका कुछ हिसाब किताब ठीक नहीं हो सकता। यह मैं आपको बता रहा हूं। आयुर्वेद के अनुसार खाएंगे और ऋषियों के अनुसार जीवन व्यतीत करेंगे। सात्विक भोजन दिनचर्या रहेगी और दुनिया की परवाह नहीं करेंगे। दुनिया क्या कहती है? याद रखना यह जीवन में ठान लो आप। पड़ोसी क्या कह रहा है? दुनिया क्या पहनती है? खाती है उसको गोली मारो। आपके ऋषि क्या कहते हैं? वेद क्या कहते हैं? आयुर्वेद क्या कहता है? उसके अनुसार चलो। हमें अपने जीवन को भगवान को दिखाना है। दुनिया को दिखाने से क्या मोक्ष मिलेगा? क्या संसार को दिखाने से आत्मा का आनंद मिल जाएगा? भटकते रह जाओगे। रोज बदलते रह जाओगे। हजारों कपड़े तुम्हारे पास हो जाएंगे। शांति फिर नहीं मिलेगी। सैकड़ों साड़ियां जोड़ लोगी फिर भी तुम्हारे मन की तृप्ति नहीं होगी कभी भी। ध्यान रखना इस बात को। इसलिए जीवन केवल लोगों के लिए नहीं है। ठीक है? लोगों में ठीक-ठाक रहना चाहिए। हमारे शरीर की नग्नता दिखाई ना दे। हमारे ऐसे कार्य हो जिससे किसी को कोई परेशानी ना हो। ये दो तीन बातें ध्यान में रखनी चाहिए। लेकिन हर चीज लोगों ने खुला मोरी की तो इसने खुली कर ली। इतनी खुली कि दो बंदे घुस जाए और तंग की तो इतनी तंग कर ली कि टांगे सिकुड़ गई। एक एक बेटी मिली अपने परिवार की है। उसकी बहन भी यहां बैठी है। उसके मैं गया जब तो क्या देखा कि अब उसका कुर्ता घुटने से भी लंबा यानी सलवार दिखाई नहीं दे रही। सलवार दिखाई दे रही है केवल 6 इंच की। इतनी लंबी। मैंने कहा इतना लंबा कपड़ा तूने पहना है। इतने नीचे से तो किसी गरीब का बेचारे की एक स्कर्ट जंपर बन जाता। कहते नहीं जी घुटने ढके रहते हैं। मैं चौकड़ी मारती हूं ढके रहते हैं। मैं अगले साल गया तो कुर्ता उसका जो था कमीज सलवार का वो घुटने से ऊपर आ गया। मैंने कहा अब क्या तकलीफ हो गई? जब मोरी तंग की तो मैंने कहा बड़ी तंग कर ली। कहती पैरों में फंसती है। अगले साल गया तो इतनी खुली हो गई। मैंने कहा अब नहीं फंस रही। इतनी तूने मोरी चौड़ी कर ली। तो यह सब जो बीमारियां है आप इस चक्कर में रहते हैं कि लोग आपको क्या कहते हैं? अरे यह सोचो कि देवों का मार्ग क्या है? भगवान आपको क्या कहेगा? उस रास्ते पर अपने को चलना है।
तो मैं कल कह रहा था कि वन का विधान है। वनी भव गृह भूतवा वनी भव। ये संकेत है। तो क्या सत्यार्थ प्रकाश में से पांचवा समुलास निकाल दें? कोई नेता नहीं। मैं मंच पर बैठता हूं तो मेरे पीछे पड़ जाएंगे। आचार्य जी इतनी लंबी आयु हो गई है सन्यास ले लो। मैंने कहा हां उस दिन सन्यास ले लूंगा जिस दिन आर्य समाज के तथाकथित नेता जितने भी 55 से ऊपर है वनप्रस्थ ले लेंगे। आर्य निरेश निश दिन उस दिन सन्यास ले लेगा तो सों की हालत खराब होती है कि सबको रगड़ दिया। मैंने कहा और क्या करूं फिर तुम मेरे पीछे पड़ते हो ठीक बात कहूं याद। लेकिन वन में जो व्यक्ति आता है क्या लाभ है सुनो। आपकी आयु लंबी होती है आप रोगों से बचते हैं। कारण क्या है? शहरों ों की गंदी वायु से बचते हैं। बार-बार जो वहां पर आपको रोग आते हैं उन रोगों से बचते हो। उसके बाद घर में बैठे हो चीनी चड़ाका तो होना ही होना है। मोहल्ले में कोई ना कोई तो फसाद होना ही होना है। रोज वो फिर आपकी इतनी परेशानी और अब तो तनाव पैदा होता है कि रोग पैदा होते हैं। आपकी दिनचर्या उन लोगों में ठीक नहीं रह सकती। दिनचर्या खराब फिर खानपान। अब एक लड़का लड़की नए आए हैं विवाह करके वह तुम्हारे वाला भोजन करेंगे या अपना करेंगे तुम रोते रहते हो वो कहते बाहर निकल। अब बाहर बेचारा जाता नहीं है कहता तो रहता है पर निकलता नहीं है फंसा हुआ। वही मैं एक जगह गया मैंने कहा भाई साहब अब आप सेवा निवृत्त हो गए सारे काम समाप्त हो गए बेटा बहू बड़े अच्छे हैं आपके घर में यज भी हो रहा है कोई कमी नहीं है अतिथियों की मैं आता हूं सेवा भी करते बच्चे सब मेरा सहयोग करते हैं। तो अभी वनपस ले लो। कहते बस थोड़ा सा काम है अगले वर्ष ले लूंगा। मैंने कहा ठीक है। मैं अगले वर्ष पहुंच गया। मैं कहा चले भाई साहब कहते बस थोड़ा सा काम शेष है। पीछे बेटा खड़ा था। कहने लगा ले जाओ दुखी हो गए हम इनको। कोई काम में बाकी नहीं है। करवा ली अपनी इज्जत। ऐसी जगह रहने से फायदा है कोई? ऐसी जगह रहने से तुम्हारा कोई फायदा है? वो पीछे पीछे जो छोकरा खड़ा कहता है इसको ले जाओ आपके काम आएगा। हमारे तो किसी काम का नहीं है। बताइए। और यहां पर आप शांत में कहीं भी आश्रम में मैं यहां की बात नहीं कर रहा हूं। केवल बहुत आश्रम बने हुए हैं। वो तपोवन देहरादून बना हुआ है। नारायण स्वामी का आश्रम है। वो तो वैसे बेचारा कोई रहने वाला ही नहीं है। उधर वास आश्रम गंगा के किनारे हरिद्वार का भी बना हुआ है। एक स्वामी जी थे हमारे स्वामी दीक्षानंद जी महाराज वो तो एक एक महीना रहते थे। उनका भी एक स्थान खाली पड़ा हुआ है। अरे और कुछ नहीं तो अपना बोरी बिस्तर ले किसी समाज में ही डट जाओ जो शुद्ध वातावरण में बनी हुई है। समाज का भी कल्याण हो जाएगा। तुम्हारा भी कल्याण हो जाएगा। तो कितना लाभ है? शुद्ध वायु में रहने से स्वास्थ ठीक और झगड़े पड़े सुनने बवाल से मन शांत और सारे रोगों की निवृत्ति। तो ऋषि ध्यान तो आपकी लंबी आयु चाहता था। आपको स्वस्थ देखना चाहता था। बिना दवाई के जीवन व्यतीत करना चाहता था। इसलिए भगवान ने कहा।
तो आप प्रभु के मित्र बनना चाहते हो तो उसकी प्रकृति के पास आ जाओ। यदि उसका मित्र बनना है तो उसकी बातों को मानो। कितने हैं जो सज्जन तैयार हैं जी भगवान का मित्र बनने के लिए कि हम जरूर वनपस ले लेंगे। अब बातति हो गया। ये शरीर आपका है कि भगवान का है? भगवान का। ये आपके पास सब कुछ है। किसका है? सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है। नहीं तो वही दुर्गति होनी है।
हम भोजन करने जा रहे थे। एक अम्मा फिर मिल गई हमें कहीं मुंबई के अंदर बेचारी कहती महाराज महाराज बहुत दुखी थी मैंने कहा क्या बात है एक बार आ जाओ मैं तो जानता नहीं था कहती मैंने कहां ले जा रही हो मैंने कहा और कहीं ले जा मेरे साथ एक व्यक्ति था मैंने कहा चलना है कहती जी कोई नहीं बहुत दुखी चल देख लेते हैं कोई खतरे वाली बात नहीं है मैंने कहा ऐसे कहीं और आतंकवादियों के डेरे में पहुंचा दे हमें कोई भरोसा नहीं है आजकल कुछ लड़की बैठी रहती है ना बच्चे वो वो अनाथ बैठे रहते हैं तो वो एक तरीका होता है कि इनको पकड़ो फसाओ। वहां पहुंचे जी तो अब वो बेचारे सारे लोग इकट्ठे हो गए हैं और अपने वो जो है भजन भजन बोल रहे थे आरती उतार रहे थे और कुछ क्या कुछ कर रहे थे तो इतनी देर में क्या देखा कि एक बूढ़ा बेचारा जो था ऊपर पड़ा था अब फिर देखा कि इसकी नाड़ी बंद हो गई है डॉक्टर भी खड़ा है फिर उसको नीचे उतारता है भाई अब निकल निकल जा कोई बात नहीं। इतने लोग आए इनको भी घर जाना है। इनको भी निकलना है। तो भी निकल यहां से। किसको निकल? मतलब वो जाएगा कहां? अंदर से निकले तब वो निकले। जैसे ही उसको नीचे खड़ा करें तो वो उसकी वो सांस आनी शुरू हो जाए और कहे भाभी भाभी भाभी। मैंने कहा भाभी तो ये नहीं भाभी वाला तो नहीं है। ये ये भाभी यानी कुछ भाभी का चक्कर है। हमने कहा भाई इसकी भाभी को जरा मिलवा दो। उसके ही कारण इसके प्राण अटके हुए हैं। कहते हैं जी मैंने कहा कहते इनकी कोई भाभी नहीं है। सबका स्वर्गवास हो गया। मैंने कहा पड़ोस में कोई महिला होगी जिसको भाभी जी कहते होंगे। कहते पड़ोस में भी कोई नहीं है। वो भी एक क्षणा व्यक्ति रहता है पड़ोस में। मैंने कहा फिर चक्कर क्या है? कहते जी हमें भी समझ नहीं आ रहा। मैंने कहा बेटे इधर आ तो। उसको अलग से बुलाया भीड़ से अलग होकर। मैंने कहा एक बात बताओ इनकी तिजोरी कहां है? कहते तिजोरी तो यह रही खड़ी सेठ जी की यह तिजोरी खड़ी है और मैंने कहा इसकी चाबी कहां है? कहते चाबी मेरी जेब में है। मैंने कहा चाबी मुझे दे दो। अब वो दोबारा फिर ऊपर चढ़ाया। फिर सांस खत्म हुई तो नीचे लाए। फिर कहे चाबी चाबी। मैंने उसकी जैसे ही हथेली पे रखी। कहता हाय चाबी। ऐसे मरना है क्या? ऐसे मरना है या प्रभु का नाम लेकर? हमारी इच्छा मरने की कैसी है? देखो मैं तो अपनी इच्छा बता रहा हूं कि मैं स्नान कर लूं। जब मुझे पता लगे कि हां मृत्यु मेरी मृत्यु अब थोड़ी देर में होने वाली है। स्नान करके जाऊं। चिता को सजाऊं, दीपक भी जलाऊं अपने हाथ से और ऊपर बैठ जाऊं और जोर से प्राणायाम करके सांस को बाहर निकालूं। कर दो मेरा राम नाम साथ जो करना है। ध्यान रखना इस बात को।
ऐसे ऐसे सज्जन लोग हुए हैं जिनको पता लग गया कि आज मैं जाने वाला हूं वो बैठे अपने प्राण निकाले और लोग पहले उसके परिवार वालों ने पूछा पिताजी जा रहे हो बोले बिल्कुल जा रहे हो। लेकिन इसी परिवार में आऊंगा अभी मेरा यहां पर बड़ा भारी आकर्षण है मैं किसी भी रूप में आऊंगा और उसके घर में जो उसका पौत्र हुआ। उसके लक्षण बिल्कुल दादा जैसे थे। वो खींच के लाती है वासना। याद रखना वो चला तो गया साधना तो करता था लेकिन अटका हुआ था उसी में। वो देखना चाहता था कि मैंने शादी कर दी दो बेटों की लेकिन बच्चा कोई हुआ ही नहीं। ये एक जो खटका था ना उसका वो अगले जन्म में जाके पूरा हुआ। अब आप देख लो कि आपको खटका किसका रखना है। भगवान के साथ जुड़ना है। बार-बार मरना जीना है। क्या कुछ करना है? 9 महीने तक फिर मां के गर्भ में लटकना है। फिर बाहर निकलना है। तो बच्चा करता क्या है? बेचारा मूत्र भी चढ़ जाता है। कई बार कोई ध्यान नहीं देता तो अपने मल को भी खा लेता है। बच्चा तो पता ही नहीं होता। लेकिन बच्चा वास्तव में बचा हुआ होता है। इसलिए हम बचे हुए रह और अपने जीवन में उस भगवान के प्रति श्रद्धा रखें भगवान के गुणों को अपनाकर पूरा हम भगवान नहीं बन सकता कोई भी व्यक्ति लेकिन उसके समीप आ सकते हैं और भगवान की समीपता का यही तरीका है कि वो गुणों को हम जीवन में धारण करें। भगवान सेवाभावी है सेवाभावी बने। भगवान सबका कल्याण चाहते हैं कल्याण करें। भगवान केवल सत्य बोलते हैं हम भी सत्य पर विचार करें। याद रखना। भगवान भगवान वातावरण को पवित्र रखते हैं। अपने सूरज के द्वारा यज्ञ को रचाते हैं। धरती को पवित्र करते हैं। हम भी नित्य प्रति यज्ञ रूपी इस धरा के सूर्य को रचाकर अपनी धरती को पवित्र रखें। भगवान किसी से ईर्ष्या द्वेष नहीं करता। वो ऊंच नीच छुआछूत नहीं करता। हम भी अपने जीवन में ऊंच नीच छवा छूत को छोड़कर अपने इन भगवान के कुछ गुणों को धारण करके अपने जीवन को भी बनाएं।
देखो भगवान का और आत्मा के और परमात्मा के बहुत से गुण मिलते हैं। ये मैं आपको बताता हूं। परमात्मा चित है। चेतन आत्मा भी चेतन है। परमात्मा सत्य है। आत्मा भी सत्य है। यानी दोनों चेतन है और दोनों सदा बने रहते हैं। ध्यान रखना। भगवान भी कर्म करता है। हम थोड़ा कर्म करते हैं। लेकिन कुछ अंतर है। भगवान सर्वव्यापक है। पर हम एक देश हैं। भगवान सर्वव्यापक होने से सर्वशक्तिमान है। परंतु हम एक देश होने से अल्पशक्तिमान अल्पज है। वो सर्वज्य है। क्योंकि वो सर्वव्यापक है। ध्यान रखो इस बात को। तो यह भगवान के जितने गुण मिल सकते हैं बाकी भगवान के पास जो वेद का अद्भुत ज्ञान है उसको प्राप्त करें। हम अपने जीवन के अंदर इन भावनाओं को रखें और यह समय मिलता है जब घर गृष्टि से बाल बच्चों से निवृत्ति हो जाती है तो आदमी को पूरा टाइम फिर मिलता है उसका मित्र बनने के लिए क्योंकि फिर आपके और परमात्मा के बीच में तीसरा कोई रोड़ा नहीं है।
लेकिन एक बात और कहना चाहूंगा माताओं के लिए वनपस अनिवार्य नहीं है। वो एक बार अपना घर बदल के आ चुकी हैं। इसलिए ऋषिवर लिखते हैं संस्कार विधि में वह लिखते हैं कि अगर पत्नी साथ जाना चाहे तो वह साथ ले जा सकते हो लेकिन संयम से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए दोनों। अगर पत्नी की इच्छा नहीं तो वह बच्चों के पास रहे और माताओं के लिए एक दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं जो बच्चों के पास रहे तो नौकरानी बन के ना रहे उनकी गुरु धर्म गुरु बनकर रहे। तो अगर इस तरह से समाज चलेगा और बुजुर्ग आगे जाएंगे तो कितना प्रभाव पड़ता है।
अंतिम बात कह के विराम लूंगा। मैं गाड़ी पर जा रहा था यहां से जम्मू कश्मीर की ओर। ये गुरुकुल था पानीपत और उससे आगे स्वामी रमेशानंद जी का क्या नाम है उस जगह का? गरौंडा। गरौंडा के पास यह याद आया कि गाड़ी के अंदर पाना नहीं है। अगर अचानक कहीं पंचर हो गया तो टायर तो खुलेगा नहीं। तो मुझे सामने हाईवे पे जाते हुए बाएं हाथ को मार्केट दिखाई दी। जब मैं उधर बढ़ रहा था करल की तरफ अंबाला की तरफ तो मैं मार्केट में चला गया। वहां पर एक दुकान थी ऑटोमोबाइल के पार्ट्स की। तो मैंने कहा भैया एक पाना दे दो गाड़ी का और जो भी ठीक-ठाक मूले लगा लो। कहने लगा पाना तो आपको मिल जाएगा बिल्कुल ठीक-ठाक मिलेगा पर यहां नहीं मिलेगा। आपको मेरे घर चलना पड़ेगा। मैंने कहा क्यों पाने घर में रखें? कहता है नहीं जी पाना घर नहीं रखा लेकिन आपको घर में ले जाना है। क्योंकि आपको मैं पहचान ही गया हूं। आप ब्रह्मचारी आर नरेश है। मैंने कहा घर क्यों ले जा रहे हो? कहने लगे ऐसा है मेरे पिताजी आपको बहुत मानते थे। तो एक बार घर चलो जरूर। सुबह का समय है। कुछ फल फूल जो भी है ग्रहण करो। वो सज्जन घर ले गए। बैठक में बिठाए यानी पान लेने की जगह दूध मिला और फल मिला। याद रखो। तो जहां ड्राइंग रूम में बैठे थे उन्होंने कहा देखो यह मेरे पिताजी और माता जी की फोटो है और दोनों वानप्रस्थ के में रह रहे हैं और उनकी प्रेरणा से मैं दैनिक यज्ञ करता हूं और संतों की सेवा करता हूं। तो माता-पिता के वानप्रस्थ जाने पर बच्चों पर यह प्रभाव पड़ता है कि मेरे माता-पिता वानप्रस्थ में है। मैं भी उनके पीछे चल के उनका काम करूं। वो सब कुछ खिलाने पिलाने के बाद दक्षिणा भी मिली। पाना तो फ्री मिलना ही मिलना था। ऊपर ₹100 और मिले कि महाराज आप हमारे घर में आए हो। हैं तो इसलिए दक्षिणा भी लो। तो यह देखो कितना लाभ है। इसलिए आप ईश्वर के मित्र बने। उसके साथ जुड़े और इसी जीवन में उस भगवान का आनंद पाए। यही ईश्वर से प्रार्थना है कि सब लोग वेद के मार्ग पर चलते हुए और उस प्रभु को सर्व्यापक समझते हुए पाप से बचकर अपने जीवन के आनंद को मानव जीवन को सफल करें।
ओम शांति शांति शांति। सबको बहुत-बहुत आशीर्वाद। शांत।