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आप सभी को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। बजरंगबली आपकी हर परेशानी दूर करें। आपके जीवन में सुख, शांति और सफलता भर दें।
आज अंजनी पुत्र हनुमान जी के जन्मोत्सव पर मैं आप सभी को हनुमान जयंती की बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। हनुमान जी का जन्म इस धरती पर धर्म की रक्षा और प्रभु राम की सेवा के लिए हुआ था। आज इस पवित्र दिन पर आइए हम सब उनके गुणों को याद करें और उनसे प्रेरणा लें।
तो आइए सुनते हैं पवन पुत्र हनुमान जी की पावन और अद्भुत कथा।
बात उस समय की है जब [संगीत] धरती कांप रही थी। सिर्फ धरती ही नहीं देवलोक में देवताओं के सिंहासन भी हिल रहे थे और पाताल में शेषनाग की फण भी भारी हो रही थी। एक अजीब सा अंधेरा, एक अजीब सा डर हर तरफ फैल [संगीत] गया था। ऐसा लगता था जैसे सूरज तो उगता था पर उसकी रोशनी में वह पहले जैसी गर्माहट नहीं थी। हवाएं तो चलती थी पर उनमें फूलों [संगीत] की खुशबू की जगह एक अनजानी सी दहशत घुली रहती थी। नदियों का पानी बहता तो था पर उसकी कलकल में संगीत नहीं बल्कि किसी के रोने की सिसकियां सुनाई देती थी।
यह सब हो रहा था राक्षसों के अत्याचार के कारण। लंका का राजा रावण जिसे ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान मिला था कि कोई देवता, यक्ष, गंधर्व या नाग उसे मार नहीं सकता। वो खुद को भगवान समझने लगा था। उसके राक्षस सेनापति जहां भी जाते हाहाकार मचा देते। तपस्या में लीन ऋषियों की शांत कुटियाओं में उनका राक्षसी अट्टाहास गूंजता। हवन कुंडों में पवित्र अग्नि की जगह अपवित्र चीजें फेंक दी जाती। मासूमों की चीखें और बेबसों की आहें आसमान में गूंजती [संगीत] थी। पर कोई सुनने वाला नहीं था।
धरती मां अपनी संतानों को इस तरह तड़पते देख रोती थी। वह हर रोज अपनी पीड़ा देवताओं तक पहुंचाती थी। देवलोक में भी शांति नहीं थी। देवराज इंद्र का दरबार तो सजता था पर हर देवता के चेहरे पर एक चिंता की लकीर खींची [संगीत] रहती थी। वह शक्तिशाली थे। उनके पास दिव्यास्त्र थे। पर रावण के सामने सब बेबस थे। क्योंकि वह ब्रह्मा जी के वरदान से बंधे हुए थे।
एक दिन जब अत्याचार की [संगीत] हद हो गई तो सभी देवता मिलकर सृष्टि के रचयिता परमपिता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। सबके चेहरे उतरे हुए थे। आंखें झुकी हुई थी। देवराज इंद्र ने हाथ जोड़कर कहा पितामह अब सहा नहीं जाता। रावण के अत्याचार ने तीनों लोकों में त्राहित [संगीत] त्राहि मचा दी है। धर्म का नाश हो रहा है। अधर्म बढ़ रहा है। आपने ही उसे अजय होने का वरदान दिया था। अब आप ही कोई रास्ता दिखाइए।
ब्रह्मा जी ने अपनी आंखें खोली। उनके चेहरे पर एक गहरी पीड़ा और चिंता थी। वह बोले देवराज मैंने उसे वरदान दिया था कि कोई देव, दानव, यक्ष, किन्नर उसे नहीं मार पाएगा। पर उसने वरदान मांगते समय एक भूल कर दी। उसने घमंड में आकर मनुष्य और वानर को तुच्छ समझा और अपनी मृत्यु की सूची में उनका नाम नहीं लिया। उसकी मृत्यु किसी मनुष्य या वानर के हाथों ही होगी। यह सुनकर देवताओं के चेहरों पर एक हल्की [संगीत] सी आशा की किरण दौड़ी। पर फिर वही सवाल ऐसा कौन सा मनुष्य होगा जो उस महाबलशाली रावण का सामना कर पाएगा?
ब्रह्मा जी ने उन्हें रास्ता दिखाया। उन्होंने कहा इसका उत्तर मेरे पास नहीं जगत के पालनहार भगवान विष्णु के पास है। चलिए हम सब शीर सागर चलते हैं। सारे देवता ब्रह्मा जी के साथ शीर सागर पहुंचे। जहां भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर योग निद्रा में लीन थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थी। देवताओं की स्तुति सुनकर भगवान विष्णु ने अपनी आंखें खोली। उनके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी जैसे वह सब कुछ पहले से ही जानते हो।
ब्रह्मा जी ने सारी व्यथा सुनाई। भगवान विष्णु मुस्कुराते हुए बोले हर समस्या का समाधान समय आने पर स्वयं प्रकट हो जाता है। अधर्म का अंधकार जब बहुत घना हो जाता है तब धर्म के सूर्य का उदय निश्चित होता है। मैंने धरती को वचन दिया है। मैं अयोध्या के राजा दशरथ के घर एक मनुष्य के रूप में राम नाम से जन्म लूंगा और इस धरती को रावण के अत्याचार से मुक्त करूंगा। यह सुनकर सभी देवताओं ने जय जयकार की। उन्हें अपना स्वामी अपना पालनहार मिल गया था।
पर भगवान विष्णु ने आगे कहा, किंतु इस महान कार्य में मुझे आप सब देवताओं के सहयोग की भी आवश्यकता होगी। रावण की सेना बहुत विशाल और मायावी है। उसका सामना करने के लिए मुझे एक ऐसी सेना चाहिए होगी जो बल, बुद्धि और भक्ति में अद्वितीय हो। इसीलिए मैं आप सब देवताओं से कहता हूं कि आप भी पृथ्वी पर वानर और भालू के रूप में अंश रूप से जन्म [संगीत] ले। ताकि जब मैं अपनी लीला शुरू करूं तो आप सब मेरे सहायक बने।
देवताओं ने सिर झुकाकर [संगीत] आज्ञा स्वीकार की। हर देवता ने अपने-अपने अंश से पृथ्वी पर श्रेष्ठ वानर योद्धाओं को जन्म दिया। कोई रीच बना, कोई कवि, जामवंत, नल, नील [संगीत] जैसे महान योद्धा उन्हीं देवताओं के अंश थे।
जब सब देवता अपने-अपने अंश अवतार की तैयारी कर रहे थे, तब कैलाश पर्वत पर बैठे भगवान शिव शांत और ध्यान में मग्न थे। पर उनका ध्यान बाहर से शांत था। अंदर एक हलचल थी। वह अपने प्रभु अपने आराध्य भगवान विष्णु के राम अवतार की बात सुनकर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। उनके मन में अपने प्रभु की सेवा करने की एक तीव्र इच्छा जाग उठी। वो सोचने लगे मेरे प्रभु एक मनुष्य के रूप में धरती पर जा रहे हैं। वो लीला करेंगे, दुख सहेंगे, संघर्ष करेंगे। क्या मैं बस कैलाश पर बैठे यह सब देखता रहूंगा? नहीं, मैं भी जाऊंगा। मैं उनका सबसे बड़ा सेवक बनूंगा। मैं उनकी हर मुश्किल में उनकी ढाल बनूंगा। मैं उनकी भक्ति का [संगीत] ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करूंगा जो युगों युगों तक गाया जाएगा।
भगवान शिव की यह इच्छा इतनी प्रबल थी कि उनका ध्यान टूट गया। उन्होंने तय कर लिया कि वह भी अपना एक अंश पृथ्वी पर भेजेंगे। पर उनका अंश साधारण नहीं हो सकता था। वो रुद्र का अवतार होगा जिसमें 11 रुद्रों की शक्ति होगी जो अजर अमर होगा जो बल में, बुद्धि में, [संगीत] ज्ञान में और सबसे बढ़कर भक्ति में सर्वश्रेष्ठ होगा।
अब सवाल यह था कि भगवान शिव का यह तेजस्वी, महाशक्तिशाली अंश धारण कौन करेगा? इसके लिए एक ऐसा गर्व चाहिए था जो पवित्र हो, निष्पाप हो और जिसमें शिव के तेज को सहने की शक्ति हो। और यहीं से शुरू होती है उस मां की कहानी जिसे दुनिया अंजना के नाम से जानती है।
पृथ्वी पर सुमेरू नाम का एक विशाल पर्वत था। वो इतना ऊंचा [संगीत] था कि उसकी चोटी सोने की तरह चमकती थी और बादलों से बातें करती थी। उसी सुमेरू पर्वत पर वानरों का एक बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली राज्य था। वहां के राजा थे केसरी। केसरी सिर्फ नाम के ही केसरी यानी सिंह नहीं थे। वह सच में सिंह की तरह पराक्रमी, निडर और न्यायप्रिय थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत प्रेम करती थी। उनका राज्य खुशहाल था पर राजा केसरी के जीवन में एक खालीपन था, एक दुख था।
उनकी पत्नी थी अंजना। अंजना सुंदरता की मूर्ति थी। उनका मन गंगा की तरह पवित्र था और स्वभाव में शहद जैसी मिठास थी। वो भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थी। हर रोज सुबह उठकर स्नान करके वो घंटों तक शिवलिंग की पूजा करती थी। उनकी आंखों में अपने पति के लिए प्रेम और सम्मान था। पर साथ ही एक गहरी उदासी भी छिपी रहती थी। अंजना और केसरी के विवाह को कई वर्ष बीत चुके थे। पर उनकी गोद सुनी थी। एक संतान के लिए अंजना का मन हर पल तड़पता था। वो पूजा करते हुए भगवान शिव से यही मांगती। हे प्रभु सब कुछ दिया आपने। पर मुझे मां बनने का सुख कब दोगे? मेरी गोद कब भरेगी? मुझे एक ऐसा पुत्र दो जो मेरा और मेरे पति का नाम रोशन करे जो धर्म के रास्ते पर चले और दुनिया का कल्याण करे।
अंजना के आंसू रोज शिवलिंग पर गिरते थे। केसरी अपनी पत्नी की यह उदासी देखते थे पर कुछ कर नहीं पाते थे। वो उन्हें समझाते अंजना दुखी मत हो। जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा। पर अंजना का मन कैसे मानता? असल में अंजना के साथ एक पुरानी कहानी जुड़ी हुई थी। वो अपने पिछले जन्म में देवलोक की एक बहुत ही सुंदर अप्सरा थी जिसका नाम था पुंजक स्थला। एक बार वो अपनी चंचलता के कारण एक तपस्वी ऋषि के पास पहुंच गए और उनका ध्यान भंग करने की कोशिश की। ऋषि ने क्रोध में आकर उसे श्राप दे दिया। तूने एक वानर [संगीत] की तरह चंचलता दिखाई है। जा अगले जन्म में तू पृथ्वी पर एक वानरी के रूप में जन्म लेगी। पुंजिका स्थला कांपते हुए ऋषि के चरणों में गिर पड़ी और क्षमा मांगने लगी। ऋषि का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा श्राप तो वापस नहीं हो सकता पर जब [संगीत] तू भगवान शिव के अंश को पुत्र के रूप में जन्म देगी तब तुझे इस श्राप से मुक्ति [संगीत] मिल जाएगी। इसी श्राप के कारण अंजना का जन्म वानर राज केसरी की पत्नी के रूप में हुआ था। उन्हें यह सब याद नहीं था पर उनकी आत्मा जानती थी कि उनकी मुक्ति का मार्ग भगवान शिव की भक्ति से ही होकर गुजरता है।
एक दिन अंजना बहुत उदास थी। वह महल के बगीचे [संगीत] में बैठी फूलों को देख रही थी। पर उनका मन कहीं और था। तभी वहां मतंग ऋषि आए। वह एक बहुत बड़े ज्ञानी और तपस्वी थे। राजा केसरी और अंजना ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। मतंग ऋषि ने अंजना के चेहरे को पढ़ लिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, पुत्री तुम्हारे मन की पीड़ा मैं समझ सकता हूं। तुम्हारी गोद शीघ्र ही भरेगी। तुम्हारे भाग्य में एक ऐसे पुत्र का योग है जिसकी कीर्ति तीनों लोकों में फैलेगी। वह सूर्य की तरह तेजस्वी, वायु की तरह वेगवान और समुद्र की तरह गंभीर होगा। वह भगवान का सबसे बड़ा भक्त बनेगा।
यह सुनकर अंजना की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा, पर यह कैसे संभव होगा मुनिवर, मैंने तो सारे व्रत सारे पूजन कर लिए। ऋषि ने कहा, पुत्री, तुम्हें एक बहुत ही कठोर तपस्या करनी होगी। तुम्हें वायु देव को साक्षी मानकर भगवान शिव की आराधना करनी होगी। यह तपस्या आसान नहीं होगी। तुम्हें महल का सुख, अपने पति का साथ सब कुछ छोड़कर जंगल में एकांत में यह तप करना होगा। हर मौसम का प्रकोप सहना होगा। भूख प्यास भूलकर बस शिव के नाम का जाप करना होगा। क्या तुम यह कर पाओगी?
अंजना की आंखों में एक नई चमक आ गई। उदासी की जगह एक दृढ़ [संगीत] निश्चय ने ले ली। उन्होंने कहा, मुनिवर, अपने पुत्र के लिए मैं कोई भी कष्ट सहने को तैयार हूं। मैं यह तपस्या अवश्य करूंगी। राजा केसरी के लिए यह सुनना बहुत कठिन था। वह अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे और उन्हें एक पल के लिए भी खुद से दूर नहीं करना चाहते थे। पर वह यह भी जानते थे कि यह अंजना के जीवन की सबसे बड़ी इच्छा है। उन्होंने भारी मन से अंजना को तपस्या के लिए जाने की आज्ञा दे दी।
अंजना ने राजसी वस्त्र त्यागे और तपस्विनियों वाले वस्त्र धारण किए। उन्होंने अपने सारे आभूषण उतार दिए। उनके चेहरे पर अब कोई मोह या दुख नहीं था। बस एक लक्ष्य था शिव को प्रसन्न करना। उन्होंने एक सुंदर और शांत वन चुना और एक शिला पर अपना आसन लगाया। उन्होंने आंखें बंद की और ओम नमः शिवाय का जाप शुरू कर दिया।
अब अंजना [संगीत] की कठोर तपस्या शुरू हो चुकी थी। दिन बीतते गए फिर महीने और फिर साल। गर्मियों में तपता सूरज उनके शरीर को जलाता पर वो अपने ध्यान से नहीं दिखती। बारिश की बूंदे उनके शरीर को भिगो देती [संगीत] पर उनका मन शिव में लगा रहता। सर्दियों की ठंडी हवाएं उनके शरीर को कंपा देती पर उनकी आस्था की गर्मी उन्हें बचाए रखती। वो बस कंद मूल फल खाकर रहती। धीरे-धीरे उन्होंने वह भी छोड़ दिया और सिर्फ हवा और पानी पर जीवित रहने लगी।
जंगल के जानवर भी उनकी तपस्या को देखकर हैरान थे। खूंखार शेर और बाघ भी उनके पास से चुपचाप गुजर जाते जैसे वह किसी देवी की रक्षा कर रहे हो। पंछी उनके सिर पर बैठकर चहचहाते जैसे वह शिव का भजन गा रहे हो। पवन देव यानी वायु के देवता हर पल अंजना को देखते थे। वो अपनी हवा के झोंकों से उनकी थकान मिटाने की कोशिश करते। जब अंजना प्यास से व्याकुल होती तो वह नमी वाली हवाएं उनकी ओर भेजते। वह अंजना की भक्ति, उनके त्याग और उनके अटूट विश्वास को देखकर अभिभूत थे। वह हर रोज अंजना की तपस्या की कहानी कैलाश पर भगवान शिव और देवलोक में अन्य [संगीत] देवताओं को सुनाते। अंजना की तपस्या ने तीनों लोकों को हिला दिया था। उनकी भक्ति की अग्नि इतनी तीव्र थी कि उसका ताप कैलाश तक महसूस हो रहा था।
उधर अयोध्या में राजा दशरथ ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए एक बहुत बड़ा यज्ञ जिसे पुत्र कामेष्ठी यज्ञ कहते हैं आयोजित किया था। यज्ञ के अंत में अग्निकुंड से स्वयं अग्निदेव एक सोने के कटोरे में खीर लेकर प्रकट हुए। उन्होंने वह खीर राजा दशरथ को दी और कहा, राजन यह [संगीत] देवताओं का प्रसाद है। इसे अपनी रानियों को खिला दो। तुम्हें चार पुत्रों की प्राप्ति होगी। राजा दशरथ ने वह खीर अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकई और सुमित्रा में बांट दी।
जब यह सब हो रहा था, भगवान शिव ने सोचा कि यही सबसे सही समय है। उन्होंने पवन देव को आदेश दिया, पवन देव, राजा दशरथ के हाथ में जो खीर का कटोरा है, उसमें से एक छोटा सा अंश अपनी शक्ति से उड़ाकर ले आओ। उस अंश को ले जाकर मेरी परम भक्त अंजना की हथेली पर रख दो जो इस समय तपस्या में लीन है। यही खीर मेरा प्रसाद होगी और इसी से मेरे 11वें रुद्रा अवतार का जन्म होगा।
पवन देव ने सिर झुकाकर आज्ञा मानी। वह एक तीव्र झोंके का रूप धरकर अयोध्या पहुंचे। जिस क्षण राजा दशरथ अपनी रानियों को खीर बांट रहे थे, उसी क्षण पवन देव ने उस खीर का एक छोटा सा दिव्य अंश उड़ा लिया। वो अंश हवा में तैरता हुआ हजारों मील की दूरी तय [संगीत] करके उस जंगल में पहुंचा जहां अंजना आंखें बंद किए गहरे ध्यान में बैठी थी। अंजना ध्यान में इतनी मग्न थी कि उन्हें कुछ पता नहीं चला। पवन देव ने बहुत ही धीरे से वह दिव्य प्रसाद उनकी खुली हुई हथेली पर रख दिया जो उन्होंने प्रार्थना की मुद्रा में जोड़ रखी थी।
तभी आकाश में एक आवाज गूंजी। पुत्री अंजना अपनी आंखें खोलो। अंजना ने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोली। तपस्या के तेज से उनका चेहरा सोने की तरह गमक रहा था। उन्होंने सामने देखा तो साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती खड़े थे। उनके मुख पर एक सौम्य मुस्कान थी। अंजना की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। वो सीधे उनके चरणों में गिर पड़ी।
भगवान शिव ने उन्हें उठाया और बोले, पुत्री उठो तुम्हारी तपस्या सफल हुई। हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। मांगो क्या वरदान चाहती हो? अंजना ने हाथ जोड़कर कांपते हुए स्वर में कहा, प्रभु मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिए जो आपकी ही तरह शक्तिशाली हो। जो आपकी ही तरह ज्ञानी हो और जो आपकी ही तरह अपने भक्तों पर कृपा करने वाला हो। मुझे एक ऐसा पुत्र चाहिए जो [संगीत] अजर अमर हो और जिसकी भक्ति की कोई सीमा ना हो।
भगवान शिव मुस्कुराए तथास्तु उन्होंने कहा पुत्री तुम्हारा पुत्र मेरा ही रुद्रावतार होगा। वह तीनों लोकों में संकट मोचन के नाम से जाना जाएगा। [संगीत] वह बल और बुद्धि में सबसे श्रेष्ठ होगा और सबसे बढ़कर वह मेरे आराध्य प्रभु राम का सबसे बड़ा सेवक बनेगा। फिर उन्होंने अंजना की हथेली की ओर इशारा किया और कहा तुम्हारी हथेली में जो प्रसाद है उसे ग्रहण करो। यही तुम्हारी इच्छा पूरी करेगा। यह कहकर भगवान शिव और माता पार्वती अंतर्ध्य हो गए।
अंजना ने अपनी हथेली में देखा तो वहां खीर का एक छोटा सा टुकड़ा चमक रहा था। उन्होंने उसे भगवान का प्रसाद समझकर पूरी श्रद्धा के साथ ग्रहण कर लिया। जैसे ही वह प्रसाद उनके शरीर में गया उन्हें एक अद्भुत ऊर्जा का अनुभव हुआ। उनका रोम रोम एक दिव्य प्रकाश से भर गया। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके अंदर कोई सूर्य समा गया हो।
अब अंजना की तपस्या पूरी हो चुकी थी। उनका मन शांत और आनंद से भरा हुआ था। वह वापस अपने राज्य सुमेरू पर्वत की ओर लौट चली। राजा केसरी ने जब अपनी पत्नी को वर्षों बाद देखा तो वह देखते ही रह गए। अंजना पहले से भी ज्यादा सुंदर और तेजस्वी लग रही थी। उनके चेहरे पर एक ऐसा नूर था जो किसी देदी में ही हो सकता था। राजा केसरी और पूरी प्रजा ने अंजना का बहुत धूमधाम से स्वागत किया। महल में उत्सव का माहौल था।
समय बीतने लगा। भगवान शिव का वो दिव्य तेज अब अंजना के गर्भ में आकार ले रहा था। अंजना के दिन अब बदल गए थे। उन्हें अपने शरीर में कोई बोझ नहीं बल्कि एक असीम ऊर्जा का सागर महसूस होता था। उन्हें थकान या कमजोरी का अनुभव कभी नहीं हुआ। बल्कि ऐसा लगता था जैसे उनके अंदर 10 हाथियों का बल आ गया हो। उनका चेहरा हर रोज और भी ज्यादा दमकने [संगीत] लगा था। उनकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जिसे देखकर बड़े-बड़े ज्ञानी और तपस्वी भी सिर झुका लेते थे। उनकी आवाज में इतनी मिठास और शांति घुल [संगीत] गई थी कि जब वह बोलती थी तो लगता था जैसे कोई वीणा बज रही हो।
वो अब भी हर रोज भगवान शिव की पूजा करती थी। पर अब उनकी पूजा में मांग नहीं बल्कि धन्यवाद का भाव होता था। जब वह आंखें बंद करके ध्यान में बैठती, तो उन्हें अपने गर्भ [संगीत] में एक दिव्य प्रकाश का गोला घूमता हुआ महसूस होता। कभी-कभी उन्हें हल्की-हल्की डमरू की आवाज सुनाई देती तो कभी ऐसा लगता जैसे कोई ओम का नाद कर रहा हो। रात को जब वह सोती तो उनके सपनों में कैलाश पर्वत के दृश्य आते। वो देखती कि नंदी चुपचाप बैठे हैं। शिवग आनंद में नाच रहे हैं और भोलेनाथ समाधि में लीन है। यह सब देखकर उनका मन आनंद और भक्ति से भर जाता।
राजा केसरी अपनी आंखों से यह [संगीत] चमत्कार देख रहे थे। वह अपनी पत्नी के इस दिव्य रूप को देखकर हैरान भी थे और असीम सुख का अनुभव भी कर रहे थे। उन्हें अब अंजना में सिर्फ अपनी पत्नी नहीं बल्कि एक देवी का रूप दिखाई [संगीत] देता था। वह उनका पहले से भी ज्यादा ध्यान रखने लगे। उन्होंने पूरे महल में ऐसी व्यवस्था कर दी कि हर समय वेद [संगीत] मंत्रों का पाठ होता रहे। हर तरफ सुगंधित धूप और फूलों की महक फैली रहे। वो घंटों तक अंजना के पास चुपचाप बैठे रहते और उनके शांत और तेजस्वी चेहरे [संगीत] को निहारते रहते। उन्हें ऐसा लगता जैसे वह किसी मंदिर में बैठे हो और साक्षात देही के दर्शन कर रहे हो।
इस दिव्य गर्भ का प्रभाव सिर्फ अंजना या महल तक ही सीमित नहीं था। इसका असर पूरे सुमेरू राज्य पर पड़ रहा था। सुमेरू पर्वत का कोना-कोना जैसे जाग उठा था। जो पेड़-पौधे सूख रहे थे उनमें नई पत्तियां आ गई। बेमोसम के फूल खिलने लगे और हवाओं में एक [संगीत] मीठी सी मन को मोह लेने वाली सुगंध घुल गई। राज्य में किसी भी घर में कोई बीमार नहीं था। किसी के मन में कोई झगड़ा या द्वेष नहीं था। सब लोग प्रेम से रहते थे। खूंखार जानवर भी अपनी हिंसा भूल गए थे। शेर और हिरण एक ही घाट पर पानी पीते देखे जाते थे। ऐसा लगता था जैसे धरती पर सतयुग लौट आया हो।
दूर-दूर से ऋषि मुनि इस चमत्कार को महसूस करके सुमेरू पर्वत की ओर खींचे चले [संगीत] आ रहे थे। वो जानते थे कि यहां कोई साधारण आत्मा जन्म नहीं लेने वाली बल्कि स्वयं भगवान का कोई अंश अवतरित होने वाला है।
समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। एक महीना बीता फिर दूसरा फिर तीसरा हर बीतते महीने के साथ अंजना के गर्भ का तेज बढ़ता जा रहा था। अब तो रात के अंधेरे में भी उनके गर्भ से एक हल्का-हल्का प्रकाश बाहर आता हुआ दिखाई देता था। उधर दूर [संगीत] लंका में और पाताल के अंधेरे कोनों में एक अनजानी बेचैनी फैल रही थी। राक्षसों को बुरे-बुरे सपने आने लगे थे। रावण के दरबार में बैठे मायावी राक्षस महसूस कर रहे थे कि ब्रह्मांड में कोई ऐसी शक्ति जागृत हो रही है जो उनके अस्तित्व के लिए खतरा है। पर वह समझ नहीं पा रहे थे कि यह शक्ति कहां से आ रही है। उन्हें बस एक [संगीत] अनजाना सा डर सताने लगा था।
देवलोक में उत्सव का माहौल था। सभी देवता उस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे। पवन देव तो हर पल हर क्षण अंजना के आसपास ही रहते थे। वह अपनी अदृश्य उपस्थिति से उनकी रक्षा करते थे। वह कभी ठंडी हवा बनकर उन्हें शीतलता देते तो कभी फूलों की खुशबू उड़ाकर उनके मन को प्रसन्न करते। वह अपने होने वाले पुत्र की हर हलचल को महसूस कर सकते थे और उनका हृदय वात्सल्य से भर जाता था।
9 महीने पूरे होने को आए। अंजना का [संगीत] पूरा शरीर एक सुनहरे आभा मंडल से घिरा रहता था। वह अब ज्यादातर समय मौन रहती। अपनी ही भीतर की दिव्य दुनिया में खोई रहती। और फिर वह दिन आया जिसका इंतजार [संगीत] तीनों लोगों को था। यह चैत्र मास की पूर्णिमा का दिन था। आकाश एकदम साफ था। पूरा चांद अपनी 16 कलाओं के साथ चमक रहा था और अपनी शीतल चांदनी पूरी धरती पर बिखेर रहा था। रात का
समय था, पर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने हजारों दीपक एक साथ जला दिए हों। हवा बिल्कुल थम सी गई थी। पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिल रहे थे। नदियों का बहना धीमा पड़ गया था और पंछी भी अपने घोंसलों में चुपचाप, जैसे किसी चीज का इंतजार कर रहे थे।
महल के जिस कमरे में अंजना थी, वो दिव्य प्रकाश से जगमगा रहा था। वहां किसी दिए या मशाल की जरूरत नहीं थी। अंजना के शरीर से ही इतना तेज निकल रहा था कि पूरा कमरा रोशन हो गया था। राजा केसरी कमरे के बाहर बेचैनी से टहल रहे थे। उनके साथ राज्य के बड़े-बड़े मंत्री और ऋषि-मुनि भी खड़े थे। सबकी आंखें उस बंद दरवाजे पर टिकी थीं। हर किसी के चेहरे पर चिंता, उत्सुकता और आशा के मिले-जुले भाव थे।
अचानक आकाश में देवलोक के द्वार खुल गए। सभी देवी-देवता अपने-अपने विमानों पर बैठकर उस दिव्य जन्म को देखने के लिए आ गए। ब्रह्मा जी अपने हंस पर, विष्णु जी गरुड़ पर और इंद्र अपने एरावत हाथी पर विराजमान थे। अप्सराएं आकाश में नृत्य करने लगीं और गंधर्व मधुर संगीत बजाने लगे। आकाश से धीरे-धीरे फूलों की वर्षा होने लगी। उन फूलों की खुशबू से पूरी धरती महक उठी।
उसी क्षण अंजना को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। पर यह कोई साधारण पीड़ा नहीं थी। इसमें दर्द नहीं, बल्कि एक दिव्य आनंद की अनुभूति थी। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनका शरीर खुल रहा है और ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा उनके भीतर समा रही है। प्रकृति ने अपनी सांसें रोक ली थीं। पूरा ब्रह्मांड उस एक दिव्य क्षण की प्रतीक्षा में स्थिर हो गया था, जब स्वयं रुद्र अपने प्रभु की सेवा के लिए एक मां की कोख से जन्म लेने वाले थे।
और फिर, आधी रात के ठीक समय पर, उस दिव्य प्रकाश के बीच एक किलकारी गूंजी। यह किलकारी इतनी शक्तिशाली और मधुर थी कि उसकी गूंज सुमेरू पर्वत से टकराकर कैलाश तक और देवलोक तक सुनाई दी।
अंजना ने अपनी आंखें खोलीं और अपने सामने जो देखा, उसे देखकर उनकी आंखें खुली की खुली रह गईं। उनकी गोद में एक नन्हा सा बालक लेटा हुआ था। पर वह कोई साधारण बालक नहीं था। उसका शरीर सोने की तरह चमक रहा था। उसके चेहरे पर सूर्य के जैसा तेज था। उसके कान और पूंछ सोने के कुंडल की तरह चमक रहे थे। उसकी छोटी-छोटी आंखें किसी तारे की तरह जगमगा रही थीं और उसके चेहरे पर एक ऐसी मासूम और नटखट मुस्कान थी, जिसे देखकर किसी का भी मन मोहित हो जाए। उसके शरीर पर जन्म से ही जनेऊ और लंगोट शोभा दे रहे थे। यह कोई और नहीं, स्वयं भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार थे। राजा केसरी और अंजना के पुत्र, पवनपुत्र हनुमान।
जैसे ही उनका जन्म हुआ, पूरी दुनिया में खुशियां छा गईं। आकाश से देवता "जय हो, जय हो" के नारे लगाने लगे। ऋषि-मुनि मंत्रोच्चार करने लगे। सुमेरू पर्वत के हर घर में अपने आप शंख बजने लगे और घंटियां घनघनाने लगीं।
राजा केसरी दौड़कर कमरे के अंदर आए। अपने पुत्र के इस अलौकिक रूप को देखकर वह स्तब्ध रह गए। उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। वह कुछ बोल नहीं पाए। बस हाथ जोड़कर उस दिव्य बालक के सामने खड़े हो गए।
अंजना ने अपने लाल को अपनी छाती से लगा लिया। जैसे ही उन्होंने बालक को छुआ, उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्हें दुनिया की सारी खुशियां मिल गई हों। उनकी वर्षों की तपस्या, उनका इंतजार, सब कुछ आज सफल हो गया था। बालक अपनी छोटी-छोटी आंखों से अपनी मां को देख रहा था। फिर उसने चारों ओर देखा, जैसे कुछ ढूंढ रहा हो।
उस नन्हे से बालक को जन्म लेते ही बहुत तेज भूख लगी थी। उसकी नजर कमरे की खिड़की से बाहर चमकते हुए चांद पर पड़ी। पर अपनी बाल लीला के कारण, उसे वो चमकता हुआ चांद नहीं, बल्कि कोई लाल, मीठा और स्वादिष्ट फल नजर आया। उसकी भूख इतनी तेज थी कि वो एक पल भी इंतजार नहीं कर सका। उसने अपनी मां की गोद से एक जोर की छलांग लगाई।
वो नन्हा सा बालक, जिसने अभी-अभी जन्म लिया था, हवा में ऐसे उड़ा जैसे कोई पक्षी उड़ता है। राजा केसरी और अंजना कुछ समझ पाते, इससे पहले ही वह बालक कमरे की छत को तोड़ता हुआ आकाश की ओर उड़ चला।
हजारों मील ऊपर, उस लाल फल को खाने के लिए देवलोक में बैठे सभी देवता यह देखकर हैरान रह गए। पवन देव अपने पुत्र के इस पराक्रम को देखकर मुस्कुराए। उन्हें पता था कि यह तो बस शुरुआत है। यह बालक कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि युगों-युगों तक भक्ति और शक्ति की मिसाल बनने वाला है।
बालक हनुमान बिजली की तेजी से ऊपर की ओर बढ़ रहे थे। चांद उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा था। पर उसी समय एक और घटना घट रही थी। उस दिन सूर्य ग्रहण पड़ने वाला था। राहु, जो एक छाया ग्रह है और सूर्य से अपनी पुरानी दुश्मनी निकालता है, वह सूर्य को निगलने के लिए उनकी ओर बढ़ रहा था।
जब हनुमान ऊपर की ओर जा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक बड़ा सा काला गोला उनके प्यारे लाल फल, यानी सूर्य की ओर बढ़ रहा है। हनुमान को लगा कि यह कोई बड़ा सा कीड़ा है जो उनका फल खाने जा रहा है। उन्हें गुस्सा आ गया। उन्होंने अपनी गति और तेज कर दी। उन्होंने सोचा, "यह लाल फल तो मैं खाऊंगा। यह काला कीड़ा कौन है जो मेरे भोजन के बीच में आ रहा है?"
राहु ने जैसे ही उस छोटे से वानर बालक को अपनी ओर आते देखा, तो वह पहले तो हंसा। पर जैसे-जैसे बालक पास आता गया, राहु ने उसके शरीर से निकल रहे तेज को महसूस किया। उसे लगा जैसे कोई दूसरा सूर्य ही उसकी ओर आ रहा है। वह डर गया। उसने आज तक ऐसी शक्ति महसूस नहीं की थी।
हनुमान राहु के पास पहुंचे और उसे खिलौना समझकर पकड़ने की कोशिश की। राहु अपनी जान बचाकर वहां से भागा। वह सीधा देवराज इंद्र के पास पहुंचा और कांपते हुए बोला, "देवराज, बचाइए। आज सूर्य को ग्रसने के लिए मुझसे भी कोई बहुत शक्तिशाली प्राणी आ गया है। पता नहीं वह कौन है, पर उसके तेज के आगे मैं टिक नहीं पाया।"
इंद्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अपने एरावत हाथी पर बैठकर देखने आए कि आखिर ऐसा कौन है, जो राहु से भी ज्यादा शक्तिशाली है। उन्होंने देखा कि एक छोटा सा वानर बालक सूर्य को निगलने के लिए उनकी ओर बढ़ रहा है। इंद्र को लगा कि अगर इसने सूर्य को निगल लिया, तो पूरी दुनिया में अंधेरा छा जाएगा। सृष्टि का नियम टूट जाएगा।
उन्होंने हनुमान को रोकने की कोशिश की। उन्होंने समझाया, "हे बालक, रुको! यह कोई फल नहीं है। यह सूर्य देव हैं, जो पूरे संसार को प्रकाश देते हैं।" पर हनुमान तो अपनी ही धुन में थे। उन्हें तो बस वह लाल फल चाहिए था। उन्होंने इंद्र की बात पर ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ते रहे।
जब हनुमान किसी भी तरह नहीं रुके, तो इंद्र को क्रोध आ गया। उन्हें अपने देवराज होने का अभिमान भी था। उन्होंने सोचा, "एक छोटा सा वानर बालक मेरी आज्ञा नहीं मान रहा।" क्रोध में आकर इंद्र ने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र, वज्र उठाया और हनुमान पर प्रहार कर दिया।
देवराज इंद्र का वज्र कोई साधारण हथियार नहीं था। वह महर्षि दधीचि की हड्डियों से बना था, जिसके प्रहार से बड़े-बड़े पर्वत भी चकनाचूर हो जाते थे और महाशक्तिशाली असुर भी एक क्षण में राख हो जाते थे। जब इंद्र ने उस वज्र को अपने हाथ में उठाया, तो पूरे देवलोक में एक सन्नाटा छा गया। सभी देवता डर गए। वह जानते थे कि एक नन्हे से बालक के लिए इस प्रहार को सहना असंभव है।
पवन देव का दिल कांप उठा। वह अपने पुत्र की रक्षा के लिए आगे बढ़ना चाहते थे, पर इंद्र के क्रोध के सामने वह भी बेबस थे। वज्र इंद्र के हाथ से छूटा और बिजली की गति से हनुमान की ओर बढ़ा। वह नन्हा बालक, जो सूर्य को पकड़ने की धुन में मगन था, उसे पता ही नहीं चला कि उसकी ओर साक्षात मृत्यु आ रही है।
वज्र सीधे हनुमान की ठोड़ी, जिसे हनु भी कहते हैं, पर जाकर लगा। प्रहार इतना भीषण था कि उस नन्हे से बालक का शरीर आकाश में एक पल के लिए रुक सा गया। उसकी आंखें बंद हो गईं और वह बेजान होकर एक पत्थर की तरह धरती की ओर गिरने लगा। उसके मुंह से सूर्य रूपी फल छूट गया। आकाश में गूंज रही किलकारियां और हंसी खामोश हो गई।
पवन देव के लिए यह दृश्य देखना असहनीय था। उनके पुत्र को उनके ही स्वामी, देवराज इंद्र ने मारा था। उनका हृदय दुख और क्रोध की ज्वाला में जल उठा। वह एक तूफान की तरह नीचे बढ़े और इससे पहले कि उनका पुत्र धरती पर गिरता, उन्होंने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
हनुमान का शरीर ठंडा पड़ चुका था। वह बेहोश थे और उनकी सांसें नहीं चल रही थीं। उनकी ठोड़ी वज्र के प्रहार से थोड़ी टेढ़ी हो गई थी। अपने पुत्र की यह दशा देखकर पवन देव की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उनका सारा संयम टूट गया। वह अपने प्यारे लाल को सीने से लगाकर बिलख-बिलख कर रोने लगे।
उनका दुख इतना गहरा था कि वह क्रोध में बदल गया। उन्होंने सोचा, "देवताओं को अपनी शक्ति का कितना घमंड है। एक मासूम बालक, जो अपनी बाल लीला में सूर्य को फल समझ बैठा, उस पर इंद्र ने वज्र से प्रहार कर दिया। जिस संसार की रक्षा के लिए ये देवता हैं, आज उसी संसार के एक निर्दोष बालक के प्राण ले लिए। अगर मेरे पुत्र के बिना यह संसार रहेगा, तो इस संसार में वायु भी नहीं रहेगी।"
यह सोचते ही पवन देव का क्रोध चरम पर पहुंच गया। उन्होंने एक भयंकर निर्णय लिया। उन्होंने पूरे ब्रह्मांड से अपनी गति को समेट लिया। हवा रुक गई। पहले तो किसी को कुछ महसूस नहीं हुआ, पर धीरे-धीरे इसका असर दिखने लगा। जो पत्ता हवा में तैर रहा था, वह वहीं थम गया। जो पंछी उड़ रहा था, वह पंख फड़फड़ाता हुआ नीचे गिरने लगा। नदियों में लहरें उठनी बंद हो गई। बादलों का जलना रुक गया। लोगों को सांस लेने में दिक्कत होने लगी। पहले घुटन महसूस हुई, फिर दम घुटने लगा। जानवर तड़पने लगे। यज्ञ की अग्नि बिना हवा के बुझने लगी। मंत्रों का उच्चारण होठों में ही दबकर रह गया। हर प्राणी, चाहे वह इंसान हो, जानवर हो या पेड़-पौधा, प्राण वायु के बिना तड़प रहा था। ऐसा लगा जैसे किसी ने पूरे संसार का गला घोंट दिया हो।
देवलोक में भी हाहाकार मच गया। देवताओं का तेज फीका पड़ने लगा। उन्हें भी सांस लेने में कठिनाई होने लगी। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। इंद्र का घमंड चूर-चूर हो गया। उन्हें समझ आया कि उन्होंने क्रोध में आकर कितना बड़ा अनर्थ कर दिया है।
पवन देव अपने मूर्छित पुत्र को लेकर एक अंधेरी गुफा में चले गए और वहीं बैठकर विलाप करने लगे। उनके दुख के कारण पूरी दुनिया में जीवन थम गया था। जब सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा और हर तरफ त्राहि-त्राहि मच गई, तो सारे देवता घबराकर परमपिता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।
ब्रह्मा जी सब कुछ जानते थे। उनके चेहरे पर गहरी चिंता थी। उन्होंने कहा, "देवताओं, यह तुम सब ने मिलकर बहुत बड़ा अपराध किया है। पवन देव का पुत्र कोई साधारण बालक नहीं है। वह स्वयं भगवान शिव का रुद्र अवतार है, जो पृथ्वी पर एक महान उद्देश्य के लिए आया है। तुमने उस पर प्रहार करके स्वयं शिव के क्रोध को निमंत्रण दिया है। अब इस संकट से बचने का एक ही उपाय है। हमें पवन देव के पास जाना होगा। उनसे क्षमा मांगनी होगी और उनके पुत्र को फिर से जीवन देना होगा।"
सारे देवता इंद्र के साथ ब्रह्मा जी के नेतृत्व में उस गुफा की ओर चले, जहां पवन देव अपने पुत्र को गोद में लिए बैठे थे। गुफा के बाहर का दृश्य भयानक था। हवा के बिना सब कुछ वीरान और मरा हुआ लग रहा था।
ब्रह्मा जी ने गुफा के अंदर प्रवेश किया। उन्होंने पवन देव को सांत्वना देते हुए कहा, "पवन देव, शांत हो जाओ। हम सब अपराधी हैं। इंद्र ने अपने अभिमान में यह भूल की है। पर अब क्रोध का त्याग करो और संसार पर कृपा करो। तुम्हारे बिना सृष्टि नष्ट हो जाएगी।"
पवन देव ने रोते हुए कहा, "पितामह, जिस सृष्टि में मेरे पुत्र के लिए कोई स्थान नहीं, उस सृष्टि में प्राण वायु का भी कोई स्थान नहीं। मैं तब तक वायु का संचार नहीं करूंगा, जब तक मेरा पुत्र जीवित नहीं हो जाता।"
ब्रह्मा जी समझ गए कि पवन देव का दुख बहुत गहरा है। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से हनुमान के शरीर को छुआ। जैसे ही ब्रह्मा जी का स्पर्श हुआ, हनुमान के ठंडे शरीर में धीरे-धीरे चेतना लौटने लगी। उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और अपनी मां को पुकारते हुए धीरे से "मां" कहा।
अपने पुत्र को फिर से जीवित देखकर पवन देव की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया। उनकी आंखों से बहते आंसू अब दुख के नहीं, बल्कि सुख के थे।
जब हनुमान पूरी तरह से स्वस्थ हो गए, तो सभी देवता एक-एक करके आगे आए। उन्हें अपनी भूल का पश्चाताप था और वह उस दिव्य बालक को अपना आशीर्वाद और शक्तियां देना चाहते थे।
सबसे पहले ब्रह्मा जी ने अपना कमंडल उठाया और उसमें से जल लेकर बालक पर छिड़का। उन्होंने वरदान दिया, "पुत्र, तुम पर कभी भी मेरे किसी भी श्राप (जिसे ब्रह्म श्राप कहते हैं) का असर नहीं होगा। तुम्हें कोई भी अपने अस्त्र-शस्त्र से बांध नहीं पाएगा। तुम अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर सकोगे और जहां चाहोगे, वहां एक पल में पहुंच जाओगे। तुम चिरंजीवी होगे, यानी तुम्हें कभी मृत्यु नहीं आएगी और तुम हमेशा युवा रहोगे।"
इसके बाद देवराज इंद्र आगे आए। उनके चेहरे पर पश्चाताप था। उन्होंने अपने गले से अपनी दिव्य माला उतारी और बालक को पहनाते हुए कहा, "पुत्र, मेरे वज्र के प्रहार से तुम्हारी हानु (ठोड़ी) पर जो निशान बना है, उसी के कारण आज से संसार तुम्हें हनुमान के नाम से जानेगा। मेरा वज्र भी भविष्य में तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचा पाएगा। तुम्हारा शरीर वज्र के समान कठोर हो जाएगा।"
सूर्य देव ने आगे बढ़कर कहा, "यह बालक मेरे तेज को भी सहन कर गया। मैं इसे अपने तेज का 100वां भाग देता हूं। जब यह चाहेगा, इसका शरीर सोने की तरह चमकेगा और सबसे महत्वपूर्ण, मैं इसे संपूर्ण शास्त्रों और वेदों का ज्ञान दूंगा। यह दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञानी बनेगा।"
यमराज, मृत्यु के देवता ने कहा, "मेरा दंड किसी को जीवन नहीं देता। पर इस बालक पर मेरे दंड का कोई असर नहीं होगा। यह मेरे पाश से हमेशा मुक्त रहेगा और इसे कभी कोई रोग या पीड़ा नहीं होगी।"
जल के देवता वरुण देव ने कहा, "मेरे जल से इस बालक को कभी कोई भय नहीं होगा। पानी में भी यह उतनी ही आसानी से रह पाएगा, जितनी धरती पर।"
धन के देवता कुबेर ने आशीर्वाद दिया, "मेरी गदा भी युद्ध में इसे परास्त नहीं कर पाएगी। यह हमेशा अजय रहेगा।"
स्वयं भगवान शिव, जो अदृश्य रूप में वहां मौजूद थे, ने अपना आशीर्वाद दिया। "मेरा कोई भी अस्त्र, यहां तक कि मेरा तीसरा नेत्र भी इसे कोई हानि नहीं पहुंचा पाएगा। यह मेरा ही अंश है और मुझसे भी बढ़कर भक्ति का उदाहरण बनेगा।"
विश्वकर्मा जी, जो देवताओं के शिल्पी थे, ने वरदान दिया, "मेरे बनाए हुए जितने भी दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उनमें से कोई भी हनुमान को नुकसान नहीं पहुंचा सकेगा।"
इस प्रकार, हर देवता ने हनुमान को अपनी सबसे श्रेष्ठ शक्तियां और वरदान दिए। वह नन्हा सा बालक, जो कुछ देर पहले मूर्छित पड़ा था, अब ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली योद्धा बन चुका था। वह अजर, अमर, अजय और अनेकों दिव्य शक्तियों का स्वामी बन गया था।
पवन देव यह सब देखकर गदगद हो गए। उनका क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सभी देवताओं को धन्यवाद दिया और संसार में फिर से वायु का प्रवाह शुरू कर दिया। धरती पर फिर से जीवन लौट आया। लोग गहरी सांसें लेने लगे। पेड़-पौधे फिर से झूमने लगे। सृष्टि अपने पुराने रूप में लौट आई।
पवन देव अपने पुत्र हनुमान को लेकर वापस अंजना के पास सुमेरू पर्वत पर आए। अंजना अपने लाल को फिर से पाकर इतनी खुश हुई कि उन्होंने उसे अपने आंचल में छिपा लिया। राजा केसरी और पूरी प्रजा ने एक बहुत बड़ा उत्सव मनाया।
अब हनुमान जी सुमेरू पर्वत पर अपनी मां और पिता के साथ बड़े होने लगे। पर वह कोई साधारण बालक की तरह बड़े नहीं हो रहे थे। उनके अंदर इतनी शक्तियां थी कि उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता था। उनका मन एक बालक का था, पर शरीर में देवताओं की शक्ति थी। वह बहुत नटखट थे। उनकी शरारतें भी असाधारण होती थीं। वह एक छलांग में एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुंच जाते। कभी किसी बड़े से पेड़ को जड़ से उखाड़कर खिलौने की तरह घुमाने लगते। उन्हें अपनी शक्तियों का अंदाजा नहीं था।
जंगलों में ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। हनुमान अपनी बाल लीला में कभी उनके कमंडल का पानी गिरा देते, तो कभी उनके आसन को उठाकर पेड़ पर टांग देते। वह ऋषियों की दाढ़ी-मूंछ खींच कर भाग जाते। ऋषि-मुनि उनसे परेशान तो होते थे, पर वह जानते थे कि यह एक दिव्य बालक है। इसलिए वह उसे कुछ कहते नहीं थे। वह बस मुस्कुरा कर रह जाते।
एक दिन हनुमान जी खेल-खेल में सूर्य को फिर से पकड़ने के लिए आकाश में उड़ गए। वह सूर्य के रथ के घोड़ों के साथ दौड़ने लगे। उनकी गति इतनी तेज थी कि सूर्य देव भी हैरान रह गए। दिन पर दिन उनकी शरारतें बढ़ती जा रही थीं।
एक बार कुछ ऋषि-मुनि एक बहुत महत्वपूर्ण यज्ञ कर रहे थे। हनुमान जी को खेल सूझा। उन्होंने यज्ञ में रखी सारी सामग्री को उठाकर एक गुफा में छिपा दिया और यज्ञ की वेदी को उठाकर नदी में फेंक दिया। अब ऋषियों का धैर्य जवाब दे गया। वह जानते थे कि अगर इस बालक को अभी नहीं रोका गया, तो यह अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर सकता है।
वह सब मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए और अपनी समस्या बताई। ब्रह्मा जी मुस्कुराए। वह जानते थे कि ऐसा होगा। उन्होंने ऋषियों से कहा, "आप लोग चिंता ना करें। हनुमान में अपार शक्तियां हैं, पर अभी उसका मन एक बालक का है। उसे अपनी शक्तियों के सही उपयोग का ज्ञान नहीं है। आप लोग उसे एक हल्का सा श्राप दें, ताकि वह कुछ समय के लिए अपनी सारी शक्तियों को भूल जाए।"
ऋषियों ने कहा, "पितामह, हम इतने प्यारे बालक को श्राप कैसे दे सकते हैं?"
ब्रह्मा जी ने समझाया, "यह श्राप उसके भले के लिए ही होगा। आप उसे ऐसा श्राप दें कि वह अपनी सारी दिव्य शक्तियां, अपना बल, अपनी उड़ने की क्षमता, सब कुछ भूल जाएगा। पर जब कोई उसे उसकी शक्तियों की याद दिलाएगा, तो उसकी सारी शक्तियां पहले से भी ज्यादा होकर वापस आ जाएंगी। ऐसा करने से वह एक साधारण वानर बालक की तरह बड़ा होगा और जब सही समय आएगा, जब प्रभु राम को उसकी जरूरत होगी, तब उसकी शक्तियां फिर से जागृत हो जाएंगी।"
ऋषियों को यह बात सही लगी। वह वापस आए और उन्होंने खेल रहे हनुमान जी को देखकर कहा, "हे बालक, तुम अपनी शक्तियों के अहंकार में हम तपस्वीयों को बहुत सताते हो। हम तुम्हें श्राप देते हैं कि तुम अपना सारा बल और सारी दिव्य शक्तियां तब तक के लिए भूल जाओगे, जब तक कोई सच्चा भक्त तुम्हें तुम्हारी शक्तियों का स्मरण ना कराए।"
जैसे ही ऋषियों के मुंह से यह शब्द निकले, हनुमान जी के शरीर का तेज कम हो गया। उनकी आंखों की वह दिव्य चमक एक साधारण बालक जैसी हो गई। उन्हें अचानक बहुत कमजोरी महसूस होने लगी। वह जो एक छलांग में पहाड़ लांघ जाते थे, अब उन्हें एक छोटा सा पत्थर उठाने में भी मुश्किल होने लगी। वह अपनी सारी शक्तियां भूल चुके थे।
अब हनुमान जी एक आम वानर बालक की तरह बड़े होने लगे। वह शांत, सुशील और थोड़े सहमे हुए से रहने लगे। अंजना और केसरी को यह देखकर दुख तो हुआ, पर वह यह भी जानते थे कि इसमें भी ईश्वर की कोई इच्छा छिपी है।
हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया। वह हर रोज सुबह सूर्य के उगने से पहले उठ जाते और हाथ जोड़कर खड़े हो जाते। सूर्य देव अपने रथ पर चलते-चलते उन्हें ज्ञान देते और हनुमान जी उनके पीछे-पीछे दौड़ते-दौड़ते सारा ज्ञान सीखते जाते। कुछ ही समय में उन्होंने चारों वेद, छह शास्त्र और सारी विद्याएं सीख लीं। वह महाज्ञानी बन गए, पर उन्हें अपने बल का कोई ज्ञान नहीं था।
समय बीतता गया। हनुमान जी अब युवा हो चुके थे। वह बहुत ही विनम्र, ज्ञानी और सेवाभावी थे। उनका ज्यादातर समय भगवान की भक्ति और माता-पिता की सेवा में बीतता था।
उसी समय धरती पर एक और लीला चल रही थी। किष्किंधा नामक वानर राज्य में दो भाइयों, बाली और सुग्रीव के बीच राज सिंहासन को लेकर झगड़ा हो गया था। बाली, जिसे इंद्र से वरदान मिला था कि जो भी उससे लड़ेगा, उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाएगी, उसने अपने छोटे भाई सुग्रीव को मारकर राज्य से निकाल दिया। सुग्रीव अपनी जान बचाकर अपने कुछ वफादार मंत्रियों के साथ ऋषिमुख पर्वत पर आकर छिप गया, क्योंकि ऋषि मतंग के श्राप के कारण बाली उस पर्वत पर नहीं आ सकता था। सुग्रीव के उन्हीं वफादार मंत्रियों में से एक थे हनुमान। हनुमान अपनी बुद्धि और ज्ञान के कारण सुग्रीव के सबसे प्रिय सलाहकार बन गए थे। पर सुग्रीव...
को कि यह नहीं पता था कि उनका यह शांत और विनम्र मंत्री ब्रह्मांड [संगीत] का सबसे शक्तिशाली योद्धा है। हनुमान दिन रात सुग्रीव की सेवा करते। उन्हें दिलासा देते और उनके दुख में उनका साथ देते। पर वो खुद अपनी शक्तियों से अनजान एक साधारण वानर की तरह जीवन जी रहे थे। और उस सही समय का इंतजार कर रहे थे, जब कोई आकर उनके सोए हुए बल को फिर से जगाएगा।
और वह समय बहुत करीब आ रहा था क्योंकि दूर अयोध्या के राजकुमार भगवान विष्णु के अवतार श्री राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपने पिता के वचन को निभाने के लिए 14 वर्ष के वनवास पर निकल चुके थे। वनवास के दिन शांति से बीत रहे थे। राम, सीता और लक्ष्मण ने चित्रकूट के शांत और पवित्र वातावरण में अपनी एक छोटी सी कुटिया बना ली थी। प्रकृति की गोद में ऋषियों के सानिध्य में उनके दिन आनंद से कट रहे थे। पर विधाता ने तो कुछ और ही लिख रखा था। उनकी लीला का मंच तो कहीं और ही सजना था।
एक दिन लंका के राजा रावण की बहन शूरपनखा घूमते-घूमते पंचवटी पहुंची। जहां राम, सीता और लक्ष्मण रह रहे थे। राम के सुंदर और तेजस्वी रूप को देखकर वो उन पर मोहित हो गई। उसने अपनी राक्षसी माया से एक सुंदर स्त्री का रूप बनाया और राम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। राम ने मुस्कुराते हुए विनम्रता से मना कर दिया और कहा कि वह विवाहित हैं और अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते हैं। फिर उन्होंने मजाक में लक्ष्मण की ओर इशारा कर दिया। लक्ष्मण के मना करने पर शूरपनखा को क्रोध आ गया। वो अपने असली राक्षसी रूप में आ गई और सीता पर झपटी। उसने सोचा कि इसी स्त्री के कारण मेरा अपमान हुआ है। मैं इसे ही खा जाऊंगी।
यह देखकर [संगीत] लक्ष्मण अपने क्रोध पर काबू नहीं रख पाए। उन्होंने अपनी तलवार निकाली और एक ही झटके में शूरपनखा की नाक और कान काट दिए। अपमान और दर्द से चीखती चिल्लाती शूरपनखा अपने भाइयों, घर और दूषण के पास पहुंची। अपनी बहन की यह हालत देखकर वह क्रोध से भर गए और अपनी 14,000 राक्षसों की सेना लेकर राम पर आक्रमण करने के लिए चल दिए। राम ने अकेले ही बिना किसी की सहायता के उन 14,000 राक्षसों की सेना का संहार कर दिया। खर, दूषण और [संगीत] त्रिशिरा जैसे महाबलशाली राक्षस भी उनके बाणों के आगे टिक नहीं पाए।
जब यह खबर लंका पहुंची तो रावण का सिंहासन हिल गया। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई अकेला मनुष्य उसकी इतनी बड़ी सेना को समाप्त कर सकता है। पर जब शूरपनाखा ने रो-रो कर पूरी घटना सुनाई और साथ ही सीता के अनुपम सौंदर्य का वर्णन किया तो रावण के मन में क्रोध के साथ-साथ वासना की आग भी भड़क उठी। उसने सीता का हरण करने की योजना बनाई। उसने अपने मामा मारीच की सहायता ली जो अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर सकता था। मारीच एक सुंदर सोने के हिरण का रूप धरकर राम की कुटिया के पास घूमने लगा। उस अद्भुत हिरण को देखकर सीता का मन मोहित हो गया। उन्होंने राम से उस हिरण को पकड़ कर लाने का अनुरोध किया।
राम अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए उस हिरण के पीछे चले गए। बहुत दूर जाने पर जब हिरण हाथ नहीं आया तो राम ने बाण जलाया। बाण लगते ही मारीच अपने असली रूप में आ गया और मरते-मरते राम की आवाज में जोर से चिल्लाया, हां लक्ष्मण, हां सीते। कुटिया में बैठी सीता ने जब यह आवाज सुनी तो वह व्याकुल हो गई। उन्हें लगा कि उनके पति किसी बड़े संकट में हैं। उन्होंने लक्ष्मण को तुरंत उनकी सहायता के लिए जाने को कहा। लक्ष्मण जानते थे कि यह कोई राक्षसी माया है। उनके भैया को कुछ नहीं हो सकता। पर सीता के बार-बार कहने और कठोर वचन सुनने के बाद उन्हें मजबूर होकर जाना पड़ा। जाने से पहले उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींची जिसे लक्ष्मण रेखा कहते हैं। और सीता से कहा कि वह किसी भी हालत में इस रेखा से बाहर ना आए।
जैसे ही लक्ष्मण वहां से गए रावण जो इसी मौके का इंतजार कर रहा था एक साधु का वेश बनाकर वहां आ गया। उसने भिक्षा मांगी। सीता रेखा के अंदर से ही उसे भिक्षा देने लगी। पर रावण ने कहा कि वह ऐसे भिक्षा स्वीकार नहीं करता। उन्हें रेखा से बाहर आकर भिक्षा देनी होगी। सीता धर्म संकट में पड़ गई। एक साधु को खाली हाथ लौटाना वह पाप समझती थी। जैसे ही उन्होंने दान देने के लिए अपना एक पैर लक्ष्मण रेखा से बाहर रखा, रावण अपने असली रूप में आ गया। उसने बलपूर्वक सीता को पकड़ लिया और अपने पुष्पक विमान में बैठाकर लंका की ओर उड़ चला। सीता रोती रही, विलाप करती रही। राम, लक्ष्मण पुकारती रही। उनकी चीखें जंगल में गूंज रही थी पर कोई सुनने वाला नहीं था।
रास्ते में पक्षियों के राजा जटायु ने उन्हें बचाने की कोशिश की। पर रावण ने अपनी तलवार से उनके पंख काट दिए। जब राम और लक्ष्मण वापस कुटिया में लौटे और सीता को वहां नहीं पाया तो राम का हृदय भट गया। वो पागलों की तरह सीते-सीते पुकारते हुए पूरे जंगल में घूमने लगे। वो पेड़ों से पूछते, लताओं से पूछते, जानवरों से पूछते, क्या तुमने मेरी सीता को देखा है? उनके दुख को देखकर पत्थर भी पिघल रहे थे। लक्ष्मण उन्हें सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे। पर स्वयं उनकी आंखों से भी आंसू बह रहे थे।
सीता को खोजते-खोजते वह दोनों भाई आगे बढ़ते रहे। रास्ते में उन्हें मरणासन में जटायु मिले। जिन्होंने उन्हें बताया कि लंका का राजा रावण सीता का हरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले गया है। यह कहकर जटायु ने अपने प्राण त्याग दिए। राम ने अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार किया। आगे चलकर उनकी मुलाकात शबरी से हुई जो वर्षों से उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। शबरी के झूठे बेर खाकर राम ने भक्ति की एक नई परिभाषा लिखी। शबरी ने ही उन्हें बताया कि आगे ऋष्यमुख पर्वत पर वानर राज सुग्रीव रहते हैं जो उनकी सहायता कर सकते हैं।
राम और लक्ष्मण ऋष्यमुख पर्वत की ओर चल दिए। जब सुग्रीव ने दूर से दो तेजस्वी और [संगीत] धनुषधारी मनुष्यों को अपनी ओर आते देखा तो वह डर गया। उसे लगा कि कहीं उसके भाई बाली ने उसे मारने के लिए इन दोनों को तो नहीं भेजा है। उसने तुरंत अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री हनुमान को बुलाया। सुग्रीव ने घबराते हुए कहा, हनुमान, देखो वो दो वीर पुरुष कौन है? उनका तेज देखकर लगता है कि वह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। कहीं वह बाली के भेजे हुए तो नहीं है। तुम एक ब्राह्मण का वेश बनाकर जाओ और पता लगाओ कि वह कौन है और यहां किस उद्देश्य से आए हैं।
गुरु की आज्ञा पाकर हनुमान ने तुरंत एक ब्राह्मण का रूप धारण किया। उनके शरीर से सारी वानर वाली पहचान गायब हो गई। वो एक सौम्य और ज्ञानी ब्राह्मण लग रहे थे। वो धीरे-धीरे उस पेड़ के नीचे पहुंचे, जहां राम और लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे। यह हनुमान की उनके प्रभु से पहली मुलाकात थी। हनुमान ने बहुत ही विनम्रता और मीठी वाणी में हाथ जोड़कर पूछा, हे वीर पुरुषों, आप कौन हैं? आपके [संगीत] चेहरे का तेज देखकर तो लगता है कि आप स्वयं ब्रह्मा, विष्णु या महेश में से कोई हैं जो मनुष्य रूप में पृथ्वी पर घूम रहे हैं। आपके कोमल चरणों ने इस कठोर भूमि को पवित्र कर दिया। कृपया अपना परिचय देकर हमें कृतार्थ करें।
हनुमान की वाणी में इतनी मिठास, इतना ज्ञान और इतनी विनम्रता थी कि राम उन्हें देखकर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, लक्ष्मण, देखो यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। इसने बिना कोई गलती किए कितने सुंदर शब्दों में अपनी बात कही है। जिसने चारों वेदों का अध्ययन किया हो, वही इतनी शुद्ध और मधुर वाणी [संगीत] बोल सकता है। राम ने अपना और लक्ष्मण का परिचय दिया और अपने वनवास आने का कारण बताया। फिर उन्होंने अपने हृदय का सबसे बड़ा दुख सीता हरण की पूरी कहानी उन्हें सुनाई।
जैसे ही हनुमान ने अपने प्रभु के मुख से उनकी पीड़ा सुनी, उनका हृदय द्रवित हो गया। वो समझ गए कि यह दोनों वीर पुरुष कोई और नहीं बल्कि साक्षात भगवान हैं जिनकी सेवा के लिए उनका जन्म हुआ है। वो अपनी सुधबुध खो बैठे। वो अपने ब्राह्मण वेश को भूल गए और साष्टांग राम के चरणों में गिर पड़े। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। उन्होंने राम के चरण पकड़ लिए और कहा प्रभु मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं आपका दास हनुमान हूं। मेरे स्वामी सुग्रीव ने मुझे आपका परिचय जानने के लिए भेजा था। मैं कितना अभागा हूं कि आपको पहचान नहीं सका।
यह कहकर हनुमान अपने असली वानर रूप में आ गए। राम ने उन्हें उठाकर अपने गले से लगा लिया। उस एक आलिंगन में जैसे गुरु और शिष्य भगवान और भक्त स्वामी और सेवक सब एक हो गए। हनुमान को ऐसा लगा जैसे उन्हें जन्मजन्म की शांति मिल गई हो। हनुमान राम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले गए। उन्होंने सुग्रीव को राम का परिचय दिया और बताया कि यह साक्षात अयोध्या के राजकुमार हैं और भगवान विष्णु के अवतार हैं। राम ने सुग्रीव को वचन दिया कि वह बाली का वध करके उसे उसका राज्य और सम्मान वापस दिलाएंगे। बदले में सुग्रीव ने वचन दिया कि वह अपनी पूरी वानर सेना के साथ माता सीता को खोजने में उनकी मदद करेंगे।
राम ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। उन्होंने एक ही बाण से बाली का वध कर दिया और सुग्रीव को किष्किंदा का राजा बनाया। वर्षा ऋतु बीत जाने के बाद सुग्रीव ने अपनी प्रतिज्ञा निभाई। उन्होंने अपने सेनापति अंगद को आदेश दिया कि वह चारों दिशाओं में वानरों की टोलियां भेजें और हर हाल में एक महीने के अंदर सीता माता का पता लगाकर आए। सबसे बड़ी और सबसे शक्तिशाली टोली दक्षिण दिशा की ओर भेजी गई [संगीत] क्योंकि जटायु ने बताया था कि रावण सीता को दक्षिण दिशा में ही ले गया है। इस टोली का नेतृत्व युवराज अंगद कर रहे थे और उनके साथ जामवंत जैसे अनुभवी और हनुमान जैसे बुद्धिमान योद्धा थे।
राम ने हनुमान को अपने पास बुलाया। उन्हें पता था कि यह कार्य केवल हनुमान ही कर सकते हैं। उन्होंने अपनी उंगली से अपनी मुद्रिका अंगूठी [संगीत] निकाली और हनुमान को देते हुए कहा, हनुमान मुझे विश्वास है कि तुम सीता तक अवश्य पहुंचोगे। जब तुम उनसे मिलो तो यह अंगूठी उन्हें [संगीत] दे देना। इसे देखकर वह पहचान जाएंगे कि तुम मेरे ही दूत हो। हनुमान ने उस अंगूठी को अपनी आंखों से लगाया और अपने प्रभु के चरणों को छूकर उस महान खोज पर निकल पड़े।
वानरों की टोली दक्षिण दिशा में सीता को खोजती हुई आगे बढ़ रही थी। वो हर गुफा, हर पर्वत, हर जंगल में माता सीते, माता सीते पुकारते हुए खोज रहे थे। दिन बीतते जा रहे थे। पर सीता का कोई पता नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे एक महीना पूरा होने वाला था। सारे वानर निराश हो गए थे। वो खोजते खोजते [संगीत] दक्षिण के अंतिम छोर समुद्र के किनारे पहुंच गए। उनके सामने विशाल गरजता हुआ अथाह समुद्र था। दूर-दूर तक पानी के सिवा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। अब आगे जाने का कोई रास्ता नहीं था। एक महीने की समय सीमा भी समाप्त हो चुकी थी। सब थक चुके थे, भूखे प्यासे थे और निराश थे। उन्हें डर था कि अगर वह बिना कोई समाचार लिए वापस किष्किंधा गए तो सुग्रीव उन्हें मृत्युदंड देंगे।
निराशा में सब वहीं जमीन पर बैठ गए। अंगद [संगीत] ने तो यहां तक कह दिया कि अब वापस जाने से अच्छा है कि हम यहीं अपने प्राण त्याग दें। सारे वानर चुपचाप उदास बैठे थे। हर किसी के चेहरे पर हार और हताशा थी। उसी समय रीछों के राजा वयोवृद्ध और ज्ञानी जामवंत की नजर हनुमान पर पड़ी। हनुमान सबसे अलग एक चट्टान पर चुपचाप बैठे थे। उनके चेहरे पर भी चिंता थी पर निराशा नहीं थी। वो गहरे सोच में डूबे हुए थे। जामवंत धीरे-धीरे हनुमान के पास गए। वो [संगीत] जानते थे कि हनुमान कोई साधारण वानर नहीं है। उन्हें हनुमान के जन्म और उनकी शक्तियों की कथा याद थी। वो जानते थे कि यही वही बालक है जिसे [संगीत] देवताओं ने असीम शक्तियां दी थी। पर ऋषियों के श्राप के कारण वह अपनी शक्तियों को भूल चुका है।
जामवंत को लगा कि यही वह सही [संगीत] समय है। यही वो क्षण है जब हनुमान को उनकी सोई हुई शक्तियों को याद दिलाना होगा। उन्होंने बहुत ही प्रेम और सम्मान से हनुमान के कंधे पर हाथ रखा और एक ओजस्वी वाणी में बोलना शुरू किया जो किसी वीर रस की कविता जैसी लग रही थी। का चुप साध ही रहा बलवाना। [संगीत] हे बलवान तुम इस तरह चुप क्यों बैठे हो? पवन तनय बल पवन समाना बुद्धि विवेक विज्ञान निधाना तुम पवन के पुत्र हो और तुम्हारा बल भी पवन के ही समान है। तुम बुद्धि विवेक और विज्ञान के भंडार हो। कवन सुकाज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही। हे तात जगत में ऐसा कौन सा कठिन काम है जो तुमसे ना हो सके।
जैसे-जैसे जामवंत बोलते जा रहे थे। हनुमान के शरीर में एक अजीब सी हलचल होने लगी। उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उनके अंदर कोई सोया हुआ ज्वालामुखी जाग रहा हो। जामवंत उन्हें उनके बचपन की सारी कथाएं याद दिला रहे थे। कैसे उन्होंने सूर्य को फल समझ लिया था। कैसे इंद्र के वज्र का प्रहार सहा था। कैसे सभी देवताओं ने उन्हें वरदान दिए थे। राम काज लगी तब अवतारा। सुनत ही भयो पर्वताकारा। तुम्हारा अवतार तो राम के काम के लिए ही हुआ है। जैसे ही हनुमान ने यह सुना कि उनका जन्म श्री राम के कार्य के लिए हुआ है, उनके शरीर में एक विस्फोट सा हुआ। श्राप का बंधन टूट गया। उनकी सारी भूली हुई शक्तियां पहले से 100 गुना होकर वापस लौट आई। उनका शरीर बढ़ने लगा। वह छोटे से वानर से एक विशाल पर्वत के आकार के हो गए। उनका शरीर सोने की तरह दमकने लगा। उनकी आंखों में सूर्य का तेज आ गया और उनकी गर्जना से समुद्र में ऊंची-ऊंची लहरें [संगीत] उठने लगी। उन्होंने एक अंगड़ाई ली और जोर से गर्जना की। जय श्री राम।
उनकी उस एक गर्जना से दिशाएं कांप उठी। सारे वानर जो निराश बैठे थे वह अपनी आंखों के सामने यह चमत्कार देखकर खड़े हो गए। उनकी निराशा आशा में बदल गई। हनुमान ने जामवंत के चरण छुए और कहा हे रिक्षराज आपने मुझे मेरी शक्तियों का स्मरण कराकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। अब आप चिंता ना करें। मैं इस समुद्र को तो क्या ऐसे सैकड़ों समुद्रों को एक ही छलांग में पार कर सकता हूं। मैं अभी जाकर माता सीता का पता लगाकर आता हूं। यह कहकर हनुमान पास के महेंद्र पर्वत की चोटी पर चढ़ गए। उन्होंने अपने पैरों से इतना जोर लगाया कि पूरा पर्वत जमीन में धंसने लगा। उन्होंने गहरी सांस ली, अपने प्रभु श्री राम का स्मरण किया और आकाश की ओर एक ऐसी छलांग लगाई, जैसी आज तक किसी ने ना लगाई थी और ना ही भविष्य में कोई लगा पाएगा।
हनुमान जी जब आकाश में उड़े, तो ऐसा लगा जैसे कोई दूसरा सूर्य उदय हो गया हो। उनकी गति इतनी तेज थी कि हवा उनके पीछे एक तूफान की तरह चल रही थी और समुद्र में बड़ी-बड़ी [संगीत] लहरें उठ रही थी। उनके शरीर का तेज इतना था कि आकाश के तारे भी दिन में दिखाई देने लगे। वह बादलों को चीरते हुए हवा से बातें करते हुए अपने प्रभु के नाम का जाप करते [संगीत] हुए आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में कई बाधाएं आई। समुद्र में रहने वाली राक्षसी सुरसा ने उनका रास्ता रोका जो देवताओं की भेजी हुई परीक्षा थी। हनुमान जी ने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और अपना शरीर बहुत बड़ा कर लिया। फिर अचानक छोटा करके उसके मुंह से निकल आए। आगे चढ़कर सिंघेका [संगीत] नाम की राक्षसी ने उनकी परछाई पकड़ कर उन्हें रोकने की कोशिश की। पर हनुमान जी ने एक ही मुक्के में उसका अंत कर दिया।
कई घंटों की अथक यात्रा के बाद उन्हें दूर समुद्र के पार त्रिकूट पर्वत पर बसी सोने की लंका दिखाई दी। लंका की सुंदरता और उसका वैभव देखकर वह हैरान रह गए। पर उनका मन तो अपनी माता सीता को खोजने के लिए व्याकुल था। उन्होंने बहुत छोटा रूप धारण किया और रात के अंधेरे में लंका में प्रवेश कर गए। लंका की पहरेदार राक्षसी लंकिनी ने उन्हें रोका। पर हनुमान जी के एक ही घूसे से वह बेहोश होकर गिर पड़ी। हनुमान जी ने पूरी लंका छान मारी। वो रावण के महल में गए, उसके शयन कक्ष में गए। हर राक्षस के घर में गए। पर उन्हें कहीं भी सीता माता नहीं मिली। वो निराश होने लगे। उन्हें लगा कि कहीं उनका आना व्यर्थ तो नहीं हो जाएगा।
तभी उन्हें एक घर से राम राम की पवित्र ध्वनि सुनाई दी। उन्हें आश्चर्य [संगीत] हुआ कि राक्षसों की नगरी में राम नाम कौन ले रहा है? वह एक ब्राह्मण का वेश धरकर उस घर में गए तो उनकी मुलाकात रावण के भाई विभीषण से हुई। विभीषण एक धर्मात्मा पुरुष थे और भगवान राम के भक्त थे। उन्होंने ही हनुमान जी को बताया कि रावण ने सीता माता को अशोक वाटिका में रखा है। हनुमान जी तुरंत अशोक वाटिका पहुंचे। वहां का दृश्य देखकर उनका हृदय दुख से भर गया। सुंदर-सुंदर पेड़ों और फूलों के बीच एक पेड़ के नीचे माता सीता बैठी थी। उनके बाल बिखरे हुए थे। शरीर पर एक ही मैली साड़ी थी और उनकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। वह बहुत दुबली और कमजोर लग रही थी। पर उनके चेहरे पर एक दिव्य तेज अब भी था। क्रूर राक्षसिनियां उन्हें चारों ओर से घेरे हुई थी और उन्हें डराधमका रही थी।
हनुमान जी एक पेड़ पर छिपकर यह सब देख रहे थे। उनका मन क्रोध और करुणा से भर गया। वह चाहते थे कि अभी जाकर इन सभी राक्षसिनियों का वध कर दें और माता को यहां से ले जाएं। पर उन्होंने अपने प्रभु की आज्ञा का ध्यान रखते हुए धैर्य रखा। थोड़ी देर बाद रावण वहां आया। उसने सीता माता को डराने धमकाने की बहुत कोशिश की। उन्हें लालच दिया। पर सीता माता ने एक तिनके को सामने रखकर उसकी तरफ देखा भी नहीं। उन्होंने कहा, दुष्ट मेरे प्रभु राम के सामने तेरी क्या हस्ती है। वह जल्द ही आएंगे और तेरा और तेरे कुल का सर्वनाश कर देंगे। [संगीत] अपमानित होकर रावण गुस्से में चला गया।
उसके जाने के बाद सीता माता अकेली रोने लगी। [संगीत] उनका दुख इतना गहरा था कि वो अपने प्राण त्यागने की सोचने लगी। हनुमान जी समझ गए कि अब और देर करना ठीक नहीं। उन्होंने धीरे से पेड़ के ऊपर से श्री राम की दी हुई अंगूठी सीता जी के सामने गिरा दी। अपनी आंखों के सामने अपने प्रभु की निशानी देखकर सीता जी चौंक गई। उन्होंने अंगूठी [संगीत] उठाई और उसे पहचान कर उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उन्हें विश्वास हो गया कि उनके राम ने उन्हें भुलाया नहीं है। वह चारों ओर देखने लगी कि यह अंगूठी कहां से आई। तब हनुमान जी पेड़ से नीचे उतरे और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।
सीता जी पहले तो उन्हें देखकर डर गई। पर जब हनुमान जी ने अपना परिचय दिया और श्री राम का पूरा संदेश सुनाया तो उन्हें धीरज बंधा। उन्होंने हनुमान जी को आशीर्वाद दिया। पुत्र तुम अजर अमर रहो और बल बुद्धि के [संगीत] निधान बनो। तुम्हारे हृदय में सदा राम लक्ष्मण निवास करें। माता का आशीर्वाद पाकर हनुमान जी का शरीर और मन ऊर्जा से भर गया। उन्होंने कहा माता आप चिंता ना करें। मेरे जैसे करोड़ों वानर योद्धा हैं। हम सब जल्द ही यहां आएंगे और दुष्ट रावण का वध करके आपको यहां से ले जाएंगे।
फिर उन्होंने कहा माता मुझे बहुत भूख लगी है। अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं इस बगीचे के कुछ फल खा लूं। सीता जी ने मुस्कुराकर आज्ञा दे दी और फिर हनुमान जी ने अपनी लीला शुरू की। उन्होंने [संगीत] फल तो कम खाए पर पूरी अशोक वाटिका को तहस-नहस कर दिया। उन्होंने सुंदर-सुंदर पेड़ों को उखाड़ फेंका। बगीचों को रौंद डाला। जब राक्षसों ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने सबको मार गिराया। रावण के पुत्र अक्षय कुमार को भी उन्होंने पल भर में यमलोक पहुंचा दिया। अंत में रावण के सबसे शक्तिशाली पुत्र मेघनाथ ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके हनुमान जी को बंदी बना लिया।
हनुमान जी चाहते तो ब्रह्मास्त्र का बंधन तोड़ सकते थे। पर उन्होंने सोचा कि इसी बहाने रावण से भी मुलाकात हो जाएगी और उसकी शक्ति का अंदाजा [संगीत] भी लग जाएगा। उन्हें बंदी बनाकर रावण के दरबार में ले जाया गया। रावण अपने सोने के सिंहासन पर अहंकार में बैठा था। उसने गुस्स में पूछा, "कौन है तू वानर? किसने तुझे यहां भेजा है और तूने मेरी अशोक वाटिका क्यों उजाड़ी? हनुमान जी निडर होकर बोले मैं भगवान श्री राम का दूत हूं [संगीत] जिन्हें तुम अपनी होने वाली मृत्यु समझ सकते हो और वाटिका मैंने इसलिए उजाड़ी क्योंकि एक वानर का स्वभाव ही फल खाने के बाद पेड़ों को तोड़ना होता है। [संगीत] मैंने तो बस अपने धर्म का पालन किया है।
यह सुनकर रावण आग बबूला हो गया। उसने आदेश दिया कि इस वानर की पूंछ में आग लगा दो। [संगीत] राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ पर कपड़े लपेटकर उसमें तेल डाला और आग लगा दी। हनुमान जी चुपचाप सब सहते रहे। जब उनकी पूंछ में आग लग गई तो उन्होंने अचानक अपना शरीर छोटा कर लिया और बंधनों [संगीत] से मुक्त हो गए। फिर उन्होंने एक विशाल रूप धारण किया और अपनी जलती हुई पूंछ से एक महल से दूसरे महल [संगीत] पर कूदने लगे। देखते ही देखते उन्होंने अपनी एक ही पूंछ से पूरी सोने की लंका को जलाकर राख कर दिया। हर तरफ हाहाकार मच गया। राक्षस अपनी जान बचाकर भागने लगे।
पूरी लंका को जलाने के बाद वह वापस समुद्र के किनारे आए और अपनी पूंछ को पानी में बुझाया। फिर वह एक बार फिर माता सीता से विदा लेने गए और उन्हें सांत्वना दी कि प्रभु राम जल्द ही आएंगे। वहां से उन्होंने एक ही छलांग में समुद्र को फिर से पार किया और वापस अपने साथियों के पास पहुंच गए जो बेसब्री से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। हनुमान जी को सफल होकर लौटते देख सभी वानरों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने हनुमान जी को कंधे पर उठा लिया और जय श्री राम जय हनुमान के [संगीत] नारे लगाने लगे। वह सब खुशी-खुशी वापस किष्किंधा लौटे और श्री राम को सीता माता का सारा समाचार सुनाया।
हनुमान जी ने सीता जी की दी हुई चूड़ामणि निशानी के तौर पर श्री राम को दी। अपनी पत्नी का समाचार पाकर राम की आंखों में [संगीत] आंसू आ गए। उन्होंने हनुमान को अपने हृदय से लगा लिया और कहा, हनुमान तुमने जो कार्य किया है, वह कोई और नहीं कर सकता था। मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं चुका पाऊंगा। आज से तुम मुझे लक्ष्मण की ही तरह प्रिय हो। अपने प्रभु के मुख से ऐसे वचन सुनकर हनुमान जी की आंखों से भक्ति के आंसू बहने लगे। उन्होंने अपने प्रभु के चरण पकड़ लिए और यहीं से उस महान धर्म युद्ध की नींव रखी गई [संगीत] जिसमें एक ओर था अहंकार और अधर्म और दूसरी ओर थे भक्ति, शक्ति और धर्म।
यह कहानी थी अंजनी [संगीत] के उस लाल की। पवन के उस दुलारे की जिसने अपनी भक्ति और बल से असंभव को भी संभव कर दिखाया। यह कहानी थी उस महान सेवक के जन्म की जिसे आज पूरी दुनिया संकट मोचन हनुमान के नाम से पूजती है। यह उस जयंती की कथा थी जब अंधेरे को मिटाने के लिए एक मां की गोद में स्वयं भक्ति ने जन्म लिया था। [संगीत] बोलिए पवन सुधा हनुमान की जय।