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मित्रों, एसपी मैडम आज सजधज कर अपने रिश्तेदार की शादी में जा रही थीं। ड्यूटी से पहले ही उन्हें देर हो चुकी थी और अब शादी में पहुँचने में भी देरी हो रही थी। समय की कमी के कारण वह तेजी से गाड़ी चला रही थीं।
लेकिन अचानक उनकी कार का पीछे का टायर डगमगाने लगा। उतर कर देखा तो टायर पंक्चर था। एसपी मैडम ने मन ही मन सोचा, "आज तो देरी पर देरी होने वाली है।" और ऊपर से उनका ड्राइवर भी आज साथ नहीं था।
तभी उन्होंने नजर घुमाई तो पास में ही एक पंक्चर की दुकान दिखाई दी। उन्होंने भगवान को धन्यवाद दिया। "धन्यवाद भगवान, आपने पास ही मदद भेज दी।" एसपी मैडम जल्दी-जल्दी उस दुकान पर गईं और पंक्चर वाले से कहा, "मुझे शादी में जल्दी पहुँचना है। कृपया मेरी गाड़ी का टायर जल्दी से ठीक कर दीजिए।"
दुकान पर मौजूद एक बूढ़े ने कहा, "मैडम, बस पाँच मिनट बैठ जाइए। मेरा कारीगर आता ही होगा।" करीब पाँच मिनट बाद एक मास्क पहने मजदूर वहाँ आया और टायर निकालकर पंक्चर बनाने लगा। एसपी मैडम उसकी ओर देख रही थीं। उन्हें अंदर से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था।
उन्होंने पूछा, "तुमने मास्क क्यों लगाया है?" मजदूर बोला, "मुझे सर्दी है और धूल मिट्टी से एलर्जी है इसलिए मास्क पहना है।" एसपी मैडम को शक हुआ। उन्होंने सख्त लहजे में कहा, "जरा मास्क उतारो।" पहले तो मजदूर ने मना किया लेकिन एसपी मैडम के गुस्से पर मजबूर होकर उसने मास्क उतार दिया।
और जैसे ही मास्क उतारा, एसपी मैडम के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह हक्का-बक्का रह गईं क्योंकि वह मजदूर कोई और नहीं बल्कि उनका पति था जो सोलह साल पहले एक हादसे में मरा हुआ माना गया था।
एसपी मैडम ने काँपती आवाज में पूछा, "तुम जिंदा हो? यह कैसे हो सकता है? इतने सालों तक मुझसे दूर क्यों थे?" मजदूर चुप रहा। उसने आँखें झुका लीं और फूट-फूट कर रोने लगा। एसपी मैडम ने कहा, "रो क्यों रहे हो? सच बताओ। आखिर यह सब कैसे हुआ?"
तब मजबूर होकर मजदूर ने सच बताया। एक ऐसा सच जिसे सुनकर आपके भी आँखों से आँसू निकल पड़ेंगे। तो दोस्तों, पूरी कहानी को विस्तार से जानेंगे तो वीडियो में लास्ट तक बने रहें और वीडियो को लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब कर दें। तो चलिए बिना देरी के वीडियो को शुरू करते हैं।
शहर की सबसे तेजतर्रार और ईमानदार पुलिस अफसरों में से एक, एसपी आराध्या सिंह आज अपनी यूनिफॉर्म में नहीं थीं। आज वह सिर्फ आराध्या थीं। नीले रंग की सिल्क की साड़ी, कानों में हल्के झुमके और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो आज सुबह से जाने का नाम ही नहीं ले रही थी। आखिर हो भी क्यों न, आज उसकी सबसे छोटी और लाडली कजिन रिया की शादी थी। सालों बाद परिवार में कोई इतना बड़ा फंक्शन हो रहा था।
जब आराध्या अपनी सरकारी गाड़ी की चाबी उठा रही थीं तो हेड कांस्टेबल शर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैडम आज तो आप बिल्कुल पहचान में नहीं आ रही।" आराध्या ने हँसकर जवाब दिया, "शर्मा जी, कभी-कभी क्रिमिनल और फाइलों से बाहर निकलकर इंसान भी बनना पड़ता है। आज कोई ड्यूटी नहीं, सिर्फ मस्ती।" शर्मा जी ने फिक्र से कहा, "मैडम ड्राइवर को साथ ले जाती तो अच्छा रहता।" "अरे नहीं, आज मैं अपनी गाड़ी खुद चलाऊँगी। वैसे भी शहर से बाहर फार्म हाउस पर है शादी। खुला रास्ता होगा, अच्छा लगेगा।" कहकर आराध्या ने अपनी पर्सनल गाड़ी की चाबी उठाई और पार्किंग की तरफ बढ़ गईं।
गाड़ी हाईवे पर हवा से बातें कर रही थी। शीशे नीचे थे और पुराने किशोर कुमार के गाने चल रहे थे। आराध्या का मन आज सच में बहुत हल्का था। रोज की टेंशन, केस मीटिंग्स इन सबसे दूर उसे याद आया।
रोहन को भी किशोर कुमार बहुत पसंद थे। रोहन, उसका पति। यह नाम सोचते ही उसके चेहरे की मुस्कान हल्की सी फीकी पड़ गई। सोलह साल हो गए, एक लंबा अरसा, एक ऐसा जख्म जो कभी नहीं भरा।
वह एक भयानक एक्सीडेंट, एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ी का खाई में गिरना और फिर कुछ भी नहीं। बस जली हुई गाड़ी के टुकड़े और एक ऐसी खबर जिसने आराध्या की दुनिया ही उजाड़ दी थी। तब वह सिर्फ एक इंस्पेक्टर थी। रोहन की मौत ने उसे तोड़ दिया था। लेकिन उसी दर्द ने उसे पत्थर भी बना दिया। उसने खुद को काम में इतना डुबो दिया कि आज वह शहर की एसपी थी। सब था उसके पास, पावर, इज्जत, एक बड़ा सा घर। बस रोहन नहीं था।
"तुम होते तो कितना खुश होते, रोहन।" उसने धीरे से हवा में कहा, जैसे रोहन उसकी बगल वाली सीट पर ही बैठा हो। "देखते तुम्हारी आराध्या आज कितनी बड़ी अफसर बन गई है।"
इन्हीं ख्यालों में गुम उसे ध्यान ही नहीं रहा कि वह शादी के वेन्यू से बस आधे घंटे की दूरी पर थी। वह थोड़ा और लेट हो चुकी थी। उसने एक्सीलरेटर पर पाँव दबाया। गाड़ी की स्पीड बढ़ी।
तभी अचानक उसे गाड़ी के पिछले हिस्से से एक अजीब सी आवाज सुनाई दी। फट-फट फट और इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, गाड़ी का संतुलन बिगड़ने लगा। उसने बड़ी मुश्किल से स्टीयरिंग को काबू में किया और गाड़ी को सड़क के किनारे लगाया। "सत्यानाश, आज ही यह सब होना था।" उसने गुस्से में स्टीयरिंग व्हील पर हाथ मारा।
उसने नीचे उतर कर देखा। पीछे का टायर बिल्कुल छपटा हो चुका था। पंक्चर।
और किस्मत तो देखो। दूर-दूर तक कोई मदद नजर नहीं आ रही थी। न कोई दुकान, न कोई घर। सिर्फ सूनी सड़क और दोनों तरफ खेत। मोबाइल निकाला तो नेटवर्क भी गायब था। "वाह, बहुत बढ़िया।" वह खुद पर ही साकास्टिक हो रही थी। "एसपी साहिबा बीच सड़क पर फँस चुकी हैं। इससे अच्छी किस्मत और क्या होगी?"
साड़ी का पल्लू कमर में खोसकर वह गाड़ी की डिग्गी खोलने लगी कि शायद स्टेपनी बदल ले। लेकिन कहाँ उसे यह सब काम कहाँ आता था। "रोहन होता तो पाँच मिनट में कर देता।" फिर रोहन का... उसने झिड़ककर अपने ख्यालों को दूर किया। अभी प्रॉब्लम पर फोकस करना था।
उसने चारों तरफ नजर घुमाई। सड़क पर एक-दो गाड़ियाँ गुजरीं लेकिन किसी ने रुकने की जहमत नहीं उठाई। शायद एक सजी-धजी औरत को अकेली देखकर उन्हें लगा कोई ड्रामा होगा। आधा घंटा बीत गया। पसीने से उसका मेकअप हल्का पड़ने लगा था। गुस्सा और लाचारी दोनों उस पर हावी हो रहे थे।
तभी उसे दूर जहाँ सड़क हल्की सी मुड़ रही थी, एक छोटा सा बोर्ड नजर आया। धूल और मौसम की मार से उसका रंग उड़ चुका था। लेकिन फिर भी पढ़ा जा सकता था, "पंक्चर की दुकान।" उसकी आँखों में एक पल को चमक आ गई। "शुक्र है भगवान।" उसने मन ही मन कहा और बिना सोचे समझे उस दिशा में तेज कदमों से चलने लगी।
दुकान क्या थी? एक टीन की छत के नीचे एक छोटा सा कमरा था। बाहर कुछ पुराने घिसे हुए टायर पड़े थे और हवा भरने वाली मशीन शांत खड़ी थी। एक बूढ़े से चाचा एक लकड़ी की टूटी-फूटी कुर्सी पर बैठे ऊँघ रहे थे। "चाचा जी!" आराध्या ने थोड़ा तेज आवाज में कहा। चाचा हड़बड़ा कर उठे। एक सजी-धजी रबदार औरत को अपने सामने देखकर वह थोड़ा घबरा गए।
"जीजी बिटिया।" आराध्या ने एक साँस में कहा, "मेरी गाड़ी का टायर पंक्चर हो गया है। यहाँ से थोड़ी दूर पर खड़ी है। आप ठीक कर देंगे? मुझे बहुत जल्दी है। शादी में जाना है।" चाचा ने अपनी झुर्रियों वाली आँखों से उसे देखा। "बिटिया, मैं तो अब यह सब काम नहीं करता। कमर में दर्द रहता है। मेरा कारीगर है। बस पाँच मिनट में आता होगा। पास के गाँव में गया है कुछ सामान लेने। आप बैठो।"
आराध्या के पास बैठने के अलावा कोई चारा नहीं था। वह वहीं एक दूसरी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गई जो शायद सालों से साफ नहीं हुई थी। उसने अपने फोन को फिर देखा। नेटवर्क अभी भी नहीं था। वह बस इंतजार कर रही थी। हर गुजरती गाड़ी के साथ उसकी बेचैनी बढ़ रही थी। पाँच मिनट, दस मिनट, पंद्रह मिनट। उसने थोड़ी झुंझुलाहट में कहा, "चाचा कहाँ रह गया आपका कारीगर? मुझे बहुत देर हो रही है।" चाचा ने वहीं रटा-रटाया जवाब दिया, "आता होगा बिटिया, आता ही होगा।"
तभी एक पुरानी खटारा साइकिल दुकान के सामने आकर रुकी। उस पर एक आदमी सवार था। दुबला-पतला, मैले-कुचले कपड़े पहने हुए। उसके चेहरे पर एक गंदा सा मास्क लगा हुआ था जिसने उसकी नाक से लेकर ठोड़ी तक का हिस्सा ढक रखा था। धूप से बचने के लिए उसने सर पर एक गमछा भी लपेट रखा था। "आ गया, आ गया मेरा कारीगर।" चाचा ने राहत की साँस ली। "जा रे मैडम की गाड़ी देख, पंक्चर है।"
वह आदमी बिना कुछ बोले अपने औजारों का थैला उठाकर आराध्या की तरफ देखने लगा। उसकी आँखें... उन आँखों में कुछ था। एक अजीब सी थकान, एक गहरी उदासी। पर आराध्या को उस वक्त कुछ और सोचने का मौका नहीं मिला। वह जल्दी से उठी। "चलो भाई, जल्दी करो।" कहकर वह आगे-आगे चलने लगी और वह आदमी चुपचाप साइकिल घसीटता हुआ उसके पीछे-पीछे।
गाड़ी के पास पहुँचकर उसने बिना एक शब्द कहे अपना काम शुरू कर दिया। उसके काम करने का तरीका बहुत अलग था। जैसे सालों से यही करता आ रहा हो। जैक लगाना, नट खोलना, टायर बाहर निकालना, सब कुछ एक मशीन की तरह। आराध्या वहीं खड़ी उसे देख रही थी और देखते-देखते उसे फिर वही अजीब सा एहसास होने लगा। उस आदमी के हाथ लंबे और पतले, उसके हाथ पकड़ने का तरीका। वह जिस तरह से नट खोलते हुए अपनी उँगलियों को मोड़ रहा था। सब कुछ इतना जाना-पहचाना क्यों लग रहा था?
आराध्या ने अपनी पुलिस वाली आदत से मजबूर होकर पूछा, "यह मास्क क्यों लगा रखा है तुमने?" उस आदमी ने एक पल के लिए काम रोका लेकिन उसकी तरफ देखा नहीं। बस नीचे टायर को देखते हुए धीमी, दबी हुई आवाज में बोला, "सर्दी है मैडम और धूल मिट्टी से एलर्जी भी है।" आवाज भारी और थकी हुई। लेकिन इस आवाज में भी कुछ था जो आराध्या के दिल के किसी पुराने तार को छेड़ गया। उसका शक अब गहराने लगा था। यह सिर्फ एक एहसास नहीं था, कुछ और था। उसके दिमाग की बत्तियाँ जलने लगी थीं। एक पुलिस अफसर का दिमाग जो छोटी-छोटी बातों को भी पकड़ लेता है।
उसने देखा काम करते हुए उस आदमी ने अपने पसीने वाले हाथ को अपनी पैंट के पिछले हिस्से पर एक खास अंदाज में पोंछा। ठीक वैसे ही जैसे रोहन पोंछा करता था। आराध्या का दिल जोर से धड़का। एक सर्द लहर उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई। "नहीं, यह नहीं हो सकता। यह मेरा वहम है।" उसने खुद को समझाया। "मैं पागल हो रही हूँ। वह जा चुका है।" लेकिन उसका दिल मानने को तैयार नहीं था। उसकी नजरें अब उस आदमी के हर हरकत पर गड़ी थीं।
वह पंक्चर चेक करने के लिए टायर को पानी की टंकी में डाल रहा था। उसकी गर्दन का पिछला हिस्सा खुला हुआ था और वहाँ कान के ठीक नीचे एक छोटा सा तिल था। बस आराध्या के लिए यह काफी था। यह वही तिल था जिसे वह अक्सर छेड़ती थी। उसकी दुनिया घूम गई। उसके कानों में साएँ-साएँ की आवाज होने लगी। उसे लगा वह अभी चक्कर खाकर गिर पड़ेगी।
उसने काँपती हुई आवाज में कहा, "जरा अपना मास्क उतारो।" उस आदमी के हाथ वहीं रुक गए। वह पत्थर बन गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया।
आराध्या थोड़ा आगे बढ़ी। इस बार उसकी आवाज में एक एसपी का रौब था। एक पत्नी का हक था। एक टूटे हुए दिल की बेचैनी थी। "मैंने कहा अपना मास्क उतारो।" वह आदमी काँपा। उसने धीरे से 'ना' में सर हिलाया।
आराध्या का सब्र अब जवाब दे गया। वह गुस्से, दर्द और अविश्वसनीयता के एक अजीब से तूफान में घिरी थी। वह लगभग चीखी, "तुम मास्क उतार रहे हो या नहीं? मैं पुलिस अफसर हूँ।"
उसकी चीख सुनकर वह आदमी बुरी तरह डर गया। उसके पास अब कोई चारा नहीं था। उसके काँपते हुए हाथ धीरे-धीरे अपने चेहरे की तरफ बढ़े। उसने गमछा हटाया और फिर धीरे-धीरे मास्क की डोरी को अपने कानों से निकाला। मास्क नीचे आया और सामने जो चेहरा था उसे देखकर आराध्या की साँसें थम गईं। उसके पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई हो। समय रुक गया। गाड़ियों का शोर, हवा की सरसराहट सब कुछ बंद हो गया।
वह चेहरा वही चेहरा था। थोड़ा बूढ़ा, थोड़ा थका हुआ। गाल पिचक गए थे। आँखों के नीचे गहरे गड्ढे थे। माथे पर लकीरें खींच गई थीं और एक गाल पर एक लंबा सा चोट का निशान भी था। लेकिन आँखें... वह आँखें वहीं थीं। वह नाक, वो होंठ, वो रोहन था। उसका रोहन, जिंदा!
आराध्या के मुँह से एक शब्द नहीं निकला। वह बस पत्थर की मूर्ति बनी उसे देखती रही। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था। सोलह साल पहले जिस इंसान का उसने अपने हाथों से अंतिम संस्कार किया था, वह आज उसके सामने एक पंक्चर बनाने वाले मजदूर के रूप में खड़ा था।
रोहन की आँखें आराध्या से नहीं मिल पा रही थीं। वह बस जमीन को घूर रहा था और फिर सोलह सालों से दबा हुआ एक बाँध टूट गया। उसकी आँखों से आँसू झर-झर बहने लगे। वह कुछ बोल नहीं पाया। बस वहीं जमीन पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। उसकी हिचकियाँ पूरे माहौल में गूँज रही थीं।
उसका रोना देखकर आराध्या भी होश में आई। उसके खुद के आँसू अब बहने लगे थे। वह धीरे-धीरे उसके पास गई और उसके सामने घुटनों पर बैठ गई। उसने अपना काँपता हुआ हाथ बढ़ाकर उसके कंधे को छुआ। "रोहन?" उसके मुँह से एक सवाल की तरह फुसफुसाहट निकली। "तुम... तुम जिंदा हो? यह कैसे हो सकता है?"
रोहन ने कोई जवाब नहीं दिया। बस रोता रहा जैसे अपने आँसुओं में सोलह साल का हर दर्द बहा देना चाहता हो।
आराध्या ने उसे झकझोर दिया। "रो क्यों रहे हो? मुझे बताओ। मुझे सच बताओ। तुम जिंदा कैसे हो? और तुम इतने सालों तक मुझसे दूर क्यों थे? तुम्हें पता है मैंने यह सोलह साल कैसे गुजारे हैं? तुम्हें पता है? मैं हर पल, हर साँस में मरी हूँ।" उसका हर सवाल एक तीर की तरह था जो रोहन के दिल में धँस रहा था। लेकिन वह चुप था। उसकी चुप्पी आराध्या को पागल कर रही थी। "तुम्हें मेरी कसम रोहन, तुम्हें आज सच बताना होगा। क्यों किया तुमने यह सब?"
आराध्या ने जब अपनी कसम दी तो रोहन का रोना थोड़ा थमा। उसने अपनी लाल, सूजी हुई आँखों से पहली बार आराध्या की तरफ देखा। उन आँखों में इतना दर्द, इतनी लाचारी और इतना डर था कि आराध्या का दिल काँप गया। उसने टूटी हुई, काँपती हुई आवाज में कहना शुरू किया और उसने जो सच्चाई बताई वह किसी भयानक सपने से भी ज्यादा डरावनी थी।
उसने हिचकियों के बीच कहा, "मुझे माफ कर दो आराध्या। मैं तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता था। मुझे मजबूर किया गया था।" उसने बताना शुरू किया, "वह एक्सीडेंट... वह कोई एक्सीडेंट नहीं था, आराध्या। वह एक सोची-समझी साजिश थी। तुम्हें याद है मेरे मरने से कुछ महीने पहले मैं नासिक में एक बड़े सरकारी हाईवे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था?" आराध्या ने हाँ में सर हिलाया।
"मैं एक सिविल इंजीनियर था, आराध्या। मेरा काम सिर्फ नक्शे और कंस्ट्रक्शन देखना था। लेकिन मुझे कुछ गड़बड़ लगी। जो मटेरियल इस्तेमाल हो रहा था वह बहुत घटिया था। सीमेंट, सरिया सब कुछ। मैंने जब गहराई में छानबीन की तो मेरे होश उड़ गए। उस पूरे प्रोजेक्ट की आड़ में मुंबई का सबसे बड़ा गैंगस्टर पाटिल अपना काला पैसा सफेद कर रहा था और साथ ही करोड़ों का सरकारी माल भी खा रहा था।" आराध्या का चेहरा सफेद पड़ गया। पाटिल, एक ऐसा नाम जिसे सुनकर बड़े-बड़े पुलिस वालों के पसीने छूट जाते थे। वह उसे सालों से पकड़ने की कोशिश कर रही थी। लेकिन वह हमेशा कानून के शिकंजे से बच निकलता था।
रोहन ने आगे कहा, "मैं ईमानदार था। मैंने सारे सबूत इकट्ठे कर लिए। मैं अगले ही दिन पुलिस को सब कुछ बताने वाला था। लेकिन शायद पाटिल के आदमी हर जगह थे। उस रात जब मैं साइड से लौट रहा था तो मुझे अगवा कर लिया गया। मुझे पाटिल के सामने ले जाया गया। वह हँसा। उसने मेरे सारे सबूत मेरे सामने जला दिए और कहा, 'इंजीनियर, तेरे पास दो रास्ते हैं। या तो तू कल सुबह अपनी बीवी के साथ एक भयानक कार एक्सीडेंट में मर जा या फिर हमेशा के लिए दुनिया के लिए मर जा और अपनी बीवी को जिंदा छोड़ दे।' आराध्या की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसे यकीन नहीं हो रहा था।
रोहन की आवाज काँप रही थी। "पाटिल जानता था कि तुम एक पुलिस वाली हो। उसने कहा, 'तेरी बीवी बहुत ईमानदार है, बहुत तेज है। अगर तू जिंदा रहा तो वह चुप नहीं बैठेगी। वह मेरे पीछे पड़ जाएगी। लेकिन अगर तू मर गया तो वह टूट जाएगी। वह कुछ साल दुखी रहेगी लेकिन जिंदा तो रहेगी। और अगर तूने जरा भी होशियारी दिखाने की कोशिश की तो मैं उसे ऐसी मौत मारूँगा कि उसकी रूह भी काँप जाएगी।' मेरे पास कोई रास्ता नहीं था, आराध्या। एक तरफ मेरी मौत थी और दूसरी तरफ तुम्हारी जिंदगी। मैंने तुम्हारी जिंदगी चुनी।"
"अगले दिन उन्होंने सब कुछ प्लान किया। एक पुरानी गाड़ी में एक लावारिस लाश को मेरे कपड़े पहना कर बिठाया गया जिसका चेहरा पहचानना नामुमकिन था। और उस गाड़ी को उसी पहाड़ी से नीचे फेंक दिया गया जहाँ मैं अक्सर साइड पर जाते हुए रुकता था। मुझे दूर एक पहाड़ी पर खड़ा करके अपनी आँखों से अपनी मौत का तमाशा देखने के लिए मजबूर किया गया। मैं चीखना चाहता था, चिल्लाना चाहता था। लेकिन मेरे मुँह पर हाथ बँधे थे। मैंने तुम्हें देखा था आराध्या जब तुम खबर सुनकर वहाँ पहुँची थीं। तुम्हारा रोना, तुम्हारी हालत... मैं वहीं मर जाना चाहता था।" यह सुनकर आराध्या की आत्मा तक काँप उठी। वह उस मंजर को सोच कर ही सिहर उठी।
"उसके बाद पाटिल के आदमियों ने मुझे एक ट्रक में डाला और कहीं दूर एक अनजान शहर में फेंक दिया। उन्होंने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने कभी भी अपनी पहचान जाहिर करने की या तुमसे संपर्क करने की कोशिश की तो वह तुम्हें ढूँढकर मार देंगे। मेरे पास न पैसे थे, न कोई पहचान। मैं रोहन नहीं था। मैं एक जिंदा लाश था। मैंने सोलह साल, आराध्या, सोलह साल इसी डर में गुजारे हैं। मैंने हर तरह का काम किया। मजदूरी की, होटलों में बर्तन धोए और आखिर में यह पंक्चर बनाने का काम सीखा। मैं एक शहर से दूसरे शहर भटकता रहा ताकि कोई मुझे पहचान न सके।"
"मैं हर रोज अखबार में, टीवी पर तुम्हारी खबर ढूँढता था। जब तुम इंस्पेक्टर से एसपी बनी तो मैं उस दिन पूरी रात रोया था। खुशी से भी और इस बात के गम में भी कि मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ। मैं तुम्हें दूर से देखता था, आराध्या। कभी-कभी मैं तुम्हारे शहर आता था, सिर्फ तुम्हारी एक झलक पाने के लिए। तुम्हें तुम्हारी गाड़ी में, तुम्हारी यूनिफॉर्म में देखकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। लेकिन अगले ही पल यह एहसास कि मैं तुम्हारे पास नहीं आ सकता, मुझे मार डालता था।"
"उसने अपने गाल का निशान छुआ। यह निशान भी पाटिल के एक आदमी ने दिया था जब उसने मुझे एक बार तुम्हारे घर के आसपास भटकते हुए देख लिया था। उस दिन के बाद से मैंने तुम्हारे शहर आना भी छोड़ दिया।" "तो फिर आज तुम यहाँ कैसे?" आराध्या ने सिसकते हुए पूछा।
"पाटिल..." रोहन ने कहा, "तीन महीने पहले मैंने खबर में पढ़ा कि वह एक गैंग वॉर में मारा गया। उस दिन मुझे लगा जैसे मैं आजाद हो गया। सोलह साल की कैद खत्म हो गई। मैं पिछले तीन महीने से हिम्मत जुटा रहा था कि तुम्हारे पास आऊँ। लेकिन कैसे आता आराध्या? किस मुँह से? तुम एक इतनी बड़ी एसपी और मैं एक फटा-पुराना, हारा हुआ मजदूर। मुझे शर्म आ रही थी। मैं खुद को तुम्हारे काबिल नहीं समझता था। मैं बस सही वक्त का इंतजार कर रहा था। लेकिन मुझे नहीं पता था कि किस्मत वह हमें इस तरह मिलाएगी।"
सारी कहानी सुनकर आराध्या अब रो नहीं रही थी। वह सुन्न थी। उसके पति ने उसकी जान बचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी थी। उसने सोलह साल का नर्क झेला था। सिर्फ इसलिए ताकि वह महफूज़ रह सके।
उसने रोहन का चेहरा अपने हाथों में लिया। उसकी आँखों में देखा और कहा, "तुमने यह सब अकेले कैसे सहा रोहन? क्यों नहीं सोचा कि मैं तुम्हारे बिना कैसे जीऊँगी?" "मैं हर पल तुम्हारे साथ था, आराध्या।" रोहन ने... उसके सोलह साल की दूरी, सोलह साल का दर्द आज उन दोनों के आँसुओं में बह रहा था।
शादी, फंक्शन, देरी सब कुछ बेमतलब हो चुका था। जो खोया हुआ खजाना आज उसे मिला था, उसके आगे दुनिया की हर चीज फीकी थी।
उसने रोहन का हाथ पकड़ा और उसे उठाया। उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "घर चलो रोहन।" "लेकिन आराध्या, तुम्हारी शादी..." आराध्या ने उसकी बात काट दी, "मेरी दुनिया की सबसे बड़ी खुशी तो आज पूरी हो गई है। इससे बड़ी कोई शादी नहीं, कोई फंक्शन नहीं। तुम मेरे साथ हो बस यही काफी है।"
उसने पंक्चर टायर को वहीं छोड़ा। रोहन को अपनी गाड़ी में बिठाया। आज स्टीयरिंग व्हील पर आराध्या के हाथ थे और बगल की सीट पर सोलह साल बाद उसका रोहन बैठा था। गाड़ी शादी के वेन्यू की तरफ नहीं बल्कि उनके घर की तरफ जा रही थी। एक ऐसा घर जो सोलह सालों से सिर्फ एक मकान था और आज फिर से घर बनने वाला था।
किशोर कुमार का गाना अब भी बज रहा था, "चिंगारी कोई भड़के..." और आज इस गाने के मतलब उन दोनों के लिए बिल्कुल अलग थे। यह उनके प्यार की चिंगारी थी जो सोलह साल के तूफानों के बाद भी बुझी नहीं थी।
गाड़ी घर की जानी-पहचानी सड़कों से गुजर रही थी। अंदर एक अजीब सी खामोशी थी। लेकिन यह खामोशी शोर मचा रही थी। सोलह साल का सन्नाटा आज टूट रहा था। आराध्या बार-बार ड्राइविंग करते हुए बगल में बैठे रोहन को देख लेती, जैसे उसे यकीन दिलाना चाहती हो कि यह कोई सपना नहीं है।
रोहन की नजरें बाहर थीं, लेकिन वह कुछ देख नहीं रहा था। उसकी आँखें तो अपने बीते हुए कल और सामने खड़े आज के बीच की खाई को नाप रही थीं। उसके मैले कपड़े, बढ़े हुए बाल और चेहरे की थकान, आराध्या का दिल दर्द से भर गया। यह वही रोहन था जो अपनी एक शर्ट पर हल्की सी सिलवट भी बर्दाश्त नहीं करता था। उसने कितनी तकलीफें सही होंगी, कितने दिन भूखा सोया होगा, कितनी रातों को डर कर जागा होगा। यह सोचते ही आराध्या की आँखों में फिर से पानी भर आया।
आराध्या ने बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज को सामान्य रखते हुए पूछा, "तुमने खाना खाया?" यह सवाल कितना छोटा था, लेकिन इसमें सोलह साल की फिक्र छुपी थी। रोहन ने उसकी तरफ देखा और हल्का सा मुस्कुराया। एक ऐसी मुस्कान जिसमें खुशी से ज्यादा दर्द था। "सुबह चाय के साथ एक पाव खाया था।" बस इस एक लाइन ने आराध्या के सीने में एक और खंजर उतार दिया। उसकी आँखों के सामने वह दिन घूम गए जब वह रोहन के लिए टिफिन तैयार करती थी और वह बच्चों की तरह जिद करता था कि आज ऑफिस नहीं जाना, तुम्हारे हाथ के पराठे खाने हैं।
गाड़ी उनके पुराने बंगले के सामने आकर रुकी। वही बंगला जिसे उन्होंने शादी के बाद बड़ी हसरतों से खरीदा था। रोहन ने इसे अपना छोटा सा महल नाम दिया था। "हम यहीं रहते हैं?" रोहन ने काँपती हुई आवाज में पूछा। आराध्या ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, "यह हमारा घर है रोहन। हमेशा से था और हमेशा रहेगा।" रोहन के हाथ कितने खुरदुरे और सख्त हो गए थे। उन हाथों में अब औजारों के निशान थे, न कि इंजीनियरिंग की किताबों के।
आराध्या ने दरवाजा खोला और अंदर दाखिल हुई। रोहन दहलीज पर ही टिक गया जैसे उसके कदम सोलह साल के फासले को पार करने से डर रहे हों।
अंदर सब कुछ वैसा ही था। वही सोफा, वही सेंटर टेबल, दीवारों पर वही पेंट। बस चीजें थोड़ी पुरानी हो गई थीं और सामने की दीवार पर उनकी शादी की एक बड़ी सी तस्वीर लगी थी। उसमें रोहन खिलखिलाकर हँस रहा था और आराध्या शर्माते हुए मुस्कुरा रही थी।
उस तस्वीर के नीचे एक और तस्वीर रखी थी जिस पर एक सूखा हुआ हार टँगा था। वह रोहन की तस्वीर थी जिसके सामने सोलह सालों से एक दिया जल रहा था। उस तस्वीर को देखते ही रोहन वहीं जमीन पर बैठ गया। वह अपनी ही तस्वीर पर टँगे हार को देख रहा था।
"दुनिया के लिए वह मर चुका था। एक याद बन चुका था।" "आराध्या, मैं तो मर चुका हूँ।" उसने एक टूटी हुई आवाज में कहा।
आराध्या दौड़कर उसके पास आई और उसे उठाया। "नहीं रोहन, तुम जिंदा हो। यह सब एक बुरा सपना था जो अब खत्म हो गया है।" वह उसे पकड़ कर अंदर लाई और सोफे पर बिठाया। रोहन की नजरें किसी बच्चे की तरह पूरे घर को देख रही थीं। वह बुक शेल्फ जिसमें अब भी उसकी इंजीनियरिंग की किताबें रखी थीं। वह बालकनी जहाँ बैठकर वह दोनों घंटों बातें करते थे। हर चीज एक याद थी। हर कोना एक कहानी कह रहा था।
आराध्या दौड़कर किचन में गई और उसके लिए पानी ले आई। उसने रोहन के हाथ में गिलास थमाया। रोहन ने पानी पिया और फिर आराध्या की तरफ देखा जो जमीन पर उसके पैरों के पास बैठ गई थी। रोहन ने पूछा, "तुम्हारी यूनिफॉर्म कहाँ है?" आराध्या को समझ नहीं आया, "वह अलमारी में है। क्यों?" "मतलब आज तो तुम साड़ी में हो। मैं तो तुम्हें हमेशा यूनिफॉर्म में ही देखने की कल्पना करता था। अखबार में, टीवी पर हमेशा एक रबदार एसपी के रूप में।"
आराध्या मुस्कुराई। "आज तुम्हारी एसपी नहीं, सिर्फ तुम्हारी आराध्या घर लौटी है, रोहन।" यह सुनकर रोहन की आँखों में एक अजीब सी शर्मिंदगी तैर गई। उसने अपनी नजरें झुका लीं। "मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ, आराध्या। तुम कहाँ एक इतनी बड़ी अफसर और मैं एक मामूली पंक्चर वाला। लोग क्या कहेंगे? डिपार्टमेंट क्या सोचेगा?"
यही वह डर था जो उसे इतने महीनों से खाए जा रहा था। यही वह शर्म थी जिसने उसे आजाद होने के बाद भी अपनी पत्नी के पास आने से रोके रखा था।
आराध्या ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। "लोग क्या कहेंगे यह मैंने सोचना छोड़ दिया है, रोहन। और डिपार्टमेंट, वह मेरा परिवार है। वह समझेगा और अगर नहीं भी समझा तो मुझे परवाह नहीं। यह वर्दी, यह कुर्सी, यह सब तुम्हारे बिना मेरे लिए बेमतलब थे। मैंने यह सब इसलिए हासिल किया ताकि खुद को व्यस्त रख सकूँ। तुम्हारे गम को भुला सकूँ। लेकिन सच तो यह है कि मैं एक पल के लिए भी तुम्हें नहीं भूली।" उसने रोहन के हाथ अपने हाथ में ले लिए। "तुम मेरे लिए क्या हो यह सिर्फ मैं जानती हूँ। तुमने मेरी जान बचाने के लिए अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी। इससे बड़ा और महान कोई काम नहीं हो सकता। मेरी नजर में तुम किसी हीरो से कम नहीं हो।" रोहन की आँखों से फिर आँसू बहने लगे। लेकिन इस बार यह दर्द के नहीं, राहत के आँसू थे।
उसने पूछा, "लेकिन अब आगे क्या होगा आराध्या? यह सब इतना आसान नहीं होगा। दुनिया के लिए मैं एक मुर्दा हूँ। मेरा डेथ सर्टिफिकेट बना हुआ है। बैंक अकाउंट बंद हो चुके हैं। मेरी कोई पहचान नहीं है। मैं कानूनी तौर पर इस दुनिया में एक्सिस्ट ही नहीं करता।"
अब आराध्या एक एसपी की तरह सोच रही थी। यह सिर्फ एक भावनात्मक मामला नहीं था। यह एक बहुत बड़ी कानूनी उलझन थी। एक आदमी जो सोलह साल से मृत है, उसे वापस जिंदा कैसे साबित किया जाएगा? मीडिया में यह खबर आग की तरह फैलेगी। "एसपी का पति निकला जिंदा, सोलह साल से छिपाकर रखी पहचान।" न जाने कैसी-कैसी सुर्खियाँ बनेंगी। उसकी अपनी नौकरी पर भी आँच आ सकती थी।
"मुझे पता है मुश्किल है।" आराध्या ने एक गहरी साँस लेते हुए कहा, "बहुत मुश्किल। हमें हर कदम बहुत सोच समझ कर उठाना होगा। सबसे पहले हमें तुम्हें एक नई पहचान देनी होगी या यूँ कहें कि तुम्हारी पुरानी पहचान वापस दिलानी होगी।" "कैसे?" "मैं अपने सबसे भरोसेमंद लोगों से बात करूँगी। हमें कोर्ट में जाना होगा। डीएनए टेस्ट होंगे, गवाहियाँ होंगी। पाटिल मर चुका है। लेकिन उसके गैंग के कुछ लोग अब भी जिंदा हैं। हमें साबित करना होगा कि तुम्हें धमकी दी गई थी और तुम्हारी मौत को प्लान किया गया था। इसमें वक्त लगेगा, रोहन। बहुत वक्त और बहुत हिम्मत।"
रोहन का चेहरा यह सब सुनकर पीला पड़ गया। कोर्ट, कचहरी, गवाह यह सब उसके लिए एक बुरे सपने जैसा था। वह तो बस एक शांत जिंदगी जीना चाहता था। "क्या हम यह सब चुपचाप नहीं कर सकते? कहीं दूर चले जाएँ? एक नई जिंदगी शुरू करें?" उसने एक बच्चे की तरह पूछा।
आराध्या ने प्यार से उसका सर सहलाया। "हम भाग नहीं सकते रोहन। हमने कुछ गलत नहीं किया है। तुम एक पीड़ित हो, अपराधी नहीं। हम दुनिया का सामना करेंगे, एक साथ। मैं तुम्हें तुम्हारा नाम, तुम्हारी इज्जत, तुम्हारी जिंदगी वापस दिलाऊँगी। यह मेरा तुमसे वादा है।" उसकी आवाज में इतनी दृढ़ता थी कि रोहन को भी हिम्मत मिली। उसे लगा कि अब वह अकेला नहीं है। उसकी आराध्या उसके साथ है, उसकी ढाल बनकर। "ठीक है।" उसने कहा, "जैसा तुम कहोगी।"
आराध्या उठी। "पहले तुम नहा लो। मैं तुम्हारे लिए कुछ कपड़े निकालती हूँ।" वह अलमारी की तरफ गई और एक पुराना ट्रंक खोला। इसमें उसने रोहन के सारे कपड़े और सामान सहेज कर रखे थे। उसकी घड़ियाँ, उसका वॉलेट, उसकी किताबें सब कुछ। उसने रोहन के पसंदीदा कपड़ों में से एक कुर्ता-पायजामा निकाला। जब रोहन नहाकर बाहर आया तो वह बिल्कुल अलग लग रहा था। साफ कपड़ों में उसका थका हुआ चेहरा भी दमक रहा था। आराध्या बस उसे देखती रह गई। "मैंने चाय बनाई है।" उसने कहा। "तुम्हारे हाथ की अदरक वाली चाय पिए सालों हो गए।" रोहन ने कहा और मुस्कुराया।
दोनों बालकनी में आकर बैठे। शाम ढल रही थी। सूरज डूब रहा था और आसमान में नारंगी रंग फैल रहा था। दोनों चुपचाप चाय पी रहे थे। लेकिन आज उनकी खामोशी में सुकून था। रोहन ने धीरे से कहा, "हमें मम्मी-पापा को भी बताना होगा।" अपने माँ-बाप का ख्याल आते ही उसका दिल भारी हो गया। आराध्या ने उसका हाथ थामा। "हाँ, बताना होगा। उनके लिए यह किसी झटके से कम नहीं होगा। लेकिन खुशी का झटका होगा। हम कल सुबह ही उनके पास चलेंगे।"
उस रात सोलह साल बाद रोहन अपने कमरे में, अपने बिस्तर पर सोया। आराध्या पूरी रात उसके पास बैठी रही। बस उसे देखती रही। उसे डर था कि अगर उसने आँखें बंद कीं तो यह सपना टूट जाएगा और रोहन फिर गायब हो जाएगा।
सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई तो रोहन की आँख खुली। उसने देखा आराध्या कुर्सी पर ही बैठे-बैठे सो गई थी और उसका सर बिस्तर के किनारे पर था। रोहन ने धीरे से उठकर उसके माथे को चूमा। आराध्या की आँख खुल गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराए। "तैयार हो एक नई लड़ाई के लिए?" आराध्या ने पूछा। रोहन ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। "जब तक तुम साथ हो, मैं हर लड़ाई के लिए तैयार हूँ।"
तो दोस्तों, आज के लिए बस इतना ही। तो, कैसी लगी आपको यह कहानी, एक ऐसी जिंदगी जिसे उन्होंने मौत के मुँह से छीनकर वापस पाया था। रास्ता मुश्किलों से भरा था। लेकिन आज उनके पास एक दूसरे का साथ था और इसी साथ में उनकी सबसे बड़ी ताकत छुपी थी। दुनिया से लड़ने का सफर अब शुरू हो चुका था।
तो दोस्तों, कहानी तो खत्म हो गई लेकिन मुझे यकीन है कि आराध्या और रोहन के इमोशंस अब भी आपके दिलों में कहीं न कहीं महसूस हो रहे होंगे। जरा एक पल के लिए आँखें बंद करके सोचिए। सोलह साल! क्या आज के इस दौर में जहाँ रिश्ते पल भर में बनते और टूटते हैं, कोई किसी के लिए अपनी पूरी जिंदगी, अपनी पहचान, अपना वजूद सब कुछ मिटा सकता है? यह सिर्फ एक कहानी नहीं है। यह उस त्याग की एक मिसाल है जो शायद किताबों में ही अच्छा लगता है। पर रोहन ने इसे हकीकत में जी कर दिखाया।
अब मैं यह सवाल आप पर छोड़ता हूँ। आप सब मुझे कमेंट्स में यह जरूर बताइएगा। अगर आप रोहन की जगह होते तो क्या आप इतना बड़ा बलिदान दे पाते? और अगर आप आराध्या की जगह होते तो सोलह साल बाद अपने पति को इस हाल में देखकर आपका पहला रिएक्शन क्या होता? मुझे आपके जवाबों का इंतजार रहेगा।
अगर इस कहानी के किसी भी पल ने आपकी आँखों में नमी और दिल में एक कसक पैदा की हो तो अपना प्यार दिखाने के लिए इस वीडियो को एक लाइक जरूर दीजिएगा। आपके एक लाइक से मुझे और ऐसी कहानियाँ आप तक लाने की हिम्मत मिलती है। और इस कहानी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करना बिल्कुल मत भूलिएगा। शायद इस कहानी से किसी को सच्चे प्यार की ताकत का फिर से एहसास हो जाए।
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