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हेलो एवरीवन वेलकम बैक टू दी चैनल दी ट्विन ब्रॉस मेरा नाम है अभिषेक चंदेल और आज के इस वीडियो में हम लोग करने वाले हैं क्लास 12 साइकोलॉजी का चैप्टर नंबर टू जिसका नाम है सेल्फ और पर्सनालिटी। इस पर्टिकुलर चैप्टर को हम लोग बेसिकली पढ़ेंगे। कैसे? यह जो आपको PDF दिखेगा, आप इसको नीचे डिस्क्रिप्शन बॉक्स में भी एक्सेस कर सकते हैं। इस PDF में सर्टेन पोर्शन हाईलाइट आएगा। नो दिस हाईलाइटेड पोर्शन इज़ इम्पॉर्टेंट आपके एग्जाम पॉइंट ऑफ़ व्यू से। आप इसको साइड बाय साइड अपनी एनसीईआरटी में भी अंडरलाइन कर सकते हैं या फिर इसको मार्क कर सकते हैं। तो जब भी आपका क्वेश्चन आएगा किसी भी पर्टिकुलर टॉपिक से, तो ये वाले जो पोर्शन हैं वो आपको अपने आंसर्स में फ़ाइनली लिखना है।
इसी के साथ-साथ यहां पे सर्टेन क्वेश्चंस भी आप देख सकते हो, आपको मिलेंगे। ये वाले जो क्वेश्चंस हैं, ये सॉर्ट ऑफ़ एक्स्ट्रा क्वेश्चन हैं। तो एक बार ये चैप्टर खत्म हो जाता है, तो यू विल बी डूइंग दी एनसीईआरटी क्वेश्चंस ऑफ़ दी चैप्टर। एक बार एनसीईआरटी के क्वेश्चंस भी हो जाते हैं, देन यू विल बी डूइंग दिस क्वेश्चंस। तो ये सब आप एक बार कर लेंगे तो आपका चैप्टर पूरा ओवरव्यू हो जाएगा एक बार अच्छे से और आपका कॉन्फिडेंस बढ़ जाएगा सो दैट आप एग्जाम में अच्छे से आंसर्स लिख के आ सकते हैं।
इसके अलावा बहुत सारे लोग होते हैं जिनको लगता है वो नोट्स से बेटर पढ़ पाते हैं, उनको नोट्स से ज्यादा अंडरस्टैंडिंग होती है कॉन्सेप्ट्स के लिए। तो आपको नोट्स भी नीचे डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएंगे। तो उसमें फ्लो चार्ट्स वगैरा के साथ समझाया होगा, तो उससे आपको और अच्छे से कॉन्सेप्ट्स जो हैं वो समझ में आ जाएंगे। तो नाउ लेट्स बिगिन विद दिस चैप्टर। अब जो चैप्टर का नाम है, दैट इज़ सेल्फ़ और पर्सनालिटी। अब ये जो दोनों शब्द हैं, ये हम लोग अपने डे-टू-डे लाइफ़ में काफ़ी ज्यादा कॉमनली यूज़ करते हैं, राइट? की हाय, माय सेल्फ़ या फिर योरसेल्फ या फिर पर्सनालिटी की बात करते हैं। तो अच्छा उसकी पर्सनालिटी ऐसी है, दैट इज़ व्हाई दैट पर्सन इज़ बिहेविंग दिस वे। तो ये बहुत ही ज्यादा आम वे में हम लोग यूज़ करते हैं।
तो जब हम लोग ये यूज़ करते हैं तो हम लोग करैक्टेरिस्टिक्स डिफ़ाइन कर रहे हैं किसी के एक्ज़िस्टेंस का, राइट? की वो इंसान एक्ज़िस्ट इसीलिए कर रहा है बिकॉज़ उसकी पर्सनालिटी इस वे में है। तो अगर कोई इंसान बहुत ज्यादा सैड है, ठीक है बहुत ज्यादा किड हर्टेड है, तो उसके एक्सपीरियंस जितने भी थे पास्ट लाइफ़ में, वो सब उनका बिहेवियर डिफ़ाइन करते हैं। तो यूज़ुअली क्या होता है आप देखोगे जो लोग एग्रेसिव होते हैं, उनके पास्ट में भी उनके साथ बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं सो दैट इज़ व्हाई आपकी जो एक्सपीरियंस, एक्सपीरियंस होता है पहले के, दैट डिफ़ाइन्स बिहेवियर कैसे होगा और इंटर्न आपका सेल्फ़ कैसे होगा और आपकी पर्सनालिटी कैसी होगी। और ऑब्वियसली अब ये पर्सनालिटी जो है वो सिचुएशन टू सिचुएशन, कहानी ना कहानी आपका जो बिहेवियर होता है वो डिफ़र करता है, बट जो आपका अंदर के ट्रेट्स होते हैं वो रिलेटिवली स्टेबल होते हैं। इसका क्या मतलब हो गया है की अगर कोई इंसान एग्रेसिव है तो ज़रूरी नहीं है की हर सिनेरियो में वो उनको एग्रेसन को दिखाएंगे।
शायद से वो अंदर से फ़्रस्ट्रेटेड हो रहे होंगे बट ज़रूरी नहीं है की वो दिखाएं। पर एग्ज़ांपल अगर वो किसी एल्डर से बात कर रहा है और यू नो लाइक आईटी पर पर्सन उनको गुस्सा आ रहा है अपने फ़्रेंड के ऊपर वर्सेस उनको गुस्सा आ रहा है अपने पेरेंट्स के ऊपर वर्सेस उनको गुस्सा आ रहा है अपने टीचर के ऊपर, सिनेरियो में उनका जो एग्रेसन है, बिहेवियर में वो डिफ़रेंट होगा। क्यों? बिकॉज़ वहां पे सिचुएशन जो है, उनका कॉन्टेक्ट जो है, दैट विल बी डिफ़रेंट। सो इसी रीज़न से हम लोग कह सकते हैं की जो आपका पर्सनालिटी होता है वो रिलेटिवली स्टेबल होता है बट वो आपके कॉन्टेक्स्ट टू कॉन्टेक्स्ट में डिफ़र करता है। अब सेल्फ़ और पर्सनालिटी का एग्ज़ैक्ट डेफ़िनेशन क्या है वो हम लोग आगे इस चैप्टर में पढ़ेंगे।
अब जो होता है आपका सेल्फ़ के बारे में आप उतने ही अवेयर होते हो जितना आप अपने सराउंडिंग में ऑब्जेक्ट्स के बारे में अवेयर होते हो, राइट? तो अगर मैं आपको बोलूंगी अपने सराउंडिंग में देखो, देन यू नो डिस्क्राइब दी ऑब्जेक्ट्स दैट यू सी, तो आप जैसे उनको डिस्क्राइब कर सकते हैं, आप अपने सेल्फ़ को भी वैसे ही डिस्क्राइब कर सकते हैं। इसी के साथ-साथ जो आपका सेल्फ़ होता है वो ओवर योर इंटीरियर चाइल्डहुड डेवलप होता है। बचपन में वो आपके इंटरेक्शन जो आपके पेरेंट्स के साथ होते हैं, फ़्रेंड्स के साथ होते, टीचर्स के साथ होते, वो बहुत ही ज्यादा एक विटल रोल प्ले करते हैं आपके सेल्फ़ का इमर्ज करने के लिए। इसी के साथ-साथ आपके इंटरेक्शन थ्रू आउट योर लाइफ़, ज़रूरी नहीं है की सब बचपन में, थ्रू आउट योर लाइफ़ जब भी आपके इंटरेक्शन और एक्सपीरियंस इस जैसे तरीके के होते हैं, वैसे ही आपका सेल्फ़ जो होता है वो इमर्ज करके आता है। जैसे मैंने एग्ज़ांपल दिया की जो लोग एग्रेसिव होते हैं, यूज़ुअली उनके पास्ट में भी बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं उनके साथ, तभी उनका बिहेवियर ऐसा होता है वर्सेस यू नो संभवी जो बहुत ही ज्यादा किड हर्टेड है, जो बहुत ज्यादा हैप्पी है, मे बी पास्ट में उनके साथ उन्होंने एक्सपीरियंस ऐसे हुए जिसके वजह से वो आज वैसे तरीके से बिहेव कर रहे हैं, तो वैसे उनका पर्सनालिटी और सेल्फ़ जो है वो शेप होता जाता है विथ योर एक्सपीरियंस।
अब आपके जो आइडेंटिटी होती है, आइडेंटिटी कार्ड जैसे हम लोग पहन के जाते हैं जो आपको डिफ़ाइन करता है आपके करैक्टेरिस्टिक बेस को, वो आइडेंटिटी आपके दो तरीके के हो सकते हैं। एक होती है पर्सनल आइडेंटिटी और एक होती है सोशल आइडेंटिटी। नाम से ही हम लोग समझ सकते हैं की ये किस चीज को डिफ़ाइन करता है। पर्सनल आइडेंटिटी जो होता है वो पर्सन से रिलेटेड होता है, ठीक है इंडिविजुअल, ज्यादा वहां पे फ़ोकस होता है। तो पर्सनल आइडेंटिटी जो होता है आप उसको ऐसे सोच सकते हैं की आपको एक ग्रुप से स्टैंड अपार्ट करता है, ऐसी चीज जो आपको दूसरे लोगों से डिस्टिंक्ट बनाती है, ठीक है? अट्रीब्यूट्स दैट मेक यू डिफ़रेंट फ़्रॉम अदर पीपल। तो जैसे की आपका नाम हो गया, आपके प्रेफ़रेंसेस हो गए, आपका इंटरेस्ट हो गया, आपके एक चॉइसेस हो गए की आपको कैसे बिहेव करना पसंद है या फिर आपका यू नो ओवरऑल जो भी एडजेक्टिव से आपको डिस्क्राइब करता है लोग वो सारे आपका पर्सनल आइडेंटिटी बन जाती है। की मेरा नाम है अभिषेक, मेरे को फ़ुटबॉल खेलने पसंद है, मेरे को ये जो बुक्स पढ़ना पसंद है, तो ये सारे चीज हो जाती है, ये मेरे को डिफ़रेंट बनाती है फ़्रॉम यू नो क्राउड। दीज़ आर थिंग्स विच आर रिलेटेड ओनली टू यू।
सोशल आइडेंटिटी ऑन दी अदर हैंड मीन्स की आपकी जो आइडेंटिटी है वो आपको क्राउड का पार्ट बनाती है, किसी ग्रुप का पार्ट बनाती है। तो जब भी कोई भी चीज आपको ग्रुप का पार्ट बनाती है तो वो कौन सी चीज हो जाती है? जैसे की आप किसी कंट्री से बिलॉन्ग करते हो, तो इंडियन, ठीक है? इंडिया में आप नॉर्थ इंडिया में हो तो नॉर्थ इंडियन, नॉर्थ इंडिया फिर उसके बाद किसी स्टेट से हो, जैसे आप हरियाणा से, उत्तर प्रदेश से हो, तो वो आपका फादरलैंड वो हो जाता है। इसी के साथ-साथ मतलब जब सोशल आइडेंटिटी होती है वो रिलिज़न भी हो सकता है, आपका कास्ट भी हो सकता है, आपका स्कूल जिससे बिलॉन्ग करते हो, आप जिस कॉलेज से, यूनिवर्सिटी से बिलॉन्ग करते हो, वो सब आपका सोशल आइडेंटिटी बन जाता है। तो बेसिकली क्या हो गया यहां पे? जो भी चीज आपको ग्रुप से स्टैंड अपार्ट करती है, दैट इज़ योर पर्सनल आइडेंटिटी। जो भी चीज आपको ग्रुप का पार्ट बनाती है, दैट इज़ योर सोशल आइडेंटिटी।
अब सेल्फ़ की डेफ़िनेशन क्या होती है? टोटैलिटी ऑफ़ इंडिविजुअल्स कॉन्शियस एक्सपीरियंस, इज़ इट्स थॉट्स और फ़ीलिंग्स विद रिगार्ड टू हरसेल्फ़ और हिमसेल्फ़। इसका क्या मतलब हो गया? सारे जो आपके एक्सपीरियंसेस होते हैं, सारे जो आपके आइडियाज़ होते हैं, सारे जो आपके थॉट्स होते हैं, फ़ीलिंग्स होते हैं अपने बारे में, वो आपका सेल्फ़ बनाते हैं, ठीक है? सारे जो एक्सपीरियंस आप ले रहे हो यू नो इन योर डे-टू-डे लाइफ़, जो ऑफ़ दी कॉग्निटिव प्रोसेस, जैसे आपका थॉट्स हो गया, आइडियाज़ हो गया, आगे, वेल आगे दी अफ़ेक्टिव पार्ट, जो आपके फ़ीलिंग्स हो गया, वो आपका सेल्फ़ बनाने में कंट्रीब्यूट करते हैं। तो ये जो पर्टिकुलर डेफ़िनेशन है सेल्फ़ के लिए बहुत ज्यादा इम्पॉर्टेंट है, इसको प्लीज़ अच्छे से याद कर लीजिएगा। ये आपके एग्जाम में आपको लिखना होगा।
अब जो आपका सेल्फ़ होता है वो सब्जेक्ट भी होता है, ऑब्जेक्ट भी होता है। तो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट हमने इंग्लिश में पढ़ रखा है, ठीक है? कोई भी सेंटेंस होता है जैसे की यहां पे सेंटेंस है आई नो हु आई एम, ठीक है? तो यहां पे बेसिकली सब्जेक्ट जो होता है वो एक्शन बेसिकली परफ़ॉर्म कर रहा होता है। तो ये जो नोइंग का एक्शन, आई नो हुआ है यार, ठीक है? मैं जानता हूं मैं कौन हूं या मैं जानती हूं मैं कौन हूं। तो ये जो नोइंग वाला एक्शन है, दैट इज़ योर सब्जेक्ट और जो चीज ऑब्ज़र्व हो रही है विच इज़ योर सेल्फ़ ओनली इन दिस सिनेरियो, दैट इज़ दी ऑब्जेक्ट। तो सब्जेक्ट एक्टिवली पार्ट ले रहा है जानने में और ऑब्जेक्ट में यहां पे सेल्फ़ जो है आईटी इज़ बीइंग ऑब्ज़र्व्ड। तो आई नो थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड हो सकता है समझने में बट यहां पे बेसिकली यही है की जो आपका सेल्फ़ होता है वो जानता भी है अपने आपको और जो सेल्फ़ है वो ऑब्ज़र्व भी हो सकता है। तो यहां पे ड्यूल नेचर है सेल्फ़ का। तो जो सेल्फ़ है आपका, आईटी इज़ सेल्फ़ अवेयर, मतलब वो उसको पता भी है वो कैसा है और वो अपने आप को ऑब्ज़र्व भी कर सकता है। तो यहां पे जो सेल्फ़ होता है उसका ड्यूल स्टेटस होता है, हमको ये ध्यान में रखना है।
अब सेल्फ़ भी होता है उसके भी बहुत सारे वेरियस काइंड्स होते हैं। जो बचपन में यू नो बच्चे पैदा होते हैं तो उनका बेसिकली बहुत ही ज्यादा बायोलॉजिकल सेल्फ़ होता है। तो जब भी आप देखोगे जब बच्चे रो रहे होते हैं तो यूज़ुअली क्यों रो रहे होते? बिकॉज़ उनको भूख लगती है, राइट? बिकॉज़ दे डोंट हैव लैंग्वेज, दे डोंट हैव अदर मीन्स ऑफ़ कम्युनिकेशन, सो दे आर बेसिकली यू नो क्राइंग या फिर वो किसी भी रिफ़्लेक्स को यूज़ करते हैं टू शो व्हाटएवर दे वांट। तो ये हो जाते हैं उनका बायोलॉजिकल सेल्फ़। हम लोग एवरी वन ऑफ़ अस इज़ बोर्न विद एन बायोलॉजिकल सेल्फ़। हो वुड विद टाइम जब वो बड़े होते जाते हैं तो उनका इंटरेक्शन बढ़ता जाता है अपने एनवायरनमेंट के साथ, उनके एक्सपीरियंस ज़्यादा होते जाते हैं, वो लर्न करते हैं लैंग्वेज और ये अदर कम्युनिकेशन मीन्स को, तब उनका एक पर्सनल सेल्फ़ भी जो होता है वो इमर्ज करने लग जाता है।
अब पर्सनल सेल्फ़ जो होता है वो क्या किस चीज पे फ़ोकस करता है? अगेन यहां पे पर्सनल आइडेंटिटी, सोशल आइडेंटिटी के द्वारा ही ये भी पर्सनल सेल्फ़ फ़ोकस करता है पर्सनल फ़्रीडम पे, पर्सनल रिस्पांसिबिलिटी पे, पर्सनल अचीवमेंट पे और पर्सनल कमिफ़ोर्ट्स पे। एवरीथिंग टू डू विद इंडिविजुअल इज़ व्हाट दी पर्सनल सेल्फ़ इज़ अबाउट। की मेरी फ़्रीडम, मेरी रिस्पांसिबिलिटी, मेरे अचीवमेंट्स, मैं कैसे परफ़ॉर्म कर रहा हूं लाइफ़ में, दैट इज़ योर पर्सनल सेल्फ़। सोशल इज़ इन रिलेशन टू अदर पीपल। माय सेल्फ़ इज़ इमर्जिंग विद रिलेशनशिप, मतलब की मैं खुद भी एक्ज़िस्ट कर रही हूं, उसके साथ-साथ में बाकी लोगों के साथ भी एक्ज़िस्ट करती हूं। जब मैं बाकी लोगों के साथ एक्ज़िस्ट करती हूं तो मुझे कोऑपरेशन पे फ़ोकस करना होता है, मुझे यूनिटी पे फ़ोकस करना होता है जिससे हमारा जो ग्रुप है साथ में रहे और फिर ये अल्ट्रूइज़्म पे फ़ोकस करना होता है, शेयरिंग पे फ़ोकस करना होता है, सपोर्ट देना होता है। तो ये सारे जो कॉन्सेप्ट्स होते हैं ये ग्रुप को साथ में रखते हैं। तो पर्सनल सेल्फ़ आपका अपने आप से ओरिएंटेड होता है, सोशल सेल्फ़ आपका सिर्फ़ कैसे बाकी लोगों के रिलेशन में इमर्ज करता है, दैट इज़ व्हाई इट्स आल्सो नॉन आज फैमिलियर और रिलेशनशिप सेट।
अब कॉग्निटिव एस्पेक्ट्स ऑफ़ सेल्फ़ की अगर हम लोग बात करें तो देयर इज़ दिस होल कॉन्सेप्ट ऑफ़ सेल्फ़ कॉन्सेप्ट। सेल्फ़ कॉन्सेप्ट नाम से ही हम लोग समझ रहे हैं की अपने बारे में आपका क्या कॉन्सेप्ट है, आइडियाज़ दैट वे हैव अबाउट आर ओन अट्रीब्यूट्स इज़ व्हाट सेल्फ़ कॉन्सेप्ट इज़ अबाउट। अब सेल्फ़ कॉन्सेप्ट जो होता है वो बहुत सारे लेवल्स पे हम लोग देख सकते हैं। अगर मैं एक जनरल लेवल में आपसे पूछूं की अच्छा आपका सेल्फ़ कॉन्सेप्ट क्या है, तो लोग या तो बोलेंगे अच्छा मेरा सेल्फ़ कॉन्सेप्ट काफ़ी पॉज़िटिव है या फिर मेरा सेल्फ़ कॉन्सेप्ट बहुत नेगेटिव है। उसके बाद अगर आप डीप डाइव करोगे की अच्छा ठीक है आपका सेल्फ़ कॉन्फिडेंस, एंड जो सेल्फ़ कॉन्सेप्ट है ये पॉज़िटिव है, तो इसमें कौन-कौन सी चीज जो आपको अच्छी लगती है, कौन-कौन सी चीज जो नहीं पसंद है? तो शायद से लोग बोलेंगे मैं अच्छी हूं बट मेरे स्टडीज़ में उतना इंक्लिनेशन नहीं है। फिर आप फ़र्दर डाइव करोगे, अच्छा आप अकादमिक में अच्छे हो पर आप अकादमिक में ऐसी कौन सी चीज है जहां पे आपका जहां पे आप कमज़ोर हो? जो शायद से मेरा लैंग्वेज वाले थे उसमें ज़्यादा स्किल है बट मेरा मैथमेटिक्स थोड़ा कम है। तो बेसिकली हम देख सकते हैं की एक जनरल लेवल से भी हमारा हाइरार्की जो है वो नीचे जा सकता है। आप जितना ज़्यादा नीचे जा सकते हो, जितना दिग्गिन कर सकते हो उतने लेवल पे आपको सेल्फ़ कॉन्सेप्ट्स देखने को मिलेंगे।
अब सेल्फ़ कॉन्सेप्ट अगर आपको किसी भी इंसान का जानना है तो सबसे फ़्रीक्वेंटली यूज़्ड वे जो होता है उसे इंसान को उसके बारे में पूछो, ठीक है? ऑब्वियसली आप बाहर से आपको नहीं पता होगा की किसी का सेल्फ़ कॉन्सेप्ट कैसा है। थोड़ा-बहुत आप आइडिया लगा सकते हो उनके बिहेवियर से, उनके यू नो फ़ेशियल एक्सप्रेशंस से, बॉडी एक्सप्रेशन से बट टू नो सेल्फ़ कॉन्सेप्ट जो होता है किसी भी इंसान का वो सिर्फ़ वो खुद इंसान आपको बता सकता है। सेल्फ़ एस्टीम, अदर शब्द जो हम लोग काफ़ी यूज़ करते हैं इन योर डे-टू-डे लाइफ़ में। सेल्फ़ एस्टीम इज़ बेसिकली हम लोग इंडिविजुअल्स हमेशा अपने आप को जज कर रहे होते हैं और वैल्यू जजमेंट बना रहे होते हैं खुद के बारे में की अच्छा मैं इस फ़ील्ड में ऐसी हूं, मैं उस फ़ील्ड में हूं और फिर हमारा एक ओवरऑल जो सेल्फ़ एस्टीम निकाल के आता है की अच्छा मेज़ॉरिटी चीजों में मैं अच्छी हूं तो मेरा सेल्फ़ एस्टीम अच्छा है, मैं ज़्यादातर चीजों में मैं बुरी हूं तो मेरा लो सेल्फ़ एस्टीम हो जाता है। तो सेल्फ़ एस्टीम बेसिकली यही जजमेंट होता है जो हम अपने बारे में बनाते हैं।
सेल्फ़ एस्टीम जब भी हम एसेस करते हैं किसी भी इंसान का तो यूज़ुअली जो होते साइकोलॉजिस्ट वो क्वेश्चंस देते हैं और देन उसके बाद वो बोलते हैं की दिस इज़ जस्ट स्टेटमेंट, ये पर्टिकुलर स्टेटमेंट इज़ ट्रू इज़ दिस पर यू और इज़ दिस पर यू हैव जल पर यू सो आर यू? में बेसिकली इन ट्रू और फ़ॉल्स वाले क्वेश्चंस से हम लोग किसी भी इंसान का सेल्फ़ एस्टीम जो है वो जज कर सकते हैं। अब यूज़ुअली देखा जाता है की जो छह से सात साल के जो बच्चे होते हैं उनका सेल्फ़ एस्टीम कर डोमेन्स में होता है। सबसे पहले डोमेन होता है अकादमिक, मतलब पढ़ाई लिखाई में वो कैसे हैं, उसमें उनका कैसा है। एक होता है सोशल, उनके ग्रुप में उनका कैसा है, ठीक है? उनका सोशल सर्किल कैसा है, दैट इज़ दी अदर थिंग अबाउट योर सोशल कॉम्पिटेंसी। फिर आ जाता है फ़िजिकल एथलीट, ठीक है? वो लोग फ़िजिकल एक्सरसाइज़ वगैरा, आपको पता है बच्चों कितना ज़्यादा वो इंवॉल्व्ड होते हैं उसमें और देन उसके बाद फ़िजिकल अपीयरेंस देखते हैं। सो ये जो कर डोमेंस होते हैं इसमें छह सात इयर्स के आगे पे इन एरियाज में आपका सेल्फ़ एस्टीम डेवलप होना शुरू हो जाता है और हमारा जो कैपेसिटी है की इतने सारे एरियाज हैं, ठीक है? ये कर एरियाज हैं। अब इनको हम लोग मिला के एक ओवरऑल सेल्फ़ एस्टीम जब हम बनाते हैं तो उसको हम कहते हैं ओवरऑल सेल्फ़ एस्टीम। मतलब ये जो डिस्पोजिशन है इंडिविजुअल का, अगर देखा जाए तो ये कर इंडिविजुअल चीजें हैं, अकादमिक, फ़िजिकल अपीयरेंस, फ़िजिकल एक्सरसाइज़, है ना और सोशल सर्किल। ये कर चीजों को हम लोग साथ में जब कंबाइन करने की जो एबिलिटी है ह्यूमन बीइंग्स की, दैट इज़ मतलब आपको ये आपको शायद समझ में नहीं आ रहा है बट देयर इज़ एबिलिटी बहुत सारे ऑर्गेनाइज़ेशन में ऑब्वियसली नहीं है, तो जस्ट हैविंग दैट अब सेंस ऑफ़ हमारा सेल्फ़ एस्टीम कैसा है।
अब जो आपका सेल्फ़ एस्टीम होता है आईटी हैज़ एन यूज़ुअल इम्पैक्ट ऑन आपकी लाइफ़ कैसे आगे बढ़नी है। तो जो देखा गया है की यूज़ुअली जो लोग होते हैं जिनका हाई अकादमिक सेल्फ़ एस्टीम होता है वो परफ़ॉर्म बेटर करते हैं पढ़ाई में। वैसे ही जिनका हाई सोशल सेल्फ़ एस्टीम होता है उनका सोशल सर्किल ज़्यादा अच्छा होता है, उनके दोस्त ज़्यादा होते हैं। तो आपका सेल्फ़ एस्टीम जैसा होगा आपका परफ़ॉर्मेंस और बिहेवियर में भी वो दिखने को मिलता है यहीं पे। इसी के साथ जो लोग होते हैं जिनका लो सेल्फ़ एस्टीम होता है उन चिल्ड्रन में एंजायटी, डिप्रेशन, एंटी सोशल बिहेवियर ज़्यादा देखने को मिलता है एज़ कंपेयर्ड टू पीपल विद हाइज़र सेल्फ़ एस्टीम। इसी के साथ स्टडीज़ ने ये भी दिखाए हैं की पेरेंटिंग का जो रोल होता है वो सेल्फ़ एस्टीम के इमर्जेंसी में काफ़ी ज़्यादा इम्पॉर्टेंट होता है। तो जो अगर पेरेंट्स होते हैं जो वार्म और पॉज़िटिव पेरेंटिंग देंगे उनके जो बच्चे होते हैं वो यूज़ुअली ज़्यादा सेल्फ़ एस्टीमिंग होते हैं। इसी के साथ अगर पेरेंट्स बहुत ही ज़्यादा प्रोटेक्टिव हो जाते हैं बच्चे को लेकर, ये मतलब वो हर चीज कर रहे होते हैं और बच्चे को खुद नहीं करने देते हैं तो यहां पे वो बैकफ़ायर कर सकता है और सेल्फ़ एस्टीम है वो और फ़र्दर डिक्रीज़ हो सकता है उस बच्चे का। तो तभी मतलब चिल्ड्रन को यूज़ुअली खुद के डिसीज़ंस यू नो थोड़े बहुत खुद लेना सीखना शुरू कर देना चाहिए फ़्रॉम एन वेरी यंग ऐज।
नेक्स्ट कॉन्सेप्ट जिसको हम डील करने वाले हैं इज़ सेल्फ़ एफ़िकेसी। सेल्फ़ एफ़िकेसी, मैं कितनी स्पेशल हूं इस फ़ील्ड में, इज़ बेसिकली व्हाट सेल्फ़ एफ़िकेसी इज़ अबाउट, ठीक है? जो लोग होते हैं आप कभी भी उनसे पूछोगे अच्छा आपके एग्ज़ाम में इतने अच्छे मार्क्स आए कैसे आए? आपके एग्ज़ाम में थोड़े लोग बोलेंगे की बिकॉज़ आई वर्कड हार्ड, बिकॉज़ आई एम स्मार्ट, और यू नो मेरे को अच्छे से समझ में आ गया। बहुत सारे लोग आपको ये भी देखने को मिलेंगे जो बोलेंगे की अरे यार पेपर बहुत आसान था, ठीक है? या फिर वो एक्सटर्नल फैक्टर्स में अट्रीब्यूट कर देंगे। अब ये जो लोग होते हैं जो एक्सटर्नल फैक्टर में अट्रीब्यूट करते हैं इनका सेल्फ़ एफ़िकेसी कम है। क्यों? क्योंकि जो लोग अपने आप पे कह रहे हैं की ठीक है मैंने हार्ड वर्क किया, मैंने बहुत ज़्यादा स्मार्ट हो तभी मेरे मार्क्स अच्छे आए हैं, ये लोग अपने ऊपर फ़ोकस कर रहे थे, इनके वजह से इनके जो लाइफ़ के आउटकम्स हैं वो निकाल के आ रहे हैं। तो इनका सेल्फ़ एफ़िकेसी ज़्यादा है। तो जब भी कोई इंसान होता है जो कहता है की उनके वजह से उनके लाइफ़ के आउटकम्स डिटरमाइंड हुए हैं उनका बेसिकली सेल्फ़ एफ़िकेसी ज़्यादा होता है एज़ कंपेयर्ड टू बाकी लोग जो एक्सटर्नल फैक्टर्स जैसे की लक हो गया या फिर टास्क डिफ़िकल्टी हो गया उन पे अट्रीब्यूट करते हैं। ये जो पर्टिकुलर थ्योरी है ये हम लोग बंडूरा के सोशल लर्निंग थ्योरी में देखने को मिला है जब यू नो चिल्ड्रन आर इमिटेटिंग दी अदर पीपल जो उन लोगों ने अपने वीडियो में देखा होगा लास्ट ईयर। इसी के साथ-साथ पीपल का जो एक्सपेक्टेशन होता है ऑफ़ मास्ट्री और अचीवमेंट ये भी डिटरमाइन करते हैं उनका बिहेवियर को। पर एग्ज़ांपल अगर किसी भी इंसान को डिसाइड करना है की उनको आगे कौन सी स्ट्रीम लेनी है, पर एग्ज़ांपल ठीक है? तो अगर कोई इंसान है जिसको लगता है की इन साइंस दे डू नॉट हैव दी पर्टिकुलर एबिलिटीज़, उनको लगता है की वो मास्टर नहीं कर पाएंगे स्किल्स वहां पे और वो अचीव नहीं कर पाएंगे, तो चांसेस हैं की इन दोनों चीजों का लो होने के वजह से वो साइंस स्ट्रीम नहीं लेंगे, ठीक है? सिमिलरली बाकी फ़ील्ड्स के साथ भी ऐसा होता है की अगर उनको लगता है की ह्यूमैनिटीज़ की बात आ गई तो उनसे नहीं मतलब यू नो वो इतना ज़्यादा थियोरेटिकल नॉलेज नहीं ग्रास कर पाएंगे, इस के साथ-साथ वो यू नो पर्टिकुलर उसमें अचीवमेंट नहीं मिला पाएंगे, इन सब चीजों की वजह से शायद वो ह्यूमैनिटीज़ नहीं लेंगे। तो आपका जो बिहेवियर है ये दोनों चीज भी काफ़ी ज़्यादा हद तक डिटरमाइन करती है।
अब जो लोग होते हैं जिनका सेल्फ़ एफ़िकेसी ज़्यादा होता है वो अपने एनवायरनमेंट को सिलेक्ट करते हैं, इन्फ़्लुएंस करते हैं और इवन कंस्ट्रक्ट करते हैं, ठीक है? वो बस बैठ के नहीं जाते की आपके लाइफ़ में जो हो रहा है वो डिटरमाइन करता है आप कभी नहीं, वो खुद अपने बिहेवियर को डिटरमाइन करते हैं, वो खुद अपने एनवायरनमेंट में बेसिक चेंजेज़ ले आते हैं जिससे वो आगे बढ़ सके, अपने गोल्स को अचीव कर सके। और पीपल विद यू नो एन स्ट्रांग सेल्फ़ एफ़िकेसी आर आल्सो लेस फ़ियरफ़ुल इन लाइफ़। अब सेल्फ़ एफ़िकेसी ऐसी चीज है जो आप डेवलप कर सकते हो विद टाइम, ठीक है? ये ऐसी चीज नहीं है की सिर्फ़ बायोलॉजिकल नेचर में हो। आपको अगर टाइम मिलता है यू कैन बिल्ड अप ऑन आईटी। और ये भी देखने को मिला है की जो लोग होते हैं यू नो जो बहुत ज़्यादा स्मोक करते हैं और इफ़ दे वांट टू क्विट स्मोकिंग, दोज़ पीपल जिनका सेल्फ़ एफ़िकेसी ज़्यादा होता है दे आर मोर लाइकली टू क्विट स्मोकिंग बिफ़ोर दी पीपल जिसका कम होता है।
नेक्स्ट कॉन्सेप्ट हमारा आ जाता है इज़ सेल्फ़ रेगुलेशन। सेल्फ़ रेगुलेशन, अपना जो बिहेवियर हो रहा है उसको ऑर्गेनाइज़्ड करना, ठीक है और उसको मॉनिटर करना, उसको हम लोग कहते हैं सेल्फ़ रेगुलेशन। तो आपका जो एक्सटर्नल एनवायरनमेंट में बेसिकली जो बिहेवियर अकॉर्डिंग टू दी डिमांड्स ऑफ़ दी एक्सटर्नल एनवायरनमेंट और हाई ऑन सेल्फ़ मॉनिटरिंग। इसका क्या मतलब हो गया? की आपने देखा होगा की बहुत सारे लोग होते हैं जो सेफ पर एग्ज़ांपल एक सोशल सेटिंग में हैं और वो एंटी सोशल बिहेवियर में पार्टिसिपेट कर रहे हैं, मतलब वो ऐसी चीज कर रहे हैं जो उनको स्पेसिफ़िकली बोला गया है की उनको नहीं करना। तो वो जो लोग हैं उनका सेल्फ़ रेगुलेशन जो है वो कम है एज़ कंपेयर्ड टू पीपल जो फ़ॉलो कर रहे हैं उन नॉर्म्स को, उनका सेल्फ़ रेगुलेशन जो है वो हायर है। तो यहां पे हम ये पूरा कॉन्सेप्ट, आपने सुना होगा की विल पावर की बात आ जाती है, तो विल पावर डेफ़िनेटली कंट्रीब्यूट करता है चाहे पढ़ाई को लेकर हो, वो हेल्थ पे फ़ोकस करना हो, विल पावर डेफ़िनेटली कंट्रीब्यूशन करता है।
नेक्स्ट थिंग जो है दैट इज़ सेल्फ़ कंट्रोल। सेल्फ़ कंट्रोल क्या होता है? डिलेइंग दी ग्रेटिफ़िकेशन ऑफ़ नीड्स। तो बेसिकली अगर आपको कभी लगता है की अच्छा मेरे को बहुत ज़्यादा भूख लग रही है, आई वांट टू हैव जंक फ़ूड, ठीक है? तो अगर आप इमीडिएटली उस चीज को कर रहे हो तो आपका जो सेल्फ़ कंट्रोल है वो काफ़ी मतलब कम है, ठीक है? सिमिलरली अच्छा हमें को पढ़ाई करनी है अभी मेरे को टीवी देखने का मन हो रहा है, समथिंग लाइक दैट। तो यहां पे आपको जो बाहर की चीज है, जो आपका जो नीड है बेसिकली आप उस नीड को फ़ुलफ़िल करने के लिए फ़टाफ़ट जवाब कर देते हो अपने पर्टिकुलर टास्क को तो आपका सेल्फ़ कंट्रोल जो है वो लो है। यही अगर मैं बोलूं की ऐसा अभी मैं नहीं टीवी देखूंगी, पहले मैं अपना ये सिलेबस कंप्लीट करती हूं फिर उसके बाद में जाकर टीवी देखूंगी, तो आप डिले कर रहे हो इसको, है ना? ग्रेटिफ़िकेशन ऑफ़ नीड, मतलब उस नीड को फ़ुलफ़िल करना बेसिकली, तो आप इस नीड को फ़ुलफ़िल करने को डिले कर रहे हो तब जाकर आपका सेल्फ़ कंट्रोल जो है वो इंक्रीज़ हो रहा है। इंडियन कॉन्टेक्स्ट में सेल्फ़ रेगुलेशन बहुत ज़्यादा देखने को मिलता है बिकॉज़ यू नो व्हेन पीपल आर फ़ास्टिंग, तो वो आपका एक एग्ज़ांपल हो जाता है सेल्फ़ कंट्रोल का।
अब सेल्फ़ कंट्रोल बढ़ाए कैसे? तीन बेसिक वेज़ यहां पे जो प्रोवाइड किए गए हैं। एक होता है ऑब्ज़र्वेशन, पर ओनली ऑन बिहेवियर को पहले ऑब्
बीच का जो डायनेमिक है वो बहुत डिफरेंट है। यहां पे एकदम ये ज्यादा क्लियर बाउंड्रीज बना रखी है कि इंडिविजुअल अलग है, ग्रुप अलग है। ठीक है, वो आसपास आ सकते हैं, आइए मां टाइम डिटरमाइंस, बट यहां पे डायबिटीज में जो है वो ज्यादा देखने को मिलती है। डिएक्टिविटी, मतलब कि दो डिस्टिंक्ट कैटिगरीज ज्यादा देखने को मिलता है। बट इंडियन कॉन्टेक्स्ट में जो ग्रुप होता है, इसका पार्ट इंडिविजुअल है और ये जो है आप देख सकते हो, ये एरोस ये कह रहा है कि ये न्यू ओवरऑल चेंज होता जाता है। अजान व्हेन सिचुएशन होता है, अजान में नीड अकर्स, वो इंडिविजुअल कभी-कभी ज्यादा इम्पोर्टेंस में आ जाता है, कभी-कभी कम इम्पोर्टेंस में आ जाता है। तो इनके बीच में जो बाउंड्रीज है, इंडिविजुअल और ग्रुप के बीच में, वो यहां पे स्ट्रिक्ट बाउंड्रीज नहीं है, वो फ्लूइड बाउंड्रीज है। जब भी, मतलब आपको बाउंड्री मतलब पर एग्जांपल कोई नीड आ जाता है, जहां पे हम लोगों को सोशल होना ज्यादा जरूरी हो जाता है, तो ग्रुप का इम्पोर्टेंस बढ़ जाता है। और कभी-कभी ऐसा होता है कि पर्सनल हम लोग ऊपर ज्यादा फोकस होना चाहता है, तो इंडिविजुअल का इम्पोर्टेंस बढ़ जाता है। वेस्टर्न व्यूज जो होते हैं, वहां पे क्लियर डायरेक्शन कुछ नहीं है। वो डिस्टिंक्ट कैटिगरीज है, वो डिस्टेंस कैटिगरीज की रहती है। इंडिविजुअल जो होता है, यहां पर इंडियन वूमेन यहां पर ज्यादा फोकस होता है, पीसफुल कोएक्सिस्टेंस में, हार्मोनियसनेस पे ज्यादा फोकस होता है। अब बिकॉज़ वेस्टर्न कल्चर में आप देख सकते हैं कि हमने इतने ज्यादा ब्रॉडली कैटिगराइज्ड कर दिया है, तो इनको हम लोग कहते हैं इंडिविजुअलिस्टिक। इंडिविजुअल अलग, ग्रुप अलग। इसी वजह से वेस्टर्न कल्चर जो होता है, डेट इज़ मोर इंडिविजुअलिस्टिक इन नेचर, और जो एशियन कल्चर होता है, डेट इज़ मोर कलेक्टिविस्टिक इन नेचर। हम लोग यहां पे ज्यादा ग्रुप पे फोकस होता है। तो एशियन कल्चर, इंडियन कल्चर मोर कलेक्टिविस्टिक, वेस्टर्न कल्चर इज़ मोर इंडिविजुअलिस्टिक। तो यहां पे तीन-चार पॉइंट्स हमारे आ जाते हैं, वो आप अपने पेपर में लिख देना। सबसे पहले तो ये जो बाउंड्री होती है वो कैसे ड्रा करी जाती है, रिलेटिवली फिक्स होती है वेस्टर्न में, इंडिया में ऐसी कोई बाउंड्री नहीं होती है। वेस्टर्न उसमें क्लियर है, इंडिया में वो फ्यूज़ और वो होता जाता है। जब भी जरूरत होती है तो ज्यादा ग्रुप को इम्पोर्टेंट हो जाता है, अदरवाइज़ इंडिविजुअल का इम्पोर्टेंस हो जाता है। इसके साथ आपका नेक्स्ट पॉइंट यही है कि मतलब यू नो, हार्मोनियस कोएक्सिस्टेंस से ज्यादा फोकस किया जाता है, वहां पे इंडिविजुअल पर ज्यादा फोकस किया जाता है और तभी वो इंडिविजुअलिस्टिक बुलाए जाते हैं और हम लोग कलेक्टिविस्टिक।
अब हम लोग शुरू करते हैं पर्सनालिटी के बारे में। पर्सनालिटी ये जो शब्द है, ये आपका बेसिकली एक लैटिन शब्द से डेरिव हुआ है, जो है पर्सोना। तो बेसिकली पर्सोना इज़ द वो होता था एक मास्क जो रोमन एम्पायर में, जो बहुत पहले जो रोमन थिएटर में लोग पहना करते थे और देन वो एक्ट कर देते थे। तो जो थिएटर के एक्टर्स जो होते थे, जो मास्क पहना करते थे, डेट इज़ सोना यूज़्ड टू बी। तो वहां से ये शब्द आया है क्योंकि एक बार उन्होंने वो मास्क लगा दिया, अब वो किसी और में एक्ट करेंगे। वो जो मास्क है वो उनके करैक्टेरिस्टिक्स को डिफाइन करता है, वो उसे वे में एक्ट करेंगे। तभी वहां से जो शब्द है ये बस करता है। पर्सनालिटी की बात करते हैं तो हम लोग साइकोलॉजिकल चीजों को नहीं लेते हैं, हम लोग उनकी फिजिकल अपीरियंस की भी बात करते हैं। तो आपने नोटिस क्या होगा कि बहुत बार जो लोग होते हैं, जो ताल होते हैं और बहुत ज्यादा सुंदर दिखते हैं, तो हम लोग कभी-कभी उनकी ये सब को अट्रिब्यूट कर देते हैं उनकी पर्सनालिटी से भी। ठीक है, तो जैसे कि अगर कोई इंसान है वो बहुत ज्यादा ताल है, उसकी पर्सनालिटी कितनी अच्छी है। क्योंकि पर्सनालिटी इज़ मोस्टली साइकोलॉजिकल कॉन्सेप्ट, और देश नोट हैव जो मतलब सिर्फ फिजिकल जो होता है। ओब्वियसली फिजिकल कहानी ना कहानी आ जाता है, बट फिजिकल क्वालिटी उतना नहीं होती जितना साइकोलॉजिकल क्वालिटी सिर्फ फोकस होता है। अब पर्सनालिटी की डेफिनेशन क्या है? इट रेफर्स टू आर करैक्टेरिस्टिक बेस ऑफ रेस्पॉन्डिंग टू इंडिविजुअल्स और सिचुएशंस। इसका क्या मतलब हो गया कि ऐसे हम आ जो लोग होते हैं वो यूज़ुअली क्या होता है, वो इंडिविजुअल और सिचुएशन में एक ही तरीके से बिहेव करता है। ऐसा नहीं होगा कि बहुत ज्यादा ड्रास्टिक भी डिफरेंस आ जाता है। अगर कोई इंसान है जो शॉर्ट टेंपर्ड है, मतलब उसको बहुत ज्यादा फटाफट गुस्सा आता है, तो वो इंसान यूज़ुअली हमेशा ही गुस्से में बिहेव करेगा। ओब्वियसली सिचुएशन फैक्टर्स होते हैं, कभी-कभी उनका गुस्सा कम होगा, बट फॉर द मोस्ट पार्ट ऑफ इट वो हमेशा ही उसे वे में एक्ट करेंगे। ऐसा नहीं होगा कि अचानक से कभी कुछ हो गया और डेनी करें, नहीं कुछ नहीं, सब कुछ और दे हैप्पी गो लकी वाला एटीट्यूड आ जाएगा, नहीं। वो हमेशा उनका जो बिहेवियर है वो इंडिविजुअल्स और सिचुएशंस में एक करैक्टेरिस्टिक वे में ही होगा, एक पर्टिकुलर वे में ही आपको देखने मिलेगा। तो इन दिस सेंस, पर्सनालिटी रेफर्स टू यूनिक और रिलेटिवली स्टेबल क्वालिटीज डेट करैक्टराइजेस और इंडिविजुअल्स बिहेवियर अक्रॉस डिफरेंट सिचुएशंस ओवर अ पीरियड ऑफ टाइम। जो मैंने बोला बेसिकली यहां पे उन्होंने लिख दिया, थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड सी इंग्लिश में। उसके बाद यहां पे पर्सनालिटी जो है वो कैरेक्टराइज़ करती है इंडिविजुअल्स को आगे दे एप्लाइंग मोस्ट सरकमस्टेंसेस, जैसे वो बिहेव करते हैं, मोस्टली वैसे ही उनका पर्सनालिटी इनफर करके आ जाता है। और कंसिस्टेंसी जो होता है बिहेवियर, थॉट और इमोशन ऑफ एन इंडिविजुअल अक्रॉस सिचुएशंस और अक्रॉस टाइम पीरियड, करैक्टेरिस्टिकल कंसिस्टेंसी जो होती है वो काफी ज्यादा हम जरूरी होती है। हम लोग अगर बस एक बार किसी इंसान को ऐसे परफॉर्म करते हुए देखा, कि एक बार हमने देख लिया कि वो एग्रेसिव है, तो जरूरी नहीं है कि वो उनका पर्सनालिटी है। वो हमको उनकी बिहेवियर को ऑब्ज़र्व करना होगा ओवर अ पीरियड ऑफ टाइम और देन वी कैन यू नो, कम टू कंक्लूज़न्स रिगार्डिंग देयर पर्सनालिटी। तो पर्सनालिटी जो होती है उसकी बेसिक फीचर्स होते हैं, एक तो फिजिकल और साइकोलॉजिकल दोनों कॉम्पोनेंट्स होते हैं। जरूरी नहीं है कि सिर्फ फिजिकल कंपोनेंट है, लॉजिकल हो। सेकंड, उसका जो एक्सप्रेशन होता है बिहेवियर में, यूनिटी और गिवन इंडिविजुअल, ठीक है, मतलब सब कुछ एक ही तरीके से गुस्सा नहीं आता, शायद से सबको गुस्सा से लेवल का आता है, बट उनका जो बिहेवियर है, उसे तरीके से वो गुस्से को दिखाई देते हैं, वो जरूरी नहीं होते। थोड़े लोग होते हैं जो एकदम शांत हो जाते हैं और एकदम कोने में जाके अपने आपको बैठा बैठ जाते हैं। थोड़े लोग होते हैं वो बहुत ज्यादा एग्रेसिव हो जाते हैं, वो बहुत ज्यादा लाउड होना शुरू हो जाते हैं। तो ये जो एक्सप्रेशन है, जैसे वो बिहेवियर में आ रहा है, वो फेयरली यूनिक होता है, सब लोग होता है। इसकी जो मेन फीचर्स होते हैं वो चेंज नहीं होते हैं फटाफट ऐसे टाइम में और इसके साथ-साथ ये डायनेमिक भी होता है नेचर, और डेट साइड, सम ऑफ इट्स फीचर्स में चेंज। अब देखो, ये दो कांट्रडिक्टरी सेंटेंस आपको दे रहा होगा, पर आपको यहां पे बस ये फोकस करना है कि ओवर अ पीरियड ऑफ टाइम, फॉर द मोस्ट पार्ट ऑफ इट वो नहीं चेंज होगा। बट अगर कभी सिचुएशन में डिमांड करती है कि हम लोगों को एक पर्टिकुलर वे में भी हेल्प करना है, तो वो चेंज हो सकता है। इसलिए आपका बिहेवियर कैसा आता है, तो रिलेटिवली स्टेबल। तभी हम ये शब्द यूज़ करते हैं, एब्सोल्यूटली स्टेबल नहीं है, रिलेटिवली स्टेबल है। पर्सोना और इसी के साथ अगर हम किसी इंसान की पर्सनालिटी को जानते हैं, हम देख सकते हैं, वो प्रेडिक्ट कर सकते हैं कि वो बिहेव कैसे करेंगे। वही एग्जांपल हो गया, इफ समबडी इज़ यू नो, सेड टू हैव एन वेरी एग्रेसिव पर्सनालिटी, वी कैन प्रेडिक्ट कि वो एग्रेशन में भी हेल्प करेंगे सिचुएशन में जहां पे वो प्लेस ट्रेड हो जाएंगे। अगर यही कोई इंसान होता है जो बहुत किंड हार्टेड होता, में भी उसे फ्रस्ट्रेटेड सिचुएशन में वो उतने एग्रेसिवली नहीं बिहेव करेंगे। तो हम लोग प्रेडिक्ट भी कर सकते हैं किसी भी इंसान के बिहेवियर को बेस्ड ऑन देयर पर्सनालिटी। अब यहां पे पर्सनालिटी से रिलेटेड थोड़े से टर्म्स दिए गए हैं, उनको समझना की कोशिश करते हैं। टेंपरामेंट क्या होता है? डेट इज़ योर बायोलॉजिकल बेस्ड करैक्टेरिस्टिक वे ऑफ रिएक्टिंग। ये बायोलॉजिकली बेस्ड होता है, ठीक है, ये सोशली कंस्ट्रक्टेड नहीं होता है। टेंपरामेंट जो होता है वो ऐसा बिलीव करते हैं कि हर बच्चा एक पर्टिकुलर टेंपरामेंट के साथ बॉर्न होता है। ठीक है, आप देखेंगे थोड़े लोग होते हैं वो यूज़ुअली, बस इन जनरल वो बहुत ज्यादा गुस्से में आ जाते हैं। ठीक है, जरूरी नहीं है कि मतलब उनका एनवायरनमेंट से वो आया हो, वो गलत पेरेंटिंग सेल्स आया हो, नहीं। वो बायोलॉजिकल टेंडेंसी होती हैं हमारे, क्या हमारा थ्रेसहोल्ड क्या है गुस्सा होने का, हमारा थ्रेसहोल्ड क्या है किंड हार्टेड होने का। तो ये जो चीज होती है, जो बायोलॉजिकली आई है, वो आपका टेंपरामेंट डिफाइन करती है। ट्रेट्स क्या होते हैं? ट्रेट्स होते हैं स्टेबल, परसिस्टेंट और स्पेसिफिक वे ऑफ, स्पेसिफिक और परसिस्टेंट बेस जिससे हम बिहेव करते हैं वो आपके ट्रेट्स बनाते हैं। ये बिल्डिंग ब्लॉक्स होते हैं हमारे पर्सनालिटी के। ट्रेट्स को हमने और अच्छे से पढ़ेंगे आगे जब हम लोग ट्रेड अप्रोच डिस्कस करेंगे। डिस्पोजिशन जो होता है, इसे प्रोनेंसिटी को परसों टू रिएक्ट इन एन गिवन वे इन अ पर्टिकुलर आ सिचुएशन। तो बेसिकली डिस्पोजिशन, मतलब की डिस्पोजिशन इज़ मोर डिस्पोज्ड टू एक्ट एग्रेसिवली, मतलब कि एक पर्टिकुलर सिचुएशन है, उसमें क्या चांसेस है उसे परसों के एक्ट करने का एग्रेशन में या किंडली या फिर कैसे भी, वो आपका डिस्पोजिशन डिफाइन करती है। करैक्टर ऑफ एन पर्सन होता है ओवरऑल वो जैसे बिहेव करते हैं, वो उनका करैक्टर डिफाइन करता है। ठीक है, हैबिट होता है, रिपीटेड मोड्स ऑफ बिहेविंग, बिहेवियर जो हमें ओवर लर्न कर लेते हैं और वो हमारे हैबिट में आता जाता है, वो हैबिट हो जाता है। ठीक है, और वैल्यूज़ क्या होते हैं? गोल्स और आइडियल्स होते हैं जो हम लोग इम्पोर्टेंट कंसीडर करते हैं। क्योंकि आई वैल्यू की हम लोग यू नो, एक दूसरे के साथ है, सोशल हार्मनी इन एन वैल्यू करते हैं, तो दीज़ आर आइडियल्स टू, बहुत इम्पोर्टेंट होता है हमारे लिए और हम कहते हैं कि हां ये वर्थ विले टू अच्छी है, मतलब कि वी शुड फोकस ऑन अच्छी दिखे रहा है। सो ये जो टर्म्स हैं, आप इनको याद कर सकते हैं, ये सीधे में आ सकता है आपके लिए। अब जब पर्सनालिटी ये बात होती है, इसको स्टडी करने के बहुत सारे अप्रोचेज़ होते हैं। सबसे पहले अप्रोच हो हमारे पास यहां पे इज़ द टाइप ऑफ अप्रोच। बेसिकली क्या करता है? ह्यूमन पर्सनालिटी बाय एग्ज़ामिनेशन ऑफ ब्रॉड पैटर्न्स इन द ऑब्ज़र्व्ड बिहेवियर करैक्टेरिस्टिक्स ऑफ इंडिविजुअल्स। अब मैं आसान शब्दों में बताऊं तो टाइप अप्रोच जो होता है वो बहुत ब्रॉड होता है। ठीक है, वो लोगों को टाइप्स में डिवाइड करते हैं, कि आप इस टाइप के इंसान हो, आप उस टाइप के इंसान हो। बहुत ब्रॉड कैटेगराइज़ेशंस होती हैं। ठीक है, ट्रेट अप्रोच ऑन द अदर हैंड स्पेसिफिक होता है। तो अगर टाइप अप्रोच एकदम बहुत बड़े यू नो, कैटेगरी में फोकस कर रहा है, ट्रेट अप्रोच उसमें छोटे-छोटे कैटेगरीज़ पे फोकस करेगा। डेट इज़ द बेसिक नीड। ठीक है, ट्रेट इज़ स्पेसिफिक, टाइप इज़ ब्रॉड अंडरस्टैंडिंग ऑफ़ पर्सनालिटी। इसके साथ-साथ इंटरेक्शनल अप्रोच जो होता है, इंटरेक्शनल अप्रोच बेसिकली कहता है कि जो आपका सिचुएशन करैक्टेरिस्टिक्स होते हैं, जो सिचुएशन होता है वो डिटरमाइन करता है आपका बिहेवियर। वो बहुत ज्यादा इम्पोर्टेंट रोल प्ले करता है इन डिटरमिनिंग योर। अब टाइप अप्रोच की हम लोग बातचीत करना शुरू करते हैं। अब टाइप अप्रोच में बहुत सारे, वेरियस यू नो, साइकोलॉजिस्ट, नॉट ओनली साइकोलॉजिस्ट, बहुत सारे फिलॉसफर्स थे। ठीक है, काफी टाइम से हम लोग अपने पर्सनालिटी के बारे में डिस्कस करते हैं और बहुत ही ज्यादा टाइम से ऐसे बहुत सारे फिलॉसफर्स हैं, एरिस्टॉटल, प्लेटो, जिन्होंने कंट्रीब्यूट किया है ना अंडरस्टैंडिंग ऑफ़ व्हाट आर पर्सनालिटी। इस वन ऑफ़ दीज़ वाज हिप्पोक्रेटस ने कहा कि इंसान जो होते हैं, उनका जो पर्सनालिटी होता है, उसको हम लोग डिफाइन कर सकते हैं ऑन द बेसिस ऑफ़ फोर फ्लूइड्स या फिर फोर ह्यूमर्स। अब ये जो फोर फ्लूइड्स थे, इसके बेसिस में उन्होंने मतलब डिफाइन किया, साइन में फ्लेग्स। अब यहां पे आपको ये क्या है, शब्द इसका मतलब क्या है, वो आपको एग्जाम में नहीं आएगा तो आप उसका चिंता मत कीजिएगा। बस यहां पे इतना ही याद रख लीजिएगा कि ये हिप्पोक्रेटस ने फोर वो बनाए थे ये पर्सनालिटी फोर टाइप्स की हो सकती है, क्योंकि फ्लूइड्स पे डिफाइन होती है। फ्लूइड्स से यहां पे क्या मतलब हो जाता है कि जैसे कि ब्लड हो गया, ठीक है, ब्लड हो गया, आपका बिल जूस जो होता है और देन फ्लेम होता है, तो ये सब चीजें होती है वो फ्लूइड्स होती है। तो ये किस क्वांटिटी में प्रेजेंट होती है, वो डिफाइन करता है कि इंडिविजुअल के पर्सनालिटी कैसे आएगी। तो जैसे कि अगर किसी का ब्लड मतलब ज्यादा है क्वांटिटी में आज कंपेयर टू बाकी सारे, तो वो सैंग्वाइन पर्सनालिटी में आ जाएगी, वो अच्छे वैल्यूज़ आ जाएंगे। ये सब आपको याद करने की जरूरत नहीं है। एनसीईआरटी में जितना लिखा है वो याद करेंगे। ये हिप्पोक्रेटस ने चार बेसिकली टाइप्स बताए थे और ये है सैंग्वाइन, मेलेन्कोलिक और कोलेरिक। इंडिया में अगर हम लोग देखें, इंडिया में भी बहुत ज्यादा फिलॉसफी और फिजिशियंस ने डेवलप किया है हमारी अंडरस्टैंडिंग को पर्सनालिटी। उसमें से सबसे इम्पोर्टेंट है चरक समिति, जो बेसिकली आयुर्वेद के ऊपर है और यहां पे उन्होंने डिफाइन किया है कॉन्सेप्ट ऑफ़ त्रिदोष या फिर थ्री दोष। ठीक है, और त्रिदोष में उन्होंने फर्दर डिफाइन किया है वात, पित्त और कफ। तो ये तीन ऐसे ह्यूमरल एलिमेंट्स होते हैं, जैसे कि एलिमेंट्स होते हैं जो हमारे बॉडी में प्रेजेंट होते हैं और ईच रेफर्स टू एन टाइप ऑफ़ टेंपरामेंट जो हमारा बेसिकली प्रकृति होता है, बेसिक नेचर ऑफ़ एन पर्सन। ठीक है, तो जो आपका त्रिदोष होता है, अगेन वात, पित्त, कफ, आगे क्या होता है एक्जेक्टली आप उसको गूगल कर सकते हैं, बट आपके एग्जाम में नहीं आएगा। बस इतना तीन आपको याद रखना है कि ये तीन ह्यूमरल हैं। त्रिगुण जो होते हैं ये अगेन दूसरी टाइपोलॉजी होती है, कंफ्यूज़ मत होना। त्रिदोष है, वो होते हैं, त्रिगुण आपके होते हैं सत्व, रज और तम। ये आपको यहां पे डिफाइन करना पड़ेगा बिकॉज़ यहां पे एनसीईआरटी में भी मेंशन थे। सत्व जो होता है, इट फोकस ऑन यू नो, क्लीनलीनेस, ट्रुथफुलनेस, ड्यूटी पे कम करना, अपना धर्म पे कम करना, टेम्परेमेंट रखना, डिसिप्लिन पे फोकस करना। डेट इज़ योर सत्व। रजस जो होता है, डेट इज़ स्पेशली इंटेंस एक्टिविटीज़, यू आर डिजायर, डेट डिफेकेशन, एकदम अपना बहुत ज्यादा जो लोग यू नो, एम्बिशियस होते हैं, मैटेरियलिस्टिक माइंडसेट से होते हैं, वो रजस में ज्यादा होते हैं। तमस जो होता है, डेट इज़ यू नो, डिप्रेशन, लेज़ीनेस और ओवरऑल हेल्पलेसनेस। डेट इज़ तमस। तो सात्विक आपने सुना होगा, सात्विक खाना खाना चाहिए, तो वहां से आता है। ठीक है, तो सत्व, रजस, तमस। ये बेसिकली तीन गुण होते हैं, ये सब इंसान में प्रेजेंट होता है, बट जो गुण ज्यादा डोमिनेंट होता है वो आपका बिहेवियर, पर्सनालिटी को डिफाइन करता है। बट प्रेजेंट तीनों होता है और हम लोग अपने बेस्ट पार्ट ये है कि हम लोग इसको चेंज कर सकते हैं, राइट? ये फिक्स नहीं होते हैं, ये बायोलॉजिकल टेंपरामेंट बेसिस पे नहीं होते हैं। ये ओवर अ पीरियड ऑफ टाइम हमारे बिहेवियर हैं, हम इसको चेंज भी कर सकते हैं। देन उसके बाद वेस्टर्न वर्ल्ड में शेल्डन करके एक इंसान थे जिन्होंने कहा कि किसी भी इंसान की जो पर्सनालिटी होगी, वो उनके बॉडी का स्ट्रक्चर जो है, उससे हम डिटरमाइन कर सकते हैं। और उन्होंने बनाया एंडोमॉर्फिक, मेसोमॉर्फिक और एक्टोमॉर्फिक टाइप होना चाहिए। एंडोमॉर्फिक लोग जो होते हैं वो बेसिकली यू नो, सॉफ्ट और राउंड होते हैं और दे आर बेसिकली मोर सोशल, दे आर रिलैक्स। आपने देखा होगा कि मतलब यूज़ुअली स्फीयर और टिपिकल भेज में भी जो ऐसे लोग जो होते हैं जो पेट्स ऑफ राउंड होते हैं, तो उनको ऐसे दिखाए जाता है कि वो ज्यादा सोशल होते हैं, ज्यादा रिलैक्स होते हैं। उसके बाद मेसोमॉर्फिक, मेसोमॉर्फिक मतलब कि यू नो, जो उनका बहुत ऐसे एकदम मस्कुलर बॉडी होता है और दे आर वेरी यू नो, उनका बॉडीबिल्डर काफी अच्छा होता है। वो बेसिकली एनर्जेटिक और करेजियस होते हैं। यहां पे उन्होंने कहा है ये बताता हूं और देन उसके बाद होता है आपके एक्टोमॉर्फिक। एक्टोमॉर्फिक जो होते हैं वो लॉन्ग और फ्रेजाइल होते हैं और दे आर मोर लाइकली टू बी ब्रेनी, आर्टिस्टिक और इंट्रोवर्टेड। अब ये कितना सच है, कितना गलत है वो हमें नहीं पता। उतना ज्यादा इस पे मतलब यूज़ुअली लोगों ने कहा है कि आपके जो बॉडी स्ट्रक्चर होता है उस पे ज्यादा फोकस नहीं होता है। वो काफी ज्यादा स्टीरियोटिपिकल हो जाता है कि आप किसी भी इंसान के बॉडी पे फोकस करो सिर्फ। तो ये स्टीरियोटाइप जो है हमको उस पे ऑपरेट नहीं करना है, हमको एक्चुअल साइंटिफिक जो आपके रिसोर्सेज़ होती है उस पे ज्यादा फोकस करते हैं। बट ओब्वियसली एग्जाम में आएगा तो हमको याद करना पड़ेगा। तो ये शेल्डन की तीन स्टोरीज़ है। कल हम के बारे में आपने सुना होगा, कार्ल जुंग थे। वो उन्होंने डिफाइन किया पार्ट फ्रॉम है एनालिटिकल साइकोलॉजी। यहां पे उन्होंने इंट्रोवर्ट और एक्सट्रोवर्ट वाला जो कॉन्सेप्ट है, जो बहुत ज्यादा आपने देखा होगा रियल स्पेलिंग तो वो वाला जो कॉन्सेप्ट है वो कार्ल जुंग ने दिया था। इंट्रोवर्ट्स होते हैं, वो उनको प्रेफर होता है वो अलोन रहें, टेंड टू अवॉइड द पीपल, विथड्रॉ देमसेल्फ्स और इन द फेस ऑफ़ इमोशनल कन्फ्लिक्ट, जो भी कन्फ्लिक्ट होता है तो वो अपने आप को विथड्रॉ कर देते हैं और वो यूज़ुअली ज्यादा शाइ होते हैं आज कंपेयर्ड टू देम। एक्सट्रोवर्ट जो होते हैं वो आउटगोइंग होते हैं, वुड बी ड्रोन टू ऑक्यूपेशंस डेट अलाउ देम इंटरेक्टिंग विद पीपल। इसका मतलब है कि जो जॉब्स होती है जहां पे उनको बहुत सारे लोगों के साथ कम करना होता है, यूज़ुअली एक्सट्रोवर्ट वहां पे ज्यादा थ्राइव करते हैं और दी रिएक्ट टू स्ट्रेस बाय सराउंडिंग देमसेल्फ अमंग पीपल और सोशल एक्टिविटीज़। तो यूज़ुअली जब उनको स्ट्रेस होता है तो वो चाहते हैं कि वो लोगों से साथ सराउंडेड रहें और मास उनका स्ट्रेस होता है, वो डिस्ट्रेस होता है। तो बेसिकली इंट्रोवर्ट, एक्सट्रोवर्ट। आपको पता है क्या डेफिनेशन है? यहां पे एक्सट्रोवर्ट शब्द नहीं है बाय द वे, ये शब्द उन्होंने एक्स्ट्रा शब्द लिखा है। तो ये भी देखिए रिलेटिवली एयर में टाइप ए और टाइप बी ये भी आपने काफी सुना होगा। ये वाली जो थ्योरी है वो फ्रीडमैन ने दी है। टाइप ए पर्सनालिटी जो होते हैं वो हमेशा बहुत ज्यादा हाई ऑन एनर्जी होते हैं, हाई मोटिवेशन होते हैं, पेशेंस में कम होता है। हमेशा उनको लगता है कि वो बहुत ज्यादा हरि में है, बहुत ज्यादा कम है उनके ऊपर और ये जो लोग होते हैं वो बहुत मतलब स्ट्रगल करते हैं टू स्लो डाउन और रिलैक्स। अब टाइप ए वाले जो लोग होते हैं, दे आर मोर ससेप्टेबल टू डिज़ीज़ेज़ सच एज़ यू नो, कार्डियोवैस्कुलर हार्ट डिज़ीज़ेज़। ठीक है, तो ये सारे जो हाई कोलेस्ट्रॉल लेवल होता है, ब्लड प्रेशर होता है, ये सब चीज जो होती है वो टाइप ए में आपको ज्यादा देखने को मिलेगी, बिकॉज़ वो इतना इंटेंसली एक्टिविटी में फोकस रहते हैं, इतना इंटेंसिटी उनको लगता है कि उनको सब कुछ अचीव करना है, तो ये सब चीज उनमें ज्यादा होती है। टाइप बी पर्सनालिटी इज़ बेसिकली ऑपोजिट ऑफ़ टाइप ए पर्सनालिटी। तो टाइप बी पर्सनालिटी को जब डिफाइन करना होता है तो एब्सेंस ऑफ़ टाइप ए पर्सनालिटी। ठीक है। इसके बाद मोरार्स ने फर्दर सजेस्ट किया एक होता है टाइप सी, वो लोग जो ज्यादा प्रोन होते हैं टू कैंसर। अब ये लोग जो होते हैं वो कोऑपरेटिव होते हैं और पेशेंट होते हैं, अंदर सर्टेन मतलब अपनी बटन को आगे नहीं रख सकते हैं उतना ज्यादा और जो इनकी नेगेटिव इमोशंस होते हैं वो उनको दबा देते हैं और अथॉरिटी फिगर्स पे कंप्लेंट्स ज्यादा दिखाई देते हैं। तो और इसने टाइप डी पर्सनालिटी इज़ बेसिकली वो वाली पर्सनालिटी व्हिच इज़ मोर प्रोन टू डिप्रेशन। तो यहां पे फोर टाइप्स आ जाते हैं। पहले दो टाइप्स जो है वो फ्रीडमैन और रोजन ने दिए हैं, बाकी जो आगे है वो मेरिस के टाइप्स हैं।
ट्रेड अप्रोच की बात करते हैं। यहां तक टाइप अप्रोच था, जब बहुत ही ज्यादा ब्रॉड कैटेगराइज़ेशन था। अब हम बात करेंगे ट्रेट अप्रोच, जहां पे हम लोग स्पेसिफिक ट्रेट्स पे फोकस करेंगे, स्पेसिफिक फीचर्स पे फोकस करेंगे। अब जो ट्रेट्स होते हैं ये हमारे बिल्डिंग ब्लॉक्स होती हैं हमारी पर्सनालिटी का। ठीक है, ट्रेट अप्रोच जो होता है इज़ वेरी सिंपल, इज़ वेरी सिमिलर टू आर आम एक्सपीरियंस इन आवर एवरीडे लाइफ। और ट्रेट अप्रोच जो होता है वो अटेंप्ट करता है प्राइमरी करैक्टेरिस्टिक्स जो होते हैं एक इंसान के उसको मतलब समझना का और उससे उसको समझ के उसकी पर्सनालिटी को बेसिकली समझना का। ट्रेट जो होता है वो रिलेटिवली इनडायरेक्ट, मतलब कि वो ओवर अ पीरियड ऑफ़ टाइम स्टेबल रहता है, अट्रिब्यूट होता है और क्वालिटी ऑन व्हिच इंडिविजुअल्स डिफर फ्रॉम ईच अदर। तो ये रिलेटिवली स्टेबल होता है, कंसिस्टेंट होता है अक्रॉस सिचुएशंस। ओब्वियसली सिचुएशन फैक्टर्स में डिफरेंशिएट हो जाता है। स्ट्रेंथ और कॉम्बिनेशन जितने ट्रेड्स के वो वेरी करते हैं बिकॉज़ द फर्स्ट पर्सन यू नो, जिन्होंने ट्रेट अप्रोच में कम करना शुरू किया था, तो ही इज़ कंसीडर, मतलब है कि जब पॉसिबल है। इन्होंने कहा कि जो ट्रेट्स होते हैं ये काफी डायनेमिक नेचर में होते हैं और बहुत ज्यादा डिफरेंट नंबर्स में होते हैं। जो ट्रेट्स होते हैं वो इंटीग्रेट करते हैं सिमिलर और रिस्पांस को व्हिच अदरवाइज़ लुक डिस्सिमिलर। इन्होंने इंग्लिश लैंग्वेज का काफी यूज़ किया कि हम लोग इंग्लिश लैंग्वेज में जैसे अपने आप को डिफाइन करते हैं, बाकी लोगों को डिफाइन करते हैं वो हमारे को ट्रेट्स के अंडरस्टैंडिंग में काफी ज्यादा हेल्प कर सकता है। और इन्होंने तीन बेसिक डिवाइसेंस कर दिए ट्रेट्स के। एक होते हैं कार्डिनल फैक्टर्स, एक होता है सेंट्रल फैक्टर्स, और फाइनली होता है आपका सेकंडरी ट्रेट्स। ऐसे ट्रेट्स होते हैं जो बहुत ही ज्यादा जनरलाइज़्ड होते हैं। सबसे ऊपर वाले लेवल में बेसिकली जो ट्रेट्स होते हैं काफी जनरलाइज़्ड, आपके लाइफ के परपोज को डिफाइन करता है। डेट इज़ योर कार्डिनल, जैसे कि गांधीज्म, गांधी जी के नॉन वायलेंस हो गए, तो वो गांधीज्म हो गई है या फिर हिटलर का नैज़ीज़्म हो गया, तो हिटलर की नैज़ीज़्म आईडी वाली की तो वो उनके पूरे लाइफ के जो बेसिकली गोल्स होते हैं, उनका बिहेवियर कैसे होता है, उसको जो डिफाइन करता है वो आपका कार्डिनल ट्रेट होता है। काफी जनरलाइज़्ड होता है। उसके बाद आपका आता है सेंट्रल ट्रेट। ये थोड़ा कम जनरलाइज़्ड होता है, जैसे कि वो इंसान बहुत वार्म है, काफी सिंसेयर इंसान है, यू नो, तो ये ऐसी चीज जो आप अपने जब रिकमेंडेशन में लिखोगे। ठीक है, वो आपके चीज होती है जो सेंट्रल होती है। तो वो बेसिकली कार्डिनल ट्रेट बहुत ज्यादा जनरलाइज़्ड, थोड़ा सा कम जनरलाइज़्ड। बेसिकली कि वो बहुत वार्म इंसान है, किंड इंसान है वो हो जाता है। और फाइनली सेकंडरी जो एकदम मतलब यूनिक होता है उस इंसान में, जैसे कि उनके प्रेफरेंसेस, किसको मतलब यू नो, समथिंग लाइक डेट, उनके इंटरेस्ट वगैरा जो होते हैं जो उस इंसान में बहुत ज्यादा स्पेसिफिक होता है, वो आपका सेकंडरी ट्रेट हो जाता है। अब ऑलपोर्ट ने एक नोट किया था इन्फ्लुएंस ऑफ़ सिचुएशन ऑन बिहेवियर, कि हाउ डेट एन पर्सन रिएक्ट्स टू एन गिवन सिचुएशन डिपेंड्स ऑन देयर अवेलेबल ट्रेट्स जो दो पीपल शेयर द सेम ट्रेट्स में एक्सप्रेस देम डिफरेंटली। तुमने कहा कि हां जबकि सिचुएशन का इम्पोर्टेंट जरूर होता है, पर ज्यादा फोकस ऑलपोर्ट ने ट्रेट्स के ऊपर डाला था। नेक्स्ट जो आपके आते हैं वो कैटेल है। कैटेल ने पर्सनालिटी फैक्टर्स पे डिफाइन
भी ट्रेड अप्रोचों ठीक है, जहां पे आ के तेल ने 16 फैक्टर्स बनाए थे। इन्होंने सिर्फ ₹5 फैक्टर्स के ऑपरेट किया तो उन्होंने कहा की ऐसे फाइव फैक्टर्स होते हैं, बेसिकली हमारे जो डिफाइन करता है किसी भी इंसान के एक्जिस्टेंस को। ये जो फाइव फैक्टर्स हैं, ये कौन-कौन से हैं? एक होता है ओपननेस टू एक्सपीरियंस, एक होता है एक्स्ट्रा वर्जन, एक होता है एग्रीएबलनेस, एक होता है न्यूरोटिसिजम और देन देयर इज़ फाइनली कॉन्शिएंटियसनेस। अब ये क्या होता है? सबसे पहले ओपन एक्सपीरियंस से क्या मतलब हो जाता है? कितना ओपन है इंसान एक्सपीरियंस को लेने के लिए, ठीक है? ये वो कहता है इमेजिनेटिव है, क्यूरियस है, कितना ज्यादा चाहते हैं की वो न्यू इतिहास को जानें, न्यू चीजों से मिलें, न्यू लोगों से मिलें, तो वो ओपन एक्सपीरियंस में आ जाता है। एक्स्ट्रा वर्जन, अगेन आपको पता है मैंने पहले भी डिफाइन कर लिया और एग्रीएबलनेस, कितने एग्रीएबल है? अगर आप उनको कम दो, उनसे हेल्प मांगो, यू नो, किसी भी कोर्स को सीख कर कितना चेस है उनका, हां आपको बोलने का, वो आपका एग्रीएबल में आ जाता है। न्यूरोटिसिजम आईडेंटिफाइंग, अभी कॉन्शिएंटियसनेस जो होता है, की मतलब वो अपने काम को लेकर कितना फोकस्ड है, की उनको काम करना है, उनको कितना डिसिप्लिन है, टाइम मैनेजमेंट वगैरा जो चीजें आ जाती हैं, अचीवमेंट्स ओरिएंटेड कितने हैं, हार्ड वर्किंग कितने हैं, वो कॉन्शिएंटियसनेस में आ जाता है। तो ये सारे फैक्टर्स को याद करने का एक मॉडल होता है, दैट इज़ ओशन, ठीक है? तो आप देखेंगे तो एन बेसिकली मैं यहां पे भी लिख देती हूं, आप इनको याद कर सकते हैं बाय एक्सपीरियंस, ये स्टैंड्स फॉर कॉन्शिएंटियसनेस, आ इस स्टैंड्स फॉर एक्स्ट्रा वर्जन, पर एग्रीएबल है। तो इससे आप याद कर सकते हैं की ये 5 फैक्टर्स कौन-कौन से हैं। बाल कास्ट और रॉबर्ट, तो इनको ब्रेकफास्ट फैक्टर्स भी कहा जाता है।
अब हम बात करेंगे साइकोडायनेमिक अप्रोच के बारे में। अब साइकोडायनेमिक अप्रोच जो है वो सिग्मंड फ्रायड ने डेवलप किया था, जो एक फिजिशियन थे। ही वाज़ नॉट एन साइकोलॉजिस्ट, और इन्होंने अपने क्लीनिकल प्रैक्टिस में देखा था, इन्होंने नोटिस किया जो लोग इनके पास आ रहे थे, जब भी वो कोई भी प्रॉब्लम लेकर आते थे और वो उसे प्रॉब्लम के बारे में डिस्कस करते थे, जब उसके बारे में खुल के बात करते थे, दे यूज़्ड टू फील बेटर। तो यहां से डेवलप हुआ कॉन्सेप्ट का फ्री एसोसिएशन, जो मैंने आ रहा है, बिना किसी यू नो जजमेंट के बोलते जो बोलते जो बोलते जो बोलते, जो तो वो फ्री एसोसिएशन जो होता है उससे इंसान जो होता है दे फील मोर रिलैक्स्ड। देन उसके बाद उन्होंने एक और चीज ली, ड्रीम एनालिसिस। क्या आपकी जो ड्रीम्स होती है वो डिफाइन करती है की आपका यू नो एक्चुअल में पर्सनालिटी क्या है, हो आर यू फीलिंग? और एनालिसिस ऑफ एरर्स। एरर्स मतलब की अगर आपने कभी कुछ बोलते बोलते स्लिप ऑफ़ टंग हो गया, तो उसका एनालाइज़ करने का। तो इन सब चीजों से ये जो तीन फैक्टर्स हैं, उन्होंने डिसाइड किया की अब हम लोग फंक्शनिंग ऑफ़ मन को समझेंगे। फ्रायड ने डिफाइन किया तीन लेवल ऑफ़ कॉन्शियस को। एक लेवल होता है कॉन्शियसनेस का, जो होता है आपका कॉन्शियस लेवल, ठीक है? जहां पे आपको पता है की आप क्या कर रहे हो, सारे थॉट्स, फीलिंग्स और एक्शन, जो भी आपका अवेयरनेस के बारे में, मुझे पता है की मैं अभी आपको पढ़ा रही हूं, आप अवेयर हैं की मैं आपको पढ़ा रही हूं, दैट इज़ योर कॉन्शियस एक्सपीरियंस। होते हैं जिनके बारे में आप अवेयर नहीं हो, बट आप थोड़ा सा एफर्ट डालोगे तो आप अवेयर हो जाओगे। जैसे की अगर मैं पूछूं की आपने कल खाने में क्या खाया था, तो आप थोड़ा सा सोचोगे और आपको याद आ जाएगा, अगर याद आता है, तो दैट इज़ योर प्री-कॉन्शियस एक्सपीरियंस। थोड़ा सा फोकस करोगे तो आप उसको वापस से ला सकते हो अपने कॉन्शियसनेस में। इंपॉर्टेंट इन सब में है डी अनकॉन्शियस एक्सपीरियंस, जिसको आप एक्सेस नहीं कर सकते हो, और थोड़ा-थोड़ा टैक्स कर सकते हो, ड्रीम एनालिसिस, फ्री एसोसिएशन से, बट कंप्लीटली आप कभी एक्सेस नहीं कर पाओगे। ये थोड़े-थोड़े जो चीजें होती हैं, सिर्फ उनसे आप कर पाओगे। फ्रायड के अकॉर्डिंग जो अनकॉन्शियस होता है, ये आपके जो एनिमल इंस्टिंक्ट्स होती हैं, एनिमल ड्राइव्स होते हैं, इसका रिजर्वॉयर होता है। तो सरवाइवल, आपका सेक्स हो गया, एनिमल ड्राइव हो गया, वो एग्रेसिव टेंडेंसी जो होती हैं, वो आपका अनकॉन्शियस में स्टोर्ड होते हैं। और यही लिखा हुआ है यहां पे भी, की यौन डिजायर्स वगैरा, और पीपल कांस्टेंटली स्ट्रगल टू फाइंड यू नो सोशली एक्सेप्टेबल वेज़ जिसमें ये अनकॉन्शियस डिजायर्स को दिखा सकें बाहर। तो इसके वजह से उनको बहुत ज्यादा यू नो डिसकम्फ़र्ट होता है। हर इंसान में अनकॉन्शियस होता है। अब ये जो अनकॉन्शियस की जो नीड्स हैं, एग्रेसिव नीड्स हैं, यौन नीड्स हैं, उसको हम लोग सोशली एक्सेप्टेबल वे में कैसे दिखाएं, वो बहुत ज्यादा मतलब यू नो फ्रस्ट्रेशन क्रिएट करता है हर इंसान के अंदर। और यहां से उन्होंने तभी थेरेप्यूटिक प्रोसीजर बनाया, साइकोएनालिसिस, जो इस अनकम्फ़र्टेबल जो कॉन्फ़्लिक्ट जो फील करते हैं उससे डील करने के लिए बना गया है। तो साइकोएनालिसिस का बेसिक थ्योरी यही होता है की जो हमारे अनकॉन्शियस होता है उसको कॉन्शियस में लाना, पीपल को अवेयर बनाना और यू नो ट्राइंग टू हेल्प पीपल लीव बेटर लाइफ़, और कॉन्फ़्लिक्ट थोड़ा कम हो जाए। इसी के साथ उन्होंने ये भी कहा की स्ट्रक्चर्स होते हैं पर्सनालिटी के। एक स्ट्रक्चर होता है आईडी, आईडी जो होता है, एगो जो होता है, और सुपर एगो जो होता है। वो आप बेसिकली, पहले हम लोग यहां पे जो एनसीईआरटी में डेफ़िनेशन है उससे समझते हैं। आईडी जो होता है आपका, आईडी इज़ दी सोर्स ऑफ़ ए पर्सन्स इंस्टिंक्टिव एनर्जी। ये आपको एनर्जी देता है बेसिकली, ठीक है? ये ऑपरेट करता है यौन नीड्स, एग्रेसिव टेंडेंसीज़, जितना जो मैंने आपको पहले बोला था, इन सब चीजों पे ऑपरेट करता है। ये काफी प्लेज़र सीकिंग होता है, तो ये प्लेज़र प्रिंसिपल पे भी ऑपरेट करता है। ये फोकस नहीं करता क्या अच्छा रियलिटी क्या है, क्या कॉन्टेक्स्ट है, नहीं। इसका जो नीड है वो चाहता है की वो फुलफ़िल हो, तो फुलफ़िल होगा। तो आईडी इज़ सॉर्ट ऑफ़ लाइक यू नो जो एक बच्चा जो टैन्ट्रम थ्रो कर रहा होता है बहुत ज्यादा। और फ्रायड जो होते हैं वो कंसीडर करते हैं की ये जो है ये काफी बहुत ही ज्यादा इम्पॉर्टेंट पार्ट है, और इंस्टिंक्टिव एनर्जी जो होती है वो यौन होती है मोस्टली नेचर में, और बाकी जो नेचर में होती है वो एग्रेसिव होती है नेचर में। एगो जो होता है, अब जो एगो क्या करता है वो आईडी को कंट्रोल करने की कोशिश करता है, ठीक है? एगो जो होता है वो अवेयर होता है की अच्छा रियलिटी कैसी है, कॉन्टेक्स्ट क्या है। जैसे की अगर मतलब आपके सामने किसी का आइसक्रीम पड़ा हुआ है, पर एग्ज़ांपल, ठीक है? तो आप कैसे उठा के भाग नहीं सकते, की आइसक्रीम के साथ। तो एगो करेगा की नहीं मुझे आइसक्रीम खानी है, मतलब मुझे आइसक्रीम खानी है, एक आपको रोकेगा की नहीं भाई अभी आइसक्रीम या फिर मैंने पकड़ ली और मेरे को डाँट पड़ जाएगी। तो एगो इज़ अवेयर ऑफ़ रियलिटी, तभी वो ऑपरेट करता है रियलिटी प्रिंसिपल के ऊपर। और तभी मतलब हम लोग कह सकते हैं की आईडी जो है वो डिमांडिंग है, एगो ऑन दी अदर हैंड पेशेंट और रीज़नेबल होता है थोड़ा सा। सुपर एगो क्या होता है? सुपर एगो इज़ बेसिकली, अगर आपने आइसक्रीम देखा और आपने सोचा की अरे नहीं मैं नहीं उठाऊंगी अभी इस आइसक्रीम को बिकॉज़ ये आइसक्रीम मेरे लिए नहीं है, ये किसी और का आइसक्रीम है, शायद, ऐसा अच्छा नहीं होगा अगर मैं करूं तो, वो आप सोच रहे हो सुपर एगो। ऐसे जो ट्रेडिशनल वैल्यूज जो आपको इन्कल्केट कर दिया आपके पूरे चाइल्डहुड में, आपकी जो पेरेंट्स ने सिखाया, एक्सपीरियंस ने सिखाया, जो वैल्यूज़ वगैरा, वो जो आपके अंदर जो आ जाता है, आप जो इंटरनल आइस कर लेते हो, वो आपका सुपर एगो होता है। जब आप सोच रहे होते हो की अच्छा हां यू नो की इस सिचुएशन में ये नहीं करूंगी बिकॉज़ इट इज़ नॉट गुड, दैट इज़ योर सुपर एगो। तो आप ऐसे सोच सकते हो जैसे कार्टून्स में नहीं आप देखते हो की इंसान होते हैं और उनको कोई डिसीज़न लेना होता है, और एक साइड से अच्छा डिसीज़न होता है, एक साइड से बेड डिसीज़न होता है, तो जो बेड डिसीज़न होता है वो डेविल होता है एक तरफ यहां पे, और एक एंजेल होता है और इंसान बीच में होता है। जो डेविल है वो सॉर्ट ऑफ़ लाइक आईडी है, इंसान जो बीच में वो एगो है की अच्छा वो मतलब यू नो वो थोड़ा बैलेंस कर रहे हैं, और जो एंजेल है जो कह रहा है की नहीं अच्छा काम करो, वो सुपर एगो है। दिस इज़ वन वे यू कैन थिंक अबाउट इट। अब फ्रायड जो था उन्होंने कहा की जो आईडी की जो एनर्जी होता है वो दो इंस्टिंक्ट एनर्जी होता है। एक होता है लाइफ़ इंस्टिंक्ट और एक होता है डेथ इंस्टिंक्ट। मतलब की हम लोग अलाइव हैं वो वाला इंस्टिंक्ट और हम लोग मरने वाले हैं वो वाला। तो लाइफ़ इंस्टिंक्ट ज्यादा फोकस किया। और जो लाइफ़ इंस्टिंक्ट होती है वो होता है लिबिडो से, ठीक है? मतलब इमीडिएटली जो प्लेज़र है, वो प्रिंसिपल होता है।
नेक्स्ट हम लोग आ जाते हैं एगो डिफेंस मैकेनिज़्म के ऊपर। डिफेंस मैकेनिज़्म क्या होता है? बेसिकली आप बहुत सारे टाइम जब होता है, जो लोग होते हैं वो अपने जो चीज जो उनको चाहिए उसे तरीके से वो बिहेव नहीं कर पाते हैं, तो उसके लिए वो डिफेंस मैकेनिज़्म को प्लेस में ले आते हैं। तो डिफेंस मैकेनिज़्म इज़ ए वे परसन्स टू रिड्यूस और अवॉयड एंजायटी और डिस्टॉर्ट रियलिटी। पर एग्ज़ांपल, अगर कोई इंसान किसी एक पर्टिकुलर वे में बिहेव कर रहा है, बट वो उसको अचीव नहीं कर पा रहा है, तो वो बहुत सारे डिफेंस मैकेनिज़्म को प्लेस में लेगा, जिससे उनका जो एगो है वो प्रोटेक्टेड रहे, वो एगो हर्ट नहीं हो, इसलिए हम डिफेंस मैकेनिज़्म का यूज़ करते हैं। इसके क्या एग्ज़ांपल होता है? सबसे पहले तो होता है रिप्रेशन, ठीक है? जो आपको चीज जो हर्ट कर रही है, उसको रिप्रेस कर दो, उसके बारे में सोचना, एक्सपीरियंस से इसे हटा दो। तो कभी-कभी जो लोग बोलते हैं की यार मुझे नहीं पता मैंने इस वे में क्यों बिहेव किया, ऐसे इंसान के साथ, तो वो उनको नहीं पता क्योंकि उन्होंने रिप्रेस कर दिया था। तो जो आपके जो मोशन्स होते हैं, जिसके साथ डिफिकल्टी फेस कर रहे हो, एक्सप्रेस करने में, आप जब उनको हटा दें, तो रिप्रेशन होता है। नेक्स्ट होता है प्रोजेक्शन। प्रोजेक्शन मतलब की पीपल एट्रिब्यूट देयर ओन ट्रेड्स टू अदर। मतलब की जो मेरे ट्रेड्स हैं मैं वेक्यूम में एट्रिब्यूट करती हूं। मेरे को लगता है की मैं अच्छी इंसान हूं, मैं काइंड-हार्टेड हूं, तो मैं बाकी लोगों को भी ऐसे सोचूंगी, की ये सब बाकी सब भी अच्छे इंसान हैं, बाकी सब भी काइंड-हार्टेड हैं। यही अगर मैं काफी कैनिंग हूं, तो मेरे को भी लगेगा की बाकी लोग भी हैं, वो भी बहुत ज्यादा कैनिंग होते हैं। तो अपने एट्रिब्यूट्स को बाकी लोगों पे फोकस कर देना, मतलब अपने ट्रेड्स को बाकी लोगों पे एट्रिब्यूट कर देते हैं। नेक्स्ट होता है डिनायल। मतलब वही की वो मतलब यू नो रिफ़्यूज़ कर देते हैं एक्सेप्ट करने को, रियलिटी को। जैसे की मतलब कभी-कभी जिन लोगों के फैमिली मेंबर्स की डेथ हो जाती है, तो फिर डायल में चला जाता है की नहीं उनकी डेथ नहीं हुई है, अभी वो आ जाएंगे वापस। रिएक्शन फॉर्मेशन क्या होता है? जी तरीके से आप बिहेव कर रहे हो, जो आप फील कर रहे हो और आप बिहेव जी तरीके से कर रहे हो, वो अपोजिट है। तो आप कभी-कभी नोटिस किया होगा की बहुत सारे लोग होते हैं, जब उनको ऐसे स्ट्रेस हो जाता है, फिर गुस्सा आ जाता है, वो प्रार्थना शुरू कर देते हैं, जैसा मुन्ना भाई एमबीबीएस मूवी, तो उसमें जब भी उसको गुस्सा आता था या फिर रोना आता था तो वो हंसना शुरू कर देता था। तो दैट इज़ रिएक्शन फॉर्मेशन। जैसे आप बिहेव करना चाह रहे हो, आप जो फील कर रहे हो, आप वैसे बिहेव नहीं कर रहे हो, तो ऐसे यू नो, इस सिचुएशन में हम लोग कहते हैं वो रिएक्शन फॉर्मेशन हो जाता है। तो जैसे की संबदी लॉट ऑफ़ स्ट्रेसफुल और जी माइट यू नो टर्न टू रिलिजन, जिससे की वो अपना यू नो उसको आराम मिले। एगो को प्रोटेक्ट कर सकें, दैट इज़ रिएक्शन फॉर्मेशन, जो फील कर रहे हैं, वैसे बिहेव नहीं कर रहा, उसका अपोजिट कर रहा है। राशनलाइज़ेशन जो होता है वो अपने जो उन रीज़नेबल फीलिंग्स और बिहेवियर है उसको राशनलाइज़ करना। की अच्छा नहीं मेरे पेपर में इसलिए मार्क्स नहीं है क्योंकि ये पेन खराब था, ठीक है? या फिर वो पेपर जो था उसका क्वालिटी खराब थी। तो ये राशनलाइज़ कर रहे हो आप। बहुत अनरियलिस्टिक एग्ज़ांपल दे रहे हो की आपका जो पर्टिकुलर बिहेवियर है वो किस वजह से था।
नेक्स्ट उसके बाद हम लोग आ जाते हैं फ्रायड के स्टेज ऑफ़ पर्सनालिटी डेवलपमेंट, ठीक है? इसके साथ-साथ ये स्टेज थे बहुत सारे, जो आपके बेसिकली पर्सनालिटी डेवलपमेंट में काफी इम्पॉर्टेंट होते हैं। जैसे की फर्स्ट स्टेज जो होता है दैट इज़ योर ओरल स्टेज, ठीक है? तो अब ये जो स्टेज होते हैं ये साइकोसेक्सुअल स्टेज होते हैं, मतलब की आपको ग्रैटिफिकेशन मिलता है, सैटिस्फ़ैक्शन, आपको जो प्लेज़र होता है, आपको डिफ़रेंट बॉडी पार्ट्स से मिलता है इन स्टेज में। ओरल स्टेज जो होता है वो न्यूबॉर्न बेबी से लेकर उनके अंदर देखने को मिलता है, जहां पे उनको प्लेज़र मिलता है फ्रॉम देयर माउथ, ओब्वियसली बिकॉज़ डी न्यूबॉर्न बेबी होते हैं, उनका पूरा सर्वाइवल भी उनके माउथ पे डिपेंड करता है। वो कैसे खाना जब लेते हैं, वो ब्रेस्टफ़ीड जब हो रहा है, तो वो जब सक्शन करते हैं तो उनको प्लेज़र मिलता है। तो दैट इज़ योर प्लेज़र सेंस। सेकंड स्टेज ओरल ग्रैटिफ़िकेशन, जैसे थम्ब सकिंग भी हो गया, बाइटिंग भी हो गया, उन सब से भी मिलता है। अर्ली मंथ में बेसिकली इंसान का जो बेसिक फीलिंग्स होती है वो डिटरमाइन की जाती है। फ्रायड के अकॉर्डिंग जो इंसान बड़े हो के सोचता है की ये जो वर्ल्ड है वो काफी बेटर प्लेस है, वो काफी गुड प्लेस है, उनका ओरल स्टेज में काफी प्रॉब्लम हुआ होता है, तभी वो ऐसा फील कर रहा होता है। नेक्स्ट है हमारा एनल स्टेज। एनल स्टेज इज़ बेसिकली जब उनको प्लेज़र मिल रहा होता है बाय यू नो दी मीन्स ऑफ़ एक्सक्रेशन, ठीक है? तो जब वो मतलब पॉट्टी ट्रेनिंग जो होता है की जब मतलब हम लोग उनको सीखाते हैं की अपना जब भी हमको वॉशरूम जाना है तो उनको बताएं। ये जो फेज़ होता है वो आपका एनल स्टेज के अंदर आता है। और बाउल मूवमेंट से टॉडलर बच्चा जो है उसको प्लेज़र जेनरेट करने को मिलता है। यहां पे पहले बार मतलब जो चाइल्ड होता है उसको रियलाइज़ होता है की उनकी बॉडी के जो अर्जेस हैं वो सोसाइटी कंट्रोल करती होती है। बिकॉज़ पहले तक उनको हम लोग डायपर्स पहनाते थे, जब भी हो रहा है हो रहा है। अब हम उनको ट्रेन कर रहे हैं की नहीं व्हेनेवर यू वांट टू गो टू दी वॉशरूम, आप लोगों को बताओ, ठीक है? इंडिकेट करो, फिर आप वॉशरूम में जाके आप करोगे। तो ये आपका यहां पे पहले बार उनको देखने को मिलता है की चाइल्ड को की अच्छा उनकी बॉडी की फंक्शन्स जो है उसको भी कंट्रोल करना है। तो यूज़ुअली यहां पे लिखा हुआ है, संबदी जिसको हम बेसिकली बहुत ज्यादा यू नो कॉन्फ़्लिक्ट होता है की बहुत ज्यादा बेड बिहेवियर होता है, तो यहां पे उनको कॉन्सेप्ट हुआ होता है इस स्टेज में, पर्टिकुलर कभी। फिर ऐसा स्टेज होता है जहां पर आपको जेनिटल जो होते हैं, वहां से प्लेज़र सिक करने को मिलता है। ये फोर से फाइव के आगे के बीच में देखने को मिलता है। यहां पे जो बच्चा होता है उसको सेक्सुअल क्वालिटी के अवेयरनेस आती है। यौन रिलेशनशिप जो है उनके पेरेंट्स के बीच में उसकी अवेयरनेस आती है, जेंडर क्या है उसकी अवेयरनेस आती है। सो ओडीपस कॉम्प्लेक्स में बेसिकली जो होता है तो बाय होता है जो भी स्टार्ट से पांच साल में होता है, ही इज़ इन लव विद हिज़ मदर, और दैट इज़ व्हाई बिकॉज़ मदर और ही नोज़ की उसके मम्मी और पापा रिलेशनशिप में है। हॉस्टिलिटी टुवर्ड्स इट्स फादर, और बिकॉज़ ही इज़ हॉस्टाइल टुवर्ड्स गर्ल्स, फादर ही इज़ अफ़्रेड यू नो उसको पनिशमेंट मिलेगा या फिर कास्ट्रेशन फॉर्म मिलेगा बाय दी पर्टिकुलर फादर। इसी के साथ-साथ ये मेज़र डेवलपमेंट यहां पे जो इम्पॉर्टेंट होता है, ज़रूरी होता है वो रिजॉल्व हो जाए, मतलब की यू नो जो चाइल्ड है की स्टार्ट आईडेंटिफ़ाइंग विद हिज़ फादर, मतलब उसको अपने मम्मी के साथ आना है, तो यू नो ये स्टार्ट आईडेंटिफ़ाइंग विद हिज़ फादर, और देन वो जो फादर जी तरीके से बिहेव करते हैं वो भी उसे तरीके से बिहेव करना शुरू कर देगा। और तभी जैसी आईडेंटिफ़िकेशन हो जाता है, तो उनका जेंडर रूल्स जो होते हैं वो भी यहां पे अडॉप्ट करना शुरू हो जाते हैं। इलेक्ट्रा कॉम्प्लेक्स इज़ दी सेम यू नो, इलेक्ट्रा कॉम्प्लेक्स में भी जो डॉटर होती हैं दे आर इन लव विद देयर फादर, और इट्स सिम्बॉलिकली ट्राई टू रिप्लेस मदर और रेज़ ऑफ फैमिली, और देन बिकॉज़ हमको वो नहीं मिल पाता है, दे ट्राई टू आईडेंटिफ़ाई विद दी मदर, ठीक है? तो वो मदर जैसे बिहेव करती हैं वो करना शुरू कर देते हैं, और डेवलपमेंट ऑफ़ आईडेंटिफ़िकेशन जो होता है विद दी सेम ये काफी इम्पॉर्टेंट होता है इस पर्टिकुलर स्टेज में। और इसके साथ-साथ हॉस्टिलिटी जो होती है टुवर्ड्स दी मतलब यू नो दी सेम सेक्स पेरेंट वो कम हो जाती है बिकॉज़ वो हम आईडेंटिफ़ाई करना शुरू कर देते हैं उनके साथ। लेटेंसी पीरियड बेसिकली जो होता है, लेटेंसी पीरियड आपका होता है 7 इयर्स से लेकर प्यूबर्टी तक। ये वाला जो पीरियड होता है आपका, मोस्ट ऑफ़ दी एनर्जी जो होती है वो चैनेलाइज़ होती है सोशल और अचीवमेंट रिलेटेड एक्टिविटीज़ में। इसमें आपका जो सेक्सुअल स्टेज टेकिंग वो सब नहीं होता है। जेनिटल स्टेज जो आपका एडोलिसेंस से लेकर यू नो पर डी रेस्ट ऑफ़ योर लाइफ़ तक कह सकते हैं, जहां पर आपको प्लेज़र आपके जेनिटल के थ्रू मिलता है। यहां पर आप लर्न करते हो की अपोजिट सेक्स के साथ कैसे प्रॉपरली बिहेव करना चाहिए, सेक्सुअलिटी के बारे में आप ज्यादा मतलब यू नो अच्छे से अंडरस्टैंड करने लग जाते हो। इसी के साथ-साथ फिक्सेशन क्या होता है? अब इन सब स्टेज में अगर कभी भी कोई प्रॉब्लम आई है, कोई इशू आता है और वो इंसान जो होता है वो उससे कोप नहीं कर पाता, तो वो कहां पे अरेस्ट हो जाता है, उसे पर्टिकुलर स्टेट में वो फिक्स्ड हो जाते हैं। तो वो फिक्सेशन जो होता है वो उनके ओवरऑल डेवलपमेंट पे बहुत ज्यादा इशू क्रिएट कर देता है। पर एग्ज़ांपल, इफ़ ए चाइल्डहुड डस नॉट सक्सेसफुली पास थ्रू दी फाइल स्टेज, शो दिस जो डी ओडीपस कॉम्प्लेक्स और स्टिल हॉस्टिलिटी टुवर्ड्स दी पेरेंट ऑफ़ दी सेम सेक्स। मतलब की ओडीपस कॉम्प्लेक्स नहीं कर पाए तो उनका हॉस्टिलिटी टुवर्ड्स दी सेम सेक्स पेरेंट रहेगा। तो ये सारी चीजें जो होती हैं वो बहुत ज्यादा हैंपर कर देती हैं आपके नॉर्मल ग्रोथ और नॉर्मल डेवलपमेंट को। नेक्स्ट जो चीज होती है रिग्रेशन। रिग्रेशन जो बेसिकली होता है, इसको भी अंदर डिफेंस मैकेनिज़्म में आता है जहां पे आप जाते हो अपने पुराने स्टेज में, टू रिजॉल्व योर प्रेजेंट डे कॉन्फ़्लिक्ट। तो आप देखोगे की लोग अपना नेल्स बाइट कर रहे होते हैं, या फिर बेड वेटिंग होता है, तो इन सब चीजों से जो पहले उनको हेल्प करता था, पहले जो स्टेज में, अब वो वाली चीजों को वो यूज़ करते हैं करंट सिचुएशन्स में, टू रिजॉल्व आज के दिन का प्रॉब्लम। तो इट्स लाइकली टू सी अ पर्सन टू गो टू एन अर्लियर स्टेज। दैट इज़ यहां पर। फिर उसके बाद हम लोग आते हैं, फ्रायड ने साइकोडायनेमिक अप्रोच में काफी मतलब कंट्रीब्यूशन किया, और इट्स राय के कंट्रीब्यूशन के चक्कर में साइकोडायनेमिक अप्रोच जो है वो काफी ज्यादा फेमस हो गया, और इट्स प्रॉपरली वन ऑफ़ दी मोस्ट इम्पॉर्टेंट ऑफ़ प्रोजेक्ट्स इन साइकोलॉजी एवर। यहां पे आप नोटिस करेंगे की कुछ चीजें फ्रायड में बोली वो मतलब यू नो थोड़ी कॉन्फ़्लिक्टिंग थी, सोसाइटी उसको एक्सेप्ट नहीं कर पा रही थी। ऐसे ही बहुत सारे ऑडियंस जो थे, जो बिलीव मतलब यू नो फ्रायड के साथ पढ़ रहे थे या फिर उनकी थिअरीज़ में पहले बिलीव करते थे, वो वहां से कट ऑफ़ हो गए और उन्होंने खुद के थिअरीज़ बनाना शुरू की। तो इनको हम लोग कहते हैं नियोएनालिटिक्स या फिर पोस्ट-फ्रायडियन।
तो फ्रायड के बाद उन्होंने खुद की थिअरीज़ लाई और जो खुद का मतलब यू नो कॉन्सेप्ट्स लाये, आपकी यहां पे हम लोग यहां पे पढ़ने वाले हैं। ये जो लोग होते थे, ये अपना इतना ज्यादा फोकस नहीं करते थे यौन एग्रेसन में। ये ये भी कहते थे की इंसान जो होता है उसमें ये जो कॉम्पिटेंसी होती है, प्रॉब्लम सॉल्विंग एबिलिटीज़ होती हैं, और वे आर जो मोटिवेटेड बाय पर्सनल ग्रोथ। सिर्फ यौन और एग्रेसिव डिजायर नहीं डिटरमाइन करती है की हमारा बिहेवियर कैसे होगा, हमारा जो पर्सनल गोल्स होते हैं, हमारे जो कलेक्टिव यू नो एबिलिटीज़ होती हैं, वो भी डिटरमाइन करती हैं की हम लोग आगे जाके कैसे बिहेव करेंगे। तो यहां पे सबसे पहले जो थियोरेटिसियन कार्ल जुंग थे, जुंग ने एक्चुअली काफी ज्यादा काम किया था फ्रायड के साथ। दे वर वेरी क्लोज़ बट ही ब्रोक ऑफ़ विद हम, और उन्होंने कहा की जो ह्यूमन बिहेवियर होता है वो एम्स और एस्पिरेशन्स पे भी बहुत ज्यादा डिटरमाइन होता है, और ही डिटरमाइंड उनका खुद का एक उन्होंने ब्रांच शुरू किया जिसका नाम उन्होंने दिया एनालिटिकल साइकोलॉजी। इसका बेसिक असम्पशन यहां पर ये था, पर्सनालिटी कंसिस्ट ऑफ़ कॉम्प्लेक्स फोर्सेज़ और स्ट्रक्चर्स विद इन दी इंडिविजुअल, रादर देन बिटवीन दी इंडिविजुअल और दी डिमांड्स ऑफ़ दी सोसाइटी। इंडिविजुअल के विद इन जो कॉम्प्लेक्स फोर्सेज़ हैं, कॉम्प्लेक्स स्ट्रक्चर्स हैं, वो कैसे डिटरमाइन करते हैं की इंडिविजुअल कैसे डेवलप करेगा, रादर देन इंडिविजुअल और सोसाइटी के बीच में जो कॉन्सेप्ट है। इंडिविजुअल और सोसाइटी के बीच में कॉन्फ़्लिक्ट आते एगो वाला कॉन्सेप्ट जो फ्रायड ने किया था। इसके साथ-साथ इन्होंने कलेक्टिव अनकॉन्शियस की बात करें, की हम लोग एक तो अनकॉन्शियस हमारे जो इंडिविजुअल होता है, एक होता है कलेक्टिव अनकॉन्शियस जो ऑफ ऑल आर बोर्न विद दिस अनकॉन्शियस, जो भी हम लोग ग्रुप्स के पास होते हैं, ये इंडिविजुअल एक्वायर नहीं किए जाते हैं, इन्हेरिटेड होते हैं। तो जैसे की मदर अर्थ वाला आर्किटाइप है। हमको किसी ने ऐसे यूज़ुअली सिखाया नहीं। तो अकॉर्डिंग टू जुंग ये जो आर्किटाइप्स होते हैं ये जो प्री-मॉडल इमेजेज़ होती हैं हमारे अंदर ऑलरेडी रहती हैं। यू नो, लेट ड्रीम्स और आर्ट में भी देखने को मिल जाती होती हैं। और जो सेल्फ़ होता है वो यूनिटी और व्होलनेस की तरफ मतलब यू नो स्ट्राइव करता है। हम चाहते हैं की हम यूनिटी पे फोकस करें, चाहते हैं की हम लोग व्होलनेस पे फोकस करें। इसके साथ साथ इन्होंने बहुत ज्यादा डिवोशन दिया और यू नो इन स्टडींग दी वेरियस ट्रेडीशंस और कैसे की ये जो आर्किटाइप्स होते हैं, जैसे मदर इंडिया का आर्किटाइप हो गया है, ठीक है? भारत माता का आर्किटाइप हो गया, मदर अर्थ के टाइप हो गया, भगवान का जो कॉन्सेप्ट है, ये हम लोग कैसे बायोलॉजिकली इन्हेरिट करते हैं, इसके ऊपर उन्होंने काफी ज्यादा स्टडी की है।
नेक्स्ट क्वेश्चन जो है इस कार्ल हॉर्न है। तो कार्ल जो बेसिकली आपने अगर नोटिस किया, कार्ल जुंग जो थे उन्होंने ज्यादा वुमेन के ऊपर बात नहीं की थी, ठीक है? ही वाज़ मोस्टली फोकसिंग ऑन मैन। और इसके साथ-साथ फ्रायड ने ये भी कहा था की जो वुमेन होती हैं दे हैव पीनिस इन्व्ही। क्या होता है की बेसिकली हम लोग चाहते हैं की हमारे पास पीनिस हो बिकॉज़ पीनिस नहीं है, सो वी हैव सॉर्ट ऑफ़ यू नो यू नो एंजायटी विद इन अस। सो दिस इज़ व्हाट फ्रायड बिलीव्ड। दिस कार्ल ऑन लाइफ वाज़ अगेंस्ट सच और लोशन। उन्होंने कहा इन एन ऑप्टिमिस्टिक ज्यादा लाइन, उन्होंने कहा की वुमेन इनफेरियर नहीं होती है, नॉट पेमेंट नॉट को थ्रू पीनिस और दी अदर उन्होंने ये भी कहा की जो डिस्टर्ब्ड इंटरपर्सनल रिलेशनशिप होता है हमारी चाइल्डहुड में, उसकी वजह से साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर्स आते हैं, रादर देन यू नो दिस एग्रेसिव यौन ड्राइव्स का कॉन्सेप्ट जो होता है। इन्होंने बेसिक एंजायटी की बात कही की जब भी पेरेंट्स थोड़ा हॉस्टाइल होते हैं बच्चों के टुवर्ड्स, तो उनमें बेसिक एंजायटी डेवलप हो जाती है। और उन्होंने ये भी कहा की एक्सेसिव
हम लोग इवॉल्व होते हैं, हम कलर को भी शॉप करते हैं। तो ये दोनों का यू नो, सॉर्ट ऑफ़ साथ में ये चलते जाते हैं। रिसिप्रोकल वैल्यूएशन है। सिर्फ एक जगह पे फोकस नहीं है। तो कलर और ह्यूमन बीइंग्स जो है, वो एक दूसरे को इन्फ्लुएंस करते रहते हैं।
एरिकसन ने सर्च पर आईडेंटिटी दिया था, जहां पे उन्होंने कहा कि यू नो, स्ट्रेस लेक आया हूं। नेशनल कॉन्शियस एगो प्रोसेस इन पर्सनालिटी डेवलपमेंट इस ए फ्लड लाइफ लॉन्ग प्रोसेस नहीं रहता है। यू नो, लाइक फ्रॉम चीज है। और एगो की आईडेंटिटी जो होती है, वह सेंट्रल प्लेस यहां पर रोल प्ले करती है। यहां पर उन्होंने आईडेंटिटी क्राइसिस का थ्योरी दिया, जो एडोलिसेंस में होता है। यू नो, वेरिएंट देवर हेविंग एन डिफिकल्टी और अंडरस्टैंडिंग की वो कौन है, उनके फीचर्स, कैपेबिलिटी, करैक्टेरिस्टिक्स क्या हैं? तो ये वाली जो थ्योरी थी, वो एरिक्सन ने दी थी।
अब साइको डायनेमिक अप्रोच के क्रिटिसिजम क्या है? ये आपको देख सकते हो, यहां से क्रिटिसिजम शुरू होंगे। क्रिटिसिजम सबसे पहले ये है कि ये बहुत ज्यादा केस स्टडी पे फोकस था। कोई भी अगर आपका साइंटिफिक एंडेवर सिर्फ केस स्टडी पे फोकस है, तो वो उतना साइंटिफिक नहीं, क्यों क्योंकि हम उसको जनरलाइज नहीं कर सकते। जैसे स्पेसिफिक लोगों के साथ हुआ, जरूरी नहीं कि ये सब लोगों के साथ हो। तो आपने ज्यादा एक्सपेरिमेंटल मेथड, बाकी साइंटिफिक मेथड से फोकस नहीं किया। नेक्स्ट, उनके जो सैंपल साइज था, वो छोटा था। ठीक है? अगेन, सैंपल साइज अगर आपका छोटा होगा, तो आप उसको जनरलाइज करने में प्रॉब्लम आएगी। हर इंसान पर क्या वो जनरलाइज हो सकता है, जो सिर्फ ऐसे 10-15 लोगों पे बेस्ड है? नहीं। तो तभी हम लोगों को ये भी इशू आ जाता है कि सैंपल साइज काफी छोटा था। कॉन्सेप्ट्स जो हैं, डिफाइंड नहीं हैं, उतने ज्यादा वेल-डिफाइंड कॉन्सेप्ट्स नहीं हैं कि हम उसको साइंटिफिकली स्टडी कर सकते हैं। और यहां पे मेल के ऊपर ज्यादा फोकस था, फीमेल को उन्होंने कंप्लीटली ओवरलुक कर दिया था। तो मेरे सैंपल्स पे फोकस करके उन्होंने कहा कि अच्छा, ये ट्रू है, पर जो डेटा इसे नॉट नेसेसरी ऑन द फीमेल सैंपल्स को इंक्लूड किया गया।
इसके बाद हम लोग आते हैं बिहेवियरल अप्रोच, ठीक है? बिहेवियरल अप्रोच बेसिकली आपका क्या होता है? बिहेवियरिस्ट जो होते हैं, वो मन वगैरह पे बिलीव नहीं करते। वो कहते हैं कि इंसान का जो पर्सनालिटी होता है, किस तरीके से वो इंगेज करते हैं, डेट डिफरेंस ऑन द स्टीमुलाई, रिस्पांस, रिएक्शन, सिमिलर सो रिस्पांस के बीच का जो रिलेशनशिप होता है, वो फोकस करता है बिहेवियरल अप्रोच। बिहेवियरिस्ट बिलीव करते हैं डेटा पे, डिफाइनेबल चीजों पे, ऑब्जर्वेबल्स चीजों पे, मेजरेबल चीजों पे। बिहेवियरिस्ट बहुत साइंटिफिक होते हैं, जो मैं ठीक है। वो सिर्फ उन चीजों पे बिलीव करेंगे, जो एम्पीरिकली वो देख सकते हैं। ठीक है? जिनको वो साइंटिफिक इंक्वायरी में डाल सकते हैं। साइको डायनेमिक अप्रोच में हम लोग कॉन्सेप्ट्स की बात कर रहे थे, जो हम लोग डाल सकते हैं। बिहेवियरिस्ट को चाहिए कि वो साइंटिफिक प्रूफ करो। आप वो चाहते हैं सिमिलर रिस्पांस के बीच में चीजों को देखने का। तो यहां पे स्ट्रक्चरल यूनिट ऑफ पर्सनालिटी, वो कहते हैं आप सिखा सकते हो। अगर बच्चा खाना नहीं खाता, पर एग्जांपल, तो आप उसको पॉजिटिवली रीइन्फोर्स करोगे, तो खाना खाना शुरू कर देगा, और दे ओवरऑल, यू नो, दे विल हैव एन बेटर अंडरस्टैंडिंग ऑफ देयर हेल्थ, और वो आगे जाके ज्यादा अच्छे से परफॉर्म कर सकते हो। तो कॉन्सेप्ट टेंडेंसी डेट अंग इस बिहेवियर इज ए रिडक्शन ऑफ बायोलॉजिकल और सोशल बिहेवियर। बेसिकली ये कहना चाह रहे हैं कि स्टीमुलाई रिस्पांस जो होता है, वो आपका कर होता है, जो डिसाइड करते हैं कि आप ऐसे बिहेव करोगे। स्टीमुलाई रिस्पांस रिएक्शन पे काफी ज्यादा फोकस होते हैं बिहेवियरल में। बहुत सारी थ्योरीज़ हैं, जो आपने ऑलरेडी पढ़ रखी हैं। क्लासिकल, इंस्ट्रूमेंटल, ऑब्ज़र्वेशन। तो ये सारी जो थ्योरीज़ होती हैं, इसका भी काफी ज्यादा वो यूज़ करते हैं। तो अंडरस्टैंड व्हाट यू नो, पर्सनालिटी और सेल्फ एक्चुअली जो प्रिंसिपल्स होती हैं, इनका काफी ज्यादा यूज़ किया गया है। जैसे कि ऑब्ज़र्वेबल्स लर्निंग जो होती है, ऑब्ज़र्वेशनल लर्निंग। हम सिख सकते हैं। अच्छा, क्यों हम लोग कलर को अडॉप्ट करते हैं? क्यों हम लोग ऐसे बिहेव करते हैं, जैसे हमारे पेरेंट्स बिहेव करते हैं? तो वो ऑब्ज़र्वेशनल लर्निंग में उसका आंसर आपको मिल जाएगा।
नेक्स्ट होता है कल्चरल अप्रोच, जो फोकस करता है ऑब्वियसली कलर के ऊपर, कलर के इम्पोर्टेंस के ऊपर। यहां पे प्रपोज किया जाता है आइडिया कि आपका जो इकोनॉमिक मेन्टेनेंस सिस्टम होता है, वो बहुत ही ज्यादा विटल रोल प्ले करता है इन कलर और बिहेवियर के वेरिएशन। आपका क्लाइमेटिक कंडीशन, जहां पे आप बाल और वाटर पुरी हो, आपका नेचर ऑफ़ टेरेन कैसा है, लैंड हिल्स, प्लेन, व्हाट डी पोयम, मतलब कि आप प्लेन्स में, प्लेटोज में, माउंटेन रीजन में। अवेलेबिलिटी ऑफ़ फूड, ठीक है? फ्लोरा और फौना कैसा है ऑस्ट्रेलिया का, उसके साथ-साथ इकोनॉमिक एक्टिविटीज़ जो होती हैं, वो तो ये सब डिटरमाइन करती ही करती हैं, ये सारी चीजें। बट उसके साथ-साथ आपका सोशल स्ट्रक्चर कैसे निकल के आएगा, वो भी डिटरमाइन करता है। क्यों? क्योंकि आप देखोगे कि माउंटेन रीजंस में, जहां पे सेटलमेंट्स उतने डेंस नहीं हैं, ठीक है? तो या तो ज्यादा कॉम्पिटिटिव हो सकती हैं कम्युनिटीज़, या तो वो कम्युनिटीज़ ज्यादा सोशल हो सकती हैं। नेचर की वो जो सब लोग साथ में आपस में गुज़ारा करते हैं, साथ में रहते हैं, जैसे ट्राइबल कम्युनिटी होती है, वो यूज़ुअली ज्यादा अपने कम्युनिटी पे फोकस ज्यादा रहती है। ठीक है? यू नो, टाइट कम्युनिटी होती है, हाथ में ज्यादा रहती है, उनको रिसोर्सेज़ शेयर करने होते हैं। मोस्ट ऑफ़ यू विल बी लिविंग इन प्लेन रीजन। तो ये जो हम लोग प्लेन्स वाले रीजन में रहते हैं, यहां पे हम लोगों के पास काफी रिसोर्सेज़ हैं, काफी स्पेस है। तो हम लोग ज्यादा इंडिविजुअलिस्ट होते हैं, एज़ कंपेयर टू पीपल जो वहां पे होते हैं। तो किस तरीके से आप बाल और बड़े हुए होते हो, तो आपके इकोनॉमिक्स डिटरमाइन करता है आपका सोशल स्ट्रक्चर है, और बिकॉज़ वो आपके सोर्सेज़ ऑफ़ लाइफ को डिटरमाइन करता है, वो आपका पर्सनालिटी भी डिटरमाइन करता है। तो यहां पे उन्होंने एक एग्जांपल दे रखा है ट्राइबल कम्युनिटी का, जो झारखंड से है। उन्होंने कहा है कि ये लोग जो होते हैं, वो नोमेडिक होते हैं नेचर में, नोमेडिक लाइफ, मतलब कि एक जगह से दूसरी जगह हमेशा चलते रहते हैं, कहीं पे सेटल नहीं होते हैं। तो इसकी वजह से उनको कांस्टेंट मूवमेंट रिक्वायर्ड होता है। तो इनके जो बच्चे होते हैं, वो भी काफी यंग ऐज में यू नो, उनको फ्रीडम सिखाया जाता है, बिकॉज़ वो कांस्टेंटली मूव कर रहे होते हैं, कांस्टेंटली रिसोर्सेज़ ढूंढ रहे होते हैं। तो वो बहुत ज्यादा फ्रीडम प्रोवाइड की जाती है, और इसके साथ-साथ उनको इंडिपेंडेंस बनाए रखने पे काफी फोकस किया जाता है। ऑटोनॉमसली डिसीज़ंस लो, ठीक है? खुद से डिसीज़न लिया करो, खुद के डिसीज़न लिया करो। अचीवमेंट ओरिएंटेड ये लोग ज्यादा रहते हैं, एज़ कंपेयर टू संतान जो एग्रीकल्चर सोसाइटी में बॉर्न और ब्रॉट अप होता है। एग्रीकल्चर सोसाइटी में ज्यादा फोकस होते हैं कि यू नो, ओबेडिएंट रहो, एल्डर्स का फॉलो करो, ठीक है? आप जो यंगस्टर्स होते हैं, उनको नर्चर करने में हेल्प करो, रिस्पांसिबल बनो, ड्यूटीफ़ुल बनो। तो जहां पे हम लोग देखते हैं कि ट्राइबल कम्युनिटी में, जहां पे वो लोग नोमेडिक हैं, वो मूव करते रहते हैं कांस्टेंटली हर जगह, वहां पे इंडिपेंडेंस और अटोनॉमी पे ज्यादा फोकस किया जाता है। यहां पे जो सेटल्ड कम्युनिटी है, एग्रीकल्चर में, यहां पे ओबेडिएंस पे ज्यादा फोकस किया जाता है, क्योंकि यहां डेट इज़ व्हाट देयर सिचुएशन रिक्वायर्स। वहां पे वो चाहते हैं कि वो जो बच्चे हैं, वो सीखें कि उनको बाहर जाना है, उनको यू नो, रिसोर्सेज़ लाने हैं, कहीं पे सेटल नहीं होना है। तभी वो लीडरशिप क्वालिटीज़, जो अचीवमेंट ओरिएंटेड हैं, एग्रीकल्चर में हमको पता है कि वो लोग सब साथ में हैं, सब एक साथ जुड़ के रहते हैं, तभी वो सोशल कम्युनिटी पे ज्यादा फोकस करते हैं।
नेक्स्ट जो है हमारे पास, आ जाती है ह्यूमैनिस्टिक थ्योरी। ह्यूमैनिस्टिक बेसिकली जो कार्ल रोजर्स और अब्राहम मास्लो ने काफी ज्यादा कंट्रीब्यूट किया है। कार्ल रोजर्स ने एग्जांपल दिया था यहां पे फुल्ली फंक्शनिंग ह्यूमन का। फुल्ली फंक्शनिंग ऐसा इंसान होता है जिसके विदिन की जो मतलब फोर्सेज़ होते हैं, वो खुद से मोटिवेटेड रहते हैं। यू नो, वो खुद हैप्पी रहते हैं, वो हमेशा उनके पास यू नो, लाइफ में जो भी चीजें होती हैं, वो हमेशा यू नो, पॉज़िटिवली उसको लेते हैं। इनबॉर्न टेंडेंसी होती है उनके अंदर। तो ये जो इंसान होते हैं, जो इन सारी चीजों को साथ में लेके चलते हैं, खुद मोटिवेटेड है, एवरीवन के साथ है, यू नो, कंपेयर नहीं करते अपने आपको ज्यादा, वो एक फुल्ली फंक्शनिंग ह्यूमन को बनाता है। तो जिन्होंने बेसिक अज़म्पशंस दिए थे अबाउट ह्यूमन बिहेवियर, एक तो कि ह्यूमन बिहेवियर गोल्ड-डायरेक्टेड होता है। हमारे पास गोल्स होते हैं, उसको अचीव करना चाहते हैं। और सेकेंडली, डेट पीपल विल ऑलमोस्ट ऑलवेज़ ट्राई टू अडॉप्ट और सेल्फ कैपिटल। अब दिस इज़ वेरी डिफरेंट फ्रॉम साइकोडायनेमिक। वहां पे हम लोग कह रहे थे कि सेक्स और एग्रेसिव वॉचेज़ पे डिपेंड करता है। यहां पे हम फोकस कर रहे हैं कि जो आपका बिहेवियर होता है, जिसको आप अचीव करना चाहते हो, वो आप किस तरीके से बिहेव करोगे। डिपेंड्स ऑन योर गोल्स जो हैं, और आप मोस्ट ऑफ़ द टाइम अपने गोल्स को अचीव करना चाहोगे। तो ये थोड़ा पॉज़िटिव व्यू हो गया ह्यूमन बीइंग्स का। इन्होंने नोट किया कि सेल्फ जो होता है, वो बहुत इम्पोर्टेंट होता है। सेल्फ के थ्योरी पे ज्यादा इसलिए उन्होंने फोकस किया है। रोजर्स ने एक और कॉन्सेप्ट दिया था अबाउट आइडियल सेल्फ। आइडियल सेल्फ ऐसा सेल्फ होता है जो आप बनना चाहते हैं। होता है रियल सेल्फ, जो आपको आइडियल सेल्फ होते हैं, जो सेल्फ आप बनना चाहते हो, आप आइडियली ऐसा होना चाहते हो। तो आपकी जो आइडियल सेल्फ होता है और रियल सेल्फ होता है, अगर इसके बीच में बहुत ज्यादा गैप है, इसके बीच में कांग्रुएंसी नहीं है, इनको कांग्रुएंसी है, ये दोनों, तो बहुत ज्यादा डिज़अपॉइंटमेंट और कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट हो जाती है। जो इसका बेसिक प्रिंसिपल है डेट पीपल हैव एन टेंडेंसी टू मैक्सिमाइज़ सेल्फ कॉन्फिडेंस थ्रू सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन। मतलब कि जैसे कि आप सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन के थ्रू बढ़ते जाओगे, तो आप ज्यादा सोशल बनते जाओगे, और आपका सेल्फ कॉन्सेप्ट भी काफी ज्यादा बढ़ता जाएगा। तो इससे यहां पे ये भी फोकस किया है कि सोशल कंडीशनज़ जो होती हैं, वो भी डिटरमाइन करती हैं। जैसे मैंने आपको स्टार्टिंग में कहा, जैसे आप रहते हो, उस पे भी डिटरमाइन होता है। अंदर थ्योरी ऑफ़ अनकंडीशनल पॉज़िटिव रिगार्ड। मतलब कि इंसान जो भी कर रहा है, सामने से आप उसको अनकंडीशनल पॉज़िटिवली आप उसपे फोकस कर रहे हो, चाहे वो जो भी कहे, ठीक है? जो भी करे, आप उसको पॉज़िटिवली उस पे फोकस करो। डेट इज़ व्हाट अनकंडीशनल पॉज़िटिव रिगार्ड। और रोजर्स ने कहा कि की नॉर्मल सोसाइटी में हम लोग ये नहीं ला सकते। नॉर्मल सोसाइटी में कॉन्फ्लिक्ट होते हैं। हम चाहते हैं कि लोग 100% में हेल्प करें। थेरेपी में हमको जरूरी हो जाता है अनकंडीशनल पॉज़िटिव रिगार्ड दिखाना उसके साथ। इसलिए डेवलप हुआ क्लाइंट सेंटर्ड थेरेपी, क्लाइंट के ऊपर फोकस करना, क्लाइंट के डेवलपमेंट के ऊपर फोकस करना। तो बहुत सारे टर्म्स यूज़ कर लिए। एक बार रिवाइज़ कर लेते हैं। सबसे पहले कार्ल रोजर्स की बात करेंगे, तो हम लोग फुल्ली फंक्शनिंग ह्यूमन क्या होता है, वो बोलेंगे। इसके दो बेसिक अज़म्पशन्स क्या हो गए ह्यूमन बीइंग के बारे में, सिर्फ इतना ज्यादा फोकस किया है, वो लिखेंगे। और सेल्फ में आइडियल सेल्फ वर्सेज़ रियल सेल्फ और डिज़अपॉइंटमेंट के बारे में, सेल्फ कॉन्सेप्ट, सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन का ये जो रिलेशनशिप है, इसके बारे में फोकस करेंगे। इसके बाद थोड़ा-थोड़ा लिख देंगे अबाउट यू नो, पर्सन का जो सोशल कंडीशन होता है, डेवेलपमेंट पे करता है कि वो कैसे बिहेव करते हैं। और फाइनली अनकंडीशनल पॉज़िटिव रिगार्ड और क्लाइंट सेंटर्ड थेरेपी ये सब चीज के अंदर आ जाएंगे।
मास्लो ने हीरार्की दी थी, जो बहुत ज्यादा फेमस है, मास्लोज़ हीरार्की ऑफ़ नीड्स। और इस हीरार्की में सबसे ऊपर उन्होंने रखा था सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन। एक ऐसा स्टेट जहां पे आप यू नो, अपना सब कुछ अचीव कर लो, तो फुल पोटेंशियल पे आप ऑपरेट करो। सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन बिकम्स पॉसिबल बाय एनालाइज़िंग द मोटिवेशन्स डेट गवर्न आपकी जो मोटिवेशन्स हैं, आप उसको गवर्न कर रहे हैं आपके लाइफ को, उसको आप जब एनालाइज़ करते हो, तो आप सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन आपके पास पढ़ सकते हो। हमको पता है कि बायोलॉजिकल सिक्योरिटी और बिलॉन्गिंग नीड्स आर कॉमनली फाउंड अमोंग एनिमल्स और ह्यूमन बीइंग्स। 10 इंडिविजुअल का जो सोल कंसर्न होता है, सेटिस्फ़ैक्शन ऑफ़ दिस नीड्स रिड्यूस हम और हर्ट्स लेवल्स। तो ये मास्लो बेसिकली कह रहे हैं कि ये जो बायोलॉजिकल नीड्स होती हैं, बेसिक जो नीड्स होती हैं, जो सबसे लो लेवल की होती हैं, ये एनिमल और ह्यूमन बीइंग्स में काफी ज्यादा सेम होती हैं। बट एज़ ह्यूमन बीइंग्स वी हैव मोर पोटेंशियल देन एनिमल्स, तभी वी सब्सक्राइब टू बोथ वर्किंग टुवर्ड्स सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन। कि इन नीड्स से ऊपर उठ के जो ऊपर की नीचली यू नो, अपने आप को सेटिस्फ़ाई करने की नीड्स जो हैं, इंटेलेक्चुअल नीड्स जो हैं हमारे, ठीक है? हमारा जो सेल्फ एक्चुअलाइज़ेशन है, इन सब पे भी हमको फोकस करना होगा। बिकॉज़ डेट इज़ व्हाट मेक्स अस डिफरेंट फ्रॉम एनिमल्स।
फाइनल जो टॉपिक है आपका यहां पे, इस एसेसमेंट ऑफ़ पर्सनालिटी। ठीक है? एसेसमेंट ऑफ़ पर्सनालिटी। हम लोग पर्सनालिटी को तो देयर लाइफ़ में काफी एक्सेस करते रहते हैं, बट साइंटिफिकली उसको हम लोग कैसे एसेस करते हैं, वो हम यहां पे पढ़ने वाले हैं। एसेसमेंट एफर्ट्स टू यूज़ प्रोसीज़र्स टू इवेल्यूएट और डिफरेंशिएट पीपल ऑन द बेसिस ऑफ़ सर्टेन करैक्टेरिस्टिक्स। सर्टेन करैक्टेरिस्टिक्स होते हैं, उसके बेसिस पे हम लोग लोगों को कैसे डिफरेंशिएट करते हैं, कैसे यू नो, डिफाइन करते हैं, डेट इज़ व्हाट एसेसमेंट इज़ अबाउट। और जो साइकोलॉजिकल एसेसमेंट होता है, पर्सनालिटी एसेसमेंट होता है, वो फॉर्मल एफर्ट होता है किसी भी पर्सनालिटी को एसेसमेंट करने का। बहुत सारे मेथड्स होते हैं, जिससे आप एसेस कर सकते हो। मोस्ट कॉमन मेथड्स जो होते हैं, वो हैं साइकोमेट्रिक अप्रोच, सेल्फ़ रिपोर्ट, प्रोजेक्टिव टेक्निक्स और बिहेवियरल एनालिसिस। और इसके बाद आप इसमें 10 सब्सकेल्स होते हैं, जिसके बेसिस पे आपको जज किया जाता है। और ये 10 सब्सकेल्स हैं: हाइपोकोंड्रायसिस, डिप्रेशन, हिस्टीरिया, साइकोपैथिक डिवाइज़, मैस्क्युलिनिटी-फेमिनिनिटी, पैरानॉइया, साइकैस्थेनिया, साइकोटिक इंडिया, मैनिया और सोशल इंट्रोवर्शन। अब ये जो चीजें हैं, यूज़ुअली नहीं आई हैं एग्ज़ाम में, बट यू नेवर नो। सीयूईटी में आपसे पूछ ले कि इनमें से कौन सी चीज है जो एमएमपीआई नहीं पढ़ना है या पढ़ना है, तो प्लीज़ इन सब शब्दों को एक बार ध्यान से पढ़ लीजिएगा। ठीक है? इसके साथ इंडिया में भी एमएमपीआई को इंडियन कल्चर में करने का भी टेस्ट हुआ है। मलिक और जोशी ने बनाया है, जिसको हम कहते हैं जोधपुर मल्टी टेस्ट, बिकॉज़ अमेरिका से। तो इंडिया का जोधपुर मल्टी पर्सनालिटी इन्वेंटरी टेस्ट, ठीक है? आईकॉन का पर्सनालिटी क्वेश्चन है जो मैंने आपको ऑलरेडी बता दिया। एपीआई, जो इंट्रोवर्टेड, इमोशनल, स्टेबल टेस्टिस, हम वर्सेज़ स्टेबिलिटी और साइकाइज़्म वर्सेज़ सोशिएबिलिटी पे फोकस करता है। नेक्स्ट इज़ 16 पीएफ़, जो हम लोग अगेन ऑलरेडी पढ़ चुके हैं, कैटेल ने दिया था। बहुत सारे स्टेट्स में से उन्होंने डिफाइन किया फैक्टर एनालिसिस के, और 16 स्टेट्स पे आ गए। तो अब इसमें जो स्टेटमेंट्स होते हैं, वो डिक्लेअरेटिव स्टेटमेंट्स होते हैं, और सब्जेक्ट को रेस्पॉन्ड करना होता है टू एन स्पेसिफिक सिचुएशन बाय चूज़िंग फ्रॉम ए सेट। उनको ऑप्शन्स दिए जाते हैं, सिचुएशन दी जाती है। अब उनको चूज़ करना होता है कि मैं इस तरीके से बिहेव करूंगा या फिर मैं इस तरीके से यू नो, रेस्पॉन्ड करूंगी इस पर्टिकुलर सिचुएशन में। ये हाई स्कूल स्टूडेंट्स में यूज़ुअली दिया जाता है, और एडल्ट्स में भी देखा जाता है कि इसे किया जा रहा है। अब टेस्ट होता है सेल्फ़ रिपोर्ट मेज़र्स में ना थोड़े से इशूज़ आ जाते हैं, जैसे कि सेल्फ़ डिसाइज़, सोशल डिजायरेबिलिटी। जो आंसर्स वो देने हैं, वो नेसेसरी नहीं है कि वो उनके लिए ट्रू हो। वो शायद उसे तरीके से इसलिए आंसर कर रहे हैं, क्योंकि वो सोशल डिजायरेबल हो। तो इंसान जो एग्रेसिव है, वो शायद से इस वे में डिसाइड यू नो, आंसर करेक्ट और चीज दिखाएं, क्योंकि उनको लगे कि नहीं, ये सोसाइटी ज्यादा एक्सेप्ट करते हैं, तो मैं आंसर भी ऐसे दूंगा। नेक्स्ट होता है एक्वेसेंस, आपको सेंड दिस बेसिकली, और चाहे जो भी आंसर हो, आप यस यस यस, तो वो आपका हो जाता है। उसके बाद ऑब्वियसली लोग हमेशा सच नहीं बोलते हैं, थोड़े लोग इंटरेस्टेड नहीं होते। तो ये सारी जो प्रॉब्लम्स होती हैं, वो बहुत ज्यादा इशू क्रिएट कर देती हैं सेल्फ़ रिपोर्ट के रिलायबिलिटी के ऊपर।
नेक्स्ट टेक्निक्स जो है हमारे पास, इस प्रोजेक्टिव टेक्निक। प्रोजेक्टिव टेक्निक्स बेसिकली ए टेक्निक्स जहां पे सेल्फ़ पर्सनालिटी को स्टडी किया जाता है बाय डूइंग यू नो, थोड़े से जो स्टीमुलाई होते हैं, वो क्लियर नहीं होते हैं, वो डायरेक्टली हम लोग नहीं स्टडी कर रहे होते हैं। जहां पर हम लोग यू नो, नॉर्मल स्टडीज़ में क्वेश्चंस दे रहे होते हैं, प्रॉपर एकदम एसेसमेंट होता है। इन वाले सिचुएशन में जो क्या होता है, डायरेक्ट मेथड नहीं होता है। इनडायरेक्ट हम लोग स्टडी करना चाहते हैं। कैसे स्टडी करते हैं? अभी एग्ज़ाम में आपको तो स्टीमुलाई स्ट्रक्चर होता है यहां पर, या फिर पूरा ही अनस्ट्रक्चर्ड स्टीमुलाई होता है, और देन उसके बाद इंसान को पूछा जाता है कि आपको स्टीमुलाई को देख के क्या लग रहा है? आपको क्या रिस्पांस आ रहे हैं? उसे रिस्पांस हम इंटरप्रेट करते हैं कि इंसान एक्चुअली में क्या फील कर रहा है, उनकी पर्सनालिटी कैसी है? तो इसको ना आप एग्ज़ांपल के साथ ही समझ पाएंगे, पर यहां पर आप देख लीजिएगा थोड़े से नेचर्स दिए गए हैं। सिमिलर के सिमिलर कंस्ट्रक्शन होते हैं। जैसे ये देखिए, ये आपको ये जो डायग्राम दिख रहा होगा, फोटो दिख रहा है, ये अनस्ट्रक्चर्ड है। ठीक है? यहां पे आपको देख नहीं सकते हो कि आप मुझे क्या हैं एक्जेक्टली। काफी अनस्ट्रक्चर्ड, काफी एम्बिगुअस डायग्राम है। इसके साथ जो पर्सन है, उसको यूज़ुअली पता नहीं होता कि इसका पर्पज़ क्या है। यहां पे कोई करेक्ट और रॉन्ग आंसर नहीं होता। ठीक है? जो आपके मन में आ रहा है, वो आंसर कीजिए। और इस रिस्पांस जो होता है, वो कंसीडर करते हैं कि बहुत सिग्निफ़िकेंट है। दिस रिस्पांस से कुछ इम्पोर्टेंट ही रिवील करेगा इंसान के बारे में। और स्कोरिंग जो होती है, वो ऑब्जेक्टिव नहीं होती, सब्जेक्टिव होती है। बहुत ही ज्यादा यू नो, डिफिकल्ट होती है। इसके लिए आपको बहुत ज्यादा ट्रेन होना पड़ता है अगर आपको स्कोर करना चाहते हैं तो। ये जो चीजें होती हैं, रोर्शाख ने दिया था, जहां पे आपको बेसिकली 10 इंकब्लॉट्स दिखाई देते हैं। फाइव ऑफ़ देम आर ब्लैक टुवर्ड्स ग्रे, रेडिंग, और बाकी जो तीन हैं, वो आपके होते हैं पास्टल कलर्स में। ये सिमिट्रिकल होते हैं। बेसिकली आपका जो पेपर होता है, उसमें एक ब्लू डाल दिया जाता है और फोल्ड किया जाता है, और जो आपका शॉप बन गया आता है, उसे ऑब्वियसली सिमिट्रिकल होगा बिकॉज़ फोल्ड करना है आप लोग पेपर को। और ये सेवन बाय 10 वाले साइज़ में देखने को मिलता है। यहां पे दो फेज़ होते हैं। एक होता है परफॉर्मेंस प्रॉपर, यहां पे आपका परफॉर्मेंस कर रहे होते हो, यू नो, आपसे पूछा जाता है आपको क्या दिख रहा है, क्या आप सोच सकते हो। और इंक्वायरी चेंज़ होता है जहां पे आपको जो रिस्पांस मिला है, आप उसको एसेस कर रहे हो। यहां पे काफी ज्यादा कंप्यूटर टेक्निक्स का भी यूज़ किया जा रहा है आजकल टू अंडरस्टैंड द मेटर ऑफ़ रिसेप्शन। टेस्ट जो होता है, डेट इज़ डेवलप्ड बाय मॉर्गन और मोर एंड। यहां पे आपको 30 पिक्चर्स दिखाई जाती हैं, ब्लैक और व्हाइट इमेज, और यहां पे एक ब्लैक कार्ड भी दिया जाता है। इच पिक्चर में सर्टेन सिचुएशंस होते हैं, और इंसान से पूछा जाता है कि अच्छा, उस सिचुएशन में आपको क्या दिख रहा है? आप उससे स्टोरी लाइन बनाओ और यू नो, इच पिक्चर में आपको एडल्ट मेल देखने को मिलेंगे, थोड़े में फीमेल दिखाई जाएंगी, बॉयज़ और गर्ल्स होंगे। तो बेसिकली 20 कार्ड्स यूज़ुअली यूज़ किए जाते हैं, सारे 30 को नहीं यूज़ करते हैं। 20 कार्ड्स में यूज़ुअली आ जाता है। तो कभी-कभी एवन कम कार्ड्स में भी लोगों ने देखा है कि सब्जेक्ट का एक्यूरेट डिस्क्रिप्शन हम लोग बना सकते हैं। और देन उसके बाद बेसिकली यही पूछा जाता है कि अच्छा, जैसे ये इमेज है, क्या स्टोरी है? क्या चल रहा है? इनके दिमाग में क्या आपको लगता है? और जैसे वो सिचुएशन पे रेस्पॉन्ड करते हैं, वैसे आप डेवलप कर सकते हो उस इंसान के पर्सनालिटी का अंडरस्टैंडिंग। इसका इंडियन वर्ज़न चौधरी ने बनाया है। इसका इंडियन एडॉप्शन। नेक्स्ट, स्पेशली रोशन भाई पिक्चर्स, फ्रस्ट्रेशन टेस्ट। इसमें बेसिकली क्या होता है? इंसान को एक सिचुएशन दिखाई जाती है पिक्चर में, जो बहुत ज्यादा फ्रस्ट्रेशन क्रिएट कर सकती है। अब इंसान से पूछा जाता है कि आप बिहेव कैसे करोगे? वैसे आप फ्रस्ट्रेशन लेवल जो होता है, एग्रेसन लेवल होता है, उसको स्टडी करने की कोशिश करते हो। तो यही लिख रखा है। चाइल्ड को कार्टून दिखाए जाते हैं, एनालिसिस होता है रिस्पांस का, और देखा जाता है कि किस डायरेक्शन में आपका एग्रेसन देखने को मिलता है। नेक्स्ट है आपका सेंटेंस कंप्लीशन, अच्छा सॉरी, पारीक जो है, उन्होंने डेवलप किया है एक इंडियन एडॉप्शन ऑफ़ पिक्चर फ्रस्ट्रेशन टेस्ट। ठीक है? सेंटेंस कंप्लीशन टेस्ट कुछ नहीं है। बेसिकली जैसे कि ये सेंटेंस दिए हुए हैं: माय फादर माय ग्रेटेस्ट फियर इज़, आई एम प्राउड ऑफ़। तो ये ऐसे सेंटेंस दे जाते हैं, और आपको बोला जाता है आप इसे सेंटेंस को फिल कर दीजिए। फर्स्ट पार्ट दिया जाता है, सेकंड पार्ट फिल करता है, और देन जो साइकोलॉजिस्ट होता है, वो उसको एनालाइज़ करते हैं, इंटरप्रेट करते हैं, तो अंडरस्टैंड व्हाटएवर द पर्सन इज़ गोइंग थ्रू। नेक्स्ट इज़ ड्रा ए पर्सन टेस्ट। यहां पे बोला जाता है कि आपको बेसिकली ड्रा करना होता है। सबसे पहले आपको ड्रा द पर्सन ऑफ़ देयर ओन सेक्स। फिर उसके बाद बोला जाता है कि आप दूसरे सेक्स के इंसान को ड्रा करो। यहां पे बेसिकली देखने को मिलता है कि जब भी कोई फेशियल फीचर्स अगर वो अमिट कर रहे हैं, डेट मीन्स डेट द पर्सन इज़ ट्राइंग टू अवॉयड द हार्डली कॉन्फ्लिक्टिंग इंट्रापर्सनल रिलेशनशिप। ठीक है? तो ये बेसिकली दे रखा है, ऐसा होगा। तो अगर आपके जो ड्रॉइंग्स हैं वहां पर स्पेशल फीचर्स नहीं देखने को मिल रहा है, तो बेसिकली इंडिविजुअल जो है वो अपने जो इंटरपर्सनल रिलेशनशिप में इशू आ रहे हैं, उससे विद्रोह करने की कोशिश कर रहा है। अगर जो ड्रॉइंग है उस पे ग्राफ़िक एम्फ़ैसिस है, मतलब कि वो इम्पल्स को कंट्रोल नहीं कर पाते। अगर हेड का साइज़ बहुत ज्यादा बड़ा है बॉडी के साइज़ से, तो इट्स शोज़ यू नो, बेसिकली ऑर्गेनिक ब्रेन डिज़ीज़ का साइन हो सकते हैं या फिर ऑक्यूपेशन विद हेडिंग। अगेन ड्रा पर्सन टेस्ट को एसेस करना भी काफी डिफिकल्ट है। हर प्रोजेक्टिव टेस्ट को एक्सेस करना काफी डिफिकल्ट हो जाता है, तो इसलिए आपको एक्सटेंसिव ट्रेनिंग जरूरी होती है।
बिहेवियरल एनालिसिस जो होता है, ये आपके फोकस करते हैं साइंटिफिक मेथड पे। जैसे कि सबसे पहले इंटरव्यू आ जाता है। इंटरव्यू में बेसिकली आप वन ऑन वन
दे रहे हो तो ये जो बायोसिस होते हैं इससे भी आपका जो रिजल्ट होता है वो जरूरी नहीं है कि हमेशा सही है। कभी-कभी ये भी इश्यूज क्रिएट कर देते हैं।
नेक्स्ट आता है आपको नॉमिनेशन। नॉमिनेशन आपने बिग बॉस में सुना होगा। आईटी कैन बी दान विद डी परसों हूं हज बिन यू नो मतलब बहुत ही लॉन्ग टर्म इंटरेक्शन होता है। उससे पूछा जाता है कि अच्छा अगर आपको एक टास्क तो आप किसके साथ वो टास्क करना चाहेंगे? अच्छा आप इसके साथ टास्क करेंगे क्यों टास्क करना चाहेंगे? आप इसे साथ के साथ वो आपका बेसिकली ए जाता है। नॉमिनेशन तो लॉन्ग टर्म इंटरेक्शन होता है और दें उसके बाद नॉमिनेशन से वो चीज करते हैं परसों को दें उसके बाद वो एक्सप्लेन करते हैं कि ऐसा उन्होंने क्यों किया। नॉमिनेशन से फिर हम लोग समझ सकते हैं कि इंसान का क्यों मतलब यू नो जो दूसरा इंसान है जिसके बड़े में वो रजिस्ट्रेशन बना रहे हैं वह इंसान कैसा है। इंपॉसिबल उनकी पर्सनालिटी को हम एसेस कर सकते हैं। ऑब्वियसली पर्सनल बाइक्स ए जाते हैं कहानी ना कहानी बट मोर और ली नॉमिनेशन इस एन गुड वेरिएबल मतलब गुड वे पर एन सो अंडरस्टैंड पर्सनालिटी।
सो फाइनली इस डी सिचुएशन टेस्ट। सिचुएशन टेस्ट में बेसिकली क्या हुआ जाता है? दिस इस डी मोस्ट कॉमनली यूज्ड किड ऑफ टेस्ट पर इवेलुएटिंग डी हम वेयर इस के अंदर और इसमें जो इंसान होता है हम उसको एक सिचुएशन में जाते हैं जहां पे वो बहुत ज्यादा स्ट्रेस को मतलब यू नो स्ट्रेसफुल सिचुएशन में होता है और वो बिकॉज़ एन स्ट्रेसफुल सिचुएशन में है। दें उसके बाद उनको उन लोगों के साथ डाला जाते हैं जो नॉन कोऑपरेटिव और इंटरफेयर इंपॉर्टेंट है। अब देखा जाते हैं वो कैसे तरीके से बिहेव करेंगे। इसके साथ यहां पे रोल प्लेईंग भी देखा उसे किया जाता है। यूजुअली सिचुएशंस में और डी वर्बल रिपोर्ट इस अलसो ऑप्टेड। दिस सिचुएशन शायद रियलिस्टिक भी हो सकती है या फिर वीडियो प्ले वाली सिचुएशन भी हो सकती है। तो सिचुएशन टेस्ट में बेसिकली एक्चुअल लाइफ में वो कैसे बिहेव करेंगे वो हम लोग ट्राई करते हैं एसेसमेंट का।
यहां पे आपका चैप्टर खत्म हो जाता है। आई होप काफी ज्यादा लॉन्ग चला गया ये चैप्टर बट डेट इस बिकॉज़ इसमें कॉन्टेंट इतना ज्यादा था। आई होप आपको समझ में आ गया हो अभी तक। आई हैव ट्राइड टू कवर एवरी सिंगल डिटेल और अगर आपको किसी भी क्वेश्चन पे डाउट है आप वापस पर्टिकुलर पार्ट में जाके रिवाइंड कर सकते हैं। बट इसके अलावा अगर आपको कोई और डाउट आता है आप कमेंट सेक्शन में भी लिख सकते हैं। आई विल डेफिनेटली ट्राई टू आंसर। थैंक यू सो मच फॉर वाचिंग दिस वीडियो और आई होप यू हैव अ गुड डे। थैंक यू सो मच [संगीत]