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Sodagar Ki Beti Ka Anokha Waqia || Moral Stories in Urdu || Hindi Moral Stories

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बहुत पुराने जमाने की बात है। बगदाद शहर में एक बहुत बड़ा और दौलतमंद ताजिर रहता था जिसका नाम शेख इमरान था। शेख इमरान की सिर्फ एक ही बेटी थी जो बेहद समझदार, नेक सिरत और नजरों को भा जाने वाली हुस्न की मालिक थी। उसके अखलाक, उसकी जहानत और उसके हुस्न का चर्चा पूरा शहर में आम था।

कई साल पहले शेख इमरान की अहलिया इस दुनिया से रुखसत हो चुकी थी। और अब इस आलीषण हवेली में बस यही बाप और बेटी एक दूसरे का सहारा थे। जब शेख इमरान की बेटी जिसका नाम फौजिया था शादी के लायक हुई तो बाप ने उसके लिए एक रिश्ता सोचा। यह रिश्ता एक ऐसे शख्स का था जो उम्र में फौजिया से करीब दो गुना बड़ा था।

शेख इमरान ने जब यह तजवीज फौजिया के सामने रखी तो उसे सख्त नापसंद गुजर। उसके लिए यह नाकाबिल कबूल था कि वह अपनी जवानी किसी ऐसे शख्स के नाम कर दे जो जैफुल उम्र की दहलीज पर हो। उसने अपने वालिद से साफसाफ इंकार कर दिया कि वह किसी भी कीमत पर इस अदाज उम्र शख्स से शादी नहीं करेगी।

शेखा इमरान ने अपनी बेटी को बहुत नरमी और तदबीर से समझाया कि वह शख्स कोई आम नहीं बल्कि इलाके का सबसे बड़ा जागीरदार उमर बिन सईद है जो बेपनाह दौलत और जायदाद का मालिक है। बेटी अगर तू इससे शादी कर लेगी तो इसकी तमाम दौलत एक दिन तेरी और बालाखिर हमारी ही हो जाएगी। शेख इमरान ने लालच दिलाते हुए कहा।

मगर फौजिया हक और इज्जत की पुजारी थी। उसने दौलत के लिए अपने जमीर और अपनी ख्वाहिशात का सौदा करने से यकजा इंकार कर दिया और अपने बाप की एक भी ना सुनी। शेख इमरान का दिल पत्थर का था। वह मामूली ताजिर नहीं बल्कि तजारत के उसूलों पर चलने वाला आदमी था। उसने देखा कि बात नरमी से नहीं बन रही तो उसके बस्से और अदावत ने उसे अंधा कर दिया। उसने अपनी लाडली बेटी पर जरा भी तरस ना खाया और फौरन यह सख्त हुक्म जारी किया कि फौजिया को हवेली के सबसे अंदरूनी कमरे में कैद कर दिया जाए।

बहुत से दिन इसी तन्हाई और तंगी में गुजर गए। यहां तक कि फौजिया का दिल इस कैद से घबरा गया। बाल आखिर इस कैद से आजादी पाने के लिए उसने एक अनोखी और पुरखतर तकबीर सोची। एक रोज उसने अपने वालिद से कहा, अब्बू जान मैं आपको मजीद नाराज नहीं करना चाहती। जिस उम्र रसीद शख्स से आप मेरी शादी करवाना चाहते हैं, मैं इस शर्त पर उसे अपना शौहर कुबूल करूंगी कि आप मेरी एक नायाब ख्वाहिश पूरी करने का वादा करें।

फौजिया की यह बात सुनकर शेख इमरान की खुशी का ठिकाना ना रहा। उसे लगा कि उसकी कामयाबी यकीनी हो गई है। वह फौरन बोल उठा हां हां मेरी प्यारी बेटी मैं तेरी हर ख्वाहिश पूरी करने को तैयार हूं। एक ख्वाहिश की क्या बात है? तू तो सैकड़ों ख्वाहिशें कर सकती है। मुझे यह यकीन है कि तू मेरी इज्जत रखेगी और उमर बिन सईद से शादी करने पर राजी हो जाएगी। जल्दी बता तेरी वह क्या ख्वाहिश है?

फौजिया ने मुस्कुरा कर कहा अब्बू जान मेरी ख्वाहिश यह है कि आप मुझे 1000 अशरफियां सोने के सिक्के दें ताकि मैं एक ऐसा शानदार शमई दान बनवा सकूं जिसमें 40 शमययां रोशन की जा सके। मैं अपनी शादी से पहले ऐसा ही एक नायाब शमईदान बनवाना चाहती हूं। मेहरबानी करके आज ही शहर के सबसे माहिर सुनार को बुलाइए ताकि मैं उसे तफसील से हिदायत दे सकूं।

उसी दिन शेख इमरान ने माहिर सुनार यूसुफ को बुलाया और उसे कहा कि जैसा शमाईदान मेरी बेटी बनवाना चाहती है उसे जल्द आज जल्द तैयार करो। तुम कईमत की फिक्र मत करना यूसुफ। बस चीज मेरी बेटी की पसंद और मयार के मुताबिक होनी चाहिए।

तब फौजिया ने सुनार यूसुफ को तन्हाई में बुलाया और उसे बहुत एहतियात से यह हिदायत की यूसुफ जब तू यह शमदान तैयार कर तो उसके अंदरूनी हिस्से में इतनी काफी जगह रखना जहां मैं आसानी से छुप सकूं और सबसे जरूरी बात इसमें एक ऐसा खफिया दरवाजा भी बनाना जिसे मैं अंदर से जब चाहूं खोल लूं और जब चाहूं बंद कर दूं। यह कहकर फौजिया ने सुनार को एक नायाब और कीमती हीरा तहफन फ्री के तौर पर दिया और कसम दी कि वह इस खफिया दरवाजे का जिक्र शेख इमरान से हरगिज़ ना करें।

सुनार युसुफ ने 1000 सोने के सिक्कों के अलावा यह इनाम पाकर खुशी से वादा कर लिया। चंद ही रोज बाद सुनार ने सोने का एक बहुत बड़ा हुस्न और माहिरत से तराशा हुआ शमईदान शेख इमरान की हवेली पहुंचा दिया। इसकी तराश खराश ऐसी थी कि आंखें खैर हो जाए। फौजिया ने अपने बाप की नजर बचाकर फौरन इसका खफिया दरवाजा खोला और उसके अंदर एक हफ्ते की खुराक, पानी के मटके और चंद खजूरों का जखीरा छुपा दिया।

अगले रोज जब शेख इमरान ने अपनी बेटी से कहा कि मैंने तेरी ख्वाहिश पूरी कर दी है। अब तुझे भी अपने वादे के मुताबिक इस दौलतमंद जागीरदार से शादी करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। फौजिया ने गमगीन होकर गर्दन झका ली और उसकी आंखों से तपतप आंसू गिरने लगे। शेख इमरान ने इन आंसुओं को कोई अहमियत ना दी। उसने यही सोचा कि हर लड़की अपने मां-बाप का घर छोड़ते वक्त रोया करती है। वह उसी वक्त उठा और बाहर जाकर उमर बिन सईद को शादी की तैयारियों की इत्तला देने चला गया।

बाप के बाहर जाते ही फौजिया ने अपने चमकदार जूते उतारे और हवेली के सहन में बने पुराने कुएं की मंडेर पर रख दिए। फिर उसने फौरन श मैदान का दरवाजा खोला और खामोशी से उसके अंदर छुप गई। शाम को जब शेखा इमरान वापस आया तो उसने इधर-उधर देखा। फौजिया कहीं नजर ना आई। घबराहट और परेशानी में ढूंढते-ढूंढते उसकी निगाह कुएं की मंडेर पर पड़े हुए बेटी के खूबसूरत जूतों पर पड़ी। उसने फौरन यह नतीजा इख्तियार कर लिया कि लड़की ने शादी के खौफ और सदमे से कुएं में छलांग लगा दी है और डूब कर अपनी जान दे दी है। हाय मेरा बेड़ा गर कर हो। वह सीनियों पर हाथ मारते हुए चीख उठा। मैं ही अपनी बेटी का कातिल हूं। मैंने ही उसे इस बदतरीन इंतहा पर मजबूर किया। अगर वह इस बूढ़े अमीर से शादी नहीं करना चाहती थी तो क्या था? मैं उसकी शादी किसी नवजवान गरीब मगर नेक दिल शख्स से कर देता। हाय हाय। यह सब मेरी लालची और जालिमाना हरकतों का नतीजा है।

देर तक आंसू बहाने और खुद को मलामत करने के बाद वह खामोश हुआ। लेकिन फिर उसे सख्त बदनामी का एहसास हुआ। उसे ख्याल आया कि अगर शहर के काजी और कोतवाल को पता चल गया कि उसकी बेटी ने खुदकुशी कर ली है और पुलिस के सिपाही आकर लाश को कुएं से निकालेंगे तो ना सिर्फ पूरे बगदाद में सख्त रुसवाई होगी बल्कि हो सकता है उसे सज्जा भी मिले। उसने फौरन फैसला किया कि वह यह राज किसी पर जाहिर नहीं करेगा। अगर कोई बेटी के बारे में पूछेगा तो वह कह देगा कि वह अपनी खाला के साथ तिजारत के किसी दूरदराज शहर चली गई है।

शेख इमरान के दिल पर सख्त सदमा था। जो ही वह अपने कारोबारी कामों से फुर्सत पाकर हवेली में दाखिल होता। उसे अपनी प्यारी बेटी का मुस्कुराता हुआ चेहरा नजर आता और वह मुंह छुपाकर चुपकेचपके देर तक आंसू बहाता रहता। वह सोने का बड़ा शैदान उसके रंज और गम में मजीद इजाफा करता था। जब भी वह इस शैदान पर नजर डालता तो सोचता कि कितने शौक से मेरी प्यारी बेटी ने यह बनवाया था और उसे एक दफा भी इसमें शमैया रोशन करना नसीब ना हुआ। यह सोचकर बेचारे शेख इमरान की हिचकी बंध जाती।

बाल आखिर उसने फैसला किया कि वह इस गम की निशानी को अपने से दूर कर देगा। उसने फौरन एक गुलाम को हुक्म दिया कि इस शैदान को ले जाकर शहर के सबसे बड़े बाारे जरगरी जवाहरात और सोने का बाजार में रख दे और कोई भी मुंसफाना कीमत लेकर उसे बेच दे।

कुदरत का खेल देखिए। उसी रोज सुल्तान का बेटा शहजादा सलीम घोड़े पर सवार होकर बाारे झरगरी में अपनी मंगेतर के लिए कुछ जेवरात खरीदने आया था। इसकी जल्द ही बादशाहत की ऐलान की हुई शहजादी से शादी होने वाली थी। अचानक शहजादे की निगाह इस सोने के बेमिसाल शईदान पर पड़ी। वह इसे देखकर हैरान और बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि ऐसा शानदार शमई दान तो खुद शाही महल में भी मौजूद नहीं था जिसमें 40 शमैया रोशन हो सके। शहजादे ने मुंह मांगी कीमत देकर वह शमई दान खरीदा और अपने गुलामों को हुक्म दिया कि इसे बड़ी एहतियात से महल में ले जाओ और इसकी खास ख्वाबगाह में सजा दो। जहां वह आराम किया करता था। गुलामों ने तमील की और शमईदान शहजादे के पुरशिकोह कमरे की जीनत बन गया।

उसी रोज जब शमई दान उसके कमरे में रखा गया तो शहजादे ने महसूस किया कि रात का जो खाना सोने चांदी के बर्तनों में उसके लिए लाकर रखा गया था उसमें से कुछ हिस्सा गायब है। शहजादा हैरान हुआ। मगर उसने किसी से कुछ नहीं कहा। लेकिन सुबह के नाश्ते पर भी ऐसा ही हुआ। दूध से भरा हुआ पूरा गिलास आधा दिखाई दिया। चार उबले हुए अंडों में से सिर्फ दो बाकी रह गए और नाश्ते के तीन सेबों में से एक गायब हुआ तो शहजादे ने नाश्ता लाने वाले गुलाम से पूछा यह गड़बड़ी किसने की है? गुलाम सिंह हम गया और उसने अदब से कहा अलीजा आपके खाने या नाश्ते में गड़बड़ी करने की भला किसे जुरत हो सकती है?

हर रात और हर सुबह शहजादे के नाश्ते और खाने में से कोई ना कोई चीज जरूर गायब हो जाती। कभी तो दूध से भरा हुआ पूरा गिलास खाली ही मिलता। शहजादा गुस्से से गुलामों को डांटता। उन्हें सजा देने की धमकी भी देता। मगर रोजाना ऐसी पुरसरार शरारतें हर एक रोज सुबह एक गुलाम उसके सामने नाश्ता लेकर आया तो शहजादे ने देखा कि प्लेटों में हर चीज सही और पूरी है। उसने गुलाम को हुकुम दिया कि नाश्ता मेज पर रखकर चला जाए। उसके बाद वह गुस्लखाने में जाकर हाथ मुंह धोया और फिर अपनी ख्वाबगाह में आया। आते ही उसकी नजर नाश्ते के बर्तनों पर पड़ी तो हैरत से उसका मुंह खुला का खुला रह गया। उसे एहसास हुआ कि शायद गुलाम ठीक ही कहते थे। जरूर इस कमरे में किसी अनदेखी मखलूका ने डेरा जमा लिया है।

शहजादे ने देखा कि चार अंडों में से एक अंडा गायब है। दूध का गिलास आधा रह गया है और दो सेब भी गायब है। कोई और होता तो डर कर इस कमरे को ही खाली कर देता। और इसमें अकेले सोने का ख्याल भी ना लाता। लेकिन शहजादा सलीम एक बहादुर और नडर शख्स था। उसने सोचा यह कैसा जिन या भूत है जो हम इंसानों की तरह नाश्ते और खाने का शौक रखता है। इसे पकड़ना चाहिए। चुनांचे उसने फैसला किया कि वह एक रात जागकर पहरा देगा और देखेगा कि यह पुरसरार चोर कौन है।

इस रात वह झूठ मोठ अपने बिस्तर पर लेट कर सो गया। आधी रात हुई तो उसके कानों में एक अजीब सी आवाज आई। उसने आहिस्ता से गर्दन मोड़कर शैदान की तरफ देखा। सोने के शैदान में से एक शगाफ बन रहा था। फिर देखते ही देखते उस शगाफ में से एक निहायत खूबसूरत नाजुक अंधाम लड़की बाहर निकली। वह लड़की कमरे के दरमियान में खड़ी हुई। उसने सोए हुए शहजादे को एक नजर देखा। फिर दबे पांव उस मेज की तरफ बढ़ने लगी जिस पर शहजादे के लिए रात का खाना चुनकर रखा गया था और जो शहजादे ने जानबूझकर नहीं खाया था। लड़की गर्जी पर बैठ गई और जल्दी-जल्दी खाना खाना शुरू कर दिया। शहजादा कभी-कभी आंखें खोलकर लड़की को देख लेता था। थोड़ी ही देर में लड़की ने अपना पेट भर लिया। फिर वह उठी और दबे पांव शमाईदान की तरफ आई और इसमें दाखिल होना ही चाहती थी कि शहजादा उछल कर खड़ा हो गया और लड़की का हाथ पकड़ लिया।

लड़की बरी तरह सहम कर शहजादे की तरफ देखने लगी। कौन हो तुम? शहजादे ने रूब से पूछा कोई रूह हो परी हो या हम आदमियों की तरह इस दुनिया में रहने वाली एक इंसान लड़की पहले तो सहमी रही लेकिन जब शहजादे ने इसरार किया तो वह रोते हुए बोली मैं एक बेसहारा और मसबतजादा लड़की हूं और फिर शहजादे को उसने अपनी सारी दुख भरी कहानी सुना डाली शेख इमरान का लालच उमर बिन सईद का रिश्ता कुएं पर जूते रखना और शयदान के अंदर छुप जाना उसने सच सच सब कुछ बता दिया।

शहजादे के दिल पर इसकी कहानी का बहुत गहरा असर हुआ। उसे यह लड़की बहुत पसंद आ गई थी। उसने दिल ही दिल में सोचा कि क्या ही अच्छा हो अगर इस लड़की से मेरी शादी हो जाए। लेकिन यह बात अभी उसने अपने दिल में ही पोशीद रखी। शहजादे ने मसलाहत के तहत सौदागर की बेटी फौजिया को उसी श मैदान में छुपा कर ही रखा। जब सारी दुनिया नींद के मजे लेने लगती तो लड़की बाहर निकलती और सुबह होते ही वापस अंदर चली जाती।

एक रात जब शहजादा और फौजिया आपस में हंसहंस कर बातें कर रहे थे तो अचानक एक कनीज महल के इस हिस्से में आई जहां शहजादे की ख्वाबगाह थी। उसके कानों में बातें करने की आवाज आई तो वह एकदम रुक गई और सोचने लगी कि शहजादा तो अपनी ख्वाबगाह में अकेला सोता है। इस वक्त वहां दूसरा कौन है जिससे शहजादा बातें कर रहा है। यह सोचकर वह दबे पांव शहजादे की ख्वाबगाह के करीब आ गई और दरवाजे के एक सुराख से अंदर झांकने लगी। यह देखकर उसके हैरत की इंतहा ना रही कि शहजादे की मसहरी के करीब करसी पर एक निहायत खूबसूरत लड़की बैठी है और शहजादा और वह लड़की दोनों हंसते बोलते हुए बातें कर रहे हैं।

यह तमाशा देखकर तो कनीज के पेट में चूहे दौड़ने लगे। उसने उसी वक्त सुबह का इंतजार किया ताकि सबसे पहले जाकर सुल्ताना मल्लिका को यह खबरें सनसनीखेज सुनाएं। सुबह होते-होते यह खबर आग की तरह तमाम महल में मशहूर हो गई। यह खबर शहजादी जिससे शहजादे की मंगनी होने वाली थी तक भी पहुंची। यह खबर सुनते ही वह शहजादी तो हसद के मारे जल भुन गई और अंगारों पर लौटने लगी। उसने चुपके से अपनी चालाक कनीज को अपने पास बुलाया और बड़े इनाम का लालच देकर कहने लगी अगर तुम मुझे इस लड़की के बारे में यह मालूम करके बता दो कि वह शहजादे की ख्वाबगाह में कैसे आती है और कहां वापस जाती है और कौन है तो मैं तुझे मुंह मांगा इनाम दूंगी।

कनीज बहुत मकर और चालाकत थी। उसने शहजादी से वादा कर लिया कि वह एकद रोज में अच्छी तरह तहकीकात करके बता देगी। इस दिन से कनीज शहजादे की ख्वाबगाह के आसपास फिरती रही। जब आधी रात करीब आई तो शैदान से वह लड़की निकली और पर बैठकर शहजादे से गुफ्तगू करने लगी। कनीज बराबर दरवाजे से आंखें लगाए खड़ी देखती रही। जब अफक पर उजाला फैला और मुर्गों ने अजानियां दी तो वह लड़की गर्सी से उठी। श मैदान में दाखिल हुई और खट से दरवाजा बंद कर लिया। कनीज दौड़ी दौड़ी गई और शहजादी को सारा किस्सा नमक मिर्च लगाकर सुनाया और अपना इनाम तलब किया।

शहजादी ने इनाम देने के बजाय जोरदार तमाचा कनीज के मुंह पर मारा और नाराज होकर बोली दफा हो जा कमबख्त। मेरे सामने से दफा हो जाओ। भला यह भी कोई इनाम की खबर है जिस पर मैं तुझे इनाम दूंगी। कनीज अपना सा मुंह लेकर चली गई। उसके सिवा वह और करती भी क्या?

उधर शहजादी ने मखारी से काम लेते हुए एक अजीब तरकीब सोची। एक दिन उसने सुना कि शहजादा अपने लश्कर और गुलामों के साथ शिकार खेलने के लिए जंगल की तरफ जा रहा है। शहजादी को इस खबर का बेचैनी से इंतजार था। शहजादे के वहां से जाते ही उसने अपना एक गुलाम शाही महल में सुल्ताना मल्लिका के पास भेजा। इस गुलाम ने यह झूठा पैगाम दिया कि आज रात शहजादी की चंद सहेलियां दावत में आने वाली हैं और शहजादी को अपना कमरा रोशन करने के लिए एक बड़े से शमैदान की जरूरत है। उसने सुना है कि शहजादे की ख्वाबगाह में सोने का एक बड़ा शमदान मौजूद है। निहायत मेहरबानी होगी अगर यह शयदान सिर्फ एक रात के लिए दे दिया जाए।

सुल्ताना यह पैगाम सुनकर सोच में पड़ गई। असल में शहजादा शिकार पर जाने से पहले सबको सख्ती से मना ही कर गया था कि कोई गुलाम या कनीज उसकी ख्वाबगाह में कदम ना रखे और सोने का वह शमाईदान जिस जगह रखा गया है वहीं रहने दिया जाए। जब गुलाम ने जवाब मांगा तो सुल्ताना ने साफ इंकार कर दिया कि वह शमाईदान नहीं दिया जा सकता। यह सुनकर शहजादी रोने लगी और सीधी बादशाह सलामत के पास गई और कहने लगी जहां पनाह देखिए मेरी इतनी सी ख्वाहिश भी पूरी नहीं की जा सकती। हालांकि कुछ अरसे बाद मेरी शादी शहजादे से हो जाएगी। फिर मैं खुद ब खुद उसकी हर चीज की मालिक बन जाऊंगी। मुझे सिर्फ एक रात के लिए सोने के शदान की जरूरत है। वादा करती हूं कि सुबह होते ही वापस शहजादे की ख्वाबगाह में भिजवा दूंगी।

अब बादशाह तो बादशाह था। बादशाह सलामत ने गुलामों को हुक्म दिया कि शमदान शहजादे के कमरे से उठाकर शहजादी के पास पहुंचा दिया जाए। शमदान मिलते ही शहजादी ने फौरन इसमें 40 शमय रोशन करवा दी। थोड़ी ही देर में इन जलती हुई शमैइयों की सख्त गर्मी से शमई दान का अंदरूनी हिस्सा टपने लगा। बेचारी फौजिया ने जल जाने के खौफ से मजबूर होकर खफिया दरवाजा खोला और बाहर निकल कर भागी। लेकिन ज्यादा दूर ना जा सकी और वहां कमरे के फर्श पर गिरकर बेहोश हो गई।

शहजादी ने करीब जाकर देखा तो फौजिया को बेहस हरकत देखकर वह समझी कि लड़की मर चुकी है। उसी वक उसने अपने हबशी गुलाम को तलब किया और कहने लगी देखो इस मरी हुई लड़की को किसी कपड़े में बांधो और कैले के बाहर पानी से भरी हुई गहरी खंडक में फेंक दो। खबरदार किसी से इसका जिक्र ना करना। गुलाम ने फौजिया को कपड़े में अच्छी तरह लपेटा। इसका बोझ सा बनाकर कंधे पर डाला और पानी से भरी हुई गहरी खड़क में फेंक कर वापस आ गया।

उधर पानी में गिरते ही फौजिया को होश आ गया। वह असल में मरी नहीं थी बल्कि सख्त गर्मी और खौफ से बेहोश हुई थी। उसने जान बचाने के लिए हाथपांव मारे और मदद के लिए पुकारने लगी। खुदा की कौदत उधर से एक बूढ़ा माही गिर गुजर रहा था जिसका नाम अब्बू नसर था। उसने लड़की के चीखने चिल्लाने की आवाजें सुनी। उसने फौरन खड़क की तरफ देखा तो लड़की डूबती नजर आई। बूढ़े माहीगीर ने बिना सोचे समझे खड़क में छलांग लगा दी। वह बेहतरीन तिराक था। वह जल्द ही लड़की तक पहुंच गया और फौजिया को घसीट कर खड़क के किनारे ले आया। फिर वह उसे अपने गरीबाना घर ले आया और इसका हाल पूछा। मगर फौजिया ने सिर्फ इतना कहा बाबा मैं एक मसईब ज्यादा लड़की हूं और मेरा ठिकाना कोई नहीं है। आज से मैं आपकी बेटी हूं।

सौदागर की बेटी फौजिया बूढ़े माहीगीर अब्बू नसर के घर में रहने लगी और उसकी बेटी बनकर जिंदगी गुजारने लगी।

अब शहजादे का किस्सा सुनिए। जब वह शिकार खेलकर महल में वापस आया तो उस पर गजब टूट पड़ा। उसने देखा कि सोने का शमदान अपनी जगह से हटा हुआ है। मगर इसका खफिया दरवाजा खुला हुआ है और लड़की गायब है। वह गुस्से में गुलामों पर बरस पड़ा। मगर किसी को इस बारे में कुछ मालूम ना था। सब यही कहते रहे कि हमने आपके शमईदान को हरगिज़ नहीं छेड़ा। आखिरकार परेशान होकर शहजादा अपने कमरे में बैठ गया और मसेहरी पर लेट कर खूब रोया। उसे लगा कि उसकी रूह ही उसके जिस्म से निकल गई है। उस दिन से उसने खाना पीना, सैर और तफरीह, हंसना बोलना सब कुछ छोड़ दिया। रोज-रोज उसकी हालत बिगड़ती गई और वह चंद ही दिन में यूं दिखाई देने लगा जैसे बरसों का बीमार हो।

बादशाह और सुल्ताना अपने प्यारे बेटे की बिगड़ती हुई हालत देखकर सख्त परेशान थे। मुल्क भर के हकीमों और तबीबों को बुलाकर शहजादे का इलाज कराया गया। मगर कोई फायदा ना हुआ। और ऐसा मालूम होने लगा कि अगर शहजादे ने एकद दिन और कुछ ना खाया पिया तो उसकी जान बचनी सख्त मुश्किल है। उसे खिलाने पिलाने की हजार कोशिशें की गई मगर कोई कोशिश काम ना आई। आखिरकार एक दाना वजीर के दिमाग में एक तरकीब आई। जल्दी बयान करो वह क्या तदबीर है? बादशाह ने खुश होकर कहा।

वजीर ने कहा वह तदबीर यह है आलीजा कि तमाम सल्तनत में मुनादी करवा दी जाए कि हर शख्स बच्चा हो या बूढ़ा मर्द हो या औरत अपने शहजादे की जान बचाने के लिए खाने या पीने की कोई चीज तैयार करे और महल में लेकर आए। हो सकता है अपनी रैया की यह मोहब्बत देखकर शहजादा फाका तोड़ने पर मजबूर हो जाए। बादशाह को यह तदबीर बहुत पसंद आई। उसी दिन तमाम सल्तनत में मुनादी कर दी गई और गलीगली यह ढिंढोरा पिटा गया कि हर शख्स अपनी पकाई हुई सबसे लजीज चीज लेकर महल में हाजिर हो। शायद किसी के हाथ का पका हुआ खाना शहजादे को पसंद आ जाए और वह इसे खाकर अपना फाका तोड़ दे। देखते ही देखते औरत क्या और मर्द क्या सब खाने पकाने में लग गए। हर शख्स की कोशिश थी कि उसका खाना सबसे उम्दा और लजीज हो। किसी ने जरदा पकाया तो कोई पुलाव की देग लेकर शाही महल की तरफ रवाना हुआ। किसी ने शाही टुकड़े बनाए। कोई कोरमा और मटनजन लेकर गया और किसी ने सिर्फ दाल माश पकाए। गरज हजारों खाने नथ नए और एक से एक जायकेदार तैयार होने लगे। यह सब अपने शहजादे से बहुत मोहब्बत करते थे। लेकिन शहजादा अपनी अदावत का पक्का था। क्या माजल जो उसने किसी खाने की तरफ निगाह उठाकर भी देखा हो?

एक दिन बूढ़े माहीगीर अब्बू नसर के घर में फौजिया ने कहा बाबा जान शहर के सब लोग शहजादे के लिए तरह-तरह के खाने पका कर ले जा रहे हैं। आप भी कुछ ले जाइए ना। अगर कहो तो मैं मछली का शोरबा बना दूं। माहीगीर ने ठंडी आह भर कर जवाब दिया। बेटी हमारे ऐसे नसीब कहां कि शहजादा हमारे घर का पका हुआ शोरबा कुबूल कर ले। बड़े-बड़े अमीरों, रईसों और वजीरों के घर से लजीज खाने पक कर शहजादे के लिए ले जाए और वह उन्हें आंख उठाकर भी नहीं देखता। भला हमारे शोरबे को कौन पूछेगा?

आप लेकर तो जाइए बाबा जान क्या खबर? शहजादे को मछली का शोरबा पसंद ही आ जाए। लड़की ने इसरार किया। अच्छा बेटी तो फिर पका दो मछली का शोरबा। फौजिया ने निहायत मजेदार और हौसला बख्श मछली का शोरबा बनाया और मिट्टी के एक सादे प्याले में भरकर माही गियर को दिया कि वह इसे ले जाए और शहजादे की खिदमत में पेश कर दे। चलते वक्त फौजिया ने खामोशी से एक कीमती अंगूठी शोरबे में डाल दी। यह अंगूठी शहजादे की ही थी जो उसने एक दिन शमदान वाली लड़की को मोहब्बत की निशानी के तौर पर दी थी।

बूढ़ा माही गिर शोरबे का प्याला लेकर शाही महल की जानिब रवाना हुआ तो लोगों ने इसका खूब मजाक उड़ाया। ताने दिए और फिकरे कसे। किसी ने कहा लो इस बूढ़े की अकल मारी गई है कि बदबूदार मछली का शोरबा मिट्टी के प्याले में उंडेल कर शहजादे के लिए ले चला जा रहा है। दूसरे ने आवाज लगाई। अरे बड़े मियां इस गवस्ताखी पर सूली पर लटका दिए जाओगे। तीसरे ने कहा चले हैं गधाशाही महल तक। यूं ही लोगों ने आवाजें की और माही गीर का खूब मजाक उड़ाया। वह बेचारा भी सोचता कि वाकई मेरी औकात कहां कि शहजादे के हुजूर यह शोरबा ले जाऊं। कई दफा दिल में ख्याल आया कि यहीं से उलटे कदमों वापस घर लौट जाऊं। मगर फिर लड़की के बारे में सोचता कि उसने कितने चाव से शहजादे के लिए शोरबा तैयार किया है। अगर मैं वापस गया तो उसके मासूम दिल टूट जाएगा। हां अगर शहजादे ने तहफाक कबूल ना किया तो फिर मेरा क्या कसूर। इसी तरह की हजारों बातें दिल से करता बूढ़ा माहीगीर बालाखिर शाही महल में दाखिल हो गया। बादशाह की जानिब से इजाजत थी कि जो शख्स भी शहजादे के लिए खाना लेकर आए उसे मत रोके। दरबानों और गुलामों ने झटपट माहीर को शहजादे के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। माहीगीर ने डरते-डरते शोरबे का प्याला शहजादे की जानिब बढ़ाया। शहजादे ने कई रोज से कुछ नहीं खाया था और अब बेहोशी के आलम में था। उसने नीम व आंखों से शोरबे के प्याले को देखा और ना जाने क्या हुआ कि फौरन शोरबे का प्याला ले लिया। कैसी उम्दा खुशबू है शोरबे की। शहजादे ने कहा और मजे ले लेकर शोरबा पीना शुरू कर दिया। सब हैरान और परेशान थे कि इस बूढ़े की किस्मत खूब जागटकी है।

शहजादे ने सारा शोरबा पी लिया और अब जो प्याले की तह में निगाह पड़ी तो अपनी वही अंगूठी दिखाई दी जो उसने शमईदान वाली लड़की को दी थी। अंगूठी देखते ही शहजादा खुशी से उछल पड़ा। यूं लगा जैसे जान में जान आ गई हो। उसने बेताबी से बूढ़े माहीगीर का हाथ पकड़ा। उसे एक तरफ ले गया और बोला बड़े मियां जल्दी बताओ यह शोरबा किसने पकाया था? तब माही गीर ने शहजादे को शुरू से आखिर तक सारा किस्सा सुनाया कि किस तरह उसने खड़क में डूबती हुई लड़की को बचाया। फिर उसे घर ले आया और अपनी बेटी बनाकर रखा। यह शोरबा इसी लड़की ने तैयार किया है।

शहजादे ने उसी वक्त दरबार के अमीरों और वजीरों को हुक्म दिया कि वह अपनी बीगमत को बूढ़े माहीगीर के घर भेजें और निहायत इज्जत और एहतराम से इसकी बेटी को शाही महल लेकर आए। थोड़ी ही देर में सौदागर की बेटी फौजिया को बा एतराम तरीके से शाही महल पहुंचा दिया गया। शहजादे ने इसे तमाम हालात से आगाह किया तो उसने रो-रो कर अपनी सच्ची दास्तान सुनाई। बादशाह को भी इन वाक्यात का पता चल गया और उसने फौरन हुक्म दिया कि मक्खन शहजादी से शहजादी की मंगनी तोड़ दी जाए।

तीसरे रोज शहजादा सलीम और सौदागर की बेटी फौजिया की शादी बड़े धूमधाम से हुई। तमाम सल्तनत में चार दिन तक जश्न मनाया गया। गरीबों में खाना तकसीम किया गया और महल में खुशी के नगमे गूंजते रहे। शहजादे ने बूढ़े माहीगीर अबू नसर को भी अपने महल में एक शानदार और सजा सजाया कमरा रहने के लिए दिया और वहां उसने अपनी बाकी उम्र सुकून और खुदा की इबादत में गुजार